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हिंदी भाषा का महत्व और गरीब-हिन्दी व्यंग्य (hindi ka mahtav aur garib-hindi vyangya)


                14 सितंबर 2011 बुधवार को हिन्दी दिवस मनाया जाने वाला है। इस अवसर पर देश में हिन्दी बोलो, हिन्दी सुनो और हिन्दी समझो जैसे भाव का बोध कराने वाले परंपरागत नारे सुनने को मिलेंगे। प्रचार माध्यम बतायेंगे कि हिन्दी अपने देश में ही उपेक्षित है। हिन्दी को निरीह गाय की तरह देखा जायेगा भले ही वह असंख्य बुद्धिजीवियों को शुद्ध दूध, देशी की तथा मक्खन खिलाती हो। इसी दिन अनेक कार्यक्रम होंगे तो नाश्ता वगैरह भी चलेगा।
           शायद इस लेखक ने अपने ब्लागों पर कई लेखों मे खुशवंत सिंह नामक अंग्रेजी के लेखक की चर्चा की है। दरअसल उन्होंने एक बार लंदन में कहा था कि ‘ भारत में हिन्दी गरीबों की भाषा है।’ इस पर देश में भारी बवाल मचाया गया। समस्त प्रचार माध्यम राशन पानी लेकर उनके पीछे पड़ गये। उनका बयान यूं सुनाया गया कि खुशवंत सिंह ने कहा है कि हिन्दी गरीबों भाषा है। इस लेखक ने वह समाचार पढ़ा। हिन्दी को गरीब भाषा कहने पर मन व्यथित हुआ था तो एक अखबार में संपादक के नाम पत्र में उनकी खूब बखिया उधेड़ी। उसके बाद कुछ समाचार पत्रों में उनका पूरा बयान भी आया। उससे साफ हो गया कि उन्होंने हिन्दी को गरीबों की भाषा कहा है। तब भी मन ठंडा नहीं हुआ क्योंकि तब जीवन का ऐसा अनुभव नहीं था। समय ने करवट बदली। दरअसल इस प्रचार के बाद से खुशवंत सिंह के लेख हिन्दी भाषा में अनुवाद होकर छपने लगे। तब यह सोचकर हैरानी होती थी कि जिस शख्स पर यह अखबार वाले इस कदर पिल पड़े थे उनके लेख अनुवाद कर क्यों हिन्दी पाठकों के सामने प्रस्तुत कर उनको चिढ़ा रहे हैं? अब यह बात समझ में आने लगी है कि इस तरह के प्रचार से उस समय के बाज़ार प्रबंधक एक ऐसा नायक गढ़ रहे थे जिसे हिन्दी में पढ़ा जाये। उस खुशवंत सिंह को बता दिया गया होगा कि यह सब फिक्स है और अब आपकी रचनायें हिन्दी में छपा करेंगी।
        खुशवंत सिंह ने अपने उसी बयान में हिन्दी भाषा में चूहे के लिये रेट और माउस अलग अलग शब्द न होने पर अफसोस जताया था। इससे उन पर हंसी आयी थी। दरअसल वह अंग्रेजी भाषा के लेखक हैे पर उसका सही स्वरूप नहीं जानते। वह कहते है कि भारत में हिन्दी गरीबों की भाषा है यह हमने मान लिया मगर वह इस लेखक की बात-उनको हिन्दी आती नहीं और हम कोई बड़े लेखक नहीं है कि उन तक पहुंच जायेगी पर इंटरनेट पर यह संभावना हम मान ही लेते हैं कि उनके शुभचिंतक पढ़ेंगे तो उन्हें बता सकते हैं-मान लें कि अंग्रेजी भाषा इस धरती पर दो ही प्रकार के लोग लिखते और बोलते हैं एक साहब दूसरे गुलाम! जिनको अंग्रेजी से प्रेम है वह इन्हीं दो वर्गों में अपना अस्तित्व ढूंढे तीसरी स्थिति उनकी नहीं है। याद रखें यह संसार न साहबों की दम पर चलता है न गुलामों के श्रम पर पलता है। उनके अपने रिश्ते होंगे पर स्वतंत्र वर्ग वाले अपनी चाल स्वयं ही चलते हैं। स्वतंत्र वर्ग वाले वह लोग हैं जो अपनी बुद्धि से सोचकर अपने ही श्रम पर जिंदा हैं। उनका न कोई साहब है न गुलाम।
          बहरहाल हम यह तो मानते हैं कि इस देश में हिन्दी अब गरीबों की भाषा ही रहने वाली है और यहीं से शुरु होता है इसका महत्व! इंटरनेट पर हिन्दी के महत्व पर लिखे गये एक लेख पर अनेक लोग उद्वेलित हैं। वह कहते हैं कि हिन्दी का आपने महत्व तो बताया ही नहीं। उनका जवाब देना व्यर्थ है। दरअसल ऐसे लोग एक तो अपनी बात रोमन लिपि में लिखते हैं। अगर हिन्दी में लिखते हैं तो उनका सोच अंग्रेजी का है। मतलब कहंी न कहंी गुलामी से ग्रसित हैं। हम यह बात स्पष्ट करते रहते हैं कि हिन्दी अनेक लोगों को कमा कर दे रही है। अगर ऐसा नहीं है तो हिन्दी फिल्मों, समाचार पत्रों और टीवी धारावाहिकों में हिन्दी के प्रसारण प्रकाशन में अंग्रेजी शब्द क्यों घुसेड़ते हैं? अपनी बात पूरी अंग्रेजी में ही क्यों नहीं करते? हिन्दी चैनल चला ही क्यों रहे हैं? अपने चैनल में अंग्रेजी ही चलायें तो क्या समस्या है?
      नहीं! वह ऐसा कतई नहीं करेंगे! इसका सीधा मतलब है कि अंग्रेजी हमेशा हर जगह कमाने वाली भाषा नहीं हो सकती। दूसरा यह भी कि अंग्रेजी पढ़ने वाले सभी साहब नहीं बन सकते! जो साहब बनते हैं उनके हिस्से में भी ऐसी गुलामी आती है जो पर्दे के पीछे वही अनुभव कर सकते हैं भले उनके सामने सलाम ठोकने वालों का जमघट खड़ा रहता हो। आप किसी माता पिता से पूछिये कि‘‘अपने बच्चे को अंग्रेजी क्यों पढ़े रहे हैं?’
          ‘जवाब मिलेगा कि ‘‘आजकल इसके बिना काम नहीं चलता!’’
         देश के सभी लोग अमेरिका, कनाडा या ब्रिटेन  नहीं जा सकते। जायें भी तो अंग्रेजी जानना आवश्यक नहीं जितनी कमाने की कला उनके होना चाहिए। एक पत्रिका में हमने पढ़ा था कि आज़ादी से पहले एक सिख फ्रांस गया। उसे अंग्रेजी क्या हिन्दी भी नहीं आती थी। इसके बावजूद अपने व्यवसायिक कौशल से वह वहां अच्छा खासा कमाने लगा। अब हो यह रहा है कि लोगबाग अपनी भाषा से परे होकर अंग्रेजी भाषा को आत्मसात करने के लिये इतनी मेहनत करते हैं कि किसी अन्य विषय का ज्ञान उनको नहीं रहता। बस उनको नौकरी चाहिए। सच बात कहें तो हमें लगता है कि हमारी शिक्षा पद्धति में अधिक शिक्षा प्राप्त करने का मतलब है निकम्मा हो जाना। बहुत कम लोग हैं जो अंग्रेजी में शिक्षा प्राप्त करने के बाद निजी व्यवसायों में सफलता प्राप्त कर पाते हैं। उनसे अधिक संख्या तो उन लोगों की है जो कम पढ़े हैं पर छोटे व्यापार कर अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रखते हैं। अंग्रेजी में शिक्षा प्राप्त करने के बाद रोजगारी की कोई गारंटी नहीं है पर इससे एक खतरा है कि हमारे यहां के अनेक लोग परंपरागत व्यवसायों को हेय समझ कर उसे करते नहीं या उनको शर्म आती है जिसकी चरम परिणति बेरोजगार की उपाधि है।
        अंग्रेजी पढ़कर कंपनियों के उत्पादों की बिक्री करने के लिये घर घर जाने को भले ही सेल्समेनी कहा जाता हो पर अंततः पर इसे फेरी लगाना ही कहा जाता है। यह काम कम शिक्षित लोग बड़े आराम से कर जाते हैं। अलबत्ता सेल्समेन के बड़े व्यापारी बनने के संभावना क्षीण रहती है जबकि फेरीवाले एक न एक दिन बड़े व्यापार की तरफ बढ़ ही जाता है। न भी बने तो उसका स्वतंत्र व्यवसाय तो रहता ही है।
         पता नहीं हिन्दी का महत्व अब भी हम बता पाये कि नहीं। सीधी बात यह है कि हिन्दी गरीबों की भाषा है और उनकी संख्या अधिक है। वह परिश्रमी है इसलिये उपभोक्ता भी वही है। उसकी जेब से पैसा निकालने के लिये हिन्दी भाषा होना जरूरी है वह भी उसके अनुकूल। अपने अंदर हिन्दी जैसी सोच होगी तो हिन्दी वाले से पैसा निकलवा सकते हैं। उसके साथ व्यवहार में अपने हित अधिक साध सकते हैं। देखा जाये तो इन्हीं गरीबों में अनेक अपने परिश्रम से अमीर भी बनेंगे तब उनकी गुलामी भी तभी अच्छी तरह संभव है जब हिन्दी आती होगी। वैसे तो गुलामी मिलेगी नहीं पर मिल भी गयी तो क्लर्क बनकर रह जाओगे। उसकी नज़रों में चढ़ने के लिये चाटुकारिता जरूरी होगी और वह तभी संभव है जब गरीबों की भाषा आती होगी। अंग्रेजी अब बेरोजगारों की भाषा बनती जा रही है। साहबनुमा गुलामी मिल भी गयी तो क्या? नहीं मिली तो बेरोजगारी। न घाट पर श्रम कर सके न घर के लिये अनाज जुटा सके। इतना लिख गये पर हमारे समझ में नहीं आया कि हिन्दी का महत्व कैसे बखान करें। अब यह तो नहीं लिख सकते कि देखो हिन्दी में इंटरनेट पर लिखकर कैसे मजे ले रहे हैं? यह ठीक है कि इसे गरीबों की भाषा कह रहे हैं। हम इस लिहाज से तो गरीब हैं कि हमें अंग्रेजी लिखना नहीं आती। पढ़ खूब जाते हैं। वैसे लिखना चाहें तो अंग्रेजी में सौ पचास लेखों के बाद अच्छी अंग्रेजी भी लिखने लगेंगे पर यकीनन उसमें मजा हमको नहीं आयेगा। वैसे हिन्दी दिवस पर प्रयास करेंगे कि हिन्दी का महत्व जरूर बतायें। यह लेख तो इसलिये लिखा क्योंकि हिन्दी दिवस के नाम से सर्च इंजिनों पर हमारे पाठ खूब पढ़े जा रहे हैं।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है।

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होली और क्रिकेट साथ साथ-हिन्दी व्यंग्य (holi aur cricket sath sath-hindi vyangya


होली, क्रिकेट और सट्टा
लेखक -दीपक ‘भारतदीप’  
इस बार होली का मजा वैसे भी किरकिरा होना ही है क्योंकि विश्वकप क्रिकेट प्रतियोगिता के मैचे खेल जा रहे हैं। होली पर देश का जनजीवन एकदम ठप्प हो जाता है। कुछ लोग रंग खेलने में लग जाते है तो कुछ उनसे बचने के लिये घरों में दुबक जाते हैं। दोपहर एक बजे तक सड़कें सन्नाटे से घिर जाती हैं जिसको होली के अवसर पर निकलने वाले झुंड ही अपने शोर से चीरकर निकल जाते हैं। जिन लोगों को साफ सुथरा जीवन पसंद है उनके लिये यह दिन उदासी का दिन हो जाता है। ऐसे अवसर पर हमारे देश के बहुत सारे लोग अपनो के बीच जुआ खेलते हैं तो आदतन जुआरियों के लिये तो यह दिन स्वर्णिम होता है। कहीं खुले में भी खेलते हैं तो उनके पास इस बात का पारंपरिक लाईसैंस होता है कि वह यह बताने के लिये कि वह तो रस्म निभा रहे हैं।
शराब, जुआ और बेकार की बकवास करने के लिये होली का दिन उपयुक्त मान लिया जाता है। वैसे दिवाली पर भी लोग जुआ की रस्म निभाते हैं। इससे एक बात तो प्रमाणित होती है कि हमारे पवित्र त्यौहारों में प्रमाद और व्यसनों की अनिवार्यता को जो लोग स्वीकार करते हैं वह निहायत अज्ञानी हैं और ऐसे लोगों की कमी नहीं है। मनोरंजन और खुशी के लिये बने दिनों में व्यसन में लिप्त होकर हुआ में लगने की प्रवृत्ति देश के लिये खतरनाक रही है। यही कारण है कि क्रिकेट तो क्रिकेट अब सुनने में आ रहा है कि टीवी चैनलों में प्रतियोगिताओं पर आधारित हास्य, संगीत तथा वाद विवाद कार्यक्रमों में जीत हार पर सट्टे लगता है और वहां विजेता और उपविजेता फिक्स होते हैं । हम यह न समझें कि सट्टा लगाने और लगवाने वाले कोई अदृश्य तत्व हैं बल्कि वह इस देश के ही लोग हैं। खासतौर से आर्थिक उदारीकरण के बाद बने नवधनाढ्य वर्ग के लोग इसमें शामिल हो रहे हैं। समस्या यह है कि उनके साथ मध्यम और निचली आयवर्ग के युवक भी शामिल होते हैं जो कि संकट का कारण बनती है।
एक बात तय है कि विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता के मैचों में सट्टा चल रहा है। अनेक जगह पुलिस ने अनेक लोगों को पकड़ा है। जब यह सट्टे वाले दो सौ करोड़ तक की रकम वाले संगीत कार्यक्रम को फिक्स कर सकते हैं तो वह अरबों की राशि वाले क्रिकेट मैच में अपना हाथ न दिखायें इस पर अब कौन यकीन कर सकता है। खासतौर से जब धनपति और घनपति-यानि काले धंधे वाले लोग-और उनके पालित मनपति-यानि लोगों के मन का हरण करने वाले प्रचार माध्यमों मे लोग-यह स्वयं बता रहे हैं कि पांच देशों के 21 खिलाड़ी तथा खेले गये सात मैचों की जांच विश्व कप क्रिकेट की अंतर्राष्ट्रीय संस्था आई सी आई कर रही है। इन मैचों के फिक्स होने का उसे संदेह है। भारतीय प्रचार माध्यमों ने इसमें विदेशी खिलाड़ियों होने की बात तो कही है पर भारतीय खिलाड़ियों की तरफ कोई संकेत न कर अपनी व्यवसायिक सीमाओं का भी प्रमाण दिया है। भारतीय खिलाड़ियों की गल्तियों पर खूब शोर हो रहा है पर वह उन्होंने अनजाने में की या अनजाने में हो गयीं इसका पता नहीं। न ही यह पता लग रहा है कि वह उनसे करवाई गयी। इस पर विशेषज्ञ खामोश हैं। बात सीधी है कि टीवी पर हर विषयों की तरह क्रिकेट के विशेषज्ञ भी प्रायोजित हैं। इनमें एक तो ऐसा कप्तान भी है जो फिक्सिंग की वजह से सजा भी पा चुका है मगर जोड़तोड़ कर अब टीवी चैनलों में अपना चेहरा विशेषज्ञ की तरह दिखाने लगा है। क्या मान लें कि भारतीय खिलाड़ी वाकई साफ सुथरे हैं? मान लेते हैं क्योंकि धनपतियों, घनपतियों और मनपतियों ने ऐसा वातावरण फिर बना दिया है जिससे लोग विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता में देशप्रेम से जुड़ रहे हैं। इसलिये कुछ कहने या सुनने में खतरे हैं।
उस दिन एक आदमी ने दूसरे से क्रिकेट प्रेमी से कहा-‘काहेका क्रिकेट! सब मैच फिक्स हैं।’
दूसरा उग्र हो गया और बोला-‘तू क्या अपने देश को खिलाड़ियों की पाकिस्तानियों से तुलना कर रहा है।’
वह चुप हो गया। पाकिस्तान का भी एक ऐसा खिलाड़ी विशेषज्ञ की भूमिका हमारे देश के टीवी चैनलों में निभा रहा है जिस पर उसके अपने देश के लोग ही फिक्सर होने का आरोप लगाते हैं। यह आईसीआई क्रिकेट में खेल रहे खिलाड़ियों के किसी सट्टेबाज से मिलने पर उससे शक की निगाह से देखती है पर यह विशेषज्ञ की भूमिका में बदनाम लोग घूम रहे हैं उसके बारे में उसकी राय का पता नहीं चलता। इससे एक बात लगती है कि विश्व क्रिकेट पर नियंत्रण करने वाली संस्था यह प्रयास नहीं कर रही कि खेल साफ सुथरा हो बल्कि वह चाहती है कि वह ऐसा दिखे। कम से कम भारतीय खिलाड़ी तो पाक साफ दिखें क्योंकि इसी देश के लोगों का पैसा इस खेल की प्राणवायु हैं जो कि मनोरंजन और खुशी भी जुआ और सट्टे के साथ मनाते हैं।
वैसे जिस तरह मैच चल रहे हैं अनेक लोगों को शक है कि कुछ गड़बड़ है। ऐसे में अगर मान लीजिये होली के दिन कोई भारतीय खिलाड़ियों के सट्टे में शामिल होने के बारे में कोई बात सत्य भी लिख दे तो लोगों को मजाक लगेगा। वैसे इतने सारे अखबार हैं। इंटरनेट पर भी बहुत कुछ लिखा जा रहा है। इसलिये संभव है उस दिन कोई मजाक करते हुए भी सत्य लिख सकता है। हां, होली पर कोई बात सच कहकर उसे मजाक का रूप दिया जा सकता है।
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आदर्श का सच-हिन्दी व्यंग्य कविताऐं (adarsh ka sach-hindi vyangya kavitaen)


आदर्श होने का दावा
बाहर से लगता है
मगर उसके अंदर छिपे ढेर सारे दाग हैं,
रावण और कंस जैसे
नाम रखकर कोई कातिल बने
यह जरूरी नहीं है
देवताओं का मुखौटा लगाकर
उजाड़े कई लोगों ने बहुत सारे बाग हैं।
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नाम में वाकई कुछ नहीं रखा है,
दैत्यों ने भी कलियुग का अमृत चखा है,
अब उनको मरने का डर नहीं लगता
देवताओं के मुखौटे पहने लोग अब उनके सखा है।
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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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भारतीय योग साधना का फिनोमिना-हिन्दी धार्मिक विचार आलेख (finomina of yog sadhna-hindu dharmik vichar lekh


