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मोटापा और मोटे लोग-हास्य व्यंग्य (motapa aur mote log-hasya vyangya)


मोटापे अच्छा है या बुरा इस पर बहुत बहस चलती है। ऐसा लगता है कि मोटापे पर कोई सही ढंग से शोध नहीं कर पाया। अनेक लोग मोटापे पर चिंतन लिखते हैं तो अनेक व्यंग्य! कुछ लोग शोध करते हैं तो कुछ क्रोध करते हैं। मुश्किल यह है कि इस पर अनुसंधान करने वाले लोग स्वयं मोटे हों इसका प्रमाण नहीं मिलता। दूसरा जो मोटापे पर चिंतन लिखते हैं उनका ज्ञान केवल पश्चिमी अवधारणा पर आधारित होता है। जो व्यंग्य लिखते हैं उनके लिये मोटापा केवल हंसने की चीज है।
अपने देश के बाबा रामदेव भी मोटापे को कोसते हैं पर वह स्वयं मोटे नहीं है। ऐसे में मोटापे पर शोध, चंतन और व्यंग्य लिखने की काबलियत हमे अपने में ही दिखाई दी। वजह यह कि हमारी गिनती भी मोटों में होती है। फटे पुराने और घटिया दर्जे के हैं तो क्या लेखक तो हैं ही! हमारे मोटापे का कारण हमको नहीं पता पर योग माता अपनी कृपा से सारे शरीर का दर्शन करा देती है। जब कहीं मोटापे पर पढ़ते हैं तो सोचने लगते हैं। कभी कभी हंसी आती है और कभी चिंतन में खो जाते हैं। सोचा था कि कभी मोटापे पर नहीं लिखेंगे पर एक घटना ने मज़बूर किया। घटना पांच साल पहले की थी।
हम किसी काम से दूसरे शहर गये। अपनी जीवन संगिनी के रिश्ते की बहिन के यहां कोई सामान पहुंचाना था और इसका बीड़ा उन्होंने उठाया। वह दूर के रिश्ते की थी पर हमारे साथ उसका संबंध अच्छा था। हमारे उस शहर में जाने की खबर हमारी उसी दूर की साली को फोन पर हमारे घर से ही मिली। उसने मां को फोन किया। उसकी मां ने हमसे कहा कि ‘आप भी तो उसके जीजा की तरह हैं, उसे बच्चा हुआ है और यह सामान पहुंचाना जरूरी है। आप दो दिन के लिये जा रहे हैं तो उसके घर रुक जाईयेगा। इससे एक तो हमारा सामान पहुंच जायेगा जिससे उनके यहां नवजात शिशु की ननिहाल से आने वाले सामान से होने वाली रस्में पूरी होंगी और दूसरा हमारा कोई सहारा है इसका संदेश भी उसके ससुराल वालों मिल जायेगा।’’
अपने देश में ऐसे ही संबंधों का प्रभाव भी जताया जाता है। बहरहाल हम सामान लेकर अपनी साली के पास पहुंचे। उसने स्वाभाविक रूप से हमारा स्वागत किया। उसके साथ उसकी देवरानी ने भी हमें आदर दिया। सामान बहुत था इससे उसकी सास भी खुश हुई हालांकि वह कहीं पड़ौस में रहती थी पर उस दिन वहां आयी थी। इससे हमारी साली का एक काम तो सिद्ध हो गया कि नवजात शिशु के लिये ननिहाल से आया समान से जिससे उसकी रस्में पूरी होंगी। दूसरे के लिये हमें वह एक दिन और एक रात रुकना था
रात को उसकी देवरानी ने पूछा-‘जीजाजी, खाने में क्या बनाऊं?’
