Tag Archives: हिन्दी साहित्य

धार्मिक ग्रंथ की बात पहले समझें फिर व्यक्त करें-हिन्दी लेख


                                   अभी हाल ही में एक पत्रिका में वेदों के संदेशों के आधार पर यह संदेश प्रकाशित किया गया कि ‘गाय को मारने या मांस खाने वाले को मार देना चाहिये’।  इस पर बहुत विवाद हुआ। हमने ट्विटर, ब्लॉग और फेसबुक पर यह अनुरोध किया था कि उस वेद का श्लोक भी प्रस्तुत किया गया है जिसमें इस तरह की बात कही गयी है। चूंकि हम अव्यवसायिक लेखक हैं इसलिये पाठक अधिक न होने से  प्रचार माध्यमों तक हमारी बात नहीं पहंुंच पाती। बहरहाल हम अपनी कहते हैं जिसका प्रभाव देर बाद दिखाई भी देता है।

बहुत ढूंढने पर ही अथर्ववेद सि यह श्लोक मिला

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आ जिह्वाया मूरदेवान्ताभस्व क्रव्यादो वृष्टबापि धत्सवासन।

हिन्दी में भावार्थ-मूर्खों को अपनी जीभ रूपी ज्वाला से सुधार और बलवान होकर मांसाहारी हिसंकों को अपनी प्रवृत्ति से निवृत्त कर।

                                   हमें संस्कृति शुद्ध रूप से नहीं आती पर इतना ज्ञान है कि श्लोक और उसका हिन्दी अर्थ मिलाने का प्रयास करते हैं।  जहां तक हम समझ पाये हैं वेदों में प्रार्थनाऐं न कि निर्देश या आदेश दिये गये हैं।  उपरोक्त श्लोक का अर्थ हम इस तरह कर रहे हैं कि ‘हमारी जीभ के मूढ़ता भाव को आग में भस्म से अंत कर। अपने बल से हिंसक भाव को सुला दे।’

                                   हम फिर दोहराते हैं कि यह परमात्मा से प्रार्थना या याचना है कि मनुष्य को दिया गया आदेश। यह भी स्पष्ट कर दें कि यह श्लोक चार वेदों का पूर्ण अध्ययन कर नहीं वरन एक संक्षिप्त संग्रह से लिया गया है जिसमें यह बताया गया है कि यह चारो वेदों की प्रमुख सुक्तियां हैं।

                                   हम पिछले अनेक वर्षों से देख रहे हैं कि अनेक वेदों, पुराणों तथा अन्य ग्रंथों से संदेश लेकर कुछ कथित विद्वान ब्रह्मज्ञानी होने का प्रदर्शन करते हैं। अनेक प्रचार पाने के लिये धार्मिक ग्रंथों की आड़ में विवाद खड़ा करते हैं।  जिस तरह पाश्चात्य प्रचारक यह मानते हैं कि पुरस्कार या सम्मान प्राप्त करने वाला साहित्यकार मान जायेगा वैसे ही भारतीय प्रचारक भी यह मानते हैं कि गेरुए या सफेद वस्त्र पहनकर आश्रम में रहने वाले ही ज्ञानी है।  उनके अनुसार हम दोनों श्रेणी में नहीं आते पर सच यही है कि ग्रंथों का अध्ययन श्रद्धा करने पर ही ज्ञान मिलता है और वह प्रदर्शन का विषय नहीं वरनृ स्वयं पर अनुंसधान करने के लिये होता है। हमने लिखा था सामवेद में कहा गया है कि ‘ब्रह्मद्विष आवजहि’ अर्थात ज्ञान से द्वेष करने वाले को परास्त कर। हमारा मानना है कि बिना ज्ञान के धर्म रक्षा करने के प्रयास विवाद ही खड़ा करते हैं।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
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140 शब्दों की सीमा से अधिक twitlonger पर लिखना भी दिलचस्प


                                   ट्विटर, फेसबुक और ब्लॉग से आठ वषौं के सतत संपर्क से यह अनुभव हुआ है कि भले ही आपकी बात अंग्रेजी में अधिक पढ़ी जाती है पर भारत में समझने के लिये आपका पाठ हिन्दी में होना आवश्यक है।  महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर आक्रामक शैली में शब्द लिखने हों तो अंग्रेजी से अधिक हिन्दी ज्यादा बेहतर भाषा है।  कटु  बात कहने के लिये मधुर शब्द का उपयोग भी व्यंजना भाषा में इस तरह किया जा सकता है कि  ंइसका अनुभव एक ऐसे ट्विटर प्रयोक्ता के खाते से संपर्क होने पर हुआ जो अपनी अंग्रेजी भाषा में लिखी गयी बात से प्रसिद्ध हो रहा है।  उसके अंग्रेजी शब्दों के जवाब में अंग्रेजी टिप्पणियां आती हैं पर जितना आक्रामक शब्द अंग्रेजी की अपेक्षा हिन्दी टिप्पणियों के होते हैं।  एक टिप्पणीकर्ता ने तो लिख ही दिया कि अगर अपनी बात ज्यादा प्रभावी बनाना चाहते हो तो हिन्दी में लिखो। वह ट्विटर प्रयोक्ता अंग्रेजी में लिख रहा है पर उसकी आशा के अनुरूप हवा नहीं बन पाती। अगर वह हिन्दी में लिखता तो शायद ज्यादा चर्चित होता। इसलिये हमारी सलाह तो यही है कि जहां तक हो सके अपना हार्दिक प्रभाव बनाने के लिये अधिक से अधिक देवनागरी हिन्दी में लिखे।