इंटरनेट पर एक हिंद ब्लॉग में लिखा   गया वह एक दिलचस्प लेख था! मन में आया टिप्पणी करना चाहिए! लेख दोबारा पढ़ा तो लगा कि चलो एक अपना पाठ ही लिख लेते हैं क्योंकि भारतीय योग साधना से संबंधित विधियां और उनके महत्व को लेकर विश्व भर में चर्चा हो रही है पर उसके मूल तत्व किसी को नहीं दिखाई दे रहे हैं। एक तरह से अंधों का हाथी हो गया है भारतीय योग जो केवल देह के इर्दगिर्द ही घूम रहा है और मन और विचारों में उससे होने वाले परिवर्तनों को अनदेखा किया जा रहा है।
बात उन दिनों की है जब इस लेखक ने योग साधना प्रारंभ की थी। शायद दस वर्ष पूर्व की बात होगी तब बाबा रामदेव का नाम इतना प्रसिद्ध नहीं था। भारतीय योग संस्थान के शिविर में अनेक साधकों से भेंट होती। कुछ अन्यत्र शिविरों की भी जानकारी आती थी। ऐसे ही अन्यत्र चल रहे योग शिविर की जानकारी मिली कि एक शिक्षक ने अचानक ही साधना का परित्याग कर दिया था। एक साधक ने बताया कि उनके किसी संत गुरु ने उनको योग साधना करने से मना कर कहा था कि इससे भगवान के प्रति भक्ति भाव कम होता है। अपने गुरु के आदेश का उन्होंने पालन किया। बात आई गयी खत्म होना चाहिए थी, मगर हमें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि अनेक लोग योग साधना के बारे में अनेक संशय पाले हुए हैं। उससे भी ज्यादा यह बात कि लोग इससे अनेक प्रकार की सिद्धियां होने का दावा करते हैं। यह दोनों ही बुरी बात है और मन में असहजता का भाव उत्पन्न करती हैं जो कि ठीक योग के विरुद्ध है। योग साधना से केवल देह, मन और विचारों में सकारात्मक भाव पैदा होता है इससे अधिक कुछ नहीं। अगर कोई योग साधक श्रीमद्भागवत गीता पढ़ ले तो वह अध्यात्मिक रूप से आत्मनिर्भर हो जाता है और तब स्वर्ग में टिकट दिलाने, हर मर्ज की दवा देने, मनोरंजन करने, सौंदर्य बनाये रखने और काम शक्ति बढ़ाने के उपाय बताने के नाम पर उस पर शासन करने वाले बाज़ार तथा प्रचार का उस नियंत्रण उस पर से समाप्त हो जाता है। सभी योग साधक श्रीमद्भागवत गीता पढ़ें यह जरूरी नहीं है पर चरम पर आने के बाद उसका मन ऐसे तत्व ज्ञान की तरफ स्वतः ही बढ़ता है। ऐसे में वह इस संसार में बुद्धि और मन के आधार पर सामान्य मनुष्यों पर शासन करने वाली शक्तियों के घेरे से बाहर हो जाता है। कोई वाद या विचार उसके आगे निरर्थक विषय के अलावा कुछ नहीं रह जाता। वह संसार के सामान्य कर्म नहीं त्यागता वरन् वह एक स्वतंत्र और मौलिक कर्मयोगी मनुष्य बन जाता है। यही से शुरु होता है योग का विरोध जो शासन और बाज़ार के स्वामी अपने प्रचारकों से करवाते हैं।
उस लेख में बाबा रामदेव के फिनोमिना की बात कही गयी थी। लिखने वाले स्वयं ही कार्ल मार्क्स की किताब पूंजी से प्रभावित हैं। कार्ल मार्क्स का नाम और उनकी पूंजी किताब का भी एक समय फिनोमिना रहा है। कार्ल मार्क्स एक विदेशी लेखक था और उसके विचारों को भारत के संबंध में अप्रासंगिक माना जाता रहा है, मगर शैक्षणिक संस्थानों तथा साहित्यक क्षेत्रों में एक समय ऐसे लोगों का जमावड़ा था जो सोवियत संघ की कथित क्रांति के प्रभाव में वैसी ही क्रांति अपने देश में लाना चाहते थे और गरीब और मज़दूर का उद्धार करना ही उनका लक्ष्य था। उनकी बहसें कॉफी हाउसों में होती थी। यह बहसें या मुलाकतें एक फैशन थी जो किसी विचार या आंदोलन का निर्माण करने में सहायक नहीं थी। उन्होंने इस देश में बुद्धिजीवियों की ऐसी छबि का निर्माण किया जिसका अपना फिनोमना जनता में था। यही कारण था कि ऐसे लोग जो कार्ल मार्क्स के विचारों से प्रभावित नहीं थे और कहीं न कहीं उनके मन में अपने भारत की विचाराधारा का प्रभाव था वह भी उनकी शैली अपनाने लगे। इससे भारत में विचारधाराओं का फिनोमिना बढ़ा। नये नये देवता गढ़े गये मगर चूंकि सभी भारतीय अध्यात्म ज्ञान से परे थे इसलिये चिंतन केवल चिंता तक सिमट गया। ऐसे में भारतीय योग को देशी विचारधारा के लोग भी एक बेकार चीज़ मानने लगे थे। उनका मानना था कि योगियों की निष्क्रियता की वज़ह से ही विदेशी यहां आकर जम गये जबकि सच यह है कि यह केवल अधंविश्वासी तथा पाखंडी लोगों की सक्रियता से हुआ था। श्रीमद्भागवत गीता को तो केवल सन्यासियों के लिये प्रचारित किया गया।
ऐसे में यह देश बहुत बड़े वैचारिक भटकाव में फंस गया और नतीजा यह निकला कि नारे और वाद ही दर्शन बनकर रह गये मगर यह समाज बिना फिनोमिना के चलने के आदी नहीं है। एक आदर्श आदमी के फिनोमिना में चलने के आदी इस समाज को अगर बाबा रामदेव नाम का नायक मिल गया तो उस पर अध्यात्मिकवादी लोग खुश ही होते हैं। रहा बाज़ार और उसके प्रचारतंत्र का सवाल तो उसके दोनों ही हाथों में लड्डू रहने है और इसे रोकना मुश्किल काम हैं। मुश्किल यह है कि वैचारिक भटकाव के समय इस देश में ऐसे बुद्धिजीवियों की भरमार हो गयी जो चिंतन कम चिंताओं पर अधिक लिखते हैं। समस्याओं को उभारते हैं पर हल उनके पास नहीं है। सबसे बड़ी बात यह कि वह समाज को वैचारिक रूप से आत्मनिर्भर बनाकर समस्याओं का हल ढूंढने की बजाय सरकारी कानूनों से करने की शैली आज के बुद्धिजीवियों में है। पराश्रित बुद्धिजीवी जब योग साधना पर लिखते हैं तो उनका सामना करने वाले लोग भी वैसे ही हैं। आदमी जब दैहिक तनाव से मुक्त होगा वह मानसिक और वैचारिक रूप से स्वतंत्र हो जायेगा। ऐसे में इन बुद्धिजीवियों की सुनेगा कौन?
अमेरिका के एक पादरी ने घोषित किया कि भारतीय योग साधना ईसाई धर्म के विरुद्ध है। इस पर भारत में कुछ लोगों ने विरोध किया। विरोध करने वालों का कहना है कि यह ईसाई धर्म के विरुद्ध नहीं है। यह विरोध करने वाले नहीं जानते कि अनेक हिन्दू संत ही इसका विरोध करते हैं।
सच बात तो यह है कि पूरे विश्व में इतने सारे धर्म होना ही इसका प्रमाण है कि इसके नाम पर जनसमुदाय में भ्रम फैलाया जाता रहा है। किसी भी भारतीय ग्रंथ में धर्म का कोई नाम नहीं है और इसका आशय केवल आचरण से लिया जाता रहा है। मतलब पूरी दुनियां में दो ही प्रवृतियां रहती हैं एक धर्म की दूसरी अधर्म की! धर्म के नाम पर बांटने का काम तो पश्चिम से ही आया है। इसका कारण यह रहा है कि लोग अपने संकटों, बीमारियों तथा अन्य समस्याओं का हल दूसरे से कराना चाहते हैं। योग मनुष्य को शारीरिक, मानसिक तथा अध्यात्मिक रूप से आत्मनिर्भर बनाता है। जब व्यक्ति आत्मनिर्भर हो जायेगा और धर्म का मतलब समझ जायेगा तब वह किसी भी धर्म के किसी ठेकेदार के पास नहीं जायेगा। यह योग तो हर धर्म के लिये खतरा है जिसमें इंसान स्वयं ही इंसान होकर जीना सीख जाता है। ऐसे में सभी धर्म प्रेम, अहिंसा तथा दया भाव से जीना सिखाते हैं जैसी बातें सुनाकर बहसें और चर्चा करने वाले तथा शांति संदेश बेचने वालों का क्या होगा? यही कारण है कि योग फिनोमिना से बहुत लोग आतंकित हैं क्योंकि आधुनिक बाज़ार तथा उसके प्रचारकों का फिनोमिना कम होने का खतरा है। हमने फिनोमिना शब्द का अर्थ इधर उधर ढूंढा पर मिला नहीं। इसका आशय हिन्दी में प्रभाव या प्रभावी हो सकता है और इसीलिये फिनोमिना शब्द प्रयोग करके देखा है। जब आप योग साधना करते हैं तो ऐसे प्रयोगों की प्रेरणा स्वतः पैदा होती है। यह लेखक कोई ब्रह्मज्ञानी नहीं है पर योग फिनोमिना की वजह से ही यह लिखने को विवश हुआ है इसमें संदेह नहीं है।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior, madhyapradesh
http://dpkraj.blogspot.com

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बिसात-हिन्दी कविता (bisat-hindi poem


दुबली, पतली और सांवली
उस गरीब औरत की काम के समय
मौत होने पर
पति ने हत्या होने का शक जताया।
पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिये
अस्पताल भेजा
और एक घर से दूसरे और वहां से तीसरे
घर में काम करती हुई
उस गरीब औरत की मौत को
संदेहास्पद बताया।
गरीब और बीमार की मौत का पोस्टमार्टम
सुनकर अज़ीब लगता है,
पति लगाये तो कभी नहीं फबता है,
एक औरत
जिसने दस दिन पहले गर्भपात कराया हो,
रोटी की आस में घर से भूखी निकली होगी
कमजोर लाचार औरत की क्या बिसात
उमस तो अच्छे खासे इंसान को वैसे ही बनाती रोगी,
हड्डियों के कमजोर पिंजरे से
कब पंछी कैसे उड़ा
उसकी जिंदगी का रथ कैसे मौत की ओर मुड़ा,
इन प्रश्नों का जवाब ढूंढने की
जरूरत भला कहां रह जाती है,
सारी दुनियां गरीबी को अपराध
औरत उस पर सवार हो तो अभिशाप बताती है,
जाने पहचाने सवाल हैं,
अज़नबी नहीं जवाब हैं,
भूख और मज़बूरी
पहले अंदर से तोड़ते हैं,
तब ही मौत से लोग नाता जोड़ते हैं,
क्या करेंगे सभी
अगर पोस्टमार्टम में
कहीं भूख का अक्स नज़र आया।
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कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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भद्र पुरुष उवाच-हास्य व्यंग्य


वह भद्र पुरुष बुद्धिजीवी बहुत दिनों से बिना प्रचार के सांसें ले रहा था। कहने को लेखक था और संबंधों के दम पर अच्छा खासा छपता भी था पर अब न वह लिख पाता था और न ही उसकी दिलचस्पी थी। अलबत्ता अपने पुराने रिश्तों के सहारे कहीं उसने साहित्यक संस्थाओं के पद वगैरह जरूर हथिया कर रखे थे ताकि साहित्यकार की छबि बनी रहे। बहुत दिन से न तो अखबार में नाम आया और न ही टीवी चैनल वालों ने पूछा।
उस दिन एक भद्र महिला बुद्धिजीवी का फोन उसके पास आया। उसने रिसीवर उठाया ‘‘हलौ कौन बोल रहा है?’’
भद्र महिला ने कहा-‘‘मैं बोल रही हूं।’’
भद्र पुरुष ने कहा-‘‘कौन बोल रही हो। नाम तो बताओ।’’
भद्र महिला ने कहा-‘पहले अपनी खांसी बंद तो कर बुढऊ, तब तो बताऊं।’
भद्र पुरुष ने खांसते हुए कहा-‘‘पहले नाम तो बताओ! गोरी नाम है या काली या सांवली या दिलवाली! तुम नाम बताओगी तो खांसी अपने आप रुक जायेगी। नहीं तो मुझे यह भ्रम बना रहेगा कि पंद्रह दिन से मायके में गयी मेरी बीवी बोल रही है, उसे अधिक बात न करना पड़े इसलिये मेरा गला वैसे ही बिदकता है। मेरे समझाने पर भी नहीं समझता।’’
भद्र महिला-कमबख्त! तू अब भी नाम पूछता है। तेरा नाम तो डूबा जा रहा है। उसे बचाने के लिये मौका चाहिए कि नहीं!
भद्र पुरुष की खांसी रुक गयी और बोला-‘अच्छा! तू बोल रही है………तभी मैं कहूं कि ऐसा स्वर किसका है जिसकी वजह से खांसी नहीं रुक रही। मेरे कान तो कोयल के स्वर सुनने के आदी हैं न कि कौएनी के!’
भद्र महिला-‘लगता है सठिया गये हो। अब यह कौएनी कौन? क्या हिन्दी में कोई नया शब्द जोड़ा है। तुझे खुशफहमी है कि तू हिन्दी का बड़ा ठेकेदार है।’
भद्र पुरुष बोला-‘‘कौए के नारी रूप को क्या कहेंगे? मेरे हिन्दी ज्ञान से इसके लिये यही शब्द ठीक है। अब ज्यादा माथा न खपा। बता मामला क्या है?’’
भद्र महिला-‘‘इधर बहुत दिन से मेरा नाम न तो अखबार में आ रहा है न तुम्हारा। इसलिये कुछ ऐसा करो कि अपना नाम चलता रहे। इधर इंटरनेट पर अपना नाम कहीं चमक नहीं रहा।’’
भद्र पुरुष-‘अपने तो चेले चपाटे चमका रहे हैं। रोज कोई न कोई विवाद खड़ा करता रहता हूं। तू अपनी कह, करना क्या है? हां, एक बात याद रखना मैं अब केवल विवाद ही खड़ा करता रहूंगा क्योंकि सीधा सपाट लिखना पढ़ना अब हिन्दी वाले जानते ही नहीं।’
भद्र महिला-‘‘कल एक कार्यक्रम रखा है जिसमें हम दोनों हिन्दी भाषा के साहित्य पर बहस करेंगे। तुम्हारे एक चेले ने ही इसे रखवाया है और कह रहा था कि गुरुजी को आप मना लो। जब बहस होगी तो तय बात विवाद तो होगा। आजकल के प्रचार जगत को विवादों की बहुत जरूरत है।’’
भद्र पुरुष ने हामी भर दी। दोनों समय पर वहां पहुंचे। पहले भद्र पुरुष को बोलना था। उसने भद्र महिला की तरफ देखा और बोला-‘अरे, आजकल कुछ महिला लेखिकाऐं तो यह साबित करने में जुटी हैं कि
उनके लिखे में कौन ज्यादा छिनालपन दिखा सकता है।’
उसने कनखियों से भद्र महिला बुद्धिजीवी को देखा। जैसे उसने सुना ही नहीं। भद्र पुरुष इधर उधर देखने लगा। पास में आयोजक चेला आया तो भद्र बुद्धिजीवी पुरुष ने उसके कान में कहा-‘‘यह सुन नहीं रही शायद! नहीं तो अभी तक तो हमला कर चुकी होंती।’’
चेला तत्काल महिला बुद्धिजीवी के पास गया और बोला-‘आपने सुनने वाली मशीन नहीं लगायी क्या?’
महिला ने वह भी नहीं सुना पर जब कानों में हाथ डाला तो झेंप गयी और तत्काल मशीन लगा ली। तब भद्र पुरुष की जान में जान आयी।
उसने फिर अपने शब्द दोहराये।
भद्र महिला तत्काल उठकर आयी और उसके हाथ से माईक खींचककर बोली-‘‘यह आदमी सरासर मूर्ख है। इसके लिखे में तो ऐसा छिछोरापन दिखता है कि पढ़ते हुए भी हमें शर्म आती है। फिर आज यह समूची महिला लेखिकाओं पर आक्षेप करता है। इसके अंदर सदियों पुरानी पुरुष अहं की भावना है। जिस तरह पुरुष स्त्री को हमेशा ही लांछित करता है। उसी तरह यह भी……’’
एक श्रोता उठकर बोला-‘‘उन्होंने केवल कुछ महिला लेखिकाऐं कहा है तो आप भी कुछ पुरुष कहें। आप दोनों कोई पुरुष या महिला के इकलौते प्रतिनिधि नहीं हैं। हिन्दी भाषा में अच्छे लेखक और लेखिकायें भी हैं पर आप दोनों कैसे हैं यह पता नहीं।’
इस पर भद्र बुद्धिजीवी चिल्ला पड़ा-‘‘ओए, तू कहां से बीच में कूद पड़ा। हम दोनों प्रसिद्ध बुद्धिजीवी हैं इसलिये समूचे मानव जाति के प्रतिनिधि हैं। बैठ जा…….हमें बोलने दे।’’
भद्र महिला-‘बोली और क्या? इस बहस में केवल विद्वान ही हिस्सा ले सकते हैं।’
वह श्रोता बोला-‘पर आप लोग यह किस तरह के असाहित्यक शब्द उपयोग में ला रहे हैं।’
तब आयोजक चेला बोला-‘तुम कोई साहित्यकार हो?’
श्रोता बोला-‘नहीं!
आयोजक चेला-‘तुम्हें कोई पुरस्कार मिला है?’
श्रोता ने ना में सिर हिलाया तो वह चिल्लाया-‘बैठ जा! इतने महान विद्वानों की बहस के बीच में मत बोल।’
श्रोता बोला-‘पर मैं तो इनका नाम भी पहली बार सुन रहा हूं। वैसे मैं सब्जी खरीदने घर से बाज़ार जा रहा था। बरसात की वजह से यहां सभागार के बाहर पोर्च में खड़ा था। अंदर नज़र पड़ी तो देखा कि यहां कोई साहित्यक कार्यक्रम हो रहा है सो चला आया। मुझे नहीं पता था कि यहां कोई भाषाई अखाड़ा है जहां साहित्यक पहलवान आ रहे हैं।’
भद्र महिला चीख पड़ी-‘मारो इसे! यह तो इससे ज्यादा छिछोरेपन की बात कर रहा है।’
इससे पहले कि कोई उससे कहता वह भाग निकला।
उसके साथ ही एक दूसरा श्रोता भी निकल आया और थोड़ी दूर चलने पर उसे रोका बोला-‘यार, अच्छा हुआ मैं बच गया। वरना यह सब बातें मैं ही कहने वाला था पर मेरे पास बैठे एक आदमी ने यह कहकर रोका यहां तो पहले से ही तयशुदा कुश्ती होने वाली है।’
पहले श्रोता ने कहा-‘तुम वहां क्यों गये थे?’
दूसरा श्रोता बोला-‘जैसे तुम बरसात से बचने के लिये गये थे। सुना है आजकल इंटरनेट की वजह से इन पुराने हिन्दी दुकानदारों की स्थिति ठीक नहीं है इसलिये ऐसे स्वांग रचे जा रहे हैं ताकि प्रचार जगत में अहमियत बनी रहे। ऐसा वहीं बैठे एक आदमी ने बताया। अब देखना इस पर चहूं ओर चर्चा होगी। निंदा परनिंदा होगी! कुछ जगह बहसें होंगी। दोनों का डूबता हुआ नाम चमकेगा।’
पहले श्रोता को यकीन नहीं हुआ पर अगले दिन उसने टीवी और समाचार पत्रों में यह सब सुना और पढ़ा। तब मन ही मन बुदबुदाया-छिछोरापन, छिनालपन और तयशुदा जंग।
सारे विवाद में प्रचार जगत में दो दिन तक दोनों भद्र पुरुष और महिला सक्रिय रहे। तीन दिन बाद भद्र महिला ने भद्र पुरुष को फोन किया-‘धन्यवाद, आपने तो कल कमाल कर दिया। एक ही शब्द से ही धोती फाड़कर रुमाल कर दिया। बुढ़ापे में भी रौनक कम नहीं हुई।’
भद्र पुरुष ने कहा-‘इसलिये ही तो ज्यादा लिखना कम कर दिया है। क्या जरूरत है, जब एक शब्द से ही विवाद खड़ा कर नाम कमाया जा सकता है!’
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नोट-यह हास्य व्यंग्य किसी घटना या व्यक्ति पर आधारित नहीं है। अगर इसमें लिखा किसी की कारितस्तानी से मेल खा जाये तो लेखक जिम्मेदार नहीं है। इसे केवल पाठकों के मनोरंजन के लिये लिखा गया है।

