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दिल से बाहर-हिन्दी कविता


अब अपने दिल के घर से
बाहर आकर
न हम रोते
न हँसते हैं,
पर्दे पर चलते अफसाने
देखते देखते
हो गए इस जहान के लोग
हर पल प्रपंच रचने के आदी
हम उनके जाल में यूं नहीं फँसते हैं।
कहें दीपक बापू
फिल्म की पटकथाएँ
और टीवी धारावाहिकों की कथाएँ
ले उड़ जाती हैं अक्ल पढ़े लिखे लोगों की
ख्याली दुनियाँ के पात्रों को ढूंढते हुए
ज़मीन की हक़ीक़तों में खुद ही धँसते हैं,
रोना तो छूट गया बरसों पहले
अब ज़माने के कभी बहते घड़ियाली आंसुओं
कभी फीकी उड़ती मुस्कान देखकर
अब अपने दिल को साथ लेकर
बस, हम भी हँसते हैं।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com
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‘सविता भाभी’ से मस्त राम पीछे- व्यंग्य आलेख ‘savita bhabhi’ se pichhe ‘mastram’-hindi vyangya article


कुछ दिन पहले तक शायद बहुत कम लोग जानते होंगे कि ‘सविता भाभी’ नाम की कोई वेबसाइट होगी जिस पर ‘लोकप्रिय’ सामग्री भी हो सकती है। इस पर प्रतिबंध लगने के बाद उसकी खोज खबर बढ़ गयी है। सच कहें तो इस ‘सविता भाभी’ अपने पाठों को हिट कराने का जोरदार नुस्खा बनता नजर आ रहा है-यह लेख भी इसी उद्देश्य से हम लिख रहे हैं कि चलो कुछ और हिट बटोर लो क्योंकि हम कथित रूप से उस तरह का लोकप्रिय साहित्य लिखने में अपने को असमर्थ पाते हैं-हां, अगर कहीं से जोरदार पैसे की आफर आ जाये तो जोरदार कहानियां हैं पर मु्फ्त में तो यही लिखेंगे। नामा आ जाये तो नाम वैसे ही होता है भले बदनाम हो जाये।
किस्से पर किस्सा याद आ ही जाता है। हमने अपने ब्लाग में अपने नाम के साथ मस्तराम शब्द जोड़ा तो पाया कि वह हिट ले रहा है। उसी तरह हमने अंग्रेजी और हिंदी में मस्तराम के लेबल जोड़े। उससे कुछ पाठ हिट होने लगे। एक बार एक ब्लाग लेखक ने इस पर आपत्ति की तो हमने पता किया कि मस्तराम साहित्य में लोकप्रिय सामग्री लिखी जाता है अलबत्ता उसकी लोकप्रियता का दायदा उत्तरप्रदेश तक ही सीमित है। इधर मध्यप्रदेश में लोगों को अधिक जानकारी नहीं है। बहरहाल हमारी नानी हमसे मस्तराम कहती थी जो किसी भी आपत्ति को स्वीकार न कर हम उसका उपयोग करते हैं-उसमें सामग्री यही होती है।
इधर सविता भाभी ने मस्तराम को पीछे छोड़ दिया है। अब क्या करें? उसके उपयोग के लिये हमारे पास कोई तर्क नहीं है। हमारे पूरे खानदान में किसी महिला का नाम सविता नहीं है जिसे झूठमूठ ही आदर्श के रूप में प्रस्तुत कर ब्लाग का नाम लिखे या पाठों पर लेबल लगायें। ‘सविता भाभी’ प्रतिबंध से पहले कितनी लोकप्रिय थी यह तो पता नहीं पर इस समय सर्च इंजिनों यह शब्द सबसे अधिक खोजा गया है। कहते हैं कि किसी भी चीज या आदमी को दबाओ उतनी ही शिद्दत से ऊपर उठ कर आती है। यही हाल ‘सविता भाभी’ का है। एक काल्पनिक स्त्री पात्र और उसका नाम इस समय इंटरनेट प्रयोक्ताओं के लिये खोजबीन का विषय हो गया है।
इंटरनेट पर पोर्न वेबसाईटों का जाल कभी खत्म नहीं हो सकता। देश के अधिकतर प्रयोक्ता ऐसा वैसा देखने के लिये ही अधिक उत्सुक हैं और उनकी यही इच्छा संचार बाजार का यह एक बहुत बड़ा आधार बनी हुई हैं।
एक मजे की बात है कि हमेशा ही नारी स्वतंत्रता और और विकास के पक्षधर सार्वजनिक रूप से अश्लीलता रोकने का स्वतंत्रता के नाम पर तो विरोध करते हैं पर अंतर्जाल पर ‘सविता भाभी’ की रोक पर कोई सामने नहीं आया। लगभग यही स्थिति उनकी है जो परंपरावादी हैं और अश्लीलता रोकने का समर्थन करते हैं वह भी इसके समर्थन में आगे नहीं आये।
इधर अनेक अंतर्जाल लेखकों ने यह बता दिया है कि ‘सविता भाभी’ पर कैसे पहुंचा जा सकता है। हमने यह वेबसाईट देखने का प्रयास नहीं किया मगर इस पर लगा प्रतिबंध हमारे लिये कौतुक और जिज्ञासा का विषय है। इधर हमारे एक पाठ ने जमकर हिट पाये तो वह जिज्ञासा बढ़ गयी।
हम भी लगे गुणा भाग करने। पाया कि मस्तराम उसके मुकाबले एकदम फ्लाप है।
उस दिन इस लेखक ने सविता भाभी वेबसाईट पर लगे प्रतिबंध पर एक आलेख लिखा। उसका नाम भी पहली बार अखबार में देखा था। वह पाठ ब्लाग स्पाट के ब्लाग पर लिखा गया। हिंदी के सभी ब्लाग एक जगह दिखाने वाले एक फोरम ब्लाग वाणी पर इस लेखक के केवल ब्लाग स्पाट के ही ब्लाग दिखते हैं। वहां ब्लाग लेखक मित्रों की आवाजाही होती है और आम पाठक तो हमारे पाठों को सर्च इंजिनों में सीधे ही पढ़ते हैं। वहां सविता भाभी पर लिखा गया पाठ फ्लाप हो गया। उसे हमने शाम को डालाा था और अगली सुबह वही पाठ हमें सुस्त पड़ा दिखा। जैसे कह रहा हो कि तुमने शीर्षक में ही अगर ‘सविता भाभी’ लिखा होता तो मेरा यह हाल न होता।’
हमने उसे पुचकारा और शाम तक इंतजार करने के लिये कहा। शाम को आते ही उस पाठ को वर्डप्रेस के प्लेट फार्म ‘हिंदी पत्रिका’ पर ढकेल दिया। उस पर शीर्षक हिंदी और अंग्रेजी में लिखा-यह अलग बात है कि हिंदी में ‘सविता भाभी’ छूट गया पर अंग्रेजी में डालना नहीं भूले।
अपने दायित्व की इति श्री करने के बाद हमने उससे मूंह फेर लिया। डेढ़ दिन बाद जब वर्डप्रेस के डेशबोर्ड को खोला तो वह पाठों के शीर्ष पर मौजूद होकर वह हमें चिढ़ा रहा था-देखो हिंदी में लिखना था ‘सविता भाभी पर प्रतिबंध’ और लिख दिया केवल ‘पर प्रतिबंध’। हमने अंदर घुसकर देखा तो आंखें फटी रह गयी। कहां वह पाठ छह पाठकों की संख्या लेकर ब्लागवाणी में सुपर फ्लाप था और कहां वह डेढ़ सौ के पास पहुंच गया। हिंदी में शब्द डालने का अफसोस इसलिये नहीं रहा क्योंकि उसे अंग्रेजी के शब्द से ही खोजा गया था।
फिर हमने मस्तराम की खोजबीन की तो देखा कि उसके आंकड़े नगण्य थे। मस्तराम नाम की अंतर्जाल पर लोकप्रियता ठीक ठाक है। हम तो हैरान होते हैं जब मस्तरामी ब्लाग के आंकड़े देखते हैं। कुछ मत लिखो पर उस पाठकों का आगमन यथावत है। हमें याद है जब पत्रकार थे तब हमारे साथ एक बाजार संपादक हुआ करते थे। उनके शीर्ष ऐसे ही होते थे। ‘मिर्ची भड़की’, ‘सोना लुढ़का’, ‘चांदी उछली’ और ‘तेल पिछड़ा’। उनकी अनुपस्थिति में हम उनका काम देखते थे। तब ऐसे ही शीर्षक लगाते थे। उनकी देखा देखी हम अपने खेल समाचारों पर कभी कभी खेल संपादक के रूप में हम भी लिख देते थे कि‘अमुक टीम ने अमुक को पीटा’। इस बात को अनेक बरस हो गये हैं पर याद तो आती है। इस घटनाक्रम पर हमारे दिमाग में एक ही शीर्षक आ रहा था कि ‘सविता भाभी’ ने ‘मस्तराम’को पीटा।
आगे क्या होगा पता नहीं पर इस देश में अंतर्जाल पर व्यवसाय ढूंढ रहे लोग इसे नुस्खे के रूप में अपना सकते हैं। आप देखना कि ‘सविता भाभी’ नाम के अनेक उत्पाद और पाठ यहां दिख सकते हैं। प्रतिबंध लगा यह एक अलग विषय है पर जिस तरह अखबार में पढ़कर लोग इस पर आ रहे हैं उस पर विचार करना चाहिये कि कहीं इस तरह के प्रयास तो नहीं हो रहे कि इसके नाम के सहारे अंतर्जाल पर बाजार की नैया पर लगायी जाये क्योंकि अंतर्जाल का बाजर नियमित रूप से बना रहे इसके लिये टेलीफोन कंपनियों से विज्ञापन पाने वाले व्यवसायिक इस तरह के प्रयास करेंगे। मस्तराम से अधिक आशा नहीं की जा सकती।
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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप
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कबीर के दोहे: मधुमक्खी की तरह सुगंध ग्रहण करें


