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पतंजलि योग विज्ञान-मन पर नियंत्रण करना ही सच्चा योग


       भारतीय योग साधना शब्द ही अपने आप में स्वर्णिम लगता है।  जब भी कहीं योग की बात आती है तो भारतीय जनमानस उसके प्रति अपना सदाशय दिखाने में चूकता नहीं है। महर्षि पतंजलि योग विज्ञान के जनक है तो उसके महत्व को भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भागवत गीता में प्रतिपादित किया है।  हम यह भी देखते रहे हैं कि जिस तरह भारतीय अध्यात्म ग्रंथों के सत्य से संबंधित विषय सामग्री का उपयोग पेशेवर धार्मिक कथाकार अपने व्यवसायिक हित की साधना के लिये करते हैं वैसे ही योग पद्धति का भी करना शुरु कर दिया है। हालांकि लंबे समय तक योग  साधना केवल सन्यासियों और सिद्धों के लिये स्वाभाविक कर्म माना जाता था पर जैसे जैसे भौतिकवाद ने मनुष्य के तन, मन और विचारों को विकृत किया वैसे वैसे ही विश्व के अनेक समाज, स्वास्थ्य तथा शिक्षा विशेषज्ञों ने उसका प्रतिकार भारतीय योग साधना को मानने का अभियान प्रारंभ किया।

   जैसा कि हम भारतीयों की आदत है जब तक कोई फैशन विदेश से न आये हम उसे स्वीकार नहीं करते वैसे ही योग साधना के मामले में भी रहा। विदेशी विशेषज्ञों ने जब भारतीय योग को एक वैज्ञानिक पद्धति माना तो देश में उसकी शिक्षा का व्यवसायिक अभियान प्रारंभ हो गया।  आज स्थिति यह है कि राजयोग, ज्ञान योग, अध्यात्मिक योग तथा  चमत्कृत शब्दों से अनेक कथित धार्मिक संस्थान अपनी दुकान चला रहे हैं तो अनेक बड़े छोटे पर्दे के कलाकार भी योग को योगा बनाकर अपनी छवि चमत्कृत कर रहे हैं। हमें  उनसे कोई शिकायत नहीं  है।  समस्या यह है कि उपभोग की तरह योग विषय का विज्ञापन करने का प्रभाव यह हुआ है कि पतंजलि योग का मूल स्तोत्र उससे मेल नहीं खाता जिससे इस विषय को लेकर अनेक लोग  भ्रमित हो रहे हैं।  सच बात तो यह है कि योग साधना के प्राणायाम तथा आसनों तक ही सीमित रखा जा रहा है।  अनेक पेशेवर धार्मिक फिल्मी कलाकारों की तरह दैहिक सक्रियता तक ही सीमित रखकर ज्ञान दे रहे हैं।  हाथ पांव हिलाने से आदमी न केवल स्वयं को देखता है बल्कि दूसरे भी उसे देखते हैं।  उसी तरह  सांसों को तेज करने से ध्वनि का बोध होता है।  इस तरह दृश्य और स्वरों के मेल से जो सक्रियता हो वह दिखती है इसलिये उनसे मनुष्य की दो इंद्रियां आंख और कान चमत्कृत होती हैं। इन्हीं दो इंद्रियों के आधार पर  मनोरंजनक व्यवसायियों के अर्थ का महल बनता है।  अगर धार्मिक पेशेवर भी इसी पर काम रहे हैं तो कोई बड़ी बात नहीं है क्योंकि उनका लक्ष्य भी समाज कल्याण के नाम पर अपना प्रचार करना ही है।