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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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लौकी का जूस और मूली-हास्य व्यंग्य


यही है बाज़ार और उससे प्रायोजित प्रचार माध्यमों को खेल कि लौकी भी अब विषैले पदार्थों में शामिल हो सकती है।
हमें याद है जब सात वर्ष पूर्व जब उच्च रक्तचाप की शिकायत होने पर आधुनिक चिकित्सकों के शरण लेनी पड़ी थी।
एक मित्र होम्योपैथी चिकित्सक ने रक्तचाप की नाप ली और कहा कि ‘तुम्हें उच्च रक्तचाप है।’
हमने कहा-‘ज्यादा झाड़ो नहीं! हम अपनी बीमारी स्वयं ही बता देते हैं। हमें शराब की बहुत खराब आदत है। फिर कल मंगलवार होने के कारण व्रत था इसलिये शाम को शादी में खाना देर से खाया। उससे पहले शराब का पैग लिया पर एक घूंट के बाद ही हमारी हालत बिगड़ गयी। बाद में खाना गया तो चैन आया पर रात को नींद आराम से आयी और अब चाय के बाद हालत बिगड़ी है। ऐसा लगता है कि गैस की समस्या है।’
चिकित्सक ने कहा‘-तुम अपनी बीमारी जानते हो तो मेरे पास क्यों आये।’
हमने कहा-‘कोई वायु विकार दूर करने वाली गोली बता दो।’
चिकित्सक ने कहा-‘ मित्र हो इसलिये अभी उच्च रक्तचाप की गोली देता हूं। वह भी आधी लेना और हां शराब और तंबाकू से पीछा छुड़ाओ। साथ ही यह चेकअप की कराओ।’
हमने गोली ली और घर आये। बीमारी की वजह स्वयं को पता थी। शराब से पीछा छुड़ाया। तंबाकू भी एकदम छोड़ दी-हालांकि वह अब भी है और योग साधना के कारण उसके दुष्परिणाम से बचे रहते हैं। उस समय इससे परहेज करने से शरीर के व्यसनों की वजह से सक्रिय अंग ढीले पड़ गये।
उसके बाद शुरु हुआ लोगों से चर्चा का सिलसिला। मधुमेह की समस्या थी पर अधिक नहीं। अब स्थिति यह थी कि हमें लगने लगा कि जीवन ऐसे ही संकट के साथ चलेगा। लोगों की सलाहें ली। एक ने कहा खाने के साथ सलाद लिया करो। हमने मूली खाना प्रारंभ किया। नियमित रूप से लेते और शाम को स्थिति बिगड़ती। मूली हम खाते थे खाना पचाने के लिये पर वह संकट की वजह बन रही है इसका पता चला तब जब किसी ने बताया कि मूली हर किसी को नहीं पचती। हमने दो दिन मूली छोड़ी तो समस्या से निजात मिली।
लोगों ने करेले और लौकी का जूस पीने की सलाह दी। हमने उसे अनसुना किया और अपना इलाज स्वयं ही शुरु किया। हमें पता था कि घरेलू समस्याओं की वजह से चार महीने तक साइकिल चलाना छोड़ने से शरीर में संकट पैदा हुआ है। साइकिल चलाना शुरु की। शराब एकदम कम कर दी पर तंबाकू छूटने नहीं छूटी।
सबकुछ सामान्य था पर मन में यह बात आ गयी कि हम उच्च रक्तचाप के शिकार है। उसी समय अखबार में पढ़ा कि देश के साठ प्रतिशत लोगों को पता ही नहीं कि वह मनोरोग का शिकार है और हमें लगने लगा कि हम उनमें से एक ही हैं। जिस चिकित्सक ने उच्च रक्तचाप के बाद तमाम तरह के चेकअप लिख कर दिये थे उसी ने ही एक अपने से बड़े होम्यापैथिक चिकित्सक के पास भेजा। उसने ही तमाम तरह के चेकअप किये और पर्चे पर लिखा हाईपर ऐसिडिटी। बात हमारी समझ में आ गयी क्योंकि वह हमारे पूर्वानुमान से मेल खाती थी। सब कुछ सामान्य होने के बावजूद मानसिक स्थिति खराब हो चली थी। इसी बीच एक योग शिविर कालोनी में लगा।
हम उन दिनों सुबह घूमने जाते थे। एक सज्जन ने हमसे कहा-‘अरे आप उस योग शिविर में आईये। इस तरह सैर करने से कोई अधिक लाभ नहीं होता।’
हमने शिविर में जाना किया। शिविर में जो शिक्षक आते थे। वह भले आदमी थे। पांचवें दिन योग साधना कर हम घर लौटे तो हालत बिगड़ गयी। तब हमने अपने ही फ्रिज में रखी बर्फी खाकर अपने पर नियंत्रण किया क्योंकि हमें पता था कि वायुविकार के हमले का प्रतिकार करने का यही एक उपाय है।
अगले दिन हमने योग शिक्षक को बताया तो उन्होंने अच्छी बात कहीं। वह बोले-‘एक बात बताईये कि अगर हमारे घर में अनेक किरायेदार हों और हम सबसे मकान खाली करने को कहें तो क्या वह प्रसन्न होंगे? कोई चुपचाप बद्दुआऐं देता जायेगा। कोई लड़ेगा, कोई केस भी कर सकता है। यह आपके अंदर वायु विकार है जो कर आपसे लड़ रहा था क्योंकि योग साधना उसको निकालने आयी थी।’
हमें उसके जवाब ने हतप्रभ कर दिया। सात वर्ष हो गये योग साधना करते हुए।  सच तो यह है कि ज़िन्दगी कि दूसरी पारी है जो योगढ़ना खेल रही है, न कि हम स्वयं!अब किसी चीज पर भरोसा नहीं। न लौकी न करेला। पपीता खाना पड़ता है क्योंकि तंबाकू की वजह से कब्जी का मुकाबला करने के वही काम आता है। तंबाकू न खायें तो खाना तरस जाये कि यह हमें खाता क्यों नहीं और पानी देखता रहे कि यह पीता क्यों नहीं!
जब तनाव के क्षण आते हैं तो हम तंबाकू का त्याग कर देते हैं क्योंकि हमें पता है कि वह मानसिक संतुलन बिगाड़ता है। साइकिल चलाकर दूर तक चले जाते हैं। घर लौटते हैं तो लगता ही नहीं कि साइकिल चलाकर आये हैं। तब सोचते हैं कि काश! यह योग साधना बचपन में किसी ने सिखाई होती।
इसी योग साधना को लेकर भी तमाम तरह के दुष्प्रचार होते रहते हैं जिसके बारे में हमारा दावा है कि खुश रहने के लिये इससे बेहतर कोई उपाय नहीं है। योग साधना से अमरत्व नहीं मिलता पर इंसानों की तरह जिंदा रहने की ताकत मिलती है। जहां तक पेट पालने का सवाल है तो पशु भी पल जाते हैं और इंसान ही केवल इस भ्रम में रहता है कि वह स्वयं को पाल रहा है।
टीवी चैनलों पर लौकी का जूस पीकर मरने वाले एक दंपत्ति की मौत होने के साथ ही एक अधेड़ के बीमार पड़ने की खबर जोरशोर से चल रही थी। इधर इंटरनेट पर पता चला कि जिन दंपत्ति की मौत हुई वह डिब्बा बंद था यानि किसी कंपनी के द्वारा पैक किया गया पर उसका नाम नहीं पता लगा। चैनल शायद इस बात को छिपा रहे हैं ताकि लोग स्वयं लोकी का रस बनाने से बचें और कंपनियों का खरीदें।
अनेक बार नकली दूध की खबरें आती हैं तब लगता है कि सारे देश में वही दूध बिक रहा है। तब मन खराब होता है। एक ब्लाग लेखक ने तो आरोप लगाया था कि कंपनियों के लिये दूध बेचने का मार्ग बनाने के लिये निजी असंगठित ंक्षेत्र को बदनाम करने के लिये ऐसा प्रचार किया जा रहा है। लौकी के बाद करेले पर निशाना लगेगा। योग साधना पर तो लगता ही रहता है। ऐसा क्यों?
कभी कभी सुबह योग साधना के पहले या बाद में पार्क जाना होता है। कभी कभी शाम को भी जाते हैं। वहां योग साधना, व्यायाम तथा सैर करने वालों की संख्या देखकर लगता है कि लोग अब अपने स्वास्थ्य को लेकर सजग हैं। हालांकि सुप्तावस्था में रहने वाले लोगों की संख्या कहंी अधिक है पर सजगता का बढ़ता दायरा दवा कंपनियों के लिये चिंता का विषय हो सकता है। अनेक जगह चिकित्सा शिविर लगते हैं जहां चिकित्सक अपने यहां चेकअप की सलाह लिखकर देते हैं।
प्रसंगवश कहते हैं कि देश में भुखमरी अधिक है पर आंकड़े बताते हैं कि खाकर मरने वालों की संख्या अधिक है भूख से मरने वालों की कम! सीधा मतलब है कि खाने पीने में सावधानी से बीमारी से बचा जा सकता है। कम से कम खाद्य पदार्थ अपने घर पर ही निर्माण किये जायें उतना ही अच्छा! प्रतिदिन योग साधना की जाये तो कहना ही क्या? बाज़ार और उसके प्रचार माध्यमों पर एकदम निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं। हमने मूली से तौबा की पर इसका मतलब यह नहीं कि वह सभी के लिये विषैली है। वैसे अगर कोई प्रायोजित लेख लिखने के लिये कहे तो हम उस पर बहुत कुछ नकारात्मक लिख सकते हैं।
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सेवा के सौदागऱ-हिन्दी व्यंग्य कविता


सेवा के सौदागरों को अपने घर भी भरने हैं,
फुरसत मिले तो लोगों को भरमाने के लिये
नये नारे भी गढ़ने हैं।
मुफ्त में उनसे भले की उम्मीद कर
अपने आप को क्यों धोखा देते हो
परदे पर सपने देखकर
कब तक कितना चैन पायेंगे
वादों से कब तक अपने को बहलायेंगे
जबकि अपनी सच्चाईयों से जंग के हरजाने
खुद अपनी जेब से ही भरने हैं।
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अंधेरों को दूर करने का वादा कर
उन्होंने सिंहासन हथिया लिया
फिर दूसरों के घर की रौशनी लूटकर
अपना महल चमका लिया।
दर्द उनकी बेवफाई का नहीं
हैरान हैं इस बात पर
रोज वादों पर धोखा खाते लोगों ने
बार बार उन पर यकीन कर लिया।
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इंटरनेट की माया-हास्य कविता (Internet ki maya-hasya kavita)


अंतर्जाल पर रोज मिलते थे
प्यार भरे शब्द एक दूसरे के लिये लिखते थे,
बहुत दिन बाद
आशिक और माशुका को
आपस में मिलने की बात दिमाग में आई,
एक तारीख चुनकर अपनी मीट होटल में सजाई।
आशिक पहले पहुंचकर टेबल पर बैठ गया
माशुका थोड़ी देर बाद आई।
दोनों ने देखा एक दूसरे को
तब एक उदासी उनके चेहरे पर नज़र आई।
फिर भी खाना पीना टेबल पर सज गया
तो उसे खाने की इच्छा उनके मन में आई।
आशिक ने बिल की कीमत बड़े बेमन से चुकाई।

बातचीत का दौर शुरु हुआ तो
माशुका एकदम जोर से आशिक पर चिल्लाई,
‘सच कहते हैं इंटरनेट पर
धोखे हजार है,
जो खाये वह हो बरबाद
जो दे उसकी तो बहार है
तुम तो छत्तीस के लगते हो
भले ही इंटरनेट में अपने फोटो में
पच्चीस के बांके जवान की तरह फबते हो,
शर्म की बात है
तुमने अपनी उम्र मुझे केवल तीस बताई।’

सुनकर उठ खड़ा हुआ आशिक
और बोला
‘तीस साल का ही हूं
वह तो धूप में जवानी थोड़ा पक गयी है,
तुम्हारे लिये टंकित करते हुए श्रृंगार रस से भरी कवितायें
यह आंखें कुछ थक गयी हैं,
कंप्यूटर पर बैठा बैठा
मोटा और भद्दा हो गया हूं,
पर इसका मतलब यह नहीं कि
जवानी का दिल बिछाकर सो गया हूं,
मेरी बात छोड़ो,
बात का रुख अपनी तरफ मोड़ो,
तुम छह साल से अपनी उम्र
अट्ठारह ही बता रही हो,
फोटो दिखाकर यूं ही सता रही हो,
जब तुम्हें मीट में आते देखा तो सोच रहा था
पता नहीं यह कहीं मेरी माशुका की
माताश्री तो नहीं आयी है।
मुझ पर लगा रही है हो छह साल
कम उम्र बताने का आरोप जबकि
तुमने तो कम से कम
सात साल सात महीने कम बतायी है।
जहां तक मेरा अनुमान है
तुम्हारा नाम भी दूसरा होगा
मुझ से तो तुमने छद्म मोहब्बत रचाई है।
होटल में खा पीकर चली जाओगी,
फिर दूसरी जगह दाव आजमाओगी,
मेरी यह गलती थी जो
छह साल तक तुम्हें अपने दिल की रानी माना,
अपनी तरफ देखो मुझे न दो ताना,
तुम्हें क्या दोष दूं
इंटरनेट की माया
दुनियां की तरह अज़ीब है
इसलिये मैंने यह छठी ठोकर खाई।’

इस तरह आशिक माशुक की पहली मीट ने
दोनों के इश्क की कब्र बनाई।
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खतरा है जिनसे जमाने को, पहरा उनके घर सजा है-हिन्दी हास्य व्यंग्य कवितायें


इंसान कितना भी काला हो चेहरा
पर उस पर मेअकप की चमक हो,
चरित्र पर कितनी भी कालिख हो
पर उसके साथ दौलत की महक हो,
वह शौहरत के पहाड़ पर चढ़ जायेगा।
बाजार में बिकता हो बुत की तरह जो इंसान
लाचार हो अपनी आजाद सोच से भले
पर वह सिकंदर कहलायेगा।
खतरा है जिनसे जमाने को
उनके घर सुरक्षा के पहरे लगे हैं,
लोगों के दिन का चैन
और रात की नींद हराम हो जाती जिनके नाम से
उनके घर के दरवाजे पर पहरेदार, चौबीस घंटे सजे हैं।
कसूरवारों को सजा देने की मांग कौन करेगा
लोग बेकसूर ही सजा होने से डरने लगे हैं।
———–
बाजार में जो महंगे भाव बिक जायेगा,
वही जमाने में नायक कहलायेगा।
जब तक खुल न जाये राज
कसूरवार कोई नहीं कहलाता,
छिपायेगा जो अपनी गल्तियां
वही सूरमा कहलायेगा।
———-

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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काली करतूतें सफेद कागज में ढंकते रहे-हिन्दी शायरी


सिर उठाकर आसमान में देखा तो लगा
जैसे हम उसे ढो रहे हैं,
जमीन पर गड़ायी आंख तो लगा कि
हम उसे अपने पांव तले रौंद रहे हैं।
ठोकर खाकर गिरे जब जमीन पर मुंह के बल
न आसमान गिरा
न जमीन कांपी
तब हुआ अहसास कि
हम कोई फरिश्ते नहीं
बस एक आम इंसान है
जो इस दुनियां को बस भोग रहे हैं।
———
अपने से ताकतवर देखा तो
सलाम ठोक दिया,
कमजोर मिला राह पर
उसे पांव तले रौंद दिया।
वह अपनी कारगुजारियों पर इतराते रहे
काली करतूतें
सफेद कागज में ढंकते रहे
पर ढूंढ रहे थे अपने खड़े रहने के लिये जमीन
जब समय ने उनके कारनामों को खोद दिया।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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हिन्दी के कवि और शायर बिना पढ़े ही गीता पर लिखते हैं-हिन्दी आलेख (Hindi poet writes on without reading the Gita – Hindi article)


