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भक्ति में जादू का मिश्रण-हिन्दी व्यंग्य कवितायें


दूसरे पर तरह खाते वही

अपनी देह पर तरह तरह के

वेश धारण करने में

जिनकी आसक्ति है।

चमकते सिंहासन पर विराजे

समाज सेवा के व्यापार में

बेचते भ्रम सत्य के नाम पर

उनके शब्दों में इतनी शक्ति है।

कहें दीपक बापू प्रमाण पत्र

कोई नहीं  देखता

प्रसिद्ध हो जाने पर

प्रश्न नहीं उठाता

चतुराई में सिद्धि आने पर,

गुरु को दोष देना व्यर्थ

शिष्य वही आते

जिनकी जादू में भक्ति है।

——————-

दूसरे पर तरह खाते वही

अपनी देह पर तरह तरह के

वेश धारण करने में

जिनकी आसक्ति है।

चमकते सिंहासन पर विराजे

समाज सेवा के व्यापार में

बेचते भ्रम सत्य के नाम पर

उनके शब्दों में इतनी शक्ति है।

कहें दीपक बापू प्रमाण पत्र

कोई नहीं  देखता

प्रसिद्ध हो जाने पर

प्रश्न नहीं उठाता

चतुराई में सिद्धि आने पर,

गुरु को दोष देना व्यर्थ

शिष्य वही आते

जिनकी जादू में भक्ति है।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”,Gwalior madhya pradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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सत्य से लोग घबड़ाते हैं-हिन्दी व्यंग्य कविताये


कत्ल की खबर

प्रचार के बाज़ार में

महंगी बिक जाती है।

व्याभिचार का विषय हो तो

दिल दहलाने के साथ

 मनोरंजन के तवे पर विज्ञापन की

रोटी भी सिक जाती है।

कहें दीपक बापू साहित्य को

समाज बताया जाता था दर्पण,

शब्दों का अब नहीं किया जाता

पुण्य के लिये तर्पण,

अर्थहीन शब्द

चीख कर बोलने पर

प्रतिष्ठा पाता

जिसके भाव शांत हों

उसकी किसी के दिल पर स्मृति

टिक नहीं पाती है।

———————–

सत्य से सभी लोग

बहुत कतराते हैं,

झूठे अफसानों से

अपना दिल

इसलिये बहलाते हैं।

सड़क पर पसीने से

नहाये चेहरों से

फेरते अपनी नज़र

खूबसुरत तस्वीरों से

अपनी आंखें सहलाते हैं।

कहें दीपक बापू सोच का युद्ध

ज़माने में चलता रहा है,

घमंड में डूबे लोग

अक्ल का खून बहा है,

सौेदागर ख्वाब बेचकर

पैसा कमा रहे हैं,

ज़माने पर अपना

राज भी जमा रहे हैं,

बगवात रोकने वाले

सबसे बड़े चालाक कहलाते हैं।

—————–

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””
Gwalior, madhyapradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

poet, Editor and writer-Deepak  ‘Bharatdeep’,Gwalior
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भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा के अनुसरण से ही विश्व शांति संभव-हिन्दी चिंत्तन लेख


            फ्रांस के पेरिस में लगातार आतंकवादी हमलों से वहां के वातावरण जो भावनात्मक विष मिश्रित हो रहा है उसे कोई समझ नहीं पा रहा है।  ऐसा लगता है कि विश्व में मध्य एशिया से निर्यातित आतंकवाद के मूल तत्व को कोई समझ नहीं पा रहा है। हमारे देश में कथित रूप से जो सर्व धर्म समभाव या धर्म निरपेक्ष का राजनीतिक सिद्धांत प्रचलित है वह विदेश से आयातित है और भारतीय दर्शन या समाज की मानसिकता का उससे कोई संबंध नहीं है। पहले तो सर्व धर्म शब्द ही भारतीय के लिये एक अजीब शब्द है।  हमारे अध्यात्मिक दर्शन में कहीं भी हिन्दू धर्म का नाम नहीं है वरन् उसे आचरण और कर्म से जोड़ा गया है।  कभी कभी सर्व धर्म भाव या धर्मनिरपेक्ष शब्द कौतूहल पैदा करता है।  इस संसार में आचरण या कर्म के आशय से प्रथक अनेक कथित धर्म हो सकते हैं-यह बात भारतीय ज्ञान साधक के लिये सहजता से गेय नहीं हो पाती।

            जब हम यह दावा करते हैं कि हमारे देश में विभिन्नता में एकता रही है तो उसका आम जनमानस में  पूजा पद्धति के प्रथक प्रथक रूपों की स्वीकार्यता से है। हम जैसे अध्यात्मिक ज्ञान साधकों के लिये किसी की भी पूजा पद्धति या इष्ट के रूप पर प्रतिकूल टिप्पणी करना अधर्म करने वाला काम होता है। सर्वधर्म समभाव तथा धर्म निरपेक्ष शब्द अगेय लगते हैं पर इसका मतलब यह नहीं है कि उनकी मूल भावना से कोई विरोध है।  इसके बावजूद विश्व में प्रचलित कथित धर्मों के नाम पर चल रही गतिविधियों का आंकलन करना जरूरी लगता है।  स्पष्टतः मानव में अदृश्य सर्वशक्तिमान के प्रति जिज्ञासा तथा सम्मान का भाव रहता है।  इसी का दोहन के करने के लिये अनेक प्रकार की पूजा पद्धतियां तथा इष्ट के रूप में निर्मित किये गये।  यहां तक सब ठीक है पर उससे आगे जाकर अज्ञात सर्वशक्तिमान  के आदेश के नाम पर मनुष्य जीवन के रहन सहन, खान पान तथा पहनावे तक के नियम भी बनाने की प्रक्रिया चतुर मनुष्यों की अपना स्थाई समूह बनाकर अपना वैचारिक सम्राज्य विस्तार की इच्छा का परिणाम लगता है।  वह इसमें सफल रहे हैं।  पूजा पद्धतियां और इष्ट के रूप अब मनुष्य के लिये धर्म की पहचान बन गये हैं।  उससे भी आगे रहन सहन, पहनावे और खान पान में अपने शीर्ष पुरुषों के सर्वशक्तिमान के संदेश के नाम पर बिना चिंत्तन किये अनुसरण इस आशा में करते हैं कि इस धरती पर इस नश्वर देह के बिखरने के बाद आकाश में भी बेहतर स्थान मिलेगा। पूजा पद्धतियां और सर्वशक्तिमान के रूप ही लोगों की पहचान अलग नहीं कर सकते क्योंकि इनके साथ मनुष्य एकांत में या कम जन समूह में संपर्क करता है जबकि खान पान, रहन सहन तथा पहनावे से ही असली धर्म की पहचान होती है।  हम एक तरह से कहें कि जिस तरह सर्व धर्म समभाव या धर्म निरपेक्षता राजनीतिक शब्दकोष से आये हैं उसी तरह विभिन्न धर्मों से जुड़े शब्द भी प्रकट हुए हैं।  हम सीधी बात कहें तो पूजा पद्धति और इष्ट के रूप से आगे निकली धर्म की पहचान उसके शिखर पुरुषों की राजनीतिक विस्तार करती है।  ऐसे में जब हम जैसे चिंत्तक विभिन्न नाम के धर्मों को देखते हैं तो सबसे पहला यह प्रश्न आता है कि उसकी सक्रियता से राजनीतिक लाभ किसे मिल रहा है?

            इतिहास बताता है कि मध्य एशिया में हमेशा ही संघर्ष होता रहा है। परिवहन के आधुनिक साधनों से पूर्व विश्व के मध्य में स्थित होने के कारण दोनों तरफ से आने जाने वाले लोगों को यहां से गुजरना होता था।  इसलिये यह मध्य एशिया पूरे विश्व के लिये चर्चा का विषय रहा है।  तेल उत्पादन की वजह से वहां माया मेहरबान है और ऐसे में इस क्षेत्र के प्रति विश्व के लोगों का आकर्षण होना स्वाभाविक रहा है।  ऐसे में मध्य एशिया ने अपनी पूजा पद्धति और इष्ट के रूप के साथ मनुष्य जीवन में हस्तक्षेप करने वाली प्रक्रियाओं को जोड़कर अपने धर्म का प्रचार कर अपना साम्राज्य सुरक्षित किया है।  इस क्षेत्र में अन्य पूजा पद्धतियों या इष्ट के रूप मानने वालों को स्वीकार नहीं किया जाता मगर इसके बावजूद उन पर सर्वधर्म समभाव या धर्मनिरपेक्ष भाव अपनाने का का दबाव कोई नहीं डाल सकता।  अलबत्ता इन्होंने अपने दबाव से भिन्न पूजा पद्धतियों और इष्ट के रूप मानने वालों को  सर्वधर्म समभाव या धर्मनिरपेक्ष भाव अपनाने का दबाव डाला।  इनके पास तेल और गैस के भंडार तथा उससे मिली आर्थिक संपन्नता से विश्व के मध्यवर्गीय समाज का वहां जाने के साथ  अपने क्षेत्र में ही प्रमुख धार्मिक स्थान होने की वजह से जो शक्ति मिली उससे मध्य एशिया के देशों की ताकत बढ़ी।  यह क्षेत्र आतंकवाद का निर्यातक इसलिये बना क्योंकि अपना भावनात्मक साम्राज्य विश्व में बदलाव से नष्ट होने की आशंका यहां के शिखर पुरुषों में हमेशा रही है।

            हमें इनकी गतिविधियों पर कोई आपत्ति नहीं है पर हम यह साफ कहना चाहते हैं कि पूजा पद्धति और इष्ट के रूप के आगे जाकर कथित रूप से अन्य परंपरायें शुद्ध रूप से राजसी विषय है-स्पष्टत । सात्विक भाव का इनसे कोई संबंध नहीं है। हमारा भारतीय अध्यात्मिक दर्शन जिसे सुविधा के लिये हम हिन्दू संस्कृति का आधार भी कह सकते हैं वह केवल पूजा पद्धति के इर्दगिर्द ही रहा है।  इतना ही नहीं जीवन को सहन बनाने के लिये योग साधना जैसी विधा इसमें रही है जिसमें आसन, प्राणायाम तथा ध्यान के माध्यम से समाधि का लक्ष्य पाकर व्यक्त्तिव में निखार लाया जा सकता है।  भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का आधार ग्रंथ श्रीमद्भागवत गीता स्वर्णिम शब्दों का भंडार है  सांसरिक विषय का रत्तीभर भी उल्लेख  नहीं है।  स्पटष्तः कहा गया है कि अध्यात्मिक ज्ञान होने पर मनुष्य राजसी विषय में भी सात्विकता से सक्रिय रह कर सहज जीवन बिता सकता है।  खान पान, पहनावे, तथा रहन सहन के साथ ही कोई ऐसा धार्मिक प्रतीक चिन्ह नहीं बताया गया जिससे अलग पहचान बनी रहे। हमारी पहचान दूसरे कथित धर्मों से अलग इसलिये दिखती है क्योंकि उनके मानने वाले अपनी विशिष्ट पहचान के लिये बाध्य किये गये दिखते हैं।

            जिस तरह पूरे विश्व में कथित धर्मों के बीच संघर्ष चल रहा है उसके आधार पर हमारी यही राय बनी है कि उनके आधार राजनीतिक ही हैं। हमारे देश के लोग यह कहते हैं कि धर्म को राजनीति से नहीं जोड़ना चाहिये तो उन्हें यह समझना होगा कि इस नियम का पालन केवल भारतीय अध्यात्मिक विचारधाराओं में ही होता है।  बाहर से आयातित सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा साहित्य विचाराधारायें शुद्ध रूप से राजनीतिक पृष्ठभूमि वाली हैं। अगर ऐसा न होता तो रहन सहन, खान पान तथा पहनावा जो भौगोलिक आधारों पर तय होना चाहिये उसके लिये सर्वशक्तिमान के आदेश बताने की जरूरत नहीं होती।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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कमाई के जरिये पर कोई सवाल नहीं उठता-हिंदी कविताएँ


बाहर हंसने की

नाकाम कोशिश करते लोग

मगर उनके दिल टूटे हैं।

शब्दों का मायाजाल

बुनने में सभी माहिर होते

अनुमान नहीं लगता कि

अर्थ कितने सत्य कितने झूठे हैं।

कहें दीपक बापू सभी के दिल

लगे हैं माया जोडने में,

कुछ उड़ाते

वफा का वादा हवा में

कुछ लगे रिश्ते तोड़ने में,

कमाई के जरिये पर

कोई सवाल नहीं करता

जानना चाहते हैं कि

किसने कितने सिक्के लूटे हैं।

———————

पद पैसे और प्रतिष्ठा के

शिखर पर आकर

हर कोई वाणी के नियम से

मुक्त हो जाता है।

चला न जाता

स्वयं जिस पथ पर

उसके प्रदर्शक बनने की

योग्यता से युक्त हो जाता है।

कहें दीपक बापू रबड़ की जीभ

धरा पर  तलवार की तरह चलती

 तब कोई नहीं देखता

चढ़ जाये सफलता के सिर पर

हर किसी की नज़र में

इंसान का मुख वाक्य

अलंकार से संयुक्त हो जाता है।

——————-

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
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अपनी बात-हिन्दी कविता


कभी कभी हम

कुछ पंक्तियों में

अपनी बात कह जाते हैं।

हालातों से बेजार ज़माना

भटका है बाज़ार की

भूलभुलैया में

किससे कहें अपने शब्द

लोगों के कान

अपने मतलब की बात

सुनने के लिये ही रहते आतुर

हम स्वयं से ही कहते

दिल की बात

कागज अपना साथी बनाते हैं।

कहें दीपक बापू संवेदना से

जिनका नाता है

वही अकविता में भी

कवित्व समझ पाते हैं। 

——————————————

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

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ऊंचे और शानदार भवन-हिन्दी कविताऐं


