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रहीम संदेश: समय ख़राब हो तो कटु वचन सुनने पड़ते हैं


समय परे ओछे बचन, सब के सहे रहीम
सभा दुसासन पट गहे, गदा लिए रहे भीम

कविवर रहीम कहते हैं कि बुरा समय आने पर तुच्छ और नीच वचनों का सहना करना पड़ा। जैसे भरी सभा में देशासन ने द्रोपदी का चीर हरण किया और शक्तिशाली भीम अपनी गदा हाथ में लिए रहे पर द्रोपदी की रक्षा नहीं कर सके।

समय पाय फल होत है, समय पाय झरि जाय
सदा रहे नहिं एक सौ, का रहीम पछिताय

कविवर रहीम कहते हैं कि समय आने पर अपने अच्छे कर्मों के फल की प्राप्ति अवश्य होती है। वह सदा कभी एक जैसा नहीं रहता इसीलिये कभी बुरा समय आता है तो भयभीत या परेशान होने की आवश्यकता नहीं है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जीवन में सभी के पास कभी न कभी अच्छा समय आता है ऐसे में अपना काम करते रहने के अलावा और कोई चारा नहंी है। आजकल लोग जीवन में बहुत जल्दी सफलता हासिल करने को बहुत आतुर रहते हैं और कुछ को मिल भी जाती है पर सभी के लिये यह संभव नहीं है।
कई लोग जल्दी सफलता हासिल करने के लिये ऐसे मार्ग पर चले जाते हैं वहां उन्हें शुरूआत में बहुत अच्छा लगता है पर बाद में वह पछताते है।

यह सही है कि कुछ लोगों के लिये जीवन का संघर्ष बहुत लंबा होता है पर उन्हें अपना धीरज नहीं खोना चाहिए। कई बार ऐसा लगता है कि हमें जीवन में किसी क्षेत्र मे सफलता नहीं मिलेगी पर सत्य तो यह है कि आदमी को अपने अच्छे कर्मों का फल एक दिन अवश्य मिलता है। इसलिये अगर ऐसा वक्त आता है तो चिंता नहीं करना चाहिये। जब हम संघर्ष करते हैं तो लोग तमाम तरह की बातें मजाक उड़ाने के लिये कहते हैं। अगर सफल हो जाते हैं तो वही वाह वाही भी करते हैं।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

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कबीर के दोहे: मधुमक्खी की तरह सुगंध ग्रहण करें


जो तूं सेवा गुरुन का, निंदा की तज बान
निंदक नेरे आय जब कर आदर सनमान

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अगर सद्गुरु के सच्चे भक्त हो तो निंदा को त्याग दो और कोई अपना निंदा करता है तो निकट आने पर उसका भी सम्मान करो।
माखी गहै कुबास को, फूल बास नहिं लेय
मधुमाखी है साधुजन, गुनहि बास चित देय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मक्खी हमेशा दुर्गंध ग्रहण करती है कि न फूलों की सुगंध, परंतु मधुमक्खी साधुजनों की तरह है जो कि सद्गण रूपी सुगंध का ही अपने चित्त में स्थान देती है।

तिनका कबहूं न निंदिये, पांव तले जो होय
कबहुं उडि़ आंखों पड़ै, पीर धनेरी होय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कभी पांव के नीच आने वाले तिनके की भी उपेक्षा नहीं करना चाहिए पता नहीं कब हवा के सहारे उड़कर आंखों में घुसकर पीड़ा देने लगे।

जो तूं सेवा गुरुन का, निंदा की तज बान
निंदक नेरे आय जब कर आदर सनमान

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अगर सद्गुरु के सच्चे भक्त हो तो निंदा को त्याग दो और कोई अपना निंदा करता है तो निकट आने पर उसका भी सम्मान करो।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-यह सच्चे भक्त की पहचान है कि वह किसी की निंदा नहीं करते न ही किसी में दोष देखते हैं। जो नित प्रतिदिन भक्ति करते हैं और फिर परनिंदा में लग जाते हैं उनकी भक्ति में दोष है यही समझना चाहिये। वैसे आम आदमी की बात ही क्या कथित संत और साधु भी एक दूसरे की निंदा करते हैं। निंदा करना आदमी के अंदर मौजूद नकारात्मक सोच का परिणाम है। जिनके मन में परमात्मा के प्रति सत्य में भक्ति का भाव है उनका सोच सकारात्मक रहता है और वह दूसरों की अच्छाईयों पर ही विचार कर उनको ग्रहण करते हैंं।