              अक्सर अनेक कवितायें, शायरियों गीत, और गद्य रचनायें हमारे सामने आती हैं जिसमें भारतीय धर्म ग्रंथों के साथ ही अन्य धर्मों की पवित्र पुस्तकें भूलकर इंसान से प्रेम करने का संदेश शामिल होता है। जिन कवियों और शायरों को देशभक्ति, एकता और धार्मिक सद्भावना सुसज्जित कर अपनी रचनाओं में दिखानी होती है वह अक्सर भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों के साथ ही अन्य धार्मिक ग्रंथों पर भी बरसने लगते हैं। इस पर कोई आपत्ति नहीं करता क्योंकि अपने देश के लोगों का यह रवैया है कि चलो हमारे साथ दूसरे धर्म की पुस्तक को भी भुलाने की बात तो कही। हमारा कान पकड़ तो दूसरे का भी तो नहीं छोड़ा।
              अगर कोई कवि या शायर अकेली यह बात कहे कि श्री रामायण या श्री रामचरित मानस पढ़ना छोड़ दो, श्रीगीता और वेद पुराण और श्रीगीता भूल जाओ तो उस पर हाहाकार मच जायेगा। लोग उस पर छद्म धर्मनिरपेक्ष होने का आरोप लगा देंगे। अगर उसने किसी अन्य धर्म का नाम लिया तो उस पर सांप्रदायिक होने का आरोप लग जायेगा। अगर भारतीय अध्यात्म ग्रंथों के साथ अन्य धर्म की पुस्तकों को त्यागने की बात कोई शायर, कवि या निबंधकार कहता है तो कोई उस पर ध्यान नहीं देता। चलो हमें काना कहा तो दूसरे को भी तो एक आंख वाला कहा।
                अगर कोई अन्य भारतीय धर्मग्रंथ की बात कहे तो हम भी मुंह  फेर सकते हैं पर जब मामला श्रीगीता का हो तब बात हमें कुछ जमती नहीं। हमें याद है कि बचपन में हमने जब हिंदी का प्रारंम्भिक ज्ञान प्राप्त किया था तब महाभारत ग्रंथ पढ़ते समय हमने श्रीगीता को पढ़ा था तब समझ में नहीं आया, पर कहते हैं कि बचपन में कोई बात भले ही समझ में न आये पर उसका अर्थ कहीं न कहीं आदमी के जेहन में रहता है। यही हाल हमारे साथ श्रीगीता का हुआ। अन्य किसी धर्मग्रंथ से जब भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथ की तुलना किसी फिल्मी या साहित्यक गीत, कविता, शायरी या आलेख में होती तो हम सहजता से लेते पर श्रीगीता का नाम आते ही असहज होते हैं। जब हिंदी का पूर्णता से ज्ञान हुआ तब पता लगा कि यह दुनियां की इकलौती ऐसी पुस्तक है जिसमें ज्ञान और विज्ञान है। समय के साथ हम भी चलते रहे पर श्रीगीता का ज्ञान कहीं न कहीं हमारे मस्तिष्क में रहा। इस पर अनेक लेख समाचार पत्रों में भेजे पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। तब हम सोचते थे कि हो सकता है कि हमारे लिखे में कमी हो।

               इधर जब से अंतर्जाल पर लिखने का सौभाग्य मिला तो हमने सोचा कि चलो यहां अपनी अध्यात्मिक भूख भी मिटा लो। ऐसा करते हुए हमारा ध्यान श्रीगीता की तरफ जाना स्वाभाविक था। सच बात तो यह है कि अंतर्जाल पर लिखने से पहले हम इतना नहीं लिखते थे पर कहते हैं कि लिखते लिखते लव हो जाये। जब भी अवसर मिलता है श्रीगीता पर अवश्य लिखते हैं और यही लिखते लिखते हमें ऐसा लग रहा है कि या तो हम ही कुछ दिमाग से विचलित हैं या फिर शायर और कवि लोग ही सतही रूप से लिखते रहे हैं। एक तरह से वह कार्ल माक्र्स और अंग्रेजों के चेलों की संगत में नारे और वाद ढोने आदी हो गये हैं।
                नारों और वाद पर चलने के आदी हो चुके इस समाज से यह आशा ही नहीं करना चाहिये कि वह कवियों और शायरों की चालाकियों को समझकर उनकी योग्यता पर उंगली उठाये। हम तो दूसरी बात कहते हैं कि जिस विषय पर आप जानते नहीं उस पर नहीं लिखें। हमने केवल भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथ ही पढ़े हैं इसलिये उन पर लिखते हैं-वह भी सकारात्मक पक्ष में। न तो हमने विदेशी लेखकों को पढ़ा है न ही गैर भारतीय धर्म ग्रंथों को देखा है इसलिये उन पर नहीं लिखते। उनकी आलोचना भी नहीं करते क्योंकि उर्दू शायरों की यह प्रवृत्ति हमें बिल्कुल नहीं भाती कि बिना जाने ही किसी विषय पर भी कुछ लिखने लगो।
एक सवाल हमारे दिमाग में आता है कि अगर कोई अन्य धर्म का भारतीय व्यक्ति भारतीय धर्म ग्रंथ पर कुछ प्रतिकूल बात कहता है तो हम उस पर चढ़ दौड़ते हैं चाहे भले ही उसने अपने धर्म ग्रंथ पर भी प्रतिकूल लिखा या कहा हो पर अगर कोई भारतीय धर्म का व्यक्ति ऐसा करे तो उसे हम सामान्य कहकर नजरअंदाज करते हैं-क्या यह हमारी बौद्धिका संकीर्णता का प्रमाण नहीं है।
              दरअसल हुआ यह है कि उर्दू शायरों की लच्छेदार शायरियों से प्रभावित होकर जब देश के लोग वाह वाह करने लगे होंगे तो तो हिंदी कवि भी इसी राह पर चल पड़े होंगे। इसमें भी एक पैंच हैं। भले ही उर्दू और हिंदी समान भाषायें लगती हैं पर दोनों का भाव अलग है। एक बार धर्म को लेकर मामला बढ़ गया था तब एक विद्वान ने कहा कि अंग्रेजी में रिलीजन शब्द का भाव सीमित है पर हिंदी में धर्म शब्द का भाव बहुत व्यापक है। यही हाल उर्दू का है। उर्दू का प्यार शब्द दैहिक संबंधों तक ही सीमित है जबकि हिंदी का प्रेम शब्द इतना व्यापक है कि उसे इंसान के अलावा सर्वशक्तिमान और अन्य जीवों से भी जोड़ जाता है और उसे तभी समझा जा सकता है जब हमारे अपने आध्यात्मिक ज्ञान के प्रति आस्था हो। मुख्य बात संकल्प की है और हिंदी के प्रेम शब्द का उच्चारण करते ही हमारे अंदर समस्त जीवों के प्रति दया, करुणा और सहृदयता का भाव आता है।

                बात कहां से शुरु हुई और कहां पहुंच गयी। उर्दू शायरों में केवल श्रोताओं और लेखकों में सतही भाव पैदा करने की ललक होती है। इसके विपरीत हिंदी कवियों में इसके साथ ही अध्यात्मिक ज्ञान जाग्रत करने का भाव भी पैदा होता है। मगर उर्दू शायरों की सफलता ने हिंदी कवियों को भी पथभ्रष्ट कर दिया है। यही कारण है कि कबीर, रहीम, तुलसी और मीरा के बाद फिर कोई कवि रत्न पैदा ही नहीं हुआ। यह शिकायत नहीं है और न ही किसी कवि विशेष के विरुद्ध प्रचार है बल्कि अपनी बात कहने का अंतर्जाल पर कहने का जो अवसर मिला है उसका लाभ उठाने का एक प्रयास भर है। हमें तो हर पाठक और लेखक प्रिय है। जो लिखने और पढ़ने में परिश्रम करते हैं। परिश्रम करने वालों का प्रेम करते हुए उनका सम्मान करना चाहिये- श्रीगीता को पढ़ने और समझने के बाद हम इसी निष्कर्ष पर पहुंचे हैं। शेष फिर कभी

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1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

बरसात के साथ धार्मिक चालाकी-हिंदी व्यंग्य (hindi vyangya)


अध्यात्म नितांत एक निजी विषय है पर जब उसकी चौराहे पर चर्चा होने लगे तो समझ लो कि कहीं न कहीं उसकी आड़ में कोई अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ा रहा है तो कोई अपना व्यवसाय कर रहा है। जब कहीं सार्वजनिक रूप से प्रार्थनायें सभायें होती हैं तब यह लगता है कि लोग दिखावा अधिक कर रहे हैं। आज के संचार युग में तो यह कहना कठिन है कि धर्म का बाजार लग रहा है या बाजार ही धर्म बना रहा है। ऐसा लगता है कि पहले लोगों के पास मनोरंजन के अधिक साधन नहीं थे इसलिये धार्मिक पात्रों की व्याख्या करना ही धर्म प्रचार मान लिया गया। इस आड़ में तमाम तरह के कर्मकांड और अंधविश्वास सृजित किये गये ताकि उनकी आड़ में धरती पर उत्पन्न अनावश्यक भौतिक साधान बिक सकें जिसके माध्यम से आदमी की जेब से पैसा निकाला जाये।
अब तो प्रचार युग आ गया है और लोग अध्यात्मिक आधार पर इसलिये अपना अस्तित्व बनाये रखना चाहते है ताकि सामाजिक, आर्थिक तथा वैचारिक संगठनों में अपनी छबि बनाकर पुजते रहें। वह आधुनिक बाजार में आधुनिक अध्यात्मिक व्यापारी बनकर चलना चाहते हैं पर उनकी दुकान सामान उनका बरसो पुराना ही है जिसमें केवल धार्मिक प्रतीक और कर्मकांड ही हैं। जब कहीं हिंसा हो तो वहां लोग शांति के लिये सामूहिक प्रार्थनायें करने के लिये एकत्रित होते हैं। उनको प्रचार माध्यमों में बहुत दिखाया जाता है। जब यह कहना कठिन हो जाता है कि बाजार को ऐसी खबरें चाहिये इसलिये यह सब हो रहा है या सभी विचारधारा के ज्ञानियों को प्रचार चाहिये इसलिये वह इस तरह की सामूहिक प्रार्थनायें करते हैं।
हमारा अध्यात्मिक दर्शन तो साफ कहता है कि पूजा, भक्ति या साधना तो एकांत में ही परिणाम देने वाली होती है।’ इसलिये जब इस तरह के सामूहिक कार्यक्रम होते हैं तो वह दिखावा लगते हैं। आजकल अनेक स्थानों पर बरसात बुलाने के लिये प्रार्थना सभायें हो रही हैं। हर तरह की धार्मिक विचाराधारा के स्वयंभू ज्ञानी लोगों से बरसात के लिये सामूहिक प्रार्थनाऐं आयोजित कर रहे हैं। प्रचार भी उनको खूब मिल रहा है। हमें इस पर आपत्ति नहीं है पर अपने जैसे लोगों से अपनी बात करने का एक अलग ही मजा है। कुछ लोग है जो इसमें हो रही चालाकियों को देखते हैं।
हम जरा इस बरसात के मौसम पर विचार करें तो लगेगा कि उसका आना तय है। देश के कुछ इलाकों में उसका प्रवेश हो चुका है और अन्य तरफ मानसून बढ़ रहा है।

उस दिन मई की एक शाम बाजार में तेज बरसात से बचने के लिये हम एक मंदिर में बैठ गये। उस समय तेज अंाधी के साथ बरसात हो रही थी। हालांकि गर्मी कम नहीं थी और बरसात से राहत मिली पर एक शंका मन में थी कि यह मानसून के लिये संकट का कारण बन सकता है। प्रकृत्ति का अपना खेल है और उस पर किसी का नियंत्रण नहीं है। मनुष्य यह चाहता है कि प्रकृति उसके अनुरूप चले पर पर उसके साथ खिलवाड़ भी करता है। मई में उस दिन हुई बरसात के अगले कुछ दिनों में ही अखबारों में हमने पढ़ा कि बरसात देर से आयेगी। विशेषज्ञों ने बरसात कम होने की भविष्यवाणी की है-औसत से सात प्रतिशत कम यानि 93 प्रतिशत होने का अनुमान है।

ऐसा नहीं है कि बरसात हमेशा समय पर आती हो-कभी विलंब से तो कभी जल्दी भी आती है-पिछली बार कीर्तिमान भंजक वर्षा हुई थी। बरसात जब तक नहीं आती तब आदमी व्यग्र रहता है। ऐसे में उसके जज्बातों से खेलना बहुत सहज होता है। उसका ध्यान गर्मी पर है तो उसे भुनाओ। कहने के लिये तो कह रहे हैं कि हम सर्वशक्तिमान को बरसात भेजने के लिये पुकार रहे हैं। पर उसका समय पर चर्चा नहीं करते। जब बरसात आने के संकेत हो चुके हैं तब ऐसी प्रार्थनाओं के समाचार खूब आ रहे हैं। वैसे तो फरवरी के आसपास भी ऐसे समाचार आ गये थे कि इस बार बरसात देर से आयेगी और कम होगी। तब ऐसी प्रार्थना सभायें क्यों नहीं की गयी। उस समय नहीं तो मई में ही कर लेते।
सर्वशक्तिमान के सभी रूपों के चेले चालाक हैं। उस समय करते तो कौन लोग उनको याद रखते। जब एक दो दिन या सप्ताह में बरसात आने वाली तब ऐसी प्रार्थना सभायें इसलिये कर रहे हैं ताकि जब हों तो लोग माने कि उनके ‘ज्ञानियों’ को कितनी सिद्धि प्राप्त है। बहरहाल हम देख रहे हैं कि बाजार के प्रबंधक और सर्वशक्तिमान के यह आधुनिक दूत एक जैसे चालाक हैं। टीवी चैनल और समाचार पत्र पत्रिकाऐं तो व्यवसायिक हैं पर सर्वशक्तिमान के सभी रूपों के यह ज्ञानी चेले भी क्या व्यवसायी है? उनकी इस तरह की चालाकियों से तो यही लगता है?
प्रसंगवश याद आया एक पाठक ने अपनी टिप्पणी में पूछा था कि ‘आपके लेखों से यह पता ही नहीं लगता कि आप किस धर्म या भगवान की बात कर रहे हैं?
दरअसल इसका कारण यह है कि हम सभी तरह की विचारधाराओं पर अपने विचार रखते हैं। किसी एक का तयशुदा नाम लेने पर लोग कहते हैं कि तुम उनके नाम पर लिखो तो जाने। जहां तक हमारी जानकारी सर्वशक्तिमान शब्द किसी भी खास विचारधारा से नहीं जुड़ा यही स्थिति उसके ठेकेदार शब्द ं की भी है। इसलिये कोई यह नहीं कह सकता कि हमारी बात करते हो उनकी करके देखो तो जानो।
अगर सभी विरोध करने लगें तो हम भी कह सकते हैं कि तुम सर्वशक्तिमान और ठेकेदार शब्द से अपने को क्यों जोड़ते हो? दरअसल हमने देखा कि यह समाजों के ठेकेदारो का काम ही चालाकी पर चल रहा है और लोगों को जज्बात से भड़काने और बहलाने के काम में यह सब सक्षम होते हैं। हम इसलिये अपनी बात व्यंजना विधा में कहते हैं। हां, बरसात की पहली बूंदों का इंतजार हमें भी है। अब यह गर्मी सहना कठिन हो गया है। कभी कभी आकाश में बिना बरसते बादल देखते हैं तो भी गुस्सा आता है कि यह हमारी धरती की गर्मी नष्ट कर रहे हैं जो कि बरसात को खींचती है।
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‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’

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कवि और संपादक-दीपक भारतदीप

बरसात के लिये प्रार्थना-हिंदी व्यंग्य (hindi vyangya)


अध्यात्म नितांत एक निजी विषय है पर जब उसकी चौराहे पर चर्चा होने लगे तो समझ लो कि कहीं न कहीं उसकी आड़ में कोई अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ा रहा है तो कोई अपना व्यवसाय कर रहा है। जब कहीं सार्वजनिक रूप से प्रार्थनायें सभायें होती हैं तब यह लगता है कि लोग दिखावा अधिक कर रहे हैं। आज के संचार युग में तो यह कहना कठिन है कि धर्म का बाजार लग रहा है या बाजार ही धर्म बना रहा है। ऐसा लगता है कि पहले लोगों के पास मनोरंजन के अधिक साधन नहीं थे इसलिये धार्मिक पात्रों की व्याख्या करना ही धर्म प्रचार मान लिया गया। इस आड़ में तमाम तरह के कर्मकांड और अंधविश्वास सृजित किये गये ताकि उनकी आड़ में धरती पर उत्पन्न अनावश्यक भौतिक साधान बिक सकें जिसके माध्यम से आदमी की जेब से पैसा निकाला जाये।
अब तो प्रचार युग आ गया है और लोग अध्यात्मिक आधार पर इसलिये अपना अस्तित्व बनाये रखना चाहते है ताकि सामाजिक, आर्थिक तथा वैचारिक संगठनों में अपनी छबि बनाकर पुजते रहें। वह आधुनिक बाजार में आधुनिक अध्यात्मिक व्यापारी बनकर चलना चाहते हैं पर उनकी दुकान सामान उनका बरसो पुराना ही है जिसमें केवल धार्मिक प्रतीक और कर्मकांड ही हैं। जब कहीं हिंसा हो तो वहां लोग शांति के लिये सामूहिक प्रार्थनायें करने के लिये एकत्रित होते हैं। उनको प्रचार माध्यमों में बहुत दिखाया जाता है। जब यह कहना कठिन हो जाता है कि बाजार को ऐसी खबरें चाहिये इसलिये यह सब हो रहा है या सभी विचारधारा के ज्ञानियों को प्रचार चाहिये इसलिये वह इस तरह की सामूहिक प्रार्थनायें करते हैं।
हमारा अध्यात्मिक दर्शन तो साफ कहता है कि पूजा, भक्ति या साधना तो एकांत में ही परिणाम देने वाली होती है।’ इसलिये जब इस तरह के सामूहिक कार्यक्रम होते हैं तो वह दिखावा लगते हैं। आजकल अनेक स्थानों पर बरसात बुलाने के लिये प्रार्थना सभायें हो रही हैं। हर तरह की धार्मिक विचाराधारा के स्वयंभू ज्ञानी लोगों से बरसात के लिये सामूहिक प्रार्थनाऐं आयोजित कर रहे हैं। प्रचार भी उनको खूब मिल रहा है। हमें इस पर आपत्ति नहीं है पर अपने जैसे लोगों से अपनी बात करने का एक अलग ही मजा है। कुछ लोग है जो इसमें हो रही चालाकियों को देखते हैं।
हम जरा इस बरसात के मौसम पर विचार करें तो लगेगा कि उसका आना तय है। देश के कुछ इलाकों में उसका प्रवेश हो चुका है और अन्य तरफ मानसून बढ़ रहा है।

उस दिन मई की एक शाम बाजार में तेज बरसात से बचने के लिये हम एक मंदिर में बैठ गये। उस समय तेज अंाधी के साथ बरसात हो रही थी। हालांकि गर्मी कम नहीं थी और बरसात से राहत मिली पर एक शंका मन में थी कि यह मानसून के लिये संकट का कारण बन सकता है। प्रकृत्ति का अपना खेल है और उस पर किसी का नियंत्रण नहीं है। मनुष्य यह चाहता है कि प्रकृति उसके अनुरूप चले पर पर उसके साथ खिलवाड़ भी करता है। मई में उस दिन हुई बरसात के अगले कुछ दिनों में ही अखबारों में हमने पढ़ा कि बरसात देर से आयेगी। विशेषज्ञों ने बरसात कम होने की भविष्यवाणी की है-औसत से सात प्रतिशत कम यानि 93 प्रतिशत होने का अनुमान है।