धन का शिखर

हमेशा चमकदार दिखता है

मगर कोई चढ़ नहीं पाता।

एक रुपये की चाहत

करोड़ों तक पहुंचती

चढ़ते जाते फिर भी लोग शौक से

चाहे वह हमेशा दूर ही नज़र आता।

कहें दीपक बापू माया की दौड़ में

शामिल धावकों की कमी नहीं है,

कुछ औंधे मुंह गिरे

जो दौड़ते रहे

फिर भी उनको

सफलता जमी नहीं है,

यह माया का खेल है

किसी के हाथ आयी

किसी के हाथ से गयी

जीतकर भी कोई नहीं

सिर ऊंचा कर पाया

नाकाम धावक

प्राण भी दांव पर लगाता है।

———————-

हर शहर में

ऊंचे और शानदार भवन

सीना तानकर खड़े हैं।

आंखें नीचे कर देखो

कहीं गड्ढे में सड़क हैं

कहीं सड़कों पर गड्ढे

पैबंद की तरह जड़े हैं।

कहें दीपक बापू खूबसूरत

शहर बहुत सारे कहलाते हैं,

कूड़े के  मिलते ढेर भी

आंखों को दहलाते हैं,

विकास की दर ऊपर

जाती दिखती जरूर है

मुश्किल यह है कि

हमारी सोच स्वच्छ नहीं हो पाती

गंदी सांसों में फेर में  जो पड़े हैं।

—————————-

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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सफाई की जिम्मेदार दूसरे पर-2 अक्टूबर महात्मा गांधी जयंती पर भारत स्वच्छता अभियान पर विशेष हिन्दी कविता


पेट में डालकर दाना

कूड़ा वह राह पर

फैंक देते हैं

यह सोचकर कि

कोई दूसरा आकर उठायेगा।

सभी व्यस्त हैं काम में

फुर्सत नहीं किसी को

फालतू काम और बातों से

ख्याल यह है कि सफाई के लिये

कोई दूसरा आकर

अपना समय लुटायेगा।

कहें दीपक बापू आर्थिक दंड

अनिवार्य होना चाहिये

सार्वजनिक स्थान में

कचड़ा फैलाने पर

तब कोई सफाई के लिये समय

य पैसे स्वयं जुटायेगा।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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छिपाते जो खजाना वही अमीर होते-हिन्दी व्यंग्य काव्य रचनाये


कई बार सुना  वह लोग अमीर हो जाते हैं,

जिनके हाथ छिपे खजाने लग जाते हैं।

कहें दीपक बापू अब देखते हैं हम

छिपाते हैं जो अपना खजाना वही  अमीर कहलाते हैं।

———–

लुटेरों को अब कोई भय नहीं सताता है,

खजाने में पहरेदारों से ही हिस्सा मिल जाता है।

कहें दीपक बापू अपराधों का पैमाना ऊपर जाये तो जाये

रुपहले पर्दे पर ज़माने के हालात पर होती चर्चा

रोने वाला भी कमाई कर जाता है।

———

किस जगह कौनसा सामान कब तक बचायें,

लुटने की फिक्र में जिंदगी कब तक दाव पर लगायें।

कहें दीपक बापू चिंता से बेहतर हैं चिंत्तन करना

सामानों का उपयोग करें पर दिल न लगायें।

————

जिस मशहूर आदमी के हाथ में कोई काम नहीं रह पाता है,

वही सर्वशक्तिमान के दर पर मत्था टेकने पहुंच जाता है।

कहें दीपक बापू पर्दे पर दिखने के  लिये बेताब है सभी

 कोई इंसान अपने चरित्र से भी बेपर्दा हो जाता है।

————–

पर्दे पर चेहरा दिखाने का मोह इंसानों को भटका देता है,

कोई चलता भद्दी चाल कोई चरित्र सरेराह लटका लेता है।

कहें दीपक बापू मूर्खतापूर्ण अदाओं से  बहलाने वाला आदमी

लोकप्रिय होने की तख्ती अपने नाम के साथ अटका देता है।

——————–

खबरची किसी की लहर ऊपर उठाते किसी की गिराते हैं,

डूबने वाले से करते किनारा 

मगर खुद पार लगने वाले पर अपनी मेहरबानी दिखाते हैं।

कहें दीपक बापू पर्दे पर खबरें लहरों की तरह बहती हैं,

आ गयी खोपड़ी के किनारे उन पर ही हम नज़र टिकाते हैं।

—————-

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

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बादशाहों का ताज जनता का हाल-हिन्दी व्यंग्य कवितायें


एक इंसान वह हैं जो कृत्रिम वातानुकूलन यंत्र से सजे

महलों में लेते सांस

रास्ते पर वाहनों में सफर करते हुए भी

जिंदगी में बदलाव की हवा से कांपते हैं,

दूसरी तरफ वह मेहनतकश भी हैं जो

गर्मी की भरी दोपहरिया में

खेत खलिहान और चौराहों पर

पसीना बहाते हुए अपनी तकलीफों से दिखते लापरवाह

चाहे हांफते हैं।

कहें दीपक बापू उन अमीरों को

अपना दर्द सुनाने से कोई फायदा नहीं है,

कांपते जिनके बीमार दिल

मदद देना उनका कायदा नहीं है,

सच यह है कि जंग में खड़े रहते हैं वह यकीन के साथ,

पसीना बहाने में नही डरते जिनके हाथ,

उनकी सच्ची हमदर्दी की वीरता को हम भांपते हैं।

————

इतिहास गवाह है सिंहासन के लिये हमेशा जंग होती रही है,

बड़े योद्धाओं के जीत दर्ज कर पहना ताज क्रांति के नाम पर

यह अलग बात है जनता अपने चेहरे का रंग खोती रही है।

कहें दीपक बापू आम इंसान लड़ता रहा हमेशा

अपने लिये रोटी जुटाने के वास्ते,

मदद मांगने कभी नहीं गया वह राजमहल के रास्ते,

घर पर अपना आसन लगाकर बैठा रहा

उसे मालुम है कोई नहीं बनेगा हमदर्द

वह लोग तो कतई नहीं

जिनकी शाही पालकी

उसकी भुजाओं की मेहनत ढोती रही है

—————-

 

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

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झगड़े से बचने के लिये अज्ञानी की छवि बनाये रखें-संत मलूक दास के दर्शन के आधार पर चिंत्तन लेख


         हमारे देश के लोगों की प्रकृति इस तरह की है उनकी अध्यात्मिक चेतना स्वतः जाग्रत रहती है। लोग पूजा करें या नहीं अथवा सत्संग में शामिल हों या नहीं मगर उनमें कहीं न कहीं अज्ञात शक्ति के प्रति सद्भाव रहता ही है। इसका लाभ धर्म के नाम पर व्यापार करने वाले उठाते हैं। स्थिति यह है कि लोग अंधविश्वास और विश्वास की बहस में इस तरह उलझ जाते हैं कि लगता ही नहीं कि किसी के पास कोई ज्ञान है। सभी धार्मिक विद्वान आत्मप्रचार के लिये टीवी चैनलों और समाचार पत्रों का मुख ताकते हैं। जिसे अवसर मिला वही अपने आपको बुद्धिमान साबित करता है।

            अगर हम श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों के संदर्भ में देखें तो कोई विरला ही ज्ञानी की कसौटी पर खरा उतरता है। यह अलग बात है कि लोगों को दिखाने के लिये पर्दे या कागज पर ऐसे ज्ञानी स्वयं को प्रकट नहीं करते। सामाजिक विद्वान कहते हैं कि हमारे भारतीय समाज एक बहुत बड़ा वर्ग धार्मिक अंधविश्वास के साथ जीता है पर तत्वज्ञानी तो यह मानते हैं कि विश्वास या अविश्वास केवल धार्मिक नहीं होता बल्कि जीवन केे अनेक विषयों में भी उसका प्रभाव देखा जाता है।

                  संत मलूक जी कहते हैं कि
——————-
भेष फकीरी जे करै, मन नहिं आये हाथ।

दिल फकीरी जे हो रहे, साहेब तिनके साथ।

          ‘‘साधुओं का वेश धारण करने से कोई सिद्ध नहीं हो जाता क्योंकि मन को वश करने की कला हर कोई नहीं जानता। सच तो यह है कि जिसका हृदय फकीर है भगवान उसी के साथ हैं।’’
‘‘मलूक’ वाद न कीजिये, क्रोधे देय बहाय।
हार मानु अनजानते, बक बक मरै बलाय।।
‘‘किसी भी व्यक्ति से वाद विवाद न कीजिये। सभी जगह अज्ञानी बन जाओ और अपना क्रोध बहा दो। यदि कोई अज्ञानी बहस करता है तो तुम मौन हो जाओ तब बकवास करने वाला स्वयं ही खामोश हो जायेगा।’’

             हमारे यहां धार्मिक, सामाजिक, कला तथा राजनीतिक विषयों पर बहस की जाये तो सभी जगह अपने क्षेत्र के अनुसार वेशभूषा तो पहन लेते हैं पर उनको ज्ञान कौड़ी का नहीं रहता। यही कारण है कि समाज के विभिन्न क्षेत्रों के शिखरों पर अक्षम और अयोग लोग पहुंच गये हैं। ऐसे में उनके कार्यों की प्रमाणिकता पर यकीन नहीं करना चाहिए। मूल बात यह है कि अध्यात्मिक ज्ञान या धार्मिक विश्वास सार्वजनिक चर्चा का विषय कभी नहीं बनाना चाहिए। इस पर विवाद होते हैं और वैमनस्य बढ़ने के साथ ही मानसिक तनाव में वृद्धि होती है।

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मसले और मजबूरी-हिंदी व्यंग्य कविता


हमें ऊंचे लक्ष्य की तरफ उन्होंने मदद का

भरोसा देकर ऊबड़ खाबड़ रास्ते पर  धकेल दिया

मौका आया तो बताने लगे अपने मसले और मजबूरी,

यूं ही छोड़ जाते तो कोई बात नहीं

उन्होंने बना ली दिल से दूरी।

कहें दीपक बापू तन्हाई इतना नहीं सताती,

बिछड़ने के दर्द दूर करने की कोई दवा नही आती

हमने भी तय किया है

उसी जंग में उतरेंगे जो लड़ सकेंगे खुद ही पूरी।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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इंसान और अंतरिक्ष-हिंदी व्यंग्य कविताएँ


सवाल उठा रहे जहान की हालातों पर

वह अक्लमंद लोग जिनको जवाब देने हैं,

बहस होती  उनमें पर्दे पर विज्ञापनों के बीच

मगर फैसला लापता है

जुबान से निकले शब्दों के

मतलब अक्लमंदों से भी लेने हैं।

कहें दीपक बापू  जहान की मुसीबतों का हल

किसी फरिश्ते के पास भी नहीं मिल सकता

फिर भी कागजी नायक तैयारी करते दिखते हैं

हर कोई टाल रहा असली मुद्दे

क्योंकि लोगों के मसले बहुत पैने हैं।

———-

इंसान भेजता रहता है चांद पर अंतरिक्ष यान,
आंकाश के रहस्य की तलाश में है
मगर अपनी धरती के स्वभाव से हो गया है अनजान।
कहें दीपक बापू संसार में विज्ञान की तरक्की बुरी नहीं
है
मगर दुःखदायी है बिना इंसानियत के ज्ञान,
पत्थर और लोहे का सामान रंग से चमकता है
आंखों देखती है तो दिल धमकता है,
फिर भी लगता है कहीं खालीपन
क्योंकि होती नहीं अपनी जान की पहचान
—————-

 

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””

Gwalior, madhyapradesh

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विज्ञापन की नाव.हिंदी व्यंग्य कविता


कुछ खबरे बनती हैं कुछ बनायी जाती हैं,

बताते हैं खुद खबरची कुछ ढूंढते हैं हम मसाला

बनाते हैं चाट की तरह खबर

मिर्ची सनसनी के लिये

मिलाई जाती हैं।

कहें दीपक बापू पर्दे  हो या कागज

प्रचार की धारा में बहने के लिये विज्ञापन की नाव जरूरी है,

अपने चेहरे को लोकप्रियता के समंदर में

पार लगाने वालों की  यही मजबूरी है,

नशा करते हैं जो पढ़ने सुनने का

उनको खबर की किस्म का हो जाता है अहसास

बयान करने के अंदाज से अपनी वह असलियत बताती है।

—————-

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”,Gwalior madhya pradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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रिश्ता और कीमत-दो हिन्दी व्यंग्य क्षणिकायें


दौलत चाहे बेईमानी से घर में आये

पहरेदारी के लिये ईमानदार शख्स जरूरी है,

ईमानदारी अभी तक नहीं मिटी इस धरती पर

जिंदगी बचाने के लिये उसे बनाये रखना

सर्वशक्तिमान की मजबूरी है।

कहें दीपक बापू अमीरों के छल कपट से

बन जाते है महल

इसे भाग्य कहें या दुर्भाग्य

ईमानदारी की रिश्तेदार मजदूरी है।

——–

हमने तो वफा निभाई उन्हें अपना समझकर

वह उसकी कीमत पूछने लगे,

क्या मोल लगाते हम अपने जज़्बातों का

जो उन पर हमने लुटाये थे

बिना यह सोचे कि वह पराये हैं या सगे।

कहें दीपक बापू रिश्ता निभाना भी उन्होंने व्यापार समझा

जिसकी तौल वह रुपयों की तराजू में करने लगे।

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लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

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बाज़ार से गठबंधन-हिन्दी व्यंग्य कविता


