Tag Archives: hindi manoranjan

वाकई क्या सुपर कूल हैं हम-हिंदी लेख


                          अमेरिका की एक फिल्म की चर्चा पढ़ने का मिली जिसमें एक पात्र से कहलाया गया है कि ‘‘हताश अमेरिका को बचाने के लिये एक हीरो की जरूरत है।’’ यह कोई बड़ी बात नहीं है पर इसे एक संदर्भ मानकर हम आसपास देखें तो पायेंगे कि धर्म, इतिहास, साहित्य तथा राजनीति से जुड़ी अनेक पुस्तकों में अनेक लोगों ने नायक या हीरो की अपनी स्मृतियां समाज में स्थापित की है जिनके दुबारा प्रकट होने की कामना लोग आज  भी करते हैं।  सभी धर्म, समाज, जाति तथा भाषाई समूहों के अपने अपने हीरो हैं।  जिनकी गाथायें गायी जाती हैं।  हमारे देश में तो भगवान या उनके अवतार का दर्जा तक दिया जाता है जिस पर विश्व की बात तो छोड़िये अपने ही देश अनेक विचाकर हंसते हैं-यह अलग बात है कि विदेशी विचाराधाराओं से प्रभावित यह विद्वान विदेशी नायकों पर ऐसी टिप्पणियां नहीं करते जितना देशी नायकों पर करते हैं।

हम इस पर बहस नहीं कर पूरे विश्व के मानव समुदाय की उस कमजोरी की तरफ इशारा करना चाहते हैं जिसमें समस्याओं को परेशानियों का जनक वह स्वयं है पर उनका हल वह आसमानी देवताओं से चाहता है।

आसमानी देवता कभी धरती पर प्रकट नहीं हो सकते यह दूसरा सत्य है। सासंरिक विषयों में ऊंची नीच होता रहता है। जिसने संपदा और प्रतिष्ठा पाई अभावों में जी रहे लोग उन पर भगवान कृपा मानते हैं। उनकी दृष्टि में आसमान में बैठा अदृश्य शक्तिमान ही संसार की गतिविधियों का संचालक है।  वही कर्म प्रेरणा है तो परिणाम भी वही निर्धारित करता है।  अपनी देह में स्थित दो हाथ, दो पांव, दो कान और दो आंख तथा दो नाक (एक योग साधक के रूप में हमें दो नाक का ही अनुभव होता है) लेकर इस संसार में विचर रहा आदमी अपने मन में अनेक सपने पालता है पर बुद्धि की शक्ति से बेखबर रहता है।  वह स्वयं कर्ता है पर भोक्ता की तरह इस संसार में रहना चाहता है।  रोटी नहीं है तो उसकी तलाश और वह पूरी हुई तो मनोरंजन की चाहत उसके मन में उट खड़ी होती है।

मनुष्य की बुद्धि से अधिक मन पर निर्भर रहता है। यहीं से चालाक लोग अपने हितों की पूर्ति का मार्ग बनाते हैं।  यही चालाक लोग धन, संपदा के संचय के साथ ही समाज के शिखर पर प्रतिष्ठत हो जाते है।  भगवान की कृपा का प्रसाद उनको मिला यह देखकर आम आदमी भी उनका भक्त बन जाता है।  यही शिखर पुरुष अपना समाज में तानाबाना ऐसे बुनते हैं कि आम आदमी हमेशा ही शोषण, तनाव और रोजीरोटी के संघर्ष का बोझा उठाते हुए लिये महल बनाता  है। जब वह तंग होता है तो एकाध बार उस हाथ फेरकर शाबादी भी यही शिखर पुरुष देवत्व की अनुभूति कराते  हैं।  सामान्य तौर से आम आदमी इन शिखर पुरुषों को दिखावे का सम्मान देता है पर मन में मानता है कि इन पर भगवान की कृपा हुई है। इन्हीं शिखर पुरुषों के स्वार्थों की पूर्ति करते हुए अनेक लोग भी शिखर प्राप्त कर लेते हैं। ऐसे सफल लोग इन शिखर पुरुषों को नायक की तरह प्रचारित करते हैं। ऐसे में आम आदमी भी अपनी समस्याओं के लिये नायक की प्रतीक्षा करता है।  हम कुछ नहीं कर सकते कोई नायक आकर हमारी समस्या का हाल करेगा यह सोचकर लोग अपना दिल बहलाते हैं।