ऐसा नहीं है कि बरसात हमेशा समय पर आती हो-कभी विलंब से तो कभी जल्दी भी आती है-पिछली बार कीर्तिमान भंजक वर्षा हुई थी। बरसात जब तक नहीं आती तब आदमी व्यग्र रहता है। ऐसे में उसके जज्बातों से खेलना बहुत सहज होता है। उसका ध्यान गर्मी पर है तो उसे भुनाओ। कहने के लिये तो कह रहे हैं कि हम सर्वशक्तिमान को बरसात भेजने के लिये पुकार रहे हैं। पर उसका समय पर चर्चा नहीं करते। जब बरसात आने के संकेत हो चुके हैं तब ऐसी प्रार्थनाओं के समाचार खूब आ रहे हैं। वैसे तो फरवरी के आसपास भी ऐसे समाचार आ गये थे कि इस बार बरसात देर से आयेगी और कम होगी। तब ऐसी प्रार्थना सभायें क्यों नहीं की गयी। उस समय नहीं तो मई में ही कर लेते।
सर्वशक्तिमान के सभी रूपों के चेले चालाक हैं। उस समय करते तो कौन लोग उनको याद रखते। जब एक दो दिन या सप्ताह में बरसात आने वाली तब ऐसी प्रार्थना सभायें इसलिये कर रहे हैं ताकि जब हों तो लोग माने कि उनके ‘ज्ञानियों’ को कितनी सिद्धि प्राप्त है। बहरहाल हम देख रहे हैं कि बाजार के प्रबंधक और सर्वशक्तिमान के यह आधुनिक दूत एक जैसे चालाक हैं। टीवी चैनल और समाचार पत्र पत्रिकाऐं तो व्यवसायिक हैं पर सर्वशक्तिमान के सभी रूपों के यह ज्ञानी चेले भी क्या व्यवसायी है? उनकी इस तरह की चालाकियों से तो यही लगता है?
प्रसंगवश याद आया एक पाठक ने अपनी टिप्पणी में पूछा था कि ‘आपके लेखों से यह पता ही नहीं लगता कि आप किस धर्म या भगवान की बात कर रहे हैं?
दरअसल इसका कारण यह है कि हम सभी तरह की विचारधाराओं पर अपने विचार रखते हैं। किसी एक का तयशुदा नाम लेने पर लोग कहते हैं कि तुम उनके नाम पर लिखो तो जाने। जहां तक हमारी जानकारी सर्वशक्तिमान शब्द किसी भी खास विचारधारा से नहीं जुड़ा यही स्थिति उसके ठेकेदार शब्द ं की भी है। इसलिये कोई यह नहीं कह सकता कि हमारी बात करते हो उनकी करके देखो तो जानो।
अगर सभी विरोध करने लगें तो हम भी कह सकते हैं कि तुम सर्वशक्तिमान और ठेकेदार शब्द से अपने को क्यों जोड़ते हो? दरअसल हमने देखा कि यह समाजों के ठेकेदारो का काम ही चालाकी पर चल रहा है और लोगों को जज्बात से भड़काने और बहलाने के काम में यह सब सक्षम होते हैं। हम इसलिये अपनी बात व्यंजना विधा में कहते हैं। हां, बरसात की पहली बूंदों का इंतजार हमें भी है। अब यह गर्मी सहना कठिन हो गया है। कभी कभी आकाश में बिना बरसते बादल देखते हैं तो भी गुस्सा आता है कि यह हमारी धरती की गर्मी नष्ट कर रहे हैं जो कि बरसात को खींचती है।
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‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’

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कवि और संपादक-दीपक भारतदीप

इस ब्लाग/पत्रिका ने पार की पाठक संख्या पचास हजार-संपादकीय


पाठ पठन/पाठक संख्या पचास हजार पार करने वाला ईपत्रिका इस लेखक का तीसरा ब्लाग/पत्रिका है। इसने हाल ही मैं गूगल के पैज रैंक में चौथा स्थान प्राप्त किया-जो कि इसकी बहुत बड़ी उपलब्धि है। इसे लेखक के पचास हजार की पाठ पठन/पाठक संख्या पार करने वाले अब तीन ब्लाग हैं-
1. हिंदी पत्रिका
2.शब्द पत्रिका
3.ईपत्रिका
गूगल के पैज रैंक में चार अंक प्राप्त करने वाले अब चार ब्लाग/पत्रिका इस प्रकार हैं-
1. शब्दलेख सारथी
2. हिंदी पत्रिका
3. शब्दलेख पत्रिका
4. ईपत्रिका
आंकड़ों का खेल हमेशा ही दिलचस्प होता है। शब्द पत्रिका ने भी पचास हजार पाठ पठन/पाठक संख्या पार की है पर उसे गूगल की पैज रैंक में तीन अंक प्राप्त हैं जबकि शब्दलेख पत्रिका ने गूगल पैज रैंक में दस में से चार अंक प्राप्त किये हैं पर उसकी संख्या अभी पचास हजार से दूर है। गूगल का पैज रैंक किसी भी ब्लाग की लोकप्रियता को प्रमाणित करने वाला अकेला प्रमाणिक टूल है। हालांकि अन्य कुछ वेबसाईट भी ब्लाग की लोकप्रियता का आंकलन करती हैं पर अनेक ब्लाग लेखक मानते हैं कि उनके साफ्टवेयर अधिक प्रमाणिक नहीं है।
जब ब्लाग लेखन की यात्रा प्रारंभ की थी तब यह लेखक अकेला था पर अंतर्जाल पर बहुत सारे मित्र मिले और जो पहले ही मित्र थे वह अब पाठक भी हो गये हैं। वर्डप्रेस की पाठक संख्या पर वह हमेशा नजर लगाये रहते हैं और यह बताते हैं कि तुम्हारा वह ब्लाग आज पचास हजार पार सकता है। आज तो अच्छा संपादकीय लिखना। मना करने पर कहते हैं कि-नहीं, आजकल वह समय नहीं है कि चुपचाप बैठकर लिखते जाओ। लोगों को यह बताना जरूरी है कि हम भी है नंबर वन की दौड़ में।’
तब बरबस हंसी आती है। सच तो हम जानते हैं कि हिंदी में लेखन कभी आसान नहीं रहा। अपने काम की व्यसततओं से समय निकालकर लिखने में मजा आता है पर समस्या उसके प्रकाशन की आती है।
प्रसंगवश आज एक लेख पर नजर पड़ गयी। उस लेख में बताया गया कि अनेक लेखकों द्वारा अपना पैसा लगाकर पुस्तकें प्रकाशित कराने की प्रवृत्ति से अनेक प्रकाशक जमकर पैसा कमा रहे है।
उस लेख में कहा गया कि आज हिंदी के लेखक की वह छबि नहीं है कि वह रद्दी दिखता हो या गरीब हो। उस पाठ में लिखा गया था कि अनेक अप्रवासी भारतीय भारत आते हैं और अपने पैसे से किताब छपवाकर आकर्षक कार्यक्रम में उसका विमोचन करते हुए चले जाते हैं। उस पाठ के लेखक का मानना था कि ऐसी किताबों की विषय सामग्री कूड़ा हो यह जरूरी नहीं है। आखिर धनी मानी लोगों को भी लिखने का अधिकार है। उसने कुछ पुराने लेखकों के नाम भी गिनाये जो अमीर परिवारों से आये। इसलिये यह जरूरी नहीं कि हिंदी लेखक गरीब हो या जो गरीब है वही अच्छा लिख सकता है।
उस लेखक की बात ठीक थी पर कुछ सवाल हमारे सामने थे। जिन धनी मानी परिवारों में पैदा पुराने हिंदी लेखकों की उसने बात की उन्होंने अपने पैसे से किताब छपवाकर विमोचन नहीं किया। दूसरा यह है कि जो धनीमानी लोग किताबें छपवाते हैं उनमें होता क्या है? उनके जीवन के अनुभव जिनमें झूठ के अलावा कुछ भी नहीं होता। उनमें वह यह साबित करने का प्रयास किया जाता है वह वह धनी, उच्च पदस्थ और प्रसिद्ध होने के साथ संवेदनशील लेखक भी हैं। फिर सवाल यह नहीं है कि अमीर आदमी को लिखने या छपने का अधिकार नहीं हैं। हां, उनमें भी बहुत अच्छे लेखक हो सकते हैं। पर अनवरत चलने वाली बहस का निष्कर्ष यह है कि अपना पैसा खर्च किये बिना कोई लेखक प्रसिद्ध नहीं हो सकता। इसे हम यह भी कह सकते हैं कोई भी आदमी अपने लिखने के दम पर प्रसिद्ध नहीं हो सकता।
दूसरा यह है कि जो धनीमानी हैं उनका समय अधिकतर अपने व्यवसायों पर ही रहता है। समाज के उतार चढ़ाव में वह बहते हैं पर वह किस तरह आते हैं और इसके लिये कौनसी प्रवृत्तियां जिम्मेदार हैं यह देखने के पास उनके पास इतना समय नहीं होता जितना अल्प धनिक के पास रहता है। अल्प धनिक के पास ही वह समय होता है कि वह जमीन पर चलते हुए अनेक यथार्थ घटनाओं को एक स्वपनदृष्टा की तरह प्रस्तुत करता है। मुख्य बात यह है कि हिंदी में लिखने की बात आज वही सोच सकता है जिसके पास अपने रोजगार का कोई साधन हो। इससे रोटी पाने की कोई आशा नहीं कर सकता। हिंदी भाषी समाज की यह प्रवृत्ति है कि वह शुद्ध लेखक को पाल नहीं सकता।
ऐसे में यह अंतर्जाल ही एक आशा की किरण है। उसमें भी शर्त यही है कि इंटरनेट कनेक्शन व्यय करने की शक्ति होना चाहिए। इस लेखक ने लिखना तब शुरु किया था जब वह कमाने की सोच भी नहीं सकता था। जीवन संघर्ष के दौरान लिखते हुए कभी यह नहीं लगा कि उसक सहारे धन या प्रतिष्ठा मिलेगी। बस, एक आनंद आता है। इंटरनेट कनेक्शन लेते समय यह विचार भी था कि जब अवसर मिलेगा अपनी रचनायें प्रतिष्ठत समाचार पत्रों में भेज दिया जायेगा। कुछ समय बाद अध्ययन किया तो इस बात का आभास हो गया कि हर क्षेत्र में शिखर पर बैठे लोग कंप्यूटर पर काम करने से इसलिये कतराते हैं क्योंकि उनको लगता है कि यह काम टाईपिस्ट या लिपिक’ का है। इंटरनेट से भेजी गयी रचनाओं का भी वही हाल रहा जो डाक से भेजी गयी रचनाओं का था। ऐसे में स्वतंत्र लेखन के लिये ब्लाग मिला तो लिखना शुरु किया। इस लेखक की कवितायें, व्यंग्य, आलेख और कहानियां अच्छी है या बुरी इस स्वयं कभी नहीं सोचता। लिखते समय इस बात का ध्यान रहता है कि उसका सामाजिक सरोकार और संबंध जरूर होना चाहिये। अपनी कहानी लिखना आसान है पर वह तभी प्रभावी होती है जब उसकी प्रस्तुति ऐसी होना चाहिये कि वह सभी को अपनी लगे।
इधर इंटरनेट पर अच्छे लेखक भी आ गये हैं। उनका पढ़कर आनंद आता है और उनसे भी लिखने की प्रेरणा मिलती है। सच बात तो यह है कि कई ऐसे स्तरीय पाठ भी सामने आये जो व्यवसायिक पत्र पत्रिकाओं में नहीं दिखते। साहित्य, फिल्म, व्यापार, कला तथा प्रचार माध्यमों में एक परंपरागत ढांचा है जो परिवार, जाति, भाषा और धर्म में ही अपने रचनाकार तथा पात्र ढूंढता है। नयी व्यवस्था के आने की आशंका से यथास्थितिवादी खौफ खाते हैं और इसलिये वह ऐसी योजना बनाते हैं कि वह बदलाव आये ही नहीं और आये तो उसमें उसके मोहरे ही फिट हों। इसका पता तो पहले से ही था पर अंतर्जाल लिखते हुए इसका आभास अच्छी तरह होता जा रहा है।
एक ब्लाग मित्र-उसकी और इस लेखक की मित्रता ब्लाग लिखने के पहले से ही है- से उसी दिन बात हो रही थी। उसकी इंटरनेट पर अनेक ब्लाग लेखकों से चर्चा भी होती है। उसने कहा-’‘वह लोग तुम्हें पंसद करें या नहीं पर जानते सभी हैं। यह तय बात है। वह लोग कहते हैं कि ‘उसके कुछ ब्लाग बहुत अच्छे हैं और कुछ ऐसे ही हैं। मतलब यह कि तुम्हारी पहचान है और इसे कोई मिटा नहीं सकता। सबसे बड़ी बात यह है कि मुझे भी तुम्हारा वह ब्लाग पसंद हैं जो सभी की पसंद है।’
इशारा समझ में आया। मगर यह यात्रा बहुत लंबी है। कोई जल्दी नहीं है। आशा से अधिक जिज्ञासा है कि देखें यथास्थितिवादी किस तरह बदलाव लाने के लिये जूझ रहे लेखकों के सामने प्रतिरोध कर रहे हैं। जाति, भाषा, धर्म, क्षेत्र और परिवार के दायरों से मुक्त रहने का संदेश वाले छद्म लोग वास्तव में यथास्थितिवादी है और बदलाव लाने वाले तो केवल अपने कर्म में लिप्त रहते हैं। इसमें एक दृष्टा की तरह शामिल होकर देखने का अलग ही मजा है। खुद मैदान में उतरने का अर्थ है अपने लिये अधिक से अधिक विरोधी बनाना। ऐसे अवसरों पर लिखने का केवल एक ही मतलब होता है कि जिन लोगों की हिंदी ब्लाग का विश्लेषण करने वाले ब्लाग लेखकों के लिये अगर कुछ हो तो वह समझ लें। पूर्व में ऐसे ही आलेखों का प्रभाव क्या हुआ है यह इस लेखक ने देखा है। ब्लाग लेखक मित्रों से जो पाया है उनको ही कुछ लौटाया जा सकता है तो वह इसी तरह ताकि वह अगर इससे कोई लाभ उठा सकें तो ठीक, नहीं भी तो पाठकों में यह प्रेरणा तो आ ही सकती है कि अंतर्जाल पर हिंदी में लिखना उतना बुरा नहीं है जितना लगता है।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

चाणक्य नीति-कुसंस्कार बुढ़ापे तक पीछा नहीं छोड़ते


वयसः परिणामेऽपि यः खलः खलः एव सः।
सुपक्वमपि माधुर्य नोपयातीद्रवारुणाम्।।

हिंदी में भावार्थ-आयु में बड़ा हो जाने पर भी दुष्ट की दुष्टता का भाव नहीं जाता। जैसे किसी फल का स्वाद स्वाभाविक रूप कड़वा होता है और उसे अधिक देर तक इसलिये पकाया जाये कि उसमें मीठे का स्वाद आ जाये तो वह संभव नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य में संस्कार और आस्थायें स्थापित होने के लिये दस या बारह वर्ष तक की आयु मानी जाती है। कुछ संस्कार तो अगर पांच वर्ष तक पड़ जायें तो ठीक नहीं तो उनका फिर आना मुश्किल होता है। कहने का तात्पर्य है छोटी आयु में ही बच्चों में संस्कार डालने का प्रयास करना चाहिये। कुछ माता पिता यह सोचकर बच्चों की परवाह नहीं करते कि ‘अभी तो छोटा है बड़ा होकर सीख जायेगा‘। इतना ही नहीं वह अपने बच्चों के सामने ही लड़ाई झ्रगड़ा और अपने रिश्तेदारों की निंदा करते हैं-सोचते हैं कि यह छोटा है भला क्या समझेगा? और समझ भी ले तो क्या? माता पिता के व्यवहार, आचरण और कार्य से बच्चे बहुत कुछ सीखते हैं। कई चीजें उनको बताई नहीं जाती बस देखकर ही सीख जाते हैं।

संस्कार और आस्थायें स्थापित करने की आयु में अगर माता पिता ने उचित प्रयास नहीं किया या लापरवाही दिखाई तो बाद में उसका परिणाम उनको भोगना पड़ता है। आजकल समाज में लोगों का अपराध, व्यसन और समाज के प्रति उपेक्षा का जो भाव दिख रहा है वह उनके ही पूर्वजों की लापरवाही का परिणाम है। एक अन्य बात यह है कि माता पिता अपने बच्चे को बस यही सिखाते हैं कि अधिक से अधिक कमाओ, प्रतिष्ठत पद प्राप्त करो और जिंदगी मं केवल अपने स्वार्थ ही पूरे करो। बाद में जब बच्चे उनकी ही उपेक्षा करने लगते हैं तब अपने बुढ़ापे को कोसते हैं। जो माता पिता अपने बच्चों की उपेक्षा की शिकायत करते हैं अगर उनसे कहा जाये कि ‘आपने ही यह संस्कार दिये होंगे।’ तब वह जवाब नहीं दे पायेंगे। आप अपने बच्चे के सामने अपनी पत्नी को प्रसन्न करने के लिये अपने माता पिता, भाई बहिन तथा अन्य रिश्तेदारों की निंदा कर बड़े होने पर उससे किसी प्रकार की उदारता की आशा नहीं कर सकते।
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‘‘मैं कुर्सी हूं, किसी की सगी नहीं’’-हास्य व्यंग्य कविता


कुर्सी पर चाहे लिपिक लिखा हो
या महाप्रबंधक
बस वह मिलना चाहिए।
अपने घर में जिस पर स्वयं बैठ सकें
वह लकड़ी की हो या लोहे की
कौन देखने आता है
कुर्सी का रुतबा तो बाहर ही
नजर आता है
न मिले तो बस नाम के आगे ही
तख्ती की तरह लग जाये
हम न बैठ सके तो कोई बात नहीं
नाम ही कुर्सी पर बैठा नजर आना चाहिए।।
…………………………..
कुर्सी बिन सून
जिसके पास नहीं है
लगता है उसका हो जैसे सफेद खून
………………..
चेले ने कहा गुरु से
‘बहुत दिन हो गये सेवा के नाम पर
आपकी चाकरी करते हुए
नहीं घुसा दिमाग में ब्रह्मज्ञान
दुनियांदारी खूब करवा ली
अब आप जाओ वानप्रस्थ
मत करो अब मुझे अधिक त्रस्त
अपनी कुर्सी अब मुझे दे दो
मेरे बैठने से परहेज है तो
अपनी पादुकायें वहां रखने के लिये दे दो
मेरे नाम के आगे गुरु की उपाधि
अब चिपकना चाहिए
इससे आपका भी बढ़ेगा मान।