हमने उससे कहा कि ‘हमें दूध का एक कप दे देना, उससे ज्यादा हम कुछ नहीं खाते। दिन में एक बार ही खाना खाते हैं और यह कार्य यात्रा में पूरा कर चुके हैं’।
उसे यकीन नहीं हुआ। हमारा मोटा पेट देखकर उसे यकीन होना भी नहीं था। वह बोली-‘जीजाजी, लगता है कि आप संकोच कर रहे हैं।’
हमने हंसते हुए कहा-‘कल दोपहर को आप यह देखेंगी कि हम खाने में संकोच में नहीं करते। अलबत्ता कल रात को आपके यहां से भी दूध का कप पीकर ही जायेंगे।’
वह हंस कर चली गयी।
सुबह हमने योग साधना के लिये उनकी छत का रुख किया। छत पर अपने आसन और प्राणायम में लग गये। एक डेढ़ घंटा बाद उससे निवृत होकर हम नीचे आये तो साली हमें देखकर हंस रही थी। वह बोली-‘जीजाजी आप तो बिल्कुल योगी हो गये। दीदी बताती तो थीं पर आपको योगसाधना करते देखकर हैरानी हो रही थी।’
हमने कहा-‘हम योगी तो नहीं हैं पर इतना तय है कि इसके बिना हमारा अब काम चल नहीं सकता।
साढ़ू ने मुझसे कहा कि ‘आप कुछ आसन हमें भी बता जायें। मैंने पहले आपको देखा था और अब देख रहा हूं। बहुत अंतर है, पर आपका पेट तो वैसे ही है हालांकि बाकी जगह अंगों में मोटापा नहीं दिख रहा।’
रात को हमने कुछ देर ध्यान लगाया और दूध का कप पीकर वहां से निकले। साली और साढ़ू बाहर छोड़ने आये। घर से कुछ दूर तक साथ चले जैसा कि अपने लोगों का स्वभाव होता है इस दौरान कुछ ऐसी बातें भी होती हैं जो सबके सामने नहीं हो सकती। करीब आधा घंटा बातचीत हुई। इस दौरान हमारी साली अपने पड़ौसन की चर्चा करने लगी जिससे उसकी बातचीत दोपहर उस समय हुई जब हम बाहर घूमने गये थे।
वह बोली-‘‘हमारी पड़ौसी कह रही थी कि कल शाम को जब तुम्हारे जीजाजी आये तो मैं सोच रही थी कि यह तो बहुत मोटे हैं पर सुबह छत पर उनको योगासन करते देखा तो हैरानी हुई। तुम्हारे जीजाजी तो अपने हाथ पांव चाहे जैसे मोड़ लेते हैं। पदमासन पर बहुत देर बैठे रहे। ऐसे आसन तो पतले के लिये भी करना कठिन है।’
हमने हंसते हुए कहा-‘ऐसा बहुत लोग कहते हैं।’
वह बोली-‘‘मैंने जब केवल एक ही समय खाना खाने की बात बताई तो वह यकीन नहंी कर रही थी। वह पूछ रही थी कि आपका मोटापा फिर क्यों बना हुआ है।’
हमने कहा कि ‘यह तो वंशानुगत है, इससे पीछा नहीं छूट सकता।’
पहले भी बहुत सारे लोग हमारे मोटापे पर हसंते थे अब भी हंसते हैं पर मोटे लोग सब झेल जाते हैं। दरअसल मोटे लोगों में सहनशीलता होती है। सच बात तो यह है कि मोटे लोग बेशर्म न हों तो पतले हो जायें।
एक बात यहां बता दें कि खाने का मोटापे से कोइ्र लेना देना नहीं है। हमने देखा है कि कुछ लोग खाते पहलवान की तरह पर दिखते हैं सींकिया। मोटे बहुत खाते हैं यह हमने कम ही देखा है पर ऐसे दसियों महिला पुरुष देखे हैं जो इकहरे बदने के होने पर भी जब खाने पर टूटते हैं तो कोई मोटा देख तो उससे इर्ष्या करने लगे।
उस दिन दो महिलाओं के बीच तीसरी महिला को लेकर चर्चा सुनी।