जो तूं सेवा गुरुन का, निंदा की तज बान
निंदक नेरे आय जब कर आदर सनमान

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अगर सद्गुरु के सच्चे भक्त हो तो निंदा को त्याग दो और कोई अपना निंदा करता है तो निकट आने पर उसका भी सम्मान करो।
माखी गहै कुबास को, फूल बास नहिं लेय
मधुमाखी है साधुजन, गुनहि बास चित देय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मक्खी हमेशा दुर्गंध ग्रहण करती है कि न फूलों की सुगंध, परंतु मधुमक्खी साधुजनों की तरह है जो कि सद्गण रूपी सुगंध का ही अपने चित्त में स्थान देती है।

तिनका कबहूं न निंदिये, पांव तले जो होय
कबहुं उडि़ आंखों पड़ै, पीर धनेरी होय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कभी पांव के नीच आने वाले तिनके की भी उपेक्षा नहीं करना चाहिए पता नहीं कब हवा के सहारे उड़कर आंखों में घुसकर पीड़ा देने लगे।

जो तूं सेवा गुरुन का, निंदा की तज बान
निंदक नेरे आय जब कर आदर सनमान

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अगर सद्गुरु के सच्चे भक्त हो तो निंदा को त्याग दो और कोई अपना निंदा करता है तो निकट आने पर उसका भी सम्मान करो।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-यह सच्चे भक्त की पहचान है कि वह किसी की निंदा नहीं करते न ही किसी में दोष देखते हैं। जो नित प्रतिदिन भक्ति करते हैं और फिर परनिंदा में लग जाते हैं उनकी भक्ति में दोष है यही समझना चाहिये। वैसे आम आदमी की बात ही क्या कथित संत और साधु भी एक दूसरे की निंदा करते हैं। निंदा करना आदमी के अंदर मौजूद नकारात्मक सोच का परिणाम है। जिनके मन में परमात्मा के प्रति सत्य में भक्ति का भाव है उनका सोच सकारात्मक रहता है और वह दूसरों की अच्छाईयों पर ही विचार कर उनको ग्रहण करते हैंं।

दूसरों के दोष देखकर उसकी चर्चा करने से वह दोष हमारे अंदर स्वतः आ जाता है। कहते हैं कि आलोचक को अपने से दूर नहीं रखना चाहिये क्योंकि उसके श्रीमुख से अपने दोष सुनने से हमें वह अपने अंदर से निकालने का अवसर मिल जाता है। यह दोष निकलकर उसके अंदर से जाता कहां है? तय बात है कि वह आलोचक के अंदर ही जाता है। जिस तरह भगवान की भक्ति करने से उनका सानिध्य मिलता है उसी तरह दूसरे की निंदा करना या दोष देखने से वह भी हमें प्राप्त होता है। यह दुनियां वैसी ही जैसी हमारी नीयत है अतः अच्छा देखें तो वह अच्छी लगेगी और अगर खराब देखेंगे तो वैसा ही बुरा भी लगेगा।
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वही नायक बनेगा-हास्य व्यंग्य कविताएँ


रीढ़हीन हो तो भी चलेगा।
चरित्र कैसा हो भी
पर चित्र में चमकदार दिखाई दे
ऐसा चेहरा ही नायक की तरह ढलेगा।

शब्द ज्ञान की उपाधि होते हुए भी
नहीं जानता हो दिमाग से सोचना
तब भी वह जमाने के लिये
लड़ता हुआ नायक बनेगा।
कोई और लिखेगा संवाद
बस वह जुबान से बोलेगा
तुतलाता हो तो भी कोई बात नहीं
कोई दूसरा उसकी आवाज भरेगा।

बाजार के सौदागर खेलते हैं
दौलत के सहारे
चंद सिक्के खर्च कर
नायक और खलनायक खरीद
रोज नाटक सजा लेते हैं
खुली आंख से देखते है लोग
पर अक्ल पर पड़ जाता है
उनकी अदाओं से ऐसा पर्दा पड़ जाता
कि ख्वाब को भी सच समझ पचा लेते हैं
धरती पर देखें तो
सौदागर नकली मोती के लिये लपका देते हैं
आकाश की तरफ नजर डालें
तो कोई फरिश्ता टपका देते हैं
अपनी नजरों की दायरे में कैद
इंसान सोच देखने बाहर नहीं आता
बाजार में इसलिये लुट जाता
ख्वाबों का सच
ख्यालों की हकीकत
और फकीरों की नसीहत के सहारे
जो नजरों के आगे भी देखता है
वही इंसान से ग्राहक होने से बचेगा।

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बादशाह बनने की चाहत-हिंदी शायरी
हीरे जवाहरात और रत्नों से सजा सिंहासन
और संगमरमर का महल देखकर
बादशाह बनने की चाहत मन में चली ही आती है।
पर जमीन पर बिछी चटाई के आसन
कोई क्या कम होता है
जिस पर बैठकर चैन की बंसी
बजाई जाती है।

देखने का अपना नजरिया है
चलने का अपना अपना अंदाज
पसीने में नहाकर भी मजे लेते रहते कुछ लोग
वह बैचेनी की कैद में टहलते हैं
जिनको मिला है राज
संतोष सबसे बड़ा धन है
यह बात किसी किसी को समझ में आती है।
लोहे, पत्थर और रंगीन कागज की मुद्रा में
अपने अरमान ढूंढने निकले आदमी को
उसकी ख्वाहिश ही बेचैन बनाती है।

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मौका पड़े तो अपने लिए शैतान खड़ा कर लो-व्यंग्य


शैतान कभी इस जहां में मर ही नहीं सकता। वजह! उसके मरने से फरिश्तों की कदर कम हो जायेगी। इसलिये जिसे अपने के फरिश्ता साबित करना होता है वह अपने लिये पहले एक शैतान जुटाता है। अगर कोई कालोनी का फरिश्ता बनना चाहता है तो पहले वह दूसरी कालोनी की जांच करेगा। वहां किसी व्यक्ति का-जिससे लोग डरते हैं- उसका भय अपनी कालोनी में पैदा करेगा। साथ ही बतायेगा कि वह उस पर नियंत्रण रख सकता है। शहर का फरिश्ता बनने वाला दूसरे शहर का और प्रदेश का है तो दूसरे प्रदेश का शैतान अपने लिये चुनता है। यह मजाक नहीं है। आप और हम सब यही करते हैं।