………………………
कुर्सी किसी की सगी नहीं-लघु व्यंग्य
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वह बड़ी कंपनी में क्लर्क था। उसे काम के सिलसिले में कार्यालय में अधर उधर जाना पड़ता था तब उसके सहकर्मियों से मिलने जो उनके मित्र मिलने आते या वही एक दूसरे से वार्तालाप करते तब उसकी कुर्सी वहां पहुंच जाती थी। वह वापस लौटता तो बाहर का कोई आदमी अगर बैठा तो उससे कुछ नहीं कह पाता इसलिये कुर्सी मिलने का इंतजार करना पड़ता और कोई अगर सहयोगी बैठा होता तो उससे उसका झगड़ा करता था। रोज रोज की चिकचिक से तंग आकर आखिर उसने अपनी कुर्सी को रस्सी से बांधने का बांध दिया ताकि वह उसकी अनुपस्थिति में भी वहीं उसका इंतजार करती रहे। थोड़ी देर बार वह कहीं गया और लौटा तो अपनी कुर्सी की तरफ जाते हुए उसका पांव उस रस्सी में फंस गया और गिर पड़ा। वहां मौजूद लोग उस पर हंसने लगे। उसने गुस्से में कुर्सी को लात मारते हुए गाली दी।
तब कुर्सी ने कहा-‘मैं कुर्सी किसी की सगी नहीं हूं। मुझे बांधकर रखने का यही नतीजा है। मेरे को कोई बांध नहीं सकता और जो बांधकर रखना चाहेगा वह ऐसे ही गिरेगा। मैं चाहती हूं लोग बदल बदल कर मेरे पास आते रहें । मैं कोई इंसान नहीं हूं कि किसी आदमी की तरह कुर्सी से चिपक कर रह सकूं।
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कवि और संपादक-दीपक भारतदीप

इन्टरनेट पर लिखते हुए कोई संकोच न करें-आलेख


नये लेखक लेखिकाओं को लिखते हुए इस बात की झिझक हो सकती है कि उनके लिखे पर कोई हंसे नहीं। वह समाचार पत्र पत्रिकाओं में तमाम प्रसिद्ध लेखकों की रचनायें पढ़कर यह सोचते होंगे कि वह उन जैसा नहीं लिख सकते। कई युवक युवतियां तो ऐसे हैं जो अपनी रचनायें लिखकर अपने पास ही रख लेते हैं कि कहीं कोई उस पर पढ़कर हंसे नहीं। संभव है ऐसे ही कुछ नये लेखकों के पास इंटरनेट की सुविधा के साथ ब्लाग लिखने की तकनीकी जानकारी भी हो पर वह इसलिये नहंी लिखते हों कि ‘कहीं कोई पढ़कर मजाक न उड़ाये।’

ऐसे नये लेखक अपने आप को भाग्यशाली समझें कि उनके पास अंतर्जाल पर ब्लाग लिखने के अवसर मौजूद हैं जो पुराने लेखकों के पास नहीं थे। हां, उन्हें लिखने को लेकर अपने अं्रदर कोई संकोच नहीं करना चाहिये। वह जिन पत्र पत्रिकाओं के प्रसिद्ध लेखकों की रचनाओं को लेकर अपने अंदर कुंठा पाल लेते हैं उनके बारे में अधिक भ्रम उन्हें नहीं रखना चाहिये। वैसे तो हर आदमी जन्मजात लेखक होता है पर अभ्यास के बाद वह समाज में लेखक का दर्जा प्राप्त करता है। अगर आप लिखना प्रारंभ करें तो धीरे धीरे आपको लगने लगेगा कि जिन बड़े लेखकों को पढ़कर आप कुंठा पाल रहे थे उनसे सार्थक तो आप लिख रहे है। सच बात तो यह है कि स्वतंत्रता के बाद देश में हर क्षेत्र में ठेकेदारी का प्रथा का प्रचलन शुरु हो गया जिसमें बाप जो काम करता है बेटा उसके लिये उतराधिकारी माना जाता है। यही हाल हिंदी लेखन का भी रहा है।

अनेक लोग ऐसे भी हैं जो हिंदी में बेहतर नाटक,कहानी या उपन्यास न लिखने की शिकायत करते हैं। दरअसल यह वही लोग हैं जो ठेकेदारी के चलते प्रसिद्धि प्राप्त कर गये हैं पर उनको हिंदी के सामान्य लेखक के मनोभाव का ज्ञान नहीं रहा। हिंदी में बहुत अच्छा लिखने वालों की कमी नहीं है पर उनको अवसर देने वाले तमाम तरह के बंधन लगा कर उन्हें अपनी मौलिकता छोड़ने को बाध्य करे देते हैं। यही कारण है कि पिछले पचास वर्षों से जातिवाद, क्षेत्रवाद,और भाषावाद के कारण हिंदी में बहुत कम साहित्य लिखा गया है। जिन लोगों ने इन वादों और नारों की पूंछ पकड़कर प्रसिद्धि की वैतरणी पार की है उनका सच आप तभी समझ पायेंगे जब अंतर्जाल पर स्वतंत्र लेखन करेंगे। अधिकतर लेखक या तो प्रतिबद्ध रहे या बंधूआ। दोनों ही परिस्थितियों में मौलिक भाव का दायरा संकुचित हो जाता है।

अगर आप कविता लिखना चाहते हैं तो लिखिये। अब वह कविता इस तरह भी हो तो चलेगी।
होटल में जाने को मचलने लगा हमारा दिल
खाया पीया जमकर, बैठ गया वह जब आया बिल
या
फिल्मी गाने सुनते ऐसे हुए, चेहरे परं चांद जैसा लगता तिल
जब भी आता है कोई ऐसा चेहरा, गाने लगता अपना दिल

आप यह मत सोचिये कि कोई हंसेगा। हो सकता है कुछ लोग हंसें पर यह सबसे आसान काम है। कोई भी किसी पर हंस सकता है। आप तो यह मानकर चलिये कि आपने अपने मन की बात लिख ली यही बहुत है।
अगर आपको गद्य लिखने का विचार आया तो यह भी लिख सकते हैं।
आज मैं सुबह नहाया, फिर नाश्ता किया और उसके बाद बाहर फिल्म लिखने गया और रात को घर आया और खाना खाया और सो गया। अब कल सोचूंगा कि क्या करना है?

ऐसे ही आप लिखना प्रारंभ कर दीजिये। अभ्यास के साथ आप के अंदर का लेखक परिपक्व होता चला जायेगा। वैसे इसके साथ ही दूसरों का लिखा पढ़ें जरूर! दूसरे का पढ़ने से न केवल विषय के चयन का तरीका मिलता है बल्कि उससे अपनी एक शैली स्वतः निर्मित होती जाती है। हम जैसे पढ़ते हैं वैसे ही लिखने का मन करता है और फिर अपनी एक नयी शैली अपने आप हमारी साथी बन जाती है।
आप लोग पत्र पत्रिकाओं में बड़ी कहानियां,व्यंग्य और निबंध पढ़ते हैं और वैसा ही लिखना चाहते हैं तो इस पर अधिक विचार मत करिये। अंतर्जाल पर संक्षिप्तता का बहुत महत्व है। सबसे बड़ी बात यह है कि यहां मौलिकता और स्वतंत्रता के साथ लिखने की जो सुविधा है उसका उपयोग करना जरूरी है। इस लेखक से अनेक लोग अपनी टिप्पणियों में सवाल करते हैं कि आप अपनी रचनायें पत्र पत्रिकाओं में क्यों नहीं भेजते?
इसका सीधा जवाब तो यही है कि भई, हम तो पांच रुपये की डाक टिकट लगाकर लिफाफे भेजते हुए थक गये। अपनी रचना अपने हिसाब से की पर वह उन पत्र पत्रिकाओं के अनुकूल नहीं होती । वैसे अधिकतर समाचार पत्र पत्रिकाओं के वैचारिक, साहित्यक और व्यवसायिक प्रारूप हैं जिनके ढांचे में हमारी रचनायें फिट नहीं बैठती। हां, यह सच है कि आप जो लिखते हैं उसका उस पत्र या पत्रिका के निर्धारित प्रारूप में फिट होना आवश्यक है। जो लेखक इन प्रारूपों की सीमा में लिखते हैं वही प्रसिद्ध हो पाते हैं-यह सफलता भी उन्हीं लेखकों को नसीब में आती है जिनके संबंध होते हैं। अधिकतर पत्र पत्रिकाओं के मुख्यालय बड़े शहरों में होते हैं और छोटे शहरों के लेखक वहां तक नहीं पहुंच पाते। वैसे वह उनके तय प्रारूप के अनुसार लिखें तो तो भी इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि उनकी रचना छप ही जाये।
बहरहाल जिन नये लेखकों के अवसर मिल रहा है उनके लिये तो अच्छा ही है पर जिनको नहीं मिल रहा है वह यहां लिखें। उन्हें पत्र पत्रिकाओं वाले प्रारूपों का ध्यान नहीं करना चाहिये क्योंकि यहां संक्षिप्पता, मौलिकता और निष्पक्षता के साथ चला जा सकता है जबकि वहां कुछ न कुछ बंधन होता ही है। आपके ब्लाग एक जीवंत किताब की तरह हैं जो कहीं अलमारी में बंद नहीं होंगे और उन्हें पढ़ा ही जाता रहेगा। आप इस पर विचार मत करिये कि आज कितने लोगों ने इसे पढ़ा आप यह सोचिये कि आगे इसे बहुत लोग पढ़ने वाले हैं। मेरे ऐसे कई पाठ हैं जो प्रकाशित होने वाले दिन दस पाठक भी नहीं जुटा सके पर वह एक वर्ष कें अंदर पांच हजार की संख्या के निकट पहुंचने वाले हैं।
हिंदी लेखन में स्थिति यह हो गयी है कि लेखक की पारिवारिक, व्यवसायिक और सामाजिक परिस्थिति कें अनुसार उसकी रचना को देखा जाता है। यही कारण है कि पत्र पत्रिकाओं में लेखन से इतर कारणों से प्रसिद्धि हस्ती के लेखक प्रकाशित होते हैं या फिर उन अंग्रेजी लेखकों के लेख प्रकाशित होते हैं जो अंग्रेजी में आम पाठक की उपेक्षा से तंग आकर हिंदी की तरफ आकर्षित हुए-इस बारे में संदेह है कि वह स्वयं उनको लिखते होंगे क्योंकि उन्होंने ताउम्र अंग्रेजी में लिखा। संभवतः अपने लेखों को अंग्रेजी में लिखकर उसका हिंदी में अनुवाद कराते होंगे या बोलकर लिखवाते होंगे।

अगर कोई फिल्मी हीरो अपना ब्लाग बना ले तो उसे एक ही दिन में हजारों पाठक मिल जायेंगे पर आप अगर एक आप लेखक हैं तो फिर आपको अपने लिखे के सहारे ही धीरे धीरे आगे बढ़ना होगा। ऐसे में यही बेहतर है कि आप संकोच छोड़कर लिखे जायें। इस विषय में हमारे एक गुरुजी का कहना है कि तुम तो मन में आयी रचना लिख लिया करो। हो सकता है उस समय उसे कोई न पूछे पर जब तुम्हारा नाम हो जाये तो लोग उसी की प्रशंसा करें।

इसलिये जिन लोगों के पास ब्लाग लिखने की सुविधा है उन्हें अपना लेखक कार्य शुरु करने में संकोच नहीं करना चाहिये। हिंदी में गंभीर लेखन को कालांतर में बहुत महत्व मिलेगा। आपका लिखा हिंदी में पढ़ा जाये यह जरूरी नहीं है। अनुवाद टूलों ने भाषा और लिपि की दीवार ढहाने का काम शुरु कर दिया है यानि यहां लिखना शुरु करने का अर्थ है कि आप अंतर्राष्ट्रीय स्तर के लेखक बनने जा रहे हैं जो कि पूर्व के अनेक हिंदी लेखकों का एक सपना रहा है। हां इतना जरूरी है कि अपने लिखे पर आत्ममुग्ध न हों क्योंकि इससे रचनाकर्म प्रभावित होता है।
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भ्रष्ट पात्र किसी कहानी में में केन्द्रीय पात्र क्यों नहीं होता -आलेख


स्वतंत्रता के बाद देश का बौद्धिक वर्ग दो भागों में बंट गया हैं। एक तो वह जो प्रगतिशील है दूसरा वह जो नहीं प्रगतिशील नहीं है। कुछ लोग सांस्कृतिक और धर्मवादियों को भी गैर प्रगतिशील कहते हैं। दोनों प्रकार के लेखक और बुद्धिजीवी आपस में अनेक विषयों पर वाद विवाद करते हैं और देश की हर समस्या पर उनका नजरिया अपनी विचारधारा के अनुसार तय होता है। देश में बेरोजगारी,भुखमरी तथा अन्य संकटों पर पर ढेर सारी कहानियां लिखी जाती हैं पर उनके पैदा करने वाले कारणों पर कोई नहीं लिखता। अर्थशास्त्र के अंतर्गत भारत की मुख्य समस्याओं में ‘धन का असमान वितरण’ और कुप्रबंध भी पढ़ाया जाता है। बेरोजगारी,भुखमरी तथा अन्य संकट कोई समस्या नहीं बल्कि इन दोनों समस्याओं से उपजी बिमारियां हैं। जिसे हम भ्रष्टाचार कहते हैं वह कुप्रबंध का ही पर्यायवाची शब्द है। मगर भ्रष्टाचार पर समाचार होते हैं उन पर कोई कहानी लिखी नहीं जाती। भ्रष्टाचारी को नाटकों और पर्दे पर दिखाया जाता है पर सतही तौर पर।

अनेक बार व्यक्तियों के आचरण और कृतित्व पर दोनों प्रकार के बुद्धिजीवी आपस में बहस करते है। अपनी विचारधाराओं के अनुसार वह समय समय गरीबों और निराश्रितों के मसीहाओं को निर्माण करते हैं। एक मसीहा का निर्माण करता है दूसरा उसके दोष गिनाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि सतही बहसें होती हैं पर देश की समस्याओं के मूल में कोई झांककर नहीं देखता। फिल्म,पत्रकारिता,नाटक और समाजसेवा में सक्र्रिय बुद्धिजीवियों तंग दायरों में लिखने और बोलने के आदी हो चुके हैं। लार्ड मैकाले ने ऐसी शिक्षा पद्धति का निर्माण किया जिसमें स्वयं की चिंतन क्षमता तो किसी मेें विकसित हो ही नहीं सकती और उसमें शिक्षित बुद्धिजीवी अपने कल्पित मसीहाओं की राह पर चलते हुए नारे लगाते और ‘वाद’गढ़ते जाते हैं।

साहित्य,नाटक और फिल्मों की पटकथाओं में भुखमरी और बेरोजगारी का चित्रण कर अनेक लोग सम्मानित हो चुके हैं। विदेशों में भी कई लोग पुरस्कार और सम्मान पाया है। भुखमरी, बेरोजगारी,और गरीबी के विरुद्ध एक अघोषित आंदोलन प्रचार माध्यमों में चलता तो दिखता है पर देश के भ्रष्टाचार पर कहीं कोई सामूहिक प्रहार होता हो यह नजर नहंी आता। आखिर इसका कारण क्या है? किसी कहानी का मुख्य पात्र भ्रष्टाचारी क्यों नहीं हेाता? क्या इसलिये कि लोगों की उससे सहानुभूति नहीं मिलती? भूखे,गरीब और बेरोजगार से नायक बन जाने की कथा लोगों को बहुत अच्छी लगती है मगर सब कुछ होते हुए भी लालच लोभ के कारण अतिरिक्त आय की चाहत में आदमी किस तरह भ्रष्ट हो जाता है इस पर लिखी गयी कहानी या फिल्म से शायद ही कोई प्रभावित हो।
भ्रष्टाचार या कुप्रबंध इस देश को खोखला किये दे रहा है। इस बारे में ढेर सारे समाचार आते हैं पर कोई पात्र इस पर नहीं गढ़ा गया जो प्रसिद्ध हो सके। भ्रष्टाचार पर साहित्य,नाटक या फिल्म में कहानी लिखने का अर्थ है कि थोड़ा अधिक गंभीरता से सोचना और लोग इससे बचना चाहते हैं। सुखांत कहानियों के आदी हो चुके लेखक डरते हैं कोई ऐसी दुखांत कहानी लिखने से जिसमें कोई आदमी सच्चाई से भ्रष्टाचार की तरफ जाता है। फिर भ्रष्टाचार पर कहानियां लिखते हुए कुछ ऐसी सच्चाईयां भी लिखनी पड़ेंगी जिससे उनकी विचारधारा आहत होगी। अभी कुछ दिन पहले एक समाचार में मुंबई की एक ऐसी औरत का जिक्र आया था जो अपने पति को भ्रष्टाचार के लिये प्रेरित करती थी। जब भ्र्रष्टाचार पर लिखेंगे तो ऐसी कई कहानियां आयेंगी जिससे महिलाओं के खल पात्रों का सृजन भी करना पड़ेगा। दोनों विचारधाराओं के लेखक तो महिलाओं के कल्याण का नारा लगाते हैं फिर भला वह ऐसी किसी महिला पात्र पर कहानी कहां से लिखेंगे जो अपने पति को भ्रष्टाचार के लिये प्रेरित करती हो।
फिल्म बनाने वाले भी भला ऐसी कहानियां क्यों विदेश में दिखायेंगे जिसमें देश की बदनामी होती हो। सच है गरीब,भुखमरी और गरीबी दिखाकर तो कर्ज और सम्मान दोनों ही मिल जाते हैं और भ्रष्टाचार को केंदीय पात्र बनाया तो भला कौन सम्मान देगा।
देश में विचारधाराओं के प्रवर्तकों ने समाज को टुकड़ों में बांटकर देखने का जो क्रम चलाया है वह अभी भी जारी है। देश की अनेक व्यवस्थायें पश्चिम के विचारों पर आधारित हैं और अंग्रेज लेखक जार्ज बर्नाड शा ने कहा था कि ‘दो नंबर का काम किये बिना कोई अमीर नहीं बन सकता।’ ऐसे में अनेक लेखक एक नंबर से लोगों के अमीर होने की कहानियां बनाते हैं और वह सफल हो जाते हैं तब उनके साहित्य की सच्चाई पर प्रश्न तो उठते ही हैं और यह भी लगता है कि लोगा ख्वाबों में जी रहे। अपने आसपास के कटु सत्यों को वह उस समय भुला देते हैं जब वह कहानियां पढ़ते और फिल्म देखते हैं। भ्रष्टाचार कोई सरकारी नहीं बल्कि गैरसरकारी क्षेत्र में भी कम नहीं है-हाल ही में एक कंपनी द्वारा किये घोटाले से यह जाहिर भी हो गया है।

आखिर आदमी क्या स्वेच्छा से ही भ्रष्टाचार के लिये प्रेरित होता है? सब जानते हैं कि इसके लिये कई कारण हैं। घर में पैसा आ जाये तो कोई नहीं पूछता कि कहां से आया? घर के मुखिया पर हमेशा दबाव डाला जाता है कि वह कहीं से पैसा लाये? ऐसे में सरकारी हो या गैरसरकारी क्षेत्र लोगों के मन में हमेशा अपनी तय आय से अधिक पैसे का लोभ बना रहता है और जहां उसे अवसर मिला वह अपना हाथ बढ़ा देता है। अगर वह कोई चोरी किया गया धन भी घर लाये तो शायद ही कोई सदस्य उसे उसके लिये उलाहना दे। शादी विवाहों के अवसर पर अनेक लोग जिस तरह खर्चा करते हैं उसे देखा जाये तो पता लग जाता है कि किस तरह उनके पास अनाप शनाप पैसा है।
कहने का तात्पर्य है कि हर आदमी पर धनार्जन करने का दबाव है और वह उसे गलत मार्ग पर चलने को प्रेरित करता है। जैसे जैसे निजी क्षेत्र का विस्तार हो रहा है उसमें भी भ्रष्टाचार का बोलबाला है। नकली दूध और घी बनाना भला क्या भ्रष्टाचार नहीं है। अनेक प्रकार का मिलावटी और नकली सामान बाजार में बिकता है और वह भी सामाजिक भ्रष्टाचार का ही एक हिस्सा है। ऐसे में भ्रष्टाचार को लक्ष्य कर उस पर कितना लिखा जाता है यह भी देखने की बात है? यह देखकर निराशा होती है कि विचारधाराओं के प्रवर्तकों ने ऐसा कोई मत नहीं बनाया जिसमें भ्रष्टाचार को लक्ष्य कर लिखा जाये और यही कारण है कि समाज में उसके विरुद्ध कोई वातावरण नहीं बन पाया। इन विचाराधाराओं और समूहों से अलग होकर लिखने वालों का अस्तित्व कोई विस्तार रूप नहीं लेता इसलिये उनके लिखे का प्रभाव भी अधिक नहीं होता। यही कारण है कि भ्रष्टाचार अमरत्व प्राप्त करता दिख रहा है और उससे होने वाली बीमारियों गरीबी,बेरोजगारी और भुखमरी पर कहानियां भी लोकप्रिय हो रही हैं। शेष फिर कभी
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जिंदगी क्या जंग से कम है-लघुकथा


उसकी मां आई.सी.यू में भर्ती थी। वह और उसका चाचा बाहर टहल रहे थे। उसने चाचा से पूछा-‘चाचाजी, आपको क्या लगता है कि पाकिस्तान से भारत की जंग होगी।’

चाचा ने कहा-‘पता नहीं! अभी तो हम दोनों यह जंग लड़ ही रहे हैं।’

इतने में नर्स बाहर आयी और बोली-‘तीन नंबर के मरीज को देखने वाले आप ही लोग हैं न! जाकर यह दवायें ले आईये।’

युवक ने पूछा-‘‘आप ने अंदर कोई दवाई दी है क्या?’