         आमतौर से पतंजलि योग साहित्य और श्रीमद्भागवत गीता को अनेक कथित धार्मिक प्रवचनकार गूढ अर्थों वाला मानते हैं।  उनका मानना है कि आम आदमी उसका स्वतः ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। यह प्रचार उन्हें स्वयं को गुरु पद पर प्रतिष्ठित करने के प्रयासों के  अलावा कुछ नहीं है।  सच बात तो यह है कि नित्य योग साधना तथा गीता का अध्ययन करने वाले लोग जब ज्ञान के सागर में गोता लगाने के आदी हो जाते हैं तब उनको यही गहराई कम लगती है।  इतना ही नहीं प्रचलित योग तथा उसके मूल स्तोत्र में उनको अंतर का पता चलता है।  योग मूलतः अंतर्मुखी होने की कला है जबकि योग प्रचारक उसे दैहिक सक्रियता तक सीमित रखकर उसके बहिर्मुखी होना प्रमाणित करते हैं। इसलिये इस बात की अनेक विद्वान आवश्यकता अनुभव करते हैं कि योग का मूल अर्थ समाज में बताते रहना चाहिये। इस विषय पर अनेक निष्काम कर्मी प्रयास कर रहे हैं जो प्रशंसनीय है।

पतंजलि योग में कहा गया है कि

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योगनिश्चत्तवृत्तिनिरोधः।।

तदा दृष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्।।

वृत्तिसारूप्यमिततरत्र।।

   हिन्दी में भावार्थ-चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है।  उस समय दृष्टा की  स्थिति अपने वास्तविक स्वरूप से जुड़ जाती है। दूसरे समय या यानि सामान्य समय में वह वृत्ति के सदृश होता है।

            हम योग का केवल शाब्दिक  अर्थ लें तो उसका मतलब जोड़ना।  मूल रूप से मनुष्य का संचालक उसका मन है।  मन हमेशा बहिर्मुखी विषयों की तरफ आकर्षित रहता है।  ऐसे में दृष्टा भी मन की बतायी राह पर चलता है। यह असहज योग की स्थिति है।  मनुष्य का मन या चित्त उसकी बुद्धि को इधर से उधर दौड़ाता है।  जब देह थक जाती है तो मनुष्य टूटने लगता है।  हम अगर मूल योग की बात करें तो वह चित्त की अवस्था पर नियंत्रण की विधा है।  जिस तरह दैहिक कार्य करने के बाद विराम लिया जाता है उसी तरह मन को भी विराम देना चाहिये पर यह केवल योग साधक ही कर सकते हैं।  हम दिन भर सांसरिक विषयों में रत रहें। रात को सो जायें फिर सुबह उठकर इन्हीं सांसरिक विषयों का चिंत्तन करें ऐसे में हमारे अध्यात्म का तो कोई अभ्यास होता ही नहीं हैं। अध्यात्म यानि वह शक्ति जो  इस शरीर को धारण करती है पर वह उसकी उपभोक्ता नहीं है। उपभोक्ता तो चित्त या मन है।  सांसरिक विषयों में डूबा मन कभी विरत नहीं होता। एक विषय से भरता है तो दूसरा ढूंढ लेता है।   उधर अध्यात्म का घर खाली लगता है।  इन दोनों को मिलाना ही योग है।  अध्यात्म और चित्त मिलकर एक स्वस्थ मनुष्य का निर्माण करते हैं।

               हमें इस मेल के लिये त्याग की आवश्यकता होती है।  यह त्याग धन का नहीं मन का होता है। प्रातःकाल उठकर पहले शरीर, मन और विचारों के विकारों को  योगासन, प्राणायाम और प्रत्याहार  से ध्वस्त करें फिर धारणा, ध्यान के साथ  समाधि की प्रक्रिया  से अपने चित्त को नवीन स्वरूप मे स्थापित करें। सांसरिक विषयों में लिप्त मन को प्रतिदिन उनसे विराम देने के लिये अध्यात्मिक साधना करें।  योग साधना की प्रक्रिया में लिप्त होने पर मनुष्य स्वाभाविक रूप से सांसरिक विषयों से परे हो जाता है जिसे हम त्याग कह सकते हैं। 

    आप अगर सर्वेक्षण करें तो पायेंगे कि अनेक लोग यह कहते हैं कि हम योग साधना करना चाहते हैं पर समय नहीं मिलता या फिर हमारी कुछ घरेलु समस्यायें जिनके हल तक यह करना संभव नहीं है। दरअसल ऐसे लोग सांसरिक विषयों के प्रति अपने भाव को त्याग नहीं करना चाहते हैं। चित्त में चिंतायें जमाये रखने की उनको ऐसी आदत होती है कि उससे परे रहना उन्हें उसी तरह तकलीफदेह लगता है जैसे कि किसी शराबी को शराब न मिलने पर लगता है।