घर में किसी चीज की कमी है और अपने पास उसके लिये लाने का कोई उपाय नहीं है तो परिवार के सदस्यों को समझाने के लिये यह भी एक रास्ता है कि किसी ऐसे शैतान को खड़ा कर दो जिससे वह डर जायें। सबसे बड़ा शैतान हो सकता है वह जो हमारा रोजगार छीन सकता है। परिवार के लोग अधिक कमाने का दबाव डालें तो उनको बताओं कि उधर एक एसा आदमी है जिससे मूंह फेरा तो वह वर्तमान रोजगार भी तबाह कर देगा। नौकरी कर रहे हो तो बास का और निजी व्यवसाय कर रहे हों तो पड़ौसी व्यवसायी का भय पैदा करो। उनको समझाओं कि ‘अगर अधिक कमाने के चक्कर में पड़े तो इधर उधर दौड़ना पड़ा तो इस रोजी से भी जायेंगे। यह काल्पनिक शैतान हमको बचाता है।
नौकरी करने वालों के लिये तो आजकल वैसे भी बहुत तनाव हैं। एक तो लोग अब अपने काम के लिये झगड़ने लगे हैं दूसरी तरफ मीडिया स्टिंग आपरेशन करता है ऐसे में उपरी कमाई सोच समझ कर करनी पड़ती है। फिर सभी जगह उपरी कमाई नहीं होती। ऐसे में परिवार के लोग कहते हैं‘देखो वह भी नौकरी कर रहा है और तुम भी! उसके पास घर में सारा सामान है। तुम हो कि पूरा घर ही फटीचर घूम रहा है।
ऐसे में जबरदस्ती ईमानदारी का जीवन गुजार रहे नौकरपेशा आदमी को अपनी सफाई में यह बताना पड़ता है कि उससे कोई शैतान नाराज चल रहा है जो उसको ईमानदारी वाली जगह पर काम करना पड़ रहा है। जब कोई फरिश्ता आयेगा तब हो सकता है कि कमाई वाली जगह पर उसकी पोस्टिंग हो जायेगी।’
खिलाड़ी हारते हैं तो कभी मैदान को तो कभी मौसम को शैतान बताते हैं। किसी की फिल्म पिटती है तो वह दर्शकों की कम बुद्धि को शैताना मानता है जिसकी वजह से फिल्म उनको समझ में नहीं आयी। टीवी वालों को तो आजकल हर दिन किसी शैतान की जरूरत पड़ती है। पहले बाप को बेटी का कत्ल करने वाला शैतान बताते हैं। महीने भर बाद वह जब निर्दोष बाहर आता है तब उसे फरिश्ता बताते हैं। यानि अगर उसे पहले शैतान नहीं बनाते तो फिर दिखाने के लिये फरिश्ता आता कहां से? जादू, तंत्र और मंत्र वाले तो शैतान का रूप दिखाकर ही अपना धंध चलाते हैं। ‘अरे, अमुक व्यक्ति बीमारी में मर गया उस पर किसी शैतान का साया पड़ा था। किसी ने उस पर जादू कर दिया था।’‘उसका कोई काम नहीं बनता उस पर किसी ने जादू कर दिया है!’यही हाल सभी का है। अगर आपको कहीं अपने समूह में इमेज बनानी है तो किसी दूसरे समूह का भय पैदा कर दो और ऐसी हालत पैदा कर दो कि आपकी अनुपस्थिति बहुत खले और लोग भयभीत हो कि दूसरा समूह पूरा का पूरा या उसके लोग उन पर हमला न कर दें।’
अगर कहीं पेड़ लगाने के लिये चार लोग एकत्रित करना चाहो तो नहीं आयेंगे पर उनको सूचना दो कि अमुक संकट है और अगर नहीं मिले भविष्य में विकट हो जायेगता तो चार क्या चालीस चले आयेंगे। अपनी नाकामी और नकारापन छिपाने के लिये शैतान एक चादर का काम करता है। आप भले ही किसी व्यक्ति को प्यार करते हैं। उसके साथ उठते बैैठते हैं। पेैसे का लेनदेन करते हैं पर अगर वह आपके परिवार में आता जाता नहीं है मगर समय आने पर आप उसे अपने परिवार में शैतान बना सकते हैं कि उसने मेरा काम बिगाड़ दिया। इतिहास उठाकर देख लीजिये जितने भी पूज्यनीय लोग हुए हैं सबके सामने कोई शैतान था। अगर वह शैतान नहीं होता तो क्या वह पूज्यनीय बनते। वैसे इतिहास में सब सच है इस पर यकीन नहीं होता क्योंकि आज के आधुनिक युग में जब सब कुछ पास ही दिखता है तब भी लिखने वाले कुछ का कुछ लिख जाते हैं और उनकी समझ पर तरस आता है तब लगता है कि पहले भी लिखने वाले तो ऐसे ही रहे होंगे।
एक कवि लगातार फ्लाप हो रहा था। जब वह कविता करता तो कोई ताली नहीं बजाता। कई बार तो उसे कवि सम्मेलनों में बुलाया तक नहीं जाता। तब उसने चार चेले तैयार किये और एक कवि सम्मेलन में अपने काव्य पाठ के दौरान उसने अपने ऊपर ही सड़े अंडे और टमाटर फिंकवा दिये। बाद में उसने यह खबर अखबार में छपवाई जिसमें उसके द्वारा शरीर में खून का आखिरी कतरा होने तक कविता लिखने की शपथ भी शामिल थी । हो गया वह हिट। उसके वही चेले चपाटे भी उससे पुरस्कृत होते रहे।
जिन लड़कों को जुआ आदि खेलने की आदत होती है वह इस मामले में बहुत उस्ताद होते हैं। पैसे घर से चोरी कर सट्टा और जुआ में बरबाद करते हैं पर जब उसका अवसर नहीं मिलता या घर वाले चैकस हो जाते हैं तब वह घर पर आकर वह बताते हैं कि अमुक आदमी से कर्ज लिया है अगर नहीं चुकाया तो वह मार डालेंगे। उससे भी काम न बने तो चार मित्र ही कर्जदार बनाकर घर बुलवा लेंगे जो जान से मारने की धमकी दे जायेंगे। ऐसे में मां तो एक लाचार औरत होती है जो अपने लाल को पैसे निकाल कर देती है। जुआरी लोग तो एक तरह से हमेशा ही भले बने रहते हैं। उनका व्यवहार भी इतना अच्छा होता है कि लोग कहते हैं‘आदमी ठीक है एक तरह से फरिश्ता है, बस जुआ की आदत है।’
जुआरी हमेशा अपने लिये पैसे जुटाने के लिये शैतान का इंतजाम किये रहते हैं पर दिखाई देते हैं। उनका शैतान भी दिखाई देता है पर वह होता नहीं उनके अपने ही फरिश्ते मित्र होते हैं। वह अपने परिवार के लोगों से यह कहकर पैसा एंठते हैं कि उन पर ऐसे लोगों का कर्जा है जिनको वापस नहीं लौटाया तो मार डालेंगे। परिवार के लोगो को यकीन नहीं हो तो अपने मित्रों को ही वह शैतान बनाकर प्रस्तुत कर दिया जाता है। आशय यह है कि शैतान अस्तित्व में होता नहीं है पर दिखाना पड़ता है। अगर आपको परिवार, समाज या अपने समूह में शासन करना है तो हमेशा कोई शैतान उसके सामने खड़ा करो। यह समस्या के रूप में भी हो सकता है और व्यक्ति के रूप में भी। समस्या न हो तो खड़ी करो और उसे ही शैतान जैसा ताकतवर बना दो। शैतान तो बिना देह का जीव है कहीं भी प्रकट कर लो। किसी भी भेष में शैतान हो वह आपके काम का है पर याद रखो कोई और खड़ा करे तो उसकी बातों में न आओ। यकीन करो इस दुनियां में शैतान है ही नहीं बल्कि वह आदमी के अंदर ही है जिसे शातिर लोग समय के हिसाब से बनाते और बिगाड़ते रहते हैं।
एक आदमी ने अपने सोफे के किनारे ही चाय का कप पीकर रखा और वह उसके हाथ से गिर गया। वह उठ कर दूसरी जगह बैठ गया पत्नी आयी तो उसने पूछा-‘यह कप कैसे टूटा?’उसी समय उस आदमी को एक चूहा दिखाई दिया।
उसने उसकी तरफ इशारा करते हुए कहा-‘उसने तोड़ा!
’पत्नी ने कहा-‘आजकल चूहे भी बहुत परेशान करने लगे हैं। देखो कितना ताकतवर है उसकी टक्कर से इतना बड़ा कप गिर गया। चूहा है कि उसके रूप में शेतान?”
वह चूहा बहुत मोटा था इसलिये उसकी पत्नी को लगा कि हो सकता है कि उसने गिराया हो और आदमी अपने मन में सर्वशक्तिमान का शुक्रिया अदा कर रहा कि उसने समय पर एक शैतान-भले ही चूहे के रूप में-भेज दिया।
’याद रखो कोई दूसरा व्यक्ति भी आपको शैतान बना सकता है। इसलिये सतर्क रहो। किसी प्रकार के वाद-विवाद में मत पड़ो। कम से कम ऐसी हरकत मत करो जिससे दूसरा आपको शैतान साबित करे। वैसे जीवन में दृढ़निश्चयी और स्पष्टवादी लोगों को कोई शैतान नहीं गढ़ना चाहिए, पर कोई अवसर दे तो उसे छोड़ना भी नहीं चाहिए। जैसे कोई आपको अनावश्यक रूप से अपमानित करे या काम बिगाड़े और आपको व्यापक जनसमर्थन मिल रहा हो तो उस आदमी के विरुद्ध अभियान छेड़ दो ताकि लोगों की दृष्टि में आपकी फरिश्ते की छबि बन जाये। सर्वतशक्तिमान की कृपा से फरिश्ते तो यहां कई मनुष्य बन ही जाते हैं पर शैतान इंसान का ही ईजाद किया हुआ है इसलिये वह बहुत चमकदार या भयावह हो सकता है पर ताकतवर नहीं। जो लोग नकारा, मतलबी और धोखेबाज हैं वही शैतान को खड़ा करते हैं क्योंकि अच्छे काम कर लोगों के दिल जीतने की उनकी औकात नहीं होती।
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क्रिकेट मैच से अधिक अच्छा लगता है ब्लाग/पत्रिका पर लिखना-हास्य व्यंग्य


अब फ़िर क्रिकट प्रतियोगिता शुरू होने की तैयारी हो रही है। अखबारों और टीवी पर उसका धूंआधार प्रचार होते देख एसा लगा कि क्रिकेट अब मुझसे अलविदा कह रही है।

पिछली बार इन्हीं दिनों मैने विश्व कप में भारत के हारने पर एक कविता लिखी थी अलविदा किकेट। उस समय सादा हिंदी फोंट में होने के कारण कोई उसे पढ़ नहीं पाया बाद में मैने इसे स्कैन कर एक ब्लाग रखा तो एक साथी ब्लागर ने लिखा कि ‘‘क्रिकेट तो मजे के लिये देखना चाहिए। कोई भी टीम हो हमें तो खेल का आनंद उठाना चाहिए। उन्होंने सभी टीमों के नाम भी गिनाए और उनमें एक भी टीम इसमें नहीं है। अगर मेरा वह यह लेख पढ़ें और उन्हें याद आये तो वह भी मानेंगे कि इस खेल से वह अब अपने को जोड़ नहीं पायेंगे।

एक अरब से अधिक आबादी वाले इस देश में बच्चा-बूढ़ा-जवान, स्त्री-पुरुष, डाक्टर-मरीज, प्रेमी-प्रेमिका, अमीर-गरीब, और सज्जन-दुर्जन सबके लिये यह खेल एक जुनून था तो केवल इसलिये कि कहीं न कहीं इसके साथ खेलने वाली टीमों के साथ उनका भावनात्मक लगाव था पर लगता है कि वह खत्म हो गया है। ऐसा लगता है कि क्रिकेट की यह प्रतियोगिता मेरी हास्य कविता का जवाब हो जैस कह रही हो ‘अलविदा प्यारे अब नहीं हम तुम्हारे’।

कोई आठ टीमें हैं जिनके नाम मैंने पढ़ें। उनमें से किसी के साथ मेरा तो क्या उन शहरों या प्रदेशें लोगों के जज्वात भी नही जुड़ सकते जिनके नाम पर यह टीमें हैं। क्या वहां लोग संवेदनहीन है जो उनको यह आभास नहीं होगा कि देश के क्रिकेट प्रेमियों का एक बहुत बड़ा हिस्सा इससे अलग हो गया है। कहते हैं कि क्रिकेट ने इस देश को एक किया और विभाजित क्रिकेट को देखकर क्या कहें?

लोगों के पास बहुत सारे संचार और प्रचार माध्यम हैं और सब जानने लगे हैं। लोगों को एक रखने के लिये वैसे भी क्रिकेट की जरूरत नहीं थी पर जिस तरह यह प्रतियोगिता शुरू हो रही है और उसमें जबरन लोगों की दिलचस्पी पैदा करने की जो कोशिश हो रही है वह विचारणीय है। अखबारों ने लिखा है कि इस पर करोड़ों रुपये को खेल होगा। कहने की जरूरत नहीं है कि इसमें वह सब कुछ खुलेआम होगा जो पहले पर्दे के पीछे होता था। अब आम क्रिकेट प्रेमी को किसी प्रकार की शिकायत का अधिकार नहीं है क्योंकि कौन देश के नाम उपयोग कर रहा है? पहले जिसे देखो वही टीम इंडिया की हार को भी शक से देख रहा है तो जीत को भी। तमाम चेहरे जो चमके उन पर लोग कालिख के निशान देखने लगते। अब उनका यह अधिकार नहीं है। शुद्ध रूप से मनोरंजन के लिये यह सब हो रहा है। अब यह फिल्म है या क्रिकेट हमारे पूछने या जानने का हक नहीं है।

