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उम्मीद और वफा-हिन्दी शायरी


हमने देखा उनकी तरफ
बड़ी उम्मीद के साथ
शायद वह हमारी जिंदगी में
कभी बहार लायेंगे,
दोष हमारा ही था कि
बिना मतलब के
उनका साथ निभाया,
उनमें वफा करने की कला है कि नहीं
यह जाने बिना
जरूरत से ज्यादा
अपनी सादगी का रूप दिखाया,
फिर भी भरोसा है कि
इस भटकाव में भी
हम कोई नया रास्ता पायेंगे।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
jpoet, Writer and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
 
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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नया आईडिया-लघु हिन्दी हास्य व्यंग्य (new idea-laghu hindi hasya vyangya or short comic satire article)


     उस्ताद ने शागिर्द से कहा-“मेरी तौंद बहुत बढ़ गई है, इसे कम करना होगा, वरना लोग मेरे उपदेशों पर यकीन नहीं करेंगे जिसमें मैं उनको कम खाने गम खाने और कसरत करो तंदुरुस्ती पाओ जैसी बातें कहता हूँ। आजकल मोटे लोगों को कोई पसंद नहीं करता, नयी पीढ़ी के लड़के लड़कियां मोटे लोगों को बूढ़ा और बीमार समझते हैं। सोच रहा हूँ कल सुबह से सैर पर जाना शुरू करूँ।”
     शागिर्द ने कहा-“उस्ताद सुबह जल्दी उठने के लिए रात को जल्दी सोना पड़ेगा। जल्दी सोने के लिए सोमरस का सेवन भी छोडना होगा।”
    उस्ताद ने कहा-“सोमरस का सेवन बंद नहीं कर सकता, क्योंकि उसी समय मेरे पास बोलने के ढेर सारे आइडिया आते हैं जिनके सहारे अपना समाज सुधार अभियान चलता है। ऐसा करते हैं सोमरस का सेवन हम दोनों अब शाम को ही कर लिया करेंगे।”
     शागिर्द ने कहा-“यह संभव नहीं है क्योंकि आपके कई शागिर्द शाम के बाद भी देर तक रुकते हैं, उनको अगर यह इल्म हो गया कि उनके उस्ताद शराब पीते हैं तो हो सकता है कि वह यहाँ आना छोड़ दें।”
    उस्ताद ने कहा-“ऐसा करो तुम सबसे कह दो कि हम अपना चित्तन और मनन का कार्यक्रम बदल रहे हैं इसलिए वह शाम होने से पहले ही चले जाया करें।”
    उस्ताद कुछ दिन तक अपने कार्यक्रम के अनुसार सुबह घूमने जाते रहे पर पेट था कि कम होने का नाम नहीं ले रहा था। उस्ताद ने शागिर्द से अपनी राय मांगी। शागिर्द बोला-“उस्ताद आप देश में फ़ेल रही महंगाई रोकने के लिए अनशन पर बैठ जाएँ। इससे प्रचार और पैसे बढ्ने के साथ आपका पेट भी कम होगा।”
    उस्ताद ने कहा-“कमबख्त तू शागिर्द है या मेरा दुश्मन1 मैं पतला होना चाहता हूँ,न कि मरना।
शागिर्द बोला-“मैं तो आपको सही सलाह दे रहा हूँ। सारा देश परेशान है। इससे आपको नए प्रायोजक और शागिर्द मिल जाएंगे। फिर आपका स्वास्थ भी अच्छा हो जाएगा।”
      उस्ताद ने कहा-“हाँ और तू बैठकर बाहर सोमरस पीना, मैं उधर अपना गला सुखाता रहूँ।”
शागिर्द ने कहा-“ठीक है,फिर आप ऐसा करें की शाम को कहीं अंदर घुस जाया करें। तब मैं बाहर बैठकर लोगों को भाषण वगैरह दिया करूंगा। अलबत्ता मेरे यह शर्त है कि मैं आपसे पहले ही जाम पी लूँगा।”
      उस्ताद ने पूछा-“वह तो ठीक है पर शराब पीकर खाली पेट कैसे सो जाएंगे?
    शागिर्द ने कहा-” आप शराब कोई नमकीन के साथ थोड़े ही पीएंगे, बल्कि काजू और सलाद भी आपको लाकर दूँगा। उस समय हमारे पास ढेर सारा चंदा होगा। वैसे आप चाहें तो कभी कभी भोजन में मलाई कोफता के साथ रोटी भी खा लेना। अपने तो ऐश हो जाएंगे।”
      उस्ताद ने कहा-“पर इससे मेरी तौंद कम नहीं होगीc”
     शागिर्द ने कहा- आप अब अभी तक तौंद करने के मसले पर ही सोच रहे हैं? अरे, आप तो नए शागिर्द बनाने के लिए ही यह सब करना चाहते हैं न! जब नया आइडिया आ गया तो फिर पुराने पर सोचना छोड़ दीजिए।”
        उस्ताद ने मुंडी हिलाते हुए कहा-“हूँ, हूँ !”
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

समाज सेवा का धंधा-हिन्दी हास्य कविता (samaj seva ka dhandha-hindi hasya kavita


समाज सेवक की पत्नी ने कहा
‘‘सुनते हो जी!
आज नौकर छुट्टी पर गया है
तुम थैला लेकर जाओ,
उसमें आलु, टमाटर और धनिया
खरीद कर लाना
जब घर वापस आओ।’’
समाज सेवक ने कहा
‘‘अभी तक तुम्हारे मस्तिष्क का विकास हुआ नहीं है,
घर पर खाना जरूरी है क्या
मेरे साथ चलो जहां में जा रहा हूं
खाने का होटल भी वहीं है,
अगर किसी ने देख लिया
थैले में हम सब्जी भर भरने लगे हैं,
तब दानदाता भी
हमारे थैले में पैसे की जगह
आलु और टमाटर भरने लगेंगे
छवि के दम पर चल रहा है अपना धंधा
वरना कौन लोग अपने सगे हैं,
नौकर एक दिन की छुट्टी पर गया है
तुम हमें हमेशा के लिये
समाज के धंधे से रिटायर न कराओ।’’
————–
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

————————-
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फरिश्ते जनभक्षी हो गए–हिन्दी व्यंग्य शायरियाँ