      एक बात सभी जानते हैं कि सबका दाता राम है फिर लोग कभी अपनी  तो कभी अपने परिवार की समस्याओं को लेकर अपने अंदर चिंता की आग जलाये क्यों रखते हैं। वह भगवान के समक्ष  आर्त भाव से इस तरह प्रस्तुत क्यों होते हैं कि उनका काम बन जाये तो वह योग साधना करेंगे?   दरअसल चिंता की अग्नि में  जलने की आम लोगों को आदत है। एक तरह से कहें कि चिंतायें पालना भी एक तरह का नशा हो गया है। सब ज्ञान है पर धारण कोई नहीं करता।  चिंता के नशे में रहने आदी लोगों को योग साधना के दौरान अंतर्मुखी होने पर बाहरी विषयों से परे होने का भय ं को डरा देता है।  जबकि  मन और शरीर स्वस्थ होने के साथ ही  विचारों की शुद्धता मनुष्य को संबल प्रदान करती है पर सांसरिक विषयों से  विराम की आवश्यकता है उसे कोई लेना नहीं चाहता। हम इसे यह भी कह सकते हैं कि सांसरिक विषयों के चिंत्तन का त्याग कर योग साधना का लाभ अधिकतर लोग लेना नहीं चाहते। कहने का अभिप्राय यही है कि योग अपने चित्त पर नियंत्रण के लिये आवश्यक है।  जब तक चित्त पर नियंत्रण नहीं आता तब तक योग का कोई महत्व नहीं है।

 

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””
Gwalior, madhyapradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

poet, Editor and writer-Deepak  ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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बिना ‘एक्शन’ के योग साधना लोगों को प्रभाहीन लगती है-हिन्दी लेख (yog sadhna without action no popular-hindi lekh)