अंगद जैसे उनके पांव नहीं पर फिर भी सेवा के लिये अड़े हैं,

चंदे और दान से व्यापार चलाते शर्म नहीं वह चिकने घड़े हैं।

कागजों पर अपना खुद लिखते हुए इतिहास वह बन गये महान,

मदद का पैसा आत्मप्रचार पर फूंककर पर्दे पर सीना रहे तान,

अपनी चाहतों का पूरा करने के लिये दूसरे का दर्द दिखाते,

खुद करते कमाई ज़माने को तरक्की के सपने देखना सिखाते,

सबके चरित्र पर दाग हैं उन पर कोई उंगली नहीं उठायेगा,

बेआबरुओं से सभी डरते हैं अपनी इज्जत कोई नहीं लुटायेगा,

मशहुर हुए वह  करके बाज़ारों के सौदागरों से गठबंधन,

जिनके नाम का लिया सहारा उन बेबसों का जारी है क्रंदन,

कहें दीपक बापू अपनी सेहत बचाने का जिम्मा खुद पर है

देह हो या दिल की बीमारी दवा के दाम में उनके हिस्से बड़े हैं।

—————-

 

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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गरीब का पसीना बनाता उनका महल-हिन्दी व्यंग्य कविता


बड़े लोग अच्छा कहें या बुरा कुछ फर्क नहीं होता है,

हिचकोले खाते हालातों में ज़माने का बेड़ा गर्क होता है।

गरीबी से रहे जो दूर वही गरीब का उद्धार करने चले हैं,

मजदूरों के पसीने के गाते गीत वही महलों में जो पले है,

जवानी के जश्न का सामान जुटाते वृद्धों का भला करते हुए

अभिव्यक्ति के झंडबरदारों के पास जाते लोग डरते हुए,

विज्ञान की डिग्री लेकर क्रांतिकारी अर्थशास्त्र पर चर्चा करते,

नारे लगाते लोग लेते चंदा जिससे अपना ही खर्चा भरते,

नाटकबाजी से चले आंदोलन  वजन प्रचार से पाते हैं,

तख्त पर पहुंचे लोगों के विचार आखिर खो जाते हैं,

कहें दीपक बापू स्वर्ग के सपने बेचने वाले बाज़ार में बहुत हैं

सस्ते मिले या महंगा सुंदर आवरण में छिपा नर्क होता है।

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

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होली के रंग और रस पर अध्यात्मिक चिंत्तन-होली पर्व 2014 के अवसर पर विशेष हिन्दी लेख


      अगर अंतर्मन सूखा हो तो बाहर पानी में कितने भी प्रकार के रंग डालकर उन्हें उड़ाओ क्षणिक प्रसन्नता के बाद फिर वही उष्णता घिर आती है।  बाह्य द्रव्यमय रंगों का रूप है दिखता है उसमें गंध है जो सांसों में आती है , एक दूसरे पर रंग डालते हुए शोर होता है उसका स्वर है, दूसरे की देह का स्पर्श है। पांचों इंद्रियों की सक्रियता तभी तक अच्छी लगती है जब तक वह थक नहीं जाती।  थकने के बाद विश्राम की चाहत! एक पर्व मनाने का प्रयास अंततः थकावट में बदल जाता है।

      आदमी बोलने पर थकता है, देखने में थकता है, सुनने में थकता है, चलते हुए एक समय तेज सांसें लेते हुए थकता है, किसी एक चीज का स्पर्श लंबे समय तक करते हुए थकता है। आनंद अंततः विश्राम की तरफ ले जाता है।  यह विश्राम इंद्रियों की  सक्रियता पर विराम लगाता है। यह विराम देह की बेबसी से उपजा है। देह की बेबसी मन में होती है और तब दुनियां का कोई नया विषय मस्तिष्क में स्थित नहीं हो सकता।  व्यथित इंद्रियां विश्राम करने  के समय स्वयं को सहमी लगती हैं। 

      योग साधकों की होली अंतर्मन में रंगों के दर्शन करते हुए बीतती है।  एकांत में आत्मचिंत्तन करने का सुअवसर पर मिलने पर अध्यात्मिक चक्षु, कर्ण, नासिका, मुख तथा मस्तिष्क  काम करने लगता है।  बाहर के रंग सूर्य की उष्मा से सूखने के साथ ही फीके होते हैं पर आंतरिक रंग ध्यान से उत्पन्न ऊर्जा से अधिक गहरे होते जाते हैं।  ऐसे में इस बात की अनुभूति होती है कि बाह्य सुख सदैव दुःख में बदलते हैं। जिस तरह हम करेला खाये या मिठाई अंततः पेट में कचड़े का ही रूप उनको मिलता है।  उसी तरह कानों से सुने गये स्वर, आंखों से देखे गये सुदंर दृश्य, नासिका से ली गयी सुगंध और हाथ से स्पर्श की गयी वस्तुओं का अनुभव अंततः स्मृतियों में बसकर कष्ट का कारण बनता है।  हमने वह खाया उसे फिर खाना चाहते हैं। हमने वह देखा फिर देखना चाहते हैं। हमने वह सुना फिर सुनना चाहते हैं। हमने गुलाब के फूल की खुशबू ली फिर लेना चाहते हैं। हमने सुंदर वस्तु को छुआ हम उसे फिर छूना चाहते हैं।  यह लोभ सताता है।   इसका कारण यह कि इन सुखों से प्राप्त विकार मन में बना हुआ है।  योग साधक अपनी साधना से विकार रहित हो जाते हैं। इंद्रियों के गुणों के पांचों विषय-रूप, रस, गंध, स्वर तथ स्पर्श-का सत्य जानते हैं।  इन गुणों के भी गुण वह समझते हैं। इसलिये वह किसी विषय को अपनी इंद्रियों के साथ  ग्रहण करते हुए भी उसके गुणों में लिप्त नहीं होते। योग साधक किसी विषय या वस्तु को छूते हैं, स्वर सुनते हैं, दृश्य देखते हैं, गंध सूंघते हैं, भोजन का स्वाद भी लेते हैं पर उससे प्राप्त सुख का तुरंत त्याग भी कर देते हैं ताकि वह अंदर जाकर दुःख का रूप न ले। अपने अभ्यास से वह विकारों को ध्यान से ध्वस्त कर देते हैं।

      मनुष्य की इंद्रियां बाहर सहजता से विचरण करती है। उन पर नियंत्रण करना कठिन है यह कहा जाता है।  योगसाधकों का इंद्रियों पर नियंत्रण सहज नहीं वरन् स्वभाविक रूप से होता है। इस संसार में मनुष्य मन के चलने के दो ही मार्ग हैं। एक सहज योग दूसरा असहज योग। योग सभी करते हैं। सामान्य आदमी इंद्रियों के वश होकर सांसरिक विषयों से जुड़ता है जिससे वह अंततः असहज को प्राप्त होता है  पर योग साधक उन पर नियंत्रण कर उपभोग करता है और हमेश सहज बना रहता है।  सामान्य मनुष्य होने का अर्थ असिद्ध होना नहीं है और योग साधक को सिद्ध भी नहीं समझना चाहिये।  असहज योगी में नैतिक और चारित्रिक दृढ़ता का अभाव होता है। कोई योग साधक है उसके लिये यह दोनों शक्तियां प्रमाण होती हैं। अगर नहीं है तो इसका आशय यह है कि उसके अभ्यास में कमी है। अपने योग साधक होने का प्रमाण दूसरों को दिखाने की बजाय स्वयं देखना चाहिये।  हम भीड़ में जाकर अगर यह प्रमाण दिखायेंगे तो सामान्य लोग यकीन नहीं कर सकते क्योंकि उनके पास ज्ञान नहीं होता। सहज योगियों के सामने प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने की आवश्यकता भी नहीं है क्योंकि वह दूसरे योग साधक की चाल देखकर ही समझ लेते हैं।

      अध्यात्मिक चिंत्तन, अध्ययन, मनन और अनुसंधान एकांत का विषय है। सत्संग करना चाहिये ताकि दूसरे लोगों से भी अनुभव किये जा सकें।  आत्म प्रचार की भूख सभी को होती है पर योग साधक के कार्य उनके लिये प्रचार का काम स्वतः करते हैं। फिर पं्रचार कर प्रभावित भी किसे करना है? उन लोगों के सामने स्वप्रचार का क्या लाभ जिन्हें सांसरिक विषय भी अच्छे लगते हैं और त्यागियों के सामने प्रचार कोई लाभ भी नहीं है क्योंकि वह परमात्मा के स्वरूप में स्थित हो जाते हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि हमें अपने को प्रसन्न करने का प्रयास करना चाहिये। सहज योग के लिये यह संभव है। जब संसार के सभी लोग असहज योग में रत हों तक सहज योगी को अपनी अनुभूतियां आनंद देती हैं। इनको बांटना संभव नहीं क्योंकि इनका न कोई रूप है न रंस है न ही स्वर है न गंध है न ही इसे स्पर्श किया जा सकता है।

      इस होली और घुलेड़ी पर एकांत चिंत्तन करते हुए हमने इतना ही पाया। इस अवसर पर सभी ब्लॉग लेखक मित्रों तथा पाठको को बधाई।

दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

ग्वालियर मध्यप्रदेश

 

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कैमरे के सामने समाज सेवा-हिंदी व्यंग्य कविता


 कैमरे के सामने आते ही समाज सेवकों की बाछें खिल जाती हैं,

चंदे के कारोबार में प्रचार की पंक्तियों की सांसें मिल जाती हैं।

जन कल्याण की दुकानें शहर और गांव में जगह जगह खुल गयी हैं,

मालिकों खाते चंदे की मिठाई जिसमें  दान की मिश्री घुल गयी है,

देश के एक सिरे से दूसरे सिरे तक सेवकों की टोली फैली है,

बेबसों की संख्या यथावत पता नहीं किसकी नीयत मैली है,

गायक गाते अभिनेता नाचते मजबूरों के लिये चंदा मांगते,

भूल जाते सब जब भरी जेब की पतलून घर में खूंटी पर टांगते,

कहें दीपक बापू विकास दर के साथ गरीबी और बेबसी भी बढ़ी हैं

समाज सेवा के कारोबारियों के खाते में रकम भी बढ़ती जाती है।

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लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

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अपनी खुशी का काम-हिंदी व्यंग्य कविता


 हर कोई लगा रहा एक दूसरे पर भ्रष्टाचार का इल्जाम,

अपने कसूरों से बेखबर लिखते खुद ही अपना ईमानदारों में नाम।

लोगों के खजाने पर खतरे मंडराते हैं नहीं देते अब सांप पहरा,

सारे सबूत सामने हैं पर दावा यह कि चोरी का राज है गहरा,

पर्दे पर चर्चा होती विज्ञापनों के बीच भ्रष्टाचार हटाने की,

हंसी और मजाक करते हुए विद्वान कहते बात महंगाई घटाने की,

शिखर पर पहुंचे खास लोग लगाते हैं भलाई के नये नारे,

बेबस हो रहा आम इंसान दिन में दिखते हैं जमीन पर तारे,

कहें दीपक बापू दूसरे पर न छोड़ो  अपनी खुशी का काम,

हुक्मतों के लिये मुश्किल है खुद ही करो अपनी हंसी का इंतजाम।

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लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

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Gwalior, Madhya pradesh

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हमदर्दी का दर्द से संबंध-हिंदी व्यंग्य कविता


दिखाते हैं हमदर्दी पर दर्द से उनका संबंध नहीं है,

रोज नये वादे करने के महाराथी पर वफा के पाबंद नहीं है।

वाक्पटुता के लिये मशहूर है वह पर शब्द सृजन नहीं करते,

इधर उधर से चुराकर कविता अपनी जुबान में  ही भरते।

रेतीली जमीन पर आम उगाने की हमेशा वह करेंगे बात,

दिन में लोगों के दर्दे पर बोलते पर  भुला देती उनको रात।

चलता रहेगा लोगों के जज़्बात से खेलने का सिलसिला,

लोग सौंप रहे शातिरों को दान पेटी किससे करेंगे गिला।

कहें दीपक बापू धोखे की आग के उनको कभी जलना ही होगा

टूटे इंसानों की आह से उनके स्वाह होने के रास्ते बंद नहीं है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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पर्दे पर चलती खबर -हिंदी व्यंग्य कविता


नित नये स्वांग रचें,

अपने ही सच से आप बचें,

जिंदगी में हर पल एक नया शगूफा छोड़कर

सरल है स्वयं को  बहलाना

मौका मिले तो दूसरे को भी बरगलाना।

कहें दीपक बापू

पर्दे पर चलती खबर

फिल्म की तरह बनी लगती हैं,

पात्रों की अदायें बाद में हुई 

पहले लिखी लगती है,

जब काम न बनता हो अपने आप से

अस्त्र शस्त्रों को पास में दबाकर

भीड़ में हमदर्दी पाने के लिये

अच्छा है चिल्लाने का बहानां

………………………………..