जन जन के भले की बात करते हुए
कई फरिश्ते जनभक्षी हो गए हैं,
दाने खिलाने के लिए हाथ फैलाते हैं
जिनको खिलाने के लिए
वही जन उनके लिए
शिकार करने वाले पक्षी हो गए हैं।
———————–
नरभक्षियों का समय गया
अब खतरा जनभक्षियों का हो गया है,
चेहरे काले नहीं खूबसूरत हैं,
हाथों में तलवार की जगह
जुबान के हर शब्द में प्यार है,
मगर जन जन के भले की बात
करने वाले इन फरिश्तों के लिए
आम इंसान
शिकार करने लायक पक्षियों जैसा हो गया है।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

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अच्छे काम का जिम्मा दूसरों पर डालने की आदत-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन (accha kam ka jimma-hindi vyangya lekh)


      सब चाहते हैं कि कोई भगतसिंह बनकर भ्रष्टाचार का सफाया करे पर हमारे कार्य और व्यापार निरंतर सामान्य गति के साथ अपनी यथास्थिति मे चलता रहे। माननीय शहीद भगतसिंह का पूरा देश सम्मान करता है पर सच यह है कि इस देश में लड़ने की ताकत अब उन लोगों में नहीं है जिनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वह भ्रष्टाचार से युद्ध करे। यहां हमारा युद्ध से आशय गोलीबारी चलाने से नहीं बल्कि अभियान, आंदोलन तथा अन्य अहिंसक प्रयासों से हैं। हम अगर शहीद भगतसिंह की बात करें तो उन्हें समाज से प्रोत्साहन होने के अलावा चंद्रशेखर आज़ाद जैसे अन्य महारथियों का सानिध्य प्राप्त था। शहीद भगतसिंह अकेले नहीं थे और समकालीनों में कई लोगों को उनके समक्ष रखा जा सकता है। ऐसे में अगर हम किसी एक व्यक्ति पर ही भरोसा करें तो वह हास्यास्पद लगता है। यहां सभी एक नायक देखना चाहते हैं पर उसके साथ नायकत्व की भूमिका निभाने में उनको डर लगता है।
       हम केवल सोच रहे हैं। हम केवल द्वंद्व देख रहे हैं। हम केवल भ्रष्टाचार और ईमानदार का संघर्ष देखना चाहते हैं। ऐसा लगता है कि हम किसी फिल्म का सीधा प्रसारण देखना चाहते हैं। शायद हमें देश की समस्याओं से सरोकार नहीं है ऐसे ही जैसे किसी फिल्म के विषय से नहीं होता। अंग्रेजी शिक्षा ने या तो साहब पैदा किये या गुलाम! जो साहबी प्रवृत्ति के हैं उनके लिये भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन एक देखने लायक आंदोलन है जिसमें उनको भागीदारी नहीं करनी। जो गुलाम है वह भी केवल देखना चाहते हैं क्योंकि उनको तो अपनी गुलामी से ही फुरसत नहीं है। जब फुरसत मिले टीवी के सामने बैठकर वह द्वंद्व का मजा लेना चाहते हैं। इस पर हिन्दी फिल्मों की कहानियों ने पूरे समजा को कायर बना दिया है। सारी समस्यायें कोई नायक ही हल करेगा हमें तो केवल भीड़ के सहनायकों की भूमिका निभानी है।
       फिर भी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन चलते आ रहे हैं। जिनको नायकत्व का मोह है वह नेतृत्व कर रहे हैं ओर जिनको यह भूमिका नहीं मिल सकती या लेना नहीं चाहते वह लोग उप नायक की भूमिका के लिये स्वयं को प्रस्तुत कर रहे हैं। दुनियां को दिखाने के लिये देश में हलचल होना जरूरी है। सभी जगह हलचल है और भ्रष्टाचार के लिये बदनाम होते जा रहे इसलिये विश्व के परिदृश्य में देश को चेतन साबित करने के लिये आंदोलन या अभियान जरूरी है। इसके दूसरे लाभ भी हैं जिससे समाज को फुरसत में टीवी के सामने चिपकाया जा सकता है। सुबह अखबार पढ़ने के लिये पाठकों को बाध्य किया जा सकता है। अनेक उत्पादों के विज्ञापन एक ही जगह दिखाने में भी इससे सहायता मिलती है। लोगों को मजबूर करना है कि वह सब देखें। प्रयोक्ताओं की संख्या बढ़े।
      यह तभी संभव है जब प्रकाशन और प्रसारण सामग्री द्वंद्वों से सजी हो। जो उत्पादक सामान बेचकर कमा रहे हैं वही फिल्म भी बना रहे हैं। टीवी भी चला रहे हैं। अखबार भी उनके सहारे चल रहा है। वही कहानी लिखवा रहे हैं तो वही अभिनय करने वालों पात्रों का चयन कर रहे हैं। अगर आपको समाज सेवक बनना है तो जरूरी नहीं है कि आपको समाज सेवा करना आये बल्कि बस कोई धनपति प्रायोजक मिलना चाहिए। उसी तरह अभिनय न आने अपन अभिनेता, लेखन में रुचि न होने पर भी लेखक, आढ़ी तिरछी रेखायें खींचना जानते हों तो चित्रकार और संगीन न भी आये तो भी अपने साथ चार पांच वाद यंत्र बजाने वाले रखकर संगीतकार बन सकते हैं बशर्ते कि धनपतियों की कृपा हो।
       कहीं हास्य तो कहीं सनसनी तो कहीं प्रेम से सजी कहानियां सीधे प्रस्तुत हो रही हैं। देश को मनोरंजन में व्यस्त रखना है इसलिये उसके लिये भिन्न प्रकार की कहानियां जरूरी हैं। काल्पनिक कथाओं से उकता गये तो कुछ सत्य कहानियों की सीधा प्रसारण भी हो रहा है। देश में ढेर सारे आंदोलन और अभियान हुए उनमें से किसका क्या परिणाम निकला किसी को नहीं पता! आगे भी होंगे।
      कहा भी जाता है कि जनता की याद्दाश्त कमजोर होती है। यहां तो अब बची ही नहीं है। लोग कितनी कहानियेां को याद रखेंगे। याद रखने की जरूरत है क्या रोज नयी कहानी बन रही है। वैसे भी आचार्य रजनीश यानि ओशो ने कहा है कि स्मृति आदमी की सबसे बड़े शत्रु हैं। इसलिये हमें इस बात पर तो खुश होना चाहिए कि अब तो लोगों की याद्दाश्त लुप्त हो रही है। आम इंसान अधिक याद्दाश्त रखेगा तो रोटी से भी जायेगा। वह जानता है कि उसकी कोई भूमिका समाज निर्माण में नहीं हो सकते हैं। वह देख रहा है। अनेक फिल्मों को एक साथ देख रहा है। फिर अपने कड़वे सच को भी देख रहा है। बस, सभी देख रहे हैं।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप” 
poet,writter and editor-Deepak “BharatDeep”
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आपसी द्वन्द्व-हिन्दी कविताएँ