एक ने कहा-‘वह तो बहुत दुबली दिखती है। लगता है खाना कम खाती है।’
दूसरी बोली-‘क्या बात करती हो? कभी उसके साथ शादी या किसी सामूहिक कार्यक्रम में जाकर देखो। तुम या मैं इतना खा नहीं सकती। वह तो ढेर सार खा जाती है।’
ऐसे ही कई पुरुषों की चर्चा सुनी है तो देखी भी है। हमारा एक ऐसे मित्र के साथ शादी में जाना हुआ जो पतला था। शादी में घुसने के बाद पानी की टिकिया देखकर वह रुक गया और बोला-‘मैं तो पहले ही पानी की टिकिया पीऊंगा।’
हम दोनों ने दोने उठाये। जहां हम दो पानी की टिकिया पीकर दोना फैंकने के लिये कचड़े के डिब्बे की तरफ गये तो वह बोला-‘अरे, यार खाने की जल्दी है क्या? अभी मैं और खाऊंगा तुम चाहो तो दूसरे स्टाल पर चले जाओ। वैसे तुम अपने मोटापे को शरमा रहे हो।’
बात हमें चुभ गयी। हम वहां से हटे पर थोड़ी दूर जाकर खड़े हो गये यह देखने के लिये कि वह कितनी पानी की टिकिया खा रहा है।’
वह बीस टिकिया उदरस्थ कर गया। हटा भी तब जब इधर उधर से उसे धक्के मिलने लगे क्योंकि तब पंडाल में भीड़ बढ़ गयी थी। वह शायद तब भी नहीं हटता अगर टिकिया देने वाला उसकी उपेक्षा नहीं करता।
वह चाट के स्टालों पर गया। फिर मिठाई के स्टाल पर आनंद लिया। डोसा खाया, डबल रोटी खाई। फिर घूमता हुआ हमें ढूंढने लगा। तब हम उसके पास गये। वह बोला-‘चलो खाना खाते हैं।’
इसके बाद भी वह खाना खायेगा? यह सुनकर हमारे तोते उड़ गये। हमने कहा-‘हमने डोसा खा लिया और थोड़ा मीठा ले लिया। कॉफी पी ली इसलिये हमारा पेट भर चुका है।’
वह बोला-‘अरे यार, जब यहां आये तो खाना तो खाना ही चाहिए न!
हमने कहा-‘तुम खा लो तब तक हम कुर्सी पर बैठ जाते हैं।’
बाप रे, उसका खाना! कभी हम अपना तो कभी उसका पेट देख रहे थे। हमारा मोटा पेट बता रहा था कि उसमें खाना है पर उसका पेट! कहां चला गया उसका खाना!
विशेषज्ञ भी अजीब बातें करते हैं। एक कहता है कि व्यायाम करो तो पेट कम होगा तो दूसरा कहता है कि सोते रहो पतले हो जाओगे। कोई कहता है कि कम खाओ पतले हो जाओ तो कोई कहता है कि ज्यादा खाओ तो पतले हो जाओगे। यह मज़ाक नहीं है बल्कि सारी बातें अखबारों में आती हैं।
अब थोड़ा चिंतन भी कर लें क्योंकि हमारे मित्र उसके बिना मानते नहीं हैं। देवराज इंद्र ने राज हरिश्चंद्र के पुत्र से कहा था कि ‘चलते रहो, चलते रहो।
उनका कहना है कि जो लोग सोते हैं वह नरक भोगते हैं। जो उठकर बैठे रहते हैं वह पाताल के रहवासी हैं। जो उठकर खड़े होते हैं वह धरतीपुत्र हैं और जो चलते रहते हैं वह धरती पर स्वर्ग भोगते हैं।
मतलब न हम मोटापे से खुश हैं न दुःखी। भारतीय अध्यात्मिक पुरुष देवराज इंद्र का नारा रट लिया है। चलते रहो चलते रहो। (motape se mote nahin hote pareshan-hasya vyangya)
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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