इसके बावजूद कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिनकी तरफ ध्यान देना जरूरी है। इसके सामान्य क्रिकेट पर क्या प्रभाव होंगे? चाहे कितना भी किया जाये अगर राष्ट्रीय भावनायें नहीं जुड़ने से आम क्रिकेट प्रेमी तो इससे दूर ही होगा तो फिर इसके साथ कौन जुड़ेगा? इसका अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेले जाने वाले मैचों पर क्या अच्छा या बुरा प्रभाव होगा? कहने को कहते हैं कि निजी क्षेत्र तो जनता की मांग के अनुसार काम करता है पर अब सारी शक्तियां निजी क्षेत्र के हाथ में है तो वह अपने अनुसार लोगों की मांग निर्मित करना चाहता है। देखा जाये तो टीवी चैनलो और अखबारों में इसके प्रचार का लोगों पर कोई अधिक प्रभाव परिलक्षित नहीं हो रहा तो क्या वह इसकी खबरों को प्रमुखता देकर इसके लिये लोग जुटाने के प्रयास में लगे रहेंगे? हर क्रिकेट प्रेमी के दिमाग में एक शब्द था ‘भारत’ जिससे क्रिकेट को भाव का विस्तार होता था तो क्या नयी क्रिकेट के पास ऐसा कोई अन्य शब्द है जो फिर उसे विस्तार दे।

बीस ओवर की प्रतियोगिता में भारत की जीत के बाद मेरा मन कुछ देर के लिये क्रिकेट की तरफ गया था पर अब फिर वही हालत हो गयी। कल शुरू होने वाली प्रतियोगिता के लिये जो टीमों की सूची देखी तो मैं अपने आपसे पूछ रहा था ‘‘यह कौनसी क्रिकेट’’। आखिर कौन लोग इसे देखकर आनंद उठायेंगे। इस देश में आमतौर से लोग कहते है कि‘‘हमारे पास टाईम नहीं है’’पर क्रिकेट के लिए उनके पास टाईम और पैसे आ जाते हैं। मतलब यह कि कुछ लोगों के पास पैसे हैं पर उसके खर्च करने और टाईम पास करने के लिए कोई बहाना नहीं है और उनके लिए यह एक स्वर्णिम अवसर होगा।
जो मैच टीवी पर दिखता है उसको देखने के लिये भूखे प्यासे मैदान पर पहुंच जाते है ऐसे लोगों की इस देश में कमी नहीं है। जहां तक उनकी क्रिकेट में समझ का सवाल है तो अधिकतर टीवी पर अपनी शक्ल दिखाते हुए यह कहते हैं कि हम अपने हीरो को देखने आये थे। अब वहां जाकर कोई पूछ नहीं सकते कि क्या वह तुम को टीवी पर नहीं दिखाई देता।
खैर, कुल मिलाकर क्रिकेट अब खेल नहीं मनोरंजन बन गया है यह अलग बात है कि हम जैसे ब्लागर के लिये तो ऐसे मैचों से अच्छा यही होगा कि कोई फालतू कविता लिखकर मजा ले लें आखिर छहः सो रुपया हम इस पर खर्च कर रहे है।

हिट की परवाह की तो ब्लाग पर लिखना कठिन होगा-संपादकीय


अंतर्जाल वाकई एक बहुत बड़ा मायाजाल है। हिंदी के समस्त ब्लाग एक जगह दिखाये जाने वाले फोरमों पर आपस में संपर्क रखने की जो सुविधा है वह एक अनूठी है। जिन लोगोंे ने नारद फोरम के साथ अपने ब्लाग जीवन की शुरुआत की है वह उसे भूल नहीं सकते। वहां पर दूसरों को हिट और स्वयं को फ्लाप ब्लागर देखकर कुछ लेखकों को अपनी तौहीन लगती थी क्योंकि ऐसा लगता कि हिंदी के अंतर्जाल की दुनियां यहीं सिमटी हुई है। अनेक लोग यहां हिट प्राप्त करते रहे इसी कारण उन विषयों पर लिखने के आदी हो गये जिससे ब्लाग लेखकों में हिट मिलें। इनमें तो कई गजब के लेखक हैं और आज भी उनको जमकर हिट मिलते हैं। उनको पढ़ना बुरा नहीं है क्योंकि उनसे ही यही सीखा जा सकता है कि आपको क्या पसंद नहीं है और जो आपको पंसद नहीं है वह आम पाठक को भी पसंद नहीं आयेगा। ऐसे में अपने अंदर कुछ अलग लिखने के प्रेरणा पैदा होती है।
पहले ब्लाग लेखकों को यह पता ही नहीं था कि आखिर उनके ब्लाग की पहुंच कहां तक है? धीरेधीरे यह स्पष्ट हो गया है कि एच.टी.एम.एल से लिखी गयी सामग्री ही ब्लाग की ताकत होती है। इन फोरमों पर फ्लाप रहने के बावजूद कई लोग लिख रहे हैं क्योंकि वह जानते हैं कि अंततः उनके लिखे पाठों का महत्व ही उनको प्रचार दिला सकता है। सच तो यह है कि ब्लाग लेखकों में हिट दिलाने वाली सामग्री केवल उसी दिन के लिये महत्वपूर्ण है जिस दिन लिखी गयी है। उसके बाद उसका कोई महत्व नहीं रह जाता। ब्लाग लेखकों से लेखक ब्लागरों का सामंजस्य बैठ पाना कठिन है। मेरे कई ब्लाग लेखक मित्र है और उनकी सदाशयता ने मुझे प्रेरित किया है उनकी हिंदी ब्लाग जगत के प्रति निष्ठा भी असंदिग्ध है पर यहां कुछ ऐ से लोग भी हैं जो लिखने के बावजूद गंभीर नहीं हैं। बंदरों की तरह उछलकूद कर वह यह जताते हैं कि वह यहां के श्रेष्ठ ब्लागर हैं पर उनका लेखन एक ब्लागर लेखक के रूप में मुझे पसंद आता है पाठक के रूप में नहीं। इन फोरमों पर हिट और फ्लाप का खेल नकली है इस बात को समझ लेना चाहिए। कभी तो ऐसा लगता है कि यहां कुछ लोगों को हिट इतने न मिलें तो वह लिखना ही बंद कर देंगे। संभवतः यही कारण है ऐसे लोगों को प्रोत्साहित किया जा रहा है पर दूसरे लोग हतोत्साहित न हों इसलिये मैं प्रतिवाद स्वरूप अपने कुछ पाठ लिख देता हूं जो मेरे मित्र ब्लागरों को पसंद नहीं आते। जिन लोगों को गंभीर और सोद्देश्य लेखक करना है उन्हें यहंा हिट का मोह त्यागना होगा। यहां अपनी सुविधा और विचार से पसंद और हिट हैं पर किसी भी तरह से आम पाठक का प्रतिनिधित्व यहां नहीं है। यहां कुछ ऐसे ब्लाग लेखक जबरदस्त हिट पा रहे हैं जिनके लेखन को आम पाठक के लिये तो कभी भी मतलब का नहीं माना जा सकता। जिन लोगों ने अपने आपको यहां का नेता समझा है वह बड़े शहरों रहते हैं और प्रचार माध्यमों में अपनी पहुंच का लाभ उठाकर कर अपने ऐसे ब्लाग लेखकों को प्रचार दिलवाते हैं जिनका लेखक आम पाठक के रूप में प्रभावित नहीं करता। हालांकि मैं उनको स्वयं बहुत दिलचस्पी से पढ़ता हूं। एक दिलचस्प बात यह है कि जिन ब्लाग लेखकों को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया जा रहा है उनमें अधिकांशतः ब्लाग स्पाट पर ही लिखते हैं जिनको प्रोत्साहित करने की आवश्यकता होती है। ब्लागस्पाट के ब्लाग तकनीकी कारणों से अधिक पाठक नहीं जुटा पाते। जिस दिन पाठ लिखो उस दिन हिट आते हैं पर फिर शांति छा जाती है। इसके विपरीत वर्डप्रेस के ब्लाग अधिक पाठक जुटाते हैं। यही कारण है कि यहां लिखते हुए कभी ऐसा नहीं लगता कि किसी की परवाह की जाये। ब्लाग स्पाट पर लिखते हुए मुझे ऐसा लगता है कि जैसे अपनी डायरी में लिख रहा हूं। यहां से उठाकर वर्डप्रेस पर रखे गयी कम से कम दस पाठ ऐसे हैं जो पांच सौ से अधिक बार पढ़े जा चुके हैं जबकि यहां उनको बीस से अधिक लोग नहीं पढ़ पाये। ऐसे में मेरा हौसला बढ़ता है। इसके पीछे तकनीकी कारण है जिसका अनुसंधान मैं कर उसका निष्कर्ष भी प्रस्तुत करूंगा। वैसे जिस तरह ब्लाग स्पाट तेजी से अपने स्वरूप में बदलाव ला रहा है उससे अनेक लाभ भी होना है।

ब्लाग लेखकों का एक समूह हिंदी ब्लाग जगत को अपनी जागीर समझ रहा है। यह लोग अपने को मिली सुविधाओं का उपयोग इस तरह कर रहे हैं जैसे कि वह बहुत बड़े लेखक हैं। अगर उनके हिट की लेखक ब्लागर परवाह करेंगे तो फिर वह उस भीड़ में खो जायेंगे जिसकी पहचान कभी नहीं बनती। मैं उन कवि और लेखक ब्लागरों की तारीफ करूंगा जो इन ब्लाग लेखकों के हिट की परवाह किये बिना लिख रहे हैं। सच तो यह है कि लेखक ब्लागरों में ही वह ताकत है जो वह अंतर्जाल में प्रतिष्ठा प्राप्त करेंगे। पिछले कई दिनों से वर्डप्रेस पर लिखी गयी हास्य और गंभीर कविताओं, चिंतन और आलेखों की बढ़ते पाठकों की संख्या देखकर मुझे ऐसा लगता है कि उनमें और अधिक वृद्धि होगी। यह एक दिलचस्प तथ्य है कि ब्लाग के विषय में लिखे गये विषयों को इन फोरमों पर ठीकठाक हिट मिले पर फिर बाद में उनका कोई पाठक नहीं मिला। कई हास्य गंभीर कवितायें तो इतने हिट जुटा लेती हैं कि मुझे स्वयं पर ही यकीन नहीं होता जबकि कहा जाता है कि लोग कविताएं पढ़ना नहीं चाहते। ईपत्रिका ने एक दिन में 253 पाठक जुटाये जो जबकि मेरे एक दूसरे ब्लाग पर सर्वाधिक 215 पाठकों की संख्या थी।
एक बात तय है कि अंतर्जाल पर बेहतर साहित्य लिखने वालों का भविष्य उज्जवल है पर उसके लिये उनको धैर्य धारण करना होगा। इन फोरमों पर अपने ब्लाग अवश्य पंजीकृत करवायें पर हिट के लिये आम पाठक की दृष्टि से ही लिखने का विचार करें। ब्लाग लेखकों से संपर्क रखना आवश्यक है क्योंकि इनमें कई लोग तकनीकी रूप से बहुत कुछ सीख गये हैं और उनके ब्लाग पढ़ते रहना चाहिए। अभी मैंने एक ब्लाग लेखक का पाठ पढ़कर ही अपने ब्लागस्पाट के पाठ में सुधार किया और उससे वह आकर्षक बन गया। इसके बावजूद इन ब्लाग लेखकों के हिट की परवाह की तो आम पाठक के लिये लिखना कठिन हो जायेगा। इस ब्लाग के एक दिन में 250 से अधिक पाठक जुटाने पर बस इतना ही। यह ब्लाग बीस हजार की संख्या की तरफ बढ़ रहा है और उस समय शेष बात लिखी जायेगी।