इधर फिल्मों और टीवी धारावाहिकों ने इस कदर लोगों की बुद्धि का हरण किया है कि कल्पित कहानियों पर बनी मनोरंजन सामग्री को ही संसार की हकीकत माना जाने लगा है।  इनमें काम करने वाले अभिनेता और अभिनेत्रियों को संसार का नायकत्व मिल जाता है।  यहां किसी को रोटी मिलती है तो नहीं भी मिलती है। किसी के पास रोजगार है तो कोई बेरोजगारी में ही सड़क नाप रहा है।  कामयाबी का पैमाना भगवान की कृपा है तो कामयाब और प्रतिष्ठित आदमी देवत्व का दर्जा पा लेता है।  लोकप्रियता का पैमाना आदमी का व्यवहार नहीं बल्कि उसके साथ खड़ी भीड़ है।  भीड़ में खड़ा आदमी नायक और अकेला खड़ा आदमी मूर्ख है-यह भाव आम हो गया है।

इधर एक फिल्म प्रदर्शित हुई थी ‘क्या कूल हैं हम,’ उसके क्रम में ही दूसरी फिल्म आ गयी है‘क्या सुपर कूल हैं हम’।  इन फिल्मों के प्रदर्शन में अधिक अंतराल नहीं है पर हमने पहले के समाज से कही वर्तमान में  अधिक लोगों को निष्क्रियता की स्थिति में देख रहे हैं। पहले तो लोग कूल या ठंडे थे अब तो सुपर कूल या एकदम ठंडे हो गये हैं। पहले तो यह था कि सभी नहीं तो कुछ लोग यह सोचते थे कि चलो समाज के लिये कुछ कर लें पर आजकल तो समाज में यह मान लिया गया है कि केवल शिखर पुरुष ही यह काम करेंगे। वाकई सुपर कूल हैं हम।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athor and editor-Deepak  “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Advertisements

विकास से दैहिक जलीय विसर्जन अवरुद्ध-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन


               गोलगप्पे वाले का स्टिंग आपरेशन कर उस छात्रा ने कमाल ही कर दिया। गोलगप्पे या पानी पुड़ी ठेले पर बेचने वाला वह शख्स अपना मुंह दिखाने लायक नहीं रहा होगा। हुआ यह कि वह लोगों की नज़रे बचाकर उस लोटे में पेशाब कर रहा था जिससे उसके ग्राहक पानी पीते है। दूरदृश्यों में उसका मूत्र विसर्जन का प्रसारण देखकर कोई भी शरमा जाये। अगर किसी भावुक चिंतक ने वह दृश्य देखा होगा तो यकीनन अब राह चलते हुए पेशाब करने के बारे में सोचेगा। उस ठेले वाले ने नीचे बैठकर लोटे में पेशाब किया और थोड़ा दूर चलकर उसे इस तरह फैंका जैसे अपने ठेले से अनुपयोगी जल फैंक रहा हो। कोई कह भी नहीं सकता। अगर वह उतनी दूर जाकर पेशाब करता तो संभव है कि कोई टोक देता। बहरहाल उसने वह लोटा जस का तस उठाकर ठेले पर बिना धोये रख दिया।
             छात्रा और उसके सहयोगियों ने वह दृश्य कैमरे में बंद किया और पहरेदारों को दिखाया। उसे पकड़ा गया और 12 सौ रुपये का जुर्माना देकर वह छूटा। किस्सा छोटा लगता है पर हमें ऐसा लगा कि जैसे उस पर तो बहुत कुछ लिखा जा सकता है। पेशाब पर लिखना कोई अच्छा नहीं लगता मगर देह में उसका अस्तित्व अस्वीकार नहीं किया जा सकता।
         स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि पेशाब कभी रोकना नहीं चाहिए। दूसरी तरफ राय देते हैं कि स्वस्थ रहने के लिए पानी अधिक पीना चाहिये, ऐसे में पेशाब भी तो अधिक आयेगा! न आये तो इसका कोई उपाय नहीं है। प्रकृति ने समस्त प्राणियों की देह इस तरह बनाई है कि उपभोग के द्वार से आगमित वस्तु अंततः निष्कासन द्वारा पर निर्गमन के लिये चली आती है। न आये तो विकट बीमारियां उत्पन्न होती है। वैसे तो इस घटना का प्रसारण देखकर बाज़ार में खाने पीने का सामान बेचने वालों के कामकाज पर ही टिप्पणियां की जा रही थीं पर हमें उस ठेले वाले पर गुस्से के साथ तरस भी आ रहा था। वह फंसा इसलिये कि वह अक्सर ऐसा करता रहा है। छात्रा ने कई दिन उसका कारनामा देखने के बाद ही उसे कैमरे कैद किया। एक बात तय रही कि वह ठेले वाला कोई अच्छी भावना वाला आदमी नहीं रहा होगा। सच बात तो यह है कि खाने का सामान बेचने वाले अनेक लोग ऐसे हैं जो साफ सफाई की बात सोचते तक नहीं है। यही कारण है कि गरीबी और भुखमरी के लिये बदनाम हमारे देश में आज भी भूख से कम गलत सलत खाकर मरने वालों की संख्या अधिक है। ग्राहक को भगवान माना जाता है पर उस ठेले यह साबित किया कि वह तो कमाई को सर्वोपरि मानता है।
          बहरहाल इस घटना से हमारा ध्यान पेशाबघरों की कम होती समस्या की तरफ जा रहा है। देश के शहरों में बढ़ती आबादी के चलते सड़कें सिकुड़ रही हैं। कई पेशाबघर लापता हो गये हैं। कहीं उनके आसपास चाय, पान, तथा चाट ठेलों ने कब्जा किया है तो कहीं बड़े दुकानदार काबिज हो गये हैं। इसके विपरीत भीड़ बढ़ रही है। बाज़ार में खानपान करने वालों की संख्या भी कम नहीं है। ऐसे में पेशाब आने पर सबसे बड़ा संकट यह होता है कि उसके लिये स्थान ढूंढें। वैसे हमारे देश में धार्मिक लोग प्याऊ बनवाते रहे हैं पर पेशाबघर बनाने का जिम्मा राज्य पर ही रखा गया है। वैसे प्राचीन समय में पेशाबघर बनवाने की आवश्यकता नहंीं अनुभव होती थी क्योकि इसके लिये तो पूरी जमीन खाली थी पर समय के अनुसार सभ्यता बदली है। गनीमत है कि अनेक स्थानों पर पिशाबघर न दिखने पर भी गंदगी के ऐसे ढेर मिल जाते हैं जहां खड़े होकर अपने को तनाव मुक्त किया जा सकता है। जिस तरह विकास बढ़ रहा है उससे तो लगता है कि आगे चलकर पेशाब घर कंपनियों को इसका भी ठेका मिलने लगेगा। कई वाहन मोबाईल जलीय विसर्जन-पेशाब के लिये अच्छा साहित्यक शब्द ढूंढना जरूरी है-का काम करेंगे। कहीं कहीं तो एक के साथ एक फ्री जैसे भी नारे लिखे मिलेंगे।
             वैसे तो अनेक शहरों में सुलभ शौचालय हैं पर वहां पेशाब की सुविधा हो यह जरूरी नहीं है। दूसरी बात यह भी कि अंततः वहां कार्यरत कर्मचारी मालिकाना हक की तरह उसका इस्तेमाल करते हुए पैसे मांगते हैं। कुछ लोगों ने तो यह शिकायत भी की है कि वहां पुरुषों के पिशाब घर खुले होने के कारण उनसे पैसे नहीं मांगे जाते पर महिलाओं से पैसा मांगा जाता है। महिला कल्याण समर्थक इस तरफ भ ध्यान दें।