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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सौदागरों के कागजी ख्वाब-हिन्दी व्यंग्य कविता


वह ठहरे हल्के इंसान

चेहरे पर रोज नया मुखौटा लगाकर आते हैं,

गंभीरता का करते हैं नाटक

जल्दी ही जोकर हो जाते हैं।

कहें दीपक बापू

वादों पर कभी वह खरे उतर सकते नहीं,

अपने भरोसे पर यकीन खुद करते नहीं,

यह प्रचार का खेल हैं

जहां उनकी काली नीयत भी सुंदर नज़र आती है,

फरेबी अदायें महंगी बिक जाती हैं,

सौदागर बेच रहे बाज़ार में कागजी ख्वाब,

कारिंदों करें कारिस्तानी वह दिखायें रुआब,

सियायत हो या ज़माने का भला

कामयाब खिलाड़ी वही नज़र आते हैं,

वादों से वफादारी निभाने के बजाय

कागजी नाव जो चला पाते हैं।

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आकाश मुस्करा रहा है -हिंदी व्यंग्य कविता


लगता है ख्वाब में आयेंगे आसमान  से फरिश्ते,

निभायेंगे बिना मिन्नत किये हमसे अपने रिश्ते।

कहें दीपक बापू

हर पल जंग लड़ना ही  जिंदगी की सच्चाई है,

भले ही पलायन करने की कसम हमने खाई है,

बहुत आशिक कर चुके चांद तारे जमीन पर लाने के इरादे,

आकाश मुस्करा रहा है सदियों से सुनकर झूठे वादे,

सपने देखना अब बंद कर दिया लोगों ने,

खरीद रहे दूसरे की सोच घेरा दिमागी रोगों ने,

सभी के घर भरे दुनियां भर के सामानों से,

फिर भी ख्वाहिशों के झुंड के लिये फिर रहे अरमानों से,

दिल बहलाने के लिये भटकते लोगों का समझाना कठिन है

 अक्लमंदों के लिये ठीक यही कि अपना चंदन रहें खुद घिसते।

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माया का विज्ञापन रूप भी है-हिंदी व्यंग्य कविताएं


 रुपहले पर्दे पर जो चेहरे  दिख रहे हैं,

बाज़ार के सौदागरों हाथ बिक रहे हैं।

कहें दीपक बापू खबर और फिल्म एक समान

होता वही है जो पटकथाकार लिख रहे हैं।

————

खबरची लोगों के मन की बात भांप रहे हैं,

रुपहले पर्दे पर कुछ लोग खुश तो कुछ कांप रहे हैं।

कहें दीपक बापू मन तो पल पल  में बदलता है,

महीनों बाद के फैसले पर अभी विद्वान हांफ रहे हैं।

———-

रुपहले पर्दे पर रोज नया सर्वे आता है,

कोई नायक कोई खलनायक बन जाता है।

कहें दीपक बापू माया का विज्ञापन रूप भी है

लोगों की भलाई का नारा भी दाम दे जाता है।

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राजनीति में दावपेंच तो चलते ही रहेंगे-हिंदी चिंत्तन लेख


            हमारे देश राजतंत्र समाप्त होने के बाद लोकतांत्रिक प्रणाली अपनायी गयी जिसमें चुनाव के माध्यम से  जनप्रतिनिधि चुने जाते हैं।  भारत एक बृहद होने के साथ भौगोलिक विविधता वाला देश है। लोकसभा राष्ट्रीय, विधानसभा प्रादेशिक, नगर परिषद तथा पंचायत स्थानीय स्तर पर प्रशासन की देखभाल करती हैं। देखा जाये तो राजतंत्र में राजा के चयन का आधार सीमित था इसलिये आम आदमी राजकीय कर्म में लिप्त होने की बात कम ही सोचता था। हालांकि इस संसार में अधिकतर लोग राजसी प्रवृत्ति के ही होते हैं पर राजतंत्र के दौरान क्षेत्र व्यापार, कला, धर्म तथा प्रचार के अन्य क्षेत्रों में स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने तक ही उनका प्रयास सीमित था। लोकतंत्र ने अब उनको आधुनिक राजा बनने की सुविधा प्रदान की है।  चुनावों में वही आदमी जीत सकता है जो आम मतदाता के दिल जीत सके।  बस यहीं से नाटकीयता की शुरुआत हो जाती है।  स्थिति यह है कि कला, पत्रकारिता, फिल्म, टीवी तथा धर्म के क्षेत्र में लोकप्रिय होता है वही चुनाव की राजनीति करने लगता है। वैसे राजनीति राजसी कर्म की नीति का परिचायक होती है जो अर्थोपार्जन की हर प्रक्रिया का भाग होता है।  राज्यकर्म तो इस प्रक्रिया का एक भाग होता है। राजनीति उस हर व्यक्ति को करना चाहिये जो नौकरी, व्यापार अथवा उद्योग चला रहा है।  केवल चुनाव ही राजनीति नहीं होती पर माना यही जाने लगा है।

            इससे हुआ यह है कि बिना राजनीति शास्त्र ज्ञान के लोग पदों पर पहुंच जाते हैं पर काम नहीं कर पाते। राजकीय कर्म की नीतियां हालांकि परिवार के विषय से अलग नहीं होती पर जहां परहित या जनहित का प्रश्न हो वहां शिखर पुरुषों को व्यापक दृष्टिकोण अपनाना पड़ता है।  इसलिये राजनीति शास्त्र का उनको आम इंसान से अधिक होना आवश्यक है।  भारत में आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक व्यवस्थाओं  से हमेशा ही लोगों में अंतर्द्वंद्व देखा गया है।  देखा यह गया है कि रचनात्मक दृष्टिकोण वाला व्यक्ति लंबे समय तक अपना स्थान बनाये रखता है पर अनवरत अंतर्द्वंद्व की प्रक्रिया के बीच जब कोई विध्वंसक प्रवृत्ति का व्यक्ति खड़ा हो जाता है तो तनावग्रस्त समाज में उसकी छवि नायक की बन जाती है। दूसरी बात यह है कि जब लोग अपनी समस्याओं से जूझते हैं तब उनके बीच जोर से ऊंची आवाज में बगावत की बात कहने से लोकप्रियता मिलती है।  यही लोकप्रियता चुनाव जीतने का आधार बनती है।  इससे उन लोगों को जनप्रतिनिधि होने का अवसर भी  मिल जाता है जो बगावती तेवर के होते है पर उनमें रचनात्मकता का अभाव होता है।

मनु स्मृति में कहा गया है कि

——————

साम्रा दानेन भेदेन समस्तैरथवा पृथक।

विजेतुः प्रयतेतारीन्न युद्धेन कदाचत्।।

            हिन्दी में भावार्थ-अपने राजनीतिक अभियान में सफलता की कामना रखने वाले पुरुष को साम, दाम तथा भेद नीतियों के माध्यम से पहले अपने अनुकूल बनाना चाहिये। जब यह संभव न हो तभी दंड का प्रयोग करना श्रेयस्कर है।

उपजप्यानुपजपेद् बुध्येतैव च तत्कृतम।

बुत्तों च दैवे बुध्यते जयप्रेप्सुरपीतभीः।।

            हिन्दी में भावार्थ-राजनीतिक अभियान में पहले अपने विरोधी पक्ष के लालची लोगों को अपने पक्ष में करना चाहिये। उनसे अपने विरोधी पक्ष की नीति तथा कमजोरी का पता लगाकर अपने अभियान को सफल बनाने का प्रयास करना चाहिये।

            हमारे देश में अनेक प्रकार के राजनीतिक परिदृश्य देखने को मिले हैं।  अनेक संगठन बने और बिगड़े पर देश की राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक स्थिति यथावत रही।  नारे लगाकर अनेक लोग सत्ता के शिखर पर पहुंचे राजनीति तथा प्रशासन का ज्ञान न होने की वजह से वह प्रजाहित की सोचते तो रहे पर आपने कार्यक्रम क्रियान्वित नहीं कर सके। साहित्य, कला, फिल्म तथा पत्रकारिता के साथ ही जन समस्याओं के लिये जनआंदोलन करने वाले लोग जनमानस में लोकप्रियता प्राप्त कर चुनाव जीत जाते हैं पर जहां प्रशासन चलाने की बात आये वहां उनकी योग्यता अधिक प्रमाणित नहीं हो पाती।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”,Gwalior madhya pradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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मय कभी गम दूर नहीं करती-हिन्दी व्यंग्य कविता


मयखानों में भीड़ लगी है,

जैसे भीड़ अभी नींद से जगी है,

लगता है सारा जहान ही

बोतल में खुशियां तलाश रहा है,

एकता की मिसाल मिलती वहां

किसी ने खूब कहा है।

कहें दीपक बापू

कतरा कतरा हलक से उतरती मय

ऐसा शैतान पैदा करती

बात करता  जो फरिश्तों जैसी

मगर  दिल में जिसके

बदनीयती जगह बना लेती है,

नशेड़ी सच बोलता है

किस मूर्ख ने कहा है,

वहम है कि मय पीने से

गम दूर होता है

सच यह है

उतरती शराब से

बढ़ जाता है वह दर्द

जो होशहवास में सहा है,

जिसे कोई करना नहीं आता

पीने लग जाता है

कोई गम कोई खुशी की

वजह झूठी बता रहा है।

————–

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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तख्त के चाहने वाले-हिन्दी व्यंग्य कविता


हुकुमतों के तख्त पर बैठने वाले

चेहरे रोज नये नये आते हैं,

ज़माना जब पांव तले होने का अहसास ऐसा

उनमें कसाई का चरित्र ही पाते है,

कीचड़ की दुर्गंध क्या समझेंगे

अपने महलों में रहते जो इत्र ही  पाते हैं

कहें दीपक बापू

बादशाह बन गया जो इंसान

सड़कों पर उड़ती धूल नहीं आती आंखों में

खुशकिस्मत होता है वही लाखों में,

आम इंसान की भलाई का दावा

वह चाहे कितना भी करे

अपने तख्त का उसे मित्र ही पाते हैं।

—————–

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

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असुरों के अपराध पर बहस-हिन्दी व्यंग्य कविता


असुरों के अपराध पर करते हैं बहस

महिलाओं के हक हड़पने पर

समाज को कोसते हैं,

देवताओं पर लगाते पुरुष होने का आरोप

तोहमत कानून पर थोपते हैं।

कहें दीपक बापू अंग्रेजों ने समाज बांटा,

बुद्धिजीवी लगा रहे हर टुकड़े

बेकार के तर्कों का कांटा,

कोई कर रहा बाल कल्याण,

कोई महिलाओं की रक्षा के लिये चला बाण,

कोई गरीब को अमीर बनाने में जुटा,

कोई बीमार के लिये हमदर्दी रहा लुटा,

हजारों हाथ उठे दिखते हैं

जमाने की भलाई के लिये

मलाई मिलने का मौका मिलते ही

कमजोरों की पीठ में छुरा घौंपते हैं।

————

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

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Gwalior, Madhya pradesh

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जिसके मन में दया है उसे धार्मिक पाखंड करने की आवश्यकता नहीं-हिन्दी चिंत्तन लेख


            हमारे देश में धर्म के विषय पर दो धारायें हमेशा प्रचलित रही हैं-एक निराकार भक्ति तथा दूसरी साकार भक्ति।  जहां तक हमारे प्राचीन धर्म ग्रंथों में वर्णित सामग्री की बात है तो उसमें दोनों ही प्रकार की भक्ति को ही मान्य किया गया है।  वैसे हमारे प्राचीन ऋषियों, मुनियां तथा तपस्वियों ने सदैव ही परमात्मा के निराकार रूप को ही श्रेष्ठ माना है पर देखा यह गया है कि समाज के सामान्य जनों ने हमेशा ही साकार भक्ति करने में ही अपनी सिद्धि समझी है।  समाज ने ऋषियों, मुनियों तथा तपस्वियों को अपने हृदय में तो स्थान दिया पर उनकी निराकार भक्ति से कभी प्रेरणा नहीं ली।  यही कारण है कि साकार भक्ति के कारण पूरा समाज धीरे धीरे तार्किक गतिविधियों की तरफ बढ़ता चला गया।  दरअसल साकार भक्ति में हर मनुष्य अपनी दैहिक सक्रियता न केवल स्वयं देखता है बल्कि दूसरों को भी दिखाकर सुख उठाना चाहता है।

                        मंदिर में जाकर फल, फूल, दूध तथा तेल चढ़ाने की परंपरा साकार तथा सकाम भक्ति का ही प्रतीक हैं। इसके अलावा भी प्रसाद तथा वस्त्र भी मूर्तियों पर चढ़ाये जाते हैं।  इन सब वस्तुओं की आपूर्ति बाज़ार करता है। अनेक मंदिरों में विशेष अवसरों पर पूजा सामग्री, प्रसाद तथा मूर्तियों की दुकानें लगी देखी जा सकती है। कहने का अभिप्राय यह है कि सकाम तथा साकार भक्ति के कारण बाज़ार को लाभ होता है जैसा कि हम जानते हैं कि आर्थिक प्रबंधक सदैव ही अपनी वस्तुओं के प्रचार तथा उनके विक्रय के लिये सक्रिय रहते है।  कभी वह अपनी वस्तुओं का विक्रय करने के लिये किसी स्थान को सिद्ध प्रचारित करते हैं तो कभी अपनी वस्तु को सिद्ध बताकर भगवान के लिये अर्पण करने के लिये लोगों को प्रेरित करते है। इतना ही नहीं मनुष्य में जीवन के रहस्यों को जानने की जो जिज्ञासा होती है उसके लिये मोक्ष तथा स्वर्ग के भी रूप भिन्न भिन्न रूप तैयार किये गये हैं।  जिस धर्म के सिद्धांत अत्यंत सीमित और संक्षिप्त हैं उस पर ही लंबी लंबी बहसें होती हैं। यह बहसें तत्वज्ञान के नारों से शुरु तो होती हैं और समाज अज्ञान के अंधेरे में होती हैं।  दान और दया के रूप को कोई समझ हीं नहीं आया।  गुरु हमेशा ही अपने आश्रमों के लिये दान मांगते हैं तो दया के के नाम पर अपने व्यवसाय के लिये चंदा प्राप्त करने के लिये रसीदें काटते हैं।

महर्षि चाणक्य कहते हैं कि

——————–

यस्य चित्तं द्रवीभूतं कृपया सर्वजन्तुषु।

तस्य ज्ञानेन मोक्षेण किं जटाभस्मलैपनैः।।

                        हिन्दी में भावार्थ-जिसके चित्त में सभी प्राणियों के लिऐ दयाभाव है उसे शरीर पर भस्म लगाने, जटायें बढ़ाने, तत्वज्ञान प्राप्त करने तथा मोक्ष के लिये कोई प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है।