यह आलेख ‘दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

जमीन की जिन्दगी की हकीकत


ख्वाहिशें तो जिंदगी में बहुत होतीं हैं
पर सभी नहीं होतीं पूरी
जो होतीं भी हैं तो अधूरी
पर कोई इसलिए जिन्दगी में ठहर नहीं जाता
कहीं रौशनी होती है पर
जहाँ होता हैं अँधेरा
वीरान कभी शहर नहीं हो जाता
कोई रोता है कोई हंसता है
करते सभी जिन्दगी पूरी

सपने तो जागते हुए भी
लोग बहुत देखते हैं
उनके पूरे न होने पर
अपने ही मन को सताते हैं
जो पूरे न हो सकें ऐसे सपने देखकर
पूरा न होने पर बेबसी जताते हैं
अपनी नाकामी की हवा से
अपने ही दिल के चिराग बुझाते हैं
खौफ का माहौल चारों और बनाकर
आदमी ढूंढते हैं चैन
पर वह कैसे मिल सकता है
जब उसकी चाहत भी होती आधी-अधूरी
फिर भी वह जिंदा दिल होते हैं लोग
जो जिन्दगी की जंग में
चलते जाते है
क्या खोया-पाया इससे नहीं रखते वास्ता
अपने दिल के चिराग खुद ही जलाते हैं
तय करते हैं मस्ती से मंजिल की दूरी

—————————————-
ख्वाहिशें वही पूरी हो पातीं हैं
जो हकीकत की जमीन पर टिक पातीं हैं
कोई ऐसे पंख नहीं बने जो
आदमी के अरमानों को आसमान में
उडा कर सैर कराएँ
जमीन की जिन्दगी की हकीकतें
जमीन से ही जुड़कर जिंदा रह पाती हैं

कौटिल्य का अर्थशास्त्र: कायर की संगति भी बुरी


  • 1. दूर्भिक्ष और आपत्तिग्रस्त स्वयं ही नष्ट होता है और सेना का व्यसन को प्राप्त हुआ राज प्रमुख युद्ध की शक्ति नहीं रखता।
    2. विदेश में स्थित राज प्रमुख छोटे शत्रु से भी परास्त हो जाता है। थोड़े जल में स्थित ग्राह हाथी को खींचकर चला जाता है।
    3. बहुत शत्रुओं से भयभीत हुआ राजा गिद्धों के मध्य में कबूतर के समान जिस मार्ग में गमन करता है, उसी में वह शीघ्र नष्ट हो जाता है।
    4.सत्य धर्म से रहित व्यक्ति के साथ कभी संधि न करें। दुष्ट व्यक्ति संधि करने पर भी अपनी प्रवृति के कारण हमला करता ही है।
    5.डरपोक युद्ध के त्याग से स्वयं ही नष्ट होता है। वीर पुरुष भी कायर पुरुषों के साथ हौं तो संग्राम में वह भी उनके समान हो जाता है।अत: वीर पुरुषों को कायरों की संगत नहीं करना चाहिऐ।
    6.धर्मात्मा राजप्रमुख पर आपत्ति आने पर सभी उसके लिए युद्ध करते हैं। जिसे प्रजा प्यार करती है वह राजप्रमुख बहुत मुश्किल से परास्त होता है।
    7.संधि कर भी बुद्धिमान किसी का विश्वास न करे। ‘मैं वैर नहीं करूंगा’ यह कहकर भी इंद्र ने वृत्रासुर को मार डाला।
    8.समय आने पर पराक्रम प्रकट करने वाले तथा नम्र होने वाले बलवान पुरुष की संपत्ति कभी नहीं जाती। जैसे ढलान के ओर बहने वाली नदियां कभी नीचे जाना नहीं छोडती।
  • दिल के चिराग जलाते नहीं-hindi shayri


    जिनका हम करते हैं इन्तजार
    वह हमसे मिलने आते नहीं
    जो हमारे लिए बिछाये बैठे हैं पलकें
    उनके यहां हम जाते नहीं
    अपने दिल के आगे क्यों हो जाते हैं मजबूर
    क्यों होता है हमको अपने पर गरूर
    जो आसानी से मिल सकता है
    उससे आँखें फेर जाते हैं
    जिसे ढूँढने के लिए बरसों
    बरबाद हो जाते हैं
    उसे कभी पाते नहीं
    तकलीफों पर रोते हैं
    पर अपनी मुश्किलें
    खुद ही बोते हैं
    अमन और चैन से लगती हैं बोरियत
    और जज्बातों से परे अंधेरी गली में
    दिल के चिराग के लिए
    रौशनी ढूँढने निकल जाते हैं
    ——————–

    दुर्घटनाएं अब अँधेरे में नहीं
    तेज रौशनी में ही होतीं है
    रास्ते पर चलते वाहनों से
    रौशनी की जगह बरसती है आग
    आंखों को कर देती हैं अंधा
    जागते हुए भी सोती हैं
    —————————-
    हमें तेज रौशनी चाहिए
    इतनी तेज चले जा रहे हैं
    उन्हें पता ही नहीं आगे
    और अँधेरे आ रहे हैं
    दिल के चिराग जलाते नहीं
    बाहर रौशनी ढूँढने जा रहे हैं

    कौटिल्य का अर्थशास्त्र:अग्नि के समान असहनशील भी होना चाहिये


    १.कछुए के समान अंग संकोचकर शत्रु का प्रहार भी सहन करे और बुद्धिमान फिर समय देखकर क्रूर सर्प के समान डटकर लडे.
    २.समय पर पर्वत के समान सहनशील हो और अग्नि के समान असहनशील हो और समय पर प्रिय वचन कहता हुआ कंधे पर भी शत्रु को उठावे.
    ३.मत्त और प्रमत्त के समान बाहरी दिखावे से स्थित बुद्धिमान आक्रमण करे, जैसे कि सिंह ऐसा कूदकर प्रहार करता है वह खाले वार नहीं जाता.
    ४.प्रसन्नता की वृत्ति से लोक की हितकारी वृत्ति से शत्रु के हृदय में निरन्तर प्रवेश का समय पर नीति के हाथों से प्रहार कर उसकी लक्ष्मी के केश ग्रहण करें.

    ५.विद्वान् को उचित है कि प्राप्त हुए उपायों से विग्रह को शांत करे. विजय की प्राप्ति अचल नहीं है. एकाएक किसी प्रकार पर प्रहार न करे.
    ६.बुद्धिमान को कोई भी वस्तु असाध्य नहीं है, लोहा अभेद्य होता है पर लोहार बुद्धिमानी से उसे गला डालता है.

    झूठ की सता ही लोगों में इज्जत पाती है


    अपनी महफिलों में शराब की
    बोतलें टेबलों पर सजाते हैं
    बात करते हैं इंसानियत की
    पर नशे में मदहोश होने की
    तैयारी में जुट जाते हैं
    हर जाम पर ज़माने के
    बिगड़ जाने का रोना
    चर्चा का विषय होता है
    सोने का महंगा होना
    नजर कहीं और दिमाग कहीं
    ख्याल कहीं और जुबान कहीं
    शराब का हर घूँट
    गले के नीचे उतारे जाते हैं
    ————————————

    आदमी की संवेदना हैं कि
    रुई की गठरी
    किसी लेखक के लिखे
    चंद शब्दों से ही पिचक जाती हैं
    लगता हैं कभी-कभी
    सच बोलना और लिखना
    अब अपराध हो गया है
    क्योंकि झूठ और दिखावे की सत्ता ही
    अब लोगों में इज्जत पाती है

    ———————————

    तकिये का सहारा


    हमें पूछा था अपने दिल को
    बहलाने के लिए किसे जगह का पता
    उन्होने बाजार का रास्ता बता दिया
    जहां बिकती है दिल की खुशी
    दौलत के सिक्कों से
    जहाँ पहुंचे तो सौदागरों ने
    मोलभाव में उलझा दिया
    अगर बाजार में मिलती दिल की खुशी
    और दिमाग का चैन
    तो इस दुनिया में रहता
    हर आदमी क्यों इतना बैचैन
    हम घर पहुंचे और सांस ली
    आँखें बंद की और सिर तकिये पर रखा
    आखिर उसने ही जिसे हम
    ढूढ़ते हुए थक गये थे
    उसका पता दिया
    ——————-

    सांप के पास जहर है
    पर डसने किसी को खुद नहीं जाता
    कुता काट सकता है
    पर अकारण नहीं काटने आता
    निरीह गाय नुकीले सींग होते
    हुए भी खामोश सहती हैं अनाचार
    किसी को अनजाने में लग जाये अलग बात
    पर उसके मन में किसी को मरने का
    विचार में नहीं आता
    भूखा न हो तो शेर भी
    कभी शिकार पर नहीं जाता
    हर इंसान एक दूसरे को
    सिखाता हैं इंसानियत का पाठ
    भूल जाता हां जब खुद का वक्त आता
    एक पल की रोटी अभी पेट मह होती है
    दूसरी की जुगाड़ में लग जाता
    पीछे से वार करते हुए इंसान
    जहरीले शिकारी के भेष में होता है जब
    किसी और जीव का नाम
    उसके साथ शोभा नहीं पाता
    ————–

    रहीम के दोहे:संसार के बड़प्पन को कोई नहीं देख सकता


    रहिमन जगत बडाई की, कूकुर की पहिचानि
    प्रीती करे मुख छाती, बैर करे तन हानि

    कविवर रहीम कहते हैं की अपनी बडाई सुनकर फूलना और आलोचना से गुस्सा हो जाना कोई अच्छी बात नहीं है क्योंकि यह कुत्ते का गुण है. उसे थोडा प्यार करो तो मालिक को चाटने लगता है और फटकारने पर उसे काट भी लेता है.
    भावार्थ-संसार में कई प्रकार के लोग हैं और कुछ लोग ऐसे होते हैं कि जो चापलूसी कर काम निकालते हैं ऐसे लोगों से बचने का प्रयास करना चाहिए. उनकी प्रशंसा पर फूल जाना मूर्खता है क्योंकि उन्हें तो काम निकलना होता है और बाद में हमें मूर्ख भी समझते हैं कि देखो कैसे काम निकलवाया.