अब मंच और पर्दे के नाटक
नहीं किसी को भाते हैं,
खबरों के लिए होने वाले
प्रायोजित आंदोलन और अनशन ही
मनोरंजन खूब कर जाते हैं।
——————
हर मुद्दे पर
उन्होने समर्थन और विरोध की
अपनी भूमिका तय कर ली है,
उनके आपसी द्वन्द्व के
पर्दे पर चलते हुए दृश्य को
देखकर कभी व्यथित न होना
कुछ हंसी तो
कुछ दर्द की
चाशनी में नहाये शब्दों से
उन्होंने  पहले ही अपनी  पटकथा भर ली है।
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Bharatdeep,Gwalior, madhyapradesh
http://dpkraj.blogspot.com

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पहले लिखी आंदोलन की पटकथा-हिन्दी व्यंग्य कविता


अब मंच और पर्दे के नाटक
नहीं किसी को भाते हैं,
खबरों के लिए होने वाले
प्रायोजित आंदोलन और अनशन ही
मनोरंजन खूब कर जाते हैं।
——————
हर मुद्दे पर
उन्होने समर्थन और विरोध की
अपनी भूमिका तय कर ली है,
उनके आपसी द्वन्द्व के
पर्दे पर चलते हुए दृश्य को
देखकर कभी व्यथित न होना
कुछ हंसी तो
कुछ दर्द की
चाशनी में नहाये शब्दों से
उन्होंने  पहले ही अपनी  पटकथा भर ली है।
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
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विकास से दैहिक जलीय विसर्जन अवरुद्ध-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन


               गोलगप्पे वाले का स्टिंग आपरेशन कर उस छात्रा ने कमाल ही कर दिया। गोलगप्पे या पानी पुड़ी ठेले पर बेचने वाला वह शख्स अपना मुंह दिखाने लायक नहीं रहा होगा। हुआ यह कि वह लोगों की नज़रे बचाकर उस लोटे में पेशाब कर रहा था जिससे उसके ग्राहक पानी पीते है। दूरदृश्यों में उसका मूत्र विसर्जन का प्रसारण देखकर कोई भी शरमा जाये। अगर किसी भावुक चिंतक ने वह दृश्य देखा होगा तो यकीनन अब राह चलते हुए पेशाब करने के बारे में सोचेगा। उस ठेले वाले ने नीचे बैठकर लोटे में पेशाब किया और थोड़ा दूर चलकर उसे इस तरह फैंका जैसे अपने ठेले से अनुपयोगी जल फैंक रहा हो। कोई कह भी नहीं सकता। अगर वह उतनी दूर जाकर पेशाब करता तो संभव है कि कोई टोक देता। बहरहाल उसने वह लोटा जस का तस उठाकर ठेले पर बिना धोये रख दिया।
             छात्रा और उसके सहयोगियों ने वह दृश्य कैमरे में बंद किया और पहरेदारों को दिखाया। उसे पकड़ा गया और 12 सौ रुपये का जुर्माना देकर वह छूटा। किस्सा छोटा लगता है पर हमें ऐसा लगा कि जैसे उस पर तो बहुत कुछ लिखा जा सकता है। पेशाब पर लिखना कोई अच्छा नहीं लगता मगर देह में उसका अस्तित्व अस्वीकार नहीं किया जा सकता।
         स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि पेशाब कभी रोकना नहीं चाहिए। दूसरी तरफ राय देते हैं कि स्वस्थ रहने के लिए पानी अधिक पीना चाहिये, ऐसे में पेशाब भी तो अधिक आयेगा! न आये तो इसका कोई उपाय नहीं है। प्रकृति ने समस्त प्राणियों की देह इस तरह बनाई है कि उपभोग के द्वार से आगमित वस्तु अंततः निष्कासन द्वारा पर निर्गमन के लिये चली आती है। न आये तो विकट बीमारियां उत्पन्न होती है। वैसे तो इस घटना का प्रसारण देखकर बाज़ार में खाने पीने का सामान बेचने वालों के कामकाज पर ही टिप्पणियां की जा रही थीं पर हमें उस ठेले वाले पर गुस्से के साथ तरस भी आ रहा था। वह फंसा इसलिये कि वह अक्सर ऐसा करता रहा है। छात्रा ने कई दिन उसका कारनामा देखने के बाद ही उसे कैमरे कैद किया। एक बात तय रही कि वह ठेले वाला कोई अच्छी भावना वाला आदमी नहीं रहा होगा। सच बात तो यह है कि खाने का सामान बेचने वाले अनेक लोग ऐसे हैं जो साफ सफाई की बात सोचते तक नहीं है। यही कारण है कि गरीबी और भुखमरी के लिये बदनाम हमारे देश में आज भी भूख से कम गलत सलत खाकर मरने वालों की संख्या अधिक है। ग्राहक को भगवान माना जाता है पर उस ठेले यह साबित किया कि वह तो कमाई को सर्वोपरि मानता है।
          बहरहाल इस घटना से हमारा ध्यान पेशाबघरों की कम होती समस्या की तरफ जा रहा है। देश के शहरों में बढ़ती आबादी के चलते सड़कें सिकुड़ रही हैं। कई पेशाबघर लापता हो गये हैं। कहीं उनके आसपास चाय, पान, तथा चाट ठेलों ने कब्जा किया है तो कहीं बड़े दुकानदार काबिज हो गये हैं। इसके विपरीत भीड़ बढ़ रही है। बाज़ार में खानपान करने वालों की संख्या भी कम नहीं है। ऐसे में पेशाब आने पर सबसे बड़ा संकट यह होता है कि उसके लिये स्थान ढूंढें। वैसे हमारे देश में धार्मिक लोग प्याऊ बनवाते रहे हैं पर पेशाबघर बनाने का जिम्मा राज्य पर ही रखा गया है। वैसे प्राचीन समय में पेशाबघर बनवाने की आवश्यकता नहंीं अनुभव होती थी क्योकि इसके लिये तो पूरी जमीन खाली थी पर समय के अनुसार सभ्यता बदली है। गनीमत है कि अनेक स्थानों पर पिशाबघर न दिखने पर भी गंदगी के ऐसे ढेर मिल जाते हैं जहां खड़े होकर अपने को तनाव मुक्त किया जा सकता है। जिस तरह विकास बढ़ रहा है उससे तो लगता है कि आगे चलकर पेशाब घर कंपनियों को इसका भी ठेका मिलने लगेगा। कई वाहन मोबाईल जलीय विसर्जन-पेशाब के लिये अच्छा साहित्यक शब्द ढूंढना जरूरी है-का काम करेंगे। कहीं कहीं तो एक के साथ एक फ्री जैसे भी नारे लिखे मिलेंगे।
             वैसे तो अनेक शहरों में सुलभ शौचालय हैं पर वहां पेशाब की सुविधा हो यह जरूरी नहीं है। दूसरी बात यह भी कि अंततः वहां कार्यरत कर्मचारी मालिकाना हक की तरह उसका इस्तेमाल करते हुए पैसे मांगते हैं। कुछ लोगों ने तो यह शिकायत भी की है कि वहां पुरुषों के पिशाब घर खुले होने के कारण उनसे पैसे नहीं मांगे जाते पर महिलाओं से पैसा मांगा जाता है। महिला कल्याण समर्थक इस तरफ भ ध्यान दें।
वैसे ग्रामीण पृष्ठभूमि वाली महिलायें फिर भी परेशान नहीं दिखती पर शहरी क्षेत्र की महिलाऐं बाज़ार में घुमते समय तनाव होने पर दोहरे संकट में आ जाती हैं। एक तो उनको बाज़ार में उनको अपना काम पूरा करना है दूसरा दैहिक तनाव उनके लिये भारी संकट हो जाता है। अपने साथ पुरुष होने पर अपनी बात कह सकती हैं पर दूसरे से तो वह इसमें बात करते हुए संकोच करती हैं।
            एक सभ्य महिला ने एक बार जरूर हमसे कहा था कि ‘महिलाओं के लिये सुविधा बढ़ाने के तो दावे हैं उन पर यकीन कौन करेगा? बाज़ार में भीड़ महिलाओं की संख्या पहले से ज्यादा है पर पिशाबघर पुरुषों के लिए ही अधिक है।’
         बात सही है पर यहां तो अब पुरुषों के पिशाबघर लुप्त होते जा रहे हैं। चिकित्सक कहते हैं कि रुका पिशाब विष हो जाता है। इसके अलावा यह भी कहते हैं कि मधुमेह से ग्रसित लोगों को तत्काल पिशाब करना चाहिए। ऐसे ढेर सारे उपाय वह बताते हैं। देश में कार वालों की संख्या बढ़ती जा रही है उनका बाज़ार में आना जाना मॉलों, बड़े होटलों या ऐसे स्थानों पर होता है जहां पेशाबघर बने रहते हैं मगर समस्या है मध्यम वर्गीय या आधुनिक परिवेश वाले गरीब लोगों के लिये है। कई बार तो ऐसा है कि कुछ लोग बाज़ार से घर इसलिये ही जल्दी घर लौट आते हैं क्योंकि वह देह में पल रहे जलीय तनाव से मुक्ति का स्थान नहीं ढूंढ पाते। बाज़ार में सामान बेचने वालों की यही समस्या होती है कि उनके आसपास पेशाब घर नहीं होते।
           ऐसे में लगता है कि विकास दर वह दीवार है जो आदमी के जलीय तनाव के विसर्जन को रोकने का काम कर रही है। ऊंची और शानदार इमारतें आंखों को भले ही अच्छी लगें पर निष्कासन अंगों का तनाव उसका सुख कम किये दे रहा हैं। हमारे देश में जब कहीं दो लोग आपस में लड़ते हैं तो पिशाब को धमकी के रूप में उपयोग करते हैं। एक तो कहते हैं कि ‘ऐसी हालत करूंगा कि पेशाब बंद हो जायेगी।’ या कहेंगे कि ‘ऐसी हालत करूंगा कि पेशाब निकल आयेगी।’
           मगर हमारे देश में विकास ऐसा हो रहा है कि वह लोगों की पेशाब बंद भी कर सकता है। आमतौर से राह में पेशाब आने पर लोग ऐसे स्थान ढंूढते हैं जो एकांत में और गंदे हों। एकांत में होने के साथ चमकदार भी हों तो कोई जलीय तनाव विसर्जन का साहस नहीं कर सकता। आधुनिक विकास वही चमकदार दीवार है जिस पर कोई वक्र दृष्टि नहीं डाल सकता ऐसे में तनाव तो बढ़ना ही है।
चलते चलते 
———————-
           यह कहना मुश्किल है कि वह पानीपुरी बेचने वाला अपने ठेले पर रखे लोटे में पेशाब करते हुए कैमरे में कैद किस प्रकृति का है पर इस लेखक ने देखा है कि कुछ लोगों की बचपन से ही ऐसी प्रकृति होती है कि वह दूसरे को दुःख देकर या हानि पहुंचाकर खुश होने के आदी हो चुके होते हैं। ऐसे लोग जिंदगी में कुछ नहंी बन पाते। इस लेखक के साथ एक लड़का जूतों की दुकान पर नौकरी करता था। उसका वेतन लेखक के बराबर ही था पर  वह लड़का खराब नीयत का था। अकारण प्लास्टिक के जूते फाड़ता, आर्डर का माल पैक करते समय जिस साइज के जूते कागज पर लिखे होते उससे अलग साईज के भरता। बंडल तीन साइज का होता था पर वह अफरातफरी कर एक ही साईज के बना देता जिससे बाद में दुकानदार परेशान होते। अनावश्यक रूप से दूसरे नौकरों से भी वह लड़ता है। 
       आखिर उसका बाद में क्या हुआ? वह अब सब्जी मंडी में ठेला लेकर सब्जी ढोने का काम करता है। उसके साथ काम कर चुके चार लड़के उसी मंडी में दो कार में दो एक स्कूटर पर सब्जी खरीदने आते हैं। कार वाले तो उसको देखते तक नहीं है पर यह लेखक अनेक बार उसे देखता है पर बात नहीं करता। वह जिंदगी में नहीं बना इसके लिये अन्य कोई नहीं वह स्वयं जिम्मेदार है। यह नीच प्रकृति मनुष्य के विकास का मार्ग अवरूद्ध कर देती है-उस लड़के को देखकर हमारा तो यही मत बनता है।
—————
कवि, लेखक , संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
poet,editor,writer and auther-Deepak ‘Bharatdee’,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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इंटरनेट की माया-हास्य कविता (Internet ki maya-hasya kavita)