                        जिस मनुष्य में जीवन के प्रति सहज भाव है उसे कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। संत रविदास ने कहा है कि मन चंगा तो कठौती में गंगा। इसके विपरीत बाज़ार के आर्थिक स्वामी तथा प्रचार प्रबंधक अपने शोर से लोगों के मन को ही भटकाते हैं। जिस धर्म का सही ढंग से एकांत में हो सकता है उसे उन्होंने चौराहे पर चर्चा का विषय बना दिया है। भारत ही नहीं अपितु पूरे विश्व में यही स्थिति है।  हर धर्म के ठेकेदार अपने निर्धारित विशिष्ट रंगों के वस्त्र पहनकर यह प्रमाणित करते हैं कि वह अपने समाज के माननीय है। यह अलग बात है कि किसी भी धर्म के मूल प्रवर्तक ने अपने समाज के लिये किसी खास रंग की पहचान नहीं बनायी।  इस तरह धर्म को लेकर एक तरह से भ्रम की स्थिति बन गयी है।

                        अगर हम प्राचीन ग्रंथों के आधार पर धर्म के सिद्धांत की पहचान करें तो वह आचरण के आधार पर बना हुआ होता है। उसको कोई निश्चित कर्मकांड नहीं है। यही कारण है कि धार्मिक रूप से हमारे यहां एकता है पर कर्मकांडों में स्थान और क्षेत्र के आधार पर भिन्नता पायी जाती है। जहां तक स्वयं घर्म के आधार पर चलने का प्रश्न है तो उस पर अवश्य विचार करना चाहिये। प्रातःकाल उठकर योगसाधना तथा पूजा आदि कर मन को स्वस्थ तथा प्रसन्न चित्त बनाना चाहिये। उससे पूरा दिन अच्छा निकलता है। धर्म को लेकर लोगों से अधिक चर्चा नहीं करना चाहिये क्योंकि अधिकतर लोग इस बारे में अपना ज्ञान बघारते हैं। हमारे आसपास धर्म के मार्ग  पर चलने वाले लोग उंगलियों पर गिनती करने लायक ही होते हैं।                       

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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समाज से पहले अपने को सुधारें-हिन्दी लेख


                        हम अपने समाज में रामराज्य की कल्पना कर सकते हैं पर उसे धरातल पर लाना लगभग असंभव है।  कम से कम श्रीमद्भागवत गीता के अध्ययन करने पर तो कोई साधक इस तरह का विचार व्यक्त कर सकता है। उसमें कहा गया है कि इस संसार में दैवीय तथा आसुरीय तो प्रकार के मनुष्य होते हैं। इससे हम यूं भी मान सकते हैं कि इस संसार में दोनों प्रकार के लोग सदैव उपस्थित रहेंगे ही चाहे कोई माने या माने।  इतना ही नहीं दैवीय प्रकृत्ति के लोगों में भी सात्विक, राजस तथा तामस प्रकृत्ति के लोग हमेशा ही अपने स्वभाव के अनुसार सक्रिय पाये जायेंगे।  इस आधार हम कह सकते हैं कि समूची मानव जाति एक ही रंग में रंगी जाये यह संभव नहीं है।

                        समाज में कथित लोग समाज में  सुधार लाने के प्रयासों में लगे बुद्धिमान लोग इस विचार को निराशाजनक विचार मान सकते हैं पर ज्ञान साधकों के लिये यही संसार का सत्य है। यह सत्य उनमें स्वयं को ही सुधारने के लिये प्रेरित करता है।  ज्ञान साधकों को जब यह आभास होने लगता है कि इस संसार का निर्माण जिस तरह परामात्मा के संकल्प के आधार पर हुआ है उसी तरह वह भी अपने देहकाल में संकल्प के आधार अपने आसपास शुद्ध वातावरण का निर्माण करें। वह संसार में दूसरे लोगों  को सुधार कर उन्हें अपने अनुकूल लाने की अपेक्षा अपने अंदर ऐसी शक्ति पैदा करते हैं कि प्रतिकूल व्यक्ति और स्थिति उनके अनुकूल हो जाये।  वह किसी के लिये मन में द्वेष, ईर्ष्या और घृणा का भाव नहीं पालते। कोई दूसरा उनके प्रति कुविचार रखता है तो उसे आसुरीय प्रवृत्तियों के वशीभूत मानकर क्षमा कर देते हैं।  किसी का परोपकार करें या नहीं पर किसी का अपकार करने का विचार हृदय में भी नहीं लाते।  किसी के कठोर वचनों के उत्तर में भी मधुर वचन में बात करते हैं।  प्रमाद या आलस्य से परे होकर सदैव सकारात्मक कार्यों में लगे रहते हैं।  इससे उनके व्यक्तित्व की धवल छवि का निर्माण होता है जिससे कालांतर में उनको सम्मान मिलता है।

                        इसके विपरीत जो अज्ञानी हैं वह बिना कुछ किए ही सम्मान पाना चाहते हैं। कुछ लोग धन, मित्र और सहायकों का समुदाय एकत्रित कर यह समझते हैं कि उनका तो स्वतः ही समाज में सम्मान होगा तो यह उनका भ्रम है।  ऐसे लोगों को सम्मान पाने की भावना अंध कर देती है और किसी से प्रतिकूल व्यवहार मिलने पर वह हिंसा पर उतर आते हैं। हम आज समाज में जो हिंसक वातावरण देख रहे हैं वह राजसी लोगों की आक्रामकता और तामसी प्रवृत्ति लोगों के बौद्धिक आलस्य का परिणाम है।  सात्विक लोगों की संख्या कम है पर आज के भौतिकतावादी युग में कोई उन्हें साथ रखना नहीं चाहता।  सात्विक लोगों का ध्येय वैसे भी समाज में हर विषय पर टांग फंसाकर प्रतिष्ठा अर्जित  करना नहीं होता। वह जानते हैं कि हमारे समाज में समस्या विचारों के संकट की नहीं वरन्् उसे धारण करने की प्रवृत्ति का अभाव है।  ज्ञान चर्चा बहुत होती है पर उसे धारण करने की न लोगों में शक्ति है न उनके पास ऐसा संकल्प है। निकट भविष्य में लोग ज्ञान के आचरण की तरफ प्रवृत्त होंगे इसकी संभावना लगती भी नहीं है। समाज अपने साथ विध्वसंक तत्व लेकर चल रहा है और हम मानते हैं कि आगे हालात अधिक खराब होने वाले हैं।  यह अलग बात है कि समाज में पेशेवर समाज सेवक के सुधार का  नाटक भी जमकर चल रहा है।  हमने देखा है कि अनेक कथित सुधारक समाज में व्याप्त अंधविश्वास का विरोध करते हैं पर मनुष्य में मन में कोई विश्वास का बीज कैसे बोया जाये इस विषय पर खामोश रहते हैं। 

                        बहरहाल समाज की समस्याओं को दूर करने की बजाय अपने सुधार पर अधिक ध्यान देना चाहिये। सबसे बड़ी बात यह है कि हमें अपने शुद्ध विचार रखने और  सुखद कल्पनायें करने के साथ ही अपने अंदर एक दृढ़ संकल्प स्थापित करना चाहिये। हम बाहर जैसा वातावरण देखना चाहते हैं उसे पहले अपने अंतर्मन में संकल्प कर स्थापित करना होगा।  आजकल के तनावपूर्ण वातावरण से प्रथक होकर एकांत में शुद्ध स्थान पर ध्यान करते हुए इस बात पर विचार करना चाहिये कि हम किस तरह अपना जीवन सफल करें।

 लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

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जिंदगी का हिसाब-हिंदी व्यंग्य कविता


कुदरत की अपनी चाल है

इंसान की अपनी चालाकियां है,

कसूर करते समय

सजा से रहते अनजान

यह अलग बात है कि

सर्वशक्तिमान की सजा की भी बारीकियां हैं,

दौलत शौहरत और ओहदे की ऊंचाई पर

बैठकर इंसान घमंड में आ ही जाता है,

सर्वशक्तिमान के दरबार में हाजिरी देकर

बंदों में खबर बनकर इतराता है,

आकाश में बैठा सर्वशक्तिमान भी

गुब्बारे की तरह हवा भरता

इंसान के बढ़ते कसूरों पर

बस, मुस्कराता है

फोड़ता है जब पाप का घड़ा

तब आवाज भी नहीं लगाता है।

कहें दीपक बापू

अहंकार ज्ञान को खा जाता है,

मद बुद्धि को चबा जाता है,

अपने दुष्कर्म पर कितनी खुशफहमी होती लोगों को

किसी को कुछ दिख नहीं रहा है,

पता नहीं उनको कोई हिसाब लिख रहा है,

गिरते हैं झूठ की ऊंचाई से लोग,

किसी को होती कैद

किसी को घेर लेता रोग

उनकी हालत पर

जमीन पर खड़े इंसानों को तरस ही जाता है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””
Gwalior, madhyapradesh

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माया का तिलिस्म-हिंदी व्यंग्य कविता


देश में तरक्की बहुत हो गयी है

यह सभी कहेंगे,

मगर सड़कें संकरी है

कारें बहुत हैं

इसलिये हादसे होते रहेंगे,

रुपया बहुत फैला है बाज़ार में

मगर दौलत वाले कम हैं,

इसलिये लूटने वाले भी

उनका बोझ हल्का कर

स्वयं ढोते रहेंगे।

कहें दीपक बापू

टूटता नहीं तिलस्म कभी माया का,

पत्थर पर पांव रखकर

उस सोने का पीछा करते हैं लोग

जो न कभी दिल भरता

न काम करता कोई काया का,

फरिश्ते पी गये सारा अमृत

इंसानों ने शराब को संस्कार  बना लिया,

अपनी जिदगी से बेजार हो गये लोगों ने

मनोरंजन के लिये

सर्वशक्तिमान की आराधना को

खाली समय

पढ़ने का किस्सा बना लिया,

बदहवास और मदहोश लोग

आकाश में उड़ने की चाहत लिये

जमीन पर यूं ही गिरते रहेंगे।

—————-

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Gwalior, madhyapradesh

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शांति और हथियार के सौदागर-हिंदी व्यंग्य कविता


 

जंग के लिये जो अपने  घर में हथियार बनाते हैं,

बारूद का सामान बाज़ार में  लोगों को थमाते हैं।

दुनियां में उठाये हैं वही शांति का झंडा अपने हाथ

खून खराबा कहीं भी हो, आंसु बहाने चले आते हैं।

कहें दीपक बापू, सबसे ज्यादा कत्ल जिनके नाम

इंसानी हकों के समूह गीत वही दुनियां में गाते हैं।

पराये पसीने से भरे हैं जिन्होंने अपने सोने के भंडार

गरीबों के भले का नारे वही जोर से सुनाते हैं।

अपनी सोच किसको कब कहां और  कैसे सुनायें

चालाक सौदागरों के जाल में लोग खुद ही फंसे जाते हैं।

खरीद लिये हैं उन्होंने बड़े और छोटे रुपहले पर्दे

इसलिये कातिल ही फरिश्ते बनकर सामने आते हैं।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

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बीमार बन गए चिकित्सक -हिंदी व्यंग्य कविता


इस जहान में आधे से ज्यादा लोग

चिकित्सक हो गये हैं,

अपनी बीमारियों की दवायें खाते खाते

इतना अभ्यास कर लिया है कि

वह बीमारी और दवा के बीच

अपना अस्तित्व खो रहे हैं,

बताते हैं दूसरों को दवा

भले कभी खुद ठीक न हो रहे हों।

कहें दीपक बापू

अपनी छींक आते ही हम

रुमाल लगा लेते हैं

इस भय से कि कोई देखकर

दुःखी हो जायेगा,

बड़ी बीमारी का भय दिखाकर

बड़े चिकित्सक का रास्ता बतायेगा,

सत्संग में भी सत्य पर कम

मधुमेह पर चर्चा ज्यादा होती है,

सर्वशक्तिमान से ज्यादा

दवाओं  पर बात  होती है,

कितनी बीमारियां

कितनी दवायें

बीमार समाज देखकर लगता है

छिपकर खुशी की सांस ली जाये,

लाचार शरीर में लोग

ऊबा हुआ मन ढो रहे हैं,

बीमार खुश है अपनी बीमारी और दवाओं पर

भीड़ में सत्संग कर

यह सोचते हुए कि

वह स्वास्थ्य का बीज बो रहे हैं।

 लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

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किस पर भरोसा करें-हिंदी कविता


किस पर भरोसा करें
यहां हर कदम पर धोखा खाया,
हुकूमत पर क्या इल्जाम डालें
जनता के  हाथ पांव के साथ
दिमागी सोच को भी
पुरानी जंजीरों में बंधा पाया।
कहें दीपक बापू
हाथ में तख्तियां और मशाल
लेकर  बहुत लोग चले जुलूसों में
नारों से गूंजा बहुत बार आकाश
फिर भी ज़माना अंधकार से बाहर न आया,
शिकारी भीड़ में भेड़ों के साथ शामिल रहे
अकेले में भेड़िये बन गये
हालातों में बदलने की बात
सुनते सुनते पक गये कान
अच्छे समय की आस बनी रही
अलबत्ता ईमानदारी और यकीन को
हर दिन गर्त में जाते पाया।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश 
poet and writer-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

