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कलम की कद्र नहीं करते, तलवार उठाते अपने हाथ में-हिन्दी व्यंग्य कविता (kalam aur talwar-hindi vyangya kavita


पेड़ की छाया भी सुख न दे सके, लोग लगे ऐसे तनाव लाने में।
घास भी पांव में छाले कर दे, ऐसे मैदान में लगे पांव बढ़ाने में।।
बुलंदियों को छूना चाहते सभी, ऊंचाई का पता नहीं किसी को,
बिना पंख आकाश में उड़ते, जिंदगी दांव पर होती भाग्य अजमाने में।।
कलम की कद्र नहीं करते, तलवार उठाते अपने हाथ में,
अपनी गर्दन कटवाते या काटते, नाक की झूठी इज्जत बचाने में।।
बहुत सी चीजों की तरह, हर आदमी भी उगा इस धरती पर
ढेर सारे तोहफे यहां, मगर ताकत लगाते तारे जमीन पर लाने में।
कुदरत ने अक्ल दी, इंसान के ढेर सारी बिना मोल के,
कहें दीपक बापू लोग उसे अमन की बजाय लगाते लड़ाने में।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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भद्र पुरुष उवाच-हास्य व्यंग्य


वह भद्र पुरुष बुद्धिजीवी बहुत दिनों से बिना प्रचार के सांसें ले रहा था। कहने को लेखक था और संबंधों के दम पर अच्छा खासा छपता भी था पर अब न वह लिख पाता था और न ही उसकी दिलचस्पी थी। अलबत्ता अपने पुराने रिश्तों के सहारे कहीं उसने साहित्यक संस्थाओं के पद वगैरह जरूर हथिया कर रखे थे ताकि साहित्यकार की छबि बनी रहे। बहुत दिन से न तो अखबार में नाम आया और न ही टीवी चैनल वालों ने पूछा।
उस दिन एक भद्र महिला बुद्धिजीवी का फोन उसके पास आया। उसने रिसीवर उठाया ‘‘हलौ कौन बोल रहा है?’’
भद्र महिला ने कहा-‘‘मैं बोल रही हूं।’’
भद्र पुरुष ने कहा-‘‘कौन बोल रही हो। नाम तो बताओ।’’
भद्र महिला ने कहा-‘पहले अपनी खांसी बंद तो कर बुढऊ, तब तो बताऊं।’
भद्र पुरुष ने खांसते हुए कहा-‘‘पहले नाम तो बताओ! गोरी नाम है या काली या सांवली या दिलवाली! तुम नाम बताओगी तो खांसी अपने आप रुक जायेगी। नहीं तो मुझे यह भ्रम बना रहेगा कि पंद्रह दिन से मायके में गयी मेरी बीवी बोल रही है, उसे अधिक बात न करना पड़े इसलिये मेरा गला वैसे ही बिदकता है। मेरे समझाने पर भी नहीं समझता।’’
भद्र महिला-कमबख्त! तू अब भी नाम पूछता है। तेरा नाम तो डूबा जा रहा है। उसे बचाने के लिये मौका चाहिए कि नहीं!
भद्र पुरुष की खांसी रुक गयी और बोला-‘अच्छा! तू बोल रही है………तभी मैं कहूं कि ऐसा स्वर किसका है जिसकी वजह से खांसी नहीं रुक रही। मेरे कान तो कोयल के स्वर सुनने के आदी हैं न कि कौएनी के!’
भद्र महिला-‘लगता है सठिया गये हो। अब यह कौएनी कौन? क्या हिन्दी में कोई नया शब्द जोड़ा है। तुझे खुशफहमी है कि तू हिन्दी का बड़ा ठेकेदार है।’
भद्र पुरुष बोला-‘‘कौए के नारी रूप को क्या कहेंगे? मेरे हिन्दी ज्ञान से इसके लिये यही शब्द ठीक है। अब ज्यादा माथा न खपा। बता मामला क्या है?’’
भद्र महिला-‘‘इधर बहुत दिन से मेरा नाम न तो अखबार में आ रहा है न तुम्हारा। इसलिये कुछ ऐसा करो कि अपना नाम चलता रहे। इधर इंटरनेट पर अपना नाम कहीं चमक नहीं रहा।’’
भद्र पुरुष-‘अपने तो चेले चपाटे चमका रहे हैं। रोज कोई न कोई विवाद खड़ा करता रहता हूं। तू अपनी कह, करना क्या है? हां, एक बात याद रखना मैं अब केवल विवाद ही खड़ा करता रहूंगा क्योंकि सीधा सपाट लिखना पढ़ना अब हिन्दी वाले जानते ही नहीं।’
भद्र महिला-‘‘कल एक कार्यक्रम रखा है जिसमें हम दोनों हिन्दी भाषा के साहित्य पर बहस करेंगे। तुम्हारे एक चेले ने ही इसे रखवाया है और कह रहा था कि गुरुजी को आप मना लो। जब बहस होगी तो तय बात विवाद तो होगा। आजकल के प्रचार जगत को विवादों की बहुत जरूरत है।’’
भद्र पुरुष ने हामी भर दी। दोनों समय पर वहां पहुंचे। पहले भद्र पुरुष को बोलना था। उसने भद्र महिला की तरफ देखा और बोला-‘अरे, आजकल कुछ महिला लेखिकाऐं तो यह साबित करने में जुटी हैं कि
उनके लिखे में कौन ज्यादा छिनालपन दिखा सकता है।’
उसने कनखियों से भद्र महिला बुद्धिजीवी को देखा। जैसे उसने सुना ही नहीं। भद्र पुरुष इधर उधर देखने लगा। पास में आयोजक चेला आया तो भद्र बुद्धिजीवी पुरुष ने उसके कान में कहा-‘‘यह सुन नहीं रही शायद! नहीं तो अभी तक तो हमला कर चुकी होंती।’’
चेला तत्काल महिला बुद्धिजीवी के पास गया और बोला-‘आपने सुनने वाली मशीन नहीं लगायी क्या?’
महिला ने वह भी नहीं सुना पर जब कानों में हाथ डाला तो झेंप गयी और तत्काल मशीन लगा ली। तब भद्र पुरुष की जान में जान आयी।
उसने फिर अपने शब्द दोहराये।
भद्र महिला तत्काल उठकर आयी और उसके हाथ से माईक खींचककर बोली-‘‘यह आदमी सरासर मूर्ख है। इसके लिखे में तो ऐसा छिछोरापन दिखता है कि पढ़ते हुए भी हमें शर्म आती है। फिर आज यह समूची महिला लेखिकाओं पर आक्षेप करता है। इसके अंदर सदियों पुरानी पुरुष अहं की भावना है। जिस तरह पुरुष स्त्री को हमेशा ही लांछित करता है। उसी तरह यह भी……’’
एक श्रोता उठकर बोला-‘‘उन्होंने केवल कुछ महिला लेखिकाऐं कहा है तो आप भी कुछ पुरुष कहें। आप दोनों कोई पुरुष या महिला के इकलौते प्रतिनिधि नहीं हैं। हिन्दी भाषा में अच्छे लेखक और लेखिकायें भी हैं पर आप दोनों कैसे हैं यह पता नहीं।’
इस पर भद्र बुद्धिजीवी चिल्ला पड़ा-‘‘ओए, तू कहां से बीच में कूद पड़ा। हम दोनों प्रसिद्ध बुद्धिजीवी हैं इसलिये समूचे मानव जाति के प्रतिनिधि हैं। बैठ जा…….हमें बोलने दे।’’
भद्र महिला-‘बोली और क्या? इस बहस में केवल विद्वान ही हिस्सा ले सकते हैं।’
वह श्रोता बोला-‘पर आप लोग यह किस तरह के असाहित्यक शब्द उपयोग में ला रहे हैं।’
तब आयोजक चेला बोला-‘तुम कोई साहित्यकार हो?’
श्रोता बोला-‘नहीं!
आयोजक चेला-‘तुम्हें कोई पुरस्कार मिला है?’
श्रोता ने ना में सिर हिलाया तो वह चिल्लाया-‘बैठ जा! इतने महान विद्वानों की बहस के बीच में मत बोल।’
श्रोता बोला-‘पर मैं तो इनका नाम भी पहली बार सुन रहा हूं। वैसे मैं सब्जी खरीदने घर से बाज़ार जा रहा था। बरसात की वजह से यहां सभागार के बाहर पोर्च में खड़ा था। अंदर नज़र पड़ी तो देखा कि यहां कोई साहित्यक कार्यक्रम हो रहा है सो चला आया। मुझे नहीं पता था कि यहां कोई भाषाई अखाड़ा है जहां साहित्यक पहलवान आ रहे हैं।’
भद्र महिला चीख पड़ी-‘मारो इसे! यह तो इससे ज्यादा छिछोरेपन की बात कर रहा है।’
इससे पहले कि कोई उससे कहता वह भाग निकला।
उसके साथ ही एक दूसरा श्रोता भी निकल आया और थोड़ी दूर चलने पर उसे रोका बोला-‘यार, अच्छा हुआ मैं बच गया। वरना यह सब बातें मैं ही कहने वाला था पर मेरे पास बैठे एक आदमी ने यह कहकर रोका यहां तो पहले से ही तयशुदा कुश्ती होने वाली है।’
पहले श्रोता ने कहा-‘तुम वहां क्यों गये थे?’
दूसरा श्रोता बोला-‘जैसे तुम बरसात से बचने के लिये गये थे। सुना है आजकल इंटरनेट की वजह से इन पुराने हिन्दी दुकानदारों की स्थिति ठीक नहीं है इसलिये ऐसे स्वांग रचे जा रहे हैं ताकि प्रचार जगत में अहमियत बनी रहे। ऐसा वहीं बैठे एक आदमी ने बताया। अब देखना इस पर चहूं ओर चर्चा होगी। निंदा परनिंदा होगी! कुछ जगह बहसें होंगी। दोनों का डूबता हुआ नाम चमकेगा।’
पहले श्रोता को यकीन नहीं हुआ पर अगले दिन उसने टीवी और समाचार पत्रों में यह सब सुना और पढ़ा। तब मन ही मन बुदबुदाया-छिछोरापन, छिनालपन और तयशुदा जंग।
सारे विवाद में प्रचार जगत में दो दिन तक दोनों भद्र पुरुष और महिला सक्रिय रहे। तीन दिन बाद भद्र महिला ने भद्र पुरुष को फोन किया-‘धन्यवाद, आपने तो कल कमाल कर दिया। एक ही शब्द से ही धोती फाड़कर रुमाल कर दिया। बुढ़ापे में भी रौनक कम नहीं हुई।’
भद्र पुरुष ने कहा-‘इसलिये ही तो ज्यादा लिखना कम कर दिया है। क्या जरूरत है, जब एक शब्द से ही विवाद खड़ा कर नाम कमाया जा सकता है!’
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नोट-यह हास्य व्यंग्य किसी घटना या व्यक्ति पर आधारित नहीं है। अगर इसमें लिखा किसी की कारितस्तानी से मेल खा जाये तो लेखक जिम्मेदार नहीं है। इसे केवल पाठकों के मनोरंजन के लिये लिखा गया है।

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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
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ज़ज्बातों को कार समझ लिया-हास्य कविताएँ


एक दिल था जो
उन्होंने खिलौने की तरह तोड़ दिया,
मोहब्बत को समझा खेल
अपना रिश्ता दिल्लगी से जोड़ लिया।
जिंदगी के सुकून का मतलब नहीं समझे
जज़्बातों को समझा लोहे लंगर की तरह
अपना ख्याल कार की तरह मोड़ लिया।
———
एक दोस्त ने दूसरे को समझाया
‘‘यह ‘आई लव यू’ लिखकर
प्रेम पत्र भेजने से काम नहीं चलेगा,
इस तरह तो तू जिंदगी पर आहें भरेगा।
अपने पत्र में
तमाम तरह के तोहफों की पेशकश कर,
जज़्बातों से ज्यादा वादों के शब्द भर,
भले ही बाद में कार में न घुमाना
पहाड़ों पर हनीमून मनाने की बात भुलाना
मित्र, अब केवल दिल से दिल नहीं जीते जाते,
होटलों के बिल से ही इश्क के गीत लिखे जाते,
जो बताई मैंने तुझ राह
मंजिल तुझे तभी मिलेगी
जब आजकल के इश्क की राह चलेगा।’

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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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भगवान श्रीराम मूलतः अहिंसक प्रवृत्ति के थे-रामनवमी पर विशेष लेख (ramnavami par vishesh lekh)


आज रामनवमी है। भगवान श्रीराम के चरित्र को अगर हम अवतार के दृष्टिकोण से परे होकर सामान्य मनुष्य के रूप में विचार करें तो यह तथ्य सामने आता है कि वह एक अहिंसक प्रवृत्ति के एकाकी स्वभाव के थे। उन जैसे सौम्य व्यक्तित्व के स्वामी बहुत कम मनुष्य होते हैं। दरअसल वह स्वयं कभी किसी से नहीं लड़े बल्कि हथियार उठाने के लिये उनको बाध्य किया गया। ऐसे हालत बने कि उन्हें बाध्य होकर युद्ध के मार्ग पर जाना पड़ा।
भगवान श्रीराम बाल्यकाल से ही अत्यंत संकोची, विनम्र तथा अनुशासन प्रिय थे। इसके साथ ही पिता के सबसे बड़े पुत्र होने की अनुभूति ने उन्हें एक जिम्मेदार व्यक्ति बना दिया था। उन्होंने अपने गुरु वसिष्ठ जी से शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी अपना समय घर पर विराम देकर नहीं बिताया बल्कि महर्षि विश्वमित्र के यज्ञ की रक्षा के लिये शस्त्र लेकर निकले तो फिर उनका राक्षसों से ऐसा बैर बंधा कि उनको रावण वध के लिये लंका तक ले गया।
हिन्दू धर्म के आलोचक भगवान श्रीराम को लेकर तमाम तरह की प्रतिकूल टिप्पणियां करते हैं पर उसमें उनका दोष नहीं है क्योंकि श्रीराम के भक्त भी बहुत उनके चरित्र का विश्लेषण कर उसे प्रस्तुत नहीं कर पाते।
सच बात तो यह है कि भगवान श्रीराम अहिंसक तथा सौम्य प्रवृत्ति का प्रतीक हैं। इसी कारण वह श्रीसीता को पहली ही नज़र में भा गये थे। भगवान श्रीराम की एक प्रकृति दूसरी भी थी वह यह कि वह दूसरे लोगों का उपकार करने के लिये हमेशा तत्पर रहते थे। यही कारण है कि उनकी लोकप्रियता बाल्यकाल से बढ़ने लगी थी।
सच बात तो यह है कि अगर राम राक्षसों का संहार नहीं करते तो भी अपनी स्वभाव तथा वीरता की वजह से उतने प्रसिद्ध होते जितने रावण को मारने के बाद हुए। उनका राक्षसों से प्रत्यक्ष बैर नहीं था पर रावण के बढ़ते अनाचारों से देवता, गंधर्व और मनुष्य बहुत परेशान थे। देवराज इंद्र तो हर संभव यह प्रयास कर रहे थे कि रावण का वध हो और भगवान श्रीराम की धीरता और वीरता देखकर उन्हें यह लगा कि वही राक्षसों का समूल नाश कर सकते हैं। भगवान श्रीराम के चरित्र पर भारत के महान साहित्यकार श्री नरेंद्र कोहली द्वारा एक उपन्यास भी लिखा गया है और उसमें उनके तार्किक विश्लेषण बहुत प्रभावी हैं। उन्होंने तो अपने उपन्यास में कैकयी को कुशल राजनीतिज्ञ बताया है। श्री नरेद्र कोहली के उपन्यास के अनुसार कैकयी जानती थी रावण के अनाचार बढ़ रहे हैं और एक दिन वह अयोध्या पर हमला कर सकता है। वह श्रीराम की वीरता से भी परिचित थी। उसे लगा कि एक दिन दोनों में युद्ध होगा। यह युद्ध अयोध्या से दूर हो इसलिये ही उसने श्रीराम को वनवास दिलाया ताकि वहां रहने वाले तपस्पियों पर आक्रमण करने वाले राक्षसों का वह संहार करते रहें और फिर रावण से उनका युद्ध हो। श्रीकोहली का यह उपन्यास बहुत पहले पढ़ा था और उसमें दिये गये तर्क बहुत प्रभावशाली लगे। बहरहाल भगवान श्रीराम के चरित्र की चर्चा जिनको प्रिय है वह उनके बारे में किसी भी सकारात्मक तर्क से सहमत न हों पर असहमति भी व्यक्त नहीं कर सकते।
रावण के समकालीनों में उसके समान बल्कि उससे भी शक्तिशाली अनेक महायोद्धा थे जिसमें वानरराज बलि का का नाम भी आता है पर इनमें से अधिकतर या तो उसके मित्र थे या फिर उससे बिना कारण बैर नहीं बांधना चाहते थे। कुछ तो उसकी परवाह भी नहीं करते थे। ऐसे में श्रीराम जो कि अपने यौवन काल में होने के साथ ही धीरता और वीरता के प्रतीक थे उस समय के रणनीतिकारों के लिये एक ऐसे प्रिय नायक थे जो रावण को समाप्त कर सकते थे। भगवान श्रीराम अगर वन न जाकर अयोध्या में ही रहते तो संभवतः रावण से उनका युद्ध नहीं होता परंतु देवताओं के आग्रह पर बुद्धि की देवी सरस्वती ने कैकयी और मंथरा में ऐसे भाव पैदा किये वह भगवान श्रीराम को वन भिजवा कर ही मानी। कैकयी तो राम को बहुत चाहती थी पर देवताओं ने उसके साथ ऐसा दाव खेला कि वह नायिका से खलनायिका बन गयी।
श्री नरेंद्र कोहली अपने उपन्यास में उस समय के रणनीतिकारों का कौशल मानते हैं। ऐसा लगता है कि उस समय देवराज इंद्र अप्रत्यक्ष रूप से अपनी रणनीति पर अमल कर रहे थे। इतना ही नहीं जब वन में भगवान श्रीराम अगस्त्य ऋषि से मिलने गये तो देवराज इंद्र वहां पहले से मौजूद थे। उनके आग्रह पर ही अगस्त्य ऋषि ने एक दिव्य धनुष भगवान श्रीराम को दिया जिससे कि वह समय आने पर रावण का वध कर सकें। कहने का तात्पर्य यह है कि जब हम रामायण का अध्ययन करते हैं तो केवल अध्यात्मिक, वैचारिक तथा भक्ति संबंधी तत्वों के साथ अगर राजनीतिक तत्व का अवलोकन करें तो यह बात सिद्ध होती है कि राम और रावण के बीच युद्ध अवश्यंभावी नहीं था पर उस काल में हालत ऐसे बने कि भगवान श्रीराम को रावण से युद्ध करना ही पड़ा। मूलतः भगवान श्रीराम सुकोमल तथा अहिंसक प्रवृत्ति के थे।
जब रावण ने सीता का हरण किया तब भी देवराज इंद्र अशोक वाटिका में जाकर अप्रत्यक्ष रूप उनको सहायता की। इसका आशय यही है कि उस समय देवराज इंद्र राक्षसों से मानवों और देवताओं की रक्षा के लिये रावण का वध श्रीराम के हाथों से ही होते देखना चाहते थे। अगर सीता का हरण रावण नहीं करता तो शायद ही श्रीराम जी उसे मारने के लिये तत्पर होते पर देवताओं, गंधर्वों तथा राक्षसों में ही रावण के बैरी शिखर पुरुषों ने उसकी बुद्धि का ऐसा हरण किया कि वह श्रीसीता के साथ अपनी मौत का वरण कर बैठा। ऐसे में जो लोग भगवान श्रीराम द्वारा किये युद्ध पर ही दृष्टिपात कर उनकी निंदा या प्रशंसा करते हैं वह अज्ञानी हैं और उनको भगवान श्रीराम की सौम्यता, धीरता, वीरता तथा अहिंसक होने के प्रमाण नहीं दिखाई दे सकते। उस समय ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों, देवताओं, और मनुष्यों की रक्षा के लिये ऐसा संकट उपस्थित हुआ था कि भगवान श्रीराम को अस्त्र शस्त्र एक बार धारण करने के बाद उन्हें छोड़ने का अवसर ही नहीं मिला। यही कारण है कि वह निरंतर युद्ध में उलझे रहे। श्रीसीता ने उनको ऐसा करने से रोका भी था। प्रसंगवश श्रीसीता जी ने उनसे कहा था कि अस्त्र शस्त्रों का संयोग करने से मनुष्य के मन में हिंसा का भाव पैदा होता है इसलिये वह उनको त्याग दें, मगर श्रीराम ने इससे यह कहते हुए इंकार किया इसका अवसर अभी नहीं आया है।
उस समय श्रीसीता ने एक कथा भी सुनाई थी कि देवराज इंद्र ने एक तपस्वी की तपस्या भंग करने के लिये उसे अपना हथियार रखने का जिम्मा सौंप दिया। सौजन्यता वश उस तपस्वी ने रख लिया। वह उसे प्रतिदिन देखते थे और एक दिन ऐसा आया कि वह स्वयं ही हिंसक प्रवृत्ति में लीन हो गये और उनकी तपस्या मिट्टी में मिल गयी।
भगवान श्रीराम की सौम्यता, धीरता और वीरता से परिचित उस समय के चतुर पुरुषों ने ऐसे हालत बनाये और बनवाये कि उनका अस्त्र शस्त्र छोड़ने का अवसर ही न मिले। भगवान श्रीराम सब जानते थे पर उन्होंने अपने परोपकार करने का व्रत नहीं छोड़ा और अंततः जाकर रावण का वध किया। ऐसे भगवान श्रीराम को हमारा नमन।
रामनवमी के इस पावन पर्व पर पाठकों, ब्लाग लेखक मित्रों तथा देशभर के श्रद्धालुओं को ढेर सारी बधाई।

कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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काली करतूतें सफेद कागज में ढंकते रहे-हिन्दी शायरी


सिर उठाकर आसमान में देखा तो लगा
जैसे हम उसे ढो रहे हैं,
जमीन पर गड़ायी आंख तो लगा कि
हम उसे अपने पांव तले रौंद रहे हैं।
ठोकर खाकर गिरे जब जमीन पर मुंह के बल
न आसमान गिरा
न जमीन कांपी
तब हुआ अहसास कि
हम कोई फरिश्ते नहीं
बस एक आम इंसान है
जो इस दुनियां को बस भोग रहे हैं।
———
अपने से ताकतवर देखा तो
सलाम ठोक दिया,
कमजोर मिला राह पर
उसे पांव तले रौंद दिया।
वह अपनी कारगुजारियों पर इतराते रहे
काली करतूतें
सफेद कागज में ढंकते रहे
पर ढूंढ रहे थे अपने खड़े रहने के लिये जमीन
जब समय ने उनके कारनामों को खोद दिया।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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हिन्दू धर्म संदेश-उद्दण्डता का वेश धारण करना अनुचित


यो नोद्धतं कुरुते जातु वेषं न पोरुषेणापि विकत्धरोऽन्यान्।
न मूर्चि्छत्रः कटुकान्याह किंचित् प्रियं सदा तं कुरुते जनति।।
हिंन्दी में भावार्थ-
जो कभी उद्दण्ड जैसा वेष नहीं बनाता, दूसरों के सामने अपने पराक्रम की डींग नहीं हांकता, गुस्सा होने पर कट् वाक्य नहीं बोलता वह सभी का प्यारा हो जाता है।

न स्वे सुखे वै कुरुते नान्यस्य दुःखे भवित प्ररहृष्टः।
दत्तवा च पश्चात्कुरुतेऽनुतायं स कथ्यते सत्पुरुषार्यशीलः।।
हिंदी में भावार्थ-
महात्मा विदुर के कथानुसार जो अपने सुख में दूसरे के दुःख में प्रसन्न नहीं होता और दान देकर उसका स्मरण नहीं करता वही सदाचारी है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अगर हम देश के वातावरण को देखें तो अनुभव होगा कि आजकल भले काम कम किये जाते हैं पर उनका प्रचार अधिक होता है। देशभर की सामाजिक तथा आर्थिक हालत देखें तो ऐसे विरोधाभास सामने आते हैं जिनसे इस बात की अनुभूति होती है कि लोगों की चिंतन क्षमता अपह्त कर ली गयी है। टीवी, अखबार और रेडियो पर विज्ञापन देखने और सुनने के आदी हो चुके लोग अपना विज्ञापन स्वयं करने लगते हैं भले ही अपने परिवार के बाहर किसी का भला नहीं करते हों।
एक मजे की बात है कि इस देश में इतने महापुरुष और सामाजिक कार्यकर्ता हैं जिनके नाम पर जन्म दिन मनते हैं या उनकी तस्वीरों को लोग अपने घर में लगाकर उनकी पूजा करते हैं फिर भी इस देश की इतनी दुर्दशा क्यों है, इस पर कोई विचार नहीं करता। फिल्मों में कल्पित पात्रों की भूमिका निभाने वाले पात्रों को लोगों ने अपना भगवान मान लिया है। लोग अपनी हालतों से इतना डरते हैं कि वह प्रचार माध्यमों से बने हुए भगवानों की चर्चा अधिक करते हैं।
उसके बाद जो समय बचता है उसमें वह आत्म विज्ञापन में व्यतीत करते हैं। हर आदमी यह बताता है कि ‘उसने अमुक भला काम किया’। अब उसका प्रमाण कौन ढूंढने जाता है।
इससे दूसरे शब्दों में कहें तो लोग दूसरे से सदाचार की अपेक्षा करते हैं पर स्वयं उस राह पर चलना नहीं चाहते। समाज में प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिये अपने व्यवहार को सयंमित रखना पड़ता है। उद्दण्डता के व्यवहार से दूसरे आदमी में भय पैदा किया जा सकता है प्रेम नहीं।
कभी कभी तो ऐसा लगता है कि लोग अपने दुःख से कम दूसरे के सुख से अधिक दुःखी हैं। यह विकृत मानसिकता है और जितना हो सके इससे बचा जाये। अपने मुख से अपनी तारीफ करना व्यर्थ है। इसकी बनिस्पत अगर दूसरे का वास्तव में भला किया जाये तभी यह अपेक्षा की जा सकती है कि सम्मान प्राप्त हो। साथ ही यह भी दूसरे का भला कर उसे गाने का लाभ नहीं है इससे एक तो आत्मप्रवंचना हो जाती है दूसरा पुण्य भी नहीं मिलता। जो चुपचाप ही समाज सेवा और भक्ति करता है वही सच्चा संत है।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://rajlekh.wordpress.com

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मुखौटे बाजार के-हिन्दी व्यंग्य शायरी कवितायें (mukhaute bazar ke-hindi hasya kavita)


आदर्श पुरुषों ने अपनी दरबार में
देशभक्ति का नारा बड़े तामझाम के साथ सजाया।
बाजार को बेचनी थी मोमबत्तियों
शहीदों के नाम पर,
इसलिये प्रचारकों से नारे को संगीत देने के लिये
शोक संगीत भी बजवाया।
भेजे आदर्श पुरुषों के नाम से
रुपयों से भरे लिफाफे
जिनकी समाज सेवा से आम इंसान हमेशा कांपे
दिल में न था भाव फिर भी
आदर्श पुरुषों के खौफ से
सभी ने देशभक्ति का गीत गाया।
———
उनकी देशभक्ति की दुहाई,
कभी नहीं सुहाई,
मुखौटे हैं वह बाजार के सौदागरों के
जो जज़्बात बेचने आते हैं,
उनकी जुबां कभी बोलती नहीं
पर पर्दे के पीछे
वही संवाद लिखकर लाते हैं,

खरीदे देशभक्तों ने बस उनकी बात हमेशा दोहराई।
इंसान की हर दाद मिलती है,

पर सच बोलने पर कोई इनाम नहीं होता।

कितना भी हो जाये कोई अमीर,

पीछा नहीं छोड़ता उसका जमीर,

कैसे दे सकते हैं इनाम, उस शख्स को

बोलता है हमेशा सच जो,

खड़ी है दौलत की इमारत उनकी झूठ पर

चाटुकारों को लेते हैं, अपनी बाहों में भर

क्योंकि सच बोलने वालो से उनका काम नहीं होता।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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हाक़ी के विशिष्ट दर्शक-हिंदी व्यंग्य (hocky ke vishisht darshak-hindi vyangya)


लगभग मृतप्रायः हो चुकी भारतीय हाकी को उबारने के लिये बल्ला और गेंद से खेलकर महान बन चुके भगवान अब दर्शक के रूप में अवतरित हो रहे हैं।
‘हमारे देश में हाकी         का विश्व कप हो रहा है, क्या उसे हम नहीं देखेंगे?’
‘मैं  अब खेलूगा नहीं बल्कि दर्शकों की तरह हाकी के मैच देखूंगा!’
‘अपने देश के हाकी खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ायें।’
इस तरह के नारे उस क्रिकेट खेल के खिलाड़ी दे रहे हैं जिसने राष्ट्रीय खेल कही जाने वाली हाॅकी को लगभग मृत स्थिति में पहुंचा दिया। अगर एतिहासिक उपलब्धियों की बात की जाये तो हाकी में भारत का खाता आज भी चमकदार है क्योंकि  ओलंपिक और विश्व कप उसके नाम पर दर्ज हैं जबकि क्रिकेट में केवल एक विश्व कप दर्ज है वह भी 1983 में मिला था।  उसके बाद भले ही बल्ले और बाल से खेलने  वाले धन कमाते रहे पर इस खाते में 2007 में एक बीस ओवरीय विश्व कप के अलावा कुछ अधिक नहीं जुड़ा।  हो सकता है कि देश के युवा क्रिकेट प्रेमी परीक्षण मैच-पांच दिवसीय, पचास ओवरीय तथा बीस ओवरीय-देखकर भले ही बहल जाते हों और खिलाड़ियों के विज्ञापनों से मिलने वाले प्रचार के साथ पैसे मिलने को देखकर युवा खेल प्रशंसिकायें उनकी दीवानी हो जाती हों पर सच यही है कि श्रेष्ठता के लिये वास्तविक पैमाना वैश्विक स्तर की प्रतियोगिताओं से ही प्रमाणित होता है।
हो सकता है कि अनेक युवा खेल   प्रशंसकों में कई ऐसे भी हों जिनको हाकी शब्द ही समझ में न आये।  कई युवाओं को यह खेल नया ईजाद किया हुआ भी लगा सकता है-क्योंकि उनकी स्मृति में हाकी का स्वर्णिम समय नहीं होगा। कुछ लोगो को यह भ्रम भी हो सकता है कि यही खिलाड़ी किकेट में तो अपनी टीम नहीं उबार सके पर शायद अब राष्ट्रीय खेल हाकी में कुछ जरूर कर दिखायेंगे।  देश की हाकी को इन दर्शक अवतारों के सहारे तारने की कोशिश हो रही है या उसके विश्व कप से जुड़ी विज्ञापन कंपनियों के लिये दर्शक जुटाने का यह प्रयास है, यह कहना कठिन है। 
पुराणों में कथा आती है कि जब जब प्रथ्वी पर संकट आता है तब वह सर्वशक्तिमान की दरबार में हाजिरी लगाकर अपना बोझ हल्का करने का आग्रह करती है और वह अवतार लेकर उसका उद्धार करते हैं। प्रथ्वी की सांसें शेष होती हैं इसलिये वह चलकर सर्वशक्तिमान के दरबार पहुंचती है।  यहां प्राणविहीन हाॅकी से यह आशा करना बेकार है कि उसने क्रिकेट के इन विज्ञापन  अवतारों के  ‘सजावट कक्ष’ में-अंग्रेजी में बोलें तो ड्रैसिंग रूम-में हाजिरी लगाई होगी।
मृतप्रायः हाकी समझकर कुछ लोग शायद समझें नहीं इसलिये यह बताना जरूरी है कि अगर यह विश्व कप भारत में नहीं हो रहा होता तो भारतीय टीम इसमें नहीं खेल सकती थी क्योंकि वह क्वालीफाइग दौर में बाहर हो चुकी थी-यानि इसमें भाग लेने का अवसर योग्यता के कारण नहीं बल्कि इसके आयोजन पर पैसा खर्च करने के कारण मिल रहा है। दूसरी भाषा में इसे कृपांक से पास होना भी कह सकते हैं-अपने यहां ऐसा भी होता है कि किसी कारण वश कहीं परीक्षा नहीं हो पाती तो सामूहिक रूप से विद्यार्थियों को पास कर दिया जाता है-यह भी इसी तरह का ही है।
ऐसा नहीं है कि भारतीय हाकी टीम की यह दुर्दशा केवल एक दिन में हुई है। बरसों से हाकी के प्रेमी और शुभचिंतक आर्त भाव से इसके कर्णधारों की तरफ देखते रहे, कुछ लोगों ने अपनी भावनायें अखबारों में भी व्यक्त की। हाॅकी के उद्धार करने के लिये कई महापुरुष प्रकट भी होते रहे पर नतीजा ढाक के तीन पात!