वैसे ग्रामीण पृष्ठभूमि वाली महिलायें फिर भी परेशान नहीं दिखती पर शहरी क्षेत्र की महिलाऐं बाज़ार में घुमते समय तनाव होने पर दोहरे संकट में आ जाती हैं। एक तो उनको बाज़ार में उनको अपना काम पूरा करना है दूसरा दैहिक तनाव उनके लिये भारी संकट हो जाता है। अपने साथ पुरुष होने पर अपनी बात कह सकती हैं पर दूसरे से तो वह इसमें बात करते हुए संकोच करती हैं।
            एक सभ्य महिला ने एक बार जरूर हमसे कहा था कि ‘महिलाओं के लिये सुविधा बढ़ाने के तो दावे हैं उन पर यकीन कौन करेगा? बाज़ार में भीड़ महिलाओं की संख्या पहले से ज्यादा है पर पिशाबघर पुरुषों के लिए ही अधिक है।’
         बात सही है पर यहां तो अब पुरुषों के पिशाबघर लुप्त होते जा रहे हैं। चिकित्सक कहते हैं कि रुका पिशाब विष हो जाता है। इसके अलावा यह भी कहते हैं कि मधुमेह से ग्रसित लोगों को तत्काल पिशाब करना चाहिए। ऐसे ढेर सारे उपाय वह बताते हैं। देश में कार वालों की संख्या बढ़ती जा रही है उनका बाज़ार में आना जाना मॉलों, बड़े होटलों या ऐसे स्थानों पर होता है जहां पेशाबघर बने रहते हैं मगर समस्या है मध्यम वर्गीय या आधुनिक परिवेश वाले गरीब लोगों के लिये है। कई बार तो ऐसा है कि कुछ लोग बाज़ार से घर इसलिये ही जल्दी घर लौट आते हैं क्योंकि वह देह में पल रहे जलीय तनाव से मुक्ति का स्थान नहीं ढूंढ पाते। बाज़ार में सामान बेचने वालों की यही समस्या होती है कि उनके आसपास पेशाब घर नहीं होते।
           ऐसे में लगता है कि विकास दर वह दीवार है जो आदमी के जलीय तनाव के विसर्जन को रोकने का काम कर रही है। ऊंची और शानदार इमारतें आंखों को भले ही अच्छी लगें पर निष्कासन अंगों का तनाव उसका सुख कम किये दे रहा हैं। हमारे देश में जब कहीं दो लोग आपस में लड़ते हैं तो पिशाब को धमकी के रूप में उपयोग करते हैं। एक तो कहते हैं कि ‘ऐसी हालत करूंगा कि पेशाब बंद हो जायेगी।’ या कहेंगे कि ‘ऐसी हालत करूंगा कि पेशाब निकल आयेगी।’
           मगर हमारे देश में विकास ऐसा हो रहा है कि वह लोगों की पेशाब बंद भी कर सकता है। आमतौर से राह में पेशाब आने पर लोग ऐसे स्थान ढंूढते हैं जो एकांत में और गंदे हों। एकांत में होने के साथ चमकदार भी हों तो कोई जलीय तनाव विसर्जन का साहस नहीं कर सकता। आधुनिक विकास वही चमकदार दीवार है जिस पर कोई वक्र दृष्टि नहीं डाल सकता ऐसे में तनाव तो बढ़ना ही है।
चलते चलते 
———————-
           यह कहना मुश्किल है कि वह पानीपुरी बेचने वाला अपने ठेले पर रखे लोटे में पेशाब करते हुए कैमरे में कैद किस प्रकृति का है पर इस लेखक ने देखा है कि कुछ लोगों की बचपन से ही ऐसी प्रकृति होती है कि वह दूसरे को दुःख देकर या हानि पहुंचाकर खुश होने के आदी हो चुके होते हैं। ऐसे लोग जिंदगी में कुछ नहंी बन पाते। इस लेखक के साथ एक लड़का जूतों की दुकान पर नौकरी करता था। उसका वेतन लेखक के बराबर ही था पर  वह लड़का खराब नीयत का था। अकारण प्लास्टिक के जूते फाड़ता, आर्डर का माल पैक करते समय जिस साइज के जूते कागज पर लिखे होते उससे अलग साईज के भरता। बंडल तीन साइज का होता था पर वह अफरातफरी कर एक ही साईज के बना देता जिससे बाद में दुकानदार परेशान होते। अनावश्यक रूप से दूसरे नौकरों से भी वह लड़ता है। 
       आखिर उसका बाद में क्या हुआ? वह अब सब्जी मंडी में ठेला लेकर सब्जी ढोने का काम करता है। उसके साथ काम कर चुके चार लड़के उसी मंडी में दो कार में दो एक स्कूटर पर सब्जी खरीदने आते हैं। कार वाले तो उसको देखते तक नहीं है पर यह लेखक अनेक बार उसे देखता है पर बात नहीं करता। वह जिंदगी में नहीं बना इसके लिये अन्य कोई नहीं वह स्वयं जिम्मेदार है। यह नीच प्रकृति मनुष्य के विकास का मार्ग अवरूद्ध कर देती है-उस लड़के को देखकर हमारा तो यही मत बनता है।
—————
कवि, लेखक , संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
poet,editor,writer and auther-Deepak ‘Bharatdee’,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
————————-