              बाबा रामदेव अब राष्ट्रीय प्रचार पटल से एकदम गायब है। अपना अनशन तोड़ने के बाद वह फिर लोगों के सम्मुख नहीं आये। एक अध्यात्मिक योगी के लिये राजयोग करना कोई आसान नहीं है यह अब समझ में आने लगा है। अगर कोई योगी राजयोग करने पर आमदा हो ही जाता है तो समझ लेना चाहिए कि वह राजस भाव के वशीभूत होकर अपनी साधना कर रहा था। यहां हम श्रीमद्भागवत के कर्म तथा गुण विभाग की विस्तृत चर्चा नहीं कर रहे पर इतना बताना जरूरी है कि आदमी सामान्य भक्त हो या योगी या फिर नास्तिक हो पर वह त्रिगुणमयी सृष्टि के चक्कर से नहीं बच सकता। सात्विक, राजस तथा तामस प्रवृत्ति के लोग हर जगह और हालत में मिलेंगे। तीनों गुणों से परे कोई महायोगी होता है हालांकि यह आवश्यक नहीं है कि वह सामान्य संसार कर्म में अपने देह व्यस्त न रखे और सन्यास लेकर हिमालय पर चला जाये। हमारा कहने का अभिप्राय यह है कि आदमी अपनी इन तीन प्रवृत्तियों से ही कर्म करते हुए लिप्त होता है पर महायोगी केवल काम करना है यही सोचकर काम करता है उसे उसके फल में कदापि रुचि नहीं होती। जिसके मन में संतोष है वही सात्विक है पर संतोष तथा असंतोष से परे है तो वह योगी है।
     आलोचकों का कहना है कि बाबा रामदेव ने लोगों को योग की गलत शिक्षा दी यह अलग से बहस का विषय है क्योंकि इसका निर्णय तो केवल प्रवीण योगशास्त्री ही कर सकते हैं। कुछ योग शास्त्री मानते हैं कि ध्यान और धारणा के पतंजलि योग साहित्य में प्रतिपादित सूत्रों का उनका अध्ययन अधिक नहीं है। उनके विचार, वाणी तथा भाव भंगिमा से यही लगता है। इतना तय ही कि उनकी योग से प्रतिबद्धता असंदिग्ध है।
                   पतंजलि योग विज्ञान के सूत्र के अनुसार परिणाम से कर्म का ज्ञान हो जाता है। दूसरे शब्दों में अगर किसी की व्यक्ति या उसकी गतिविधि से निकले परिणाम को देखते हुए उसके पूर्व कर्म का आभास किया जा सकता है। यह बहुत गंभीर अध्ययन करने वाला सूत्र है। इससे हम अपनी जिंदगी में किसी कर्म के नाकाम होने पर उसका विश्लेषण करते हुए अपनी गलतियों को ढूंढ सकते हैं। अपनी नाकामी पर हम चिंता में पड़े रहें या दूसरों को उसके लिये जिम्मेदार बताने लगें यह ठीक नहीं है। अपने संकल्प की शुद्धता और शुद्धता पर दृष्टिपात कर सकते हैं। परिणाम से कर्म का ज्ञान होने सूत्र. के लिये हमें जासूसी का नियम भी कह सकते हैं। जिस तरह कोई व्यक्ति कहीं बेहोश होकर घाायल पड़ा है और उसके पास कोई बड़ा पत्थर, चाकू या गोली का खोल पड़ा है। उसका घाव और खून देखकर जासूस यह अनुमान करता है कि उसे कौनसी चीज से मारा गया होगा। अगर आंधी तूफान के बाद राह चलतते हुए हम देखते हैं कहीं पेड़ के नीचे कोई जानवर दबा पड़ा है तो हम सहजता से यह अनुमान करते हैं कि वह पेड़ आंधी में गिरा होगा।
           योग विधा में पांरगत मनुष्य छोटी मोटी घटनाओं से ही नहीं बड़ी बड़ी राजनीतिक और एतिहासिक घटनओं का भी अनुमान कर सकते हैं कि उनमें सक्रिय लोगों की गतिविधियों किससे और कैसे प्रभावित होती होंगी। परिणामों से कार्य का अनुमान करना तभी संभव है जब ध्यान आदि के माध्यम से अपना बौद्धिक चिंत्तन विकसित करे। ज्ञानी लोग अभौतिक क्रियाओं का अनुमान सहजता से कर सकते हैं। बाबा रामदेव चूंकि प्रसिद्ध योग शिक्षक हैं इसलिये उनकी गतिविधियां अनेक ज्ञात अज्ञात योगियों और हम जैसे योग साधकों के लिये बहुत समय से अनुसंधान का विषय रही हैं। दिल्ली में अनशन के दौरान और उसके बाद उनके व्यक्त्तिव का पूरा स्वरूप सामने आ रहा था। उनकी राजनीतिक गतिविधियों में योगियों और योगसाधकों की दिलचस्पी कम थी पर उसके परिणाम और अभियान के संचालन को योग विज्ञान की कसौटी पर कसने का यह स्वर्णिम अवसर था। प्राणायामों तथा योगासनों की शिक्षा देने वाले बाबा रामदेव ने अपनी साधना से कैसा व्यक्तित्व पाया है यह देखने का इससे बेहतर अवसर नहीं मिल सकता था। अभी यह कहना कठिन है कि आगे उनकी क्या योजना है? वह विश्राम करने के बाद फि कौनसा काम करते हैं यह देखने वाली बात होगी पर इतना तय है कि भारतीय अध्यात्म की योग विधा को प्रचार दिलाने में उनका कम अनुकरणीय रहा यह अलग बात है कि बाज़ार और प्रचार के संयुक्त उपक्रम के प्रबंधकों ने उनकी मदद की। बाज़ार और प्रचार में सक्रिय महानुभावों का पूरे विश्व में दबदबा है और वह समय समय पर अपने नायक आम लोगों के सामने प्रस्तुत करते हैं। जब भारतीय समाज पर राजकीय विलासिता हावी हो रही है तो वहां राजरोगों का पनपना स्वाभाविक है। ऐसे बाबा रामदेव के योगासन उपयोगी  साबित रहे रहे थे। उनको नायकत्व का दर्जा मिला पर आलोचकों ने आरोप लगाया कि बाबा इस तरह समाज में व्यायाम का प्रचार कर लोगों की उपभोग क्षमता बढ़ा रहे हैं जिससे बाज़ार को अपने उत्पादों के ग्राहक बनाये रखने में मदद मिलेगी। उस समय अनेक लोगों ने इस बात की अपेक्षा की पर योग साधना में दक्ष लोगों ने स्पष्टतः कहा था कि उनकी शिक्षा पूरी तरह से योग विधा का प्रतिनिधित्व नहीं करती।
           बाबा रामदेव ने पतंजलि के आष्टांग योग की चर्चा अनेक बार की पर वह प्राणायाम तथा योगासनों के अलावा बाकी छह भागों में अपनी विशिष्टता प्रमाणित नहीं कर पाये थे। मुख्य बात यह कि ध्यान की शक्ति का महत्व वह सिद्ध नहीं कर पाये जो कि सबसे अधिक आवश्यक था। अगर वह आगे योगशिक्षा जारी रखते हैं तो उनको ध्यान और धारणा का महत्व भी बताना चाहिए।
            अपने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान उन्होंने राजनीतिक विषयों में अपनी अपरिपक्वता का ही प्रमाण उन्होंने दिया। उनके कुछ बयान तो चौंकाने वाले थे जो कि यह बात साफ करते थे कि अभी उनको अपने ही शब्दों का प्रभाव नहीं मालुम। अपने समकक्ष ही खड़े अन्ना हजारे के आंदोलन के ऐसे मुद्दों पर अपनी असहमति दी जिनकी कोई आवश्यकता नहीं थी। उनका यह बयान उनके प्रशंसकों चौंकाने वाला लगा था। किसी महत्वपूर्ण मुद्दे पर देश में चर्चा होती है तो तमाम तरह के पहलू देखकर ही कोई निष्कर्ष निकलता है। ऐसे में अपने बयान सोच समझकर देना चाहिए।
उस समय कुछ लोगों को लगा कि वह अपना गुप्त लक्ष्य लेकर ही वह सत्याग्रह चला रहे हैं। एक मजे की बात यह है कि दिल्ली आने तक यह पता नहीं था कि वह धरना देंगे कि सत्याग्रह करेंगे या आमरण अनशन। वह तीनों का मतलब भी नही जानत लग रहे थे। अनशन तो उनको करना ही नहीं था क्योंकि वह अन्न ग्रहण ही नहीं करते तब उसे छोड़ना कैसा?
                वह शायद श्री अन्ना हजारे का अनशन देखकर वह प्रभावित हुए थे। जब नौ दिन के अनशन से बाबा रामदेव का शरीर अस्थिर हो गया तो उनके सहयोगी एक नेता ने कहा कि उनको तो नीबू पानी पीकर अनशन करना था। कुछ लोग उनको अन्ना हजारे की अपेक्षा दैहिक रूप से कमजोर बता रहे हैं जो कि सोलह दिन तक अनशन कर चुके हैं। चिकित्सकों ने यह बात मानी थी कि उनके शरीर में चर्बी की कमी है इसलिये उन पर अनशन का बुरा प्रभाव जल्दी पड़ा। दरअसल यह बाबा रामदेव के ही अपरिपक्व होने के साथ ही पतंजलि योग से पूरी तरह अनभिज्ञ होने का प्रमाण है। अन्ना हजारे अन्न खाते हैं इसलिये उनके शरीर में इतनी चर्बी मौजूद रहती है जो अनशन के समय उनकी सहायक बनती है। बाबा रामदेव अन्न नहीं खाते इसलिये उनके शरीर में चर्बी की कमी है इसलिये भूखे रहना अपने शरीर से खिलवाड़ करने जैसा ही है।
          श्रीमद्भागत गीता में कहा गया है कि न कम खाने वाले का न ज्यादा खाने वाले का, न कम सोने वाले का न अधिक सोने वाले का और न ही असंयमी का कभी योग सिद्ध नहीं होता। ऐसे में अन्न का त्याग कर चुके बाबा रामदेव को सतर्क रहना चाहिए था। स्थिति यह हो गयी कि दूसरों को स्वस्थ रहने के लिये योग शिक्षा देने वाले बाबा रामदेव को अंग्रेजी शिक्षा पद्धति के वही डाक्टर परामर्श दे रहे थे जिनके बारे में बाबा रामदेव का दावा था कि वह उनके पास कभी नहीं जायेंगे। आधुनिक राजनीतिक क्षेत्र में जय पराजय का महत्व नहीं होता पर योग में यह पराजय बाबा रामदेव के लिये एक चुनौती है। इसे वह योग साधना से ही विजय में बदल सकते हैं। पिछले अनेक दिनों से वह योग शिविरों में नहीं दिख रहे पर इसका मतलब यह नहीं है कि योग शिक्षा का काम कहीं नहीं चल रहा है यह अलग बात है कि उसे प्रचार न मिलता है न जरूरत है।
               इस देश में एक नहीं सैंकड़ों योग शिक्षक हैं। भारतीय योग संस्थान इसके लिये मुफ्त में अनेक शिविर लगाता है। उसके अनेक शिक्षक योग विज्ञान में इतना प्रमाणिक रूप से पारंगत हैं कि अनेक लोग उनका लोहा मानते हैं। समस्या यह है कि योग साधना में सक्रियता यानि एक्शन नहीं है। एक्शन वाले आसन व्यायाम होते हैं। इसके अलावा प्राणायाम, ध्यान, धारणा और समाधि में तो व्यक्ति एकदम निष्क्रिय रहता इसलिये प्रभावी नहीं लगता। जबकि बाबा रामदेव सतत सक्रिय रहते हैं। उनके कई आसान सामान्य व्यायाम की तरह हैं इसलिये ही शायद आलोचना अधिक हो रही है पर सच यह है कि उनके पास आने वाली भीड़ आती भी इसलिये है। बहरहाल आगे वह क्या करेंगे यह देखने वाली बात होगी। अलबत्ता उन्होने अपने आलोचकों को अपने भड़ास निकालने का अवसर दे दिया है। हालांकि इस बात की भी संभावना है कि उन जैसा योगी अधिक समय तक चुप नहीं बैठ सकता।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
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योगासन, प्राणायाम, ध्यान और धारणा-हिन्दी लेख (hindi lekh on yogasan)