    रहिमन जंग जीवन बडे, काहू न देखे नैन
    जाय दशानन अछत ही,कापी लागे काठ लेन

    कवि रहीम कहते हैं कि संसार के बड़प्पन को कोई व्यक्ति अपनी आँखों से नहीं देख सकता. रावण को अक्षत जाना जाता था, परन्तु वानरों ने उसके गढ़ को नष्ट कर दिया.

    भावार्थ-अक्सर यह भ्रम होता है यहाँ सब कुछ कई बरसों तक स्थिर रहने वाला है पर यहाँ सब एक दिन बिखर जाता है. इसलिए अपने अन्दर किसी प्रकार का अहंकार नहीं पालना चाहिए. न ही यह भ्रम पालना चाहिए कि कोई हमसे छोटा है और यह कुंठा भी मन में नहीं लाना चाहिऐ कि कोई हमसे बड़ा है.

    अपनी सोच से रास्ते बनते हैं


    एक पत्थर को रंग पोतकर अदभुत
    बताकर दिखाने की कोशिश
    लोहे को रंग लगाकर
    चमत्कारी बताने की कोशिश
    आदमी के भटकते मन को
    स्वर्ग दिखाने की कोशिश
    तब तक चलती रहेगी
    जब तक अपने को सब खुद नहीं संभालेंगे

    ख्वाब ही हकीकत बनते हैं
    सपने भी सच निकलते हैं
    अपनी सोच से भी रास्ते बनते हैं
    कोई और हमें संभाले
    अपनी जंग जीत सकते हैं
    जब इसके लिए इन्तजार करने के बजाय
    खुद को खुद ही संभालेंगे
    ———————————

    भीड़ से नहीं निकलेंगे शेर जब तक


    जब किसी के लिखने से
    शांति भंग होती है
    तो उससे कहें बंद कर दे लिखना
    जो बिना पढे ही
    चंद शब्दों को समझे बिना ही
    जमाने पर फैंकते हैं पत्थर
    गैरों के इशारे पर
    अपनों पर ही चुभोते हैं नश्तर
    कह देते हैं लिखने वाले से
    अब कभी लिखते नहीं दिखना

    बोलने की आजादी पर
    जोर-जोर से सुबह शाम चिल्लाने वाले
    अपनी ताकत पर खौफ का
    माहोल बनाने वालों का
    रास्ता हमेशा आसान होते दिखता
    लिखने की आजादी उनको मंजूर नहीं
    क्योंकि कोई शब्द उनके
    ख्यालों से नहीं मिलता
    उनकी दिमाग में किसी के साथ चलने का
    इरादा नहीं टिकता
    उनके खौफ से ही ताकत बनती
    जमाने के मिट जाने का डर जतातीं तकरीरें
    बेबस भीड़ भी होती है उनके साथ
    बढ़ते रहेंगे उनके पंजे तब तक
    भीड़ से नहीं निकलेंगे शेर जब तक
    दिल में हिम्मत जुटाकर लड़ना तो जरूरी है
    काफी नहीं अब लड़ते दिखना

    चाणक्य नीति:हिंसक पशु,नदी और राजपरिवार सदैव विश्वसनीय नहीं


    १.केवल मनुष्य योनि में जन्म लेने से सब मनुष्य एक समान नहीं हो जाते. एक ही माँ के गर्भ से उत्पन्न एक ही राशि-नक्षत्र में जन्म लेने वाले दो जुड़वां भाई भी बिलकुल अलग कर्म करने वाले और भिन्न गुण और स्वभाव वाले होते है. शायद पुराने कर्म फल के कारण सभी में ऐसी विभिन्नता आती है.
    २.जिस प्रकार मछली देख-देखकर संतान का पालन करती है,कछुई केवल ध्यान द्वारा ही संतान की देखभाल करती है और मादा पक्षी अपने अण्डों को सेकर या छूकर अपनी संतान का पालन करती हैं उसी परकार सज्जन की संगती अपने संपर्क में आने वालों को भगवान् के दर्शन, ध्यान और चरण-स्पर्श आदि का आभास कराकर कल्याण करती है.
    ३.संसार में सुख की अपेक्षा दु:खों का अस्तित्व अधिक माना जता है, तीन प्रकार के संताप ऐसे हैं जिनसे मनुष्य घिरा रहता है. मन, स्थिति और दुर्भाग्य के कष्टों का निवारण भी तीन प्रकार के उपायों से होता है- गुणवान पुत्र मधुर भाषिणी पत्नी और श्रेष्ठ पुत्र की संगति.

    ४.लंबे नाखून धारण करने वाले हिंसक पशु, नदिया एवं राजपरिवार हमेशा विश्वसनीय नहीं होते क्योंकि इनके स्वभाव में परिवर्तन आते रहते हैं.

    रहीम के दोहे:अपशब्द बोले जीभ, मार खाए सिर


    रहिमन जिह्म बावरी, कही गइ सरग पाताल
    आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल

    कविवर रहीम कहते हैं कि इस मनुष्य के बुद्धि बहुत वाचाल है. वह स्वर्ग से पाताल तक का अनाप-शनाप बककर अन्दर चली जाती है पर अगर उससे लोग गुस्सा होते हैं तो बिचारे सिर को जूते खाने पड़ते हैं.

    भावार्थ-यहाँ संत रहीम चेता रहे हैं कि जब भी बोलो सोच समझ कर बोलो. कटु वचन बोलना या दूसरे का अपमान करने पर मार खाने की भी नौबत आती है. इसलिए किसी को बुरा-भला कहकर लांछित नहीं करना चाहिए.

    रहिमन ठहरी धूरि की, रही पवन ते पूरि
    गाँठ युक्ति की खुलि गयी, अंत धूरि को धूरि

    संत रहीम कहते हैं ठहरी हुई धूल हवा चलने से स्थिर नहीं रहती, जैसे व्यक्ति की नीति का रहस्य यदि खुल जाये तो अंतत: सिर पर धूल ही पड़ती है.

    भावार्थ-श्रेष्ठ पुरुष अपने अपने हृदय के विचारों को आसानी से किसी के सामने प्रकट नहीं करते. यदि उनके नीति सबंधी विचार पहले से खुल जाएं तो उनका प्रभाव कम हो जाता है और उन्हें अपमानित होना पड़ता है.

    डर का माहौल बनाना ठीक नहीं


    यह अनदेखी करने वाली बात नहीं है और जिस तरह इसे सामान्य कहकर टाला जा रहा है वह मुझे स्वीकार्य नहीं है। मैं आज सागर चंद नाहर के साथ हुई बदतमीजी की बात कर रहा हूँ। मैंने सागर चंद नाहर की पोस्ट देखी और उसमें तमाम साथियों की कमेन्ट भी देखी। इसे व्यक्तिगत मामला नहीं माना जा सकता है भले ही यह दो व्यक्तियों के बीच हुआ है। हम जो ब्लोग बनाए हैं वह घर के शोपीस नहीं है और वह बराबर लोगों के बीच में पढे जाते हैं और इन पर लिखा पढ़ने से लोगों के मन में प्रतिक्रिया होती है। जब ब्लोग की संख्या कम थी तब इसका आभास नहीं था। हो सकता है कि कुछ लोगों के पुराने पूर्वाग्रह रहे हों पर उनकों इस तरह व्यक्त करने का समय अब नहीं रहा।

    अगर सागरचंद जी नाहर किसी भी चौपाल पर नहीं होते तो शायद मैं भी इस मामले में इतनी दिलचस्पी नहीं लेता, पर जब इन चौपालों से दूसरे लोगों को जोड़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं तब यह भी देखना चाहिए कि यहाँ के घटनाक्रम का क्या प्रभाव होता है। अगर हम इस घटनाक्रम को देखें तो यह नये लेखकों में भय पैदा करता है। शुरू में मुझे यह लगा था कि यहाँ कुछ गड़बड़ है इसलिए अपने एक नहीं दो छद्म ब्लोग बनाए ताकि कभी ऐसी हालत आये तो उसे दो तरफा ढंग से निपटा जा सके। उसके बाद जब लगा कि अब इसकी मुझे जरूरत नहीं है तो मैंने उनको वास्तविक नाम में परिवर्तित कर दिया क्योंकि जिस बात से मुझे डर था वह उस छद्म ब्लोग पर ही हुई और तब मैंने उसे बंद किया। यह मैं इसलिए बता रहा हूँ कि यह भय लोगों को रहता है और अपनी बात कहने में कतरायेंगे, और इस तरह तो किसी को चौपालों से जोड़ने के काम में कठिनाई भी होगी। भला आदमी किसी की बदतमीजी से डरता है.