हैरान लोग-हिन्दी कविता


मेरे दिल में न खुशी है
न कोई गम है
अपनी हालातों से परेशान लोग
हैरान है यह देखकर
यह कभी रोता नहीं
कभी हंसता भी नहीं
बिचारे नहीं जानते
बाज़ार में बिकने वाले
जज़्बात मैंने खरीदना छोड़ दिया है,
इंसानों के फरिश्ते होने की
उम्मीद कभी नहीं करता
अपनी रूह से दिमाग का
अटूट रिश्ता जोड़ दिया है।
———-
कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

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काले को सफेद करने का चमत्कार-हास्य व्यंग्य


गुरुजी के पुराने भूतहे आश्रम  में आते ही चेले ने अपने बिना प्रणाम गुरु जी से कहा-‘गुरूजी जी आज आपकी सेवा में अंतिम दिन है। कल से नये गुरू की चेलागिरी ज्वाइन कर रहा हूं, सो आशीर्वाद दीजिये कि उनकी सेवा पूरे हृदय से कर सकूं और मुझे जीवन में मेवा मिल सके।’
सुबह सुबह यह बात सुनकर गुरूजी का रक्तचाप बढ़ गया। शरीर पसीने से नहा उठा। वह उनका इकलौता चेला था जिसकी वजह से लोग उनको गुरुजी की पदवी प्रदान करते थे। अगर वह इकलौता चेला उनको छोड़कर चला गया तो साथ ही उनकी गुरूजी की पदवी भी जानी थी। बिना चेले भला कौन गुरु कहला सकता है। उन्होंने चेले से कहा-‘यह क्या किसी कंपनी की नौकरी है जो छोड़कर जा रहा है। अरे, कोई  धर्म कर्म को व्यापार समझ रखा है जो नये गुरू की सेवा ऐसे ज्वाइन कर रहा है जैसे नई कंपनी प्रमोशन देकर बुला रही है। तू तो ऐसे बोल रहा है जैसे किसी कंपनी का प्रबंधक अपने प्रबंध निदेशक से बात करता है। सुबह सुबह क्या स्वांग रचा लिया है जो आज धमका रहा है। जो थोड़ी बहुत गुरु दक्षिण आती है उसमें से तुझे ईमानदारी से हिस्सा देता हूं। कभी कभी कोई दो लड्डू चढ़ाकर जाता है तो उसमें से भी आधा तेरे लिये बचा रखता हूं। अभी डेढ़ लड्डू खा जाता हूं अगर चाहूं तो पौने दो भी खा सकता हूं पर मैं ऐसा नहीं कर सकता। इतना ख्याल तेरा कौन रखेगा।’
चेला बोला-‘आपको इस नई दुनियां का नहीं पता। यह धर्म कर्म भी अब व्यापार हो गये है। आश्रम कंपनियों की तरह चल रहे हें। आपका यह पुराना आश्रम पहले तो फ्लाप था अब तो सुपर फ्लाप हो गया है। वह तो में एक था जो किसी नये अच्छे गुरू के इंतजार में आपकी शरण लेता रहा। अब तो फायदा वाले बाबा ने मुझे निमंत्रण भेजा है अपनी चेलागिरी ज्वाइन करने के लिये।’
गुरुजी हैरान रह गये-अरे, यह फायदा वाले बाबा तो बड़े ऊंचे हैं, भला तुझे कैसे निमंत्रण भेजा है? दूसरे हिट बाबाओं को चेले मर गये हैं क्या? सुन इस चक्कर में मत पड़ना। पहली बात तो उनके फाइव स्टार आश्रम में तेरा प्रवेश ही कठिन है फिर चेलागिरी ज्वाइन करने का तो सवाल ही नहीं।‘
चेले ने कहा ‘क्या बात करते हैं आप! इस गुरूपूर्णिमा के दिन वह मुझे दीक्षा देने वाले हैं। अब उनका धंधा बढ़ा गया है और उनको योग्य शिष्यों की जरूरत है। उनमें काले धन को सफेद करने का जो चमत्कार है उसकी वजह से उनको खूब चढ़ावा आता है। उसे संभालने के लिये उनको योग्य लोग चाहिऐं।’
गुरूजी ने कहा-‘भला तुझे काले धन को सफेद करने का कौनसा अभ्यास है?’
चेले ने कहा-‘धन है ही कहां जो सफेद कर सकूं। जब धन आयेगा तो अपने आप सारा ज्ञान प्राप्त होगा। कम से कम आपको इस बात पर थोड़ा शर्मिंदा तो होना चाहिए कि आपके पास कोई काला धन लेकर नहीं आया जिसे आप सफेद कर सकते जिससे मुझे भी अभ्यास हो जाता। वैसे मै वहां काम सीखकर आपके पास वापस भी आ सकता हूं ताकि आपकी गुरुदक्षिणा चुका सकूं।’’
चेला चला गया और गुरुजी अपने काम में लीन हो गये यह सोचकर कि ‘अभी तो फ्लाप हूं शायद लौटकर चेला हिट बना दे। कहीं गुरू गुड़ रह जाता है तो चेला शक्कर बनकर अपने गुरू को हिट बना देता है।’
कुछ दिन बात चेला रोता बिलखता और कलपता हुआ वापस लौटा और बोला-‘’गुरूजी, मैं लुट गया, बरबाद हो गया। आपके नाम पर मैंने अनेक लोगों से चंदा वसूल कर एक लाख एकत्रित किया था वह उस गुरू के एक फर्जी चेले ने ठग लिया। मुझे उसके एक चेले ने कहा कि गुरुजी को एक लाख रुपये दो और दो महीने में दो लाख करके देंगे। वह मुझे गुरूजी के पास ले भी गया। उन्होंने मुझे आशीवार्द भी दिया। बोले कुछ नहीं पर गुरूजी का चेला मुझसे बोला कि जब दो लाख देने के लिये बुलवायेंगे तभी से अपनी चेलागिरी भी प्रदान करेंगे। दो महीने क्या छह महीने हो गये। मैं आश्रम में गया तो पता लगा कि कोई ऐसा ही फर्जी चेला था जो आश्रम आता रहता था। फायदा वाले बाबा के पास कुछ अन्य लोगों को पास ले जाता और आशीर्वाद दिला देता। बाकी वह क्या करता है मालुम नहीं! हम सब बाबा के पास गये तो वह बोले‘कमबख्तों काले धन को सफेद करते उसका चूरमा बन जाता है। वह रकम बढ़ती नहीं घटकर मिलती है, ताकि उसे काग़जों में दिखाया जा सके। तुम लोगों के पहले के कौन गुरू हैं जो तुम्हें इतना भी नहीं समझाया’। अब तो आपकी शरण में आया हूं। मुझे चेलागिरी में रख लें।’’
गुरूजी ने कहा-‘फायदा वाले बाबा को यह नहीं बताया कि तुम्हारे गुरू कौन हैं?’
चेला बोला-‘‘बताया था तो वह बोले ‘कमबख्त! तुम्हारा धन तो काला ही नहीं था तो सफेद कैसे होता’, वैसे तुम्हारी ठगी का वैसा ठगी में गया’।’’
गुरूजी ने कहा-‘अब भई तू किसी तीसरे गुरू की शरण ले, तेरी जगह बाहर चाय की दुकान कााम करने वाले लड़के को पार्ट टाईम चेलागिरी का काम दे दिया है। वह भी मेरे नाम से इधर उधर से दान वसूल कर आता है पर कुछ हिस्सा देता है, तेरी तरह नहीं सौ फीसदी जेब में रख ले। वैसे वह कह रहा है कि ‘काले धन को सफेद करने का काम भी जल्दी शुरू करूंगा’, वह तो यह भी दावा कर रहा है कि इस आश्रम का सब कुछ बदल डालूंगा।’
चेले ने कहा-‘गुरुजी, कहीं वह यहां गुरूजी भी तो नहीं बदल डालेगा।’
गुरूजी एकदम करवट बदलकर बैठ गये और बोले-‘कैसी बातें कर रहा है। गुरूजी तो मैं ही रहूंगा।’
चेले ने कहा-‘गुरूजी, यह माया का खेल है। जब वह कह रहा है कि ‘सब कुंछ बदल डालूंगा तो फिर गुरूजी भी वही आदमी कैसे रहने देगा। ऐसे में आप मुझे दोबारा शरण में लें ताकि उस पर नज़र रख सकूं।’’
गुरूजी सोच में पड़ गये और बोले-‘मुश्किल यह है कि काले धन को सफेद करने का धंधा कभी मैंने किया नहीं। इसलिये उस पर ही निर्भर रहना पड़ेगा। ठीक है तू अब उपचेला बन कर रह जा।’
चेले ने कहा-‘गुरूजी आप महान हैं जो उपचेला के पद पर ही पदावनत कर रख रहे हैं वरना तो मैं सफाई करने वाला बनकर भी आपकी सेवा करता रहूंगा। आपने न सिखाया तो क्या आपके नये चेले से काला धन सफेद करने का चमत्कार सीख लूंगा।’
इस तरह काले धन का सफेद करने के मामले पर दोनों ने अपने संबंध पुनः जोड़ लिये और उनको इंतजार है कि नया चेला कब से यह काम शुरू करता है।’

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खतरा है जिनसे जमाने को, पहरा उनके घर सजा है-हिन्दी हास्य व्यंग्य कवितायें


इंसान कितना भी काला हो चेहरा
पर उस पर मेअकप की चमक हो,
चरित्र पर कितनी भी कालिख हो
पर उसके साथ दौलत की महक हो,
वह शौहरत के पहाड़ पर चढ़ जायेगा।
बाजार में बिकता हो बुत की तरह जो इंसान
लाचार हो अपनी आजाद सोच से भले
पर वह सिकंदर कहलायेगा।
खतरा है जिनसे जमाने को
उनके घर सुरक्षा के पहरे लगे हैं,
लोगों के दिन का चैन
और रात की नींद हराम हो जाती जिनके नाम से
उनके घर के दरवाजे पर पहरेदार, चौबीस घंटे सजे हैं।
कसूरवारों को सजा देने की मांग कौन करेगा
लोग बेकसूर ही सजा होने से डरने लगे हैं।
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बाजार में जो महंगे भाव बिक जायेगा,
वही जमाने में नायक कहलायेगा।
जब तक खुल न जाये राज
कसूरवार कोई नहीं कहलाता,
छिपायेगा जो अपनी गल्तियां
वही सूरमा कहलायेगा।
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वफा की कीमत औकात के मुताबिक-हिन्दी शायरी


दिन में फरिश्तों को भेष ओढ़े लोग
रात को शैतान हो जाते हैं।
भलाई अब हो गयी है
सौदे की शय
बेचते हैं बाजार में दरियादिल
वही दीवारों के पीछे
रंगीन रौशनी में
इज्जत के लुटेरे बन जाते हैं।
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नहीं दौलत अपने पास तो
किसी पर यकीन नहीं करना,
बिखर जाओगे मुफ्त में वरना,
यहां वफा बिकती है
बेचने वाले की औकात से
जिसकी तय होती है कीमत
पर बेवफाई आज के इंसानों के लिये
चालाकी का नाम होती है।

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दीवार के पीछे ही खुद को छिपाना-हिंदी शायरी


दीवार के पीछे ही

अपना चेहरा छिपाये रहो तुम,

तुम हो एक सजा सजाया ख्वाब,

कितने भी सवाल करूं

नहीं देना उनका जवाब,

तुम्हारे दिल के स्वर ही

दिमाग की सोच में बजते रहे हैं,

कई  शेर कहे हमने यह मानकर

जैसे कि तुमने कहे हैं,

अपने कड़वे सच के घूंट

हमने जहर की तरह पिये हैं,

अभी तक ख्वाबों के

अमृत के सहारे ही जियें हैं,

आंखों सामने आकर  अपना सच न दिखाना

जब तक हम भूलें न तुमको

दीवार के पीछे ही खुद को छिपाना,

वरना पल भर में ख्वाबों की दुनियां हो जायेगी गुम।

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हास्य पैदा करने वाला शोक-हिन्दी व्यंग्य (hasya aur shok-hindi vyangya


आप कितने भी ज्ञानी ध्यानी क्यों न हों, एक समय ऐसा आता है जब आपको कहना भी पड़ता है कि ‘भगवान ही जानता है’। जब किसी विषय पर तर्क रखना आपकी शक्ति से बाहर हो जाये या आपको लगे कि तर्क देना ही बेकार है तब यह कहकर ही जान छुड़ाना पड़ती है कि ‘भगवान ही जानता है।’