हाकी का विश्वकप कप होने की घोषणा भी कोई दो चार दिन पहले नहीं  हुई। चार साल पहले पता था-पर यह नहीं पता कि इसे जीतने के लिये क्या योजना बनी है? उल्टे कुछ दिन पहले खिलाड़ियों द्वारा वेतन तथा सुविधाऐं न मिलने की शिकायत करते हुए हड़ताल कर दी।  बड़ी हायतौबा मची।  इस देश में शिखर पर अभी भी सज्जन लोग हैं और वह भारतीय हाकी की मदद के लिये आगे भी आये।  अब यह मामला थम गया है पर भारतीय टीम किस स्थिति में है पता नहीं।
बाकी देशों का पता नहीं पर हमारे देश में अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताऐं केवल अपनी वैश्विक छबि बनाने के लिये आयोजित किये जाते हैं।  खेल तो जाये भाड़ में बस विश्व में सभ्य देश माना जाना चाहिये!  इस छबि का लाभ जिसे मिल सकता है वही उठा सकता है। जहां तक खिलाड़ियों का सवाल है तो जिसमें अपना दमखम हो खेल ले-अगर क्रिकेट के अलावा कोई अन्य खेल खेलता है तो अपने दम पर रोटी कमाये।  या फिर जिसे प्रचार चाहिये वह किसी भी अन्य खेल में आये और शिखर पुरुषों की जीहुजूरी कर टीम में स्थान बनाकर प्रचार प्राप्त करे-मतलब जिसे आत्मविज्ञापन की जरूरत हो वही दूसरा खेल खेले।  वैसे आजकल सभी प्रकार की खेल प्रतियोगितायें कंपनियों द्वारा ही प्रायोजित किये जाते हैं जिनको अपने विज्ञापन से मतलब होता है-आशय यह है कि हाकी खेल से अधिक कंपनियों के विज्ञापन महत्वपूर्ण है उसके लिये जरूरी है अधिक से अधिक लोग इसके मैचों को देखें।
अगले कुछ दिनों में हम देखेंगे कि अनेक ‘विज्ञापन नायक नायिकायें-फिल्मी अभिनेता अभिनेत्रियां और क्रिकेट के खिलाड़ी-हाकी के लिये अपने आपको विशिष्ट दर्शक के रूप में प्रस्तुत करते नज़र आयेंगे।  अब यह कहना कठिन है कि वह इन विज्ञापनों के लिये प्रत्यक्ष धन ले रहे हैं या ‘पुराने ग्राहकों’ के लिये उपहार स्वरूप अभिनय कर रहे हैं-अपने यहां पुराने व्यवसायिक संबंधो के आधार पर रियायत करने की पंरपरा है। अनेक बार दिवाली के अवसर पर अनेक चीजें बड़े व्यापारी छोटे व्यापारियों और ग्राहकों उपहार स्वरूप देते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि हाकी के विश्व कप को आकर्षण प्रदान करने के लिये प्रयास हो रहे हैं जिसका खेल से कोई अधिक संबंध नहीं दिखता।
जो हाॅकी के खेल को जानते हैं उनको पता है कि अपनी टीम का मनोबल बहुत गिरा हुआ है। खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाने की बात कहकर केवल विज्ञापनों के लिये दर्शक जुटाना भर है।  आखिर हाकी की विश्व कप प्रतियोगिता के लिये प्रायोजक तैयार कैसे हुए? जबकि उनके पास क्रिकेट और टेनिस जैसे भी खेल हैं जहां उनके विज्ञापन देखने वाले दर्शक पहले से ही अधिक होते हैं, तब हाकी की तरफ उनका ध्यान क्यों गया? शायद वह यह सोचकर ही शामिल हुईं होंगी कि इस देश से खेलों के नाम पर बहुत कमाया है चलो ‘हाकी’ के माध्यम से दर्शकों  को थोड़ा उपहार दे दो।  अब यह देखने वाली बात होगी कि भारत में  आयोजित इस हाॅकी प्रतियोगिता को कितना जनसमर्थन मिलेगा? अब वह पहले वाली बात नहीं है कि हाकी का विश्व कहीं भी हो लोग उसका इंतजार ऐसे ही करते थे जैसे कि आजकल क्रिकेट का करते हैं।

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नयी पीढ़ी को आगे लाने के वास्ते-हिन्दी व्यंग्य कविताऐं


कभी शिकायत नहीं की अपने दर्द की

शायद इसलिये उन्होंने बेकद्री का रुख दिखाया,

इशारों को कभी समझा नहीं

काम निकलते ही अपनों  से अलग परायों में बिठाया,

जब अपने मसले रखे उनके सामने

बागी कहकर, हमलावरों में नाम लिखाया

————

नयी पीढ़ी को आगे लाने के वास्ते,

खोल रहे हैं सभी अपने रास्ते।

पुरानों को बरगलाना मुश्किल है

उनकी जेबें हैं खाली, बुझे दिल हैं

खून जल चुका है जिन बेदर्दो की तोहीन से

वही ताजे खून के लिये, ढूंढ रहे गुमाश्ते।

————-

वह देश और समाज का भविंष्य

सुधारने के लिये उठाते हैं कसम,

जबकि अपनी आने वाले सात पुश्तों का

खाना जुटाने के लिये लगाते दम।

उनके काम पर क्या उठायें उंगली

आखें खुली है

पर अक्ल के पर्दै मिराये बैठे हम।

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महानायकों के झुंड के बीचआम आदमी-व्यंग्य कविता


महानायकों के झुंड के बीच
खड़ा है आम आदमी
हैरान होता  यह सोचकर कि
किसकी आरती वह पहले करे।
सुबह छाया पर्दे पर फिल्म का नायक
दोपहर को गा रहा है भजन गायक
शाम को नजर आ रहा है
आतंक का खलनायक
किसे करे प्रेम
किस पर दिखाये गुस्सा
पहले नज़रों में उसके चेहरा तो तो भरे।
मगर पर्दे पर हर पल
दृश्य बदल रहा है
कभी हंसी आती है तो
कभी दिल दहल रहा है
इतने नायक और खलनायकों को
देखने से तो पहले फुरसत तो मिले
तब वह कुछ वह सोचने की पहल करे।

पुतले कहलाते शहंशाह-हिन्दी शायरी (putle kahlate shanshah-hindi shayri)


जिसके सिर पर ताज का बोझ नहीं है,

काम करने का जिम्मा रोज नहीं है,

कान नहीं खड़े होते हमेशा

किसी का हुक्म सुनने के लिये,

जिसके हाथ नहीं मोहताज

किसी का जुर्म बुनने के लिये,

जिसकी आंखें नहीं ताकती

मदद के लिये किसी दूसरे की राह,

खुशदिल आदमी बोले हर समय ‘वाह’।

वही है असली शहंशाह।

———–

झुकते हैं वही सिर

जिन पर होता है ताज,

तलवार का वार झेलती  वही गर्दन

जो अकड़ जाती हैं करते राज

सफेल मलमल के सिंहासन के पीछे

डर और अहंकार का रंग है काला स्याह।

दौलत कमाने वाले नटों के

हाथ में डोर है

पुतले राज करते हुए कहलाते शहंशाह।


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रास्ता जाम-हिन्दी व्यंग लेख (trafic trouble-hindi satire)


मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) में फंसना कोई बड़ी बात नहीं है। इस देश के करोड़ों लोग रोज फंसते हैं। उनकी कोई खबर नहीं बन सकती। खबर के लिये सनसनी होना जरूरी है। यह सनसन असामान्य लोगों के उठने, बैठने, चलने, फिरने और छींकने पर बनती है। मैंढकी को जुकाम हो जाये तो क्या फर्क पड़ता है, अगर किसी फिल्मी मेम को हो जाये तभी सनसनीखेज खबर बनती है क्योंकि उसके किये गये विज्ञापनों पर सारे टीवी चैनल और रोडियो चल रहे हैं। उसके लगाये ठुमकों पर जमाने भर के लड़को दिल जलते हैं। उसको जुकाम होने की खबर हो तो उनके दिल भी बैठ जाते हैं और यही काम खबरों से किया जाता हैं। दरअसल जिन खबरों से दिल उठे बैठे उससे ही सनसनी फैलती है।
ऐसे में मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) होने की खबर भी तभी सनसनी फैलाती है जब उसमें कोई खास हस्ती हो और अगर अंतराष्ट्रीय हो तो फिर कहना ही क्या? फिर एक दो नहीं बल्कि अनेक हों तब तो वह मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) अंतर्राष्ट्रीय स्तर का होता है और सनसनी अधिक ही फैल जाती है। अलबत्ता कोपेनहेगन में अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के काफिले की वजह से अन्य राष्ट्रों के प्रमुखों के काफिले मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) में फंस गये। यह खबर सुन और पढ़कर भी इस देश के बहुत कम लोगों पर उसकी प्रतिक्रिया दिखाई दे रही है। किसी से कहो तो वही यह कहता है कि‘यार, ऐसा क्या है इस खबर में! हम तो यहां दिन में गंतव्य तक पहुंचने में चार चार बार मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) में फंसते हैं।’
यह बताये जाने पर कि यह मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) अमेरिकी राष्ट्रपति की वजह से हुआ तो लोग कहते हैं कि‘ इससे क्या फर्क पड़ता है कि उनकी वजह से हुआ। अगर वह उनके खास आदमी होने की वजह से हुआ तो भी क्या? यहां तो आम आदमी की वजह से भी मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) हो जाता है!
हमें तो ऐसी आदत हो गयी है कि अगर किसी दिन अगर मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) का सामना नहीं किया तो लगता है कि जैसे यात्रा ही नहीं की हो। इतना ही नहीं अगर किसी कार्यक्रम या गंतव्य पर विलंब से पहुंचते हैं और उसकी सफाई मांगी जाती है तो भले ही मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) का सामना नहीं किया हो बहाना उसी का बना देते हैं।
कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन रोकने के लिये गैस उत्सर्जन कम करने के प्रयासों पर बैठक हो रही थी। पता नहीं उसका क्या हुआ? बहरहाल इस तरह के गैस उत्सर्जन में मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) होने का भी कम योगदान नहीं है। मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) हो गया तो गाड़ियां चालू हालत में ही गैस छोड़ती रहती हैं। कई गाड़ियों में पैट्रोल में धासलेट भरा होता है जिसके जलने पर निकलने वाली दुर्गंध बता देती है। उसका धुआं जब सांस में घुसता है तो तकलीफ कम नहीं होती। कई बार तो ऐसा लगता है कि इन जामों में जितना पैट्रोल खर्च होता है अगर उससे रोका जाये तो न केवल देश का पैसा और पर्यावरण दोनों बचेगा। कितना, यह हमें पता नहीं। अलबत्ता, ऐसे जामों में हम अपनी गाड़ी बंद कर देते हैं-गैस उत्सर्जन से बचने के लिये नहीं पैसा बचाने के लिये।
वैसे हम सोच रहे थे कि कोई मोबाईल के लिये कोई ऐसा धुन बन जाये जिसमें ‘ओबामा…ओबामा… मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) में फंस गये रामा रामा’ जैसे शब्द हों तो मजा आ जाये। अगर इस पर कोई गीत फिल्म वाले बनाकर दिखायें तो शायद वह हिट भी जाये। ऐसे में उसे मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) होने पर लोगा गुनगुनाकर दिल हल्का कर लेंगे। उसे हम अपने मोबाइल पर लोड कर लेंगे और जब कहीं फंस जायें तो उसे सुनेंगे। धुन पाश्चात्य संगीत पर आधारित होना चाहिये या फिर शास्त्रीय संगीत पर। भारतीय फिल्म संगीत के आधार पर तो बिल्कुल नहीं क्योंकि वह अब हमें प्रभावित नहीं करती। ओबामा का नाम इसलिये लिया क्योंकि जिस तरह कोपेनहेगन की खबर पढ़ी उससे तो यही लगता है कि इस समय वह दुनियां के इकलौते आदमी हैं जिनको कहीं मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) फंसना नहीं पड़ेगा! आखिर अमेरिका के राष्ट्रपति जो हैं। यह अलग बात है कि उनकी वजह से मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) हुआ और उसमें फंसी गाड़ियों में ईंधन जलने से विषाक्त गैस वातावरण में फैली।
इधर भारत ने भी तय किया कि वह गैस उत्सर्जन कम करेगा। हमारा मानना है कि हमारे राष्ट्र के प्रबंधक इस मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) से बचना चाहते हैं तो वह सड़कों का सुधार करें। इससे मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) होने की समस्या से तो निजात मिलेगी और साथ मेें गाड़ियों की गति कम होने से ईंधन की खपत कम होगी जिससे गैस का विसर्जन कम ही होगा। हालांकि यह एक सुझाव ही है। हमें पता है कि इस पर अमल शायद ही हो क्योंकि विकास कभी बिना विनाश के नहीं होता। अगर आपको सड़कें बनानी हैं तो टूटी पाईप लाईन भी बनानी है। फिर टेलीफोन लाईन लगानी है तो सड़क खोदनी है। खोदने, बनाने और लगाने में कमीशन का जुगाड़ का होना भी जरूरी है। जिस पर सड़क बनाने या बनवाने का जिम्मा है उसे भी उसी सड़क से गुजरना है पर वह बिना कमीशन के मानेगा नहीं भले ही सड़क के खस्तहाल से जूझेगा। विकास में कमीशन का मामला फिट होता है। लोगों को अपने बैंक खाते भरते दिखना चाहिये सड़क कौन देखता है? अरे, धक्के खाते हुए आफिस या घर पहुंच ही जाते हैं कौन उस पर रहना है?
किसी से मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) की बात कहो तो यही कहेगा कि ‘यार, इसमें तो केवल ओबामा ही नहीं फंसेंगे? तुम क्या ओबामा हो जो इससे बचना चाहते हो?’
इधर भारत ने गैस उत्सर्जन में कटौती की घोषणा की है तो अनेक बड़े धनिकों ने उस पर आपत्तियां की हैं। उनको देश का विकास अवरुद्ध होता नजर आ रहा है पर मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) की समस्या देखते तो उनको लगता कि यह कठिन काम नहीं है पर बात वही है कि कौन उनको ऐसी सड़कों पर चलना है। हम तो मार्ग अवरुद्ध होने पर अपनी ही यह एक पंक्ति ‘ओबामा…ओबामा… मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) में फंस गये रामा रामा’ दोहरायेंगे। पूरा गीत लिखना वैसे भी अपनी बौद्धिक क्षमता के बाहर की बात है।
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com
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इस ब्लाग ने पाठक संख्या एक लाख पार की-संपादकीय (vews of it blog-hindi editorial)


 आज यह ब्लाग एक लाख की संख्या पार गया।  देश में हिन्दी भाषी क्षेत्रों में इंटरनेट  कनेक्शनों की संख्या को देखते हुए किसी हिन्दी भाषी ब्लाग पर दो वर्ष में यह संख्या अधिक नहीं है, मगर दूसरा पक्ष यह है कि आम हिन्दी भाषी लोगों में इंटरनेट पर हिन्दी लिखे जाने का ज्ञान और उसके पढ़ने के संबंध में होने वाली तकनीकी जानकारी के अभाव के चलते यह संख्या ठीक ही कही जा सकती है।
आज भी ऐसे अनेक लोग हैं जिनको इस बात का पता नहीं है कि इंटरनेट पर हिन्दी भाषा में न केवल साहित्य बल्कि समसामयिक विषयों पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है। फिर जिनको पढ़ने का शौक है उनको यह पता ही नहीं कि हिन्दी में लिखा सर्च इंजिन में कैसे ढूंढा जाये।  जिनको तकनीकी ज्ञान है उनमें फिर यह अहंकार है कि हिन्दी में तो सभी कचड़ा है असली तो अंग्रेजी में लिखा जा रहा है।  दूसरा यह है कि लोग इंटरनेट का उपयोग टीवी के विकल्प के रूप में कर रहे हैं, जिस दिन वह अखबार या किताब के  रूप में इसे पढ़ना चाहेंगे तब शायद हिन्दी का अंतर्जाल पर बोलबाला होगा।  वैसे बहुत कम लोग इस बात पर यकीन करेंगे कि इस ब्लाग लेखक के विदेशों में अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं में अनुवाद टूलों के माध्यम से पढ़ा जा रहा है। मतलब यह है कि अंतर्जाल पर आप किसी भाषा में न लिखकर वरन् अपने अंदर चल रही हलचल या भाव को अभिव्यक्त कर रहे हैं उसे अपनी भाषा में पढ़ने की पाठक को बहुत सुविधा है।  सच तो यह है कि जो लोग सोच रहे हैं कि हिन्दी में लिखने से कोई लाभ नहीं है वह संकीर्णता के भाव मन में लिये हुए हैं-यही ब्लाग एक रैकिंग बताने वाल वेबसाईट पर अंग्रेजी के ब्लागों पर बढ़त बनाये हुए है।  गूगल पेज रैंक में भी इसे चार का अंक प्राप्त है जो अंग्रेजी ब्लागों की तुलना में किसी तरह कम नहीं है। अधिकतर लोगों को यह लगता है कि  अंग्र्रेजी ब्लाग आगे हैं तो उनकी गलतफहमी है।  दूसरी बात यह है कि अंतर्जाल पर सामग्री की गुणवता तथा भावनात्मकता के साथ उसके व्यापक प्रभाव का बहुत महत्व है। अगर यह शर्तें कोई हिन्दी ब्लाग पूरी करता है तो उसे दुनियां भर में लोकप्रियता मिल सकती है।
आखिरी बात यह है कि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन से सराबोर भारत के हिन्दी समाज में से ही भावनात्मक, आदर्श तथा अध्यात्मिक संदेश से भरी रचनायें आनी अपेक्षित हैं इसलिये हिन्दी को भविष्य में इंटरनेट पर एक आकर्षक रूप प्राप्त होगा इसकी पूरी संभावना है। इस अवसर पर पाठकों, ब्लाग लेखक मित्रों तथा तकनीकी रूप से इस ब्लाग को अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग कर रहे लोगों का आभार। भविष्य में भी ऐसे ही सहयोग की आशा है।

लेखक तथा संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर 
 
 

इतिहास के झगड़े-व्यंग्य चिंत्तन (war of history-hindi satire article


इस देश में कई ऐसे लोग मिल जायेंगे जो इतिहास विषय को बहुत कोसते हैं क्योंकि उनको प्रश्नपत्रों को हल करते समय अनेक घटनाओं की तारीखें और सन् याद नहीं रहते और गलत सलत उत्तर हो जाने पर परीक्षा में उनके अंक कम हो जाते हैं। वैसे इतिहास पढ़ते समय हमें भी मजा नहीं आता था पर नंबर पाने के लिये रटना तो पढ़ता ही था। सन आदि की गलतियां कभी नहीं हुई पर उनकी आशंका हमेशा बनी रहती थी। उत्तर लिखने के बाद जब घर पहुंचते तो पहले इसकी पुष्टि अवश्य करते थे कि कहीं सन गलत तो नहीं लिख दिया।
उस समय इस बात पर यकीन नहीं होता था कि हम जो इतिहास पढ़ रहे हैं वह झूठ भी हो सकता है। मगर जैसे जैसे अखबार वगैरह पढ़ने लगे तक लगने लगा कि किसी भी इतिहासकार ने एक लेखक के रूप में अगर कुछ अनुमान कर लिखा होगा तो कल्पना भी सच बनाकर प्रस्तुत हो सकती है। जैसे जैसे समय बीता फिर हमने ऐसे लोगों को अपने सामने इतिहास बनते देखा जिनके बारे में हमें यकीन नहीं था कि इनका नाम भी कभी इतिहास में एक श्रेष्ठ मनुष्य में रूप में लिखा जा सकता है। एक दो घटनायें ऐसी भी देखी जिससे लगा कि अगर हम अपने घर में कहीं किसी पत्थर पर राज्य का राजा होने का जानकारी खुदवाकर गाढ़ दें तो कई वर्षों बाद उसकी खुदाई होने पर वह इतिहास हो जायेगा जो कि सच नहीं बल्कि कल्पना होगी। फिर कई ऐसे लोगों की भी अच्छी चर्चायें सुनी जिनके बारे में हमें यकीन था कि वह इतने उत्कृष्ट नहीं थे जितना अपने देहावसान के बाद बताये जा रहे हैं। इससे भी आगे बढ़े तो यह भी पाया कि कुछ लोगों की कभी खूब आलोचना हुआ करती थी जो कि सही भी थी पर समय के अनुसार जनमत ऐसा बदला लगा कि लोग उनको याद करते हुए कहते हैं कि ‘अगर वह होते तो ऐसा नहीं होता।’
कहने का तात्पर्य यह है कि लोग एक व्यक्ति के बारे में अपनी राय भी बदल सकते हैं और इस तरह इतिहास बदल जाता है। पूरी बात कहें तो यह कि एक झूठ हजार बार बोला जाये तो वह सच बन जाता है। इसी कारण इतिहास की अनेक बातें यकीन पर आधारित हो सकती हैं।
इधर अंतर्जाल पर सक्रिय हुए तो उसने तो हमारे एतिहासिक ज्ञान की न केवल धज्जियां उड़ा दी है कि बल्कि अनेक तरह के शक शुबहे भी पैदा कर दिये हैं। पहला शक तो हमें अपने इतिहास लिखने वालों की विश्वसनीयता और समाज के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को ही लेकरहोता है पर उससे ज्यादा उनको अपनी राय के अनुसार प्रस्तुत करनें वाले प्रचार माध्यमों पर होता है। परस्पर विरोधाभासी तर्क देख सुनकर एक बार तो ऐसा लगता है कि दोनों में से कोई एक झूठ या भ्रमवश बोल रहा है पर फिर अपना सोचते हैं तो लगता है कि दोनों ही एक जैसे हैं। इधर कुछ लोग यह लिख रहे हैं कि ताज महल शाहजहां से अपनी बेगम मुम्ताज की याद में नहीं बनवाया बल्कि वहां पहले एक ‘शिव मंदिर’ था जिसे ‘तेजोमहालय’ कहा जाता था। किन्हीं इतिहासकार श्री ओक की खोज पर आधारित इस विचार ने हमें इतना दिग्भ्रमित कर दिया कि हमे लगने लगा कि हो सकता है वह सही हो। उनके तर्क वजनदार दिखे पर जब अपना सोचना शुरु किया तो लगने लगा कि शायद न तो यह ताजमहल होगा न यह तेजोमहालय बल्कि ताजा मोहल्ला भी हो सकता है जो शायद उस समय के साहूकार लोगों ने शायद अपनी विलासिता के लिये बनवाया हो। उनका इरादा से सामूहिक मनोरंजनालय बनाने का रहा हो जहां अनेक लोग बैठकर शतरंज या च ौपड़ खेले सकें। शायद इसमें सर्वशक्तिमान की मूर्ति भी लगवा सकते थे। उसमें जिस तरह परिक्रमा के लिये जगह बनी है उससे यह विश्वास होता है कि वह वहां कोई कलाकृति वगैरह लगाने वाले होंगे कि किसी राज कर्मचारी या अधिकारी ने बादशाह को खबर कर दी होगी कि अमुक जगह अपने नाम से करवाना बेहतर होगा।
हमें सबसे पहले ताजमहल पर हमारे मामा ले गये थे। दरअसल हमारी वहां जाने की इच्छा नहीं थी। इस अनिच्छा के पीछे इतिहास के ही पढ़ी यह बात जिम्मेदार थी कि ‘ताज महल बनाने वाले मजदूरों के हाथ इसलिये काट दिये गये थे ताकि वह दूसरी जगह ऐसी इमारत न बना सकें।’
जब पहली बार ताजमहल पर गये तब उसे देखकर अच्छा जरूर लगा पर यही बात हमारे मन में ऐसी रही कि उसका आकर्षण हमें बुरा लगा। हम न तो प्रगतिशील हैं न ही परंपरावादी पर श्रम की अवमानना करने वालों को कभी हम श्रेष्ठ व्यक्ति के रूप में नहीं स्वीकारते। इसके बाद भी अनेक बार ताजमहल गये पर वहां हमारे हृदय में कोई स्पंदन नहीं होता। फिर भी उसकी बनावट का अवलोकन तो हमेशा ही किया। हमें लगता है कि ताजमहल कभी एक काल खंड या राजा के राज्य में नहीं बना होगा। इसके बहुत से कारण है। सबसे बड़ी चीज यह कि हमें परिक्रमापथ कभी समझ में नहीं आया। वहां बताने वाले सारी बातें शाहजहां से जोड़कर बताते हैं कि वह अपनी पत्नी को बहुत प्यार करते थे इसलिये चारों तरफ घूमने के लिये उन्होंने बनवाया।
इतिहास में यह बात नहीं पढ़ाई गयी कि मुम्ताज की प्राणविहीन देह एक वर्ष तक बुरहानपुर शहर की एक कब्र में रही। यह हमें कई वर्षों बाद पता लगा। ताजमहल को आधुनिक प्रेम का प्रतीक बताकर जिस तरह फिल्में बनकर सफल रहीं और गीतों को जैसे लोकप्रियता मिली उससे भी यही लगा कि वाकई ऐसा हुआ होगा। इतना ही नहीं ताजमहल छाप साबुन, साड़ियां, बीड़ी तथा अन्य सामान भी बाजार में खूब बिकता देखा। इस पर उस समय विचार नहीं किया मगर अब जैसे बाजार और उसके सहायक प्रचार माध्यम जिस तरह इतिहास के महानायकों को गढ़ रहे हैं तब अपना ही पढ़ा इतिहास संदिग्ध लगता है।
कुछ उदाहरण तो सामने दिखते ही हैं। एक क्रिकेटर जिसने कभी इस देश को विश्वकप नहीं जितवाया उसे सर्वकालीन महान खिलाड़ी का दर्जा देते हुए यहां के प्रचार माध्यम थकते ही नहीं हैं। फिल्मों में काल्पनिक पात्रों का अभिनय करने वाले अभिनेता को देवपुरुष बना देते हैं। अगर इसी तरह चलता रहा तो यकीनन वह किसी समय इतिहास में ऐसे लोग महापुरुष की तरह अपना नाम दर्ज करवायेंगे जिन्होंने जमीनी तौर से कोई बड़ा काम नहीं किया हो।
अपनी इस हल्की सोच के साथ जीना आसान नहीं है। फिर इतिहास को समझें कैसे? क्योंकि उसके बिना आप आगे की व्याख्या भी तो नहीं कर सकते। ऐसे में हमने अपना ही सूत्र ढूंढ लिया है कि ‘‘पीछे देख आगे बढ़, आगे का देखकर पीछे का गढ़।’’
हमारे अपने तर्क हैं जो हल्के भी हो सकते हैं। हमारे महानपुरुषों ने अच्छे काम
करने को इसलिये कहा होगा क्योंकि उन्होंने अपने समय में ऐसे बुरे काम देखे होंगे। कहने का आशय यह है कि इस धरती पर धर्म और अधर्म दोनों ही रहते हैं और कम ज्यादा का कोई पैमाना नहीं है। अगर कबीर और तुलसी को पढ़ें तो यह साफ समझ में आता है कि दुष्ट प्रकृत्ति के लोग उनके समय में भी कम नहीं थे। ऐसे में बाजार और प्रचार की प्रकृत्तियां भी इसी तरह की रही होंगी। सामान्य ज्ञान की किताब में विश्व के जो सात आश्चर्य बताये गये थे उनमें ताजमहल नहीं आता था मगर पिछले साले एक प्रचार अभियान में इसे जबरदस्ती सातवें नंबर का बनाया गया। इतना ही नहीं अभियान के साथ देशप्रेम जैसे भाव भी जोड़ने के प्रयास हुए। उस समय बाजार का खेल देखकर तो ऐसा लगा था कि जैसे कि ताजमहल कोई नयी इमारत बन रही है। लोगों ने जमकर उस समय टेलीफोन पर संदेश भेजे जिसमें उनका पैसा खर्च हुआ और बाजार ने कमाया। हमने आज के बाजार और प्रचार को देखा तो लगा कि पहले भी ऐसा हो सकता है।
कहते हैैं कि ताजमहल का प्रेम प्रतीक है पर हम इसे विकट भ्रम का प्रतीक मानने लगे हैं। भारतीय अध्यात्म के अनुसार मृत्यु के कार्यक्रमों का विस्तार नहीं होना चाहिये। जिस तरह यह बताया गया कि मुम्ताज को एक साल बाद कब्र से निकालकर यहां दोबारा दफनाया गया, उस पर यकीन करना कठिन लगता है। संभव है बादशाह को इसके लिये रोकने का साहस किसी में नहीं था या लोग भी चाहते थे कि इस राजा का नाम अपने राज्य की वजह से तो लोकप्रिय नहीं होगा इसलिये इसे ताजमहल जैसी इमारत के सहारे बढ़ाया जाये। बादशाह को गद्दी पर बनाये रखना उस समय के पूंजीपतियों, जमीदारों और सेठों की बाध्यता रही होगी। इतना ही नहीं आगरा को विश्व के मानचित्र पर लाने के लिये ताजमहल के साथ प्रेम को जोड़ना आवश्यक लगा होगा इसलिये ऐसा किया गया। वरना सभी जानते हैं कि पंचतत्वों से बनी यह देह धीरे धीरे स्वतः मिट्टी होती जाती है। एक वर्ष कब्र में पड़ी देह में क्या बचा होगा यह देखने की कोशिश शायद इसलिये नहीं की गयी। जहां तक हमारी जानकारी है दुनियां में किसी भी धर्म के मतावलंबी मौत के शोक के विस्तार के रूप में इस तरह के नाटक मे नहीं करते ।
शाहजहां को इस देश का कोई अच्छा शासक नहीं माना जाता। ऐसे में लगता है कि उस समय के बाजार और प्रचार विशेषज्ञों ने उसे प्रेम का उपासक बताकर लोकप्रिय बनाने का प्रयास किया होगा। उस समय आज जैसे शक्तिशाली प्रचार माध्यम नहीं थे इसलिये आपसी बातचीत के जरिये या फिर ढोल वालों से ऐसा प्रचार कराया होगा। हम किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित नहीं हैं और न ही कोई ऐसी कसम खाई है कि दोबारा वहां नहीं जायेंगे-नहीं हमारा किसी के निष्कर्ष से सहमति या असहमति जताने का इरादा है। हम तो अपनी सोच को इधर उधर घुमाते ऐसे ही हैं। अलबत्ता इस बार जब जायेंगे तो उसके ताजमहल, तेजोमहालय या ताजा मोहल्ला होने के नजरिये से विचार जरूर करेंगे। इसका कारण यह है कि आजकल हम अपने सामने वर्तमान को इतिहास बनता देख रहे हैं उसने हमारे मन में ढेर सारे संशय खड़े कर दिये हैं।

कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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दान और कमीशन-व्यंग्य कविता (dan aur comishan-vyangya shayri)


 सरकार और साहुकारों ने

इतने वर्षों से बहुत दान किया है

कि इस देश से पीढ़ियों तक

गरीबी मिट जाती।

अगर कमबख्त

यह कमीशन की रीति

दान बांटने वालों की नीति न बन जाती।

———

नया बनाने के लिये

पुराना समाज टुकड़े टुकड़े

किये जा रहे हैं।

कुछ नया नहीं बन पा रहा है

इसलिये हर टुकड़े को समाज बता रहे हैं।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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हास्य पैदा करने वाला शोक-हिन्दी व्यंग्य (hasya aur shok-hindi vyangya


आप कितने भी ज्ञानी ध्यानी क्यों न हों, एक समय ऐसा आता है जब आपको कहना भी पड़ता है कि ‘भगवान ही जानता है’। जब किसी विषय पर तर्क रखना आपकी शक्ति से बाहर हो जाये या आपको लगे कि तर्क देना ही बेकार है तब यह कहकर ही जान छुड़ाना पड़ती है कि ‘भगवान ही जानता है।’

अब कल कुछ लोगों ने छ दिसंबर पर काला दिवस मनाया। दरअसल यह किसी शहर में कोई विवादित ढांचा गिरने की याद में था। अब यह ढांचा कितना पुराना था और सर्वशक्तिमान के दरबार के रूप में इसका नाम क्या था, ऐसे प्रश्न विवादों में फंसे है और उनका निष्कर्ष निकालना हमारे बूते का नहीं है।
दरअसल इस तरह के सामूहिक विवाद खड़े इसलिये किये जाते हैं जिससे समाज के बुद्धिमान लोगों को उन पर बहस कर व्यस्त रखा जा सकें। इससे बाजार समाज में चल रही हेराफेरी पर उनका ध्यान न जाये। कभी कभी तो लगता है कि इस पूरे विश्व में धरती पर कोई एक ऐसा समूह है जो बाजार का अनेक तरह से प्रबंध करता है जिसमें लोगों को दिमागी रूप से व्यस्त रखने के लिये हादसे और समागम दोनों ही कराता है। इतना ही नहीं वह बहसें चलाने के लिये बकायदा प्रचार माध्यमों में भी अपने लोग सक्रिय रखता है। जब वह ढांचा गिरा था तब प्रकाशन से जुड़े प्रचार माध्यमों का बोलाबाला था और दृष्यव्य और श्रवण माध्यमों की उपस्थिति नगण्य थी । अब तो टीवी चैनल और एफ. एम. रेडियो भी जबरदस्त रूप से सक्रिय है। उनमें इस तरह की बहसे चल रही थीं जैसे कि कोई बड़ी घटना हुई हो।
अब तो पांच दिसंबर को ही यह अनुमान लग जाता है कि कल किसको सुनेंगे और देखेंगे। अखबारों में क्या पढ़ने को मिलेगा। उंगलियों पर गिनने लायक कुछ विद्वान हैं जो इस अवसर नये मेकअप के साथ दिखते हैं। विवादित ढांचा गिराने की घटना इस तरह 17 वर्ष तक प्रचारित हो सकती है यह अपने आप में आश्चर्य की बात है। बाजार और प्रचार का रिश्ता सभी जानते हैं इसलिये यह कहना कठिन है कि ऐसे प्रचार का कोई आर्थिक लाभ न हो। उत्पादकों को अपनी चीजें बेचने के लिये विज्ञापन देने हैं। केवल विज्ञापन के नाम पर न तो कोई अखबार छप सकता है और न ही टीवी चैनल चल सकता है सो कोई कार्यक्रम होना चाहये। वह भी सनसनीखेज और जज़्बातों से भरा हुआ। इसके लिये विषय चाहिये। इसलिये कोई अज्ञात समूह शायद ऐसे विषयों की रचना करने के लिये सक्रिय रहता होगा कि बाजार और प्रचार दोनों का काम चले।
बहरहाल काला दिवस अधिक शोर के साथ मना। कुछ लोगों ने इसे शौर्य दिवस के रूप में भी मनाया पर उनकी संख्या अधिक नहीं थी। वैसे भी शौर्य दिवस मनाने जैसा कुछ भी नहीं है क्योंकि वह तो किसी नवीन निर्माण या उपलब्धि पर मनता है और ऐसा कुछ नहीं हुआ। अलबत्ता काला दिवस वालों का स्यापा बहुत देखने लायक था। हम इसका सामाजिक पक्ष देखें तो जिन समूहों को इस विवाद में घसीटा जाता है उनके सामान्य सदस्यों को अपनी दाल रोटी और शादी विवाह की फिक्र से ही फुरसत नहीं है पर वह अंततः एक उपभोक्ता है और उसका मनोरंजन कर उसका ध्यान भटकाना जरूरी है इसलिये बकायदा इस पर बहसें हुईं।
राजनीतिक लोगों ने क्या किया यह अलग विषय है पर समाचार पत्र पत्रिकाओं, टीवी चैनलों पर हिन्दी के लेखकों और चिंतकों को इस अवसर पर सुनकर हैरानी होती है। खासतौर से उन लेखको और चिंतकों की बातें सुनकर दिमाग में अनेक प्रश्न खड़े होते हैं जो साम्प्रदायिक एकता की बात करते हैं। उनकी बात पर गुस्सा कम हंसी आती है और अगर आप थोड़ा भी अध्यात्मिक ज्ञान रखते हैं तो केवल हंसिये। गुस्सा कर अपना खूना जलाना ठीक नहीं है।
वैसे ऐसे विकासवादी लेखक और चिंतक भारतीय अध्यात्मिक की एक छोटी पर संपूर्ण ज्ञान से युक्त ‘श्रीमद्भागवत गीता’ पढ़ें तो शायद स्यापा कभी न करें। कहने को तो भारतीय अध्यात्मिक ग्रथों से नारियों को दोयम दर्जे के बताने तथा जातिवाद से संबंधित सूत्र उठाकर यह बताते हैं कि भारतीय धर्म ही साम्प्रदायिक और नारी विरोधी है। जब भी अवसर मिलता है वह भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान पर वह उंगली उठाते है। हम उनसे यह आग्रह नहीं कर रहे कि वह ऐसा न करें क्योंकि फिर हम कहां से उनकी बातों का जवाब देते हुए अपनी बात कह पायेंगे। अलबत्ता उन्हें यह बताना चाहते हैं कि वह कभी कभी आत्ममंथन भी कर लिया करें।
पहली बात तो यह कि यह जन्मतिथि तथा पुण्यतिथि उसी पश्चिम की देन है जिसका वह विरोध करते हैं। भारतीय अध्यात्मिक दर्शन तो साफ कहता है कि न आत्मा पैदा होता न मरता है। यहां तक कि कुछ धार्मिक विद्वान तो श्राद्ध तक की परंपरा का भी विरोध करते हैं। अतः भारतीय अध्यात्मिक को प्राचीन मानकर अवहेलना तो की ही नहीं जा सकती। फिर यह विकासवादी तो हर प्रकार की रूढ़िवादिता का विरोध करते हैं कभी पुण्यतिथि तो कभी काला दिवस क्यों मनाते हैं?