मौसम भी ब्रेकिंग न्यूज होता है-हिन्दी व्यंग्य (weather is breking news-hindi hasya kavita)


टीवी चैनलों वाले भी क्या करें? उनको हमेशा ही सनसनीखेज की जरूरत है, वह न मिलें तो उसका एक ही उपाय है कि होता है कि हर खबर को सनसनीखेज खबर बनाया जाये। जब हर दस मिनट में ‘ब्रेकिंग न्यूज’ देना है तो फिर चाहे जो खबर पहली बार मिले उसे ही चला दो।
कोहरा कोई खास खबर नहीं है। कम से कम सर्दी में तो नहीं है। अगर सर्दी में मावठ की वर्षा न हो पड़े तो फिर फसलों के लिये परेशानी तो है ही आने वाली गर्मियों में जमीन का जलस्तर बहुत जल्दी कम हो जाने की आशंका हो जाती है।
कोहरे में रेलगाड़ियों के लिये क्या आदमी के लिये भी घर से निकलना परेशानी का कारण हो जाता है।
इधर घर में रजाई में बैठकर सर्दी से ठिठुर रहे हैं और उधर टीवी सुना रहा है कि ‘नई दिल्ली में हवाई जहाज की उड़ाने रद्द’, ‘उड़ाने रद्द होने से यात्री परेशान’, ‘नई दिल्ली रेल्वे स्टेशन पर अनेक गाड़ियां कोहरे के कारण लेट’ और वही पुराना राग ‘सही जानकारी न मिलने से यात्री परेशान’। लगातार ब्रेकिंग न्यूज चल रही है। यात्रा करने वालों के लिये अनेक कारण यात्रा के हो सकते हैं। अजी, इस मौसम में ही शादियां अधिक होती हैं तो गमियां भी! आदमी को जाना पड़ता है। फिर इधर नया साल आया। यह अपना परंपरागत भारतीय पर्व नहीं हैं। इस मौसम में कोई भी भारतीय पर्व नहीं पड़ता। शायद इसलिये अनेक विशेषज्ञ कहते हैं कि त्यौहारों का मौसम स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उसी समय होता है जब मौसम ठीकठाक हो और इसी कारण वह परंपरा भी बन जाते हैं। मगर अपने यहां खिचड़ी संस्कृति है सो लोग इसकी परवाह नहीं करते।
जिस दिन नया साल आ रहा था। सर्दी के मारे हम तो सो गये। रात को फटाके जलने की आवाज से हमारी निद्रा टूटी। बहुत देर तक हम सोच रहे थे कि ‘शायद कोई बारात आयी होगी।’ जब लगातार फटाखे जलने की आवाज आयी- साथ में हमारी नियमित स्मृति भी-तब याद आया कि नया वर्ष आया है।
ऐसे फटाखे शायद पूरे भारत में जल होंगे और शायद इससे पर्यावरण प्रदूषित नहीं हुआ होगा शायद इसने इसलिये नहीं लिखा। दिवाली पर तो बहुत रोना रोते हैं लोग कि ‘बड़ा खराब त्यौहार है, जिस पर जलने वाले फटाखों से पर्यावरण प्रदूषित होता है।’
शायद यह अंग्रेजी त्यौहार है इस पर ऐसी बातें लिखना पुरातनपंथी व्यवहार का प्रमाण होगा। सर्दी ने नया साल वगैरह सब भुला दिया है पर इस मौके पर शादी और गमी के अलावा अन्य आवश्यक कार्य से यात्रा पर जाने वालों से अधिक संख्या उन लोगों की होगी जो नववर्ष मनाने के लिये कही सैरसपाटे करने जा रहे होंगे या लौटते होंगे। ऐसे में सर्दी में अपने कमरे के अंदर रजाई में बैठे एक सज्जन ने हमसे कहा-‘यार, लोग इतनी सर्दी में अपने घर से बाहर क्यों निकलते हैं?’