                प्राचीन भारतीय योग साधना पद्धति की तरफ पूरे विश्व का रुझान बढ़ना कोई अस्वाभाविक घटना नहीं है। आज से दस वर्ष पूर्व तक अनेक लोग योगसाधना को अत्यंत गोपनीय या असाधारण बात समझते थे। ऐसी धारणा बनी हुई थी कि योग साधना सामान्य व्यक्ति के करने की चीज नहीं है। इसका कारण यह था कि शरीर के लिये विलासिता की वस्तुओं का उपभोग बहुत कम था और लोग शारीरिक श्रम के कारण बीमार कम पड़ते थे।
आज की नयी पीढ़ी के लोगों जहां भी वाहन का स्टैंड देखते हैं वहां पर पैट्रोल चालित वाहनों को अधिक संख्या में देखते हैं जबकि पुरानी पीढ़ी के लोगों के अनुभव इस बारे में अलग दिखाई देते हैं। पहले इन्हीं स्टैंडों पर साइकिलें खड़ी मिलती थीं। सरकारी कार्यालय, बैंक, सिनेमाघर तथा उद्यानों के बाहर साइकिलों की संख्या अधिक दिखती थी। फिर स्कूटरों की संख्या बढ़ी तो अब कारों के काफिले सभी जगह मिलते हैं। पहले जहां रिक्शाओं, बैलगाड़ियों तथा तांगों की वजह से जाम लगा देखकर मन में क्लेश होता था वहीं अब कारें यह काम करने लगी हैं-यह अलग बात है कि गरीब वाहन चालकों को लोग इसके लिये झिड़क देते थे पर अब किसी की हिम्मत नहीं है कार वाले से कुछ कह सके।