सांप्रदायिक एकता लाने का तो उनका ढोंग तो उनके बयानों से ही सामने आ जाता है। उस विवादित ढांचे को दो संप्रदाय अपनी अपनी भाषा में सर्वशक्तिमान के दरबार के रूप में अलग अलग नाम से जानते हैं पर विकासवादियों ने उसका नाम क्या रखा? तय बात है कि भारतीय अध्यात्म से जुड़ा नाम तो वह रख ही नहीं सकते थे क्योंकि उसके विरोध का ही तो उनका रास्ता है। अपने आपको निष्पक्ष कहने वाले लोग एक तरफ साफ झुके हुए हैं और इसको लेकर उनका तर्क भी हास्यप्रद है कि वह अल्प संख्या वाले लोगों का पक्ष ले रहे है क्योंकि बहुसंख्या वालों ने आक्रामक कार्य किया है। एक मजे की बात यह है कि अधिकतर ऐसा करने वाले बहुसंख्यक वर्ग के ही हैं।
इस संसार में जितने भी धर्म हैं उनके लोग किसी की मौत का गम कुछ दिन ही मनाते हैं। जितने भी धर्मो के आचार्य हैं वह मौत के कार्यक्रमों का विस्तार करने के पक्षधर नहीं होते। कोई एक मर जाता है तो उसका शोक एक ही जगह मनाया जाता है भले ही उसके सगे कितने भी हों। आप कभी यह नहीं सुनेंगे कि किसी की उठावनी या तेरहवीं अलग अलग जगह पर रखी जाती हो। कम से कम इतना तो तय है कि सभी धर्मों के आम लोग इतने तो समझदार हैं कि मौत का विस्तार नहीं करते। मगर उनको संचालित करने वाले यह लेखक और चिंतक देश और शहरों में हुए हादसों का विस्तार कर अपने अज्ञान का ही परिचय ही देते हैं। । इससे यह साफ लगता है कि उनका उद्देश्य केवल आत्मप्रचार होता है।
आखिरी बात ऐसे ही बुद्धिजीवियों के लिये जो भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान से दूर होकर लिखने में शान समझते हैं। उनको यह जानकर कष्ट होगा कि श्रीगीता में अदृश्य परमात्मा और आत्मा को ही अमर बताया गया है पर शेष सभी भौतिक वस्तुऐं नष्ट होती हैं। उनके लिये शोक कैसा? यह प्रथ्वी भी कभी नष्ट होगी तो सूर्य भी नहीं बचेगा। आज जहां रेगिस्तान था वहां कभी हरियाली थी और जहां आज जल है वहां कभी पत्थर था। यह ताजमहल, कुतुबमीनार, लालाकिला और इंडिया गेट सदियों तक बने रहेंगे पर हमेशा नहीं। यह प्रथवी करोड़ों साल से जीवन जी रही है और कोई नहीं जानता कि कितने कुतुबमीनार और ताज महल बने और बिखर गये। अरे, तुमने मोहनजो दड़ो का नाम सुना है कि नहीं। पता नहीं कितनी सभ्यतायें समय लील गया और आगे भी यही करेगा। अरे लोग तो नश्वर देह का इतना शोक रहीं करते आप लोग तो पत्थर के ढांचे का शोक ढो रहे हो। यह धरती करोड़ों साल से जीवन की सांसें ले रही है और पता नहीं सर्वशक्तिमान के नाम पर पता नहीं कितने दरबादर बने और ढह गये पर उसका नाम कभी नहीं टूटा। बाल्मीकि रामायण में कहा गया है कि भगवान श्रीरामचंद्र जी के पहले भी अनेक राम हुए और आगे भी होंगे। मतलब यह कि राम का नाम तो आदमी के हृदय में हमेशा से था और रहेगा। उनके समकालीनों में परशुराम का नाम भी राम था पर फरसे के उपयोग के कारण उनको परशुराम कहा गया। भारत का आध्यात्मिक ज्ञान किसी की धरोहर नहीं है। लोग उसकी समय समय पर अपने ढंग से व्याख्या करते हैं। जो ठीक है समाज उनको आत्मसात कर लेता है। यही कारण है कि शोक के कुछ समय बाद आदमी अपने काम पर लग जाता है। यह हर साल काला दिवस या बरसी मनाना आम आदमी को भी सहज नहीं ल्रगता। मुश्किल यह है कि उसकी अभिव्यक्ति को शब्दों का रूप देने के लिये कोई बुद्धिजीवी नहीं मिलता। जहां तक सहजयोगियों का प्रश्न है उनके लिये तो यह व्यंग्य का ही विषय होता है क्योंकि जब चिंतन अधिक गंभीर हो जाये तो दिमाग के लिये ऐसा होना स्वाभाविक ही है
सबसे बड़ी खुशी तो अपने देश के आम लोगों को देखकर होती है जो अब इस तरह के प्रचार पर अधिक ध्यान नहीं देते भले ही टीवी चैनल, अखबार और रेडियो कितना भी इस पर बहस कर लें। यह सभी समझ गये हैं कि देश, समाज, तथा अन्य ऐसे मुद्दों से उनका ध्यान हटाया जा रहा है जिनका हल करना किसी के बूते का नहीं है। यही कारण है कि लोग इससे परे होकर आपस में सौहार्द बनाये रखते हैं क्योंकि वह जानते हैं कि इसी में ही उनका हित है। वैसे तो यह कथित बुद्धिजीवी जिन अशिक्षितों पर तरस खाते हैं वह इनसे अधिक समझदार है जो देह को नश्वर जानकर उस पर कुछ दिन शोक मनाकर चुप हो जाते हैं। ऐसे में उनसे यही कहना पड़ता है कि ‘भई, नश्वर निर्जीव वस्तु के लिये इतना शोक क्यों? वह भी 17 साल तक!
हां, चाहें तो कुछ लोग उनकी हमदर्दी जताने की अक्षुण्ण क्षमता की प्रशंसा भी कर सकते हैं।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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हिन्दू अध्यात्मिक संदेश-विद्वान विपत्तियों का पहले अनुमान कर लेते है (hindi dharm sandesh-vidavan aur vipatti)


अशिक्षितनयः सिंहो हन्तीम केवलं बलात्।
तच्च धीरो नरस्तेषां शतानि जतिमांजयेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
सिंह किसी नीति की शिक्षा लिये बना सीधे अपने दैहिक बल से ही आक्रमण करता है जबकि शिक्षित एवं धीर पुरुष अपनी नीति से सैंकड़ों को मारता है।
पश्यदिभ्र्दूरतोऽप्रायान्सूपायप्रतिपत्तिभिः।
भवन्ति हि फलायव विद्वादभ्श्वन्तिताः क्रिया।।
हिन्दी में भावार्थ-
विद्वान तो दूर से विपत्तियों को आता देखकर पहले ही से उसकी प्रतिक्रिया का अनुमान कर लेता है और इसी कारण अपनी क्रिया से उसका सामना करता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सिंह बुद्धि बल का आश्रय लिये बिना अपने बल पर एक शिकार करता है पर जो मनुष्य ज्ञानी और धीरज वाला है वह एक साथ सैंकड़ों शिकार करता है। महाराज कौटिल्य का यह संदेश आज के संदर्भ में देखें तो पता लगता है कि हमारे देश में लोगों की समझ इसलिये कम है क्योंकि वह अपने अध्यात्मिक साहित्य आधुनिक शिक्षा में पढ़ाया नहीं जाता। अंग्रेज हिंसा से इस देश में राज्य नहीं कर पा रहे थे तब उन्होंने अपने विद्वान मैकाले का यह जिम्मेदारी दी कि वह कोई मार्ग निकालें। उन्होंने ऐसी शिक्षा पद्धति निकाली कि अब तो अंग्रेज ब्रिटेन में हैं पर अंग्रेजियत आज भी राज्य कर रही है। अब तलवारों से लड़कर जीतने का समय गया। अब तो फिल्म, शिक्षा, धारावाहिक, समाचार पत्र, किताबें तथा रेडियो से प्रचार कर भी सैंकड़ों लोगों को गुलाम बनाया जा सकता है। इनमें फिल्म और टीवी तो एक बड़ा हथियार बन गया है। आप फिल्में और टीवी की विषय सामग्रंी देखकर उसका मनन करें तो पता लग जायेगा कि जाति, धर्म, और भाषा के गुप्त ऐजेडे वहीं से लागू किये जा रहे हैं। फिल्म और टीवी वाले तो कहते हैं कि समाज में जो चल रहा है वही दिखा रहे हैं पर सच तो यह है कि उन्होंने अपनी कहानियों में ईमानदार लोगों का परिवार समेत तो हश्र दिखाया वह कहीं नहीं हुआ पर उनकी वजह से समाज डरपोक होता चला गया और आज इसलिये अपराधियों में सार्वजनिक प्रतिरोध का भय नहीं रहा। वजह यह थी कि इन फिल्मों में अपराधियों का पैसा लगता रहा था। फिल्मों के अपराधी पात्र गोलियों से दूसरों को निशाना बनाते थे पर उनको नायक के हाथ से पिटते हुए दिखाया गया। स्पष्टतः संदेश था कि आप अगर नायक नहीं हो तो आतंक या बेईमानी से लड़ना भूल जाओ। इस तरह समाज को डरपोक बना दिया गया और अब तो पूरी तरह से अपराधियों को महिमा मंडन होने लगा है।
अगर आप कभी फिल्म या टीवी धारवाहिकों की पटकथा तथा अन्य सामग्री देखें और उस पर चिंतन करें तो हाल पता लग जायेगा कि उसके पीछे किस तरह के प्रायोजक हैं? यह एक चालाकी है जो धनवान और शिक्षित लोग करते हैं। अंग्रेज लोग हमारे धार्मिक ग्रंथों को खूब पढ़ते रहे होंगे इसलिये उन्होंने एसी शिक्षा पद्धति थोपी कि उनसे यह देश अपनी प्राचीन विरासत से दूर हो जाये। अब क्या हालत है कि जो अंग्रेज जो कहें वही ठीक है। वह अपनी परंपराओं तथा भाषा के कारण आज भी यहां राज्य कर रहे हैं। उनकी दी हुई शिक्षा पद्धति यहां गुलाम पैदा करती है जो अंग्रेजों की सेवा के लिये वहां जाकर उनकी सेवा के लिये तत्पर रहते हैं।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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समाचार हिन्दी में-व्यंग्य कविता (news in hindi-satire poem)


समाचार भी अब फिल्म की तरह

टीवी पर चलते हैं।

हास्य पैदा करने वाले विज्ञापनों के बीच

दृश्यों में हिंसा के शिकार लोगों की याद में

करुणामय चिराग जलते हैं।

——–

समाचार भी खिचड़ी की तरह

परदे पर सजाये जाते हैं।

ध्यान रखते हैं कि 

हर रस वाला समाचार

लोगों को सुनाया जाये

किसी को हास्य तो किसी को वीर रस

अच्छा लगता है

कुछ लोग करुणारस पर

मंत्र मुग्ध हो जाते हैं।

कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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समन्दर पीने से भी प्यास नहीं बुझेगी (samandar se bhee pyas nahin bujhegee)


सभी लोग हमेशा दूसरे के सुख देखकर मन में अपने लिये उसकी कमी का विचार करते हुए अपने को दुःख देते हैं। दूसरे का दुःख देकर अपने आपको यह संतोष देते हैं कि वह उसके मुकाबले अधिक सुखी हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि लोग बहिर्मुखी जीवन व्यतीत करते हैं और अपने बारे में उनके चिंतन के आधार बाह्य दृश्यों से प्रभावित होते हैं। यह प्रवृत्ति असहज भाव को जन्म देती है। इसके फलस्वरूप लोग अपनी बात ही सही ढंग से सही जगह प्रस्तुत नहीं करते। अनेक जगह इसी बात को लेकर विवाद पैदा होते हैं कि अमुक ने यह इस तरह कहा तो अमुक ने गलत समझा। आप अगर देखें तो कुदरत ने सभी को जुबान दी है पर सभी अच्छा नहीं बोलकर नहीं कमाते। सभी को स्वर दिया है पर सभी गायक नहीं हो जाते। भाषा ज्ञान सभी को है पर सभी लेखक नहीं हो जाते। जिनको अपने जीवन के विषयों का सही ज्ञान होता है तथा जो अपने गुण और दुर्गुण को समझते हैं वही आगे चलकर समाज के शिखर पर पहुंचते हैं। इस संदर्भ में दो कवितायें प्रस्तुत हैं।
सोचता है हर कोई
पर अल्फाजों की शक्ल और
अंदाज-ए-बयां अलग अलग होता है
बोलता है हर कोई
पर अपनी आवाज से हिला देता है
आदमी पूरे जमाने को
कोई बस रोता है।।
—————
पी लोगे सारा समंदर भी
तो तुम्हारी प्यास नहीं जायेगी।
ख्वाहिशों के पहाड़ चढ़ते जाओ
पर कहीं मंजिल नहीं आयेगी।
रुक कर देखो
जरा कुदरत का करिश्मा
इस दुनियां में
हर पल जिंदगी कुछ नया सिखायेगी।
__________________________

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योगासन, प्राणायाम, ध्यान और धारणा-हिन्दी लेख (hindi lekh on yogasan)


                प्राचीन भारतीय योग साधना पद्धति की तरफ पूरे विश्व का रुझान बढ़ना कोई अस्वाभाविक घटना नहीं है। आज से दस वर्ष पूर्व तक अनेक लोग योगसाधना को अत्यंत गोपनीय या असाधारण बात समझते थे। ऐसी धारणा बनी हुई थी कि योग साधना सामान्य व्यक्ति के करने की चीज नहीं है। इसका कारण यह था कि शरीर के लिये विलासिता की वस्तुओं का उपभोग बहुत कम था और लोग शारीरिक श्रम के कारण बीमार कम पड़ते थे।
आज की नयी पीढ़ी के लोगों जहां भी वाहन का स्टैंड देखते हैं वहां पर पैट्रोल चालित वाहनों को अधिक संख्या में देखते हैं जबकि पुरानी पीढ़ी के लोगों के अनुभव इस बारे में अलग दिखाई देते हैं। पहले इन्हीं स्टैंडों पर साइकिलें खड़ी मिलती थीं। सरकारी कार्यालय, बैंक, सिनेमाघर तथा उद्यानों के बाहर साइकिलों की संख्या अधिक दिखती थी। फिर स्कूटरों की संख्या बढ़ी तो अब कारों के काफिले सभी जगह मिलते हैं। पहले जहां रिक्शाओं, बैलगाड़ियों तथा तांगों की वजह से जाम लगा देखकर मन में क्लेश होता था वहीं अब कारें यह काम करने लगी हैं-यह अलग बात है कि गरीब वाहन चालकों को लोग इसके लिये झिड़क देते थे पर अब किसी की हिम्मत नहीं है कार वाले से कुछ कह सके।

         योगसाधना की शिक्षा बड़े लोगों का शौक माना जाता था। यह सही भी लगता है क्योंकि परंपरागत वाहनों तथा साइकिल चलाने वालों का दिन भर व्यायाम चलता था। उनकी थकान उनको रात को चैन की नींद का उपहार प्रदान करती थी। उस समय ज्ञानी लोगों का इस तरफ ध्यान नहीं गया कि लोगों को योगासन से अलग प्राणायाम तथा ध्यान की तरफ प्रेरित किया जाये। संभवतः योगासाधना के आठों अंगों में से पृथक पृथक सिखाने का विचार किसी ने नहीं किया। अब जबकि विलासिता पूर्ण जीवन शैली है तब योगसाधना की आवश्यकता तीव्रता से अनुभव की जा रही है तो उसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए। पहले जब लोग पैदल अधिक चलने के साथ ही परिश्रम करते थे इसलिये उनका स्वास्थ्य सदैव अच्छा रहता था । बाद में साइकिल युग के चलते भी लोगों के स्वास्थ्य में शुद्धता बनी रही। फिर योग साधना को केवल राजाओं, ऋषियों और धनिकों के लिये आवश्यक इसलिये भी माना गया क्योंकि वह शारीरिक श्रम कम करते थे जबकि बदलते समय के साथ इसे जनसाधारण में प्रचारित किया जाना चाहिये था। भले ही शारीरिक श्रम से लोगों का लाभ होता रहा है पर प्राणायाम से जो मानसिक लाभ की कल्पना किसी ने नहीं की। श्रमिक तथा गरीब वर्ग के लिये योगासन के साथ प्राणायाम और ध्यान का भी महत्व अलग अलग रूप से प्रचारित किया जाना जरूरी लगता है। यह बताना जरूरी है कि जो लोग शारीरिक श्रम के कारण रात की नींद आराम से लेते हैं उनको भी जीवन का आनंद उठाने के लिये प्राणायाम और ध्यान करना चाहिये।

             अब योग साधना के आठ भाग देखकर तो यही लगता है कि उसके आठ अंगों को -यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि-एक पूरा कार्यक्रम मानकर देखा गया। सच तो यह है कि जो लोग परिश्रम करते हैं या सुबह सैर करके आते हैं उनको नियम, प्राणायम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि जैसे अन्य सात अंगों का भी अध्ययन करना चाहिये। योगासन या सुबह की सैर के बाद प्राणायम और ध्यान की आदत डालना श्रेयस्कर है। जो लोग गरीब, मजदूर तथा अन्य शारीरिक श्रम करते हैं उनके लिये भी प्राणायाम के साथ ध्यान बहुत लाभप्रद है। इस बात का प्रचार बहुत पहले ही होना चाहिये था इसलिये अब इस पर भी इस पर काम होना चाहिये। प्राणायाम से प्राणवायु तीव्र गति से अंदर जाकर शरीर और मन के विकारों को परे करती है। उसी तरह ध्यान भी योगासन और प्राणायाम के बाद प्राप्त शुद्धि को पूरी देह और मन में वितरित करने की एक प्रक्रिया है। जब कभी आप थक जायें और सोने की बजाय आंखें बंद कर केवल बैठें और अपने ध्यान को भृकुटि पर केंद्रित करके देखें। शुरुआत में आराम नहीं मिलेगा पर पांच दस मिनट बाद आप को अपने शरीर और मन में शांति अनुभव होगी। जैसे मान लीजिये आप किसी समस्या से परेशान हैं। वह उठते बैठते आपको परेशान करती है। आप ध्यान लगा कर बैठें। समस्या हल होना एक अलग मामला है पर ध्यान के बाद उससे उपजे तनाव से राहत अनुभव करेंगे। सच बात तो यह है कि हम अपने दिमाग और शरीर को बहुत खींचते हैं और उसको बिना ध्यान के विराम नहीं मिल सकता। यह को व्यायाम नहीं है एक तरह से पूर्णाहुति है उस यज्ञ की जो हम अपनी देह के लिये करते हैं। शेष फिर कभी। संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior http://terahdeep.blogspot.com …………………………..

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रामचरित मानस की चर्चा-चिंतन आलेख (ramcharit manas-hindi article)


रामचरित मानस लिखने के 387 वर्ष बाद एक संत ने यह शोध प्रस्तुत किया है कि उसमें व्याकरण और भाषा की तीन हजार गल्तियां हैं। हाय! भगवान राम जी के भक्त यह सुनकर उद्वेलित हो जायेंगे कि ‘देखो, रामचरित मानस का अपमान हो रहा है।’

शायद ऐसा न हो क्योंकि वह भारतीय धर्म से ही जुड़े एक संत हैं अगर ऐसा न होता तो उस पर अनेक लोग क्रोध प्रकट कर चुके होते। तुलसीदासजी ने रामचरित मानस बड़े पावन हृदय से लिखा था इसमें संदेह नहीं है। एक तो कवि मन होता ही बहुत भोला है दूसरे उन्होंने पहले ही अपने विरोधियों को यह बता दिया था कि उनका भाषा ज्ञान अल्प है-क्षमा याचना भी पहले ही कर ली थी।
यह अलग बात है कि 387 वर्ष बाद -भई, यह आंकड़ा हमें टीवी पर ही सुनाई दिया, अगर गलती हो तो क्षमा हम भी मांग लेते हैं- एक संत को यह क्या सूझा कि उसमें दोष ढूंढने बैठ गये। अगर कोई प्रगतिशील होता तो उस पर तमाम तरह की फब्तियां कसी जा सकती थीं यह कहते हुए कि ‘आप तो उसमें दोष ही ढूंढोगे’ मगर वह तो विशुद्ध रूप से पंरपरावादी विद्वान हैं। फिर संत! हमारे समाज मे जो भी कोई संतों का चोगा पहन ले वह पूज्यनीय हो जाता है-फिर लोग उसकी नीयत का फैसला उसी पर छोड़कर उसे प्रणाम करते हुए अपनी राह पकड़ते हैं। वैसे आजकल तो कथित संतों पर फब्तियां कसने वालों की कमी नहीं है पर वह लोग भी सावधानी बरतते हैं कि कहीं अधिक न लिखें।

हम भाषा से पैदल रहे हैं-इससे कमी से स्वतः ही अवगत हैं। कभी कभी कोई शब्द लिखने से कतराते हैं कि कहीं पढ़ने वाले भाषा ज्ञान को संदिग्ध न मान ले। हिंदी के बारे में हमारे गुरु की बस एक ही बात हमारे गले उतरी कि ‘जैसी बोली जाती है वैसी लिखी जाती है।’ फिर इधर हमने यह भी बात गांठ बांधली है कि ‘यहां हर पांच कोस पर बोली बदल जाती है’,मतलब किसी शब्द पर कोई बहस करे तो उससे पूछ लेते हैं कि हमसे कितना दूर रहता है? उसके पता बताने पर जब अपने घर से पांच कोस की दूरी अधिक मिलती है तो कह देते हैं कि-‘भई, हमारे इलाके में ऐसा ही है। तुम ठहरे दूर इलाके के। हमारे यहां जैसा बोला जाता है वैसा ही तो लिखा भी जायेगा न! हिंदी का नियम है।’
मगर संतों से बहस कैसे करें-तिस पर तुलसीदास जी की भाषा हिंदी की सहयोगी भाषा रही हो तब तो और भी कठिन है-संभव हो वह संत उस भाषा के ज्ञाता हों और उनके निवास की पांच कोस की परिधि मेें ही रहते हों। फिर हम तो उस प्रदेश के बाहर के ही हैं जहां तुलसीदास जी बसते थे और संभवतः संत उन्हीं के प्रदेश के हैं। एक बात तय रही कि तुलसीदास कोई दूसरा बन नहीं सकता-पर बनने की चाहत सभी में है। कई लोग इसके लिये संघर्ष करते हुए स्वर्ग में जगह बनाने में सफल रहे पर नहीं मिला तो तुलसीदास जी जैसा वह पद, जिसकी जगह लोगों के हृदय में सदैव रहती है।

तुलसीदास जी की रामचरित मानस न केवल भाषा साहित्य बल्कि अध्यात्मिक दृष्टि से भी बहुत महत्व रखती है। पहले एक पुस्तक आती थी जिसमें तुलसीदास जी को समाज का पथप्रदर्शक न बताकर पथभ्रष्ट बताया जाता था। उसमें बताया गया कि उन्होंने बाल्मीकी रामायण के श्लोकों का हुबहु अनुवाद भर किया है। इसके अलावा भी तमाम तरह की टीका टिप्पणियां भी थी।
इस पर हमने एक अखबार में संपादक के नाम पत्र में लिखा था-हां, हमारे अधिकतर कचड़ा चिंतन वहीं जगह पाते थे-कि ‘चलिये, सब बात मान ली। मगर एक बात हम कहना चाहते हैं कि उस दौर में जब समाज के सामने वैचारिक संकट था तब भगवान श्रीराम जी के चरित्र को लगभग लुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी संस्कृत भाषा से निकालकर देशी भाषा में इतने बृहद ढंग से प्रस्तुत करने का जो काम तुलसीदास जी ने किया उसके लिये समाज उनका हमेशा ऋणी रहेगा। इसका केवल साहित्य महत्व नहीं है बल्कि उन्होंने राम को इस देश जननायक बनाये रखने की प्रक्रिया को निरंतरता प्रदान की जो संस्कृत के लुप्त होने के बाद बाधित हो सकती थी। वैसे राम चरित्र भारत में सदियों गाया जाता रहेगा पर रामचरित मानस ने उसे एक ऐसा संबल दिया जिससे उसमें अक्षुण्ण्ता बनी रहेगी।’
वैसे तुलसीदासकृत राम चरित मानस एक भाव ग्रंथ है। उसमें शब्द गलत हों या सही पर वह पढ़ने वाले के हृदय को उनके भाव वैसे ही छूते हैं जैसे उनका अर्थ है। उसमें भाषा और व्याकरण संबंध त्रुटियों को निकलाने की क्षमता शायद ही किसमें हो क्योंकि अपने यहां बोली वाकई हर पांच कोस पर बदलती है। अभी भी गांव से जुड़े शिक्षित लोग शहर में आकर ‘इतके आ’, ‘काहे चलें’ ‘वा का मोड़ा’ तथा कई ऐसे शब्द बोलते हैं पर उनकी बात पर कोई आपत्ति नहीं करता। वजह! वह अपने अर्थ के अनुसार भाव को संपूर्णता से प्रकट करते हैं। इनको आप भाषा संबंधी त्रुटि मानकर अपनी अज्ञानता और असहजता का परिचय देते हैं।
आखिरी बात संत कहते हैं कि दूसरे में दोष मत देखो। उनकी बात सिर माथे पर। संत एक सामाजिक चिकित्सक हैं इसलिये उनको तो इलाज करने के लिये दोष और विकार देखने ही पड़ते हैं-यह भी सच! मगर एक सच यह भी है कि संत को किसीके दोषों की चर्चा दूसरों के सामने-कम से कम सार्वजनिक रूप से-तो नहीं करना चाहिए। वैसे उस संत की महत्ता ज्ञानियों की दृष्टि में कम हो जाती है जो दूसरों के दोष इस तरह गिनाते हैं। कहते हैं कि तुलसीदासकृत रामचरित मानस में तीन हजार गल्तियां ढूंढने वाले विद्वान ने स्वयं भी अस्सी पुस्तके लिखी हैं, मगर इससे उनको इस तरह की टिप्पणी से बचना ही चाहिये था।
आप कितने भी अच्छे हिंदी भाषी ज्ञाता हों पर लेखक अच्छे नहीं हो जाते। लेखक होते हैं तो भी पाठक पसंद करे तो यह जरूरी नहीं। यह सच है कि लिखने में जितना हो सके त्रुटियों से बचें पर यह भी याद रखें दूसरे के लिखे का अगर भाव सही मायने में प्रकट हो तो आक्षेप न करना ही अच्छा। दूसरी बात हिंदी का यह नियम याद रखें कि जैसी बोली जाती है वैसी ही लिखी जाती है। ऐसे में यह भी देखना चाहिये कि लेखक किस इलाके का है और उसका शब्द कहीं ऐसे ही तो नहीं बोला जाता। सच तो यह है कि तुलसीदास जी की रामचरित मानस एक शाब्दिक या साहित्य रचना नही बल्कि भाव ग्रंथ है और उसमें तीन लाख त्रुटियां भी होती तो इसकी परवाह कौन करता जब समाज का वह अभिन्न हिस्सा बन चुका है। वैसे इसकी टीवी पर चर्चा सुनी तो लगा कि संभव है कि इस बहाने उस पर अपनी विद्वता दिखाने और प्रचार पाने का एक नुस्खा हो।
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नए स्वांग और मुखौटे-हास्य व्यंग्य कविताएँ (svang aur mukhaute-hindi satire poem)


रोज रचते हैं नया स्वांग
चेहरे पर लगाते नए मुखौटे
और बदलकर आते हैं कपड़े
मगर छद्म होकर भी करते हैं हमेशा लफड़े.
आदमी अपना बाहर का रूप
कितना भी बदल ले
अदाओं से पहचाना जाता है,
जहां स्वर बदले
शब्दों से पकड़ा जाता है,
खुलकर सांस लेने से घबड़ाते हैं जो लोग
छिपकर करते वार
पर अपने हथियारों की शकल
और तौरतरीकों से जाते हैं पकड़े.

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अपनी महफ़िल में उन्होंने बुलाया नहीं
हमारी परवाह न होने का अहसास जताया.
खूब चिराग जलाए उन्होंने
पर अन्दर के अँधेरे में
चमकता रहा हमारा चेहरा और नाम
बड़ी मेहनत से उन्होंने छिपाया.
हमारा नाम लेने पर उन्होंने
अपने मेहमान पर गुस्सा दिखाकर
अपनी नापसंदगी दिखाई
पर सच है कि जो खौफ है
उनके दिमाग में
हमारे हाथ से जलते चिरागों से
ज़माने के रौशन होने का
वही अनजाने में बाहर आया.

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सेल के रोग का इलाज नहीं-हास्य व्यंग्य कविता (sel rog ka ilaj-hasya vyangyakavita)


अपने साथ फंदेबाज एक पर्चा लेकर आया
और हाथ में देते हुए बोला-
‘दीपक बापू,
बूढ़े आदमियों के लिये
तैयार कपड़ों की एक सेल लगी है
चलो तुम्हें वहां से
टोपी, कुर्ता धोती और स्वेटर दिलवायें
बहुत पुराने लगते हैं तुम्हारी तरह
तुम्हारें कपड़े भी सजायें।
यह ठीक है अभी तक फ्लाप हो
चिंता की बात नहीं
पर कल हिट हो जाओगे
तो कैसे सम्मेलनों में अपना चेहरा दिखाओगे
सेल में एक चीज पर एक मुफ्त है
एक रख लेना रोज पहनने के लिये
दूसरा बाहर के लिये रख लेना
चलो तो मौके का पूरा फायदा उठायें।’

सुनते ही भड़के फिर
अपनी पुरानी टोपी की तरफ
निहारते हुए बोले दीपक बापू
‘कमबख्त, हमारे फ्लाप होने का ताना
देने के लिये कोई बहाना ढूंढ जरूर लेना
अरे, इस टोपी, धोती और स्वेटर के
पुराने होने पर तुम्हें तरस आ रहा है
पर कोई दूसरा तो नहीं गा रहा है
एक के साथ एक फ्री ले आये थे
पहले इसी इरादे से
पर दोनों ही घिस गये
अंतर्जाल पर टाईप करते
पर हमारे ब्लाग अभी आहें भरते
पैकिंग में धोती, कुर्ता, टोपी और स्वेटर
बहुत अच्छे दिखे
पर घर लाये तो सभी में छेद दिखे
फिर तुम सभी जगह हमारे
फ्लाप होने की कथा सुना रहे हो
आपने हिट दोस्त होने का अच्छा साथ भुना रहे हो
हम किस हाल में है
भला कौन पाठक जानता है
इतना ही ठीक है
इस ‘एक के साथ एक फ्री’ में
पगला गये हैं कई लोग
जिसका इलाज नहीं है
ऐसा बन गया है यह सेल का रोग
हम तो मुफ्त में ब्लाग लिखने के साथ
यह दूसरा फ्री का रोग नहीं पाल सकते
रुपये भला कैसे लगायें।
दो रोग पालना एक साथ मूर्खता है
यह तुम्हें कैसे समझायें’’
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जब उनके पुतलों की पोल खुल जायेगी-हिंदी कविता (putlon ki pol-hindi hasya kavita)


पर्दे के पीछे वह खेल रहे हैं
सामने उनके पुतले डंड पेल रहे हैं।
आत्ममुग्धता हैं जैसे जमाना जीत लिया
समझते नहीं भीड़ के इशारे
अपनी उंगलियों से पकड़ी रस्सी से
मनचाहे दृश्य वह मंच पर ठेल रहे हैं।
भीड़ में बैठे हैं उनके किराये के टट्टू
जो वाह वाही करते हैं
तमाम लोग तो बस झेल रहे हैं।
खेल कभी लंबा नहीं होता
कभी तो खत्म होगा
सच्चाई तो सामने आयेगी
जब उनके पुतलों की पोल खुल जायेगी
तब जवाब मांगेंगे लोग
हम भी यही सोचकर झेल रहे हैं।

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खाली ज़ेब का रुआब-हास्य व्यंग्य कविता (khali zeb ka ruaab-hindi hasya kavita)


सूखी मन गयी दिवाली
क्योंकि जेब थी खाली,
ज़माने में अपना रुआब दिखाने के
लिए सबसे कह रहे हैं”हैप्पी दीवाली”.