हमें अपने आप पर ही शर्मिंदगी महसूस होने लगी क्योंकि हम भी तो उनके यह अपने ही घर से निकल कर आये थे।’
हमने कहा-‘ब्रेकिंग न्यूज बनाने के लिये।’
वह सज्जन बोले-‘हां, यह बात कुछ जमी! तुम्हारा हमारे यहां आना ब्रेकिंग न्यूज से कम नहीं है। तुम्हारा काफी पीने का हक बनता है। इतने दिनों बाद तुम्हें हमारी याद आयी।’
हमने कहा-‘इससे बड़ी बात यह है कि हम सर्दी में घर से बाहर निकले। पता लगा कि तुम बीमार हो! दोस्त यारों ने हम पर दबाव डाला कि हम तुम्हें देखने आयें।’
वह सज्जन बोले-‘तब तो तुम्हें पांच दिन पहले आना था। अब तो हम ठीक हैं। इस तरह तो तुम्हारा यहां आना भी सार्थक न रहा।’
हमने काफी का कप उठाते हुए कहा-‘यार, तुमने काफी पिलाकर कुछ दर्द हल्का कर दिया। वैसे सर्दी में घर से निकलने का अफसोस तुम्हारी तबियत देखने के कारण नहीं था पर तुमने ऐसी बात कर दी कि लगने लगा कि हमने गलती की।’
वह सज्जन रजाई में बैठे ही उचकते हुए बोले-‘यानि, मेरी तबियत अच्छी देखकर तुम्हें खुशी नहीं हुई। अपने सर्दी में बाहर निकलने का दर्द तुमको अब इसी कारण हो रहा है।’
हमने कहा-‘नहीं यार, तुम्हारी बात से हमें ऐसा लगा कि सैर सपाटा करने निकले हैं।
यह एक सामान्य बातचीत थी। वाकई इस बार सर्दी अधिक पड़ रही है पर ऐसा हमेशा होता है। इसमें ब्रेकिंग न्यूज जैसा कुछ हो सकता है या इससे सनसनी फैल सकती है, ऐसा नहीं लगता। बरसात में बाढ़ आने की खबरें सुनते हुए बरसों हो गये। कहते हैं कि दर्द झेलते हुए एसा समय भी आता है जब आदमी संवेदनायें मर जाती हैं और कहीं वह दर्द चला जाये तो आदमी को अजीब सा लगता है। यह कोहरा तथा उससे विमानों की उड़ाने और रेल यातायात का बाधित होना अब कोई प्रतिक्रिया पैदा नहीं करता। मगर खबर देने वाले भी क्या करें? लोग घर से निकलते कम हैं तो उनके लिये खबरें भी कम हो जाती हैं। फिर इतना बड़ा देश है तो लोग मजबूरी में यात्रायें तो करेंगे और चाहे जो भी मौसम हो तो हवाई अड्डों और स्टेशनों पर भीड़ होगी ही। अगर वह दिल्ली, मुंबई, कलकत्ता या अन्य बड़ा शहर हुआ तो फिर कहना ही क्या? तब तो खबरें लिखने वालों को बाहर निकलते ही खबर मिल जाती है। बाकी देश में कहां ढूंढते फिरें! ऐसे में सर्दी में अपने दिनों की याद को हम अकेले में ही याद कर उसे अपने ब्लाग/पत्रिका पर लिख सकते हैं।
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com
————————————-