अंतर्जाल पर रोज मिलते थे
प्यार भरे शब्द एक दूसरे के लिये लिखते थे,
बहुत दिन बाद
आशिक और माशुका को
आपस में मिलने की बात दिमाग में आई,
एक तारीख चुनकर अपनी मीट होटल में सजाई।
आशिक पहले पहुंचकर टेबल पर बैठ गया
माशुका थोड़ी देर बाद आई।
दोनों ने देखा एक दूसरे को
तब एक उदासी उनके चेहरे पर नज़र आई।
फिर भी खाना पीना टेबल पर सज गया
तो उसे खाने की इच्छा उनके मन में आई।
आशिक ने बिल की कीमत बड़े बेमन से चुकाई।

बातचीत का दौर शुरु हुआ तो
माशुका एकदम जोर से आशिक पर चिल्लाई,
‘सच कहते हैं इंटरनेट पर
धोखे हजार है,
जो खाये वह हो बरबाद
जो दे उसकी तो बहार है
तुम तो छत्तीस के लगते हो
भले ही इंटरनेट में अपने फोटो में
पच्चीस के बांके जवान की तरह फबते हो,
शर्म की बात है
तुमने अपनी उम्र मुझे केवल तीस बताई।’

सुनकर उठ खड़ा हुआ आशिक
और बोला
‘तीस साल का ही हूं
वह तो धूप में जवानी थोड़ा पक गयी है,
तुम्हारे लिये टंकित करते हुए श्रृंगार रस से भरी कवितायें
यह आंखें कुछ थक गयी हैं,
कंप्यूटर पर बैठा बैठा
मोटा और भद्दा हो गया हूं,
पर इसका मतलब यह नहीं कि
जवानी का दिल बिछाकर सो गया हूं,
मेरी बात छोड़ो,
बात का रुख अपनी तरफ मोड़ो,
तुम छह साल से अपनी उम्र
अट्ठारह ही बता रही हो,
फोटो दिखाकर यूं ही सता रही हो,
जब तुम्हें मीट में आते देखा तो सोच रहा था
पता नहीं यह कहीं मेरी माशुका की
माताश्री तो नहीं आयी है।
मुझ पर लगा रही है हो छह साल
कम उम्र बताने का आरोप जबकि
तुमने तो कम से कम
सात साल सात महीने कम बतायी है।
जहां तक मेरा अनुमान है
तुम्हारा नाम भी दूसरा होगा
मुझ से तो तुमने छद्म मोहब्बत रचाई है।
होटल में खा पीकर चली जाओगी,
फिर दूसरी जगह दाव आजमाओगी,
मेरी यह गलती थी जो
छह साल तक तुम्हें अपने दिल की रानी माना,
अपनी तरफ देखो मुझे न दो ताना,
तुम्हें क्या दोष दूं
इंटरनेट की माया
दुनियां की तरह अज़ीब है
इसलिये मैंने यह छठी ठोकर खाई।’

इस तरह आशिक माशुक की पहली मीट ने
दोनों के इश्क की कब्र बनाई।
———-

कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
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ढाई कौड़ी का चिंत्तन-हिन्दी हास्य व्यंग्य