जेब खाली हो तो
अपना चेहरा आईने में देखते हुए भी
बहुत डर लगता है
अपने ही खालीपन का अक्स
सताने लगता है।

क्यों न इतरायें दौलतमंद
जब पूरा जमाना ही
आंख जमाये है उन पर
और अपने ही गरीब रिश्ते से
मूंह फेरे रहता है।

अपना हाथ ही जगन्नाथ
फिर भी लगाये हैं उन लोगों से आस
जिनके घरों मे रुपया उगा है जैसे घास
घोड़ों की तरह हिनहिना रहे सभी
शायद मिल जाये कुछ कभी
मिले हमेशा दुत्कार
फिर भी आशा रखे कि मिलेगा पुरस्कार
इसलिये दौलतमंदों के लिये
मुफ्त की इज्जत और शौहरत का दरिया
कमअक्लों की भीड़ के घेरे में ही बहता है।

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खेल और हवा-हिंदी व्यंग्य लघुकथा (khel aur hava-hindu laghu katha)


उसने एक फुटबाल ली और उस पर लिख दिया धर्म। वह उस फुटबाल के साथ एक डंडा लेकर उस मैदान में पहुंच गया जहां गोल पोस्ट बना हुआ था। तमाम लोग वहां तफरी करने आते थे इसलिये वह पहले जोर से चिल्लाया और बोला-‘है कोई जो सामने आकर मुझे गोल करने से रोक सके।’
उसने अपनी आंखों पर चश्मा लगा लिया था। उसका डीलडौल और हाथ में डंडा देखकर लोग डर गये और फिर वह शुरु हो गया उसके गोल करने का सिलसिला। एक के बाद एक गोल कर वह चिल्लाता रहा-है कोई जो मेरा सामना कर सके। देखों धर्म को मैं कैसे लात मारकर गोल कर रहा हूं।’
लोग देखते और चुप रहते। कुछ बच्चे शोर बचाते तो कुछ बड़े कराहते हुए आपस में एक दूसरे का सांत्वना देते कि कोई तो माई का लाल आयेगा जो उसका गोल रोकेगा।’
उसी समय एक ज्ञानी वहां से निकला। उसने यह दृश्य देखा और फिर उसके पास जाकर बोला-‘क्या बात है? सामने कोई गोल पर तो है नहीं जो गोल किये जा रहे हो।’
वह बोला-‘तुम सामने आओ। मेरा गोल रोककर दिखाओ। यह फुटबाल मैंने एक कबाड़ी से खरीदी है और मैं चाहता हूं कि कोई मेरे से गोल गोल खेले।

ज्ञानी ने कहा-‘ यह होता ही है। अगर फुटबाल है तो खेलने का मन होगा। डंडा है तो उसे भी किसी को मारने का मन आयेगा। ऐसे में तुम्हारे साथ कोई नहीं खेलने आयेगा।’
उसने कहा-‘तुम ही खेल लो। दम है तो आ जाओ सामने।’
ज्ञानी ने उससे फुटबाल हाथ में ली और उसकी हवा भरने के मूंह पर जाकर उसका ढक्कन खोल दिया। वह पूरी हवा निकल गयी।
वह चिल्लाने लगा और बोला-‘अरे, डरपोक हवा निकाल दी। अभी डंडा मारता हूं।’
ज्ञानी ने कहा-‘फंस जाओगे। यहां बहुत सारे लोग हैं। फुटबाल पर तुमने धर्म लिखकर लोगों की भावनाओं को संशकित कर दिया था पर अब वह यहीं आयेंगे। देखो वह आ रहे हैं।’
उसने देखा कि लोग उसकी तरफ आ रहे हैं। ज्ञानी ने कहा-‘तुम अब घर जाओ। यह तुम नहीं फुटबाल थी जो तुमसे खेल रही थी। फुटबाल में हवा भरी थी जो उसके साथ तुम्हें भी उड़ा रही थी। वैसे तुम्हारी देह भी हवा से चल रही है पर यह हवा तुम्हारे दिमाग को भी चला रही थी। अब न यह फुटबाल चलेगी न डंडा।’
वह ज्ञानी ऐसा कहकर चल दिये तो तफरी करने आये एक सज्जन ने पूछा-‘पर आपने सब क्यों और कैसे किया?’
ज्ञानी ने कहा-‘मैंने कुछ नहीं किया। यह तो हवा ने किया है। उसे फुटबाल में भरी हवा ने बौखला दिया था। वह निकल गयी तो उसके लिये अपना यह नाटक जारी रखना कठिन था। मुझे करना ही क्या था? उसके कहने पर उसके साथ फुटबाल खेलने से अच्छा है कि उसकी हवा निकाल कर मामला ठंडा कर दो। फुटबाल खेलता तो वह गोल रोकने को लेकर विवाद करता। मेरे गोल पर आपत्तियां जताता। उसको छोड़ कर जाता तो वह यहां भीड़ के लोगों को बेकार में डराता। इससे अच्छा है कि धर्म नाम लिखकर झगड़ा बढ़ाने की उसकी योजना को फुटबाल में से हवा निकाल कर बेकार कर दिया जाये।’
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बहस कि कामेडी-हिंदी लघु व्यंग्य (disscusion as a comedy-hindi satire)


                 उस उद्यान में ज्ञानियों के बीच देश की गरीबी मिटाने के लिये बहस चल रही थी। विषय था देश में गरीबी और शौषण खत्म कैसे किया जाये। सभी सजधजकर बहस करने आये थे। सभी वक्ता अपने अपने विचार रख रहे थे।
            एक ने कहा ‘हमें गरीबों के दिमाग में अपने अधिकार के लिये चेतना जगाने का अभियान छेड़ना चाहिये।
           वहीं एक फटीचर आदमी भी बैठा था। उसने उठकर पूछा-‘पर कैसे? क्या कहें गरीबों से जाकर कि अमीरों का पैसा छीन लो!’
               सभा के संचालक ने उसे बिठा दिया और कहा‘-आप आमंत्रित वक्ता नहीं है इसलिये बहस मत करिये।’
              दूसरे वक्ता ने कहा-‘हमें एक आंदोलन छेड़ना चाहिये।’
              वह फटीचर फिर उठकर खड़ा हो गया और बोला-‘बहस और आंदोलन तो बरसों से चल रहे हैं।’
            संचालक फिर चिल्लाया-‘चुपचाप बैठ जाओ। वरना बाहर फैंक दिये जाओगे। हम कितने गंभीर विषय पर बहस कर रहे हैं और तुम अपनी टिप्पणियां मुफ्त में दिये जा रहे हो।’
              वह फटीचर आदमी वहां से चला गया तो एक विद्वान ने दूसरे से पूछा-‘यह कौन फटीचर यहां आ गया था।’
            दूसरे ने कहा-‘पता नहीं।’
           वहीं एक दूसरा फटीचर आदमी र्बैठा था वह बोला-‘वह मेरा दोस्त था। पहले किताबें पढ़कर बहुत बहस कर चुका है पर जब से बहुत ज्ञानी हो गया तब से उसने ऐसी बहसें बंद कर दी हैं। अलबत्ता कभी कभी चला आता है ऐसी बहसें देखने। क्योंकि इसे इसमें कामेडी नजर आती है।’
            यह बात सुनते ही दोनों विद्वानों का खूल खौल उठा वह बोले-‘तू हमारी बहस को कामेडी कहता है।’
वह दोनों उठकर खड़े गये और चिल्लाने लगे कि‘यह हमारी बहस को कामेडी कह रहा है। इसे मारो पीटो।’
            सब लोग उस पर चढ़ पड़े। वह चिल्लाता रहा‘मैं नहीं वह कहता है।’
             उसके पुराने कपड़ों में पहले ही पैबंद लगे थे वह और अधिक फट गये। जब वह पिट पिटकर बेहोश हो गया तब उसे छोड़ दिया गया। विद्वान फिर बहस करने लगे। कुछ देर बात उसे होश आया तो वह दोनों विद्वान वहीं बैठे बहस में व्यस्त थे। उसने उनसे कहा-‘यार, मैं थोड़े ही कहता हूं। वह कहता है। तुम दोनों ने मुझे क्यों क्यों पिटवाया।’
          उनमें से एक ने कहा-‘हम विद्वान है कोई सामान्य आदमी नहीं।  सांप को निकलने देते हैं उसके बाद लकीर पीटते हैं।’
       वह बिचारा वापस अपने दोस्त के पास पहुंचा और पूरा हाल बताकर बोला-‘यार, किस मुसीबत में फंसा मुझे फँसकर इस तरह भाग निकले। हम तो सोच रहे थे कि विद्वान लोग हैं शांति से सभी की बात सुनते होंगे पर  हैं पर वह हिंसा पर उतर आये।’
            उसने जवाब दिया-‘यह भ्रम मुझे भी होता था। इसलिये तुझसे कहता हूं कि ऐसी जगहों पर अधिक मत रुका करो। वहां बहस वही करते हैं जो किताबी ज्ञानी हैं। कबीरदास जी कह गये हैं कि किताब पढ़ने वालों को अहंकार आ ही जाता है। मैं भी तुझसे कहता हूं कि ऐसी बहसें कामेडी नाटक की तरह हैं क्योंकि किताबी ज्ञानी लकीर के फकीर होते हैं पर वहां सबके बीच में नहीं कहा। सच बात भी सही जगह और सही समय पर बोलना चाहिये। बस तुम्हारे और मेरे बीच यही अंतर है। इसलिये मैं तुम्हें अल्पज्ञानी कहता हूं। मैंने खतरा देखा तो निकल लिया और तुम फंसं गये।’

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पसंद कि नापसंद-हास्य व्यंग (hindi comedy satire)


एक सज्जन ने मन्नत मांगी थी कि अगर उनको कभी कहीं से कोई सम्मान प्राप्त होगा तो वह किसी नये कवि का सम्मेलन करायेंगे। इससे तो उनका सम्मान का प्रचार तो होगा ही साहित्य में नयी पीढ़ी को आगे लाने के लिये भी प्रसिद्धि मिलेगी। दरअसल उन्होंने अपने बेकारी के दिनों में अनेक कवितायें लिखी थी जिनका एक किताब के रूप में प्रकाशन कराया। उन्होंने अपने मित्र को वह कविता दिखाई तो उसने कहा-‘‘चुपचाप इनको रख लो। यह कवितायें तुम्हारी मजाक बनवायेंगी। अलबत्ता जब तुम्हारे सपंर्क बन जायें तो इस किताब के सहारे कोई सम्मान वगैरह जुगाड़ लेना क्योंकि तुम जिस तरह अपने व्यवसाय में आगे जा रहे हो तुम्हारे लिये अच्छे अवसर हैं।’’
वह सज्जन अनेक तरह के ठेके लिया करते थे। ढेर सारी किताबें रखने के लिये उन्होंने एक अलमारी बनवायी थी जिस पर रोज अगरबत्ती जलाकर घुमाते।
इधर समय के साथ उनके व्यवसाय के साथ बड़े और प्रतिष्ठित लोगों से संपर्क बढ़ रहे थे। एक कारखाने में निर्माण का ठेका उनको मिला। वह कंपनी अवार्ड वगैरह भी बांटा करती थी। दरअसल उसका यह समाज कल्याण अभियान बड़े लोगों से संपर्क बढ़ाने के लिये था और वह अपने को फायदा देने वालों को सम्मानित भी कर चुकी थी। ठेकेदार सज्जन की उसी कंपनी के प्रबंधक से बातचीत हुई। ठेकेदार सज्जन को मालुम था कि यह कंपनी अवार्ड वगैरह बांटती है इसलिये वह प्रबंधक से अधिक प्रगाढ़ संबंध बनाने लगे। एक दिन उन्होंने प्रबंधक से कहा-‘आप हमें साहित्य के लिये अपना अवार्ड दिलवा दीजिये। आपका कमीशन दुगना कर देता हूं।’
प्रबंधक ने कहा-‘पहले वह किताब दिखाओ। नहीं दिखाना है तो कमीशन तीन गुना करो।’
ठेकेदार सज्जन बहुत खुश हो गये। मन ही मन कहने लगे कि‘यह बेवकूफ है, अगर चार गुना भी कहता तो देता।’
उन्होंने अपनी सहमति दी। इस तरह यह इनाम उनको मिल गया। वह भी साहित्यकार के रूप में। शहर भर के साहित्यकारों को तो मानो सांप सूंध गया। हरेक कोई एक दूसरे से पूछा रहा था कि ‘यह कौन महाकवि इस शहर में रहता है जो हमारी नजर से नहीं गुजरा। कभी किसी मंच पर नही देखा। उसका अखबार में नहीं पढ़ा।’
सम्मान मिलना तो सो मिल गया। एक दो आलोचक उनके घर पहुंच गये और कविता के शीर्षकों से ही समीक्षा अखबारों में लिखकर छाप दी। ठेकेदार सज्जन ने बकायदा आलोचकों की खातिर की। इधर उनके मन में बस एक ही बात थी कि किसी नये लेखक का एकल पाठ कराकर अपनी वह मिन्नत पूरी करूं जो किसी दिन मन में आ गयी थी। भले ही दस वर्ष बाद यह पूरी हुई पर मिन्नत का मान रखना भी जरूरी था। मुश्किल यह थी कि पहले उन्होंने नये कवि को अच्छी खासी रकम देने का विचार रखा था पर इधर खर्चा इतना हो गया कि वह सोच रहे थे कि सस्ते में निपट जाये। इसी चिंता में रहते थे। घर से बाहर एक दिन एक लड़का उनको मिल गया जिसके बारे में उनको पता लगा कि उसकी कोई कविता कहीं छपी थी-यह दावा वह मोहल्ले में करता फिर रहा था।

उन्होंने उससे पूछा-‘‘क्यों गंजू उस्ताद, कैसी चल रही है तुम्हारी कवितागिरी।’’
गंजू उस्ताद ने कहा-‘आपसे तो अच्छी नहीं चल रही। अब सोच रहा हूं कि मैं भी ठेकेदारी शुरु करूं। बहुत दिनों से काम तलाश रहा हूं। सोच रहा हूं कि आपको गुरु बना लूं। हो सकता है एक दो अवार्ड अपने किस्मत में भी आ जाये।’
ठेकेदार सज्जन ने कहा-‘अरे, कहां ठेकेदारी के चक्कर में पड़े हो। तुम तो अपनी कविता सविता के साथ आनंद करो।’
गंजू उस्ताद बीच में ही बोल पड़ा-‘‘छि…छि………चुप हो जाईये। अभी अभी तो मेरी शादी हुई है। किसी ने सुना लिया कि सविता से मेरा चक्कर था तो गड़बड़ हो जायेगी।’’
ठेकेदार ने कहा-‘‘कविता के साथ मैंने तो ऐसे ही सविता जोड़ दिया। इधर मैं सोच रहा हूं कि तुम्हारा काव्य पाठ करवा दूं। इससे तुम्हें प्रचार मिलेगा और मुझे भी तसल्ली होगी कि साहित्य की सेवा की।’’
गंजू उस्ताद बोला-‘‘हां, पर अब आप मुझे उस्ताद न कहकर कवि नाम से पुकारें। आप अवसर दे रहे हैं तो अच्छी बात है। आप तैयारी करिये मैं अपनी नयी नवेली पत्नी के पास जाकर उसे यह खबर देता हूं। वह मुझे निठल्ला कहने के साथ ही कवितायें जलाने की धमकी देती है। इधर पिताजी भी कह रहे हैं कि अब तेरी शादी हो गयी तो कुछ कमाई करो। आप कितना पैसे देंगे।’’
ठेकेदार ने कहा-‘‘अरे, तुम्हें एक कवि सम्मेलन मिल गया तो फिर रास्ता खुल जायेगा। यही क्या कम है?’’
गंजू उस्ताद मान गया। वह गया तो ठेकेदार सोचने लगा कि ‘कितना बेवकूफ है कि अगर पांच सात सौ रुपये भी मांगता तो मैं देता।’
एक पार्क में बने बनाये मंच पर गंजू उस्ताद का एकल कविता पाठ प्रारंभ हुआ। मगर वह नया था उसे क्या मालुम कि कवितायें ठेली जाती हैं श्रोताओं की परवाह किये बिना। वह हर कविता पर श्रोताओं से पूछता-‘‘आप बताईये कि यह कविता आपको पसंद आयी।’’
लोग चिल्लाये -‘‘नापसंद नापसंद’’।
इस तरह उसने दस कवितायें सुनायी। अब तो हर कविता की समाप्ति पर लोग चिल्लाते-‘‘नापसंद नापसंद।’’
गंजू उस्ताद के बारे में यह कहा जाता है कि जब वह घर में अपने माता पिता से नाराज होता तो अपने कपड़े फाड़ने और बाल नौचने लगता था। इतना ही नहीं फिर घर से बाहर आकर ऐसे ही पत्थर उड़ाने लगता। यह बचपन की बात थी पर जब लोगों ने उसे इस तरह प्रताड़ित किया तो खिसियाहट में अपने बाल्यकाल में चला गया। वह अपने कपड़े फाड़ने लगा। उधर से लोग चिल्लाये ‘‘पसंद पसंद’’।
वह बाल नौचने लगा। लोग चिल्लाये-‘‘पसंद पसंद’’।
वह मंच से उतर गया और पत्थर उछालने लगा। लोग चिल्लाने लगे ‘‘पसंद पसंद।’’
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे ठेकेदार सज्जन भाग निकले। उनके पीछे गंजू उस्ताद भी भाग निकला। पीछे से लोग भी चिल्लाते हुए भागे-‘पसंद पसंद’
बाद में वह ठेकेदार सज्जन से मिला-‘‘और कुछ नहीं तो मेरे कपड़े फट गये उसके पैसे दे दो। आपको पता है कि वह शादी में मुझे ससुराल से मिले थे। आपके कार्यक्रम को सफल बनाने के लिये मैंने उनको फाड़ डाला। तभी तो लोग चिल्ला रहे थे ‘पसंद पसंद’। वरना तो ‘नापसंद नापसंद’ कर पूरा कार्यक्रम ही बरबाद किये दे रहे थे।’’
ठेकेदार सज्जन बोले-‘बेशरम आदमी! तुम्हारी वजह से मेरी बदनामी हुई है। मैंने तुम्हार काव्य पाठ सुनने के लिये कार्यक्रम करवाया था या लोगों की पसंद नापसंद जानने के लिये। अरे, यह भीड़ है इस पर चाहे जितना अपनी कवितायें या कहानी थोप दो चुपचाप झेलती है। अगर बोलने का अवसर दो तो फिर यही करती है जो तुम्हारे साथ किया।’
गंजू उस्ताद उदास होकर चला गया। इधर ठेकेदार सज्जन सोचने लगे कि‘अगर जिद्द करता तो एक दो हजार मैं दे ही देता। चलो अच्छा है चला गया। मुझे तो अपना प्रचार मिल ही गया न!
……………………

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विदुर नीति- दुष्ट की सलाह पर व्यक्ति चले तो उससे दूर रहें (vidur niti-raja aur dusht ki salah)


न निह्यवं मन्त्र गचछेत संसृष्टमन्त्रस्य कुसंगतस्य।
न च ब्रूयात्रश्वसिमि त्वयीति संकारणं व्यपदेशं तु कुर्यात्
हिंदी में भावार्थ-
जब कहीं भरी सभा में राजा-वर्तमान संदर्भ में कहें तो अपने से शक्तिशाली व्यक्ति-दुष्ट सलाहकारों से सलाह ले रहा है तब उसकी किसी बात का खंडन नहीं करना चाहिये। साथ ही वहां उसके प्रति किसी प्रकार का अविश्वास भी नहीं प्रकाट करना चाहिये।

न विश्वासाज्जातु परस्य गेहे गच्छेन्नरश्चेतवानो विकालो।
न चत्वरे निशि तिष्ठिन्न्गिुडो राजकाययां योषितं प्रार्थचीत।।
हिंदी में भावार्थ-
सावधानी की दृष्टि से कभी भी किसी ऐसे व्यक्ति के घर सायंकाल नहीं जाना चाहिये जिस पर विश्वास न हो। रात में छिपकर चैराहे पर न खड़ा हो और राजा-वर्तमान संदर्भ में हम उसे अपने से शक्तिशाली व्यक्ति भी कह सकते हैं-जिस स्त्री को पाना चाहता है उसे पाने का प्रयत्न नहीं करना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन में सावधानी से चलना बहुत आवश्यक है। अगर हम अपने आसपास ऐसे लोगों को देखें जिन्होंने धोखा खाकर कष्ट उठाया या जीवन से हाथ धोया है तो उनकी स्वयं की असावधानी का परिणाम होता है। ऐसे में जीवन में कुछ सावधानी रखकर अगर आनंद उठाया जा सकता है तो उसमें कोई दोष नहीं है। जिस व्यक्ति के प्रति मन में अविश्वास हो उसके घर शाम को कतई नहीं जाना चाहिये। हमारे जीवन में कई ऐसे लोग हैं जिनके साथ हमारा सतत संपर्क रहता है पर हम उन पर विश्वास नहीं करते ऐसे लोगों के घर जाने पर ऐसी सावधानी जरूरी है।
उसी तरह कहीं ऐसी सभा हो रही हो जहां अपने से शक्तिशाली व्यक्ति मौजूद हो और वह मूर्ख तथा दुष्ट प्रकृत्ति के लोगों से सलाह ले रहा हो तो उसका प्रतिवाद नहीं करना चाहिये। शक्तिशाली व्यक्ति से तो हम वैसे ही लड़ सकते पर अगर दुष्ट अपने प्रतिवाद से उत्तेजित हो गया तो प्रहार भी कर सकता है और अपमान भी। शक्तिशाली व्यक्तियों को चाटुकारिता बहुत पंसद होती है और वह अपने चाटुकारों की रक्षा के लिये किसी भी सज्जन व्यक्ति पर शारीरिक या शाब्दिक आक्रमण कर सकते हैं।
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सविता भाभी ने किया सच का सामना-हिन्दी हास्य कविता (savita bhabhi ne kiya sach ka samana-hasya kavita)


नाम कुछ दूसरा था पर
नायिका सविता भाभी रखकर वह
सच का सामना प्रतियागिता में पहुंची
और एक करोड़ कमाया।
प्रतिबंधित वेबसाईट की कल्पित नायिका को
अपने में असली दर्शाया।
यह देखकर उसका रचयिता
छद्म नाम लेखक कसमसाया।
पीसने लगा दांत
भींचने लगा मुट्ठी और
गुस्से में आकर एक जाम बनाया।
पास में बैठे दूसरे
पियक्कड़ ब्लाग लेखक से बोला
‘‘यार, कैसी है यह अंतर्जाल की माया।
अपनी नायिका तो कल्पित थी
यह असल रूप किसने बनाया।
हम जितना कमाने की सोच न सके
उससे ज्यादा इसने कमाया।
हमने इतनी मेहनत की
पर टुकड़ों के अलावा कुछ हाथ नहीं आया।’

दूसरे पियक्कड़ ब्लाग लेखक ने
अपने मेहमान के पैग का हक
अदा करते हुए उसे समझाया
‘यार, अच्छा होता हम असल नाम से लिखते
अपने कल्पित पात्र के मालिक तो दिखते
हम तो सोचते थे कि
यौन विषय पर लिखना बुरा काम है
पर देखो हमारे से प्रेरणा ले गये
यह टीवी चैनल
कर दिया सच का सामना का प्रसारण
जिसमें ऐसी वैसी बातें होती खुलेआम हैं
हम तो हिंदी भाषा के लिये रास्ता बना रहे थे
यह हिंदी टीवी चैनल अंग्रेजी का खा रहे थे
हमारी हिंदी की कल्पित पात्र
सविता भाभी को असली बताकर
अपना कार्यक्रम उन्होंने सजाया,
पर हम भी कुछ नहीं कर सकते
क्योंकि अपना नाम छद्म बताया।
जब लग गया प्रतिबंध तो
हम ही नहीं गये उसे रोकने तो
कोई दूसरा भी साथ न आया।
हमारी कल्पित नायिका ने
हमको नहीं दिया कमाकर जितना
उससे ज्यादा टीवी चैनल वालों ने कमाया।
यह टीवी वाले उस्ताद है
ख्यालों को सच बनाते
और सच को छिपाते
नकली को असली बताने की
जानते हैं कला
इसलिये सविता भाभी का भी पकड़ लिया गला
अपने हाथ तो बस अपना छद्म नाम आया।

…………………………
नोट-यह हास्य कविता एक काल्पनिक रचना है और किसी भी घटना या व्यक्ति से इसका लेनादेना नहीं है। अगर संयोग से किसी की कारिस्तानी से मेल हो जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार होगा।
………………………….
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दिल का दिमाग से रिश्ता-हिंदी कविता (dil aur dimag-hindi sahityak kavita)


दिल में कुछ
दिमाग में कुछ
जुबां से दूसरे बोल ही निकल आते हैं।
दिल का दिमाग से
दिमाग का जुबां से रिश्ता
भला कितने लोग जान पाते हैं।
दूसरों से संवाद क्या करेंगे
अपने ही भाव नहीं पढ़ पाते हैं।
……………….
अर्थहीन शब्द
औपचारिक संवाद
सुनने की आदत हो गयी है।
दोस्ती और रिश्तों की भीड़ में
आत्मीयता ढूंढती थक चुकीं
मन की आंखें, अब सो गयी हैं।

…………………….

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बीस और पचास का खेल-हास्य व्यंग्य कविताएँ (play for twenty and fifty-hindi hasya vyangya kavitaen


उन्होंने तय किया है कि
एक दिन में पचास ओवर की
जगह बीस ओवर वाले मैच खेलेंगे।
देखने वाले तो देखेंगे
जो नहीं देखने वाले
वह तो व्यंग्य बाण ऐसे भी फैंकेंगे।

सच है जब बीस रुपये खर्च से भी
हजार रुपया कमाया जा सकता है तो
पचास रुपये खर्च करने से क्या फायदा
फिल्म हो या खेल
अब तो कमाने का ही हो गया है कायदा
पचास ओवर तक कौन इंतजार करेगा
जब बीस ओवर में पैसे से झोला भरेगा
मूर्खों की कमी नहीं है जमाने में
मैदान पर दिखता है जो खेल
उस पर ही बहल जाते हैं लोग
नहीं देखते कि खिलाड़ियों को
अभिनेता की तरह पर्दे के पीछे
कौन लगा है नचाने में
पैसा बरस रहा है खेल के नाम पर
फिल्म वाले भी लग गये उसमें काम पर
दाव खेलने वाले भी
जल्दी परिणाम के लिये करते हैं इंतजार
खिलाने वाले भी
अब हो रहे हैं बेकरार
पैसे का खेल हो गया है
खेलते हैं पैसे वाले
निकल चुके हैंे कई के दिवाले
खाली जेब जिनकी है
बन जाते समय बरबाद करने वाले
अभिनेताओं में भगवान
खिलाड़ियों में देवता देखेंगे।

कहें दीपक बापू
‘नकली शयों का शौकीन हो गया जमाना
चतुरों को इसी से ही होता कमाना
पर्दे के नकली फरिश्तों के जन्म दिन पर
प्रचार करने वाले नाचते हैं
मैदान पर बाहर की डोर पर
खेलने वालों के करतबों पर
तकनीकी ज्ञान फांकते हैं
जब हो सकती है दो घंटे में कमाई
तो क्यों पांच घंटे बरबाद करेंगे
बीस रुपये में काम चलेगा तो
पचास क्यों खर्च करेंगे
आम आदमी हो गया है
मन से खाली मनोरंजन का भूखा
जुआ खेलने को तैयार, चाहे हो पैसे का सूखा
जिनके पास दो नंबर का पैसा
वह खुद कहीं खर्च करें या
उनके बच्चे कहीं फैंकेंगे।
खेल हो या फिल्म
जज्बातों के सौदागर तो
बस! अपना भरता झोला ही देखेंगे।

…………………………..


पर्दे पर आंखों के सामने
चलते फिरते और नाचते
हांड़मांस के इंसान
बुत की तरह लगते हैं।
ऐसा लगता है कि
जैसे पीछे कोई पकड़े है डोर
खींचने पर कर रहे हैं शोर
डोर पकड़े नट भी
खुद खींचते हों डोर, यह नहीं लगता
किसी दूसरे के इशारे पर
वह भी अपने हाथ नचाते लगते हैं
………………………
चारो तरफ मुखौटे सजे हैं
पीछे के मुख पहचान में नहीं आते।
नये जमाने का यह चालचलन है
फरिश्तों का मुखौटा शैतान लगाते।

……………………

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दोनों तूफान में फंसे थे-हिंदी कविता(rishton men tufan-hindi poem)


हम दोनों तूफान में फंसे थे
उनको सोने की दीवारों का
सहारा मिला
हम ताश के पतों की तरह ढह गये।

अब गुजरते हैं जब उस राह से
यादें सामने आ जाती हैं
कभी अपनो की तरह देखने वाली आंखें
परायों की तरह ताकती हैं
रिश्ते समय की धारा में यूं ही बह गये।
जुबां से निकलते नहीं शब्द उनके
पर इशारे हमेशा बहुत कुछ कह गये।

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नकली खून और डाक्टर-हास्य व्यंग्य (nakle khoon aur dactor-hindi hasya vyangya)


डाक्टर साहब बाहर ही मिल गये। उस समय वह एक किराने वाले से सामान खरीद रहे थे और हम पहले लेचुके सामान का पैसा उसे देने गये थे। दुपहिया से जैसे ही उतरे डाक्टर साहब से नमस्कार किया और पैसा देकर जैसे ही वापस मुड़े तो डाक्टर साहब ने पूछा-‘कहीं बाजार जा रहे हैं।’
हमने कहा-‘हां, आज अवकाश का दिन है सोच रहे हैं कि बाजार जाकर घूमे और सामान खरीद लायेें।’
डाक्टर साहब बोले-हां, सप्ताह में एक बार बाजार जाना स्वास्थ्य के लिये अच्छा होता है। आदमी रोज घर का खाना खाते हुए उकता जाता है, इसलिये कभी बाजार में खाना बुरा नहीं है।’
हम रुक गये और उनकी तरफ घूर कर देखा और कहा-‘पर एक बार जब हम बीमार पड़े थे तब आपने कहा था कि बाजार का खाना ठीक नहीं होता। तब से लगभग हमने यह कार्य बंद ही कर दिया है।’
वह बोले-‘हां, पर यह छह वर्ष पहले की बात है। वैसे आजकल आप सुबह योग कर लेते हैं इसलिये अब आपको इतनी परेशानी नहीं आयेगी। वैसे क्या आपने वाकई बाजार का खाना पूरी तरह बंद कर दिया है।’
हमने कहा-‘अधूरी तरह किया था पर अब तो टीवी वगैरह ने नकली घी, तेल, दूध, चाय तथा खोये का ऐसा खौफ भर दिया है कि बाजार में खाने के सामान की खुशबू नाक को कितना भी परेशान करे पर उस पर अपना ध्यान नहीं जाने देते।’
डाक्टर साहब बोल-‘हां, यह तो सही है पर सभी जगह थोड़े ही नकली सामान मिल रहा है।’
हमने कहा-‘आपकी बात सही है पर हम करें क्या? आधा आपने डराया और आधा इन टीवी वालोें ने। जैसे आपकी सलाह के बाद हमने योग साधना शुरु की वैसे ही बाहर का खाना भी बंद कर दिया है।’
डाक्टर साहब बोले-‘ आप अपने स्वास्थ्य के प्रति आप सजग है, यह अच्छी बात है। वैसे आप बहुत दिनों से घर नहीं आये।’
हमने हंसते हुए कहा-‘डाक्टर साहब, आपके घर आने से बचने के लिये तो रोज सुबह इतनी मेहनत करते हैं। पहले आपकी और अब टीवी वालों की चेतावनी को इसलिये ही याद रखते हैं क्योंकि हमें आपके घर आने से डर लगता है। अनेक बार तो बुखार और जुकान की बीमारियों से स्वतः ही निपटते हैं क्योंकि सोचते हैं कि हमने जो खराब खाना खाया है उसका दुष्प्रभाव कम होते ही सब ठीक हो जायेगा।’
डाक्टर साहब हंस पड़े-हां, वैसे भी हम छोटी मोटी बीमारियों का इलाज करते हैं पर बड़ी बीमारी के लिये तो बड़े डाक्टर के पास मरीज को भेजना ही पड़ता है।’
हमने बातों ही बातों में उनसे पूछा-‘डाक्टर साहब आप नकली खून की पहचान कर सकते हैं।’
वह एकदम बोले-‘हम तो होम्योपैथी के डाक्टर हैं। इसके बारे में ज्यादा नहीं जानते अलबत्ता टीवी पर देखा तो हैरान रह गये।’
हमने कहा-‘मतलब यह है कि कभी किसी को बड़ी बीमारी हो और उसमें दूसरे का खून शरीर में देना जरूरी हो तो आपके पास न आयें। आपने तो हमारी उम्मीद ही तोड़ दी।’
डाक्टर साहब बोले-‘आपकी बात सुनकर मेरा ध्यान अपने चचेरे भाई की तरफ चला गया है। एक किडनी खराब होने के कारण वह एक अस्पताल में भर्ती है और उसे निकाला जाने वाला है। उसके लिये भी खून की जरूरत है। मैं अभी जाकर अपने दूसरे चचेरे भाई को फोन कर कहता हूं कि जरा देखभाल कर खून ले आये।’
डाक्टर साहब के चेहरे पर चिंता के भाव आ गये और वह शीघ्र वहां से चले गये। एक डाक्टर की आंखों में ऐसे चिंता के भाव देखकर हमें हैरानी हुई साथ ही यह चिंता भी होने लगी कि कहीं हमें अपने या किसी अन्य के लिये खून की जरूरत हुई तो क्या करेंगे? ऐसे में हमें सिवाय इसके कुछ नहीं सूझता तो फिर योग साधना का विचार आता है। सोचने लगे कि थोड़ी योग साधना से छोटी बीमारियों को ठीक कर लेते हैं तो क्यों न कल से अधिक अधिक कर बड़ी बीमारियों को अपने से दूर रखने का प्रयास करें। हालांकि कभी कभी लगता है कि इनसे अच्छा तो टीवी देखना ही बंद कर दें। वह बहुत सारी चिंतायें देने लगता है। कहा भी गया है कि ‘चिंता सम नास्ति शरीरं शोषणम्।’
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hindi aritcle, hindi laghu katha, hindi vyangya, खून, डाक्टर, बीमारी, मनोरंजन, हिंदी साहित्य

हिन्दी के कवि और शायर बिना पढ़े ही गीता पर लिखते हैं-हिन्दी आलेख (Hindi poet writes on without reading the Gita – Hindi article)


              अक्सर अनेक कवितायें, शायरियों गीत, और गद्य रचनायें हमारे सामने आती हैं जिसमें भारतीय धर्म ग्रंथों के साथ ही अन्य धर्मों की पवित्र पुस्तकें भूलकर इंसान से प्रेम करने का संदेश शामिल होता है। जिन कवियों और शायरों को देशभक्ति, एकता और धार्मिक सद्भावना सुसज्जित कर अपनी रचनाओं में दिखानी होती है वह अक्सर भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों के साथ ही अन्य धार्मिक ग्रंथों पर भी बरसने लगते हैं। इस पर कोई आपत्ति नहीं करता क्योंकि अपने देश के लोगों का यह रवैया है कि चलो हमारे साथ दूसरे धर्म की पुस्तक को भी भुलाने की बात तो कही। हमारा कान पकड़ तो दूसरे का भी तो नहीं छोड़ा।
              अगर कोई कवि या शायर अकेली यह बात कहे कि श्री रामायण या श्री रामचरित मानस पढ़ना छोड़ दो, श्रीगीता और वेद पुराण और श्रीगीता भूल जाओ तो उस पर हाहाकार मच जायेगा। लोग उस पर छद्म धर्मनिरपेक्ष होने का आरोप लगा देंगे। अगर उसने किसी अन्य धर्म का नाम लिया तो उस पर सांप्रदायिक होने का आरोप लग जायेगा। अगर भारतीय अध्यात्म ग्रंथों के साथ अन्य धर्म की पुस्तकों को त्यागने की बात कोई शायर, कवि या निबंधकार कहता है तो कोई उस पर ध्यान नहीं देता। चलो हमें काना कहा तो दूसरे को भी तो एक आंख वाला कहा।
                अगर कोई अन्य भारतीय धर्मग्रंथ की बात कहे तो हम भी मुंह  फेर सकते हैं पर जब मामला श्रीगीता का हो तब बात हमें कुछ जमती नहीं। हमें याद है कि बचपन में हमने जब हिंदी का प्रारंम्भिक ज्ञान प्राप्त किया था तब महाभारत ग्रंथ पढ़ते समय हमने श्रीगीता को पढ़ा था तब समझ में नहीं आया, पर कहते हैं कि बचपन में कोई बात भले ही समझ में न आये पर उसका अर्थ कहीं न कहीं आदमी के जेहन में रहता है। यही हाल हमारे साथ श्रीगीता का हुआ। अन्य किसी धर्मग्रंथ से जब भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथ की तुलना किसी फिल्मी या साहित्यक गीत, कविता, शायरी या आलेख में होती तो हम सहजता से लेते पर श्रीगीता का नाम आते ही असहज होते हैं। जब हिंदी का पूर्णता से ज्ञान हुआ तब पता लगा कि यह दुनियां की इकलौती ऐसी पुस्तक है जिसमें ज्ञान और विज्ञान है। समय के साथ हम भी चलते रहे पर श्रीगीता का ज्ञान कहीं न कहीं हमारे मस्तिष्क में रहा। इस पर अनेक लेख समाचार पत्रों में भेजे पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। तब हम सोचते थे कि हो सकता है कि हमारे लिखे में कमी हो।

               इधर जब से अंतर्जाल पर लिखने का सौभाग्य मिला तो हमने सोचा कि चलो यहां अपनी अध्यात्मिक भूख भी मिटा लो। ऐसा करते हुए हमारा ध्यान श्रीगीता की तरफ जाना स्वाभाविक था। सच बात तो यह है कि अंतर्जाल पर लिखने से पहले हम इतना नहीं लिखते थे पर कहते हैं कि लिखते लिखते लव हो जाये। जब भी अवसर मिलता है श्रीगीता पर अवश्य लिखते हैं और यही लिखते लिखते हमें ऐसा लग रहा है कि या तो हम ही कुछ दिमाग से विचलित हैं या फिर शायर और कवि लोग ही सतही रूप से लिखते रहे हैं। एक तरह से वह कार्ल माक्र्स और अंग्रेजों के चेलों की संगत में नारे और वाद ढोने आदी हो गये हैं।
                नारों और वाद पर चलने के आदी हो चुके इस समाज से यह आशा ही नहीं करना चाहिये कि वह कवियों और शायरों की चालाकियों को समझकर उनकी योग्यता पर उंगली उठाये। हम तो दूसरी बात कहते हैं कि जिस विषय पर आप जानते नहीं उस पर नहीं लिखें। हमने केवल भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथ ही पढ़े हैं इसलिये उन पर लिखते हैं-वह भी सकारात्मक पक्ष में। न तो हमने विदेशी लेखकों को पढ़ा है न ही गैर भारतीय धर्म ग्रंथों को देखा है इसलिये उन पर नहीं लिखते। उनकी आलोचना भी नहीं करते क्योंकि उर्दू शायरों की यह प्रवृत्ति हमें बिल्कुल नहीं भाती कि बिना जाने ही किसी विषय पर भी कुछ लिखने लगो।
एक सवाल हमारे दिमाग में आता है कि अगर कोई अन्य धर्म का भारतीय व्यक्ति भारतीय धर्म ग्रंथ पर कुछ प्रतिकूल बात कहता है तो हम उस पर चढ़ दौड़ते हैं चाहे भले ही उसने अपने धर्म ग्रंथ पर भी प्रतिकूल लिखा या कहा हो पर अगर कोई भारतीय धर्म का व्यक्ति ऐसा करे तो उसे हम सामान्य कहकर नजरअंदाज करते हैं-क्या यह हमारी बौद्धिका संकीर्णता का प्रमाण नहीं है।
              दरअसल हुआ यह है कि उर्दू शायरों की लच्छेदार शायरियों से प्रभावित होकर जब देश के लोग वाह वाह करने लगे होंगे तो तो हिंदी कवि भी इसी राह पर चल पड़े होंगे। इसमें भी एक पैंच हैं। भले ही उर्दू और हिंदी समान भाषायें लगती हैं पर दोनों का भाव अलग है। एक बार धर्म को लेकर मामला बढ़ गया था तब एक विद्वान ने कहा कि अंग्रेजी में रिलीजन शब्द का भाव सीमित है पर हिंदी में धर्म शब्द का भाव बहुत व्यापक है। यही हाल उर्दू का है। उर्दू का प्यार शब्द दैहिक संबंधों तक ही सीमित है जबकि हिंदी का प्रेम शब्द इतना व्यापक है कि उसे इंसान के अलावा सर्वशक्तिमान और अन्य जीवों से भी जोड़ जाता है और उसे तभी समझा जा सकता है जब हमारे अपने आध्यात्मिक ज्ञान के प्रति आस्था हो। मुख्य बात संकल्प की है और हिंदी के प्रेम शब्द का उच्चारण करते ही हमारे अंदर समस्त जीवों के प्रति दया, करुणा और सहृदयता का भाव आता है।

                बात कहां से शुरु हुई और कहां पहुंच गयी। उर्दू शायरों में केवल श्रोताओं और लेखकों में सतही भाव पैदा करने की ललक होती है। इसके विपरीत हिंदी कवियों में इसके साथ ही अध्यात्मिक ज्ञान जाग्रत करने का भाव भी पैदा होता है। मगर उर्दू शायरों की सफलता ने हिंदी कवियों को भी पथभ्रष्ट कर दिया है। यही कारण है कि कबीर, रहीम, तुलसी और मीरा के बाद फिर कोई कवि रत्न पैदा ही नहीं हुआ। यह शिकायत नहीं है और न ही किसी कवि विशेष के विरुद्ध प्रचार है बल्कि अपनी बात कहने का अंतर्जाल पर कहने का जो अवसर मिला है उसका लाभ उठाने का एक प्रयास भर है। हमें तो हर पाठक और लेखक प्रिय है। जो लिखने और पढ़ने में परिश्रम करते हैं। परिश्रम करने वालों का प्रेम करते हुए उनका सम्मान करना चाहिये- श्रीगीता को पढ़ने और समझने के बाद हम इसी निष्कर्ष पर पहुंचे हैं। शेष फिर कभी

…………………………………

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वह कौनसी तराजू है-हिन्दी व्यंग्य कविता (taraju-hasya kavita)


कामयाबी की कीमत
मुद्रा में आंकी जाने लगी है।
इज्जत और दिल के चैन का
मोल लोग भूल गये हैं
ढेर सारी दौलत एकत्रित कर
प्रतिष्ठा का भ्रम पाले
अपने पांव तले
दूसरे इंसान को कुचलने की चाहत
हर इंसान में जगी है।
…………………………
वह कौनसी तराजू हैं
जिसमें इंसान की इज्जत
और दिल का चैन तुल जाये।
दौलत के ढेर कितने भी बड़े हों
फिर भी उनमें कोई द्रव्य नहीं है
जिसमें दिल का अहसास उसमें घुल जाये।
………………………..