यह आलेख इस ब्लाग ‘राजलेख की हिंदी पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

रास्ता जाम-हिन्दी व्यंग लेख (trafic trouble-hindi satire)


मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) में फंसना कोई बड़ी बात नहीं है। इस देश के करोड़ों लोग रोज फंसते हैं। उनकी कोई खबर नहीं बन सकती। खबर के लिये सनसनी होना जरूरी है। यह सनसन असामान्य लोगों के उठने, बैठने, चलने, फिरने और छींकने पर बनती है। मैंढकी को जुकाम हो जाये तो क्या फर्क पड़ता है, अगर किसी फिल्मी मेम को हो जाये तभी सनसनीखेज खबर बनती है क्योंकि उसके किये गये विज्ञापनों पर सारे टीवी चैनल और रोडियो चल रहे हैं। उसके लगाये ठुमकों पर जमाने भर के लड़को दिल जलते हैं। उसको जुकाम होने की खबर हो तो उनके दिल भी बैठ जाते हैं और यही काम खबरों से किया जाता हैं। दरअसल जिन खबरों से दिल उठे बैठे उससे ही सनसनी फैलती है।
ऐसे में मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) होने की खबर भी तभी सनसनी फैलाती है जब उसमें कोई खास हस्ती हो और अगर अंतराष्ट्रीय हो तो फिर कहना ही क्या? फिर एक दो नहीं बल्कि अनेक हों तब तो वह मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) अंतर्राष्ट्रीय स्तर का होता है और सनसनी अधिक ही फैल जाती है। अलबत्ता कोपेनहेगन में अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के काफिले की वजह से अन्य राष्ट्रों के प्रमुखों के काफिले मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) में फंस गये। यह खबर सुन और पढ़कर भी इस देश के बहुत कम लोगों पर उसकी प्रतिक्रिया दिखाई दे रही है। किसी से कहो तो वही यह कहता है कि‘यार, ऐसा क्या है इस खबर में! हम तो यहां दिन में गंतव्य तक पहुंचने में चार चार बार मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) में फंसते हैं।’
यह बताये जाने पर कि यह मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) अमेरिकी राष्ट्रपति की वजह से हुआ तो लोग कहते हैं कि‘ इससे क्या फर्क पड़ता है कि उनकी वजह से हुआ। अगर वह उनके खास आदमी होने की वजह से हुआ तो भी क्या? यहां तो आम आदमी की वजह से भी मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) हो जाता है!
हमें तो ऐसी आदत हो गयी है कि अगर किसी दिन अगर मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) का सामना नहीं किया तो लगता है कि जैसे यात्रा ही नहीं की हो। इतना ही नहीं अगर किसी कार्यक्रम या गंतव्य पर विलंब से पहुंचते हैं और उसकी सफाई मांगी जाती है तो भले ही मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) का सामना नहीं किया हो बहाना उसी का बना देते हैं।
कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन रोकने के लिये गैस उत्सर्जन कम करने के प्रयासों पर बैठक हो रही थी। पता नहीं उसका क्या हुआ? बहरहाल इस तरह के गैस उत्सर्जन में मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) होने का भी कम योगदान नहीं है। मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) हो गया तो गाड़ियां चालू हालत में ही गैस छोड़ती रहती हैं। कई गाड़ियों में पैट्रोल में धासलेट भरा होता है जिसके जलने पर निकलने वाली दुर्गंध बता देती है। उसका धुआं जब सांस में घुसता है तो तकलीफ कम नहीं होती। कई बार तो ऐसा लगता है कि इन जामों में जितना पैट्रोल खर्च होता है अगर उससे रोका जाये तो न केवल देश का पैसा और पर्यावरण दोनों बचेगा। कितना, यह हमें पता नहीं। अलबत्ता, ऐसे जामों में हम अपनी गाड़ी बंद कर देते हैं-गैस उत्सर्जन से बचने के लिये नहीं पैसा बचाने के लिये।