एक सरकारी अधिकारी के यहां छापा मारकर ढाई हजार करोड़ की अवैध संपत्ति का पता लगाया गया। डेढ़ टन सोना बरामद किया। यह खबर अखबार में पढ़कर अपने तो होश ही उड़ गये-आजकल अक्सर ऐसा होने लगा है।
हम सोचने लगे कि इतने सारी संपत्ति वह अधिकारी संभालता कैसै होगा। अपने से तो ढाई हजार रुपये की रकम हीं नहीं संभलती। पहले तो इतनी बड़ी रकम साथ लेकर निकलते ही नहीं-कुछ तो लेकर निकलते ही हैं क्योंकि इतने बड़े आदमी नहंी है कि साथ में सचिव वगैरह हो खर्च करने के लिये या लोग मुफ्त सेवा के लिये आतुर रहते हों-अगर साथ लेकर निकलते ही हैं तो कुछ पर्स में रखेंगे, कुछ पेंट की अंदरूनी जेब में तो कुछ शर्ट की जेब में और बाकी पेंट की दायीं जेब में।
इसके चलते एक बार हमें अपमानित भी होना पड़ा जब हमारा पर्स खो गया तो एक टूसीटर चालक वापस करने आया। उसमें एटीएम कार्ड था जो गरीब होने की छबि से बचाता है, इसलिये शर्मिंदा होने से बचे और और उस टूसीटर चालक ने कहा भी था कि ‘आपका एटीएम देखकर वापस करने का मन हुआ था वरना तो उसमें एक भी पैसा भी नहीं था जिससे वापस करने का विचार करता।’
कभी एक साथ ढाई लाख की रकम नहीं देखी इसलिये ढाई करोड़ जैसा शब्द ही डरा देता है। ऐसे में उसके साथ सौ का शब्द तो अंदर तक हिला देता है। देश की विकासदर बढ़ रही है पर अपनी विकास दर स्थिर है इसलिये यह सौ करोड़ या हजार करोड़ शब्द ही मातृभाषा हिन्दी से पृथक किसी दूसरी भाषा के शब्द प्रतीत होते हैं। उस समय सोच के दरवाजे ही बंद हो जाते हैं।
एक समय तक इस देश में करोड़ की रकम भ्रष्टाचार में पकड़े जाने तक सम्मानजनक मानी जाती थी। उसके बाद सौ करोड़ अब तो हजार करोड़ों से नीचे बात ही कहां होती है। वैसे आजकल अधिकारियों के पकड़े जाने की चर्चा खूब होती है। इसमें कुछ गरीब अधिकारी भी फंसे हैं जिनके पास सौ करोड़ के मानक में संपत्ति थी।
जब ऐसी खबरे आती हैं तो हमें कुछ देर लगता है कि जैसे वह इस धरती की चर्चा नहीं होगी कहीं स्वर्ग वगैरह का मामला होगा वरना यहां हजार करोड़ रखने की किसके पास ताकत होगी-यह तो ऊपर वाले देवताओं की कृपा हो सकती है जो स्वर्ग में ही रहते हैं। फिर शहर और प्रदेश देखते हैं तो यकीन करना ही पड़ता है कि इस धरती पर भी दूसरी दुनियां है जिसमें केवल पैसे वाले रहते हैं और भले ही उन सड़कों पर घूमते हों जहां से हम भी निकलते हैं पर उनको न हम जैसे लोग दिखाई देते हैं और न वह इनको देख पाते हैं। इतने हजार करोड़ों रुपये के मालिक भला खुले में निकल कहां सकते हैं? उनको तो चाहिये लोहे लंगर के बने हुए चलते फिरते किले।
प्रेम के ढाई आखर पढ़ ले वही पंडित बन जाये, पर जिससे पंडित नहीं बनना हो वह ढाई में सौ का गुणा करते हुए इस मायावी दुनियां में बढ़ता जाये। मुश्किल हम जैसे लोगों की है जिनके पास यह गुणा करने की ताकत नहीं है।
डेढ़ टन सोना। कर लो बात! यहां अपने घर में डेढ़ तोले सोने पर ही बात अटक जाती है। हमारे मित्र को अपने पत्नी के लिये सोने की चूड़ियां बनवानी थी। एक दिन हम से उसने कहा-‘अभी तय नहीं कर पा रहा कि एक तोले की चार चूड़ियां बनवाऊं या डेढ़ डेढ़ तोले की दो।’
हमने कहा-‘क्या यार। अभी भी एक ड़ेढ तोले पर ही अटके हुए हो। सोना तो विनिवेश करने एक अच्छा साधन है। दो दो तोले की चार बनवा लो।’
वह बोला-‘यार, औरतों को पहननी भी तो पड़ती हैं। भारी हो जाती हैं।’
सोना पहनने में भारी होता है पर रखने में नहीं। आम औरतें सोना पहनने के लिये लेती हैं ताकि समाज में उनकी अमीरी का अहसास बना रहे। विशिष्ट लोगों की औरतों में तो अब सोना पहनने का शौक नहीं रहा। शायद इसका कारण यह है कि किसी वस्तु अधिकता से बोरियत हो जाती है-यह अर्थशास्त्र के उपयोगिता नियम के अनुसार विचार है- अपने घर में टनों सोना देखकर उनका मन वैसे ही भर जाता है तब उसके गहने बनवाने का विचार उनको नहंी आता। वैसे ही उनका रौब इतना रहता है कि अगर गहने न भी पहने तब भी आम लोग उनकी अमीरी का लोहा मानते हैं। ऐसी औरतों के पति अगर बड़े पद पर हों तो वह सोने की बरफी-बिस्कुट भी कह सकते हैं-बनाने वाले हलवाई हो जाते हैं जो अपना माल खुद उपभोग में नहीं लाते। उनके घर की नारियां भी ऐसे ही हो जाती हैं कि क्या अपने पति का बना माल खाना’।
हद है यार! क्या लिखें और क्या कहें! ढाई हजार करोड़ रुपये की संपत्ति और डेढ़ टन सोने की मात्रा देखते हुए अपनी औकात नहीं लगती कि उस पर कुछ लिखें। मुश्किल यह है कि जिनकी औकात है वह लिखेंगे नहीं क्योंकि उनको तो अपने गुणा भाग से ही फुरसत नहीं होती। यह लिखने का काम तो ढाई कौड़ी के लेखक ही करते हैं-यकीनन इतनी औकात तो अपनी है ही। अपनी आंखें ढाई हजार पर ही बंद हो जाती हैं पर ऐसे महानुभाव तो गुण पर गुणा करते हुए बढ़ते जाते हैं। आखिर उनको जिंदा रहने के लिये कितना पैसा चाहिये। यह सोचकर ही हमारी सोच भी जवाब देने लगती है वह भी तो ठहरी आखिर ढाई कौड़ी की।

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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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वफा की कीमत औकात के मुताबिक-हिन्दी शायरी


दिन में फरिश्तों को भेष ओढ़े लोग
रात को शैतान हो जाते हैं।
भलाई अब हो गयी है
सौदे की शय
बेचते हैं बाजार में दरियादिल
वही दीवारों के पीछे
रंगीन रौशनी में
इज्जत के लुटेरे बन जाते हैं।
———-
नहीं दौलत अपने पास तो
किसी पर यकीन नहीं करना,
बिखर जाओगे मुफ्त में वरना,
यहां वफा बिकती है
बेचने वाले की औकात से
जिसकी तय होती है कीमत
पर बेवफाई आज के इंसानों के लिये
चालाकी का नाम होती है।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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पर्दे के पीछे-हिन्दी साहित्य कविता


सच कहते हैं
जिंदगी के फैसले
कभी जंग से नहीं होते।
पर्दे के पीछे
तय हो जाते फैसले ले देकर
कटवाते है वही सिर अपना
जो इससे बेखबर होते।
कहीं गद्दारी तो
कही वफदारी बिक जाती है
दौलत और शौहरत वह शय है
जो ईमान भी खरीद लाती है
खून खराबे के आदी होते कायर
बहादुर तो जमाने के साथ
बांटकर खाने वाले होते।
जिंदगी की जंग जीतते हैं वही लोग
जो जमाने का दिल जीत चुके होते।

———-
इज्जतदार लोग-व्यंग्य कविता
______________________

इंसान के चेहरे बदल जाते हैं
नहीं बदलती चाल।
खून खराबा करने वाले
हाथ बदल जाते हैं
वही रहती तलवार और ढाल।