अब कल कुछ लोगों ने छ दिसंबर पर काला दिवस मनाया। दरअसल यह किसी शहर में कोई विवादित ढांचा गिरने की याद में था। अब यह ढांचा कितना पुराना था और सर्वशक्तिमान के दरबार के रूप में इसका नाम क्या था, ऐसे प्रश्न विवादों में फंसे है और उनका निष्कर्ष निकालना हमारे बूते का नहीं है।
दरअसल इस तरह के सामूहिक विवाद खड़े इसलिये किये जाते हैं जिससे समाज के बुद्धिमान लोगों को उन पर बहस कर व्यस्त रखा जा सकें। इससे बाजार समाज में चल रही हेराफेरी पर उनका ध्यान न जाये। कभी कभी तो लगता है कि इस पूरे विश्व में धरती पर कोई एक ऐसा समूह है जो बाजार का अनेक तरह से प्रबंध करता है जिसमें लोगों को दिमागी रूप से व्यस्त रखने के लिये हादसे और समागम दोनों ही कराता है। इतना ही नहीं वह बहसें चलाने के लिये बकायदा प्रचार माध्यमों में भी अपने लोग सक्रिय रखता है। जब वह ढांचा गिरा था तब प्रकाशन से जुड़े प्रचार माध्यमों का बोलाबाला था और दृष्यव्य और श्रवण माध्यमों की उपस्थिति नगण्य थी । अब तो टीवी चैनल और एफ. एम. रेडियो भी जबरदस्त रूप से सक्रिय है। उनमें इस तरह की बहसे चल रही थीं जैसे कि कोई बड़ी घटना हुई हो।
अब तो पांच दिसंबर को ही यह अनुमान लग जाता है कि कल किसको सुनेंगे और देखेंगे। अखबारों में क्या पढ़ने को मिलेगा। उंगलियों पर गिनने लायक कुछ विद्वान हैं जो इस अवसर नये मेकअप के साथ दिखते हैं। विवादित ढांचा गिराने की घटना इस तरह 17 वर्ष तक प्रचारित हो सकती है यह अपने आप में आश्चर्य की बात है। बाजार और प्रचार का रिश्ता सभी जानते हैं इसलिये यह कहना कठिन है कि ऐसे प्रचार का कोई आर्थिक लाभ न हो। उत्पादकों को अपनी चीजें बेचने के लिये विज्ञापन देने हैं। केवल विज्ञापन के नाम पर न तो कोई अखबार छप सकता है और न ही टीवी चैनल चल सकता है सो कोई कार्यक्रम होना चाहये। वह भी सनसनीखेज और जज़्बातों से भरा हुआ। इसके लिये विषय चाहिये। इसलिये कोई अज्ञात समूह शायद ऐसे विषयों की रचना करने के लिये सक्रिय रहता होगा कि बाजार और प्रचार दोनों का काम चले।
बहरहाल काला दिवस अधिक शोर के साथ मना। कुछ लोगों ने इसे शौर्य दिवस के रूप में भी मनाया पर उनकी संख्या अधिक नहीं थी। वैसे भी शौर्य दिवस मनाने जैसा कुछ भी नहीं है क्योंकि वह तो किसी नवीन निर्माण या उपलब्धि पर मनता है और ऐसा कुछ नहीं हुआ। अलबत्ता काला दिवस वालों का स्यापा बहुत देखने लायक था। हम इसका सामाजिक पक्ष देखें तो जिन समूहों को इस विवाद में घसीटा जाता है उनके सामान्य सदस्यों को अपनी दाल रोटी और शादी विवाह की फिक्र से ही फुरसत नहीं है पर वह अंततः एक उपभोक्ता है और उसका मनोरंजन कर उसका ध्यान भटकाना जरूरी है इसलिये बकायदा इस पर बहसें हुईं।
राजनीतिक लोगों ने क्या किया यह अलग विषय है पर समाचार पत्र पत्रिकाओं, टीवी चैनलों पर हिन्दी के लेखकों और चिंतकों को इस अवसर पर सुनकर हैरानी होती है। खासतौर से उन लेखको और चिंतकों की बातें सुनकर दिमाग में अनेक प्रश्न खड़े होते हैं जो साम्प्रदायिक एकता की बात करते हैं। उनकी बात पर गुस्सा कम हंसी आती है और अगर आप थोड़ा भी अध्यात्मिक ज्ञान रखते हैं तो केवल हंसिये। गुस्सा कर अपना खूना जलाना ठीक नहीं है।
वैसे ऐसे विकासवादी लेखक और चिंतक भारतीय अध्यात्मिक की एक छोटी पर संपूर्ण ज्ञान से युक्त ‘श्रीमद्भागवत गीता’ पढ़ें तो शायद स्यापा कभी न करें। कहने को तो भारतीय अध्यात्मिक ग्रथों से नारियों को दोयम दर्जे के बताने तथा जातिवाद से संबंधित सूत्र उठाकर यह बताते हैं कि भारतीय धर्म ही साम्प्रदायिक और नारी विरोधी है। जब भी अवसर मिलता है वह भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान पर वह उंगली उठाते है। हम उनसे यह आग्रह नहीं कर रहे कि वह ऐसा न करें क्योंकि फिर हम कहां से उनकी बातों का जवाब देते हुए अपनी बात कह पायेंगे। अलबत्ता उन्हें यह बताना चाहते हैं कि वह कभी कभी आत्ममंथन भी कर लिया करें।
पहली बात तो यह कि यह जन्मतिथि तथा पुण्यतिथि उसी पश्चिम की देन है जिसका वह विरोध करते हैं। भारतीय अध्यात्मिक दर्शन तो साफ कहता है कि न आत्मा पैदा होता न मरता है। यहां तक कि कुछ धार्मिक विद्वान तो श्राद्ध तक की परंपरा का भी विरोध करते हैं। अतः भारतीय अध्यात्मिक को प्राचीन मानकर अवहेलना तो की ही नहीं जा सकती। फिर यह विकासवादी तो हर प्रकार की रूढ़िवादिता का विरोध करते हैं कभी पुण्यतिथि तो कभी काला दिवस क्यों मनाते हैं?

सांप्रदायिक एकता लाने का तो उनका ढोंग तो उनके बयानों से ही सामने आ जाता है। उस विवादित ढांचे को दो संप्रदाय अपनी अपनी भाषा में सर्वशक्तिमान के दरबार के रूप में अलग अलग नाम से जानते हैं पर विकासवादियों ने उसका नाम क्या रखा? तय बात है कि भारतीय अध्यात्म से जुड़ा नाम तो वह रख ही नहीं सकते थे क्योंकि उसके विरोध का ही तो उनका रास्ता है। अपने आपको निष्पक्ष कहने वाले लोग एक तरफ साफ झुके हुए हैं और इसको लेकर उनका तर्क भी हास्यप्रद है कि वह अल्प संख्या वाले लोगों का पक्ष ले रहे है क्योंकि बहुसंख्या वालों ने आक्रामक कार्य किया है। एक मजे की बात यह है कि अधिकतर ऐसा करने वाले बहुसंख्यक वर्ग के ही हैं।
इस संसार में जितने भी धर्म हैं उनके लोग किसी की मौत का गम कुछ दिन ही मनाते हैं। जितने भी धर्मो के आचार्य हैं वह मौत के कार्यक्रमों का विस्तार करने के पक्षधर नहीं होते। कोई एक मर जाता है तो उसका शोक एक ही जगह मनाया जाता है भले ही उसके सगे कितने भी हों। आप कभी यह नहीं सुनेंगे कि किसी की उठावनी या तेरहवीं अलग अलग जगह पर रखी जाती हो। कम से कम इतना तो तय है कि सभी धर्मों के आम लोग इतने तो समझदार हैं कि मौत का विस्तार नहीं करते। मगर उनको संचालित करने वाले यह लेखक और चिंतक देश और शहरों में हुए हादसों का विस्तार कर अपने अज्ञान का ही परिचय ही देते हैं। । इससे यह साफ लगता है कि उनका उद्देश्य केवल आत्मप्रचार होता है।
आखिरी बात ऐसे ही बुद्धिजीवियों के लिये जो भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान से दूर होकर लिखने में शान समझते हैं। उनको यह जानकर कष्ट होगा कि श्रीगीता में अदृश्य परमात्मा और आत्मा को ही अमर बताया गया है पर शेष सभी भौतिक वस्तुऐं नष्ट होती हैं। उनके लिये शोक कैसा? यह प्रथ्वी भी कभी नष्ट होगी तो सूर्य भी नहीं बचेगा। आज जहां रेगिस्तान था वहां कभी हरियाली थी और जहां आज जल है वहां कभी पत्थर था। यह ताजमहल, कुतुबमीनार, लालाकिला और इंडिया गेट सदियों तक बने रहेंगे पर हमेशा नहीं। यह प्रथवी करोड़ों साल से जीवन जी रही है और कोई नहीं जानता कि कितने कुतुबमीनार और ताज महल बने और बिखर गये। अरे, तुमने मोहनजो दड़ो का नाम सुना है कि नहीं। पता नहीं कितनी सभ्यतायें समय लील गया और आगे भी यही करेगा। अरे लोग तो नश्वर देह का इतना शोक रहीं करते आप लोग तो पत्थर के ढांचे का शोक ढो रहे हो। यह धरती करोड़ों साल से जीवन की सांसें ले रही है और पता नहीं सर्वशक्तिमान के नाम पर पता नहीं कितने दरबादर बने और ढह गये पर उसका नाम कभी नहीं टूटा। बाल्मीकि रामायण में कहा गया है कि भगवान श्रीरामचंद्र जी के पहले भी अनेक राम हुए और आगे भी होंगे। मतलब यह कि राम का नाम तो आदमी के हृदय में हमेशा से था और रहेगा। उनके समकालीनों में परशुराम का नाम भी राम था पर फरसे के उपयोग के कारण उनको परशुराम कहा गया। भारत का आध्यात्मिक ज्ञान किसी की धरोहर नहीं है। लोग उसकी समय समय पर अपने ढंग से व्याख्या करते हैं। जो ठीक है समाज उनको आत्मसात कर लेता है। यही कारण है कि शोक के कुछ समय बाद आदमी अपने काम पर लग जाता है। यह हर साल काला दिवस या बरसी मनाना आम आदमी को भी सहज नहीं ल्रगता। मुश्किल यह है कि उसकी अभिव्यक्ति को शब्दों का रूप देने के लिये कोई बुद्धिजीवी नहीं मिलता। जहां तक सहजयोगियों का प्रश्न है उनके लिये तो यह व्यंग्य का ही विषय होता है क्योंकि जब चिंतन अधिक गंभीर हो जाये तो दिमाग के लिये ऐसा होना स्वाभाविक ही है
सबसे बड़ी खुशी तो अपने देश के आम लोगों को देखकर होती है जो अब इस तरह के प्रचार पर अधिक ध्यान नहीं देते भले ही टीवी चैनल, अखबार और रेडियो कितना भी इस पर बहस कर लें। यह सभी समझ गये हैं कि देश, समाज, तथा अन्य ऐसे मुद्दों से उनका ध्यान हटाया जा रहा है जिनका हल करना किसी के बूते का नहीं है। यही कारण है कि लोग इससे परे होकर आपस में सौहार्द बनाये रखते हैं क्योंकि वह जानते हैं कि इसी में ही उनका हित है। वैसे तो यह कथित बुद्धिजीवी जिन अशिक्षितों पर तरस खाते हैं वह इनसे अधिक समझदार है जो देह को नश्वर जानकर उस पर कुछ दिन शोक मनाकर चुप हो जाते हैं। ऐसे में उनसे यही कहना पड़ता है कि ‘भई, नश्वर निर्जीव वस्तु के लिये इतना शोक क्यों? वह भी 17 साल तक!
हां, चाहें तो कुछ लोग उनकी हमदर्दी जताने की अक्षुण्ण क्षमता की प्रशंसा भी कर सकते हैं।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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यह आलेख/हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।
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नए स्वांग और मुखौटे-हास्य व्यंग्य कविताएँ (svang aur mukhaute-hindi satire poem)


रोज रचते हैं नया स्वांग
चेहरे पर लगाते नए मुखौटे
और बदलकर आते हैं कपड़े
मगर छद्म होकर भी करते हैं हमेशा लफड़े.
आदमी अपना बाहर का रूप
कितना भी बदल ले
अदाओं से पहचाना जाता है,
जहां स्वर बदले
शब्दों से पकड़ा जाता है,
खुलकर सांस लेने से घबड़ाते हैं जो लोग
छिपकर करते वार
पर अपने हथियारों की शकल
और तौरतरीकों से जाते हैं पकड़े.

——————————-
अपनी महफ़िल में उन्होंने बुलाया नहीं
हमारी परवाह न होने का अहसास जताया.
खूब चिराग जलाए उन्होंने
पर अन्दर के अँधेरे में
चमकता रहा हमारा चेहरा और नाम
बड़ी मेहनत से उन्होंने छिपाया.
हमारा नाम लेने पर उन्होंने
अपने मेहमान पर गुस्सा दिखाकर
अपनी नापसंदगी दिखाई
पर सच है कि जो खौफ है
उनके दिमाग में
हमारे हाथ से जलते चिरागों से
ज़माने के रौशन होने का
वही अनजाने में बाहर आया.

—————————-
कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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जब उनके पुतलों की पोल खुल जायेगी-हिंदी कविता (putlon ki pol-hindi hasya kavita)


पर्दे के पीछे वह खेल रहे हैं
सामने उनके पुतले डंड पेल रहे हैं।
आत्ममुग्धता हैं जैसे जमाना जीत लिया
समझते नहीं भीड़ के इशारे
अपनी उंगलियों से पकड़ी रस्सी से
मनचाहे दृश्य वह मंच पर ठेल रहे हैं।
भीड़ में बैठे हैं उनके किराये के टट्टू
जो वाह वाही करते हैं
तमाम लोग तो बस झेल रहे हैं।
खेल कभी लंबा नहीं होता
कभी तो खत्म होगा
सच्चाई तो सामने आयेगी
जब उनके पुतलों की पोल खुल जायेगी
तब जवाब मांगेंगे लोग
हम भी यही सोचकर झेल रहे हैं।

……………………………
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लहरें देखकर खेलने का मन करता है-हिंदी कविता(lahren aur man-hindi kavita)


जिंदगी की इस धारा में
किस किसकी नाव पार लगाओगे।
समंदर से गहरी है इसकी धारा
लहरे इतनी ऊंची कि
आकाश का भी तोड़ दे तारा
अपनी सोच को इस किनारे से
उस किनारे तक ले जाते हुए
स्वयं ही ख्यालों में डूब जाओगे।
दूसरे को मझधार से तभी तो निकाल सकते हो
जब पहले अपनी नाव संभाल पाओगे।
दूर उठती लहरें देखकर
खेलने का मन करता है
पर उनकी ताकत तभी समझ आयेगी
जब उनसे लड़ने जाओगे।

……………………………..