    बात यहाँ तक ही सीमित नहीं है। किसी के ब्लोग पर जाकर सद्भावना से प्रशंसा और आलोचना करना अलग बात है अभद्र शब्द लिखना अनैतिक तो है ही और भारतीय संविधान भी इसकी इजाजत नहीं देता। सबसे बड़ी बात यह है कुछ लोगों के मन में यह भय व्याप्त हो सकता है कि किसी की प्रशंसा या आलोचना पर ऐसी प्रतिक्रिया भी हो सकती है। ऐसे भय का माहौल बनाने का किसी को कोई अधिकार नहीं है। मैं मानकर चलता हूँ कि कुछ भद्र लोग भी गलतियां कर जाते हैं और उनको उसे सुधारने का अधिकार दिया जाना चाहिए पर उनको दूसरे की सहृदयता को भी उनकी कमजोरी नहीं समझना चाहिए। हमारी कुछ गलतियां कानून के दायरे में आती है यह भी नये ब्लोगरों को ध्यान में रखना चाहिए। हो सकता है मैं कड़ी बात कह रहा हूँ और कुछ लोगों को बुरा लगे पर एक बात तो यह कि सच कड़वा होता है दूसरा यह कि मैं बहुत समय से ब्लोग को देख रहा हूँ और किसी ने भी यह बात लिखी हो कि ‘किसी के साथ बदतमीजी करने की इजाजत भारतीय संविधान नहीं देता’। अगर आप लोगों ने देखा होगा कि किस तरह ईमेल और मोबाइल पर बदतमीजी करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही होती है और हम तो सब एक दूसरे के अते-पते जानते हैं। मेरे गुरु ने जो पत्रकारिता में थे वह कहते थे’तुम कभी किसी को गाली मत देना और कोई दे तो उसे मारपीट भी मत करना दोनों में तुम फंसे होगे और दे तो तुम कानून की याद दिलाना। उनकी बात मेरे मन में ऐसी लगी कि फिर मैं बातचीत में किसी अभद्र शब्द का उपयोग गुस्से में भी नहीं करता। यह मैं सदाशय भाव से लिख रहा हूँ और कोई उपदेशक बनने का मेरा कोई विचार नहीं है। मैं उम्मीद करता हूँ कि मेरे मित्र मेरी इस बात को समझेंगे कि यहाँ डर का माहौल बनाना ठीक नहीं होगा, वैसे ही ऐसा माहौल बनाने वालों की कमी नहीं हैं.

    क्रिकेट और फिल्म में ऐसा भी हो सकता है


    आखिर झगडा किस बात का है? क्रिकेट वालों ने एक्टर से कहा होगा कि-”यार, क्रिकेट को लोग देखने तो खूब आ रहे हैं पर अभी पहले जैसी तवज्जो नहीं मिल रही है। हमारी टीम ने ट्वेन्टी-ट्वेन्टी मैं विश्व कप जीता है और हमें चाहिए फिफ्टी-फिफ्टी के ग्राहक जिसमें विज्ञापन लंबे समय तक दिखाए जा सकते हैं। सो तुम भी मैदान मैं देखने आ जाओ तो थोडा इसका क्रेज बढे। ट्वेन्टी-ट्वेन्टी के समय से क्रिकेट पेट नहीं भरना है.”

    इधर एक्टर भी फ्लॉप चल रहें हो तो क्या करें? एक दिन फिल्म आयी मीडिया मैं शोर मचा फिर थम गया। अरबों रूपये का खेल है और तमाम तरह के विज्ञापन अभियान(अद्द cअम्पैं) लोगों की भावनाओं पर जिंदा हैं। विज्ञापन देने वाली कंपनिया तो सीमित हैं। फिल्मों के एक्टर हों या क्रिकेट के खिलाड़ी उनके प्रोडक्ट के प्रचार के माडल होते हैं। एक क्षेत्र में फ्लॉप हो रहे हों तो दूसरे के इलाके से लोग ले आओ। समस्या फिल्म और क्रिकेट की नहीं है कंपनियों के प्रोडक्ट के प्रचार की हैं। जब किसी प्रोडक्ट के माडल हीरो और खिलाड़ी एक हों तो उनका एक जगह पर होना प्रचार का दोहरा साधन हो जाता है।

    अब आगे और बदलाव आने वाले हैं। जो युवक और युवतियां फिल्म के लिए इंटरव्यू देने जायेंगे उनसे अपने अभिनय के बारे में कम क्रिकेट के बारे में अधिक सवाल होंगे। खेल से संबन्धित विषय पर नहीं बल्कि उसे देखने के तरीक के बारे में सवाल होंगे। जैसे
    १. जब मैच देखने जाओगे तो कैसे सीट पर बैठोगे?
    २. चेहरे पर कैसी भाव भंगिमा बनाओगे जिससे लगे कि तुम क्रिकेट के बारे में जानते हो?
    ३. जब कोई देश का खिलाड़ी छका लगाएगा तो कैसे ताली बजाओगे?
    इस तरह के ढेर सारे सवाल और होंगे और अनुबंध में ही यह शर्त शामिल होगी कि जब तक फिल्म पुरानी न पड़े तब तक निर्माता के आदेश पर फिल्म प्रचार के लिए एक्टर मैच देखने मैदान पर जायेगा।

    क्रिकेट में क्या होगा? लड़के दो तरह के कोच के यहाँ जायेंगे-सुबह क्रिकेट के कोच के यहाँ शाम को डांस वाले के यहाँ। भी रैंप पर भी जाना तो होगा क्रिकेट के प्रचार के लिए। आगे जब स्थानीय, प्रादेशिक और राष्ट्रीय स्तर पर जो चयन करता टीम का चयन करेंगे वह पहले खिलाडियों की नृत्य कला की परख करेंगे। क्रिकेट खेलने वाले तो कई मिल जायेंगे पर रेम्प पर नृत्य कर सकें यह संभव नहीं है-और ऐसी ही प्रचार अभियान चलते रहे तो नृत्य में प्रवीण खिलाडियों की पूछ परख बाद जायेगी। हाँ, इसमें पुराने संस्कार धारक दब्बू क्रिकेट खिलाडियों को बहुत परेशानी होगी। यह बाजार और प्रचार का खेल और इसमें आगे जाने-जाने क्या देखने को मिलेगा क्योंकि यह चलता है लोगों के जज्बातों से और जहाँ वह जायेंगे वहीं उनकी जेब में रखा पैसा भी जायेगा और उसे खींचने वाले भी वहीं अपना डेरा जमायेंगे।

    चाणक्य नीति:धन मिले तो भी बैरी के पास न जाएं


    1.जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुचाने वाले मर्मभेदी वचन बोलते हैं, दूसरों की बुराई करने में खुश होते हैं। अपने वचनों द्वारा से कभी-कभी अपने ही वाचों द्वारा बिछाए जाल में स्वयं ही घिर जाते हैं और उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जिस तरह रेत की टीले के भीतर बांबी समझकर सांप घुस जाता है और फिर दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है।

    2.समय के अनुसार विचार न करना अपने लिए विपत्तियों को बुलावा देना है, गुणों पर स्वयं को समर्पित करने वाली संपतियां विचारशील पुरुष का वरण करती हैं। इसे समझते हुए समझदार लोग एवं आर्य पुरुष सोच-विचारकर ही किसी कार्य को करते हैं।
    3.मनुष्य को कर्मानुसार फल मिलता है और बद्धि भी कर्म फल से ही प्रेरित होती है। इस विचार के अनुसार विद्वान और सज्जन पुरुष विवेक पूर्णता से ही किसी कार्य को पूर्ण करते हैं।

    4.ऐसा धन जो अत्यंत पीडा, धर्म त्यागने और बैरियों के शरण में जाने से मिलता है, वह स्वीकार नहीं करना चाहिए। धर्म, धन, अन्न, गुरू का वचन, औषधि हमेशा संग्रहित रखना चाहिए, जो इनको भलीभांति सहेज कर रखता है वह हेमेशा सुखी रहता है।बिना पढी पुस्तक की विद्या और अपना कमाया धन दूसरों के हाथ में देने से समय पर न विद्या काम आती है न धनं.

    5.जो बात बीत गयी उसका सोच नहीं करना चाहिए। समझदार लोग भविष्य की भी चिंता नहीं करते और केवल वर्तमान पर ही विचार करते हैं।हृदय में प्रीति रखने वाले लोगों को ही दुःख झेलने पड़ते हैं।
    6.प्रीति सुख का कारण है तो भय का भी। अतएव प्रीति में चालाकी रखने वाले लोग ही सुखी होते हैं.
    7.जो व्यक्ति आने वाले संकट का सामना करने के लिए पहले से ही तैयारी कर रहे होते हैं वह उसके आने पर तत्काल उसका उपाय खोज लेते हैं। जो यह सोचता है कि भाग्य में लिखा है वही होगा वह जल्द खत्म हो जाता है। मन को विषय में लगाना बंधन है और विषयों से मन को हटाना मुक्ति है.

    भूल-भुलैया में फंस जाते हैं


    अपने दिल के नगीने से
    सजाकर कितने भी तौह्फे दे दो
    इस ज़माने को
    कद्रदान कभी होगा नहीं
    खुश रहते हैं वही लोग
    जो बेचते हैं परछाईयाँ
    झूठ बेचते हैं दिखाकर सच्चाईयां
    बन जाते हैं उनके महल
    ज़माना भी खो जाता है
    भूलभुलैया में कहीं
    दावे सभी करते हैं
    पर भला कोई हुआ है अभी तक
    सच्चे आदमी का साथी कहीं
    —————————————-

    भगवान की पहचान के लिए
    शैतान का डर दिखाते हैं
    सच को सही बताने के लिए
    झूठ का भूत दिखाते हैं
    पर जो देते हैं पता
    वही नाचते हैं शैतान जैसा
    झूठ को बेचते हैं सच की तरह
    लोग मानते हैं उनको अपना आदर्श
    इसलिए भगवान् से दूर
    सच के रस्ते से हटे हुए
    भूल-भुलैया में फंस जाते हैं

    सिगरेट का धुआं छोड़ते हुए (sigret ka dhuan-hindi vyangya kavita)


    मुख से सिगरेट का धुँआ
    चहुँ और फैलाते हुए करते हैं
    शहर में फैले
    पर्यावरण प्रदूषण की शिकायत
    शराब के कई जाम पीने के बाद
    करते हैं मर्यादा की वकालत
    व्यसनों को पालना सहज है
    उससे पीछा छुड़ाने में
    होती है बहुत मुश्किल
    पर नैतिकता की बात कहने में
    शब्द खर्च करने हुए क्यों करो किफायत
    कहैं दीपक बापू देते हैं
    दूसरों को बड़ी आसानी से देते हैं
    नैतिकता का उपदेश लोग
    जबकि अपने ही आचरण में
    होते हैं ढ़ेर सारे खोट
    दूसरे को दें निष्काम भाव का संदेश
    और दान- धर्म की सलाह
    अपने लिए जोड़ रहे हैं नॉट
    समाज और जमाने के बिगड़ जाने की
    बात तो सभी करते हैं
    आदमी को सुधारने की
    कोई नहीं करता कवायद
    ————————