दूसरों के दोष देखकर उसकी चर्चा करने से वह दोष हमारे अंदर स्वतः आ जाता है। कहते हैं कि आलोचक को अपने से दूर नहीं रखना चाहिये क्योंकि उसके श्रीमुख से अपने दोष सुनने से हमें वह अपने अंदर से निकालने का अवसर मिल जाता है। यह दोष निकलकर उसके अंदर से जाता कहां है? तय बात है कि वह आलोचक के अंदर ही जाता है। जिस तरह भगवान की भक्ति करने से उनका सानिध्य मिलता है उसी तरह दूसरे की निंदा करना या दोष देखने से वह भी हमें प्राप्त होता है। यह दुनियां वैसी ही जैसी हमारी नीयत है अतः अच्छा देखें तो वह अच्छी लगेगी और अगर खराब देखेंगे तो वैसा ही बुरा भी लगेगा।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

व्ही.आई.पी. कहलाने की चाहत-हास्य व्यंग्य


वैसे तो अपने देख के लोगों की यह पूरानी आदत है कि वह हर तरफ अपने को श्रेष्ठ साबित करना चाहते हैं और अब एक नयी आदत और पाल ली है। वह यह कि कहीं भी अपने को व्ही.आई.पी साबित करो। भले ही झूठमूठ पर यह बताओ कि हमें अमुक स्थान पर हमें व्ही.आई.पी. ट्रीटमेंट मिला।
अपने जीवन के सफर में हमें प्रसिद्धि पाने का मोह तो कभी नहीं रहा पर कुछ हमारे काम ऐसे रहे हैं कि वह बदनाम जरूर करा देते हैं और तब लगता है कि यह मिली प्रसिद्धि के कारण हो रहा है। पढ़ने का मजा खूब लिया तो लिखने के मजे लेने का ख्याल भी आया। लिखते रहे। जो मन मेंे आया लिखा मगर भाषा की दृष्टि से कभी सराहे जायेंगे यह तो ख्याल नहीं किया पर अव्यवस्थित लेखन की वजह से बदनाम जरूर हुए। यही हाल हर क्षेत्र में रहा है।

अध्यात्म में झुकाव है पर भक्ति के नाम पर पाखंड कभी नहीं किया। कहीं कोई कहता है कि यहां मत्था टेको या अमुक गुरू के दर्शन करो तो हम मना कर देते हैं। कहते हैं कि भईया हम तो सीधे नारायण में मन लगाते हैं इन बिचैलियों से मार्ग का पता पूछें यह संभव नहीं हैं।

जिनके गुरु है वह अपने गुरु को मानने की प्रेरणा देते हैं। ना करते हैं तो वह लोग कहते हैं कि गुरु के बिना उद्धार नहीं होता। हम पूछते हैं कि ‘क्या गुरु पाकर आपका उद्धार हो गया है तो जवाब देते हैं कि ‘तुम्हें अहंकार है, अरे इतनी जल्दी थोड़ा उद्धार होता है।’

हम कहते हैं कि हमारा उद्धार तो हो गया है क्येांकि परमात्मा ने मनुष्य योनि देकर दुनिया को समझने का अवसर दिया क्या कम है?

बात दरअसल यह कहना चाहते थे कि हम भारत के लोगों की मनोवृत्ति बहुत खराब है। हर मामले में व्ही.आई.पी. ट्रीटमेंट चाहते हैं और इसके लिये हम कुछ भी करना चाहते हैं। उनमें यह भी एक बात शामिल है कि जिस भगवान या गूुरु को हम माने उसे दूसरे भी माने। इसलिये अपने गुरुओंं और भगवानों को लेकर दूसरे पर दबाव बनाने लगते हैं। इसके अलावा कहीं अगर आश्रम या मंदिर जाते हैं तो वहां भी अपने को व्ही. आई.पी. के रूप में देखना चाहते हैं।

उस दिन एक आश्रम में गये तो पता लगा कि उनके गुरु आये हैं। हमने दूर से गुरुजी को देखा और वहीं उनके प्रवचन प्रारंभ हो गये। इसी दौरान पंक्ति लगाकर उनके दर्शन करने का सिलसिला भी चला। वहां कुछ लोग पंक्ति से अलग दूसरी पंक्ति लगाकर उनके दर्शन कर रहे थे जो यकीनन खास भक्तों के खास भक्त थे।

सत्संग समाप्त हुआ पर दर्शन करने वालों का तांता अभी लगा हुआ था। हम बाहर निकल आये तो एक परिचित मिल गये। हमसे पूछा कि‘क्या गुरु महाराज के दर्शन किये।’
हमने न में सिर हिलाया तो वह कहने लगे कि‘हमने तो व्ही.आई.पी. लाईन में जाकर उनके दर्शन किये। उनका एक खास भक्त मेरी दुकान पर सामान खरीदने आता है।’