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बहस कि कामेडी-हिंदी लघु व्यंग्य (disscusion as a comedy-hindi satire)


                 उस उद्यान में ज्ञानियों के बीच देश की गरीबी मिटाने के लिये बहस चल रही थी। विषय था देश में गरीबी और शौषण खत्म कैसे किया जाये। सभी सजधजकर बहस करने आये थे। सभी वक्ता अपने अपने विचार रख रहे थे।
            एक ने कहा ‘हमें गरीबों के दिमाग में अपने अधिकार के लिये चेतना जगाने का अभियान छेड़ना चाहिये।
           वहीं एक फटीचर आदमी भी बैठा था। उसने उठकर पूछा-‘पर कैसे? क्या कहें गरीबों से जाकर कि अमीरों का पैसा छीन लो!’
               सभा के संचालक ने उसे बिठा दिया और कहा‘-आप आमंत्रित वक्ता नहीं है इसलिये बहस मत करिये।’
              दूसरे वक्ता ने कहा-‘हमें एक आंदोलन छेड़ना चाहिये।’
              वह फटीचर फिर उठकर खड़ा हो गया और बोला-‘बहस और आंदोलन तो बरसों से चल रहे हैं।’
            संचालक फिर चिल्लाया-‘चुपचाप बैठ जाओ। वरना बाहर फैंक दिये जाओगे। हम कितने गंभीर विषय पर बहस कर रहे हैं और तुम अपनी टिप्पणियां मुफ्त में दिये जा रहे हो।’
              वह फटीचर आदमी वहां से चला गया तो एक विद्वान ने दूसरे से पूछा-‘यह कौन फटीचर यहां आ गया था।’
            दूसरे ने कहा-‘पता नहीं।’
           वहीं एक दूसरा फटीचर आदमी र्बैठा था वह बोला-‘वह मेरा दोस्त था। पहले किताबें पढ़कर बहुत बहस कर चुका है पर जब से बहुत ज्ञानी हो गया तब से उसने ऐसी बहसें बंद कर दी हैं। अलबत्ता कभी कभी चला आता है ऐसी बहसें देखने। क्योंकि इसे इसमें कामेडी नजर आती है।’
            यह बात सुनते ही दोनों विद्वानों का खूल खौल उठा वह बोले-‘तू हमारी बहस को कामेडी कहता है।’
वह दोनों उठकर खड़े गये और चिल्लाने लगे कि‘यह हमारी बहस को कामेडी कह रहा है। इसे मारो पीटो।’
            सब लोग उस पर चढ़ पड़े। वह चिल्लाता रहा‘मैं नहीं वह कहता है।’
             उसके पुराने कपड़ों में पहले ही पैबंद लगे थे वह और अधिक फट गये। जब वह पिट पिटकर बेहोश हो गया तब उसे छोड़ दिया गया। विद्वान फिर बहस करने लगे। कुछ देर बात उसे होश आया तो वह दोनों विद्वान वहीं बैठे बहस में व्यस्त थे। उसने उनसे कहा-‘यार, मैं थोड़े ही कहता हूं। वह कहता है। तुम दोनों ने मुझे क्यों क्यों पिटवाया।’
          उनमें से एक ने कहा-‘हम विद्वान है कोई सामान्य आदमी नहीं।  सांप को निकलने देते हैं उसके बाद लकीर पीटते हैं।’
       वह बिचारा वापस अपने दोस्त के पास पहुंचा और पूरा हाल बताकर बोला-‘यार, किस मुसीबत में फंसा मुझे फँसकर इस तरह भाग निकले। हम तो सोच रहे थे कि विद्वान लोग हैं शांति से सभी की बात सुनते होंगे पर  हैं पर वह हिंसा पर उतर आये।’
            उसने जवाब दिया-‘यह भ्रम मुझे भी होता था। इसलिये तुझसे कहता हूं कि ऐसी जगहों पर अधिक मत रुका करो। वहां बहस वही करते हैं जो किताबी ज्ञानी हैं। कबीरदास जी कह गये हैं कि किताब पढ़ने वालों को अहंकार आ ही जाता है। मैं भी तुझसे कहता हूं कि ऐसी बहसें कामेडी नाटक की तरह हैं क्योंकि किताबी ज्ञानी लकीर के फकीर होते हैं पर वहां सबके बीच में नहीं कहा। सच बात भी सही जगह और सही समय पर बोलना चाहिये। बस तुम्हारे और मेरे बीच यही अंतर है। इसलिये मैं तुम्हें अल्पज्ञानी कहता हूं। मैंने खतरा देखा तो निकल लिया और तुम फंसं गये।’

दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

पसंद कि नापसंद-हास्य व्यंग (hindi comedy satire)


एक सज्जन ने मन्नत मांगी थी कि अगर उनको कभी कहीं से कोई सम्मान प्राप्त होगा तो वह किसी नये कवि का सम्मेलन करायेंगे। इससे तो उनका सम्मान का प्रचार तो होगा ही साहित्य में नयी पीढ़ी को आगे लाने के लिये भी प्रसिद्धि मिलेगी। दरअसल उन्होंने अपने बेकारी के दिनों में अनेक कवितायें लिखी थी जिनका एक किताब के रूप में प्रकाशन कराया। उन्होंने अपने मित्र को वह कविता दिखाई तो उसने कहा-‘‘चुपचाप इनको रख लो। यह कवितायें तुम्हारी मजाक बनवायेंगी। अलबत्ता जब तुम्हारे सपंर्क बन जायें तो इस किताब के सहारे कोई सम्मान वगैरह जुगाड़ लेना क्योंकि तुम जिस तरह अपने व्यवसाय में आगे जा रहे हो तुम्हारे लिये अच्छे अवसर हैं।’’
वह सज्जन अनेक तरह के ठेके लिया करते थे। ढेर सारी किताबें रखने के लिये उन्होंने एक अलमारी बनवायी थी जिस पर रोज अगरबत्ती जलाकर घुमाते।
इधर समय के साथ उनके व्यवसाय के साथ बड़े और प्रतिष्ठित लोगों से संपर्क बढ़ रहे थे। एक कारखाने में निर्माण का ठेका उनको मिला। वह कंपनी अवार्ड वगैरह भी बांटा करती थी। दरअसल उसका यह समाज कल्याण अभियान बड़े लोगों से संपर्क बढ़ाने के लिये था और वह अपने को फायदा देने वालों को सम्मानित भी कर चुकी थी। ठेकेदार सज्जन की उसी कंपनी के प्रबंधक से बातचीत हुई। ठेकेदार सज्जन को मालुम था कि यह कंपनी अवार्ड वगैरह बांटती है इसलिये वह प्रबंधक से अधिक प्रगाढ़ संबंध बनाने लगे। एक दिन उन्होंने प्रबंधक से कहा-‘आप हमें साहित्य के लिये अपना अवार्ड दिलवा दीजिये। आपका कमीशन दुगना कर देता हूं।’
प्रबंधक ने कहा-‘पहले वह किताब दिखाओ। नहीं दिखाना है तो कमीशन तीन गुना करो।’
ठेकेदार सज्जन बहुत खुश हो गये। मन ही मन कहने लगे कि‘यह बेवकूफ है, अगर चार गुना भी कहता तो देता।’
उन्होंने अपनी सहमति दी। इस तरह यह इनाम उनको मिल गया। वह भी साहित्यकार के रूप में। शहर भर के साहित्यकारों को तो मानो सांप सूंध गया। हरेक कोई एक दूसरे से पूछा रहा था कि ‘यह कौन महाकवि इस शहर में रहता है जो हमारी नजर से नहीं गुजरा। कभी किसी मंच पर नही देखा। उसका अखबार में नहीं पढ़ा।’
सम्मान मिलना तो सो मिल गया। एक दो आलोचक उनके घर पहुंच गये और कविता के शीर्षकों से ही समीक्षा अखबारों में लिखकर छाप दी। ठेकेदार सज्जन ने बकायदा आलोचकों की खातिर की। इधर उनके मन में बस एक ही बात थी कि किसी नये लेखक का एकल पाठ कराकर अपनी वह मिन्नत पूरी करूं जो किसी दिन मन में आ गयी थी। भले ही दस वर्ष बाद यह पूरी हुई पर मिन्नत का मान रखना भी जरूरी था। मुश्किल यह थी कि पहले उन्होंने नये कवि को अच्छी खासी रकम देने का विचार रखा था पर इधर खर्चा इतना हो गया कि वह सोच रहे थे कि सस्ते में निपट जाये। इसी चिंता में रहते थे। घर से बाहर एक दिन एक लड़का उनको मिल गया जिसके बारे में उनको पता लगा कि उसकी कोई कविता कहीं छपी थी-यह दावा वह मोहल्ले में करता फिर रहा था।

उन्होंने उससे पूछा-‘‘क्यों गंजू उस्ताद, कैसी चल रही है तुम्हारी कवितागिरी।’’
गंजू उस्ताद ने कहा-‘आपसे तो अच्छी नहीं चल रही। अब सोच रहा हूं कि मैं भी ठेकेदारी शुरु करूं। बहुत दिनों से काम तलाश रहा हूं। सोच रहा हूं कि आपको गुरु बना लूं। हो सकता है एक दो अवार्ड अपने किस्मत में भी आ जाये।’
ठेकेदार सज्जन ने कहा-‘अरे, कहां ठेकेदारी के चक्कर में पड़े हो। तुम तो अपनी कविता सविता के साथ आनंद करो।’
गंजू उस्ताद बीच में ही बोल पड़ा-‘‘छि…छि………चुप हो जाईये। अभी अभी तो मेरी शादी हुई है। किसी ने सुना लिया कि सविता से मेरा चक्कर था तो गड़बड़ हो जायेगी।’’
ठेकेदार ने कहा-‘‘कविता के साथ मैंने तो ऐसे ही सविता जोड़ दिया। इधर मैं सोच रहा हूं कि तुम्हारा काव्य पाठ करवा दूं। इससे तुम्हें प्रचार मिलेगा और मुझे भी तसल्ली होगी कि साहित्य की सेवा की।’’
गंजू उस्ताद बोला-‘‘हां, पर अब आप मुझे उस्ताद न कहकर कवि नाम से पुकारें। आप अवसर दे रहे हैं तो अच्छी बात है। आप तैयारी करिये मैं अपनी नयी नवेली पत्नी के पास जाकर उसे यह खबर देता हूं। वह मुझे निठल्ला कहने के साथ ही कवितायें जलाने की धमकी देती है। इधर पिताजी भी कह रहे हैं कि अब तेरी शादी हो गयी तो कुछ कमाई करो। आप कितना पैसे देंगे।’’
ठेकेदार ने कहा-‘‘अरे, तुम्हें एक कवि सम्मेलन मिल गया तो फिर रास्ता खुल जायेगा। यही क्या कम है?’’
गंजू उस्ताद मान गया। वह गया तो ठेकेदार सोचने लगा कि ‘कितना बेवकूफ है कि अगर पांच सात सौ रुपये भी मांगता तो मैं देता।’
एक पार्क में बने बनाये मंच पर गंजू उस्ताद का एकल कविता पाठ प्रारंभ हुआ। मगर वह नया था उसे क्या मालुम कि कवितायें ठेली जाती हैं श्रोताओं की परवाह किये बिना। वह हर कविता पर श्रोताओं से पूछता-‘‘आप बताईये कि यह कविता आपको पसंद आयी।’’
लोग चिल्लाये -‘‘नापसंद नापसंद’’।
इस तरह उसने दस कवितायें सुनायी। अब तो हर कविता की समाप्ति पर लोग चिल्लाते-‘‘नापसंद नापसंद।’’
गंजू उस्ताद के बारे में यह कहा जाता है कि जब वह घर में अपने माता पिता से नाराज होता तो अपने कपड़े फाड़ने और बाल नौचने लगता था। इतना ही नहीं फिर घर से बाहर आकर ऐसे ही पत्थर उड़ाने लगता। यह बचपन की बात थी पर जब लोगों ने उसे इस तरह प्रताड़ित किया तो खिसियाहट में अपने बाल्यकाल में चला गया। वह अपने कपड़े फाड़ने लगा। उधर से लोग चिल्लाये ‘‘पसंद पसंद’’।
वह बाल नौचने लगा। लोग चिल्लाये-‘‘पसंद पसंद’’।
वह मंच से उतर गया और पत्थर उछालने लगा। लोग चिल्लाने लगे ‘‘पसंद पसंद।’’
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे ठेकेदार सज्जन भाग निकले। उनके पीछे गंजू उस्ताद भी भाग निकला। पीछे से लोग भी चिल्लाते हुए भागे-‘पसंद पसंद’
बाद में वह ठेकेदार सज्जन से मिला-‘‘और कुछ नहीं तो मेरे कपड़े फट गये उसके पैसे दे दो। आपको पता है कि वह शादी में मुझे ससुराल से मिले थे। आपके कार्यक्रम को सफल बनाने के लिये मैंने उनको फाड़ डाला। तभी तो लोग चिल्ला रहे थे ‘पसंद पसंद’। वरना तो ‘नापसंद नापसंद’ कर पूरा कार्यक्रम ही बरबाद किये दे रहे थे।’’
ठेकेदार सज्जन बोले-‘बेशरम आदमी! तुम्हारी वजह से मेरी बदनामी हुई है। मैंने तुम्हार काव्य पाठ सुनने के लिये कार्यक्रम करवाया था या लोगों की पसंद नापसंद जानने के लिये। अरे, यह भीड़ है इस पर चाहे जितना अपनी कवितायें या कहानी थोप दो चुपचाप झेलती है। अगर बोलने का अवसर दो तो फिर यही करती है जो तुम्हारे साथ किया।’
गंजू उस्ताद उदास होकर चला गया। इधर ठेकेदार सज्जन सोचने लगे कि‘अगर जिद्द करता तो एक दो हजार मैं दे ही देता। चलो अच्छा है चला गया। मुझे तो अपना प्रचार मिल ही गया न!
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