नर्स ने कहा-‘ नहीं! अभी तो चेकअप कर रहे हैं। उनके कुछ और चेकअप होने हैं जो आप जाकर बाहर करायें। हमारी मशीनें खराब पड़ीं हैं। अभी यह दवायें आप ले आयें।

लड़का दवा लेने चला गया। रास्ते में एक फलों का ठेला देखा और अपनी मां के लिये पपीता खरीदने के लिये वहां रुक गया। उसी समय दो लड़के वहां आये और उस ठेले से कुछ सेव उठाकर चलते बने।

ठेले वाला चिल्लाया-‘अरे, पैसे तो देते जाओ।’

उन लड़कों में एक लड़के ने कहा-‘अबे ओए, तू हमें जानता नहीं। अभी हाल जाकर ढेर सारे दोस्त ले आयेंगे तो पूरा ठेला लूट लेंगे।’

ठेले वाले ने कहा-‘ढंग से बात करो। मैं भी पढ़ा लिखा हूं। इधर आकर पैसे दो।’

उनमें एक लड़का आया और उसके गाल पर थप्पड़ जड़ दिया। वह ठेले वाला सकते में आया और लड़के वहां से चलते बने।’

ठेले वाला गालियां देता रहा। फिर पपीता तौलकर उस युवक से बोला-‘साहब, क्या लड़ेगा यह देश किसी से। आतंक आतंक की बात करते हैं तो पर यह घर का आतंक कौन खत्म करेगा? गरीब और कमजोर आदमी का इज्जत से जीना मुश्किल हो गया है और बात करते हैं कि बाहर से आतंक आ रहा है।

वह दवायें लेकर वापस लौटा। उसने अपनी दवायें नर्स को दी। वह अंदर चली गयी तो उसने अपने चाचा को बताया कि एक हजार की दवायें आयीं हैं। उसने चाचा से कहा-‘चाचाजी, यहां आते आते पंद्रह सौ रुपये खर्च हो गये हैं। अगर कुछ पैसे जरूरत पड़ी तो आप दे देंगे न! बाद में मैं आपको दे दूंगा।’

चाचा ने हंसकर कहा-‘अगर मुझे मूंह फेरना होता तो यहां खड़ा ही क्यों रहता? तुम चाहो तो अभी पैसे ले लो। बाद में देना। तुम्हारी मां ने मुझे देवर नहीं बेटे की तरह पाला है। उसकी मेरे ऊपर भी उतनी ही जिम्मेदारी है जितनी तुम्हारी।’

इतने में वही नर्स वहां आयी और एक पर्चा उसके हाथ में थमाते हुए बोली-‘डाक्टर साहब बोल रहे हैं यह इंजेक्शन जल्दी ले आओ।’

युवक वह इंजेक्शन ले आया और फिर चाचा से बोला-‘मेडीकल वाले में बताया कि यह इंजेक्शन तो अक्सर मरीजों को लगता है। वह यह भी बता रहा था कि इन अस्पताल वालों को ऐसे ही इंजेक्शन मिलते हैं पर यह कभी मरीज को नहीं लगाते बल्कि बाजार में बेचकर पैसा बचाते हैं।’

चाचा ने कहा-‘हां, यह तो आम बात है। सार्वजनिक अस्पताल तो अब नाम को रह गये हैं। वह दवाईयां क्या डाक्टर ही देखने वाला मिल जाये वही बहुत है।’

वह कम से कम तीन बार दवाईयां ले आया। धीरे धीरे उसकी मां ठीक होती गयी। एक दिन उसे अस्पताल से छुट्टी मिल गयी। बाद में वह युवक बाजार में अपने सड़क पर सामान बेचने के ठिकाने पर पहुंचा। उसने अभी अपना सामान लगाया ही था कि हफ्ता लेने वाला आ गया। युवक ने उससे कहा-‘यार, मां की तबियत खराब थी। कल ही उनको आई.सी.यू. से वापस ले आया। तुम कल आकर अपना पैसा ले जाना।’

हफ्ता वसूलने वाले ने कहा-‘ओए, हमारा तेरी समस्या से कोई मतलब नहीं है। हम कोई उधार नहीं वसूल नहीं कर रहे। हमारी वजह से तो तू यहां यह अपनी गुमटी लगा पाता है।’

युवक ने हंसकर कहा-‘भाई, जमीन तो सरकारी है।’

हफ््ता वसूलने वाले ने कहा-‘फिर दिखाऊं कि कैसे यह जमीन सरकारी है।’

युवक ने कहा-‘अच्छा बाद में ले जाना। कम से कम इतना तो लिहाज करो कि मैंने अपनी मां की सेवा की और इस कारण यहां मेरी कमाई चली गयी।’

हफ्ता वसूली करने वाले ने कहा-‘इससे हमें क्या? हमें तो बस अपने पैसे से काम है? ठीक है मैं कल आऊंगा। याद रखना हमें पैसे से मतलब हैं तेरी समस्या से नहीं। ’

वह हफ्तावसूली वाला मुड़ा तो उसी समय एक जूलूस आ रहा था। जुलूस में लोग देश भक्ति जाग्रत करने के लिये आतंक विरोधी तख्तियां लिये हुए थे। उसमें उसे वह दो लड़के भी दिखाई दिये जिन्होंने फल वाले के सेव लूटकर उसको थप्पड़ भी मारी थी। उन्होंने हफ्तावसूल करने वाले को देखा तो बाहर निकल आये और उससे हाथ मिलाया।’

उसके निकलने पर युवक के पास गुमटी लगाने वाले दूसरे युवक ने कहा-‘यार, तेरे को क्या लगता है जंग होगी?’

पहले युवक ने आसमान की तरफ देखा और कहा-‘अभी हम लोगों के लिये यह जिंदगी क्या जंग से कम है?’

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मैंने कुछ सुधार कर दिया है अगर आप मेरे ब्लॉग का और मेरा पूरा नाम दें तो अच्छा रहेगा. मेरी आपको शुभकामनाएं

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यह प्यार है बाजार का खेल-व्यंग्य कविता


खूब करो क्योंकि हर जगह
लग रहे हैं मोहब्बत के नारे
बाजार में बिक सकें
उसमें करना ऐसे ही इशारे
उसमें ईमान,बोली,जाति और भाषा के भी
रंग भरे हों सारे
जमाने के जज्बात बनने और बिगड़ने के
अहसास भी उसमें दिखते हांे
ऐसा नाटक भी रचानां
किसी एकता की कहानी लिखते हों
भले ही झूठ पर
देश दुनियां की तरक्की भी दिखाना
परवाह नहीं करना किसी बंधन की
चाहे भले ही किसी के
टूटकर बिखर जायें सपने
रूठ जायें अपने
भले ही किसी के अरमानों को कुचल जाना
चंद पल की हो मोहब्बत कोई बात नहीं
देखने चले आयेंगे लोग सारे
हो सकती है
केवल जिस सर्वशक्तिमान से मोहब्बत
बैठे है सभी उसे बिसारे

……………………………
जगह-जगह नारे लगेंगे
आज प्यार के नारे
बाहर ढूंढेंगे प्यार घर के दुलारे
प्यार का दिवस वही मनाते
जो प्यार का अर्थ संक्षिप्त ही समझ पाते
एक कोई साथी मिल जाये जो
बस हमारा दिल बहलाए
इसी तलाश में वह चले जाते

बदहवास से दौड़ रहे हैं
पार्क, होटल और सड़क पर
चीख रहे हैं
बधाई हो प्रेम दिवस की
पर लगता नहीं शब्दों का
दिल की जुबान से कोई हो वास्ता
बसता है जो खून में प्यार
भला क्या वह सड़क पर नाचता
अगर करे भी कोई प्यार तो
भला होश खो चुके लोग
क्या उसे समझ पाते
प्यार चाहिऐ और दिलदार चाहिए के
नारे लगा रहे
पर अक्ल हो गयी है भीड़ की साथी
कैसे होगी दोस्त और दुश्मन की पहचान
जब बंद है दिमाग से दिल की तरफ
जाने का रास्ता
अँधेरे में वासना का नृत्य करने के लिए
प्यार का ढोंग रचाते
यह प्यार है बाजार का खेल
शाश्वत प्रेम का मतलब
क्या वाह जानेंगे जो
विज्ञापनों के खेल में बहक जाते

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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप

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दर्द से लड़ते आंसू सूख गये-हिंदी शायरी


जब हकीकतें होती बहुत कड़वी
वह मीठे सपनों के टूटने की
चिंता किसी को नहीं सताती
जहां आंखें देखती हैं
हादसे दर हादसे
वहां खूबसूरत ख्वाब देखने की
सोच भला दिमाग में कहा आती

दर्द से लड़ते आंसू सूख गये है जिसके
हादसों पर उसकी हंसी को मजाक नहीं कहना
उसकी बेरुखी को जज्बातों से परे नही समझना
कई लोग रोकर इतना थक जाते
कि हंसकर ही दर्द से दूर हो पाते
जिक्र नहीं करते वह लोग अपनी कहानी
क्योंकि वह हो जाती उनके लिये पुरानी
रोकर भी जमाना ने क्या पाता है
जो लोग जान जाते हैं
अपने दिल में बहने वाले आंसू वह छिपाते हैं
इसलिये उनकी कशकमश
शायरी बन जाती
शब्दों में खूबसूरती या दर्द न भी हो तो क्या
एक कड़वे सच का बयान तो बन जाती
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यह शहर धरती का एक टुकड़ा है-व्यंग्य कविता


अपने शहर पर इतना नहीं इतराओ
कि फिर पराये लगने लगें लोग सभी
कभी यह गांव जितना छोटा था
तब न तुम थे यहां
न कोई बाजार था वहां
बाजार बनते बड़ा हुआ
सौदागर आये तो खरीददार भी
गांव से शहर बना तभी

आज शहर की चमकती सड़कों
पर तुम इतना मत इतराओ
बनी हैं यह मजदूरों के पसीने से
लगा है पैसा उन लोगों का
जो लगते हैं तुमको अजनबी
‘मेरा शहर सिर्फ मेरा है’
यह नारा तुम न लगाओ
तुम्हारे यहां होने के प्रमाण भी
मांगे गये तो
अपने पूर्वजों को इतिहास देखकर
अपने बाहरी होने का अहसास करने लगोगे अभी

अपने शहर की इमारतों और चौराहों पर
लगी रौशनी पर इतना मत इतराओ
इसमें जल रहा है पसीना
गांवों से आये किसानों का तेल बनकर
घूमने आये लोगों की जेब से
पैसा निकालकर खरीदे गये बल्ब
मांगा गया इस रौशनी का हिसाब तो
कमजोर पड़ जायेंगे तर्क तुम्हारे सभी

यह शहर धरती का एक टुकड़ा है
जो घूमती है अपनी धुरी पर
घूम रहे हैं सभी
कोई यहां तो कोई वहां
घुमा रहा है मन इंसान का
अपने चलने का अहसास भ्रम में करते बस सभी
जिस आग को तुम जला रहे हो
कुछ इंसानों को खदेड़ने के लिये
जब प्रज्जवलित हो उठेगी दंड देने के लिये
तो पूरा शहर जलेगा
तुम कैसे बचोगे जब जल जायेगा सभी

अपने शहर की ऊंची इमारतों और
होटलों पर इतना न इतराओ
दूसरों को बैचेन कर
अपने लोगों को अमन और रोटी दिलाने का
वादा करने वालों
बरसों से पका रहे हो धोखे की रोटी
दूसरों की देह से काटकर बोटी
अधिक दूर तक नहीं चलेगा यह सभी
दूसरों की भूख पर अपने घर चलाने का रास्ता
बहुत दूर तक नहीं जाता
क्योंकि तुम हो छीनने की कला में माहिर
रोटी पकाना तुमको नहीं आता
जान जायेगें लोग कुछ दिनों में सभी

——————————
तालाब के चारों और किनारे थे
पर पानी में नहाने की लालच मेंं
नयनों के उनसे आंखें फेर लीं
पर जब डूबने लगे तो हाथ उठाकर
मांगने लगे मदद
पर किनारों ने फिर सुध नहीं ली
……………………………….
दिल तो चाहे जहां जाने को
मचलता है
बंद हो जातीं हैं आंखें तब
अक्ल पर परदा हो जाता है
पर जब डगमगाते हैं पांव
जब किसी अनजानी राह पर
तब दुबक जाता है दिल किसी एक कोने में
दिमाग की तरफ जब डालते हैं निगाहें
तो वहां भी खालीपन पलता है
……………………………

दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप

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सहमा शब्द -हिन्दी शायरी


जब बमों की आवाज से
शहर काँप जाते हैं
बाज़ार में सड़कों पर
फैले खून के दृश्य
आखों के सामने आते हैं
तब बैठने लगता है दिल
लड़खडाने लगती है जुबान
हाथ रुक जाते हैं
तब अपने शब्द लडखडाते नजर आते हैं

लगता है कि कोई
मुस्करा रहा है यह बेबसी देखकर
क्योंकि बुलंद आवाज और
बोलते शब्द उसे पसंद नहीं आते हैं
उसके चेहरे पर है कुटिलता का भाव
लगता है उसी ने दिया है घाव
आजादी देने के बहाने
अपने पास बुलाकर
मन में खौफ भरकर
लोगों को गुलाम बनाने के बहाने उसे खूब आते हैं

क्या बाँटें दर्द अपना
किससे कहें हाल दिल का
लोगों के खून के साथ होली खेलने वाले
चुपके से निकल जाते हैं
अपना उदास चेहरा किसे दिखाएँ
कही अपने कदम न लडखडायें
यहाँ खंजर लिए है कौन
पता नहीं चलता
पीठ में घोंपने के लिए सब तैयार नजर आते हैं

ज़माने में अमन और चैन बेचने का भी
व्यापार होता है
भले ही मिल नहीं पाते हैं
पर दहशत के सौदागर फलते हैं इसलिए
क्योंकि दाम लेकर खून का
सौदा हाथों हाथ किये जाते हैं
इंसानी रिश्तों को वह क्या समझेंगे
जो इसका मोल नहीं जान पाते हैं
बुलंद आवाज़ और शब्दों की ताकत क्या समझेंगे
वह बम धमाकों में ही
अपने को कामयाब समझ पाते हैं
उनकी आवाज से खून बहता है सड़क पर
तकलीफों के कारवाँ
लोगों के घर पहुँच जाते हैं
पर सहमा शब्द
लडखडाते हुए चलते हुए भी
लम्बी दूरी तय कर जाते हैं
मिटते नहीं कभी
समय की मार से मरने वाले बचे ही कहाँ
पर मारने वाले भी कब बच पाते हैं
दहशत से शब्द कभी न कभी तो उबार आते हैं
भले ही धमाको से शब्द उदास हो जाते हैं

—————————————

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भलाई करने वाला फ़रिश्ता-लघु व्यंग्य


भरी दोपहर में वह इंसान सड़क पर जा रहा था। उसने देखा दूसरा इंसान बिजली के खंबे के नीचे अपने कुछ कागज उल्टे पुल्टे कर रहा था। अचानक वह बड़बड़ा उठा-‘यह बिजली वाले एकदम नकारा हैं। देखों बल्ब भी नहीं जलाकर रखा। खैर, कोई बात नहीं मैं अपने कागज ऐसे ही पढ़कर देखता हूं ताकि वक्त पड़ने पर इन्हें देखने में कोई समस्या न हो।’

पहला इंसान रुक गया और उसने दूसरे इंसान से पूछा-‘क्या बात है भई? भरी दोपहरियो में बल्ब न जलाने पर इन बिजली वालों को क्यों कोस रहे हो। अपने कागज तो तुम ऐसे ही पढ़ सकते हो। अभी तो सूरज की तेज रोशनी पड़ रही है जब रात हो जोयगी तब लाईट जल जायेगी।’

उस दूसरे इंसान ने कहा-‘ओए, तू भला कहां से आ टपका। तुझे पता नहीं मैं मोहब्बत और अमन का फरिश्ता हूं और जिनकों कागज कह रहा है इसमें मोहब्बत और अमन की कहानियां हैं। यह तेरे समझ के परे है क्योंकि तेरे साथ कभी को हादसा नहीं हुआ न! यह पीडि़त लोगों को सुनाने के लिये है इससे उनको राहत मिलती है। तू फूट यहां से।

फरिश्ते की बात सुनकर वहा इंसान आगे बढ़ने को हुआ तो अचानक एक लड़का चिल्लाता हुआ उसके पीछे आया और बोला-चाचा, जल्दी वापस चलो अपने चाय के ठेले में आग लग गयी है।’

वह इंसान भागने को हुआ तो पीछे से फरिश्ता चिल्लाया-‘रुक तेरे साथ हादसा हुआ है। अब सुन मेरे मोहब्बत और अमन का पैगाम। यह कहानी है और यह कविता!’