इंसान से ही उगे इंसान
संभालते उसका खानदान
जमाने को काबू करने का मिला जिनको वरदान,
पांव हमेशा पेट की तरफ ही मुड़ता है,
दौलत से ही किस्मत का साथ जुड़ता है,
बड़े आदमी करते दिखावा
जमाने का भला करने का
मगर लूटते हैं गरीब का दान,
छोटे आदमी के हिस्से आता है अपमान,
थामे अपनी अगली पीढ़ी का झंडा
लुटेरे लूट रहे जमाने को
लगे हैं कमाने को
अपनी दौलत शौहरत देकर
अपनी औलाद में जिंदा
रहने की ख्वाहिश पाले
मौत की सोच पर लगा ताले
दौड़ जा रहे हैं इज्जतदार लोग,
लिये साथ पाप और रोग
वाह री कुदरत! तेरा कमाल।

लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com
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जिंदगी और जंग-हिंदी शायरी (zindagi aur zang-hindi shayri


सच कहते हैं
जिंदगी के फैसले
कभी जंग से नहीं होते।
पर्दे के पीछे
तय हो जाते फैसले ले देकर
कटवाते है वही सिर अपना
जो इससे बेखबर होते।
कहीं गद्दारी तो
कही वफदारी बिक जाती है
दौलत और शौहरत वह शय है
जो ईमान भी खरीद लाती है
खून खराबे के आदी होते कायर
बहादुर तो जमाने के साथ
बांटकर खाने वाले होते।
जिंदगी की जंग जीतते हैं वही लोग
जो जमाने का दिल जीत चुके होते।

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इंसान के चेहरे बदल जाते हैं
नहीं बदलती चाल।
खून खराबा करने वाले
हाथ बदल जाते हैं
वही रहती तलवार और ढाल।

इंसान से ही उगे इंसान
संभालते उसका खानदान
जमाने को काबू करने का मिला जिनको वरदान,
पांव हमेशा पेट की तरफ ही मुड़ता है,
दौलत से ही किस्मत का साथ जुड़ता है,
बड़े आदमी करते दिखावा
जमाने का भला करने का
मगर लूटते हैं गरीब का दान,
छोटे आदमी के हिस्से आता है अपमान,
थामे अपनी अगली पीढ़ी का झंडा
लुटेरे लूट रहे जमाने को
लगे हैं कमाने को
अपनी दौलत शौहरत देकर
अपनी औलाद में जिंदा
रहने की ख्वाहिश पाले
मौत की सोच पर लगा ताले
दौड़ जा रहे हैं इज्जतदार लोग,
लिये साथ पाप और रोग
वाह री कुदरत! तेरा कमाल।

लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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दिल और कविता-हिंदी कविता (dil aur kavita-hindi shayri)


 
कभी गम तो कभी खुशी
कभी दर्द तो कभी हँसी के साथ
कविता लिखने का ख्याल किया
तब भाषा सजाने के साथ  
शब्द को जोर से बजाने का सोच  नहीं आया.
कोशिश की रस के रंग दिखाने 
और   अलंकार से कविता  सजाने की 
मिले जिससे भाषा विद्वान की उपाधि 
तब कविता को अपने दिल के  भाव से दूर पाया..
____________________
 

कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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खाली ज़ेब का रुआब-हास्य व्यंग्य कविता (khali zeb ka ruaab-hindi hasya kavita)


सूखी मन गयी दिवाली
क्योंकि जेब थी खाली,
ज़माने में अपना रुआब दिखाने के
लिए सबसे कह रहे हैं”हैप्पी दीवाली”.

जेब खाली हो तो
अपना चेहरा आईने में देखते हुए भी
बहुत डर लगता है
अपने ही खालीपन का अक्स
सताने लगता है।

क्यों न इतरायें दौलतमंद
जब पूरा जमाना ही
आंख जमाये है उन पर
और अपने ही गरीब रिश्ते से
मूंह फेरे रहता है।

अपना हाथ ही जगन्नाथ
फिर भी लगाये हैं उन लोगों से आस
जिनके घरों मे रुपया उगा है जैसे घास
घोड़ों की तरह हिनहिना रहे सभी
शायद मिल जाये कुछ कभी
मिले हमेशा दुत्कार
फिर भी आशा रखे कि मिलेगा पुरस्कार
इसलिये दौलतमंदों के लिये
मुफ्त की इज्जत और शौहरत का दरिया
कमअक्लों की भीड़ के घेरे में ही बहता है।

……………………………

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हंसी के खजाने की तलाश-हिंदी शायरी (hansi ka khazana-hindi shayri)


अपने पर ही यूं हंस लेता हूं।
कोई मेरी इस हंसी से
अपना दर्द मिटा ले
कुछ लम्हें इसलिये उधार देता हूं।
मसखरा समझ ले जमाना तो क्या
अपनी ही मसखरी में
अपनी जिंदगी जी लेता हूं।
रोती सूरतें लिये लोग
खुश दिखने की कोशिश में
जिंदगी गुजार देते हैं
फिर भी किसी से हंसी
उधार नहीं लेते हैं
अपने घमंड में जी रहे लोग
दूसरे के दर्द पर सभी को हंसना आता है
उनकी हालतों पर रोने के लिये
मेरे पास भी दर्द कहां रह जाता है
जमाने के पास कहां है हंसी का खजाना
इसलिये अपनी अंदर ही
उसकी तलाश कर लेता हूं।

…………………………….

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मिलावट और नकल का आतंक-हास्य व्यंग्य(nakal aur milavat par hindi vyangya)


