हंसी के खजाने की तलाश-हिंदी शायरी (hansi ka khazana-hindi shayri)

अपने पर ही यूं हंस लेता हूं।
कोई मेरी इस हंसी से
अपना दर्द मिटा ले
कुछ लम्हें इसलिये उधार देता हूं।
मसखरा समझ ले जमाना तो क्या
अपनी ही मसखरी में
अपनी जिंदगी जी लेता हूं।
रोती सूरतें लिये लोग
खुश दिखने की कोशिश में
जिंदगी गुजार देते हैं
फिर भी किसी से हंसी
उधार नहीं लेते हैं
अपने घमंड में जी रहे लोग
दूसरे के दर्द पर सभी को हंसना आता है
उनकी हालतों पर रोने के लिये
मेरे पास भी दर्द कहां रह जाता है
जमाने के पास कहां है हंसी का खजाना
इसलिये अपनी अंदर ही
उसकी तलाश कर लेता हूं।

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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

4 Comments

  1. Posted 06/08/2009 at 08:43 | Permalink

    बहुत ही प्यारा लिखा है आप ने!!

  2. Posted 09/10/2009 at 20:05 | Permalink

    bahut sundar baat kahdi janaab

  3. yadvendra singh
    Posted 26/10/2009 at 13:14 | Permalink

    i have a lot of proud for you because you have care(worry)of forien indians

  4. yadvendra singh
    Posted 26/10/2009 at 13:18 | Permalink

    Apke sher-o-shayri read karne ke paschat meri ankhon men ansu bhar gaye.(please write it forever anever)


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