वैसे हम सोच रहे थे कि कोई मोबाईल के लिये कोई ऐसा धुन बन जाये जिसमें ‘ओबामा…ओबामा… मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) में फंस गये रामा रामा’ जैसे शब्द हों तो मजा आ जाये। अगर इस पर कोई गीत फिल्म वाले बनाकर दिखायें तो शायद वह हिट भी जाये। ऐसे में उसे मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) होने पर लोगा गुनगुनाकर दिल हल्का कर लेंगे। उसे हम अपने मोबाइल पर लोड कर लेंगे और जब कहीं फंस जायें तो उसे सुनेंगे। धुन पाश्चात्य संगीत पर आधारित होना चाहिये या फिर शास्त्रीय संगीत पर। भारतीय फिल्म संगीत के आधार पर तो बिल्कुल नहीं क्योंकि वह अब हमें प्रभावित नहीं करती। ओबामा का नाम इसलिये लिया क्योंकि जिस तरह कोपेनहेगन की खबर पढ़ी उससे तो यही लगता है कि इस समय वह दुनियां के इकलौते आदमी हैं जिनको कहीं मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) फंसना नहीं पड़ेगा! आखिर अमेरिका के राष्ट्रपति जो हैं। यह अलग बात है कि उनकी वजह से मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) हुआ और उसमें फंसी गाड़ियों में ईंधन जलने से विषाक्त गैस वातावरण में फैली।
इधर भारत ने भी तय किया कि वह गैस उत्सर्जन कम करेगा। हमारा मानना है कि हमारे राष्ट्र के प्रबंधक इस मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) से बचना चाहते हैं तो वह सड़कों का सुधार करें। इससे मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) होने की समस्या से तो निजात मिलेगी और साथ मेें गाड़ियों की गति कम होने से ईंधन की खपत कम होगी जिससे गैस का विसर्जन कम ही होगा। हालांकि यह एक सुझाव ही है। हमें पता है कि इस पर अमल शायद ही हो क्योंकि विकास कभी बिना विनाश के नहीं होता। अगर आपको सड़कें बनानी हैं तो टूटी पाईप लाईन भी बनानी है। फिर टेलीफोन लाईन लगानी है तो सड़क खोदनी है। खोदने, बनाने और लगाने में कमीशन का जुगाड़ का होना भी जरूरी है। जिस पर सड़क बनाने या बनवाने का जिम्मा है उसे भी उसी सड़क से गुजरना है पर वह बिना कमीशन के मानेगा नहीं भले ही सड़क के खस्तहाल से जूझेगा। विकास में कमीशन का मामला फिट होता है। लोगों को अपने बैंक खाते भरते दिखना चाहिये सड़क कौन देखता है? अरे, धक्के खाते हुए आफिस या घर पहुंच ही जाते हैं कौन उस पर रहना है?
किसी से मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) की बात कहो तो यही कहेगा कि ‘यार, इसमें तो केवल ओबामा ही नहीं फंसेंगे? तुम क्या ओबामा हो जो इससे बचना चाहते हो?’
इधर भारत ने गैस उत्सर्जन में कटौती की घोषणा की है तो अनेक बड़े धनिकों ने उस पर आपत्तियां की हैं। उनको देश का विकास अवरुद्ध होता नजर आ रहा है पर मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) की समस्या देखते तो उनको लगता कि यह कठिन काम नहीं है पर बात वही है कि कौन उनको ऐसी सड़कों पर चलना है। हम तो मार्ग अवरुद्ध होने पर अपनी ही यह एक पंक्ति ‘ओबामा…ओबामा… मार्ग अवरुद्ध (ट्रैफिक जाम) में फंस गये रामा रामा’ दोहरायेंगे। पूरा गीत लिखना वैसे भी अपनी बौद्धिक क्षमता के बाहर की बात है।
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com
————————————-

यह आलेख इस ब्लाग ‘राजलेख की हिंदी पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप