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दर्द बयां करते हुए हो जाता है भुलावा-व्यंग्य कविताएँ


चेहरे हैं उनके सजे हुए
अपने घर पर उन्होंने
पत्थर और प्लास्टिक के फूल सजाये हैं
अपनी जुबान से बात करते हैं
वह ईमान और वफा की
पर अपने करते नहीं वह धंधे जो
उन्होंने सभी को बताये हैं
नाम तो हैं बड़े आकर्षक पर
काम का कोई भरोसा नहीं है
कौन बिक जाये यहां
पता नहीं लगता
आजाद तो सभी दिखते हैं
चाल और चरित्र में ‘सत्य’ लिखते हैं
पर सवाल उठता है
फिर इतने सारे इंसान
गुलामों के बाजार में
बिकने कहां से आये हैं
फूल तो है सभी के एक हाथ में
पर दूसरे हाथ में पीठ पीछे
सभी खंजर सजाये हैं

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पुरानी इबारतें-हिंदी शायरी
जब भी अपने दिल का हाल
दूसरें को हम सुनाते हैं
तब उस पर हंसने वालों को
भेजते है बुलावा
दर्द बयां करते हुए हो जाता है भुलावा
जिनके सहारे लेकर दोस्त भी दुश्मन बनकर
कमजोर जगहों पर वार कर जाते हैं
पुरानी इबारतों को पढ़ना हमेशा
बुरा नहीं होता
जिन में धोखे और गद्दारी पर
ढेर सारे किस्से हैं दर्ज
जिनमें इंसानी रिश्ते
वफा की तरफ कम
बेवफाई की तरफ अधिक जाते हैं।

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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप

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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

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