         योगसाधना की शिक्षा बड़े लोगों का शौक माना जाता था। यह सही भी लगता है क्योंकि परंपरागत वाहनों तथा साइकिल चलाने वालों का दिन भर व्यायाम चलता था। उनकी थकान उनको रात को चैन की नींद का उपहार प्रदान करती थी। उस समय ज्ञानी लोगों का इस तरफ ध्यान नहीं गया कि लोगों को योगासन से अलग प्राणायाम तथा ध्यान की तरफ प्रेरित किया जाये। संभवतः योगासाधना के आठों अंगों में से पृथक पृथक सिखाने का विचार किसी ने नहीं किया। अब जबकि विलासिता पूर्ण जीवन शैली है तब योगसाधना की आवश्यकता तीव्रता से अनुभव की जा रही है तो उसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए। पहले जब लोग पैदल अधिक चलने के साथ ही परिश्रम करते थे इसलिये उनका स्वास्थ्य सदैव अच्छा रहता था । बाद में साइकिल युग के चलते भी लोगों के स्वास्थ्य में शुद्धता बनी रही। फिर योग साधना को केवल राजाओं, ऋषियों और धनिकों के लिये आवश्यक इसलिये भी माना गया क्योंकि वह शारीरिक श्रम कम करते थे जबकि बदलते समय के साथ इसे जनसाधारण में प्रचारित किया जाना चाहिये था। भले ही शारीरिक श्रम से लोगों का लाभ होता रहा है पर प्राणायाम से जो मानसिक लाभ की कल्पना किसी ने नहीं की। श्रमिक तथा गरीब वर्ग के लिये योगासन के साथ प्राणायाम और ध्यान का भी महत्व अलग अलग रूप से प्रचारित किया जाना जरूरी लगता है। यह बताना जरूरी है कि जो लोग शारीरिक श्रम के कारण रात की नींद आराम से लेते हैं उनको भी जीवन का आनंद उठाने के लिये प्राणायाम और ध्यान करना चाहिये।