140 शब्दों की सीमा से अधिक ट्विटरलौंगर पर लिखना भी दिलचस्प

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इधर ट्विटर ने भी 140 शब्दों से अधिक शब्द लिखने वाले प्रयोक्ताओं  ट्विटलोंगर की सुविधा प्रदान की है। हिन्दी के प्रयोक्ता शायद इसलिये उसका अधिक उपयोग नहीं कर पा रहे क्योंकि उसका प्रचार अधिक नहीं है। हमने जब एक प्रयोक्ता के खाते का भ्रमण किया तब पता लगा कि यह सुविधा मौजूद है। हालांकि हम जैसे ब्लॉग लेखक के लिये यह सुविधा अधिक उपयोगी नहीं है पर जब किसी विशेष विषय पर ट्विटर लिखना हो तो उसका उपयोग कर ही लेते हैं। वैसे ट्विटर पर अधिक लिखना ज्यादा अच्छा नहीं लगता क्योंकि वह लोग लिंक कम ही क्लिक करते हैं।  बहरहाल जो केवल ट्विटर पर अधिक सक्रिय हैं उनके लिये यह लिंक तब अधिक उपयोग हो सकता है जब वह अधिक लिखना चाहते हैं।

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एकलव्य की तरह श्रीमद्भागवतगीता का अध्ययन करें-हिन्दी लेख


                         श्रीमद्भागवत गीता में सांख्ययोग की अपेक्षा कर्मयोग को श्रेष्ठ बताया गया है। इतना ही सांख्या योग से सन्यास अत्यंत कठिन बताते हुए कर्म येाग सन्यास का महत्व प्रतिपादित किया गया है। हमारे यहां सन्यास पर अनेक तरह के भ्रम फैलाये जाते हैं।  सन्यास का यह अर्थ कदापि नही हैं कि संसार के विषयों का त्याग कर कहीं एकांत में बैठा जाये। यह संभव भी नहीं है क्योंकि देह में बैठा मन कभी विषयों से परे नहीं रहने देता।  उसके वश में आकर मनुष्य कुछ न कुछ करने को तत्पर हो ही जाता है। भारतीय धर्म में सन्यास से आशय सांसरिक विषयों से संबंध होने पर भी उनमें भाव का त्याग करना  ही माना गया गया है। इसे सहज योग भी कहा जाता है। जीवन में भोजन करना अनिवार्य है पर पेट भरने के लिये स्वाद के भाव से रहित होकर पाचक भोजन ग्रहण करने वाला सन्यासी है। लोभ करे तो सन्यासी भी ढोंगी है।

                                   इस संसार में मनुष्य की देह स्थित मन के चलने के दो ही मार्ग हैं-सहज योग या उसके विपरीत असहज योग। अगर श्रीमद्भागवत् गीता को गुरु मानकर उसका अध्ययन किया जाये तो धीरे धीरे जीवन जीने की ऐसी कला आ जाती है कि मनुष्य सदैव सहज योग में स्थित हो जाता है। जिन लोगों के पास ज्ञान नहीं है वह मन के गुलाम होकर जीवन जीते हैं। अपना विवेक वह खूंटी पर टांग देते हैं। यह मार्ग उन्हें असहज योग की तरफ ले ही जाता है।

                                   एक बात निश्चित है कि हर मनुष्य योग तो करता ही है। वह चाहे या न चाहे अध्यात्मिक तथा सांसरिक विषयों के प्रति उसके मन में चिंत्तन और अनुसंधान चलता रहता है। अंतर इतना है कि ज्ञानी प्राणायाम, ध्यान और मंत्रजाप से अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण करते हुए अपने विवेक से अध्यत्मिक ज्ञान धारण कर संसार के विषयों से जुड़ता है जबकि  सामान्य मनुष्य ज्ञान के पंच दोषों के प्रभाव के वशीभूत होकर कष्ट उठाता है। इसलिये अगर दैहिक गुरु न मिले तो श्रीमद्भागवत्गीता का अध्ययन उसी तरह करना चाहिये जैसे एकलव्य ने द्रोणाचार्य की प्रतिमा बनाकर धनुर्विद्या सीखी थी।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

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#आमआदमी की उपेक्षा करना अब #संभव नहीं-#हिन्दीचिंत्तनलेख


                    सार्वजनिक जीवन में मानवीय संवेदनाओं से खिलवाड़ कर  सदैव लाभ उठाना खतरनाक भी हो सकता है। खासतौर से आज जब अंतर्जाल पर सामाजिक जनसंपर्क तथा प्रचार की सुविधा उपलब्ध है। अभी तक भारत के विभिन्न पेशेवर बुद्धिजीवियों ने संगठित प्रचार माध्यमों में अपने लिये खूब मलाई काटी पर अब उनके लिये परेशानियां भी बढ़ने लगी हैं-यही कारण है कि बुद्धिजीवियों का एक विशेष वर्ग अंतर्जालीय जनसंपर्क तथा प्रचार पर नियंत्रण की बात करने लगा है।

                              1993 में मुंबई में हुए धारावाहिक बम विस्फोटों का पंजाब के गुरदासपुर में हाल ही में हमले से सिवाय इसके कोई प्रत्यक्ष कोई संबंध नहीं है कि दोनों घटनायें पाकिस्तान से प्रायोजित है।  बमविस्फोटों के सिलसिले में एक आरोपी को फांसी होने वाली है जिस पर कुछ बुद्धिमान लोगों ने वैसे ही प्रयास शुरु किये जैसे पहले भी करते रहे हैं। इधर उधर अपीलों में करीब तीन सौ से ज्यादा लोगों ने हस्ताक्षर किये-मानवीय आधार बताया गया। इसका कुछ सख्त लोगों ने विरोध किया। अंतर्जाल पर इनके विरुद्ध अभियान चलने लगा। इसी दौरान पंजाब के गुरदासपुर में हमला होने के बाद पूरे देश में गुस्सा फैला जो अंतर्जाल पर दिख रहा है। लगे हाथों सख्त मिजाज लोगों ने इन हस्ताक्षरकर्ता बुद्धिजीवियों पर उससे ज्यादा भड़ास निकाली।  जिन शब्दों का उपयोग हुआ वह हम लिख भी नहीं सकते। हमारे हिसाब से स्थिति तो यह बन गयी है कि इन हस्ताक्षरकर्ता बुद्धिजीवियों के हृदय भी अब यह सोचकर कांप रहे होंगे कि गुरदासपुर की घटना के बाद आतंकवाद पर उनका परंपरागत ढुलमुल रवैया जनमानस में स्वयं की खलनायक छवि स्थाई न बना दे।