आतंक कोई बाहर विचरने वाला पशु नहीं बल्कि मानव के मन में रहने वाला भाव है जो उसके सामने तब उपस्थित होता है जब वह अपने लिये कठिन हालत पाता है। पूरे विश्व के साथ भारत में भी आंतक फैले होने की बात की जाती है पर अन्य से हमारी स्थिति थोड़ी अलग है। दूसरे देश कुछ लोगों द्वारा उठायी गयी बंदूकों के कारण आतंक से ग्रसित हैं पर भारत में तो यह आतंक का एक हिस्सा भर है। यह अलग बात है कि हमारे देश के बुद्धिमान बस उसी बंदूक वाले आतंक पर ही लिखते हैं।
बहुत दिन से हम देख रहे हैं कि हम सारे जमाने के आतंक पर लिख रहे हैं पर अपने मन में जिनका आंतक है उसकी भी चर्चा कर लें। सच बात तो यह है हम नकली नोटों और मिलावटी सामान से बहुत आतंकित हैं।
बाजार में जब किसी को पांच सौ का नोट देते हैं तो वह ऐसे देखता है कि जैसे कि किसी अपराधी ने उसे अपने चरित्र का प्रमाणपत्र देखने के लिये दिया हो। जब तक वह दुकानदार लेकर अपनी पेटी में वह नोट डालकर सौदा और बचे हुए पैसे वापस नहीं करता तब तक मन में जो उथल पुथल होती है उसमें हम कितनी बार घायल होते हैं यह पता ही नहीं-याद रहे पश्चिमी चिकित्सा शास्त्र यह कहता है कि तनाव से जो मनुष्य के दिमाग को क्षति पहुंचती है उसका पता उसे तत्काल नही चलता।
हमने अनेक दुकानदारों के सामने ताल ठौंकी-अरे, भईया हम यह नोट ए.टी.एम से ताजा ताजा निकाल कर लाये हैं।’
वह कहते हैं कि ‘साहब, आजकल तो ए़.टी.एम. से भी नकली नोट निकल आते हैं और वह सभी ताजा ही होते हैं।’
उस समय सारा आत्मविश्वास ध्वस्त नजर आता है। ऐसा लगता है कि जैसे बम फटा हो और हम अपनी किस्मत से साबित निकल गये।
यही मिलावटी सामान का हाल है। बाजार में खाने के नाम पर दिन-ब-दिन डरपोक होते जा रहे हैं। इधर टीवी पर सुना कि मिलावटी दूध में ऐसा सामान मिलाया जा रहा है जिसमें एक फीसदी भी शरीर के लिये पाचक नहीं हैं। मतलब यह कि पूरा का पूरा कचड़ा है जो पेट में जमा होता है और समय आने पर अपना दुष्प्रभाव दिखाता है। अभी उस दिन समाचार सुना कि एक तेरहवीं में विषाक्त खोये की मिठाई खाकर 1200 लोग एक साथ बीमार पड़ गये। उस समय हमारी सांसें उखड़ रही थी। उसी दौरान एक मित्र का फोन आया और उसने पूछा-‘क्या हालचाल हैं? तुम्हारे ब्लाग हिट हुए कि नहीं। अगर हो गये हों तो मिठाई खिला देना। हम अंधेरे में बैठे हैं और आज तुम्हारा ब्लाग नहीं देख पा रहे।’
हमने कहा-‘अच्छा है बैठे रहो। अगर लाईट आ गयी तो तुम टीवी समाचार भी जरूर देखोगे। वहां जब मिठाई खाकर बीमार पड़ने वालों की खबर सुनोगे तो फिर मिठाई नहीं मांगोगे बल्कि मिठाई खाना ही भूल जाओगे।’
मित्र ने कहा-‘’तुम चिंता मत करो। न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी। तुम कभी हिट नहीं बनोगे इसलिये मिठाई भी नहीं मिलेगी सो खतरा कम है। पर यार, वाकई बाहर खाने में हम दिमाग तनाव मे आ जाता है कि कहीं गलत चीज तो नहीं खा ली। उस दिन एक जगह चाय पी और बीच में छोड़ कर दुकानदार को पैसे दिये और उससे कहा‘यह हमारी इंसानियत ही समझना कि हमने पैसे दिये वरना तुम्हारा दूध खराब है उसमें बदबू आ रही है।’ उसने भी हमसे पैसे ले लिये। हैरानी की बात यह है कि लोग उसी चाय को पी रहे थे किसी ने उससे कुछ कहा नहीं।’’
पिछली दो दीवाली हमने बिना खोये की मिठाई खाये बिना ही मनाई हैं। कहां हमें उस दिन मिठाई खाने का शौक रहता था पर मिलावट के आतंक ने उसे छीन लिया। वजह यह है कि इधर दीवाली के दिन शुरु हुए उधर टीवी पर मिलावटी दूध के समाचार शुरु हो जाते हैं कहते हैं कि
1-शहरों में खोवा आ कहां से रहा है जबकि उस क्षेत्र में इतनी भैंसे ही नहीं्र है।
2-खोये में तमाम ऐसे रसायन मिले होते हैं जो पेट की आंतों में भारी हानि पहुंचाते हैं।
3-घी भी पूरी तरह से नकली बन रहा है।’
ऐसे समाचार जो दिमाग में आंतक फैलाते हैं वह बारूद के आतंक से कहीं कम नहीं होते। आप ही बताईये खोय की विषाक्त मिठाई खाकर 1200 लोग एक साथ बीमार हों तो उसे भला छोटी घटना माना जा सकता है? क्या जरूरी है कि दुनियां के किसी हिस्से में बारूद से लोग मरे उसे ही आतंकवादी घटना माना जायेगा?
समस्या यह नहीं है कि दूध, घी या खोवा मिलावटी सामान बन रहा है बल्कि हल्दी, मिर्ची और शक्कर में मिलावट की बात भी सामने आती है। इतना ही नहीं अब तो यह भी कहने लगे है कि सब्जियों और फलों में भी दवाईयां मिलाकर उन्हें प्रस्तुत किया जा रहा है और वह भी कम मनुष्य देह के लिये कम खतरनाक नहीं है।

जब बारूदी आतंक का समाचार चारों तरफ गूंज रहा होता है तब कुछ देर उस पर ध्यान अधिक रहता है पर जब अपने जीवन में कदम कदम पर नकली और खतरनाक सामान से सरोकार होने की आशंका है तो वह भी अब कम आतंकित नहीं करती। मतलब यह है कि चारों तरफ आंतक है पर हमारे देश के बुद्धिमान लोगों की आदत है कि विदेश के बताये रास्ते पर ही अपने विषय चुंनते हैं। हम इससे थोड़ा अलग हैं और हर विषय को एक आईना बनाकर अपने आसपास देखते हैं तब लगता है कि इस विश्व में बारूदी आतंक खत्म वैसे ही न होने वाला पर जो यह नकल और मिलावट का यह अप्रत्यक्ष आतंक है उसके परिणाम उससे कहीं अधिक गंभीर हैं। सोचने का अपना अपना तरीका है कोई सहमत न हो यह अलग बात है।
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