             अब योग साधना के आठ भाग देखकर तो यही लगता है कि उसके आठ अंगों को -यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि-एक पूरा कार्यक्रम मानकर देखा गया। सच तो यह है कि जो लोग परिश्रम करते हैं या सुबह सैर करके आते हैं उनको नियम, प्राणायम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि जैसे अन्य सात अंगों का भी अध्ययन करना चाहिये। योगासन या सुबह की सैर के बाद प्राणायम और ध्यान की आदत डालना श्रेयस्कर है। जो लोग गरीब, मजदूर तथा अन्य शारीरिक श्रम करते हैं उनके लिये भी प्राणायाम के साथ ध्यान बहुत लाभप्रद है। इस बात का प्रचार बहुत पहले ही होना चाहिये था इसलिये अब इस पर भी इस पर काम होना चाहिये। प्राणायाम से प्राणवायु तीव्र गति से अंदर जाकर शरीर और मन के विकारों को परे करती है। उसी तरह ध्यान भी योगासन और प्राणायाम के बाद प्राप्त शुद्धि को पूरी देह और मन में वितरित करने की एक प्रक्रिया है। जब कभी आप थक जायें और सोने की बजाय आंखें बंद कर केवल बैठें और अपने ध्यान को भृकुटि पर केंद्रित करके देखें। शुरुआत में आराम नहीं मिलेगा पर पांच दस मिनट बाद आप को अपने शरीर और मन में शांति अनुभव होगी। जैसे मान लीजिये आप किसी समस्या से परेशान हैं। वह उठते बैठते आपको परेशान करती है। आप ध्यान लगा कर बैठें। समस्या हल होना एक अलग मामला है पर ध्यान के बाद उससे उपजे तनाव से राहत अनुभव करेंगे। सच बात तो यह है कि हम अपने दिमाग और शरीर को बहुत खींचते हैं और उसको बिना ध्यान के विराम नहीं मिल सकता। यह को व्यायाम नहीं है एक तरह से पूर्णाहुति है उस यज्ञ की जो हम अपनी देह के लिये करते हैं। शेष फिर कभी। संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior http://terahdeep.blogspot.com …………………………..

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