हमने समझ लिया कि वह व्ही.आई.पी. भक्त साबित करने का प्रयास कर रहा है।

एक अन्य आश्रम में गये तो वहां देखा कि बरसों पहले खुला रहने वाला ध्यान केंद्र अब बंद कर दिया गया है। वहां सामान्य भक्तों का प्रवेश बंद कर दिया गया है केवल चंदा की रसीद कटाने और सामान लेकर जाने वालों को वहां ध्यान करने की इजाजत है।

हमने वहां मंदिर में दर्शन किये और उसके साथ लगे परिसर के पार्क में जाने लगे तो पता लगा कि वहां से आने वाला कम दूरी वाला रास्ता भी बंद कर दिया गया है। घूमकर फिर वहां पार्क में गये। पार्क के साथ ही धर्मशाला भी लगी हुई है। बाहर से आये भक्तजन वहां रहते हैं और ध्यानादि कार्यक्रम में शामिल होते हैं। वहां पार्क में अन्य लोग भी बैठे थे कोई अपने साथ भोजनादि लाया था तो को वहीं बैठे ध्यान लगा रहा था तो कोई अपनी चादर बिछाकर आराम कर रहा था। हमने देखा कि ध्यान केंद्र से कम दूरी वाले मार्ग का दरवाजा जो बंद था वह बार बार खुलता और बंद हो जाता। कुछ व्ही.आई.पी वहीं से ध्यान कक्ष से आते जाते। जब वह आते तो खुल जाता और फिर बंद। हमने देखा कि वहां खड़ा एक लड़का इस दरवाजे को खोल और बंद कर रहा था।

एक महिला धर्मशाला से निकलकर अपने दो बच्चों के साथ उसी रास्ते ध्यान कक्ष की तरफ जा रही थी । उसके आगे एक व्ही.आई.पी. भक्त तो निकल गया पर उस लड़के ने उस महिला और उसके बच्चों को नहीं जाने दिया। कारण बताया ‘सुरक्षा’। अब सुरक्षा के नाम आश्रम और मंदिरों में हो रहा है उस तो कहना ही क्या? देखा जाये तो व्ही.आई.पी भक्तों और उनको दर्शन कराने वालों को अवसर मिल गया है।

उस महिला ने लंबे रास्ते से निकलने के लिये मूंह फेरा तो एक व्ही.आई.पी. भक्त वहां से लौट रहा था उसके लिये दरवाजा खुला तो वह पलट कर फिर जाने को तत्पर हुई पर उस लड़के ने मना कर दिया। यह एकदम अपमानजनक था क्योंकि उस दरवाजे के उस पार तक तो मैं भी होकर आया था। मतलब वहां से अगर कोई आये जाये तो कोई दिक्कत नहीं थी सिवाय इसके कि किसी को विशिष्ट भक्त प्रमाणित नहीं किया जा सकता था।

यह प्रकरण हमसे कुछ दूर बैठे दंपत्ति भी देख रहे थे। महिला ने पति से कहा-‘आप देखो। कैसे उस बिचारी के साथ उस लड़के ने बदतमीजी की। धार्मिक स्थानों पर यह बदतमीजी करना ठीक नहीं है।’

पति ने कहा-‘अरे, इन चीजों को मत देखा करो। हम तो भगवान में अपनी भक्ति रखते हैं। यह तो बीच के लोग हैं न इनके मन में न भक्ति है न सेवा भाव। यह सब विशिष्ट दिखने के लिये ही ऐसा करते हैं। देखा हमारे साथ यहां कितने लोग बैठे हैं उनको इनकी परवाह नहीं है। पर यह जो विशिष्ट दिखने और दिखाने का मोह जो लोग पाल बैठते हैं उनको कोई समझा नहीं सकता। यह मान कर चलो कि जहां भगवान है तो वहां शैतान भी होगा।’
हमने देखा कि वहां अनेक लोग बैठे थे। सब दूर दूर से आये थे और उनको इन घटनाओं से केाई लेना देना नहीं था।

सच तो यह है कि धर्म के नाम पर जो लोग व्ही.आई.पी. दिखना चाहते हैं उनको ही धर्म संकट में दिखता है क्योंकि ऐसा कर ही वह अपने को धार्मिक साबित करना चाहते हैं। मंदिरों और आश्रमों में जो भ्रष्टाचार है उस पर कोई प्रहार होता है तो धर्म पर संकट बताकर आम भक्त को पुकारा जाता है जबकि इन्हीं आश्रमों में उसकी कोई कदर नहीं है वहां तो को केवल विशिष्ट लोगों का ही सम्मान है। हालांकि हम जानते हैं कि यह सब होता है पर जब कहीं ध्यान लगाने जाते हैं तो इस बात की परवाह नहीं करते कि भगवान के मध्यस्थ क्या व्यवहार करते हैं क्योंकि हम सोचते हैं कि उसके हृदय में भगवान नहीं विशिष्ट मेहमान बसे हुऐ हैं सो उनसे कोई अपेक्षा भी नहीं करते।
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यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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