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कामयाब इंसान-हिन्दी व्यंग्य कविता (kamyab insan-hindi kavita)


अमन का फरिश्ता बनने के लिये
पहले इस जहां में आग लगा दो
फिर उसे बुझा दो।
खड़ा कर दो किराये का शैतान
जिससे लड़ो नकली लड़ाई
तना रहे जब तक तुम चाहो
फिर उसे अपने सामने झुका लो।
ऐसे ही अफसाने खेलते हुए
अपना नाम आकाश में उड़ा दो।
जहां तक चलता है तुम्हारी
दौलत और शौहरत का रुतवा
वहीं तक खेलो नाटक
चाटुकार दर्शक बन जायेंगे
चाहे जब पर्दा गिराओ
चाहे जब उठा दो।
……………………
कामयाबी का नशा
जब सिर चढ़कर बोलता है
तब इंसान के नजरिये में
जहर घोलता है।
तब कामयाब इंसान ही
दूसरे इंसान को
दौलत और शौहरत के भाव से तोलता है।

……………………………

लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप
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