                              हमने पिछले दो दिनों से ट्विटर और फेसबुक पर देखा है।  यकीनन यह लोग अभी तक अंतर्जालीय मंच को निम्न कोटि का समझते हैं शायद परवाह न करें पर कालांतर में उनको यह अनुभव हो जायेगा कि संगठित प्रचार माध्यमों से ज्यादा यह साामाजिक जनसंपर्क और प्रचार माध्यम ज्यादा शक्तिशाली है। सबसे बड़ी बात यह कि आम जनमानस के प्रति उपेक्षा का रवैया अपनाने वाले इन लोगों का इस बात का अहसास धीरे धीरे तब होने लगेगा उनके जानने वाले तकनीक लोग उन्हें अपनी छवि के बारे में बतायेंगे।

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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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मैली गंगा और भरी थैली-हिन्दी कवितायें


हिमालय से निकली

पवित्र गंगा हर जगह

मैंली क्यों है।

पानी की हर बूंद पर

 गंदगी फैली क्यों है।

कहें दीपक बापू किनारे से

चलो धनवानों के घर तक

पत लग जायेगा

गंगा की धाराओं में

विष प्रवाहित करने के बदले

उनकी भरी थैली  क्यों है।

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भीड़ लगी है ऐसे लोगों की

 जो मुख में राम

बगल में खंजर दबाये हैं।

खास लोगों का भी

जमघट कम नहीं है

कर दिया जिन्होंने

शहर में अंधेरा

अपना घर रौशनी से सजाये हैं।

कहें दीपक बापू किसे पता था

विकास का मार्ग

विनाश के समानातंर चलता है

मझधार में फंसी संस्कारी नाव

जिसे किसी ने पीछे लौटने के

 गुर नहीं बताये हैं।

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ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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जहर तो न पकाओ-हिन्दी कवितायें


सपना सभी का होता है

मगर राज सिंहासन तक

चतुर ही पहुंच पाते हैं।

बादशाहों की काबलियत पर

सवाल उठाना बेकार हैं

दरबार में उनकी

अक्लमंद भी धन के गुलाम होकर

सलाम बजाने पहुंच जाते हैं।

कहें दीपक बापू इंसानों ने

अपनी जिंदगी के कायदे

कुदरत से अलग बनाये,

ताकतवरों ने लेकर उनका सहारा

कमजोरों पर जुल्म ढहाये,

हुकुमतों के गलियारों में

जज़्बातों के कातिल भी पहरेदारी

करने पहुंच जाते हैं।

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भोजन जल्दी खाना है

या पकाना

पता नहीं

मगर जहर तो न पकाओ।

दुनियां में अधिक खाकर

आहत होते हैं लोग

भूख से मरने का

भय दिल में न लाओ।

कहें दीपक बापू जिंदगी में

पेट भरना जरूरी है

जहर खायेंगे

यह भी क्या मजबूरी है

घर की नारी के हाथ से बने

भोजन के मुकाबले

कंपनी दैत्य के विषैले

चमकदार लिफाफे में रखे

प्रसाद को कभी अच्छा न बताओ।

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देवताओं ने सीखें सफलता का मंत्र-हिन्दी चिंत्तन लेख


                              मनुष्य मन का भटकाव उसे कभी लक्ष्य तक नहीं पहुंचने देता। जीवन संघर्ष में अनेक अच्छे और बुरे अवसर आते हैं पर ज्ञानी मनुष्य अपने लक्ष्य पथ से अलग नहीं होता।  कहा जाता है कि इस संसार में समय और प्रकृति बलवान है और उनके नियमों के अनुसार ही जीवन चक्र चलता है।  मनुष्य में उतावलपन अधिक रहता है इसलिये वह अपने परिश्रम का परिणाम जल्दी प्राप्त कर लेना चाहता है। ऐसा न होने पर वह निराश और हताश होकर अपने लक्ष्य से अलग हो जाता है या फिर अपना पथ बदल देता है।

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि

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रत्नेर्महार्हस्तुतुंषुर्न देवा न भेजिरेभीमविषेण भीतिम्।

सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीरा।

                              हिन्दी में भावार्थ-समुद्र मंथन के समय अनमोल निकलने पर भी देवता प्रसन्न नहीं हुए। न विष निकलने पर विचलित हुए। वह तब तक नहीं रुके जब तक अमृत निकलकर उनके हाथ नहीं आया। धीर पुरुष अपना लक्ष्य प्राप्त किये बिना कभी अपना काम बीच में नहीं छोड़ते।

          वर्तमान काल में शीघ्र तथा संक्षिप्त मार्ग से सफलता पाने का विचार करने में ही लोग अपना समय गंवा देते हैं।  किसी काम में दो दिन लगते हों पर लोग उसे दो घंटे में करने की सोचते हुए पांच दिन गंवा देते हैं।  प्रकृत्ति का सिद्धांत कहता है कि हर कार्य अपने समय के अनुसार ही होता है।  मनुष्य को बस अपने कर्म करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिये।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