वह इंसान चिल्लाया-‘भाड़ में जाये तुम्हारी कविता और कहानी। मैं जा रहा हूं अपना ठेला बचाने।’

वह भागा तो फरिश्ता भी उसके पीछे ‘सुनो सुनो’ कहता हुआ भागा।

वह इंसान ठेले के पास पहुंचा तो उसने देखा कि कुछ लोग पास की टंकी से पानी लेकर आग बुझाने का प्रयास कर रहे हैं। वह स्वयं भी इसमें जुट गया। वह बाल्टी भरकर ठेले पर डालता तो इधर फरिश्ता कहता-‘सुन अगर यह आग गैस से लगी है तो कोई बात नहीं है। गैस वैसे तो हमेशा हमारे बहुत काम आती है पर अगर एक बार धोखा हो गया तो उस पर गुस्सा मत होना। इस संबंध में एक विद्वान का कहना है कि……………’’
वह इंसान चिल्लाया-‘तुम दूर हटो। मुझे तुम्हारी इस कहानी से कोई मतलब नहीं है।’

वह दूसरी बाल्टी भरकर लाया तो वह फरिश्ता बोला-‘अगर यह किसी माचिस की दियासलाई से लगी है तो कोई बात नहीं वह अगर सिगरेट जलाने के काम आती है तो सिगड़ी को प्रज्जवलित करने के काम भी आती है। यह कविता…………………’’

वह आदमी चिल्लाया-’दूर हटो। मुझे अपनी रोजी रोटी बचानी है।’

मगर फरिश्ता कुछ न कुछ सुनाता रहा। आखिर उस इंसान ने ठेले की आग बुझा ली। वह उसके ठेले के नीचे रखे कागजों में लगी थी और अभी ऊपर नहीं पहुंची थी। उसका कामकाज चल सकता था। आग बुझाकर उसने उस फरिश्ते से कहा-‘अब सुनाओं अपनी कहानियां और कवितायें। मेरे दिल को ठंडक हो गयी। कोई खास नुक्सान नहीं हुआ।’
फरिश्ते ने अपने कागज अपने बस्तें में डाल दिये और चलने लगा। उस इंसान ने कहा-‘जब मै सुनना नहीं चाहता तब सुनाते हो और जब सुनना चाहता हुं तो मूंह फेरे जाते हो।’

उस फरिश्ते ने कहा-‘आग खत्म तो मेरी कहानी खत्म। मेरी कहानी और कवितायें अमन और मोहब्बत की हैं जो केवल वारदात के बाद तब तक सुनायी जाती हैं जब तक उसका असर खत्म न हो। अब तुम्हें मेरी कहानी और कविता की जरूरत नहीं है।’
वह इंसान हैरानी से उसे देखने लगा
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इतिहास में सीखने लायक क्या है-हास्य व्यंग्य


लोग कहते हैं कि इतिहास से सीखना चाहिये। किसी को कोई नया काम सीखना होता है तो उससे कहा जाता है पीछे देख आगे बढ़। यह शायद अंग्रेजों द्वारा बताया गया कोई तर्क होगा वरना समझदार आदमी तो आज वर्तमान को देखकर न केवल भूतकाल का बल्कि भविष्य का भी अनुमान कर लेता है और जो पीछे देख आगे बढ़ के नियम पर चलते हैं वह जीवन में कोई नया काम नहीं कर सकता।

इतिहास किसी न किसी के द्वारा लिखा जाता और लिखने वाला निश्चित रूप से अपने पूर्वाग्रहों के साथ लिखता है। इसलिये जो इतिहास हमें पढ़ाया जाता है वह एक तरह का कूड़ेदान होता है। उससे सीखने का मतलब है कि अपनी बौद्धिक क्षमता से दुश्मनी करना। जिनकी चिंतन, मनन और अध्ययन की क्षमता कमजोर होती है पर वही इतिहास पढ़कर अपना विचार व्यक्त करते हैं। तय बात है जिसने अपनी शिक्षा के दौरान ही अपनी चिंतन,मनन और अध्ययन की जड़ें मजबूत कर ली तो फिर उसे इतिहास की आवश्यकता ही नहीं हैं। न ही उसे किसी दूसरे के लिखे पर आगे बढ़ने की जरूरत है।

आये दिन अनेक लेखक और विद्वान इतिहास की बातें उठाकर अपनी बातें लिखते हैंं। ऐसा हुआ था और वैसा हुआ था। एतिहासिक व्यक्तियों के चरित्र की मीमांसा ऐसा करेंगेे जैसे कि वह भोजन नहीं करते थे या और कपड़े कोई सामान्य नहीं बल्कि दैवीय प्रकार के पहनते थे। उनमें कोई दोष नहीं था या वह सर्वगुण संपन्न थे। कभी कभी लोग कहते हैं कि साहब पहले का जमाना सही था और हमारे शीर्षस्थ लोग बहुत सज्जन थे। अब तो सब स्वार्थी हो गये हैं। कुछ अनुमान और तो कुछ दूसरे को लिखे के आधार पर इतिहास की व्याख्या करने वाले लोग केवल कूड़ेदान से उठायी गयी चीजों को इस तरह प्रस्तुत करते हैं जैसे वह अब भी नयी हों।

बात जमाने की करें। कबीर और रहीम को पढ़ने के बाद कौन कह सकता है कि पहले समाज ऐसा नहीं था। जब समाज ऐसा था तो तय है कि उसके नियंत्रणकर्ता भी ऐसे ही होंगे। फिर देश में विदेशी आक्रमणकारियों की होती है। कहा जाता है कि वह यहंा लूटने आये। सही बात है पर वह यहां सफल कैसे हुए? तत्कालीन शासकों, सामंतों और साहूकारों की कमियां गिनाने की बजाय विभक्त समाज और राष्ट्र की बात की जाती है। इस सवाल का जवाब कोई नहीं देता कि आखिर विदेशी शासकों ने इतने वर्ष तक राज्य कैसे किया? यहां के आमजन क्यों उनके खिलाफ होकर लड़ने को तैयार नहीं हुए।

इतिहास से कोई बात उठायी जाये तो इस पर फिर अपनी राय भी रखी जाये। हम यहां उठाते हैं महात्मा गांधी द्वारा अंग्रेजों के विरुद्ध प्रारंभ किये आंदोलन की घटना। दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजों को जमीन दिखाने के बाद जब वह भारत लौटे तो उनसे यहां स्वाधीनता आंदोलन का नेतृत्व प्रारंभ करने का आग्रह किया गया। उन्होंने इस आंदोलन से पहले अपने देश को समझने की लिये दो वर्ष का समय मांगा और फिर शुरु की अपनी यात्रा। उसके बाद उन्होंने आंदोलन प्रारंभ किया। दरअसल वह जानते थे कि आम आदमी के समर्थन के बिना यह आंदोलन सफल नहीं होगा। अंग्रेजों की छत्रछाया में पल रही राजशाही और अफसरशाही का मुकाबला बिना आम आदमी के संभव नहीं था। आज भी भारत में गांधीजी को याद इसलिये किया जाता है कि उन्होंने आम आदमी की चिंता की। यह पता नहीं कि उन्होंने इतिहास पढ़ा था या नहीं पर यह तय है कि उन्होंनें इसकी परवाह नहीं की और इतिहास पुरुष बन गये। यह पूरा देश उनके पीछे खड़ा हुआ।

गांधीजी का नाम जपने वाले बहुत हैं और उनके चरित्र की चर्चा गाहे बगाहे उनके साथी करते हैं पर आम आदमी को संगठित करने के उनके तरीके के बारे में शायद ही कोई सोच पाता है। अपने अभियानों और आंदोलनों को जो सफल करना चाहते हैं उनको गांधीजी द्वारा कथनी और करनी के भेद को मिटा देने की रणनीति पर अमल करना चाहिये। हो रहा है इसका उल्टा।
गांधीजी के नारे सभी ने ले लिये पर कार्यशैली तो अंग्रेजों वाली ही रखी। इसलिये हालत यह है कि आम आदमी किसी अभियान या आंदोलन से नहीं जुड़ता।

बड़े बड़े सूरमाओं से इतिहास भरा पड़ा है पर वह हारे क्यों? सीधा जवाब है कि आम आदमी की परवाह नहीं की इसलिये युद्ध हारे। आखिर विदेशी आक्रमणकारी सफल कैसे हुए? क्या जरूरत है इसे पढ़ने की? आजकल के आम आदमी में व्याप्त निराशा और हताशा को देखकर ही समझा जा सकता है। पद, पैसे और प्रतिष्ठा में मदांध हो रहे समाज के शीर्षस्थ लोगों को भले ही कथित रूप से सम्मान अवश्य मिल रहा है पर समाज में उनके प्रति जो आक्रोश है उसको वह समझ नहीं पा रहे। महंगी गाड़ी को शराब पीकर चलाते हुए सड़क पर आदमी को रौंदने की घटना का कानून से प्रतिकार तो होता है पर इससे समाज में जो संदेश जाता है उसे पढ़ने का प्रयास कौन करता है। बड़े लोगों की यह मदांधता उन्हें समाज से मिलने वाली सहानुभूति खत्म किये दे रही है। देश की बड़ी अदालत ने शराब पीकर इस तरह गाड़ी चलाने वाले की तुलना आत्मघाती आतंकी से की तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिये। यह माननीय अदालतें इसी समाज का हिस्सा है और उनके संदेशों को व्यापक रूप में लेना चाहिये।

आखिर धन और वैभव से संपन्न लोग उसका प्रदर्शन कर साबित क्या करना चाहते हैं। शादी और विवाहों के अवसर पर बड़े आदमी और छोटे आदमी का यह भेद सरेआम दिखाई देता है। आजकल तो प्रचार माध्यम सशक्त हैं और जितना वह इन बड़े लोगों को प्रसन्न करने के लिये प्रचार करते हैं आम आदमी के मन में उनके प्रति उतना ही वैमनस्य बढ़ता हैं।

इतिहास में दर्ज अनेक घटनाओं के विश्लेषण की अब कोई आवश्यकता नहीं है। कई ऐसी घटनायें हो रही हैं जो इतिहास की पुनरावृति हैंं। एक मजे की बात है कि विदेशियों के विचारों की प्रशंसा करने वाले कहते हैं कि इस देश के लोग रूढि़वादी, अंधविश्वासी और अज्ञानी थे पर देखा जाये तो भले ही ऐसे लोगों ने विदेशी ज्ञान की किताबें पढ़ ली हों पर वह भी कोई उपयोगी नहीं रहा। कोई कार्ल माक्र्स की बात करता है तो कोई स्टालिन की बात करता और कोई माओ की बात करता जबकि उनके विचारों को उनके देश ही छोड़ चुके हैं। ऐसे विदेशी लोगों के संदेश यहां केवल आम आदमी को भरमाने के लिये लाये गये पर चला कोई नहीं। यही कारण है कि आम आदमी की आज किसी से सहानुभूति नहीं है। लोग नारे लगा रहे हैं पर सुनता कौन है? हर आदमी अपनी हालतों से जूझता हुआ जी रहा है पर किसी से आसरा नहीं करता। यह निराशा का चरम बिंदू देखना कोई नहीं चाहता और जो देखेगा वह कहेगा कि इतिहास तो कूड़ेदान की तरह है। टूटे बिखरे समाज की कहानी बताने की आवश्यकता क्या है? वहा तो सामने ही दिख रहा है।
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मन की उदासी कहने में डर लगता है-हिंदी शायरी


अपने मन की उदासी
किसी से कहने में डर लगता है
जमाने में फंसा हर आदमी
अपनी हालातों से है खफा
नहीं जानता क्या होती वफा
अपने मन की उदासी को दूर
करने के लिये
दूसरे के दर्द में अपनी
हंसी ढूंढने लगता है
एक बार नहीं हजार बार आजमाया
अपने ही गम पर
जमाने को हंसता पाया
जिन्हें दिया अपने हाथों से
बड़े प्यार से सामान
उन्होंने जमाने को जाकर लूट का बताया
जिनको दिया शब्द के रूप में ज्ञान
उन्होंने भी दिया पीठ पीछे अपमान
बना लेते हैं सबसे रिश्ता कोई न कोई
पर किसी को दोस्त कहने में डर लगता है

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खुद सज जाते हैं हमेशा दूल्हों की तरह-व्यंग्य कविता


लोगों को आपस में
मिलाने के लिये किया हुआ है
उन्होंने शामियानों का इंतजाम
बताते हैं जमाने के लिये उसे
भलाई का काम
खुद सज जाते हैं हमेशा दूल्हों की तरह
अपना नाम लेकर
पढ़वाते हैं कसीदे
उनके मातहत बन जाते सिपहसालार
वह बन जाते बादशाह
बाहर से आया हर इंसान हो जाता आम

जिनको प्यारी है अपनी इज्जत
करते नहीं वहा हुज्जत
जो करते वहां विरोध, हो जाते बदनाम
मजलिसों के शिरकत का ख्याल
उनको इसलिये नहीं भाता
जिनको भरोसा है अपनी शख्यिसत पर
शायद इसलिये ही बदलाव का बीज
पनपता है कहीं एक जगह दुबक कर
मजलिसों में तो बस शोर ही नजर आता
ओ! अपने ख्याल और शायरी पर
भरोसा करने वालोंे
मजलिसों और महफिलों में नहीं तुम्हारा काम
बेतुके और बेहूदों क्यों न हो
इंतजाम करने वाले ही मालिक
सजते हैं वहां शायरों की तरह
बाहर निकल कर फीकी पड़ जायेगी चमक
इसलिये दुबके अपने शामियानों के पीछे
कायरों की तरह
वहां नहीं असली शायर का काम

…………………………

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जो बुत बोल रहे, पराये शब्द और स्वर लेकर डोल रहे-व्यंग्य कविता


हाड़मांस के पुतलों से
हो गये है नाउम्मीद इसलिये
पत्थर के बुत ही पूजना अच्छा लगता
कम से कम उम्मीद के टूटने का भय तो नहीं रहता

पत्थर बोलते नहीं है
पर जो बुत बोल रहे
स्वर उनके जरूर हैं पर
शब्द पराये होकर डोल रहे ं
आखों में जिनके जीवन है
देख रहे हैं दृश्य
पर उसे किसी का दृष्टिकोण उधार लेकर तोल रहे
उनकी किसी बात को
प्रमाणिक मानने को मन नहीं कहता

ऋषियों और मुनियों जैसे
बन नहीं सके
ऐसे पुरुषों ने अपने को पुजवाने के लिये
तमाम दिये नारे
इतिहास में किया नाम दर्ज
समाज के इलाज के नाम पर दिया
उसे भ्रमों में भटकने का मर्ज
भटक रहे हैं कई किताबी कीड़े
उतारने के लिये उनका कर्ज
मिटाने की चाहत थी पुराने इतिहास की
नया जो रचा उन्होंने
नीरस और बोझिल शब्दों से जो वाद और नारा
वह कभी हकीकत नहीं लगता
पर बिखरे पड़े हैं उनके शागिर्द चारों ओर
को साहसी भी सच नहीं उनसे नहीं कहता

पत्थर के बुतों से
अगर नहीं है कामयाबी की आशा
तो नहीं होती कभी
उनसे झूठ और भ्रम की वजह से निराशा
हाड़मांस के पुतलों को क्या
नाम दें
इसलिये तो जमाना पत्थर के बुतों को ही
अपना इष्ट कहता
पत्थरों से जंग लड़ी जाती है तभी
जब हाड़मांस के बुतों बातों पर होती जंग
उनके नारे लगाने वालों की
हो जाती है सोच तंग
पर पत्थर का कोई बुत
खुद तो किसी को जंग के लिये नहीं कहता

…………………………………….

यह आलेख ‘दीपक” भारतदीप की सिंधु केसरी-पत्रिका पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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कभी तृष्णा तो कभी वितृष्णा-व्यंग्य कविता



कभी तृष्णा तो कभी वितृष्णा
मन चला जाता है वहीं इंसान जाता
जब सिमटता है दायरों में ख्याल
अपनों पर ही होता है मन निहाल
इतनी बड़ी दुनिया के होने बोध नहीं रह जाता
किसी नये की तरह नजर नहीं जाती
पुरानों के आसपास घूमते ही
छोटी कैद में ही रह जाता

अपने पास आते लोगों में
प्यार पाने के ख्वाब देखता
वक्त और काम निकलते ही
सब छोड़ जाते हैं
उम्मीदों का चिराग ऐसे ही बुझ जाता

कई बार जुड़कर फिर टूटकर
अपने अरमानों को यूं हमने बिखरते देखा
चलते है रास्ते पर
मिल जाता है जो
उसे सलाम कहे जाते
बन पड़ता है तो काम करे जाते
अपनी उम्मीदों का चिराग
अपने ही आसरे जलाते हैं जब से
तब से जिंदगी में रौशनी देखी है
बांट लेते हैं उसे भी
कोई अंधेरे से भटकते अगर पास आ जाता
………………………………

रोटी का इंसान से बहुत गहरा है रिश्ता-हिंदी शायरी


पापी पेट का है सवाल
इसलिये रोटी पर मचा रहता है
इस दुनियां में हमेशा बवाल
थाली में रोटी सजती हैं
तो फिर चाहिये मक्खनी दाल
नाक तक रोटी भर जाये
फिर उठता है अगले वक्त की रोटी का सवाल
पेट भरकर फिर खाली हो जाता है
रोटी का थाल फिर सजकर आता है
पर रोटी से इंसान का दिल कभी नहीं भरा
यही है एक कमाल
………………………
रोटी का इंसान से
बहुत गहरा है रिश्ता
जीवन भर रोटी की जुगाड़ में
घर से काम
और काम से घर की
दौड़ में हमेशा पिसता
हर सांस में बसी है उसके ख्वाहिशों
से जकड़ जाता है
जैसे चुंबक की तरफ
लोहा खिंचता

…………………………………..

यह हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग

‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’

पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।
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दूसरे के दर्द में अपनी तसल्ली ढूंढता आदमी-हिंदी शायरी


शहर-दर-शहर घूमता रहा

इंसानों में इंसान का रूप ढूंढता रहा
चेहरे और पहनावे एक जैसे

पर करते हैं फर्क एक दूसरे को देखते

आपस में ही एक दूसरे से

अपने बदन को रबड़ की तरह खींचते

हर पल अपनी मुट्ठियां भींचते

अपने फायदे के लिये सब जागते मिले

नहीं तो हर शख्स ऊंघता रहा

अपनी दौलत और शौहरत का

नशा है

इतराते भी उस बहुत

पर भी अपने चैन और अमन के लिये

दूसरे के दर्द से मिले सुगंध तो हो दिल को तसल्ली

हर इंसान इसलिये अपनी

नाक इधर उधर घुमाकर सूंघता रहा
……………………………
दीपक भारतदीप

यह आलेख ‘दीपक भारतदीप की ई-पत्रिकापर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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