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पहरेदार-हिंदी लघुकथा/ कहानी (paharedar-a short hindi story)


एक बेकार आदमी साक्षात्कार देने के लिये जा रहा था। रास्ते में उसका एक बेकार घूम रहा मित्र मिल गया। उसने उससे पूछा-‘कहां जा रहा है?
उसने जवाब दिया कि -‘साक्षात्कार के लिये जा रहा हूं। इतने सारे आवेदन भेजता हूं मुश्किल से ही बुलावा आया है।’
मित्र ने कहा-‘अरे, तू मेरी बात सुन!’
उसने जवाब दिया-‘यार, तुम फिर कभी बात करना। अभी मैं जल्दी में हूं!’
मित्र ने कहा-‘पर यह तो बता! किस पद के लिये साक्षात्कार देने जा रहा है।’
उसने कहा-‘‘पहरेदार की नौकरी है। कोई एक सेठ है जो पहरेदारों को नौकरी पर लगाता है।’
उसकी बात सुनकर मित्र ठठाकर हंस पड़ा। उसे अपने मित्र पर गुस्सा आया और पूछा-‘क्या बात है। हंस तो ऐसे रहे हो जैसे कि तुम कहीं के सेठ हो। अरे, तुम भी तो बेकार घूम रहे हो।’
मित्र ने कहा-‘मैं इस बात पर दिखाने के लिये नहीं हंस रहा कि तुम्हें नौकरी मिल जायेगी और मुझे नहीं! बल्कि तुम्हारी हालत पर हंसी आ रही है। अच्छा एक बात बताओ? क्या तम्हें कोई लूट करने का अभ्यास है?’
उसने कहा-‘नहीं!’
मित्र ने पूछा-‘कहीं लूट करवाने का अनुभव है?’
उसने कहा-‘नहीं!
मित्र ने कहा-‘इसलिये ही हंस रहा हूं। आजकल पहरेदार में यह गुण होना जरूरी है कि वह खुद लूटने का अपराध न कर अपने मालिक को लुटवा दे। लुटेरों के साथ अपनी सैटिंग इस तरह रखे कि किसी को आभास भी नहीं हो कि वह उनके साथ शामिल है।’
उसने कहा-‘अगर वह ऐसा न करे तो?’
मित्र ने कहा-‘तो शहीद हो जायेगा पर उसके परिवार के हाथ कुछ नहीं आयेगा। अलबत्ता मालिक उसे उसके मरने पर एक दिन के लिये याद कर लेगा!’
उसने कहा-‘यह क्या बकवास है?’
मित्र ने कहा’-‘शहीद हो जाओगे तब पता लगेगा। अरे, आजकल लूटने वाले गिरोह बहुत हैं। सबसे पहले पहरेदार के साथ सैटिंग करते हैं और वह न माने तो सबसे पहले उसे ही उड़ाते हैं। इसलिये ही कह रहा हूं कि जहां तुम्हारी पहरेदार की नौकरी लगेगी वहां ऐसा खतरा होगा। तुम जाओ! मुझे क्या परवाह? हां, जब शहीद हो जाओगे तब तुम्हारे नाम को मैं भी याद कर दो शब्द बोल दिया करूंगा।’
मित्र चला गया और वह भी अपने घर वापस लौट पड़ा।
…………………………

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‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’

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यूँ हुआ सच का सामना-हास्य व्यंग्य (yoon hua sach ka samna-hindi satire)


कविराज अपने घर से दूर उस पार्क में पहुंच गये। घर में बिजली नहीं थी और बरसात की वजह से सारी सड़कें सराबोर हो गयी थीं। पिछली बार एक बरसात में कविराज एक गड्ढे में गिर चुके थे। उस समय आसपास खड़े लोग भी उन पर हंस रहे थे। एक जानपहचान वाले ने हंसने वालों से कहा-तरस खाओ। हंस रहे हो! शर्म नहीं आती। एक कवि जो तुम्हारे लिये हमेशा सरस, समधुर और हास्य कवितायें ढूंढता हुआ सड़कों पर घूमता है अगर इस गड्ढे में गिर गया और तुम हंस रहे हो।’
एक ने कहा-‘इसलिये तो खुशी हो रही है। यह कवि लोग बेकार की कवितायें लिखते हैं।’
इतने में कविराज उठकर खड़े हो गये और बोले-‘आप लोग हंसे तो मुझे भी हंसने का अवसर मिलना चाहिये। आज इस गड्ढे में गिरने के विषय पर हास्य कविता लिखूंगा। आप लोग जरा अपना परिचय दीजिये।’
उन्होंने अपनी जेब से कागज और पेन निकाली जो अभी पानी से बची हुई थी और इधर वह लोग भाग निकले। जानपहचान वाले ने कहा-‘क्या मूर्ख कवि हो। हास्य कविता लिखने की बात करते हुए उनसे परिचय मांग रहे थे। हास्य मेें उनका सच लिख दोगे तो उनकी तो हालत खराब हो जायेगी।
कविराज ने कहा-‘पर मैं उनका पूरा परिचय तो नहीं मांग रहा था। भला उनका सच हास्य कविता में कैसे लिख सकता था?’
जानपहचान वाले ने कहा-‘तुम पूरा परिचय नहीं मांग रहे थे पर उनके दिमाग में तो अपना परिचय आ गया न! अपने सच पर कोई नजर नहीं डाले इसलिये वह भाग गये। सच से समाज भागता है।’
बात आयी गयी मगर कविराज ने उस दिन जब सड़कों पर लबालब पानी भरा देखा तो एक पार्क में चले गये। वहां भी भला बैठने की जगह कहां थी। उसी समय उन्हें एक पेड़ के नीच चबूतरा दिखाई दिया। वह उस पर बैठ गये। सोचा आज कुछ बरसात पर लिख लें। मगर कमबख्त वहां भी चैन कहां। पार्क के ठीक बाहर बाहर सड़क के किनारे एक चाय वाले का ठेला लगता था। अनेक बार लोग उस पार्क में खड़े होकर उसी चबूतरे पर बैठकर चाय पीते थे। आज बरसात की वजह से उसके पास लोग अधिक नहीं थे। इधर कविराज बैठे उधर से चाय वाले ने बाहर से चिल्ला कर पूछा-‘साहब, चाय दूं क्या?
कविराज ने कहा-‘नहीं भई, हम तो घर से पीकर आये हैं।’
उस ठेले वाले ने कहा-‘हमें क्या पता कि आपको चाय नहीं चाहिये। इस पार्क में इस पेड़ के नीचे तो हमसे चाय पीने वाले ही बैठते हैं।’
कविराज ने कहा-‘यह चबूतरा तुमने खरीदा है कि या पूरा पार्क ही तुम्हारे नाम पर लिख दिया गया है। हम यहां बैठकर कवितायें लिखेंगे।
कविराज ने अपनी जेब से डायरी निकाली और उस पर कुछ लिखने लगे। इधर बरसात बंद होने के बाद चाय के आशिक भी वहां आने लगे। एक साथ चार लोग आये और उसी चबूतरे पर बैठ गये एक तो कविराज के पास ही बैठ गया। उसने चाय वाले को चार चाय बनाने का आदेश दिया और कविराज के पास बैठकर उनका लिखा देखने लगा।
कविराज ने चश्में से उसे झांक कर देखा और पूछा-‘क्या देख रहे हो?’
उसने कहा-‘बस ऐसे ही नजर पड़ गयी, पर लगता है जैसे कि आप कविता सविता लिख रहे हैं।’
कविराज ने पूछा-‘यह कविता तो समझ में आ गया पर यह सविता क्या है? कहीं तुम इंटरनेट पर वह वेबसाईट तो नहीं देखते जो बदनाम हो गयी है।’
वह आदमी बोला-‘नहीं, पर मेरा छोटा भाई शायद देखता है। मैंने तो ऐसे ही कह दिया। अलबत्ता आपकी कविता बहुत अच्छी है। इसका शीर्षक क्या लिखेंगे?’
कविराज ने पूछा-‘तुमने यह कविता पढ़ ली जो कह रहे हो अच्छी है!’
उसने जवाब दिया-‘नहीं, ऐसे ही कह दिया।’
कविराज ने कहा-‘यही इसमें लिख रहा हूं कि लोग बिना देखे प्रशंसा या निंदा करते हैं। इसका शीर्षक होगा ‘सच का सामना’। बहरहाल आप अपना परिचय दें तो अच्छा रहेगा।’
वह घबड़ा गया और बोला-‘अरे, मुझे एक काम याद आ गया। फिर आता हूं।’
उसने अपने तीनों साथियों को भी इशारा किया और चाय वाले से कहा-‘अभी चाय मत लाना। हम अपना एक काम कर आ रहे हैं।’
चाय वाले का मूंह सूख गया पर वह कह कुछ नहीं पा रहा था। इधर उस आदमी के साथ आये तीन आदमियों ने भी यह वार्तालाप सुना और उसे अपने अनुकूल न पाकर अपने साथी की बात मानकर चले गये।
इतने में एक अन्य सज्जन आये। वह सिगरेट का धूंआ छोड़ते हुए कविराज के पास बैठ गये और चाय वाले से बोले-‘जरा, एक चाय बनाना।’
इधर कविराज अपनी कविता लिखने में लगे हुए थे। वह आदमी उनको लिखते देख पास में आ गया।
कविराज ने उसकी तरफ मूंह कर पूछा-‘क्या देख रहे हो।’
उन सज्जन ने कहा-‘यही कि आप क्या लिख रहे हैं?’
कविराज ने कहा-‘यह तो सच का सामना लिख रहा हूं। अच्छा हुआ आप मिल गये। बहुत देर से एक सिगरेट पीने वाला देख रहा था क्योंकि इससे कौन कौनसी बीमारियां होती है उसे बताना था और यह भी पूछना था कि इसे पीने में मजा क्या आता है? आप अपना परिचय दीजिये।ं’
उस आदमी ने एकदम सिगरेट फैंक दी और बोला-‘अरे, यह तो मैं पहली बार पीकर देख रहा हूं। अभी सामने से सामान लाता हूं फिर आपको परिचय दूंगा।’
उसने भी चाय वाले को चाय के लिये मना किया और खिसक गया। अब तो चाय वाले का धैर्य जवाब दे गया और बोला-‘साहब, यह हो क्या रहा है? यह मेरे ग्राहक क्यों भाग रहे हैं? महाराज, अगर आप नाराज हैं तो मुफ्त चाय पी लीजिये। कम से कम मेरा धंधा बर्बाद मत करिये। वैसे आपने उन लोगों से बात क्या की थी? जो चले गये।’
कविराज ने कहा-‘मैंने तो बस यही कहा था कि आजकल दूध भी साबुन वाले सामान से बनने लगा है। वैसे कुछ दिल पहले एक आदमी तुम्हारी चाय की शिकायत कर रहा था। उसने बताया कि तुम नकली दूध से चाय बनाते हो।’
चाय वाला घबड़ा गया और बोला-‘अब, दूध तो मेरे घर पर बनता नहीं है। जैसा आता है उससे चाय बनाता हूं। दूध की वैसे मुझे पहचान अधिक नहीं है। सच कहता हूं कि इसमें मेरी गलती नहीं है।’
कविराज ने उसकी तरफ घूरकर देखा और कहा-‘तुम्हें अच्छी तरह पता है कि दूध में मिलावट है।’
चाय वाला बोला-‘पर साहब, यह बात कहीं आप लिख मत देना। मैं गरीब आदमी हूं बर्बाद हो जाऊंगा। आप कौनसी अखबार के पत्रकार हैं?’
पता नहीं कविराज को क्या सूझा बोले-‘नहीं, हम तो मामूली कवि हैं। वैसे भी हम यहां बैठकर अपने पैसे का हिसाब कर रहे थे।’
चाय वाले का रुख एकदम बदल गया और बोला-‘उंह! फूटो यहां से! तुम जैसे छत्तीस कवि देखे हैं। चुपचाप यहां से चले जाओ। वरना बुलाता हूं इस सड़क के ठेकेदार से जो हमसे हर रोज पचास रुपये सुरक्षा कर वसूल करता है। वह बहुत खतरनाक आदमी है। ख्वामख्वाह में हमें और हमारे ग्राहकों को डरा रहे हो।’
कविराज हंसते हुए उठ गये। वह पीछे से बोला-‘फिर दिखना नहीं!
वह तेजी से चले जा रहे थे तो एक परिचित बोला-‘क्या बात है कविराज, भागे जा रहे हो। जरा बात तो कर लो।’
कविराज बोले-‘अभी नहीं। एक काम से जा रहा हूं।
उन परिचित ने पूछा-‘काम से जा रहे हो यह तो बता दिया। अब यह भी बता दो आ कहां से रहे हो?’
कविराज ने कहा-‘सच का सामना करके आ रहा हूं। अखबार में पढ़ना तो समझ में आ जायेगा।’
उन परिचित ने कहा-‘हां, अगर छप गया तो! वैसे मैंने सुना है कि आजकल तुम्हारी रचनायें अनेक अखबारों के कूड़ेदान की शोभा बढ़ा रही हैं।’
कविराज ने अपने कदम पीछे खींचे और उसके पास जाकर कहा-‘हां, यह भी सच है। एक दिन में दो बार सच से सामना हुआ है। अब यह भी लिखना पड़ेगा।’
वह सज्जन बोले-‘नहीं यार, तुम तो बुरा मान गये। कहीं हमारा नाम मत लिख देना। कहीं अखबार वालों ने छाप दिया तो बदनामी होगी। यकीनन तुम उसमें हमारे लिये कुछ अच्छा तो लिखने से रहे। अगर यह सच का सामना करके कहीं लिख दिया तो हो सकता है कि कोई सनसनी फैलने की उम्मीद में छाप दे। देखो इससे तुम्हारी और हमारी दोस्ती में फर्क पड़ सकता है!
कविराज धीरे धीरे बुदबुदाये-‘तीसरी बार!’ फिर अपने रास्ते चले गये।
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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

दिखावे की दोस्ती -हिंदी शायरी (dikhave ki dosti-hindi shayri)



बेसुरा वह गाने लगे।
किसी के समझ न आये
ऐसे शब्द गुनगनाने लगे।
फिर भी बजी जोरदार तालियां
मन में लोग बक रहे थे गालियां
आकाओं ने जुटाई थी किराये की भीड़
अपनी महफिल सजाने के लिये
इसलिये लोगों ने अपने मूंह सिल लिये
पहले हाथों से चुकाई ताली बजाकर कीमत
दाम में पाया खाना फिर खाने लगे।
………………………
कमअक्ल दोस्त से
अक्लमंद दुश्मन भला
ऐसे ही नहीं कहा जाता है।
दुश्मन पर रहती है नजर हमेशा
दोस्त का पीठ पर वार करना
ऐसे ही नहीं सहा जाता है।
जमाने में खंजर लिये घूम रहा है हर कोई
अकेले भी तो रहा नहीं जाता है
इसलिये दिखाने के लिये
बहुत से लोगों को दोस्त कहा जाता है।

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दूसरे की दौलत को धूल समझें-चाणक्य नीति (dusre ki daulat ko dhool samjhen-chankya niti


यो मोहन्मन्यते मूढो रक्तेयं मयि कामिनी।
स तस्य वशगो मूढो भूत्वा नृत्येत् क्रीडा-शकुन्तवत्।।

       हिंदी में भावार्थ-नीति विशारद चाणक्य के अनुसार कुछ पुरुषों में विवेक नहीं होता और वह सुंदर स्त्री से व्यवहार करते हुए यह भ्रम पाल लेते हैं कि वह वह उस पर मोहित है। वह भ्रमित पुरुष फिर उस स्त्री के लिये ऐसे ही हो जाता है जैसे कि मनोरंजन के लिये पाला गया पक्षी।
मातृवत् परदारांश्चय परद्रव्याणि लोष्ठवत्।
आत्मवत् सर्वभूतानि यः पश्यति स नरः।।

हिंदी में भावार्थ-दूसरों की पत्नी को माता तथा धन को मिट्टी के ढेले की भांति समझना चाहिये। इस संसार में वह यथार्थ रूप से मनुष्य है जो सारे प्राणियों को अपनी आत्मा की भांति देखने वाला मानता है।
       वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हर व्यक्ति को अपने अंदर विवेक धारण करना चाहिये। कुछ लोग स्त्रियों के विषय में अत्यंत भ्रमित होते हैं। उनको लगता है कि कोई स्त्री उनसे अच्छी तरह बात कर रही है तो इसका आशय यह है कि वह उन पर मोहित है-यह उनका केवल एक भ्रम है। स्त्रियों का स्वभाव तथा वाणी कोमल होती है और इसी कारण वह हमेशा मृदभाषा से पुरुषों का मन मोह लेती हैं पर कुछ अज्ञानी और अविवेकी पुरुष यह भ्रम पाल कर अपने आपको ही कष्ट देते हैं कि वह उनके प्रति आकर्षित है।
       नीति विशारद चाणक्य ऐसे व्यक्तियों की तरफ संकेत करते हुए कहते हैं कि दूसरे की स्त्री को माता के समान समझना चाहिये। उसी तरह दूसरे के धन को मिट्टी का ढेला समझना चाहिये। वह यह भी कहते हैं कि इस संसार में वही मनुष्य श्रेष्ठ है जो सभी लोगों को देह नहीं बल्कि इस संसार में दृष्टा की तरह उपस्थित आत्मा ही मानता है।
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कल्पित भाभी, कामयाबी की चाभी,-व्यंग्य कविता kalpit bhabhi, kamyabi ki chabhi-vyangya kavita


कवि देवर ने लिखी
अपनी प्यारी भाभी पर कविता
‘बहुत सुंदर और सुशील हैं मेरी भाभी
मेरी कामयाबी की है चाभी।
जब कहीं जाता था साक्षात्कार के लिये
वही मेरा सामान बनाती
अटैची में कपड़े सजाती
मेरी कामयाबी के लिये
सर्वशक्तिमान की मूर्ति के सामने
दिल लगाकर आरती गाती
भाई के साथ फेरे लगाकर आई
जैसे मैने नई मां पाई
दिल करता है मां संबोधित करूं न कि भाभी।’
लेकर पहुंचा वह मित्र के पास
राय मांगने तो उसने कहा
‘किस जमाने को कवि हो
उगते नहीं जैसे डूबते रवि हो
भला आज के जमाने में ऐसी
पुरातनपंथी कवितायें को लिखता है
इसलिये तू फ्लाप दिखता है
अगर जमाने में वाह वाह चाहिये
तो पात्र बना अपनी कविता में
असली नहीं बल्कि कल्पित भाभी।
उसे रोज होटलों में भेज
जहां सजे उसकी अय्याशी की सेज
नाम देशी रखना
पर लगाना अंग्रेजी टखना
हो जायेगी हिट, तेरी भी भाभी।
कामयाबी की इमारत में
घुसने के लिये यही है तेरे लिए चाभी।’
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मिलावट और नकल का आतंक-हास्य व्यंग्य(nakal aur milavat par hindi vyangya)


आतंक कोई बाहर विचरने वाला पशु नहीं बल्कि मानव के मन में रहने वाला भाव है जो उसके सामने तब उपस्थित होता है जब वह अपने लिये कठिन हालत पाता है। पूरे विश्व के साथ भारत में भी आंतक फैले होने की बात की जाती है पर अन्य से हमारी स्थिति थोड़ी अलग है। दूसरे देश कुछ लोगों द्वारा उठायी गयी बंदूकों के कारण आतंक से ग्रसित हैं पर भारत में तो यह आतंक का एक हिस्सा भर है। यह अलग बात है कि हमारे देश के बुद्धिमान बस उसी बंदूक वाले आतंक पर ही लिखते हैं।
बहुत दिन से हम देख रहे हैं कि हम सारे जमाने के आतंक पर लिख रहे हैं पर अपने मन में जिनका आंतक है उसकी भी चर्चा कर लें। सच बात तो यह है हम नकली नोटों और मिलावटी सामान से बहुत आतंकित हैं।
बाजार में जब किसी को पांच सौ का नोट देते हैं तो वह ऐसे देखता है कि जैसे कि किसी अपराधी ने उसे अपने चरित्र का प्रमाणपत्र देखने के लिये दिया हो। जब तक वह दुकानदार लेकर अपनी पेटी में वह नोट डालकर सौदा और बचे हुए पैसे वापस नहीं करता तब तक मन में जो उथल पुथल होती है उसमें हम कितनी बार घायल होते हैं यह पता ही नहीं-याद रहे पश्चिमी चिकित्सा शास्त्र यह कहता है कि तनाव से जो मनुष्य के दिमाग को क्षति पहुंचती है उसका पता उसे तत्काल नही चलता।
हमने अनेक दुकानदारों के सामने ताल ठौंकी-अरे, भईया हम यह नोट ए.टी.एम से ताजा ताजा निकाल कर लाये हैं।’
वह कहते हैं कि ‘साहब, आजकल तो ए़.टी.एम. से भी नकली नोट निकल आते हैं और वह सभी ताजा ही होते हैं।’
उस समय सारा आत्मविश्वास ध्वस्त नजर आता है। ऐसा लगता है कि जैसे बम फटा हो और हम अपनी किस्मत से साबित निकल गये।
यही मिलावटी सामान का हाल है। बाजार में खाने के नाम पर दिन-ब-दिन डरपोक होते जा रहे हैं। इधर टीवी पर सुना कि मिलावटी दूध में ऐसा सामान मिलाया जा रहा है जिसमें एक फीसदी भी शरीर के लिये पाचक नहीं हैं। मतलब यह कि पूरा का पूरा कचड़ा है जो पेट में जमा होता है और समय आने पर अपना दुष्प्रभाव दिखाता है। अभी उस दिन समाचार सुना कि एक तेरहवीं में विषाक्त खोये की मिठाई खाकर 1200 लोग एक साथ बीमार पड़ गये। उस समय हमारी सांसें उखड़ रही थी। उसी दौरान एक मित्र का फोन आया और उसने पूछा-‘क्या हालचाल हैं? तुम्हारे ब्लाग हिट हुए कि नहीं। अगर हो गये हों तो मिठाई खिला देना। हम अंधेरे में बैठे हैं और आज तुम्हारा ब्लाग नहीं देख पा रहे।’
हमने कहा-‘अच्छा है बैठे रहो। अगर लाईट आ गयी तो तुम टीवी समाचार भी जरूर देखोगे। वहां जब मिठाई खाकर बीमार पड़ने वालों की खबर सुनोगे तो फिर मिठाई नहीं मांगोगे बल्कि मिठाई खाना ही भूल जाओगे।’
मित्र ने कहा-‘’तुम चिंता मत करो। न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी। तुम कभी हिट नहीं बनोगे इसलिये मिठाई भी नहीं मिलेगी सो खतरा कम है। पर यार, वाकई बाहर खाने में हम दिमाग तनाव मे आ जाता है कि कहीं गलत चीज तो नहीं खा ली। उस दिन एक जगह चाय पी और बीच में छोड़ कर दुकानदार को पैसे दिये और उससे कहा‘यह हमारी इंसानियत ही समझना कि हमने पैसे दिये वरना तुम्हारा दूध खराब है उसमें बदबू आ रही है।’ उसने भी हमसे पैसे ले लिये। हैरानी की बात यह है कि लोग उसी चाय को पी रहे थे किसी ने उससे कुछ कहा नहीं।’’
पिछली दो दीवाली हमने बिना खोये की मिठाई खाये बिना ही मनाई हैं। कहां हमें उस दिन मिठाई खाने का शौक रहता था पर मिलावट के आतंक ने उसे छीन लिया। वजह यह है कि इधर दीवाली के दिन शुरु हुए उधर टीवी पर मिलावटी दूध के समाचार शुरु हो जाते हैं कहते हैं कि
1-शहरों में खोवा आ कहां से रहा है जबकि उस क्षेत्र में इतनी भैंसे ही नहीं्र है।
2-खोये में तमाम ऐसे रसायन मिले होते हैं जो पेट की आंतों में भारी हानि पहुंचाते हैं।
3-घी भी पूरी तरह से नकली बन रहा है।’
ऐसे समाचार जो दिमाग में आंतक फैलाते हैं वह बारूद के आतंक से कहीं कम नहीं होते। आप ही बताईये खोय की विषाक्त मिठाई खाकर 1200 लोग एक साथ बीमार हों तो उसे भला छोटी घटना माना जा सकता है? क्या जरूरी है कि दुनियां के किसी हिस्से में बारूद से लोग मरे उसे ही आतंकवादी घटना माना जायेगा?
समस्या यह नहीं है कि दूध, घी या खोवा मिलावटी सामान बन रहा है बल्कि हल्दी, मिर्ची और शक्कर में मिलावट की बात भी सामने आती है। इतना ही नहीं अब तो यह भी कहने लगे है कि सब्जियों और फलों में भी दवाईयां मिलाकर उन्हें प्रस्तुत किया जा रहा है और वह भी कम मनुष्य देह के लिये कम खतरनाक नहीं है।

जब बारूदी आतंक का समाचार चारों तरफ गूंज रहा होता है तब कुछ देर उस पर ध्यान अधिक रहता है पर जब अपने जीवन में कदम कदम पर नकली और खतरनाक सामान से सरोकार होने की आशंका है तो वह भी अब कम आतंकित नहीं करती। मतलब यह है कि चारों तरफ आंतक है पर हमारे देश के बुद्धिमान लोगों की आदत है कि विदेश के बताये रास्ते पर ही अपने विषय चुंनते हैं। हम इससे थोड़ा अलग हैं और हर विषय को एक आईना बनाकर अपने आसपास देखते हैं तब लगता है कि इस विश्व में बारूदी आतंक खत्म वैसे ही न होने वाला पर जो यह नकल और मिलावट का यह अप्रत्यक्ष आतंक है उसके परिणाम उससे कहीं अधिक गंभीर हैं। सोचने का अपना अपना तरीका है कोई सहमत न हो यह अलग बात है।
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शराबी ईमेल-हास्य व्यंग्य (hasya vyangya)


उस ईमेल में सबसे ऊपर लगे फोटो में शराब की बोतलें सजी थीं। नीचे संदेश में लिखा था कि ‘कृपया इस ईमेल को ध्वस्त न करें। इसे पढ़ें और अपने अन्य मित्रों को भेजें। इस ईमेल को पढ़कर एक आदमी ने इसे ध्वस्त कर दिया तो अगले दिन ही सुबह उसके घर में रखी शराब की बोतल अपने आप ही गिर कर टूट गयी।
एक आदमी ने यह ईमेल पांच लोगों को भेजा तो उसे सुबह ही मुफ्त पांच बोतलों का पार्सल मिला।
एक आदमी ने इसे दस लोगों को भेजा तो उसे उसके मित्र ने एक बढ़िया काकटेल पार्टी दी।
एक अधिकारी ने इसे पंद्रह लोगों को भेजा तो अगले दिन ही उसे प्रमोशन मिल गया।’
यह एक मित्र ने भेजा था और साथ में लिखा था कि इसे मजाक न समझें। हम बहुत गंभीर हो गये। इस बात को लेकर कि हम जैसे व्यक्ति के साथ इस तरह का मजाक करना खतरनाक भी हो सकता था। छहः वर्ष पहले छूटी लत वापस भी आ सकती थी पर लिखने का यह नशा जो बचपन से लगा है उसकी वजह से बचने की संभावना थी पर फ्री में शराब की बोतल का मोह छोड़ना मुश्किल था।
अगले दिन हम एक शराब की दुकान के पास से गुजर रहे थे तो ईमेल की याद आ गयी तो वहीं खड़े हो गये। दरअसल हमें उस फोटो की याद आ गयी। पीछे से एक मित्र ने टोककर कहा-‘चले जाओ, खरीद लो बोतल। डरते किसलिये हो। कोई नहीं देख रहा सिवाय हमारे। हां अगर घर बुलाकर एकाध पैग पिला दो तो हम किसी से नहीं कहेंगे। वैसे तुम कवि हो और इसका सेवन तुम्हारे लिये फायदेमंद है। अच्छी कवितायें लिख लोगे।
हमने कहा-‘क्या इस शराब वाले ने तुम्हें कोई कमीशन दिया है जो प्रचार कर रहे हो? हम तो बस बोतलें देख रहे थे। वैसे ही सजी थीं जैसे कि हमारे ईमेल पर। हमने पांच लोगों को ईमेल भेजा है और सोच रहे थे कि शायद यह शराब वाला हमें मुफ्त में दो चार शराब की बोतलें देगा। सुबह से कोई पार्सल तो मिला नहीं।’
वह मित्र घूरकर हमें देखने लगा और बोला-‘यह क्या कह रहे हो?’
हमने कहा-‘सच कह रहे हैं हमने पांच लोगों को ईमेल किया है। हमें एक ईमेल मिला था जिसमें लिखा था कि यही ईमेल अगर मित्रों को भेजोगे तो कुछ न कुछ मिलेगा। हमने सोचा कि ब्लाग तो हमारे हिट होने से रहे तो हो सकता है कि शराब की एकाध बोतल ही फ्री में मिल जाये।’
उसे हमने पूरी कथा सुनाई तो वह एकदम चीख पड़ा-‘क्या बात है शराब के नाम पर अभी भी तुम बहकने लगते हो। कहते हो कि छोड़ दी है फिर यह कैसा स्वांग रचा है। लगता है कि इंटरनेट ने तुम्हारे दिमाग के सारे बल्ब फ्यूज कर दिये हैं।’
हमने कहा-‘सच कह रहे हैं हमने पांच लोगों को ईमेल भेजा है।’
’’अच्छा-‘’वह घूरकर बोला-‘आज से बीस साल पहले हमने तुम्हें एक सर्वशक्तिमान की एक दरबार के लिये एक पर्चा दिया था कि इसे छपवाकर सौ लोगों को दो तो फायदा होगा तब तुमने कहा था कि यह सब ढकोसला है और आज ईमेल पर शराब का संदेश भेजने की बात आ गयी तो सब भूल गये। क्या जमाना आया गया। आदमी सर्वशक्तिमान के संदेश छपवाता नहीं है पर शराब के ईमेल भेजने को तैयार है।’
तब हमें याद आया कि इस तरह के पर्चे पहले छपते थे कि अमुक जगह सर्वशक्तिमान के अमुक रूप की तस्वीर प्रकट हुई है। उसके बारे में यह पर्चा छपवाकर सौ लोगों को भेजो तो सारी समस्या हल हो जायेगी। दरअसल यह सर्वशक्तिमानों के दरबारों का प्रचार होता था। उसमें यह भी बताया जाता था कि अमुक जगह अमुक तस्वीर मिली तो जिसने प्रचार किया उसको लाभ हुआ जिसने वह पर्चे छपवाने की बजाय फैंक दिया तो उसे हानि हुई। हमने सतर्कता से मित्र को जवाब दिया-‘वह पर्चे छपवाने में पैसे खर्च होते हैं जबकि हमारा इंटरनेट कनेक्शन ब्राडबैंड वाला है इसलिये कोई अलग से पैसा नहीं देना पड़ता। इसलिये प्रयास करने में क्या बुराई है।’
मित्र बोला-‘हां, इससे इंटरनेट के कनेक्शन बने रहेंगे यह क्या कम है? उनकी कमाई नहीं होगी। फिर यह पूरब और पश्चिम का मेल कैसे हो रहा है? कहां अध्यात्म की बातें करते हो और कहां यह शराब की दुकान पर झांक रहे हो। निकल लो। किसी चाहने वाले ने देख लिया तो उसके सामने तुम्हारी पोल खुल जायेगी।’
हम सहम गये। हमारे दिमाग से ईमेल वाली बात निकल ही नहीं रही थी। पांच लोगों को ईमेल किया था पर कहीं से कोई पार्सल आदि नहीं मिला। फिर सोचा कि-‘यार, यह इंटरनेट पर पूरब पश्चिम का मेल कुछ इस तरह ही होगा। प्रचार का तरीका पुराना पर इष्ट तो नया होगा। कहां सर्वशक्तिमान के स्वरूप आदमी को प्रिय थे अब तो यह शराब ही प्रिय है।’

हमने गलत नहीं सोचा। टीवी, कूलर,फ्रिज, और गाड़ियों का अविष्कार इस देश में नहीं हुआ पर उपलब्ध सभी को हैं। हां, उनके उपयोग का तरीका जरूर पश्चिमी देशों से नहीं मिलता। कारें तो एक से एक सुंदर आ रही हैं पर रोड पुरानी और खटारा है। फ्र्रिज है पर लाईट की उठक बैठक उसके साथ लगी हुई है। टीवी आया पर विदेश के लोग उसका आनंद उठाते हैं जबकि हम लोग चिपक जाते हैं। फिर यह सभी चीजें चाहिये पर दहेज के रूप में। मतलब यह कि हम अपने चलने फिरने का ढर्रा नहीं बदल सकते पर इस्तेमाल करने वाली चीजों का बदल देते हैं। यही हाल उस शराब की ईमेल का है। पहले सर्वशक्तिमान की दरबारें कमाई का जरिया होती थी तो अब शराब की दुकानें हो गयी हैं इसलिये प्रचार के लिये उनका ही तो फोटा लगेगा न!
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श्रीगीता संदेश-गैर धर्म गुणवान होने पर भी दु:खदायी (shri gita sandesh)