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अज्ञान ही समस्त संकट का कारण-पतंजलि योग साहित्य


       पूरे विश्व में 21 जून को योग दिवस मनाया जा रहा है। इसका प्रचार देखकर ऐसा लगता है कि योग साधना के दौरान किये जाने वाले आसन एक तरह से ऐसे व्यायाम हैं जिनसे बीमारियों का इलाज हो जाता है।  अनेक लोग तो योग शिक्षकों के पास जाकर अपनी बीमारी बताते हुए दवा के रूप में आसन की सलाह दवा के रूप में मांगते हैं।  इस तरह की प्रवृत्ति योग विज्ञान के प्रति  संकीर्ण सोच का परिचायक है जिससे उबरना होगा।  हमारे योग दर्शन में न केवल देह वरन् मानसिक, वैचारिक तथा आत्मिक शुद्धता की पहचान भी बताई जाती है जिनसे जीवन आनंद मार्ग पर बढ़ता है।

पातञ्जलयोग प्रदीप में कहा गया है कि

———————–अनित्यशुचिदःखनात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या।।

हिन्दी में भावार्थ-अनित्य, अपवित्र, दुःख और जड़ में नित्यता, पवित्रता, सुख और आत्मभाव का ज्ञान अविद्या है।

         आज भौतिकता से ऊबे लोग मानसिक शांति के लिये कुछ नया ढूंढ रहे हैं।  इसका लाभ उठाते हुए व्यवसायिक योग प्रचारक योग को साधना की बजाय सांसरिक विषय बनाकर बेच रहे हैं। हाथ पांव हिलाकर लोगों के मन में यह विश्वास पैदा किया जा रहा है कि वह योगी हो गये हैं। पताञ्जलयोग प्रदीप के अनुसार  योग न केवल देह, मन और बुद्धि का ही होता है वरन् दृष्टिकोण भी उसका एक हिस्सा है। किसी वस्तु, विषय या व्यक्ति की प्रकृृत्ति का अध्ययन कर उस पर अपनी राय कायम करना चाहिये। बाह्य रूप सभी का एक जैसा है पर आंतरिक प्रकृत्तियां भिन्न होती हैं। आचरण, विचार तथा व्यवहार में मनुष्य की मूल प्रकृत्ति ही अपना रूप दिखाती है। अनेक बार बाहरी आवरण के प्रभाव से हम किसी विषय, वस्तु और व्यक्ति से जुड़ जाते हैं पर बाद में इसका पछतावा होता है। हमने देखा होगा कि लोहे, लकड़ी और प्लास्टिक के रंग बिरंगे सामान बहुत अच्छे लगते हैं पर उनका मूल रूप वैसा नहीं होता जैसा कि दिखता है। अगर उनसे रंग उतर जाये या पानी, आग या हवा के प्रभाव से वह अपना रूप गंवा दें तब उन्हें देखने पर अज्ञान की  अनुभूति होती है।  अनेक प्रकार के संबंध नियमित नहीं रहते पर हम ऐसी आशा करते हैं। इस घूमते संसार चक्र में हमारी आत्मा ही हमारा साथी है यह सत्य ज्ञान है शेष सब बिछड़ने वाले हैं। हम बिछड़ने वाले व्यक्तियों, छूटने वाले विषयों और नष्ट होने वाली वस्तुंओं में मग्न होते हैं पर इस अज्ञान का पता योग चिंत्तन से ही चल सकता है। तब हमें नित्य-अनित्य, सुख-दुःख और जड़े-चेतन का आभास हो जाता है।

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क्रिकेट खेल बिकने वाली सेवा मान लें तो कोई समस्या नहीं-हिन्दी चिंत्तन लेख


क्रिकेट के मैच अब खिलाड़ियों के पराक्रम  से खेले नहीं जाते नहीं वरन् टीमों के स्वामियों की लिखी पटकथा के अभिनीत किये  जाते हैं। इसका पहले हमें उस समय अनुमान हुआ था जब आज से आठ दस साल पहले इसमें इसके परिणाम सट्टेबाजों के अनुसार पूर्व निर्धारित किये जाने के आरोप लगे थे। उस समय एक ऐसे मैच की बात सुनकर हंसी आई थी जिसमें खेलने वाली दोनों टीमें हारना चाहती थी।  उस समय लगातार ऐसे समाचार आये कि हमारी क्रिकेट में रुचि समाप्त हो गयी।

अब जिस तरह क्रिकेट के व्यापार से जुड़े लोगों की हरकतें दिख रही हैं उससे यह साफ होता है कि क्रिकेट खेल अब फिल्म की तरह हो गया है। क्रिकेट के व्यापार में लगे कुछ लोग जब असंतुष्ट होते हैं तो ऐसी पोल खेलते हैं कि सामान्य आदमी हतप्रभ रह जाता है।  टीवी पर आंखों देखा हाल सुना रहे अनेक पुराने क्रिकेट खिलाड़ी भी अनेक बार उत्साह में कह जाते हैं कि इसमें केवन मनोरंजन, मनोरंजन मनोंरंजन ढूंढना चाहिये।  हम जैसे लोग डेढ़ दशक से मूर्ख बनकर इसमें राष्ट्रभक्ति का भाव ढूंढते रहे। स्थिति यह रही कि क्रिकेट, फिल्म, टीवी, टेलीफोन, अखबार तथा रेडियो जैसे मनोरंजन साधनों पर कंपनी राज हो गया है।  स्वामी लोग फिल्म वालों को क्रिकेट मैच और क्रिकेट खेलने वालों ने चाहे जब नृत्य करवा लेते हैं।  टीवी के लोकप्रिय कार्यक्रमों में उनकी उपस्थिति दिखाते हैं। ऐसे में लोग भले ही फिल्म, टीवी, और क्रिकेट के लोकप्रिय नामों पर फिदा हों पर समझदार लोग उन्हें धनवान मजदूर से अधिक नहीं मानते।  हमारा  विचार तो यह है कि क्रिकेट, टीवी धारावाहिक और फिल्म में अपना दिमाग अधिक खर्च नहीं करना चाहिये।