    सुबह से शाम तक
    छोड़ते हैं सिगरेट का धुआं
    अपने दिल में खोदते  मौत का कुआँ
    और लोगों को सुनाते हैं
    जमाने के खराब होने के किस्से
    अपना सीना तानकर कहते हैं
    बिगडा जो है प्रकृति का हिसाब
    उस पर पढ़ते हैं किताब
    पर कभी जानना नहीं चाहते
    हवाओं को तबाह करने में
    कितने हैं उनके हिस्से

    सबसे अलग हटकर लिख (sabse alag hatkar likh-hindi kavita)


    तू लिख
    समाज में झगडा
    बढाने के लिए लिख
    शांति की बात लिखेगा
    तो तेरी रचना कौन पढेगा
    जहां द्वंद्व न होता वहां होता लिख
    जहाँ कत्ल होता हो आदर्श का
    उससे मुहँ फेर
    बेईमानों के स्वर्ग की
    गाथा लिख
    ईमान की बात लिखेगा
    तो तेरी ख़बर कौन पढेगा

    अमीरी पर कस खाली फब्तियां
    जहाँ मौका मिले
    अमीरों की स्तुति कर
    गरीबों का हमदर्द दिख
    भले ही कुछ न लिख
    गरीबी को सहारा देने की
    बात अगर करेगा
    तो तेरी संपादकीय कौन पढेगा

    रोटी को तरसते लोगों की बात पर
    लोगों का दिल भर आता है
    तू उनके जज्बातों पर ख़ूब लिख
    फोटो से भर दे अपने पृष्ठ
    भूख बिकने की चीज है ख़ूब लिख
    किसी भूखे को रोटी मिलने पर लिखेगा
    तो तेरी बात कौन सुनेगा

    पर यह सब लिख कर
    एक दिन ही पढे जाओगे
    अगले दिन अपना लिखा ही
    तुम भूल जाओगे
    फिर कौन तुम्हे पढेगा

    झगडे से बडी उम्र शांति की होती है
    गरीब की भूख से लडाई तो अनंत है
    पर जीवन का स्वरूप भी बेअंत है
    तुम सबसे अलग हटकर लिखो
    सब झगडे पर लिखें
    तुम शांति पर लिखो
    लोग भूख पर लिखें
    तुम भक्ति पर लिखो
    सब आतंक पर लिखें
    तुम अपनी आस्था पर लिखो
    सब बेईमानी पर लिखें
    तुम अपने विश्वास पर लिखो
    जब लड़ते-लड़ते थक जाएगा ज़माना
    मुट्ठी भींचे रहना कठिन है
    हाथ कभी तो खोलेंगे ही लोग
    तब हर कोई तुम्हारा लिखा पढेगा
    —————-

    इससे अच्छा तो बुतों पर यकीन कर लें


    अपने लिए बनाते हैं ऐसे
    सपनों के महल
    जो रेत के घर से भी
    कमजोर बन जाते हैं
    तेज रोशनी को जब देखते देखते
    आंखों को थका देते हैं
    फिर अँधेरे में ही रोशनी
    तलाशने निकल जाते हैं
    इधर-उधर भटकते हुए
    अनजान जगहों के नाम
    मंजिल के रूप में लिखते हैं
    दर्द के सौदागरों के हाथ
    पकड़ कर चलने लग जाते हैं
    जब दौलत के अंबार लगे हों तो
    गरीबी में सुख आता है नजर
    जब हों गरीब होते हैं
    तो बीतता समय रोटी की जंग में
    अमीरों का झेलते हैं कहर
    नहीं होता दिल पर काबू
    बस इधर से उधर जाते हैं
    जिंदा लोगों को बुत समझने की
    गलती करते हैं कदम-कदम पर
    इसलिए हमेशा धोखा खाते हैं
    इससे अच्छा तो यही होगा कि
    बुतों को ही रंग-बिरंगा कर
    उनमें अपना यकीन जमा लें
    हम कुछ भी कह लें
    कम से कम वह बोलने तो नहीं आते हैं
    ——————————–

    जब अपने मन का सच बोलता है


    जब खामोशी हो चारों तरह तब भी
    कोई बोलता हैं
    हम सुनते नही उसकी आवाज
    हम उसे नहीं देखते
    पर वह हमें बैठा तोलता है
    भीड़ में घूमने की आदत
    हो जाती है जिनको
    उन्हें अकेलापन डराता है
    क्योंकि जिसकी सुनने से कतराते हैं
    वही अपने मन में बैठा सच
    दबने की वजह से बोलता है

    दूसरे से अपना सच छिपा लें
    पर अपने से कैसे छिपाये
    अकेले होते तो बच पाते
    भीड़ में रहते हुए
    लोगों के बीच में टहलते हुए
    महफिलों में अपने घमंड के
    नशे में बहकते हुए
    सहज होने की कोशिश भी
    हो जाती है जब वह
    अपने मन का सच बोलता है

    तुम्हारे प्रेम के विरह में हास्य लिखता हूँ


    ब्लोगर उस दिन एक पार्क में घूम रहा था तो उसकी पुरानी प्रेमिका सामने आकर खडी हो गयी। पहले तो वह उसे पहचाना ही नहीं क्योंकि वह अब खाते-पीते घर के लग रही थी और जब वह उसके साथ तथाकथित प्यार (जिसे अलग होते समय प्रेमिका ने दोस्ती कहा था) करता था तब वह दुबली पतली थी। ब्लोगर ने जब उसे पहचाना तो सोच में पड़ गया इससे पहले वह कुछ बोलता उसने कहा-”क्या बात पहचान नहीं रहे हो? किसी चिंता में पड़े हुए हो। क्या घर पर झगडा कर आये हो?”
    ”नहीं!कुछ लिखने की सोच रहा हूँ।”ब्लोगर ने कहा;”मुझे पता है कि तुम ब्लोग पर लिखते हो। उस दिन तुम्हारी पत्नी से भेंट एक महिला सम्मेलन में हुई थी तब उसने बताया था। मैंने उसे नहीं बताया कि हम दोनों एक दूसरे को जानते है।वह चहकते हुए बोली-”क्या लिखते हो? मेरी विरह में कवितायेँ न! यकीनन बहुत हिट होतीं होंगीं।’
    ब्लोगर ने सहमते हुए कहा-”नहीं हिट तो नहीं होतीं फ्लॉप हो जातीं हैं। पर विरह कवितायेँ मैं तुम्हारी याद में नहीं लिखता। वह अपनी दूसरी प्रेमिका की याद में लिखता हूँ।”
    ”धोखेबाज! मेरे बाद दूसरी से भी प्यार किया था। अच्छा कौन थी वह? वह मुझसे अधिक सुन्दर थी।”उसने घूरकर पूछा।
    ”नहीं। वह तुमसे अधिक खूबसूरत थी, और इस समय अधिक ही होगी। वह अब मेरी पत्नी है। ब्लोगर ने धीरे से उत्तर दिया।
    प्रेमिका हंसी-”पर तुम्हारा तो उससे मिलन हो गया न! फिर उसकी विरह में क्यों लिखते हो?’
    ”पहले प्रेमिका थी, और अब पत्नी बन गयी तो प्रेम में विरह तो हुआ न!”ब्लोगर ने कहा।
    पुरानी प्रेमिका ने पूछा -”अच्छा! मेरे विरह में क्या लिखते हो?”
    ”हास्य कवितायेँ और व्यंग्य लिखता हूँ।” ब्लोगर ने डरते हुए कहा।
    ”क्या”-वह गुस्से में बोली-”मुझे पर हास्य लिखते हो। तुम्हें शर्म नहीं आती। अच्छा हुआ तुमसे शादी नहीं की। वरना तुम तो मेरे को बदनाम कर देते। आज तो मेरा मूड खराब हो गया। इतने सालों बाद तुमसे मिली तो खुशी हुई पर तुमने मुझ पर हास्य कवितायेँ लिखीं। ऐसा क्या है मुझमें जो तुम यह सब लिखते हो?’
    ब्लोगर सहमते हुए बोला-“मैंने देखा एक दिन तुम्हारे पति का उस कार के शोरूम पर झगडा हो रहा था जहाँ से उसने वह खरीदी थी। कार का दरवाजा टूटा हुआ था और तुम्हारा पति उससे झगडा कर रहा था. मालिक उसे कह रहा था कि”साहब. कार बेचते समय ही मैंने आपको बताया था कि दरवाजे की साईज क्या है और आपने इसमें इससे अधिक कमर वाले किसी हाथी रुपी इंसान को बिठाया है जिससे उसके निकलने पर यह टूट गया है और हम इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं. तुम्हारा पति कह रहा था कि’उसमें तो केवल हम पति-पत्नी ने ही सवारी की है’, तुम्हारे पति की कमर देखकर मैं समझ गया कि……………वहाँ मुझे हंसी आ गई और हास्य कविता निकल पडी. तब से लेकर अब जब तुम्हारी याद आती है तब……अब मैं और क्या कहूं?”
    वह बिफर गयी और बोली-”तुमने मेरा मूड खराब किया। मेरा ब्लड प्रेशर वैसे ही बढा रहता है। डाक्टर ने सलाह दी कि तुम पार्क वगैरह में घूमा करो। अब तो मुझे यहाँ आना भी बंद करना पडेगा। अब मैं तो चली।”
    ब्लोगर पीछे से बोला-”तुम यहाँ आती रहना। मैं तो आज ही आया हूँ। मेरा घर दूर है रोज यहाँ नहीं आता। आज कोई व्यंग्य का आइडिया ढूंढ रहा था, और तुम्हारी यह खुराक साल भर के लिए काफी है। जब जरूरत होगी तब ही आऊँगा।”
    वह उसे गुस्से में देखती चली गयी। ब्लोगर सोचने लगा-”अच्छा ही हुआ कि मैंने इसे यह नहीं बताया कि इस पर मैं हास्य आलेख भी लिखता हूँ। नहीं तो और ज्यादा गुस्सा करती।”
    नोट-यह एक स्वरचित और मौलिक काल्पनिक व्यंग्य रचना है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई लेना देना नहीं है और किसी का इससे मेल हो जाये तो वही इसके लिए जिम्मेदार होगा.