श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।
हिंदी में भावार्थ-
श्रीगीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि अपने धर्म से पराया धर्म श्रेष्ठ लगता है तब उसको कभी श्रेय न प्रदान करें। अपना धर्म संपन्न नहीं दिखता पर दूसरे का धर्म तो हमेशा भयावह परिणाम देने वाला होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अक्सर लोग धर्म को लेकर बहस करते हैं पर उसका मतलब नहीं समझते। हर टीवी चैनल, अखबार और पत्रिका को उठाकर देख लें धर्म को लेकर तमाम सतही बातें लिखी मिल जायेंगी जिनका सार तो विषय सामग्री प्रस्तुत करने वाले स्वयं नहीं जानते न ही पाठक या दर्शक समझने का प्रयास करते हैं। कई बार तो ऐसा लगता है कि धर्म बिकने, खरीदने, और लाभ हानि वाली व्यापारिक वस्तु हो गयी है। अनेक प्रचार माध्यम बकायदा धर्मपरिवर्तित कर जिंदगी में भौतिक उपलब्धि प्राप्त करने वाले लोगों का प्रचार करते हैं। इतना ही नहीं धर्म परिवर्तित कर विवाह करने पर लड़कियों को वीरांगना करार दिया जाता है। यह केवल प्रचार है जिससे बुद्धिमान भारतीय तत्व ज्ञान से दिखने वाले कटु सत्यों से भागते हुए करते हैं क्योंकि भारतीय अध्यात्म ज्ञान जीवन के ऐसे रहस्यों को उद्घाटित करने के सत्यों से भरा पड़ा है जिसको जानने वाला धर्म न पकड़ता है न छोड़ता है।
हमारे भारतीय अध्यात्म में स्पष्ट रूप से धर्म को कर्म से जोड़ा गया न कि कर्मकांडों से। कर्मकांडों और रूढ़ियों को लेकर भारतीय धर्मों की आलोचना करने वाले मायावी लोग उस तत्व ज्ञान को जानते नहीं है पर उनको यह पता है कि अगर उसका प्रचार हो गया तो फिर उनकी माया धरी की धरी रह जायेगी।
एक मजे की बात है कि धर्म परिवर्तित दूसरा धर्म अपनाने वाली युवतियां विवाह कर लेती हैं इसमें बुराई नहीं है पर उसके बाद उनको जब दूसरे धर्म के संस्कार अपनाने पड़ते हैं तब उन पर क्या गुजरती है इस पर कोई प्रकाश नहीं डालता। दरअसल फिल्मों की कहानियों को केवल विवाह तक ही सीमित देखने वाले बुद्धिजीवी उससे आगे कभी सोच ही नहीं पाते। यही कारण है कि विवाह के बाद जब पराये धर्म के कर्मकांडों को मन मारकर अपनाना पड़ता है तब उन युवतियों की क्या कहानी होती है इस पर कोई भी आज का महापुरुष नहीं लिखता।
दरअसल धर्म दिखाने या छूने की वस्तु नहीं बल्कि हृदय में की जाने वाली अनुभूति है। बचपन से जिस धर्म के संस्कार पड़ गये उनसे पीछा नहीं छूटता विवाह या अन्य किसी भौतिक प्राप्ति के लिये धर्म परिवर्तन तो लोग कर लेते हैं उसके बाद जो उनपर तनाव आता है उसकी चर्चा भी गाहे बगाहे करते हैं। एक मजे की बात है कि कथित आधुनिक लोग धर्म परिवर्तन करते हैं पर उसके साथ अपना नाम और इष्ट भी परिवर्तित कर लेते हैं। मतलब वह दूसरे धर्म के के बंधन को ओढ़ते है और दावा आजादी का करते हैं। सच बात तो यह है कि धर्म का आशय सही मायने में भारतीय अध्यात्म में ही है जिसका आशय है कि बिना लोभ लालच और कामना के भगवान की भक्ति करते हुए जीवन व्यतीत करना न कि उनके वशीभूत होकर धर्म मानना। दूसरी बात यह है कि धर्म परिवर्तित करने वाले अपनी पहचान गुम होने के भय से अपना पुराना नाम भी साथ लगाते हैं। दूसरे के धर्म के क्या कर्मकांड हैं किसी को पता नहीं होता? इसलिये उस धर्म के लोग मजाक उड़ाते हैं जिसे अपनाया गया है।

संत कबीरदास और चाणक्य भी कहते हैं कि दूसरे धर्म या समुदाय का आसरा लेना हमेशा दुःख का कारण होता है। किसी भी व्यक्ति या समाज को बाहर से देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि उसका धर्म कैसा है या वह उसे कितना मानता है। वह तो जब कोई नया आदमी धर्म परिवर्तन कर उस धर्म में जाता है तब उसे पता लगता है कि सच क्या है? इसके बावजूद यह सच है कि दूसरा धर्म नहीं अपनाना चाहिये क्योंकि उससे तनाव बढ़ता है। हालांकि आजकल प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्षा लाभों के लिये अनेक लोग धर्म बदल लेते हैं। वह भले ही दावा करें कि उनको ज्ञान प्राप्त हुआ है पर यह झूठ है। जिसे ज्ञान प्राप्त होता है वह धर्म से परे होकर योग साधना, ध्यान और भक्ति में रहते हुए निष्काम कर्म और निष्प्रयोजन दया करता है न कि धर्म छोड़ने या पकड़ने के चक्कर में पड़ता है।
हां एक बात महत्वपूर्ण है कि भारतीय धर्म व्यापक दृष्टिकोण वाले होते हैं क्योंकि इसमें किसी प्रकार की भाषा या उस पर आधारित नाम या कर्मकांड की बाध्यता नहीं होती। हमारा श्रीगीता ग्रंथ दुनिया का अकेला ऐसा धर्म ग्रंथ है जिसमें ज्ञान के साथ विज्ञान की भी चर्चा है। इसमें निरंकार परमात्मा की निष्काम भक्ति के साथ ही अन्य जीवों पर निष्प्रयोजन दया करने का भी संदेश है। यह मनुष्य को विकास की तरफ जाने के लिये प्रेरित करने के साथ विनाश से भी रोकता है।
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बरसात के साथ धार्मिक चालाकी-हिंदी व्यंग्य (hindi vyangya)


अध्यात्म नितांत एक निजी विषय है पर जब उसकी चौराहे पर चर्चा होने लगे तो समझ लो कि कहीं न कहीं उसकी आड़ में कोई अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ा रहा है तो कोई अपना व्यवसाय कर रहा है। जब कहीं सार्वजनिक रूप से प्रार्थनायें सभायें होती हैं तब यह लगता है कि लोग दिखावा अधिक कर रहे हैं। आज के संचार युग में तो यह कहना कठिन है कि धर्म का बाजार लग रहा है या बाजार ही धर्म बना रहा है। ऐसा लगता है कि पहले लोगों के पास मनोरंजन के अधिक साधन नहीं थे इसलिये धार्मिक पात्रों की व्याख्या करना ही धर्म प्रचार मान लिया गया। इस आड़ में तमाम तरह के कर्मकांड और अंधविश्वास सृजित किये गये ताकि उनकी आड़ में धरती पर उत्पन्न अनावश्यक भौतिक साधान बिक सकें जिसके माध्यम से आदमी की जेब से पैसा निकाला जाये।
अब तो प्रचार युग आ गया है और लोग अध्यात्मिक आधार पर इसलिये अपना अस्तित्व बनाये रखना चाहते है ताकि सामाजिक, आर्थिक तथा वैचारिक संगठनों में अपनी छबि बनाकर पुजते रहें। वह आधुनिक बाजार में आधुनिक अध्यात्मिक व्यापारी बनकर चलना चाहते हैं पर उनकी दुकान सामान उनका बरसो पुराना ही है जिसमें केवल धार्मिक प्रतीक और कर्मकांड ही हैं। जब कहीं हिंसा हो तो वहां लोग शांति के लिये सामूहिक प्रार्थनायें करने के लिये एकत्रित होते हैं। उनको प्रचार माध्यमों में बहुत दिखाया जाता है। जब यह कहना कठिन हो जाता है कि बाजार को ऐसी खबरें चाहिये इसलिये यह सब हो रहा है या सभी विचारधारा के ज्ञानियों को प्रचार चाहिये इसलिये वह इस तरह की सामूहिक प्रार्थनायें करते हैं।
हमारा अध्यात्मिक दर्शन तो साफ कहता है कि पूजा, भक्ति या साधना तो एकांत में ही परिणाम देने वाली होती है।’ इसलिये जब इस तरह के सामूहिक कार्यक्रम होते हैं तो वह दिखावा लगते हैं। आजकल अनेक स्थानों पर बरसात बुलाने के लिये प्रार्थना सभायें हो रही हैं। हर तरह की धार्मिक विचाराधारा के स्वयंभू ज्ञानी लोगों से बरसात के लिये सामूहिक प्रार्थनाऐं आयोजित कर रहे हैं। प्रचार भी उनको खूब मिल रहा है। हमें इस पर आपत्ति नहीं है पर अपने जैसे लोगों से अपनी बात करने का एक अलग ही मजा है। कुछ लोग है जो इसमें हो रही चालाकियों को देखते हैं।
हम जरा इस बरसात के मौसम पर विचार करें तो लगेगा कि उसका आना तय है। देश के कुछ इलाकों में उसका प्रवेश हो चुका है और अन्य तरफ मानसून बढ़ रहा है।

उस दिन मई की एक शाम बाजार में तेज बरसात से बचने के लिये हम एक मंदिर में बैठ गये। उस समय तेज अंाधी के साथ बरसात हो रही थी। हालांकि गर्मी कम नहीं थी और बरसात से राहत मिली पर एक शंका मन में थी कि यह मानसून के लिये संकट का कारण बन सकता है। प्रकृत्ति का अपना खेल है और उस पर किसी का नियंत्रण नहीं है। मनुष्य यह चाहता है कि प्रकृति उसके अनुरूप चले पर पर उसके साथ खिलवाड़ भी करता है। मई में उस दिन हुई बरसात के अगले कुछ दिनों में ही अखबारों में हमने पढ़ा कि बरसात देर से आयेगी। विशेषज्ञों ने बरसात कम होने की भविष्यवाणी की है-औसत से सात प्रतिशत कम यानि 93 प्रतिशत होने का अनुमान है।

ऐसा नहीं है कि बरसात हमेशा समय पर आती हो-कभी विलंब से तो कभी जल्दी भी आती है-पिछली बार कीर्तिमान भंजक वर्षा हुई थी। बरसात जब तक नहीं आती तब आदमी व्यग्र रहता है। ऐसे में उसके जज्बातों से खेलना बहुत सहज होता है। उसका ध्यान गर्मी पर है तो उसे भुनाओ। कहने के लिये तो कह रहे हैं कि हम सर्वशक्तिमान को बरसात भेजने के लिये पुकार रहे हैं। पर उसका समय पर चर्चा नहीं करते। जब बरसात आने के संकेत हो चुके हैं तब ऐसी प्रार्थनाओं के समाचार खूब आ रहे हैं। वैसे तो फरवरी के आसपास भी ऐसे समाचार आ गये थे कि इस बार बरसात देर से आयेगी और कम होगी। तब ऐसी प्रार्थना सभायें क्यों नहीं की गयी। उस समय नहीं तो मई में ही कर लेते।
सर्वशक्तिमान के सभी रूपों के चेले चालाक हैं। उस समय करते तो कौन लोग उनको याद रखते। जब एक दो दिन या सप्ताह में बरसात आने वाली तब ऐसी प्रार्थना सभायें इसलिये कर रहे हैं ताकि जब हों तो लोग माने कि उनके ‘ज्ञानियों’ को कितनी सिद्धि प्राप्त है। बहरहाल हम देख रहे हैं कि बाजार के प्रबंधक और सर्वशक्तिमान के यह आधुनिक दूत एक जैसे चालाक हैं। टीवी चैनल और समाचार पत्र पत्रिकाऐं तो व्यवसायिक हैं पर सर्वशक्तिमान के सभी रूपों के यह ज्ञानी चेले भी क्या व्यवसायी है? उनकी इस तरह की चालाकियों से तो यही लगता है?
प्रसंगवश याद आया एक पाठक ने अपनी टिप्पणी में पूछा था कि ‘आपके लेखों से यह पता ही नहीं लगता कि आप किस धर्म या भगवान की बात कर रहे हैं?
दरअसल इसका कारण यह है कि हम सभी तरह की विचारधाराओं पर अपने विचार रखते हैं। किसी एक का तयशुदा नाम लेने पर लोग कहते हैं कि तुम उनके नाम पर लिखो तो जाने। जहां तक हमारी जानकारी सर्वशक्तिमान शब्द किसी भी खास विचारधारा से नहीं जुड़ा यही स्थिति उसके ठेकेदार शब्द ं की भी है। इसलिये कोई यह नहीं कह सकता कि हमारी बात करते हो उनकी करके देखो तो जानो।
अगर सभी विरोध करने लगें तो हम भी कह सकते हैं कि तुम सर्वशक्तिमान और ठेकेदार शब्द से अपने को क्यों जोड़ते हो? दरअसल हमने देखा कि यह समाजों के ठेकेदारो का काम ही चालाकी पर चल रहा है और लोगों को जज्बात से भड़काने और बहलाने के काम में यह सब सक्षम होते हैं। हम इसलिये अपनी बात व्यंजना विधा में कहते हैं। हां, बरसात की पहली बूंदों का इंतजार हमें भी है। अब यह गर्मी सहना कठिन हो गया है। कभी कभी आकाश में बिना बरसते बादल देखते हैं तो भी गुस्सा आता है कि यह हमारी धरती की गर्मी नष्ट कर रहे हैं जो कि बरसात को खींचती है।
……………………….

यह हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग

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कवि और संपादक-दीपक भारतदीप

गर्मी पर लिखी कविता बरसात धो गयी-व्यंग्य कविता


गर्मी पर लिखने बैठे कविता
बिजली गुल हो गयी।
बाहर चलती आंधी ने
मचाया शोर
गरज कर बरसा पानी
बरसात के इंतजार में रचे थे शब्द
बहते पसीने का दिखाया था दर्द
मानसून की पहली बरसात
सब धो गयी।
गर्मी पर लिखी कविता बस यूं खो गयी।
…………………
गर्मी पर लिखकर पहुंचा
वह कवि सम्मेलन में
बीच में बरसात हो गयी।
मंच पर आकर बोला वह
‘मेरे गुरु ने कहा था कि
कभी मौसम पर मत लिखना
चाहे जब बदल जाता है
कभी चुभोता है नश्तर
कभी सहलाता है
लिखकर निकला था घर से
गर्मी पर ताजा कविता
बीच रास्ते में पड़ी बरसात
लिखा कागज अब मेरी समझ में नहीं आता
धूप और पसीने से
पैदा हुए जज्बात
सुनाने का मन था
पर मानसून की पहली बरसात ने
इतना आनंदित किया कि
मेरी अक्ल सो गयी।
फिर सुनाऊंगा कभी फिर कविता
अभी तो मेरी कविता बरसात धो गयी।

…………………………..

दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
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ख़ुद भटके,द्रूसरे को देते रास्ते का पता-व्यंग्य कविता


अपनी मंजिल पर
कभी वह पहुंचे नहीं।
चले कहीं के लिये थे
पहुंचे गये कहीं।
भटकाव सोच का था
कभी रास्ते से वह उतर जाते
कभी खो जाता रास्ता कहीं।
……………………..
अपने रास्ते से वह भटके
अपने ही गम में वह लटके
कोई उपाय न देखकर
बूढ़े बरगद के नीचे धूनि रमाई।

दूसरे को रास्ता बताने लगे
यूं भीड़ का काफिला बढ़ता गया
जमाना ही उनके जाल में फंसता गया
फिर भी चल रहा है उनका धंधा
कभी आता नहीं मंदा
जब तक लोग भटकते रहेंगे
रास्ते पूछने की कीमत सहेंगे
मंजिल पर पहुंच जायेगा राही
बन नहीं हो जायेगी कमाई।
भ्रम वह सिंहासन है
जिसे सिर पर बिठाया तो
बन गये प्रजा
उस पर बैठे तो बने राजा
सच है सर्वशक्तिमान ने
खूब यह दुनियां बनाई

……………………………
नोट-यह व्यंग्य काल्पनिक तथा इसका किसी व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है और किसी से इसका विषय मेल खा जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा।

दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
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बरसात के लिये प्रार्थना-हिंदी व्यंग्य (hindi vyangya)


अध्यात्म नितांत एक निजी विषय है पर जब उसकी चौराहे पर चर्चा होने लगे तो समझ लो कि कहीं न कहीं उसकी आड़ में कोई अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ा रहा है तो कोई अपना व्यवसाय कर रहा है। जब कहीं सार्वजनिक रूप से प्रार्थनायें सभायें होती हैं तब यह लगता है कि लोग दिखावा अधिक कर रहे हैं। आज के संचार युग में तो यह कहना कठिन है कि धर्म का बाजार लग रहा है या बाजार ही धर्म बना रहा है। ऐसा लगता है कि पहले लोगों के पास मनोरंजन के अधिक साधन नहीं थे इसलिये धार्मिक पात्रों की व्याख्या करना ही धर्म प्रचार मान लिया गया। इस आड़ में तमाम तरह के कर्मकांड और अंधविश्वास सृजित किये गये ताकि उनकी आड़ में धरती पर उत्पन्न अनावश्यक भौतिक साधान बिक सकें जिसके माध्यम से आदमी की जेब से पैसा निकाला जाये।
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हमारा अध्यात्मिक दर्शन तो साफ कहता है कि पूजा, भक्ति या साधना तो एकांत में ही परिणाम देने वाली होती है।’ इसलिये जब इस तरह के सामूहिक कार्यक्रम होते हैं तो वह दिखावा लगते हैं। आजकल अनेक स्थानों पर बरसात बुलाने के लिये प्रार्थना सभायें हो रही हैं। हर तरह की धार्मिक विचाराधारा के स्वयंभू ज्ञानी लोगों से बरसात के लिये सामूहिक प्रार्थनाऐं आयोजित कर रहे हैं। प्रचार भी उनको खूब मिल रहा है। हमें इस पर आपत्ति नहीं है पर अपने जैसे लोगों से अपनी बात करने का एक अलग ही मजा है। कुछ लोग है जो इसमें हो रही चालाकियों को देखते हैं।
हम जरा इस बरसात के मौसम पर विचार करें तो लगेगा कि उसका आना तय है। देश के कुछ इलाकों में उसका प्रवेश हो चुका है और अन्य तरफ मानसून बढ़ रहा है।

उस दिन मई की एक शाम बाजार में तेज बरसात से बचने के लिये हम एक मंदिर में बैठ गये। उस समय तेज अंाधी के साथ बरसात हो रही थी। हालांकि गर्मी कम नहीं थी और बरसात से राहत मिली पर एक शंका मन में थी कि यह मानसून के लिये संकट का कारण बन सकता है। प्रकृत्ति का अपना खेल है और उस पर किसी का नियंत्रण नहीं है। मनुष्य यह चाहता है कि प्रकृति उसके अनुरूप चले पर पर उसके साथ खिलवाड़ भी करता है। मई में उस दिन हुई बरसात के अगले कुछ दिनों में ही अखबारों में हमने पढ़ा कि बरसात देर से आयेगी। विशेषज्ञों ने बरसात कम होने की भविष्यवाणी की है-औसत से सात प्रतिशत कम यानि 93 प्रतिशत होने का अनुमान है।

ऐसा नहीं है कि बरसात हमेशा समय पर आती हो-कभी विलंब से तो कभी जल्दी भी आती है-पिछली बार कीर्तिमान भंजक वर्षा हुई थी। बरसात जब तक नहीं आती तब आदमी व्यग्र रहता है। ऐसे में उसके जज्बातों से खेलना बहुत सहज होता है। उसका ध्यान गर्मी पर है तो उसे भुनाओ। कहने के लिये तो कह रहे हैं कि हम सर्वशक्तिमान को बरसात भेजने के लिये पुकार रहे हैं। पर उसका समय पर चर्चा नहीं करते। जब बरसात आने के संकेत हो चुके हैं तब ऐसी प्रार्थनाओं के समाचार खूब आ रहे हैं। वैसे तो फरवरी के आसपास भी ऐसे समाचार आ गये थे कि इस बार बरसात देर से आयेगी और कम होगी। तब ऐसी प्रार्थना सभायें क्यों नहीं की गयी। उस समय नहीं तो मई में ही कर लेते।
सर्वशक्तिमान के सभी रूपों के चेले चालाक हैं। उस समय करते तो कौन लोग उनको याद रखते। जब एक दो दिन या सप्ताह में बरसात आने वाली तब ऐसी प्रार्थना सभायें इसलिये कर रहे हैं ताकि जब हों तो लोग माने कि उनके ‘ज्ञानियों’ को कितनी सिद्धि प्राप्त है। बहरहाल हम देख रहे हैं कि बाजार के प्रबंधक और सर्वशक्तिमान के यह आधुनिक दूत एक जैसे चालाक हैं। टीवी चैनल और समाचार पत्र पत्रिकाऐं तो व्यवसायिक हैं पर सर्वशक्तिमान के सभी रूपों के यह ज्ञानी चेले भी क्या व्यवसायी है? उनकी इस तरह की चालाकियों से तो यही लगता है?
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दरअसल इसका कारण यह है कि हम सभी तरह की विचारधाराओं पर अपने विचार रखते हैं। किसी एक का तयशुदा नाम लेने पर लोग कहते हैं कि तुम उनके नाम पर लिखो तो जाने। जहां तक हमारी जानकारी सर्वशक्तिमान शब्द किसी भी खास विचारधारा से नहीं जुड़ा यही स्थिति उसके ठेकेदार शब्द ं की भी है। इसलिये कोई यह नहीं कह सकता कि हमारी बात करते हो उनकी करके देखो तो जानो।
अगर सभी विरोध करने लगें तो हम भी कह सकते हैं कि तुम सर्वशक्तिमान और ठेकेदार शब्द से अपने को क्यों जोड़ते हो? दरअसल हमने देखा कि यह समाजों के ठेकेदारो का काम ही चालाकी पर चल रहा है और लोगों को जज्बात से भड़काने और बहलाने के काम में यह सब सक्षम होते हैं। हम इसलिये अपनी बात व्यंजना विधा में कहते हैं। हां, बरसात की पहली बूंदों का इंतजार हमें भी है। अब यह गर्मी सहना कठिन हो गया है। कभी कभी आकाश में बिना बरसते बादल देखते हैं तो भी गुस्सा आता है कि यह हमारी धरती की गर्मी नष्ट कर रहे हैं जो कि बरसात को खींचती है।
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मनुस्मृतिः युवती को पति स्वयं चुनने का अधिकार


देवदतां पतिर्भार्यां विन्दते नेच्छत्यात्मनः।
तां साध्वीं बिभृयान्नित्यं दीनां प्रियमाचरन्।।
हिंदी में भावार्थ-
पुरुष स्वयं की इच्छा ने नहीं वरन् देवताओं द्वारा पूर्व निर्धारित स्त्री को ही पत्नी के रूप में प्राप्त करता है। उन्हीं देवताओं के प्रसन्न करने तथा उनके प्रति आस्था प्रदर्शित करने के लिये पुरुष का कर्तव्य है कि वह अपनी आश्रिता पत्नी का भरण भोषण करे।
अलंकारं नाददीत पित्र्यं कन्या स्वयंवरा।
मातृकभ्रातृदतं वा स्तेना स्वाद्यदि तं हरेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
कोई युवती अपने लिये वर स्वयं ही चुनकर विवाह कर सकती है पर उसे अपने माता पिता तथा भाई द्वारा दिये गये आभूषणों को ले जाने का अधिकार नहीं है। स्वयं वर चुनकर विवाह करने पर अगर वह आभूषण ले जाती है तो उसे अनुचित ही कहा जायेगा।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कहते हैं कि भारतीय समाज में कन्या को स्वयं अपना वर चुनने या विवाह करने का अधिकार नहीं है-यह आरोप पूरी तरह से मिथ्या है। मनु महाराज के समय में यह अधिकार था शायद इसी कारण उन्होंने इसकी चर्चा की है पर इतना अवश्य है कि उस पर उन्होंने यह विचार व्यक्त किया है कि जो कन्या युवती ऐसा करती है अपने माता, पिता तथा भाई द्वारा समस समय पर उपहार रूप में प्रदान आभूषण ले जाने का अधिकार नहीं है। यह स्वाभाविक भी है। जब माता पिता तथा भाई अपने कर्तव्य का निर्वाह करने के लिये अपनी कन्या युवती के लिये वर का चयन करते हैं तो वह अपनी प्रतिष्ठा के लिये उपहार स्वरूप दहेज भी देते हैं पर जहां उनको ऐसा अधिकार नहीं मिलता वहां वह अपने उपहार देने के कर्तव्य से विमुख भी हो सकते हैं। अगर किसी युवती ने अपनी इच्छा से वर चुनकर विवाह करने का निर्णय किया है तो उसे अपने माता पिता तथा भाई द्वारा दिये गये आभूषण लौटा देना चाहिये वरना उसके इस कृत्य को अनुचित कहा जायेगा। हां अगर माता पिता और भाई अगर उन आभूषणों को वापस नहीं चाहते तो फिर कन्या पर कोई आरोप नहीं लगाया जा सकता है। आजकल की परिस्थतियों में प्रेम विवाह का प्रचलन बढ़ रहा है और कोई जगह तो माता पिता और भाई न केवल उसे स्वीकृति देते हैं पर अपनी क्षमतानुसार उपहार भी देते हैं।
हालांकि इस तरह का प्रतिबंध मनु महाराज ने लगाया जरूर है पर उन्होंने कन्या युवती के स्वयं वर चुनने के अधिकार को स्वीकार भी किया है।

इसके अलावा प्रत्येक पुरुष को यह समझना चाहिये कि उसे जो युवती पत्नी के रूप में प्राप्त हुई है वह देवताओं द्वारा तय किये भाग्य के कारण प्राप्त हुई है। इसलिये उसका यह कर्तव्य है कि वह अपनी पत्नी का भरण भोषण का कर्तव्य पूरा करे। उसे यह कर्तव्य देवताओं के प्रति आस्था प्रदर्शित करते हुए उनको प्रसन्न करने के लिये करना चाहिये। तात्पर्य यह है कि जो लोग अपनी पत्नी का भरण भोषण अच्छी तरह नहीं करते देवता उनसे रुष्ट हो जाते हैं।
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पतंग और क्रिकेट-हास्य कविता hindi vyangya kavita


बेटे ने कहा बाप से
‘पापा मुझे पतंग उड़ाना सिखा दो
कैसे पैच लड़ाते हैं यह दिखा दो
तो बड़ा मजा आयेगा।’

बाप ने कहा बेटे से
‘पतंग उड़ाना है बेकार
इससे गेंद और बल्ला पकड़ ले
तो खेल का खेल
भविष्य का व्यापार हो जायेगा।
मैंने व्यापार में बहुत की तरक्की
पर पतंग उड़ाकर किया
बचपन का वक्त
यह हमेशा याद आयेगा।
बड़ा चोखा धंधा है यह
जीतने पर जमाना उठा लेता सिर पर
हार जाओ तो भी कोई बात नहीं
सम्मान भले न मिले
पर पैसा उससे ज्यादा आयेगा।
दुनियां के किसी देश के
खिलाड़ी को जीतने पर भी
नहीं कोई उसके देश में पूछता
यहां तो हारने पर भी
हर कोई गेंद बल्ले के खिलाड़ी को पूजता
विज्ञापनों के नायक बन जाओ
फिर चाहे कितना भी खराब खेल आओ
बिकता है जिस बाजार में खेल
वह अपने आप टीम में रहने का
बोझ उठायेगा।
हारने पर थकने का बहाना कर लो
फिर भी यह वह खेल है
जो हवाई यात्रा का टिकट दिलायेगा।
जीत हार की चिंता से मुक्त रहो
क्योंकि यह मैदान से बाहर तय हो जायेगा।
भला ऐसा दूसरा खेल कौनसा है
जो व्यापार जैसा मजा दिलायेगा।

…………………….
नोट-यह व्यंग्य काल्पनिक तथा इसका किसी व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है और किसी से इसका विषय मेल खा जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा।

दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

विदुर नीति-शक्ति से बड़ी इच्छा करना मूर्खता


द्वावेव न विराजेते विपरीतेन कर्मणा।
गृहस्थश्च निरारम्भः कार्यवांश्चैव भिक्षुकः।।
हिंदी में भावार्थ-
नीति विशारद विदुर जी कहते हैं कि जो अपने स्वभाव के विपरीत कार्य करते हैं वह कभी नहीं शोभा पाते। गृहस्थ होकर अकर्मण्यता और सन्यासी होते हुए विषयासक्ति का प्रदर्शन करना ठीक नहीं है।
द्वाविमौ कपटकौ तीक्ष्णौ शरीरपरिशोषिणी।
यश्चाधनः कामयते पश्च कुप्यत्यनीश्वरः।।
हिंदी में भावार्थ-
अल्पमात्रा में धन होते हुए भी कीमती वस्तु को पाने की कामना और शक्तिहीन होते हुए भी क्रोध करना मनुष्य की देह के लिये कष्टदायक और कांटों के समान है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या -किसी भी कार्य को प्रारंभ करने पहले यह आत्ममंथन करना चाहिए कि हम उसके लिये या वह हमारे लिये उपयुक्त है कि नहीं। अपनी शक्ति से अधिक का कार्य और कोई वस्तु पाने की कामना करना स्वयं के लिये ही कष्टदायी होता है।
न केवल अपनी शक्ति का बल्कि अपने स्वभाव का भी अवलोकन करना चाहिये। अनेक लोग क्रोध करने पर स्वतः ही कांपने लगते हैं तो अनेक लोग निराशा होने पर मानसिक संताप का शिकार होते हैं। अतः इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि हमारे जिस मानसिक भाव का बोझ हमारी यह देह नहीं उठा पाती उसे अपने मन में ही न आने दें।
कहने का तात्पर्य यह है कि जब हम कोई काम या कामना करते हैं तो उस समय हमें अपनी आर्थिक, मानसिक और सामाजिक स्थिति का भी अवलोकन करना चाहिये। कभी कभी गुस्से या प्रसन्नता के कारण हमारा रक्त प्रवाह तीव्र हो जाता है और हम अपने मूल स्वभाव के विपरीत कोई कार्य करने के लिये तैयार हो जाते हैं और जिसका हमें बाद में दुःख भी होता है। अतः इसलिये विशेष अवसरों पर आत्ममुग्ध होने की बजाय आत्म चिंतन करते हुए कार्य करना चाहिए।
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क्रिकेट में हार-मनोविज्ञान और अर्थशास्त्र


बीसीसीआई की क्रिकेट टीम बीस ओवरीय एक दिवसीय प्रतियोगिता में हार गयी और अब पता लगा कि उसमें पांच खिलाड़ी अनफिट थे। टीम जिस तरह अपने मैच खेल रही थी उससे लग तो नहीं रहा था कि वह कप जीत पायेगी पर इस कदर पिटेगी यह आभास भी नहीं था। इससे पहले एक क्लब स्तर की प्रतियोगिता हुई थी। उसमें बीसीसीआई के यह सभी खिलाड़ी बड़े शहरों के नाम पर बनी टीमों के लिये खेले।

कहने वाले तो शुरुआती दौर में ही कह रहे थे कि खिलाड़ी थक गये होंगे इसलिये शायद उनका प्रदर्शन प्रभावित होगा। हुआ भी यही पर इस दलील का विरोध करने वाले कहते हैं कि अन्य देशों के खिलाड़ी भी तो इसमें खेले थे फिर उनका प्रदर्शन प्रभावित क्यों नहीं हुआ? यानि हर तरह से इस हार को स्वाभाविक बताने का प्रयास किया जा रहा है। क्रिकेट अनिश्चताओं का खेल है पर इस आड़ में ऐसी हार के कारण छिप नहीं सकते। हारना एक अलग बात है और खराब खेलना अलग। यहां मुद्दा यह नहीं है कि बीसीसीआई की टीम बीस ओवरीय प्रतियोगता में हारी बल्कि उसका प्रदर्शन इतना खराब रहा कि लोग को रहे हैं कि भारत के किसी भी शहर से कोई टीम उठाकर भेज देते तो वह भी इनसे अच्छा खेलते। नये होने के कारण वह उत्साह से खेलते तो पता लगता कि बीस ओवरीय प्रतियोगता का विश्व कप ही जीत लाये। भारत में खिलाड़ियों की कमी नहीं है। फिर बीस ओवरीय प्रतियोगता तो ऐसी है जिसमें अनुभव वगैरह की तो जरूरत ही नहीं है-इसे तो केवल मनोबल के आधार पर ही जीता जा सकता है।
एक पुराने खिलाड़ी ने बढ़िया टिप्पणी की। उसने कहा कि हम भारतीयों में पैसा पचाने की क्षमता बहुत कम हैं। वर्तमान भारतीय खिलाड़ी इतना पैसा कमा चुके हैं कि वह फिर भूल गये कि वह इसी खेल की दम पर हैं।
वह खिलाड़ी चूंकि पेशवर है इसलिये अन्य सच नहीं कह पाया। जिन खिलाड़ियों को बीस ओवरीय मैचों का स्टार माना जाता था वह इस तरह खेले जैसे कि पचास ओवरों वाला मैच खेल रहे हैं। कहने को तो सभी कह रहे हैं कि हम चुस्त दुरस्त थे और क्लब स्तर की प्रतियोगिता में खेलने की वजह से हमारा खेल प्रभावित नहीं हुआ। दरअसल यह उसी क्लब स्तरीय प्रतियोगिता के दोबारा आयोजन में बाधा न पड़े इसलिये ही कहा जा रहा है। फिर वह उसी प्रतियोगिता में अपनी सदस्यता बनाये रखना चाह रहे हैं। यह खिलाड़ी सभी तरह की गेंदें खेलने में माहिर हैं चाहे शार्टपिच हो या स्पिन पर अब बिचारे शार्टपिच गेंदों का तोड़ ढूंढ रहे हैं। सच बात तो यह है कि चाहे खेल कोई भी हो अगर खिलाड़ी का मन नहीं है तो विपक्षी के दांव पैंच उसके लिये पहाड़ हो जाते हैं। भारतीय खिलाड़ी इतना पैसा कमा चुके थे कि अब उनको अपने परिवारों के लिये समय चाहिये था। इंकार इसलिये नहीं कर सकते थे कि कहीं उनकी जगह शामिल नया खिलाड़ी उसमें छा गया तो इससे भी जायेंगे। खेलना है इसलिये खेले। कह सकते हैं कि हाजिरी देने के लिये खेले। जीतने की खुशी या हारने के गम से परे होकर वह निर्विकार भाव से खेलते दिख रहे थे। मगर यह कोई उच्च स्थिति नहीं थी बल्कि उनके चेहरे पर खेलने की बाध्यता के भाव भी थे जो इस बात को दर्शा रहे थे कि वह न खुश हैं न उत्साहित बल्कि टालू खेल दिखा रहे हैं।
अन्य देशों के खिलाड़ी क्लब स्तर में खेलने के बावजूद यहां भी खेले तो इसलिये कि उनको इतना पैसा नहीं मिलता जितना भारत के खिलाड़ियों को मिलता है। भारतीय खिलाड़ी विज्ञापनों और रैम्पों पर इतना पैसा कमा चुके हैं कि उनका बोझ उठाना अब संभव नहीं था। वह खेल की थकवाट से नहीं बल्कि अपनी आर्थिक परिलब्धियेां का उपयोग न कर पाने की गम का बोझ उठाये हुए थे। सच कहें तो ऐसा लगता है कि इस विश्व में शायद उनके लिये मिलने वाली धनराशि इतनी उपयोगी नहीं थी जितनी क्लब स्तर की प्रतियोगिता से मिली होगी। अन्य देशों के खिलाड़ियों के लिये यह रकम भी बहुत बड़ी होगी इसलिये खेल रहे हैं।
क्रिकेट से देश के लोगों ने अपने जज्बात ख्वामख्वाह जोड़ रखे हैं पर उसके लिये यहां कोई जवाबदेह नहीं है। हार गये तो क्या कर लोगे? हां, लोगों का गुस्सा कम करने के लिये तमाम तरह की सफाई दी जा रही है वह इसलिये कि कहीं वह लोग फिर विरक्त न हो जायें और क्रिकेट का व्यापार कहीं ठप न हो जाये।
अगर खिलाड़ी अनफिट हैं तो फिर अभी बाहर जाने वाली टीम के के लिये उनको कैसे चुन लिया गया। वही कप्तान वही खिलाड़ी!
प्रबंधन के मामले में हमारा देश अप्रतिभाशाली माना जाता है। यह हमारी कमजोरी है। कोई नया बदलाव कहीं करना ही नहीं चाहता। दरअसल क्रिकेट अब बाजार का खेल है-कम से कम भारत में तो यही लगता है। खिलाड़ियों ने विज्ञापन कर रखे होते हैं जो ऐसी प्रतियोगिताओं में समय अधिक दिखाई देते हैं। इसलिये उसमें अभिनय करने वाले खिलाड़ियों का होना जरूरी है अतः अप्रत्यक्ष रूप से कहीं न कहीं यह बात भी देखी जाती है कि बाजार का ध्यान अधिक रखा जाता है फोकटिया दर्शक का कम। एक खिलाड़ी इस टीम में शामिल नहीं हुआ तो वह दर्शक दीर्घा में अन्य खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाने पहुंच गया। दरअसल उसके विज्ञापन भी दिख रहे थे और वह यकीनन उनकी वजह से ही अपनी सूरत दिखाने वहां पहुंचा होगा ताकि विज्ञापन दाता उससे खुश रहें। टीवी कैमरा हर मैच में उसका चेहरा अनेक बार दिखाता था। कितनी अच्छी बात लगती है यह बात सुनकर कि इतना बड़ा खिलाड़ी मनोबल बढ़ाने पहुंचा मगर इसके पीछे का सच कौन पढ़ पाता है। यह सब बुरा नहीं है क्योंकि सभी को कमाने का हक है पर आम लोगों को यही सच समझते हुए यह देखना चाहिये। क्रिकेट टीम का खेलना एक व्यवसाय है और उसे बाजार प्रभावित कर सकता है-इससे मान लेना चाहिये। किसी को क्या दोष देना? क्रिकेट वालों को पूरा पैसा मिल रहा है टीम हारे या जीते-तब उनसे यह आशा करना बेकार है कि वह नये और तरोताजा खिलाड़ी भेजकर प्रतियोगिता जीतने का प्रयास कर अपने प्रबंध कौशल का प्रमाण दें। अपने देश में पैसा कमाना महत्वपूर्ण है कि प्रबंध कौशल!
सो टीम हार गयी तो कोई बात नहीं। जिस कप्तान को सिर पर उठाये रखा है उसने कहा है कि कुछ महीने बाद फिर प्रतियोगिता है। उसमें दमखम दिखायेंगे। वहां यह आश्वासन देना ठीक है क्योंकि अगली बार तक लोग इंतजार कर अपना पैसा खर्च कर सकते हैं।
पिछली बीस ओवरीय प्रतियोगिता बीसीसीआई की टीम ने जीती थी। उससे पहले विश्व में हारने की वजह से पूरी टीम की जो किरकिरी हुई वह लोग भूल गये। बीस ओवरीय प्रतियोगिता में बीसीसीआई टीम की पिछली जीत की दो वजहें थी एक तो दूसरी टीमें गंभीरता से नहीं खेली दूसरा भारतीयों पर जीत का कोई दबाव नहीं था। कुछ लोग तो उस समय मान रहे थे कि इस आड़ में भारत में क्रिकेट को दोबारा प्रतिष्ठा दिलाने का योजनाबद्ध प्रयास किया गया है। यह योजना वैसे ही सफल हुई जैसे कि 1983 में एक दिवसीय विश्व क्रिकेट कप में बीसीसीआई की टीम के जीतने पर क्रिकेट का वह प्रारूप भारत में लोकप्रिय हो गया। मतलब पच्चीस साल तक बाजार उस जीत को भुनाता रहा। अब हमारे लिये यह देखने का विषय है कि पिछली बीस ओवरीय प्रतियोगता की जीत को बाजार कब तक भुनाता रहेगा। इस बात तो टीम पिट गयी इसलिये निश्चित रूप से क्रिकेट के इस व्यापर पर बुरा प्रभाव पड़ेगा-चाहे वह एक नंबर को हो या दो नंबर का। देखना है कि इस हार का मनौवैज्ञानिक और आर्थिक रूप से बाजार पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?
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जहर और अमृत -लघुकथा


वह कोई गेहुंआ वस्त्र पहने साधु या संत नहीं बल्कि कोई शिक्षित और सज्जन पुरुष थे। कहीं बैठकर लोगों से ज्ञान चर्चा कर रहे थे। उनके सामने तीन लोग श्रोता के रूप में बैठ कर उनकी बातें सुन रहे थे। उन सज्जन ज्ञानी पुरुष ने पुराने शास्त्रों से अनेक उद्धरण देते हुए कुछ महापुरुषों के संदेश भी सुनाये।
उनके पीछे एक अन्य व्यक्ति भी बैठा यह सब सुन रहा था। उसे यह चर्चा बेकार की लग रही थी। अचानक वह उठा और उन सज्जन पुरुष के पास आकर उनसे बोला- तुम यह क्या बकवास कर रहे हो? इस ज्ञान चर्चा से क्या होगा,? तुम इतना सब सुना रहे हो वह सब मैंने भी किताबों में पढ़ा है पर तुम्हारी तरह इधर उधर ज्ञान नहीं बघारता। तुम इतना ज्ञान बघार रहे हो पर क्या उस पर चलते भी हो?‘
उस सज्जन ने कहा-‘कोशिश बहुत करता हूं कि उस राह पर चलूं। अब यह तो लोग ही बता सकते हैं कि मेरा व्यवहार किस तरह का है? बाकी रहा ज्ञान बघारने का सवाल तो भई, फालतू की बातें सोचने अैार कहने से अच्छा है तो इसी तरह की बातें की जाये। अच्छा, हम जब यह ज्ञान चर्चा कर रहे थे तब तुम्हारे मन में क्या विचार आ रहे थे।
उस आदमी ने कहा-‘मेरे को इस तरह की ज्ञान चर्चा पर गुस्सा आ रहा था। मैं तुम जैसे ढोंगियों को देखकर क्रोध में भर जाता हूं। पता नहीं यह तीनों तुम्हें कैसे झेल रहे थे?’
उन सज्जन ने कहा-‘मुझे बहुत दुःख है कि मेरी ज्ञान चर्चा से तुम्हें बहुत गुस्सा आया पर मैं भी अनेक ढोंगियों को देखता हूं पर गुस्सा बिल्कुल नहीं होता। उनकी ज्ञान की बातें सुनता हूं पर उनके आचरण पर ध्यान देकर अपना मन खराब नहीं करता। वैसे तुम इन श्रोताओं से पूछो कि आखिर हम दोनों में वह किसे पसंद करेंगे?’
उन्होंने तीनों श्रोताओं की तरफ प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा तब एक श्रोता उस बीच में बोलने वाले आदमी से बोला-‘हम इन सज्जन पुरुष की बातें सुन रहे थे तो मन को शांति मिल रही थी। हमें इससे क्या मतलब कि यह कहां से आये है और क्या करते हैं? बस इनकी बातें सुनकर आनंद आ रहा था। यह सब बातें हमने भी सुनी है पर इनके मुख से सुनकर भी अच्छा लगा रहा था। हां, तुम्हारे बीच में आने से जरूर हमें दुःख पहुंचा है।’
दूसरा श्रोता ने कहा-‘तुमने बताया कि तुमने यह सब पढ़ा है तो हमने भी सुना है। इन सज्जन की वाणी से हमें सुख मिल रहा था पर तुम्हारे आने से ऐसा लग रहा है कि जैसे यज्ञ में किसी राक्षस ने बाधा डाली हो!
तीसरे कहा-‘तुम्हारी अंतदृष्टि में यह सज्जन ढोंगी हैं पर हमारी नजर में ज्ञानी हैं क्योंकि इनकी बात से हमें आत्मिक सुख मिल रहा था भले ही यह पुरानी बातें दोहरा रहे हैं मगर तुम शिक्षित और ज्ञानी होते हुए भी भटक रहे हो क्योंकि ज्ञान धारण न भी किया हो पर उसकी चर्चा कर अच्छा वातावरण तो बनाया जा सकता है और तुमने इसे विषाक्त बना दिया।’
बीच में बोलने वाले सज्जन का मूंह उतर गया। वह पैर पटकता हुआ वहां से चला गया तो एक श्रोता ने उस सज्जन से कहा-‘आखिर यह आपकी बात पर गुस्सा क्यों हुआ?’
सज्जन ने कहा-‘भई, एक तो यह अपने घर से परेशान होगा दूसरे यह कि इस समाज में ज्ञान चर्चा केवल गेहूंए वस्त्र पहनने वाले ही कर सकते हैं। उन्होंने इतनी सामाजिक और राजनीतिक शक्ति एकत्रित कर ली होती है कि किसी की हिम्मत नहीं होती कि सामने जाकर कोई उनको ढोंगी कह सके इसलिये उनकी कुंठायें ऐसे लोगों के सामने निकालते हैं जो सादा वस्त्र पहनकर ज्ञान चर्चा करते हैं। सभी सुविधायें जुटाकर सन्यासी होने का ढोंग करने वालों से कहना कठिन है पर कोई सद्गृहस्थ ज्ञान चर्चा करे तो उस पर उंगली उठाकर अपनी कुंठा निकालना अधिक आसान है। शायद इसलिये उसने जमाने भर का गुस्सा यहां निकाल दिया। बहरहाल तुम उसकी बात भूल जाना क्योंकि इससे तुम्हारे अंदर उसका फैलाया विष असर दिखाने लगेगा और अगर मेरी बात से कुछ बूँद अमृत बना है तो वह भी दवा कर का नहीं कर पायेगा।
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पैसे के साथ इश्क में भी आ सकता है मंदी का दौर – हास्य व्यंग्य


क्वीसलैंड यूनिवर्सटी आफ टैक्लनालाजी के प्रोफेसर कि अनुसार इस मंदी के दौर में लोगों के दाम्पत्य जीवन पर कुप्रभाव पड़ रहा है। उनके अनुसार पैसा प्यार को मजबूत रखता है और उसकी कमी तनाव को जन्म देती है।
यह एक सच्चाई है। फिल्मों,साहित्यक कहानियों और हिंदी उर्दू शायरियों में जिस इश्क, प्यार या मोहब्बत का गुणगान किया जाता है वह केवल भौतिक साधनों के सहारे ही परवान चढ़ता है। फिल्मों की काल्पनिक कथायें देखते हुए हमारे देश के युवक युवतियां क्षणिक प्यार में जाने क्या क्या करने को तैयार हो जाते हैं और फिर न केवल अपने लिये संकट बुलाते हैं बल्कि परिवार को भी उसमें फंसाते हैं।

हमारा अध्यात्मिक ज्ञान तो यही कहता है कि प्रेम केवल सर्वशक्तिमान से हो सकता है पर अपने देश में एसी भी विचारधारायें भी प्रचलन में हैं जिनके अनुसार प्रियतम अपनी प्रेयसी को तो कहीं प्रेयसी को उसकी जगह बिठाकर आदमी को प्यार और मोहब्बत के लिये प्रेरित करती हैं। आपने फिल्मों में ऐसे गीत देखे होंगे जिसमें काल्पनिक प्रियतम की याद प्रेयसी और उसकी याद में प्रियतम ऐसे गीत गा रहा होता है जैसे कि भजन गा रहा हो। हम न तो ऐसे प्रेम का विरोध कर रहे हैं न उसका गुणगान कर रहे हैं बल्कि यह बता रहे हैं कि प्रेमी जब गृहस्थ के रूप में बदल जाते हैं तक अपनी दैहिक आवश्यकताओं के लिये धन की जरूरत होती है और तभी तय होता है कि वह कथित प्रेम किस राह चलेगा।

वैसे हमने अपने जीवन में देखा है कि जब को लड़का किसी लडकी की तरफ आकर्षित होता है तो उसे प्रेम पत्र लिखकर या वाणी से बोलकर किसी ऐसी जगह ही आमंत्रित करता है जहां खाने पीने के लिये एकांत वाली जगह हो। वहां डोसा,सांभर बड़ा या समौसे कचैड़ी खाते हुए प्रेम परवान चढ़ता है। वैसे आजकल पब सिस्टम भी शुरु हो गया है। यह बात पहले पता नहीं थी पर आजकल कुछ घटनायें ऐसी हो गयी हैं उससे यह जानकारी मिली है।

यह स्त्री पुरुष का दैहिक प्रेम पश्चिमी विचारधारा पर आयातित है तो तय है कि उसके लिये मार्ग भी वैसे ही बनेंगे जैसे वहां बने हैं। वैसे इस दैहिक प्रेम का विरोध तो सदियों से हर जगह होता आया है पुराने समय में इक्का दुक्का घटनायें होती थीं और प्यार के विरोध में केवल परिवार और रिश्तेदार ही खलनायक की भूमिका अदा करते थे। अब तो सब लोग खुलेआम प्रेम करने लगे हैं और हालत यह है कि परिवार के लोग विरोध करें या नहीं पर बाहर के लोग सामूहिक रूप से इसका प्रतिकार कर उसे प्रचार देते हैं। यह भी होना ही था पहले प्यार एकांत में होता था अब भीड़ में होने लगा है तो फिर विरोध भी वैसा होता है। इस दैहिक प्यार की महिमा जितनी बखान की जाती है उतनी है नहीं पर जब कोई खास दिन होता है तो उसकी चर्चा सारे दिन सुनने को मिलती है।

वैसे तो देखा जाये कोई किससे प्यार करने या न करे उसका संबंध बाहर के लोगों से कतई नहीं है। पर रखने वाले रखते हैं और कहते हैं कि यह संस्कृति के खिलाफ है? आज तक हम उस संस्कृति का नाम नहीं जान पाये जो इसके खिलाफ है। हमारे अनेक सांस्कृतिक प्रतीक पुरुषों ने प्यार किया और अपनी प्रेयसियों से विवाह रचाया। अब यह जरूरी नहीं है कि उनकी विवाह पूर्व की प्रेमलीला कोई लंबी खिंचती या वह गाने गाते हुए इधर उधर फिरते। चूंकि यह व्यंग्य है इसलिये हम उनके नाम नहीं लिखेंगे पर जानते सभी हैं। सच बात तो यह है कि दैहिक प्रेम में आत्मिक भाव तभी ढूंढा जाता है दोनों प्रेमियो का मिलन सामाजिक नियमों के अनुसार हो जाता है। मगर आजकल हालत अजीब है कि कहीं विवाह पूर्व प्रेम ढूंढा जा रहा है तो कही विवाह के पश्चात् सनसनी के कारण से प्रेम पर चर्चा होती है।

बहरहाल हमारा मानना है कि चाहे जो भी हो जो लोग सावैजनिक जगहों पर प्रेम करने पर आमदा होते हैं उनकी तरफ अधिक ध्यान देना ही नहीं चाहिये। पिछले कुछ वर्षों से समाज में कामकाजी महिलाओंं की संख्या बढ़ती जा रही है-यह अलग बात है कि उसके बावजूद गृहस्थ महिलाओं की संख्या बहुत अधिक हैं। ऐसे में अगर वह अविवाहित हैं तो उनके संपर्क अपने कार्यस्थल पर काम कर रहे या कार्य के कारण पासं आने वाले युवकों से हो जाते हैं। लड़कियां क्योंकि कामाकाजी होती हैं इसलिये वह विवाह से पहले अपने मित्रों को पूरी तरह परखना चाहती हैं। ऐसे में कुंछ युवतियां अपने परिवार में संकोच के कारण नहीं बताती क्योंकि उनको लगता है कि इससे माता पिता और भाई नाराज हो जायेंगे। फिर क्या पता लड़का हमें ही न जमें। कुछ मामलों में तो देखा गया है कि कामकाजी लड़कियों के माता पिता पहले कहीं अपनी कामकाजी लड़की के रिश्ते की बात चलाते हैं फिर लड़की से कहा जाता है कि वह लड़का देख कर अपना विचार बताये-तय बात है कि यह मिलने लड़की और लड़के का अकेले ही होता है और उस समय कोई उनका परिचित देख ले तो यही कहेगा कि कोई चक्कर है।

बहरहाल संस्कृति और संस्कार के रक्षकों के सामने अपने विचारों का स्वरूप स्पष्ट नहीं होता बस नारे लगाते हुए चले जाते हैं। उनको लगता है कि सार्वजनिक जगहों पर अविवाहित युवक युवतियों का उठना बैठना संस्कृति को नष्ट कर देगा। यह हास्यास्पद है। हम बात कर रहे थे मंदी से प्रेम के बाजार में मंदी आने की। इस समय रोजगार के अवसरों में कमी हो रही है और ऐसे में इस समय जो कामकाजी जोड़े हैं वह प्यार कर कभी न कभी विवाह में बंधन में बंध जायेंगे। नये जोड़ों के सामने तो केवल नौकरी ढूंढने का ही संकट बना रहने वाला है। उनको अपना वक्त नौकरी ढूंढने में ही नष्ट करना होगा तो प्यार क्या खाक करेंगे? यह संकट निम्न मध्यम वर्ग के लोगों में ही अधिक है और इस वर्ग के सामने रोजगार के नये अवसरों का संकट आता दिख रहा है। कुछ अर्थशास्त्रियेां का मानना है कि अगले चार साल तक यह मंदी रहने वाली है और इसमें ऐसे अनेक व्यवसायिक स्थान संकट में फंस सकते हैं जो जोड़ों को मिलने मिलाने के सुगम और एकांत अवसर प्रदान करते हैंं। फिर रोजगार के संकट के साथ कम वेतन भी एक कारण हो सकता है जो प्रेम के अवसर कम ही प्रदान करे।

अपने देश में देशी विद्वानों की बात तो मानी नहीं जाती। इसलिये यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यह कथन एक विदेशी विद्वान का ही है कि पैसे से ही प्यार मजबूत होता है और मंदी का यही हाल रहा तो प्यार का असर कम हो जो जायेगा। यह अलग बात है कि प्रचार बनाये रखने के लिये कुछ प्रेम कहानियंा फिक्स कर दिखायी जायें पर जब मंदी की मार प्रचार माध्यमों पर पड़ेगी तो वह कितनी ऐसी कहानियां बनवायेंगे? सो संस्कार और संस्कृति रक्षकों को चादर तानकर सो जाना चाहिये। आज नहीं तो कल दैहिक प्रेम-जो कि पैसे के कारण ही परवान चढ़ता है-अपना अस्तित्व खो बैठेगा। तब उनके विचारों के कल्पित समाज अपनी राह पर फिर संस्कारों और संस्कृति के सााि चलेगा।
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संत कबीर के दोहे: भक्ति और ध्यान एकांत में करें


चर्चा करु तब चौहटे, ज्ञान करो तब दोय
ध्यान करो तब एकिला, और न दूजा कोय

संत श्री कबीरदास जी का कथन है जब ज्ञान चर्चा चौराहै पर करो पर जब उसका अध्ययन करना हो तो दो लोगों की बीच में ही ठीक है। ज्ञान के बारे में जब ध्यान, चिंतन और मनन करना हो तो उसे एकांत में ही रहे जहां कोई दूसरा व्यक्ति न हो।
अष्ट सिद्धि नव निधि लौं, सबही मोह की खान
त्याग मोह की वासना, कहैं कबीर सुजान

संत श्री कबीरदास का कथन है कि आठों सिद्धियां और नवों निधियां तो मोह की खान है। अतः इस मोह को त्याग करना ही श्रेयस्कर है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हम लोग अक्सर यह कहते हैं कि अमुक संत सिद्ध है और उसकी शरण लेना चाहिए या वह तो बहुत पहुंचे हुए हैं। कई कथित संत और साधु अपने लिये बकायदा विज्ञापन करते हैं जैसे कि बहुत बड़े सिद्ध हों। यह सब ढोंग हैं। अनेक लोग मंत्रों आदि के द्वारा काम सिद्ध करने का दावा करते हैं। यह सब मोह से उपजा भ्रम है। सिद्धियां और निधियों की आड़ में अनेक लोग धंधा कर रहे हैं। सिद्धि केवल मन की शांति के रूप में ही है बाकी तो दुनियां चलती है। माया का भंडार पास में हो पर अगर मन अशांत हो तो वह भी व्यर्थ नजर आता है। इस प्रकार की मानसिक शांति लिये तत्व ज्ञान होना चाहिये। वैसे तो इसके लिये गुरु का होना जरूरी है पर न मिले तो किसी समक+क्ष व्यक्ति के साथ बैठकर स्वाध्याय करना चाहिये। उसके बाद अकेले ध्यान में बैठकर अपने द्वारा ग्रहण तत्व पर विचार करना ही ठीक है। हां, उसकी चर्चा चार लोगों के करने में कोई बुराई नहीं है। इस चर्चा से न केवल अपने दिमाग में मौजूद ज्ञान का पूर्नस्मरण हो जाता है और वह पुष्ट भी होता है।

हम जो ज्ञान प्राप्त करें उससे अपने आपको सिद्ध मान लेना मूर्खता है क्योंकि तत्व ज्ञान का रूप अत्यंत सूक्ष्म है पर उसका विस्तार इतना दिया जाता है कि लोग उसका लाभ व्यवसायिक रूप से उठाते हैं। अनेक सिद्धियों और निधियों का प्रचार इस तरह किया जाता है जैसे वह दुनियां में रह मर्ज की दवा हैं। इनसे दूर होकर अपने स्वाध्याय, ध्यान और ज्ञान से अपने मन के विकार दूर करते रहना चाहिये।
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हादसों से सीखा, अफ़सानों ने समझाया-व्यंग्य कविता


कुछ हादसों से सीखा
कुछ अफसानों ने समझाया।
सभी जिंदगी दो चेहरों के साथ बिताते हैं
शैतान छिपाये अंदर
बाहर फरिश्ता दिखाते हैं
आगे बढ़ने के लिये
पीठ पर जिन्होंने हाथ फिराया।
जब बढ़ने लगे कदम तरक्की की तरफ
उन्होंने ही बीच में पांव फंसाकर गिराया।
इंसान तो मजबूरियों का पुतला
और अपने जज़्बातों का गुलाम है
कुदरत के करिश्मों ने यही बताया।
…………………….
कदम दर कदम भरोसा टूटता रहा
यार जो बना, वह फिर रूठता रहा।
मगर फिर भी ख्यालात नहीं बदलते
भले ही हमारे सपनों का घड़ा फूटता रहा
हमारे हाथ की लकीरों में नहीं था भरोसा पाना
कोई तो है जो निभाने के लिए जूझता रहा।
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मनु स्मृति-दूध से बनी चावल की खीर और रबड़ी हानिकारक


वृथाकृसरसंयावं पायसायूपमेव च।
अनुपाकृतमासानि देवान्नानि हर्वषि च।।
हिंदी में भावार्थ
-तिल, चावल की दूध में बनी खीर,दूध की रबड़ी,मालपुआ आदि स्वास्थ्य के हानिकाकाकर हैं अतः उनके सेवन से बचना चाहिये।
आरण्यानां च सर्वेषां मृगानणां माहिषां बिना।
स्त्रीक्षीरं चैव वन्र्यानि सर्वशक्तुनि चैव हि।।
हिंदी में भावार्थ-
भैंस के अतिरिक्त सभी वनैले पशुओं तथा स्त्री का दूध पीने योग्य नहीं होता। सभी सड़े गले या बहुत खट्टे पदार्थ खाने योग्य नहीं होते। इस सभी के सेवन से बचना चाहिये।
दधिभक्ष्यं च शुक्तेषु सर्वे च दधिसम्भवम्।
यानि चैवाभियूशयन्ते पुष्पमूलफलैः शुभैः।।
हिंदी में भावार्थ-
शुक्तों में दही तथा उससने वाले पदार्थ-मट्ठा तथा छाछ आदि-तथा शुभ नशा न करने वाले फूल, जड़ तथा फल से निर्मित पदार्थ-अचार,चटनी तथा मुरब्बा आदि-भक्षण करने योग्य है।
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चाणक्य नीति-बुरे संस्कार वालों के साथ बैठकर खाना भी न खाएं


नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि
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अर्थार्थीतांश्चय ये शूद्रन्नभोजिनः।
त द्विजः कि करिष्यन्ति निर्विषा इन पन्नगाः।।

हिंदी में भावार्थ- नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि अर्थोपासक विद्वान समाज के लिये किसी काम के नहीं है। वह विद्वान जो असंस्कारी लोगों के साथ भोजन करते हैं उनको यश नहीं मिल पता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- इस देश का अध्यात्मिक ज्ञान सदेशों के अनमोल खजाने से भरा पड़ा है। उसका कारण यह है कि प्राचीन विद्वान अर्थ के नहीं बल्कि ज्ञान के उपासक थे। उन्होंने अपनी तपस्या से सत्य के तत्व का पता लगाया और इस समाज में प्रचारित किया। आज भी विद्वानों की कमी नहीं है पर प्रचार में उन विद्वानों को ही नाम चमकता है जो कि अर्थोपासक हैं। यही कारण है कि हम कहीं भी जाते हैं तो सतही प्रवचन सुनने को मिलते हैं। कथित साधु संत सकाम भक्ति का प्रचार कर अपने भोले भक्तों को स्वर्ग का मार्ग दिखाते हैं। यह साधु लोग न केवल धन के लिये कार्य करते हैं बल्कि असंस्कारी लोगों से आर्थिक लेनदेने भी करते हैं। कई बार तो देखा गया है कि समाज के असंस्कारी लोग इनके स्वयं दर्शन करते हैं और उनके दर्शन करवाने का भक्तों से ठेका भी लेते हैं। यही कारण है कि हमारे देश में अध्यात्मिक चर्चा तो बहुत होती है पर ज्ञान के मामले में हम सभी पैदल हैं।
समाज के लिये निष्काम भाव से कार्य करते हुए जो विद्वान सात्विक लोगों के उठते बैठते हैं वही ऐसी रचनायें कर पाते हैं जो समाज में बदलाव लाती हैं। असंस्कारी लोगों को ज्ञान दिया जाये तो उनमें अहंकार आ जाता है और वह अपने धन बल के सहारे भीड़ जुटाकर वहां अपनी शेखी बघारते हैं। इसलिये कहा जाता है कि अध्यात्म और ज्ञान चर्चा केवल ऐसे लोगों के बीच की जानी चाहिये जो सात्विक हों पर कथित साधु संत तो सार्वजनिक रूप से ज्ञान चर्चा कर व्यवसाय कर रहे हैं। वह अपने प्रवचनों में ही यह दावा करते नजर आते हैं कि हमने अमुक आदमी को ठीक कर दिया, अमुक को ज्ञानी बना दिया।
अतः हमेशा ही अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लये ऐसे लोगों को गुरु बनाना चाहिये जो एकांत साधना करते हों और अर्थोपासक न हों। उनका उद्देश्य निष्काम भाव से समाज में सामंजस्य स्थापित करना हो।
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मनुस्मृति- कठिन जगह पर जाने से बचें


मनु महाराज कहते हैं कि
—————–

अधितिष्ठेन केशांस्तु न भस्मास्थिक पालिकाः।
न कार्पासास्थि न तुषादीर्धमायुजिजीविषुः।।

हिंदी में भावार्थ- जिस व्यक्ति के हृदय में लंबी आयु पाने की इच्छा है उसे कभी बालों, भस्म, हड्डी, खप्पर, कपास की गुठली तथा भूसे के ढेर पर नहीं बैठना चाहिये।
अचक्षुविंषयं दुर्ग न प्रपद्येत कहिंचित्।
न विणुमूत्रमुदीक्षेत न बाहुभ्यां नदीं तरेत्।।

हिंदी में भावार्थ-नीति विशारद चाणक्य कहा कहना है कि जो दुर्गम स्थान आंखों से देखने में कठिन हों वहां कतई नहीं जाना चाहिये। अपनी देह से बाहर निकले मलमूत्र को नहीं देखना चाहिये। किसी नदी को अपने बाहुबल से पार करने का प्रयास नहीं करना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अनेक बार पर्यटन के दौरान ऐसे स्थान सामने आते हैं जो बहुत दुर्गम होते हैं। उनको पेड़ पौद्यों ने घेर रखा होता है। वहां की हरियाली का सौंदर्य देखते ही बनता है पर अगर वह दुर्गम और अगम्य हैं तो वहां जाना खतरनाक हो सकता है। पिकनिक और पर्यटन के दौरान ऐसी अनेक दुर्घटनायें होती हैं जो लोगों के दुस्साहस और अज्ञान के कारण होती है। वैसे भी कहा जाता है कि आग, पान, और हवा से कभी नहीं खेलना चाहिये। आदमी कितना भी अच्छा तैराक क्यों न हो उसे नदी के पार जाने के लिये जल वाहनों का प्रयोग करना चाहिये। अनावश्यक दुस्साहस जीवन के लिये कष्टकारक होता है।
इन संदेशों का जीवन के संदर्भ में भी बहुत महत्व है। हमें अपने लक्ष्य और उद्देश्य हमेशा ही ऐसे तय करना चाहिये जिनकी प्राप्ति सहज हो। अपनी शक्ति और साधनों से अधिक महत्वाकांक्षी उद्देश्य और लक्ष्य संकट का कारण हो सकते हैं। इतना ही नहीं ऐसे स्थानों पर निवास करने का विचार भी नहीं करना चाहिये जहां के लोगों की प्रवृत्ति दुर्गम और क्रूर हो। इस विश्व में अनेक संस्कृतियां और समाज हैं। उनके परस्पर इतिहास, भूगोल, संस्कार, शिक्षा और ज्ञान की दृष्टि से ढेर सारे विरोधाभास हैं। यही विरोधाभास लोगों के आपसी संबंध को प्रगाढ़ बनाने में बाधक हैं। अतः जहां अपने समाज से विरोधी संस्कार वाला समाज हो वहां रहने का आशय यही है कि स्वयं ही दुर्गम स्थान पर जाना जो भारी कष्ट का कारण बन जाता है। जो व्यक्ति अपना समाज, शहर या अपना देश छोड़कर दूसरी जगह जाते हैं और वहां उनको सामाजिक और वैचारिक दृष्टि से आपसी मेलमिलाप वाले लोग नहीं मिलते तब उनके लिये जीवन दुरुह हो जाता है।
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प्रेमियों का चंद्रमा पर बसेरा-हास्य व्यंग्य कविता


सड़क से गुजर रहे वाहनों
और उद्यान में बच्चों का शोर
प्रेमिका हो गयी बोर
उसका चेहरा देखकर प्रेमी ने कहा
’क्या बात है प्रिया
तुम उदास क्यों हो?
कोई इच्छा हो तो बताओ
तुम कहो तो आकाश से
चंद्रमा जमीन पर उतार लाऊं।’

पहले तो गुस्से में प्रेमिका ने प्रेमी को देखा
फिर अचानक उसकी आंखें चमकने लगी
नासिका में जैसे ताजी हवा महकने लगी
वह बोली-
‘व्हाट इज आइडिया
जल्दी करो
पर चंद्रमा को धरती पर नहीं लाने की
बल्कि वहां मकान बनाने की
देखों यहां
बाग में बच्चों का भारी है शोर
उधर सड़क से गुजरते वाहनों का धुंआं
और उनके इंजिन की आवाज है घनघोर
चारों तरफ लाउडस्पीकरों पर जोर बजते हुए
सर्वशक्तिमान को प्रसन्न करने वाले गाने
कर देते हैं बोर
सुना है चंद्रमा पर भूखंड मिलने की तैयारी है
तुम भी एक जाकर पंजीयन करा लो
इस जहां में विषाक्त हो गया है वातावरण
क्या करेंगे यहां घर बसाकर
फंस जायेंगे गृहस्थी में, विवाह रचाकर
तुम उससे पहले भूखंड लेने की तैयारी शुरु करो
तो मैं सभी को जाकर समाचार बताऊं।’’

उसके जाने के बाद प्रेमी ने
आसमान की तरफ हाथ उठाये और बोला-
”क्या मुसीबत है
किसने बनाई थी
मोहब्बत में यह चंद्रमा और तारे तोड़कर
जमीन पर लाने की बात
शायद नहीं सोता होगा वह पूरी रात
जमाना बदल गया है
तो इश्क में बात करने का लहजा भी बदलना था
अब क्या यह आसान है कि
मैं चंद्रमा पर भूखंड पर लेकर मकान बनाऊं
इससे अच्छा तो यह होगा कि
इज्जत बचाने के लिये
अपनी प्रिया से मूंह छिपाऊं
किसी तरह उसे भुलाऊं।।”

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संत कबीर के दोहे-ह्रदय साफ नहीं तो माला फेरने से क्या लाभ



माला फेरै कह भयो, हिंरदा गाठि न खोय।
गुरु चरनन चित राखिये, तो अमरापुर जोय।।

माला तो कर में फिरै, जीभ फिरै मुख मांहि।
मनवा तो दहु दिशि फिरै, यह तो सुमिरन मांहि।।

संत शिरोमण कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य हाथ में माला फेरते हुए जीभ से परमात्मा का नाम लेता है पर उसका मन दसों दिशाओं में भागता है। यह कोई भक्ति नहीं है।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि हाथ में पकड़कर माला फेरने से कोई लाभ तब तक नहीं होता जब नाम स्मरण हृदय से नहीं किया जाये। यह तभी संभव है जब तब गुरु के चरणों में सिर झुकाकर आदर के साथ उनकी सेवा की जाये तभी अज्ञान और दोष मिट सकते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सत्संग में जाना हो या मंदिर में दर्शन करने, जब तक हम परमात्मा का ध्यान हृदय में स्थित नहीं करेंगे तब तक कोई लाभ नहीं होता। देखा जाये तो भक्ति और ज्ञान साधना अपने लौकिक और परलौकिक जीवन को सुखमय करने के लिये करते हैं पर हृदय में केवल भौतिक विषयों का ही ध्यान बना रहता है। भले ही हाथ में माला फेरते हुए परमात्मा का नाम लें या सत्संग में जाकर संतों के प्रवचन सुने पर मन का भटकाव को केवल सांसरिक विषयों में ही बना रहता है। हम वही चिंतायें दुःख और अवसाद हमेशा मस्तिष्क बने रहते हैं जिनसे परेशान होकर हम अध्यात्मिक शांति के लिये उन स्थानों पर जाते हैं जहां सत्संग होता है। इसलिये जब कहीं प्रवचन सुनने जायें या मंदिर में दर्शन करें तब अपने सांसरिक विषयों का विचार मस्तिष्क में नहीं आने देना चाहिये।
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‘‘मैं कुर्सी हूं, किसी की सगी नहीं’’-हास्य व्यंग्य कविता


कुर्सी पर चाहे लिपिक लिखा हो
या महाप्रबंधक
बस वह मिलना चाहिए।
अपने घर में जिस पर स्वयं बैठ सकें
वह लकड़ी की हो या लोहे की
कौन देखने आता है
कुर्सी का रुतबा तो बाहर ही
नजर आता है
न मिले तो बस नाम के आगे ही
तख्ती की तरह लग जाये
हम न बैठ सके तो कोई बात नहीं
नाम ही कुर्सी पर बैठा नजर आना चाहिए।।
…………………………..
कुर्सी बिन सून
जिसके पास नहीं है
लगता है उसका हो जैसे सफेद खून
………………..
चेले ने कहा गुरु से
‘बहुत दिन हो गये सेवा के नाम पर
आपकी चाकरी करते हुए
नहीं घुसा दिमाग में ब्रह्मज्ञान
दुनियांदारी खूब करवा ली
अब आप जाओ वानप्रस्थ
मत करो अब मुझे अधिक त्रस्त
अपनी कुर्सी अब मुझे दे दो
मेरे बैठने से परहेज है तो
अपनी पादुकायें वहां रखने के लिये दे दो
मेरे नाम के आगे गुरु की उपाधि
अब चिपकना चाहिए
इससे आपका भी बढ़ेगा मान।

………………………
कुर्सी किसी की सगी नहीं-लघु व्यंग्य
………………………
वह बड़ी कंपनी में क्लर्क था। उसे काम के सिलसिले में कार्यालय में अधर उधर जाना पड़ता था तब उसके सहकर्मियों से मिलने जो उनके मित्र मिलने आते या वही एक दूसरे से वार्तालाप करते तब उसकी कुर्सी वहां पहुंच जाती थी। वह वापस लौटता तो बाहर का कोई आदमी अगर बैठा तो उससे कुछ नहीं कह पाता इसलिये कुर्सी मिलने का इंतजार करना पड़ता और कोई अगर सहयोगी बैठा होता तो उससे उसका झगड़ा करता था। रोज रोज की चिकचिक से तंग आकर आखिर उसने अपनी कुर्सी को रस्सी से बांधने का बांध दिया ताकि वह उसकी अनुपस्थिति में भी वहीं उसका इंतजार करती रहे। थोड़ी देर बार वह कहीं गया और लौटा तो अपनी कुर्सी की तरफ जाते हुए उसका पांव उस रस्सी में फंस गया और गिर पड़ा। वहां मौजूद लोग उस पर हंसने लगे। उसने गुस्से में कुर्सी को लात मारते हुए गाली दी।
तब कुर्सी ने कहा-‘मैं कुर्सी किसी की सगी नहीं हूं। मुझे बांधकर रखने का यही नतीजा है। मेरे को कोई बांध नहीं सकता और जो बांधकर रखना चाहेगा वह ऐसे ही गिरेगा। मैं चाहती हूं लोग बदल बदल कर मेरे पास आते रहें । मैं कोई इंसान नहीं हूं कि किसी आदमी की तरह कुर्सी से चिपक कर रह सकूं।
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बाजार की आस्था या आस्था का बाजार-हास्य व्यंग्य


कहीं न्यूजीलैंड में इस बात को लेकर लोग नाराज है कि ‘हनुमान जी पर कंप्यूटर गेम बना दिया गया है और बच्चे उनकी गति को नियंत्रित करने का खेल कर रहे हैं।’ इससे उनकी धार्मिक आस्थायें आहत हो रही हैं। तमाम तरह के आक्षेप किये जा रहे हैं।
एक बात समझ में नहीं आती कि लोग अपने धार्मिक प्रतीकों को लेकर इस तरह के विवाद खड़ा कर आखिर स्वयं प्रचार में आना चाहते हैं या उनका उद्देश्य कंपनियों के उत्पाद का प्रचार करना होता है। कहीं किसी अभिनेत्री ने माता का मेकअप कर किसी रैंप में प्रस्तुति दी तो उस पर भी बवाल बचा दिया। टीवी चैनलों ने अपने यहां उसे दिखाया तो अखबारों ने भी इस समाचार का छापा। प्रचार किसे मिला? निश्चित रूप से अभिनेत्री को प्रचार मिला। अगर कथित धार्मिक आस्थावान ऐसा नहीं करते तो शायद उस अभिनेत्री का नाम कोई इस देश में नहीं सुन सकता था।
कई बार ऐसा हुआ कि अन्य धार्मिक विचाराधारा के लोगों ने अपने धार्मिक प्रतीकों के उपयोग पर बवाल मचाये हैं पर उनकी देखादेखी भारतीय आस्थाओं के मानने वाले भी ऐसा करने लगे तो समझ से परे है। कहने को भारतीय आस्थाओं के समर्थक कहते हैं कि ‘जब दूसरे लोगों के प्रतीकों पर कुछ ऐसा वैसा बनने पर बवाल मचता है तो हम क्यों खामोश रहे?’
यह तर्क समझ से परे है। इसका मतलब यह है कि भारतीय आस्थाओं को मानने वाले अपने अध्यात्मिक दर्शन का मतलब बिल्कुल नहीं समझते। नीति विशारद चाणक्य ने कहा है कि ‘हृदय में भक्ति हो तो पत्थर में भगवान हैं।’
यानि अगर हृदय में नहीं है तो वह पत्थर ही है जिसे दुनियां को दिखाने के लिये पूज लो-वैसे अधिकतर लोग अपने दिल को तसल्ली देने के लिये पत्थर की पूजा करते हैं कि हमने कर ली और हमारा काम पूरा हो गया। हमारा अध्यात्मिक दर्शन स्पष्ट कहता है कि सर्वशक्तिमान परमात्मा का कोई रूप नहीं है। उसके स्वरूप की कल्पना दिमाग में स्थापित कर उसका स्मरण करने का संदेश है पर अंततः निराकार में जाने का आदेश भी है।
अब अगर कोई कंप्यूटर पर हनुमान जी पर गेम बनाता है या कोई अभिनेत्री माता का चेहरा बनाकर रैंप पर अपनी प्रस्तुति देती है तो उसमें क्या आप सर्वशक्तिमान परमात्मा का रूप देख रहे हैं जो ऐसी आपत्ति करते हैं। अनेक प्रकार की भौतिक चीजों से बना कंप्यूटर अगर खराब हो जाये तो उस कोई आकृति नहीं दिख सकती। मतलब यह आकृतियां तो पत्थर की मूर्ति से भी अधिक छलावा है। उसमें अपनी अपने आस्थाओं की मजाक उड़ते देखने का अहसास ही सबसे बड़ा अज्ञान है-बल्कि कहा जाये कि उसे मजाक कहकर हम अपनी भद्द पिटवा रहे हैं। आस्था या भक्ति एक भाव है जिनको भौतिक रूप से फुटबाल मैच की तरह नहीं खेला जाता कि वह हम पर गोल कर रहा है तो उसे हमें गोलकीपर बनकर रोकना होगा या दूसरे ने गोल कर दिया है तो वह हमें उसी तरह उतारना है।
फिर आजकल यह मुद्दे ज्यादा ही आ रहे हैं। जहां तक मजाक का सवाल है तो अनेक ऐसी हिंदी फिल्में बन चुकी हैं जिसमें भारतीय संस्कृति से जुड़े अनेक पात्रों पर व्यंग्यात्मक प्रस्तुति हो चुकी है और उस पर किसी ने आपत्ति नहीं की। अब इसका एक मतलब यह है कि हम अपने धार्मिक प्रतीकों का सम्मान करना दूसरों से सीख रहे हैं। यह एक भारी गलती है। होना तो यह चाहिये कि हम दूसरों को सिखायें कि इस तरह धार्मिक प्रतीकों पर जो कार्यक्रम बनते हैं या प्रस्तुतियां होती हैं उससे मूंह फेर कर उपेक्षासन करें क्योंकि सर्वशक्तिमान के स्वरूप का कोई आकार नहीं है। अगर हमारे हृदय में हमारी आस्था दृढ है तो उसका कोई मजाक उड़ा ही नहीं सकता। अगर धार्मिक भाव से आस्था दृढ़ नहीं होती और वह ऐसी जरा जरा सी बातों पर हिलने लगती हैं तो इसका मतलब यह है कि हमारे हृदय में स्वच्छता का अभाव है। धार्मिक आस्था अगर ज्ञान की जननी नहीं है तो फिर उसका कोई आधार नहीं है।

दूसरा मतलब यह है कि उस कंप्यूटर गेम को शायद भारतीय बाजार में प्रचार दिलाने के लिये यह एक तरीका है। इससे यह संदेह होता है कि विरोध करने वाले अपनी आस्था का दिखावा कर रहे हैं। अब अगर कंप्यूटर पर कोई आकृति हनुमान जी की तरह बनी है तो हनुमान जी मान लेने का मतलब यह है कि वह आपके आंखों में ही बसते हैं, दिल में नहीं। दिल में बसे होते तो चाहे कितने प्रकार की आकृतियां बनाओ आपको वह स्वीकार्य नहीं हो सकती। बात इससे भी आगे कि अगर वह आपके इष्ट है तो आप भी उनके गेम को खेलिए-इससे वह रुष्ट नहीं हो जायेंगे। बस जरूरत है कि वह गेम भी आस्था और विश्वास से खेलें। अगर अपने इष्ट के स्वरूप में हमारी अटूट श्रद्धा है तो वह कभी इस तरह खेलने में नाराज नहीं होंगे और फिर हमसे परे भी कितना होंगे? जो पास होता है उसी के साथ तो खेला जाता है न!
वाल्मीकी ऋषि का नाम तो सभी ने सुना होगा। ‘मरा’ ‘मरा’ कहते हुए राम को ऐसा पा गये कि उन पर इतना बड़ा ग्रंथ रच डाला कि उनके समकक्ष हो गये। ऐसा कौन है जो भगवान श्रीराम को जाने पर वाल्मीकि को भूल जाये? आशय यह है कि आस्था और भक्ति दिखावे की चीज नहीं होती और न भौतिक रूप से इस जमीन पर बसती है कि वह टूटें और बिखरें।
इस तरह जिनकी आस्था हिलती है या टूटती है उनके दिल लगता है कांच के कप की तरह ही होती है। एक कप टूट गया दूसरा ले आओ। एक इष्ट की मूर्ति से बात नहीं बनती दूसरे के पास जाओ। उसके बाद भी बात नहीं बनती तो किसी सिद्ध के पास जाओ। इससे भी बात न बने तो अपनी भक्ति का शोर मचाओ ताकि लोग देखें कि भक्त परेशान है उसकी मदद करो। एक तरह से प्रचार की भूख के अलावा ऐसी घटनायें कुछ नहीं है। उनके लिये आस्था का हिलने का मतलब है सनसनी फैलाने का अवसर मिलना।
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भर्तृहरि नीति शतक- सच्चे भक्त बने व्यापारी नहीं


महाराज भर्तृहरि कहते है किकि वेदैः स्मृतिभिः पुराणपठनैः शास्त्रेर्महाविस्तजैः स्वर्गग्रामकुटीनिवासफलदैः कर्मक्रियाविभ्रमैः।
मुक्त्वैकं भवदुःख भाररचना विध्वंसकालानलं स्वात्मानन्दपदप्रवेशकलनं शेषाः वणिगवृत्तयं:।।

हिंदी में भावार्थ- वेद, स्मुतियों और पुराणों का पढ़ने और किसी स्वर्ग नाम के गांव में निवास पाने के लये कर्मकांडों को निर्वाह करने से भ्रम पैदा होता है। जो परमात्मा संसार के दुःख और तनाव से मुक्ति दिला सकता है उसका स्मरण और भजन करना ही एकमात्र उपाय है शेष तो मनुष्य की व्यापारी बुद्धि का परिचायक है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य अपने जीवन यापन के लिये व्यापार करते हुए इतना व्यापारिक बुद्धि वाला हो जाता है कि वह भक्ति और भजन में भी सौदेबाजी करने लगता है और इसी कारण ही कर्मकांडों के मायाजाल में फंसता जाता है। कहा जाता है कि श्रीगीता चारों वेदों का सार संग्रह है और उसमें स्वर्ग में प्रीति उत्पन्न करने वाले वेद वाक्यों से दूर रहने का संदेश इसलिये ही दिया गया है कि लोग कर्मकांडों से लौकिक और परलौकिक सुख पाने के मोह में निष्काम भक्ति न भूल जायें।

वेद, पुराण और उपनिषद में विशाल ज्ञान संग्रह है और उनके अध्ययन करने से मतिभ्रम हो जाता है। यही कारण है कि सामान्य लोग अपने सांसरिक और परलौकिक हित के लिये एक नहीं अनेक उपाय करने लगते हंै। कथित ज्ञानी लोग उसकी कमजोर मानसिकता का लाभ उठाते हुए उससे अनेक प्रकार के यज्ञ और हवन कराने के साथ ही अपने लिये दान दक्षिणा वसूल करते हैं। दान के नाम किसी अन्य सुपात्र को देने की बजाय अपन ही हाथ उनके आगे बढ़ाते हैं। भक्त भी बौद्धिक भंवरजाल में फंसकर उनकी बात मानता चला जाता है। ऐसे कर्मकांडों का निर्वाह कर भक्त यह भ्रम पाल लेता है कि उसने अपना स्वर्ग के लिये टिकट आरक्षित करवा लिया।

यही कारण है कि कि सच्चे संत मनुष्य को निष्काम भक्ति और निष्प्रयोजन दया करने के लिये प्रेरित करते हैं। भ्रमजाल में फंसकर की गयी भक्ति से कोई लाभ नहीं होता। इसके विपरीत तनाव बढ़ता है। जब किसी यज्ञ या हवन से सांसरिक काम नहीं बनता तो मन में निराशा और क्रोध का भाव पैदा होता है जो कि शरीर के लिये हानिकारक होता है। जिस तरह किसी व्यापारी को हानि होने पर गुस्सा आता है वैसे ही भक्त को कर्मकांडों से लाभ नहीं होता तो उसका मन भक्ति और भजन से विरक्त हो जाता है। इसलिये भक्ति, भजन और साधना में वणिक बुद्धि का त्याग कर देना चाहिये।
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चाणक्य नीतिः अपने घर के अन्दर की बात बाहर न कहें


नीति विशारद चाणक्य महाराज कहते हैं कि
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धन-धान्यप्रयोगेषु विद्य-संग्रहणेषु च।
आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत्।

हिंदी में भावार्थ-धन धान्य के व्यवहार, ज्ञान विद्या के संग्रह और खाने पीने में जो व्यक्ति संकोच या लज्जा नहीं करते वही जीवन में सुखी रहते हैं।

अर्थनाशं मनस्तापं गृहे दुश्चरितानि च।
वंचनं चाऽपमानं च मतिमान्न प्रकाशयेत्।।

हिंदी में भावार्थ-अपने धन का नाश, मन का दुःख, स्त्री की चरित्रहीनता और किसी अन्य व्यक्ति द्वारा वचनों के द्वारा कष्ट देने की बात सभी के सामने प्रकाशित नहीं करना चाहियै
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कुछ बातों सभी से कहना चाहिये और कुछ नहीं। अक्सर हम व्यग्र होने पर ऐसी बातें लोगों से कह जाते हैं जो नहीं कहना चाहिये। कभी व्यग्रता इतनी बढ़ जाती है कि कह ही नहीं पाते। नीति विशारद चाणक्य के अनुसार जिस बात से अपना अपमान होता हो या अपमान हो चुका हो वह बात किसी को नहीं बताना चाहिये। खासतौर से जब हमारे धन का नाश हमारी गलती से हो गया हो।
इसके अलावा कुछ बातें छिपानी भी नहीं चाहिये। अगर हमारे पास धन या खाद्यान्न नहीं है तो स्पष्टतः उस आदमी को बता देना चाहिये जिससे हमें मदद अपेक्षित है। किसी से कोई बात सीखने के लिये उसके सामने अपने अज्ञान को छिपाना ठीक नहीं है। अगर पेट में भूख हो कहीं अपने खाने का जुगाड़ नहीं हो पाता और कोई अन्य हमें भोजन का आग्रह करता है तो उसे अस्वीकार करना मूर्खता का काम है। कहने का तात्पर्य है कि जहां सम्मान की बात है तो ऐसी बात लोगों को नहीं बताना चाहिये जिससे हमारे अपमान का विस्तार हो साथ ही अपनी दैहिक और मानसिक आवश्यकताओं को दूसरों से छिपाना भी नहीं चाहिये।
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कबीर के दोहे: मधुमक्खी की तरह सुगंध ग्रहण करें


जो तूं सेवा गुरुन का, निंदा की तज बान
निंदक नेरे आय जब कर आदर सनमान

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अगर सद्गुरु के सच्चे भक्त हो तो निंदा को त्याग दो और कोई अपना निंदा करता है तो निकट आने पर उसका भी सम्मान करो।
माखी गहै कुबास को, फूल बास नहिं लेय
मधुमाखी है साधुजन, गुनहि बास चित देय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मक्खी हमेशा दुर्गंध ग्रहण करती है कि न फूलों की सुगंध, परंतु मधुमक्खी साधुजनों की तरह है जो कि सद्गण रूपी सुगंध का ही अपने चित्त में स्थान देती है।

तिनका कबहूं न निंदिये, पांव तले जो होय
कबहुं उडि़ आंखों पड़ै, पीर धनेरी होय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कभी पांव के नीच आने वाले तिनके की भी उपेक्षा नहीं करना चाहिए पता नहीं कब हवा के सहारे उड़कर आंखों में घुसकर पीड़ा देने लगे।

जो तूं सेवा गुरुन का, निंदा की तज बान
निंदक नेरे आय जब कर आदर सनमान

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अगर सद्गुरु के सच्चे भक्त हो तो निंदा को त्याग दो और कोई अपना निंदा करता है तो निकट आने पर उसका भी सम्मान करो।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-यह सच्चे भक्त की पहचान है कि वह किसी की निंदा नहीं करते न ही किसी में दोष देखते हैं। जो नित प्रतिदिन भक्ति करते हैं और फिर परनिंदा में लग जाते हैं उनकी भक्ति में दोष है यही समझना चाहिये। वैसे आम आदमी की बात ही क्या कथित संत और साधु भी एक दूसरे की निंदा करते हैं। निंदा करना आदमी के अंदर मौजूद नकारात्मक सोच का परिणाम है। जिनके मन में परमात्मा के प्रति सत्य में भक्ति का भाव है उनका सोच सकारात्मक रहता है और वह दूसरों की अच्छाईयों पर ही विचार कर उनको ग्रहण करते हैंं।

दूसरों के दोष देखकर उसकी चर्चा करने से वह दोष हमारे अंदर स्वतः आ जाता है। कहते हैं कि आलोचक को अपने से दूर नहीं रखना चाहिये क्योंकि उसके श्रीमुख से अपने दोष सुनने से हमें वह अपने अंदर से निकालने का अवसर मिल जाता है। यह दोष निकलकर उसके अंदर से जाता कहां है? तय बात है कि वह आलोचक के अंदर ही जाता है। जिस तरह भगवान की भक्ति करने से उनका सानिध्य मिलता है उसी तरह दूसरे की निंदा करना या दोष देखने से वह भी हमें प्राप्त होता है। यह दुनियां वैसी ही जैसी हमारी नीयत है अतः अच्छा देखें तो वह अच्छी लगेगी और अगर खराब देखेंगे तो वैसा ही बुरा भी लगेगा।
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चाणक्य नीतिः ‘जस के साथ तस’ नीति में दोष नहीं


संसार विषवृक्षस्य द्वे फले अमृतोपमे।
सुभाषितं च सुस्वादु संगतिः सुजने जनै।।

हिन्दी में भावार्थ-नीति विशारद चाणक्य जी कहते हैं कि इस विषरूपी संसार में दो तरह के फल अमृत की तरह लगते हैं। एक तो सज्जन लोगों की संगत और दूसरा अच्छी वाणी सुनना।
कृते प्रतिकृतं कुर्याद् हिंसने प्रतिहिसंनम्।
तत्र दोषो न पतति दुष्टे दुष्टे सामचरेत्
हिंदी में भावार्थ-
अपने प्रति अपराध और हिंसा करने वाले के विरुद्ध प्रतिकार और प्रतिहिंसा का भाव रखने में कोई दोष नहीं है। उसी तरह दुष्ट व्यक्ति के साथ वैसे ही व्यवहार करना कोई अपराध नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में वैसे तो दुःख और विष के अलावा अन्य कुछ नहीं दिखता पर दो तरह के फल अवश्य हैं जिनका मनुष्य अगर सेवन करे तो उसका जीवन संतोष के साथ व्यतीत किया जा सकता है। इसमें एक तो है ऐसे स्थानो पर जाना जहां भगवत्चर्चा होती हो। दूसरा है सज्जन और गुणी लोगों से संगत करना। दरअसल इस स्वार्थी दुनियां में निष्काम भाव से कुछ समय व्यतीत करने पर ही शांति मिलती है और यह तभी संभव है जब हम स्वार्थ की वजह से बने रिश्तों से अलग ऐसे संतों और सत्पुरुषों की संगत करें जिनका हम में और हमारा उनमें स्वार्थ न हो। इसके अलावा आत्मा को प्रसन्न करने वाली कहीं कोई बात सुनने को मिले तो वह अवश्य सुनना चाहिये।
कहते हैं कि मन में बुरा भाव नहीं रखना चाहिये पर अगर कोई हमारे साथ बुरा बर्ताव करता है तो उससे चिढ़ हो ही जाती है। पंच तत्व से बनी इस देह में बुद्धि, मन और अहंकार ऐसी प्रकृतियां हैं जिन पर चाहे जितना प्रयास करो पर नियंत्रण हो नहीं पाता। सज्जन लोग किसी अन्य द्वारा बुरा बर्ताव करने पर उससे मन में चिढ़ जाते हैं पर बाद में वह इस बात से पछताते हैं कि उनके मन में बुरी बात आई क्यों? अगर किसी बुरे व्यक्ति के बर्ताव से गुस्सा आता है तो उससे विचलित होने की आवश्यकता नहीं है। वैसे जीवन में सतर्कता और सक्रियता आवश्यक है। कोई व्यक्ति हमारे अहित के लिये तत्पर है तो उसका वैसा ही प्रतिकार करने में कोई बुराई नहीं है। बस! इतना ध्यान रखना चाहिये कि उससे हम बाद में स्वयं मानसिक रूप से स्वयं प्रताड़ित न हों।
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लफ्ज़ ही इन्कलाब का सैलाब लाते-हिंदी शायरी


यह सच है कि लिखने से इंकलाब नहीं आते।
पर जमाना बदल दे, लफ्ज ही ऐसा सैलाब लाते।।
किसी के लफ्ज पर ही तो तलवारें म्यान से निकलीं
खूनी जंग में गूंजती चीखें, कान गीत को तरस जाते।।
किताबों ने आदमी को गुलाम बनाकर रख दिया
लफ्जों की लड़ाई में लफ्ज ही तलवार बन पाते।।
चीखते हुए तलवार घुमाओ या कलम पर करो भरोसा
मरा आदमी किस काम का, लफ्ज उसे गुलाम बनाते।।
कहें दीपक बापू दूसरों के लिखे पर चलते रहे हो
गुर्राने से क्या फायदा, क्यों नहीं मतलब के शब्द रच पाते।।
हथियार फैंकने और मारने वाले बहुत मिल जायेंगे
उनको रास्ता बताने के लिये, क्यों नहीं गीत गजल सजाते।।

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यह जिंदगी शब्दों का खेल है-हिंदी शायरी


महलों में रहने वाले भी ज्यादा पेट नहीं भर पाते-हिन्दी शायरी
आकाश से टपकेगी उम्मीद
ताकते हुए क्यों अपनी आंखें थकाते हो।
कोई दूसरा जलाकर चिराग
तुम्हारी जिंदगी का दूर कर देगा अंधेरा
यह सोचते हुए
क्यों नाउम्मीदी का भय ठहराते हो।।

खड़े हो जिन महलों के नीचे
कचड़ा ही उनकी खिड़कियों से
नीचे फैंका जायेगा
सोने के जेवर हो जायेंगे अलमारी में बंद
कागज का लिफाफा ही
जमीन पर आयेगा
निहारते हुए ऊपर
क्यों अपने आपको थकाते हो।

उधार की रौशनी से
घर को सजाकर
क्यों कर्ज के अंधेरे को बढ़ाते हो
जितना हिस्से में आया है तेल
उसमें ही खेलो अपना खेल
देखकर दूसरों के घर
खुश होना सीख लो
सच यह है कि महलों में रहने वाले लोग भी
झौंपड़ी में रहने वालों
से ज्यादा पेट नहीं भर पाते
तुम उनकी खोखली हंसी पर
क्यों अपना ही खून जलाते हो।

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शब्दों के चिराग-हिंदी शायरी
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यह जिंदगी शब्दों का खेल है
जो समझे वह पास
जो न समझे वही फेल है।
कहीं तीरों की तरह चलते हैं
कहीं वीरों की तरह मचलते हैं
लहु नहीं बहता किसी को लग जाने से
जिसे लगे उसे भी
घाव का पता नहीं लगता
दूसरों को ठगने वाले
को अपने ठगे जाने का
पता देर से लगता
कई बार अर्थ बदलकर
शब्द वार कर जाते हैं
जिसके असर देर से नजर आते हैं
जला पाते हैं वही शब्दों के चिराग
जिनमें अपनी रचना के प्रति समर्पण का तेल है।

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वही नायक बनेगा-हास्य व्यंग्य कविताएँ


रीढ़हीन हो तो भी चलेगा।
चरित्र कैसा हो भी
पर चित्र में चमकदार दिखाई दे
ऐसा चेहरा ही नायक की तरह ढलेगा।

शब्द ज्ञान की उपाधि होते हुए भी
नहीं जानता हो दिमाग से सोचना
तब भी वह जमाने के लिये
लड़ता हुआ नायक बनेगा।
कोई और लिखेगा संवाद
बस वह जुबान से बोलेगा
तुतलाता हो तो भी कोई बात नहीं
कोई दूसरा उसकी आवाज भरेगा।

बाजार के सौदागर खेलते हैं
दौलत के सहारे
चंद सिक्के खर्च कर
नायक और खलनायक खरीद
रोज नाटक सजा लेते हैं
खुली आंख से देखते है लोग
पर अक्ल पर पड़ जाता है
उनकी अदाओं से ऐसा पर्दा पड़ जाता
कि ख्वाब को भी सच समझ पचा लेते हैं
धरती पर देखें तो
सौदागर नकली मोती के लिये लपका देते हैं
आकाश की तरफ नजर डालें
तो कोई फरिश्ता टपका देते हैं
अपनी नजरों की दायरे में कैद
इंसान सोच देखने बाहर नहीं आता
बाजार में इसलिये लुट जाता
ख्वाबों का सच
ख्यालों की हकीकत
और फकीरों की नसीहत के सहारे
जो नजरों के आगे भी देखता है
वही इंसान से ग्राहक होने से बचेगा।

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बादशाह बनने की चाहत-हिंदी शायरी
हीरे जवाहरात और रत्नों से सजा सिंहासन
और संगमरमर का महल देखकर
बादशाह बनने की चाहत मन में चली ही आती है।
पर जमीन पर बिछी चटाई के आसन
कोई क्या कम होता है
जिस पर बैठकर चैन की बंसी
बजाई जाती है।

देखने का अपना नजरिया है
चलने का अपना अपना अंदाज
पसीने में नहाकर भी मजे लेते रहते कुछ लोग
वह बैचेनी की कैद में टहलते हैं
जिनको मिला है राज
संतोष सबसे बड़ा धन है
यह बात किसी किसी को समझ में आती है।
लोहे, पत्थर और रंगीन कागज की मुद्रा में
अपने अरमान ढूंढने निकले आदमी को
उसकी ख्वाहिश ही बेचैन बनाती है।

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इन्टरनेट पर लिखते हुए कोई संकोच न करें-आलेख


नये लेखक लेखिकाओं को लिखते हुए इस बात की झिझक हो सकती है कि उनके लिखे पर कोई हंसे नहीं। वह समाचार पत्र पत्रिकाओं में तमाम प्रसिद्ध लेखकों की रचनायें पढ़कर यह सोचते होंगे कि वह उन जैसा नहीं लिख सकते। कई युवक युवतियां तो ऐसे हैं जो अपनी रचनायें लिखकर अपने पास ही रख लेते हैं कि कहीं कोई उस पर पढ़कर हंसे नहीं। संभव है ऐसे ही कुछ नये लेखकों के पास इंटरनेट की सुविधा के साथ ब्लाग लिखने की तकनीकी जानकारी भी हो पर वह इसलिये नहंी लिखते हों कि ‘कहीं कोई पढ़कर मजाक न उड़ाये।’

ऐसे नये लेखक अपने आप को भाग्यशाली समझें कि उनके पास अंतर्जाल पर ब्लाग लिखने के अवसर मौजूद हैं जो पुराने लेखकों के पास नहीं थे। हां, उन्हें लिखने को लेकर अपने अं्रदर कोई संकोच नहीं करना चाहिये। वह जिन पत्र पत्रिकाओं के प्रसिद्ध लेखकों की रचनाओं को लेकर अपने अंदर कुंठा पाल लेते हैं उनके बारे में अधिक भ्रम उन्हें नहीं रखना चाहिये। वैसे तो हर आदमी जन्मजात लेखक होता है पर अभ्यास के बाद वह समाज में लेखक का दर्जा प्राप्त करता है। अगर आप लिखना प्रारंभ करें तो धीरे धीरे आपको लगने लगेगा कि जिन बड़े लेखकों को पढ़कर आप कुंठा पाल रहे थे उनसे सार्थक तो आप लिख रहे है। सच बात तो यह है कि स्वतंत्रता के बाद देश में हर क्षेत्र में ठेकेदारी का प्रथा का प्रचलन शुरु हो गया जिसमें बाप जो काम करता है बेटा उसके लिये उतराधिकारी माना जाता है। यही हाल हिंदी लेखन का भी रहा है।

अनेक लोग ऐसे भी हैं जो हिंदी में बेहतर नाटक,कहानी या उपन्यास न लिखने की शिकायत करते हैं। दरअसल यह वही लोग हैं जो ठेकेदारी के चलते प्रसिद्धि प्राप्त कर गये हैं पर उनको हिंदी के सामान्य लेखक के मनोभाव का ज्ञान नहीं रहा। हिंदी में बहुत अच्छा लिखने वालों की कमी नहीं है पर उनको अवसर देने वाले तमाम तरह के बंधन लगा कर उन्हें अपनी मौलिकता छोड़ने को बाध्य करे देते हैं। यही कारण है कि पिछले पचास वर्षों से जातिवाद, क्षेत्रवाद,और भाषावाद के कारण हिंदी में बहुत कम साहित्य लिखा गया है। जिन लोगों ने इन वादों और नारों की पूंछ पकड़कर प्रसिद्धि की वैतरणी पार की है उनका सच आप तभी समझ पायेंगे जब अंतर्जाल पर स्वतंत्र लेखन करेंगे। अधिकतर लेखक या तो प्रतिबद्ध रहे या बंधूआ। दोनों ही परिस्थितियों में मौलिक भाव का दायरा संकुचित हो जाता है।

अगर आप कविता लिखना चाहते हैं तो लिखिये। अब वह कविता इस तरह भी हो तो चलेगी।
होटल में जाने को मचलने लगा हमारा दिल
खाया पीया जमकर, बैठ गया वह जब आया बिल
या
फिल्मी गाने सुनते ऐसे हुए, चेहरे परं चांद जैसा लगता तिल
जब भी आता है कोई ऐसा चेहरा, गाने लगता अपना दिल

आप यह मत सोचिये कि कोई हंसेगा। हो सकता है कुछ लोग हंसें पर यह सबसे आसान काम है। कोई भी किसी पर हंस सकता है। आप तो यह मानकर चलिये कि आपने अपने मन की बात लिख ली यही बहुत है।
अगर आपको गद्य लिखने का विचार आया तो यह भी लिख सकते हैं।
आज मैं सुबह नहाया, फिर नाश्ता किया और उसके बाद बाहर फिल्म लिखने गया और रात को घर आया और खाना खाया और सो गया। अब कल सोचूंगा कि क्या करना है?

ऐसे ही आप लिखना प्रारंभ कर दीजिये। अभ्यास के साथ आप के अंदर का लेखक परिपक्व होता चला जायेगा। वैसे इसके साथ ही दूसरों का लिखा पढ़ें जरूर! दूसरे का पढ़ने से न केवल विषय के चयन का तरीका मिलता है बल्कि उससे अपनी एक शैली स्वतः निर्मित होती जाती है। हम जैसे पढ़ते हैं वैसे ही लिखने का मन करता है और फिर अपनी एक नयी शैली अपने आप हमारी साथी बन जाती है।
आप लोग पत्र पत्रिकाओं में बड़ी कहानियां,व्यंग्य और निबंध पढ़ते हैं और वैसा ही लिखना चाहते हैं तो इस पर अधिक विचार मत करिये। अंतर्जाल पर संक्षिप्तता का बहुत महत्व है। सबसे बड़ी बात यह है कि यहां मौलिकता और स्वतंत्रता के साथ लिखने की जो सुविधा है उसका उपयोग करना जरूरी है। इस लेखक से अनेक लोग अपनी टिप्पणियों में सवाल करते हैं कि आप अपनी रचनायें पत्र पत्रिकाओं में क्यों नहीं भेजते?
इसका सीधा जवाब तो यही है कि भई, हम तो पांच रुपये की डाक टिकट लगाकर लिफाफे भेजते हुए थक गये। अपनी रचना अपने हिसाब से की पर वह उन पत्र पत्रिकाओं के अनुकूल नहीं होती । वैसे अधिकतर समाचार पत्र पत्रिकाओं के वैचारिक, साहित्यक और व्यवसायिक प्रारूप हैं जिनके ढांचे में हमारी रचनायें फिट नहीं बैठती। हां, यह सच है कि आप जो लिखते हैं उसका उस पत्र या पत्रिका के निर्धारित प्रारूप में फिट होना आवश्यक है। जो लेखक इन प्रारूपों की सीमा में लिखते हैं वही प्रसिद्ध हो पाते हैं-यह सफलता भी उन्हीं लेखकों को नसीब में आती है जिनके संबंध होते हैं। अधिकतर पत्र पत्रिकाओं के मुख्यालय बड़े शहरों में होते हैं और छोटे शहरों के लेखक वहां तक नहीं पहुंच पाते। वैसे वह उनके तय प्रारूप के अनुसार लिखें तो तो भी इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि उनकी रचना छप ही जाये।
बहरहाल जिन नये लेखकों के अवसर मिल रहा है उनके लिये तो अच्छा ही है पर जिनको नहीं मिल रहा है वह यहां लिखें। उन्हें पत्र पत्रिकाओं वाले प्रारूपों का ध्यान नहीं करना चाहिये क्योंकि यहां संक्षिप्पता, मौलिकता और निष्पक्षता के साथ चला जा सकता है जबकि वहां कुछ न कुछ बंधन होता ही है। आपके ब्लाग एक जीवंत किताब की तरह हैं जो कहीं अलमारी में बंद नहीं होंगे और उन्हें पढ़ा ही जाता रहेगा। आप इस पर विचार मत करिये कि आज कितने लोगों ने इसे पढ़ा आप यह सोचिये कि आगे इसे बहुत लोग पढ़ने वाले हैं। मेरे ऐसे कई पाठ हैं जो प्रकाशित होने वाले दिन दस पाठक भी नहीं जुटा सके पर वह एक वर्ष कें अंदर पांच हजार की संख्या के निकट पहुंचने वाले हैं।
हिंदी लेखन में स्थिति यह हो गयी है कि लेखक की पारिवारिक, व्यवसायिक और सामाजिक परिस्थिति कें अनुसार उसकी रचना को देखा जाता है। यही कारण है कि पत्र पत्रिकाओं में लेखन से इतर कारणों से प्रसिद्धि हस्ती के लेखक प्रकाशित होते हैं या फिर उन अंग्रेजी लेखकों के लेख प्रकाशित होते हैं जो अंग्रेजी में आम पाठक की उपेक्षा से तंग आकर हिंदी की तरफ आकर्षित हुए-इस बारे में संदेह है कि वह स्वयं उनको लिखते होंगे क्योंकि उन्होंने ताउम्र अंग्रेजी में लिखा। संभवतः अपने लेखों को अंग्रेजी में लिखकर उसका हिंदी में अनुवाद कराते होंगे या बोलकर लिखवाते होंगे।

अगर कोई फिल्मी हीरो अपना ब्लाग बना ले तो उसे एक ही दिन में हजारों पाठक मिल जायेंगे पर आप अगर एक आप लेखक हैं तो फिर आपको अपने लिखे के सहारे ही धीरे धीरे आगे बढ़ना होगा। ऐसे में यही बेहतर है कि आप संकोच छोड़कर लिखे जायें। इस विषय में हमारे एक गुरुजी का कहना है कि तुम तो मन में आयी रचना लिख लिया करो। हो सकता है उस समय उसे कोई न पूछे पर जब तुम्हारा नाम हो जाये तो लोग उसी की प्रशंसा करें।

इसलिये जिन लोगों के पास ब्लाग लिखने की सुविधा है उन्हें अपना लेखक कार्य शुरु करने में संकोच नहीं करना चाहिये। हिंदी में गंभीर लेखन को कालांतर में बहुत महत्व मिलेगा। आपका लिखा हिंदी में पढ़ा जाये यह जरूरी नहीं है। अनुवाद टूलों ने भाषा और लिपि की दीवार ढहाने का काम शुरु कर दिया है यानि यहां लिखना शुरु करने का अर्थ है कि आप अंतर्राष्ट्रीय स्तर के लेखक बनने जा रहे हैं जो कि पूर्व के अनेक हिंदी लेखकों का एक सपना रहा है। हां इतना जरूरी है कि अपने लिखे पर आत्ममुग्ध न हों क्योंकि इससे रचनाकर्म प्रभावित होता है।
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