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कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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सहज योगी उपेक्षासन करना भी सीखें-21 जून अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष हिन्दी चिंत्तन लेख


                  21 जून विश्व योग दिवस जैसे जैसे करीब आता जा रहा है वैसे वैसे भारतीय प्रचार माध्यम भारतीय अध्यात्मिक विचारधारा न मानने वाले समुदायों के कुछ लोगों को ओम शब्द, गायत्री मंत्र तथा सूर्यनमस्कार के विरोध करने के लिये बहस में निष्पक्षता के नाम पर बहसों में आगे लाकर अपने विज्ञापन का समय पास कर रहे हैं। हमारा मानना है कि भारतीय योग विद्या को विश्व पटल पर स्थापित करने के इच्छुक लोगों को ऐसी तुच्छ बहसों से दूर होना चाहिये। उन्हें विरोध पर कोई सफाई नहीं देना चाहिये।

                 योग तथा ज्ञान साधक के रूप में हमारा मानना है कि ऐसी बहसों में न केवल ऊर्जा निरर्थक जाती है वरन् तर्क वितर्क से कुतर्क तथा वाद विवाद से भ्रम उत्पन्न होता है।  भारतीय प्रचार माध्यमों की ऐसे निरर्थक बहसों से योग विश्वभर में विवादास्पद हो जायेगा। विश्व योग दिवस पर तैयारियों में लगी संस्थायें अब विरोध की सफाई की बजाय उसके वैश्विक प्रचार के लिये योग प्रक्रिया तथा विषय का प्रारूप बनाने का कार्य करें। जिन पर इस योग दिवस का जिम्मा है वह अगर आंतरिक दबावों से प्रभावित होकर योग विद्या से छेड़छाड़ करते हैं तो अपने ही श्रम को व्यथ कर देंगे।

           हम यहां बता दें कि भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा का देश में ही अधिक विरोध होता है। इसका कारण यह है कि जिन लोगों ने गैर भारतीय विचाराधारा को अपनाया है वह कोई सकारात्मक भाव नहीं रखते। इसके विपरीत यह कहना चाहिये कि नकारात्मक भाव से ही वह भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा से दूर हुए हैं।  उन्हें समझाना संभव नहीं है।  ऐसे समुदायों के सामान्य जनों को समझा भी लिया जाये पर उनके शिखर पुरुष ऐसा होने नहीं देंगे। इनका प्रभाव ही भारतीय विचाराधारा के विरोध के कारण बना हुआ है। वैसे हम एक बात समझ नहीं पाये कि आखिर चंद लोगों को गैर भारतीय विचाराधारा वाले समुदायों का प्रतिनिधि कैसे माना जा सकता है?  समझाया तो भारतीय प्रचार माध्यमों के चंद उन लोगों को भी नहीं जा सकता जो निष्पक्षता के नाम पर समाज को टुकड़ों में बंटा देखकर यह सोचते हुए प्रसन्न होते हैं कि विवादों पर बहसों से उनके विज्ञापन का समय अव्छी तरह पास हो जाता है।

           योग एक विज्ञान है इसमें संशय नहीं है। श्रीमद्भागवत गीता संसार में एक मात्र ऐसा ग्रंथ है जिसमें ज्ञान तथा विज्ञान है। यह सत्य भारतीय विद्वानों को समझ लेना चाहिये।  विरोध को चुनौती समझने की बजाय 21 जून को विश्व योग दिवस पर समस्त मनुष्य योग विद्या को सही ढंग से समझ कर इस राह पर चलें इसके लिये उन्हें मूल सामग्री उलब्ध कराने का प्रयास करना चाहिये।  विरोधियों के समक्ष उपेक्षासन कर ही उन्हें परास्त किया जा सकता है। उनमें  योग विद्या के प्रति सापेक्ष भाव लाने के लिये प्रयास करने से अच्छा है पूरी ऊर्जा भारत तथा बाहर के लोगों में दैहिक, मानसिक तथा वैचारिक रूप से स्वस्था रहने के इच्छुक लोगों को जाग्रत करने में लगायी जाये।

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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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हर विषय पर योग दृष्टि से विचार करें-21 जून विश्व योग दिवस पर विशेष लेख


       पूरे विश्व में 21 जून को योग दिवस मनाया जा रहा है। इसका प्रचार देखकर ऐसा लगता है कि योग साधना के दौरान किये जाने वाले आसन एक तरह से ऐसे व्यायाम हैं जिनसे बीमारियों का इलाज हो जाता है।  अनेक लोग तो योग शिक्षकों के पास जाकर अपनी बीमारी बताते हुए दवा के रूप में आसन की सलाह दवा के रूप में मांगते हैं।  इस तरह की प्रवृत्ति योग विज्ञान के प्रति  संकीर्ण सोच का परिचायक है जिससे उबरना होगा।  हमारे योग दर्शन में न केवल देह वरन् मानसिक, वैचारिक तथा आत्मिक शुद्धता की पहचान भी बताई जाती है जिनसे जीवन आनंद मार्ग पर बढ़ता है।

पातञ्जलयोग प्रदीप में कहा गया है कि
———————–
अनित्यशुचिदःखनात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या।।

हिन्दी में भावार्थ-अनित्य, अपवित्र, दुःख और जड़ में नित्यता, पवित्रता, सुख और आत्मभाव का ज्ञान अविद्या है।

         आज भौतिकता से ऊबे लोग मानसिक शांति के लिये कुछ नया ढूंढ रहे हैं।  इसका लाभ उठाते हुए व्यवसायिक योग प्रचारक योग को साधना की बजाय सांसरिक विषय बनाकर बेच रहे हैं। हाथ पांव हिलाकर लोगों के मन में यह विश्वास पैदा किया जा रहा है कि वह योगी हो गये हैं। पताञ्जलयोग प्रदीप के अनुसार  योग न केवल देह, मन और बुद्धि का ही होता है वरन् दृष्टिकोण भी उसका एक हिस्सा है। किसी वस्तु, विषय या व्यक्ति की प्रकृृत्ति का अध्ययन कर उस पर अपनी राय कायम करना चाहिये। बाह्य रूप सभी का एक जैसा है पर आंतरिक प्रकृत्तियां भिन्न होती हैं। आचरण, विचार तथा व्यवहार में मनुष्य की मूल प्रकृत्ति ही अपना रूप दिखाती है। अनेक बार बाहरी आवरण के प्रभाव से हम किसी विषय, वस्तु और व्यक्ति से जुड़ जाते हैं पर बाद में इसका पछतावा होता है। हमने देखा होगा कि लोहे, लकड़ी और प्लास्टिक के रंग बिरंगे सामान बहुत अच्छे लगते हैं पर उनका मूल रूप वैसा नहीं होता जैसा कि दिखता है। अगर उनसे रंग उतर जाये या पानी, आग या हवा के प्रभाव से वह अपना रूप गंवा दें तब उन्हें देखने पर अज्ञान की  अनुभूति होती है।  अनेक प्रकार के संबंध नियमित नहीं रहते पर हम ऐसी आशा करते हैं। इस घूमते संसार चक्र में हमारी आत्मा ही हमारा साथी है यह सत्य ज्ञान है शेष सब बिछड़ने वाले हैं। हम बिछड़ने वाले व्यक्तियों, छूटने वाले विषयों और नष्ट होने वाली वस्तुंओं में मग्न होते हैं पर इस अज्ञान का पता योग चिंत्तन से ही चल सकता है। तब हमें नित्य-अनित्य, सुख-दुःख और जड़े-चेतन का आभास हो जाता है।

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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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वादों के महारथी-हिंदी व्यंग्य कविता


दिखाते हैं हमदर्दी पर दर्द से उनका संबंध नहीं है,

रोज नये वादे करने के महाराथी पर वफा के पाबंद नहीं है।

वाक्पटुता के लिये मशहूर है वह पर शब्द सृजन नहीं करते,

इधर उधर से चुराकर कविता अपनी जुबान में  ही भरते।

रेतीली जमीन पर आम उगाने की हमेशा वह करेंगे बात,

दिन में लोगों के दर्दे पर बोलते पर  भुला देती उनको रात।

चलता रहेगा लोगों के जज़्बात से खेलने का सिलसिला,

लोग सौंप रहे शातिरों को दान पेटी किससे करेंगे गिला।

कहें दीपक बापू धोखे की आग के उनको कभी जलना ही होगा

टूटे इंसानों की आह से उनके स्वाह होने के रास्ते बंद नहीं है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””
Gwalior, madhyapradesh

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आदमी और पाखंड-हिंदी कविता


दौलत के भंडार है उनके घर

पर जिस्म में ताकतवर जान नहीं है,

महापुरुषों की  तस्वीरों पर

चढ़ाते हैं दिखावे के लिये  माला

पर दिल में उनके लिये मान नहीं है,

सारे जहान में फैला है पाखंड

दिखना चाहते हैं शानदार वह लोग

जिनकी आंखों में किसी की शान नहीं है।

कहें दीपक बापू

मजदूर ने तराशा जिस पत्थर को

अपनी पसीने से तराशा

बन गया भगवान,

पड़ा रहा जो रास्ते पर

बना रहा दुनियां में अनजान,

जिनके पेट भरे हैं

उनकी चिंता सभी करते हैं

परिश्रम करने वालों को पूरी रोटी मिले

इससे आंखें फेरते है

स्वर्ग की चिंता में जिंदगी

दाव पर लगाते हैं लोग

जिसका किसी को ज्ञान नहीं है,

दिवंगतों की तस्वीर के  आगे सिर झुकाते लोग

शोकाकुल सुरत से श्रद्धा निभाते

भले ही उनकी बनती  शान नहीं है।

————–

 लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

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समाज से पहले अपने को सुधारें-हिन्दी लेख


                        हम अपने समाज में रामराज्य की कल्पना कर सकते हैं पर उसे धरातल पर लाना लगभग असंभव है।  कम से कम श्रीमद्भागवत गीता के अध्ययन करने पर तो कोई साधक इस तरह का विचार व्यक्त कर सकता है। उसमें कहा गया है कि इस संसार में दैवीय तथा आसुरीय तो प्रकार के मनुष्य होते हैं। इससे हम यूं भी मान सकते हैं कि इस संसार में दोनों प्रकार के लोग सदैव उपस्थित रहेंगे ही चाहे कोई माने या माने।  इतना ही नहीं दैवीय प्रकृत्ति के लोगों में भी सात्विक, राजस तथा तामस प्रकृत्ति के लोग हमेशा ही अपने स्वभाव के अनुसार सक्रिय पाये जायेंगे।  इस आधार हम कह सकते हैं कि समूची मानव जाति एक ही रंग में रंगी जाये यह संभव नहीं है।

                        समाज में कथित लोग समाज में  सुधार लाने के प्रयासों में लगे बुद्धिमान लोग इस विचार को निराशाजनक विचार मान सकते हैं पर ज्ञान साधकों के लिये यही संसार का सत्य है। यह सत्य उनमें स्वयं को ही सुधारने के लिये प्रेरित करता है।  ज्ञान साधकों को जब यह आभास होने लगता है कि इस संसार का निर्माण जिस तरह परामात्मा के संकल्प के आधार पर हुआ है उसी तरह वह भी अपने देहकाल में संकल्प के आधार अपने आसपास शुद्ध वातावरण का निर्माण करें। वह संसार में दूसरे लोगों  को सुधार कर उन्हें अपने अनुकूल लाने की अपेक्षा अपने अंदर ऐसी शक्ति पैदा करते हैं कि प्रतिकूल व्यक्ति और स्थिति उनके अनुकूल हो जाये।  वह किसी के लिये मन में द्वेष, ईर्ष्या और घृणा का भाव नहीं पालते। कोई दूसरा उनके प्रति कुविचार रखता है तो उसे आसुरीय प्रवृत्तियों के वशीभूत मानकर क्षमा कर देते हैं।  किसी का परोपकार करें या नहीं पर किसी का अपकार करने का विचार हृदय में भी नहीं लाते।  किसी के कठोर वचनों के उत्तर में भी मधुर वचन में बात करते हैं।  प्रमाद या आलस्य से परे होकर सदैव सकारात्मक कार्यों में लगे रहते हैं।  इससे उनके व्यक्तित्व की धवल छवि का निर्माण होता है जिससे कालांतर में उनको सम्मान मिलता है।

                        इसके विपरीत जो अज्ञानी हैं वह बिना कुछ किए ही सम्मान पाना चाहते हैं। कुछ लोग धन, मित्र और सहायकों का समुदाय एकत्रित कर यह समझते हैं कि उनका तो स्वतः ही समाज में सम्मान होगा तो यह उनका भ्रम है।  ऐसे लोगों को सम्मान पाने की भावना अंध कर देती है और किसी से प्रतिकूल व्यवहार मिलने पर वह हिंसा पर उतर आते हैं। हम आज समाज में जो हिंसक वातावरण देख रहे हैं वह राजसी लोगों की आक्रामकता और तामसी प्रवृत्ति लोगों के बौद्धिक आलस्य का परिणाम है।  सात्विक लोगों की संख्या कम है पर आज के भौतिकतावादी युग में कोई उन्हें साथ रखना नहीं चाहता।  सात्विक लोगों का ध्येय वैसे भी समाज में हर विषय पर टांग फंसाकर प्रतिष्ठा अर्जित  करना नहीं होता। वह जानते हैं कि हमारे समाज में समस्या विचारों के संकट की नहीं वरन्् उसे धारण करने की प्रवृत्ति का अभाव है।  ज्ञान चर्चा बहुत होती है पर उसे धारण करने की न लोगों में शक्ति है न उनके पास ऐसा संकल्प है। निकट भविष्य में लोग ज्ञान के आचरण की तरफ प्रवृत्त होंगे इसकी संभावना लगती भी नहीं है। समाज अपने साथ विध्वसंक तत्व लेकर चल रहा है और हम मानते हैं कि आगे हालात अधिक खराब होने वाले हैं।  यह अलग बात है कि समाज में पेशेवर समाज सेवक के सुधार का  नाटक भी जमकर चल रहा है।  हमने देखा है कि अनेक कथित सुधारक समाज में व्याप्त अंधविश्वास का विरोध करते हैं पर मनुष्य में मन में कोई विश्वास का बीज कैसे बोया जाये इस विषय पर खामोश रहते हैं। 

                        बहरहाल समाज की समस्याओं को दूर करने की बजाय अपने सुधार पर अधिक ध्यान देना चाहिये। सबसे बड़ी बात यह है कि हमें अपने शुद्ध विचार रखने और  सुखद कल्पनायें करने के साथ ही अपने अंदर एक दृढ़ संकल्प स्थापित करना चाहिये। हम बाहर जैसा वातावरण देखना चाहते हैं उसे पहले अपने अंतर्मन में संकल्प कर स्थापित करना होगा।  आजकल के तनावपूर्ण वातावरण से प्रथक होकर एकांत में शुद्ध स्थान पर ध्यान करते हुए इस बात पर विचार करना चाहिये कि हम किस तरह अपना जीवन सफल करें।

 लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

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जिंदगी का हिसाब-हिंदी व्यंग्य कविता


कुदरत की अपनी चाल है

इंसान की अपनी चालाकियां है,

कसूर करते समय

सजा से रहते अनजान

यह अलग बात है कि

सर्वशक्तिमान की सजा की भी बारीकियां हैं,

दौलत शौहरत और ओहदे की ऊंचाई पर

बैठकर इंसान घमंड में आ ही जाता है,

सर्वशक्तिमान के दरबार में हाजिरी देकर

बंदों में खबर बनकर इतराता है,

आकाश में बैठा सर्वशक्तिमान भी

गुब्बारे की तरह हवा भरता

इंसान के बढ़ते कसूरों पर

बस, मुस्कराता है

फोड़ता है जब पाप का घड़ा

तब आवाज भी नहीं लगाता है।

कहें दीपक बापू

अहंकार ज्ञान को खा जाता है,

मद बुद्धि को चबा जाता है,

अपने दुष्कर्म पर कितनी खुशफहमी होती लोगों को

किसी को कुछ दिख नहीं रहा है,

पता नहीं उनको कोई हिसाब लिख रहा है,

गिरते हैं झूठ की ऊंचाई से लोग,

किसी को होती कैद

किसी को घेर लेता रोग

उनकी हालत पर

जमीन पर खड़े इंसानों को तरस ही जाता है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Gwalior, madhyapradesh

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माया का तिलिस्म-हिंदी व्यंग्य कविता


देश में तरक्की बहुत हो गयी है

यह सभी कहेंगे,

मगर सड़कें संकरी है

कारें बहुत हैं

इसलिये हादसे होते रहेंगे,

रुपया बहुत फैला है बाज़ार में

मगर दौलत वाले कम हैं,

इसलिये लूटने वाले भी

उनका बोझ हल्का कर

स्वयं ढोते रहेंगे।

कहें दीपक बापू

टूटता नहीं तिलस्म कभी माया का,

पत्थर पर पांव रखकर

उस सोने का पीछा करते हैं लोग

जो न कभी दिल भरता

न काम करता कोई काया का,

फरिश्ते पी गये सारा अमृत

इंसानों ने शराब को संस्कार  बना लिया,

अपनी जिदगी से बेजार हो गये लोगों ने

मनोरंजन के लिये

सर्वशक्तिमान की आराधना को

खाली समय

पढ़ने का किस्सा बना लिया,

बदहवास और मदहोश लोग

आकाश में उड़ने की चाहत लिये

जमीन पर यूं ही गिरते रहेंगे।

—————-

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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शांति और हथियार के सौदागर-हिंदी व्यंग्य कविता


 

जंग के लिये जो अपने  घर में हथियार बनाते हैं,

बारूद का सामान बाज़ार में  लोगों को थमाते हैं।

दुनियां में उठाये हैं वही शांति का झंडा अपने हाथ

खून खराबा कहीं भी हो, आंसु बहाने चले आते हैं।

कहें दीपक बापू, सबसे ज्यादा कत्ल जिनके नाम

इंसानी हकों के समूह गीत वही दुनियां में गाते हैं।

पराये पसीने से भरे हैं जिन्होंने अपने सोने के भंडार

गरीबों के भले का नारे वही जोर से सुनाते हैं।

अपनी सोच किसको कब कहां और  कैसे सुनायें

चालाक सौदागरों के जाल में लोग खुद ही फंसे जाते हैं।

खरीद लिये हैं उन्होंने बड़े और छोटे रुपहले पर्दे

इसलिये कातिल ही फरिश्ते बनकर सामने आते हैं।

——————-

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

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बीमार बन गए चिकित्सक -हिंदी व्यंग्य कविता


इस जहान में आधे से ज्यादा लोग

चिकित्सक हो गये हैं,

अपनी बीमारियों की दवायें खाते खाते

इतना अभ्यास कर लिया है कि

वह बीमारी और दवा के बीच

अपना अस्तित्व खो रहे हैं,

बताते हैं दूसरों को दवा

भले कभी खुद ठीक न हो रहे हों।

कहें दीपक बापू

अपनी छींक आते ही हम

रुमाल लगा लेते हैं

इस भय से कि कोई देखकर

दुःखी हो जायेगा,

बड़ी बीमारी का भय दिखाकर

बड़े चिकित्सक का रास्ता बतायेगा,

सत्संग में भी सत्य पर कम

मधुमेह पर चर्चा ज्यादा होती है,

सर्वशक्तिमान से ज्यादा

दवाओं  पर बात  होती है,

कितनी बीमारियां

कितनी दवायें

बीमार समाज देखकर लगता है

छिपकर खुशी की सांस ली जाये,

लाचार शरीर में लोग

ऊबा हुआ मन ढो रहे हैं,

बीमार खुश है अपनी बीमारी और दवाओं पर

भीड़ में सत्संग कर

यह सोचते हुए कि

वह स्वास्थ्य का बीज बो रहे हैं।

 लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

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लुटेरों की खता नही है-हिंदी व्यंग्य कविता


दौलत की दौड़ में बदहवास है पूरा जमाना

या धोखा है हमारे नजरिये में

यह हमें भी पता नहीं है,

कभी लोगो की चाल पर

कभी अपने ख्याल पर

शक होता है

दुनियां चल रही अपने दस्तूर से दूर

सवाल उठाओ

जवाब में होता यही दावा

किसी की भी खता नहीं है।

कहें दीपक बापू

शैतान धरती के नीचे उगते हैं,

या आकाश से ज़मीन पर झुकते हैं,

सभी चेहरे सफेद दिखते हैं,

चमकते मुखौटे बाजार में बिकते हैं,

उंगली उठायें किसकी तरफ

सिलसिलेवार होते कसूर पर

इंसानियत की दलीलों से जहन्नुम में

जन्नत की तलाश करते लोगों की नज़र में

पहरेदार की तलाशी होना चाहिये पहले

कहीं अस्मत लुटी,

कहीं किस्मत की गर्दन घुटी,

लुटेरों की खता नही है।

————–

 

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

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हिंदी दिवस पर हास्य कविता-राष्ट्रभाषा का महत्व अंग्रेजी में समझाते


हिन्दी दिवस हर बार

यूं ही मनाया जायेगा,

राष्ट्रभाषा का महत्व

अंग्रेजी में बोलेंगे बड़े लोग

कहीं हिंग्लिश में

नेशनल लैंग्वेज का इर्म्पोटेंस

मुस्कराते समझाया जायेगा।

कहें दीपक बापू

पता ही नहीं लगता कि

लोग तुतला कर बोल रहे हैं

या झुंझला कर भाषा का भाव तोल रहे हैं,

हिन्दी लिखने वालों को

बोलना भी सिखाया जायेगा,

हमें तसल्ली है

अंग्रेजी में रोज सजती है महफिलें

14 सितम्बर को हिन्दी के नाम पर

चाय, नाश्ता और शराब का

दौर भी एक दिन चल जायेगा।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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हिन्दी दिवस पर विशेष निबंध लेख-अध्यात्म की भाषा हिन्दी को चाटुकार संबल नहीं दे सकते


                        14 सितम्बर 2013 को एक बार फिर हिन्दी दिवस मनाया जा रहा है।  इस अवसर पर सरकारी तथा अर्द्धसरकारी तथा निजी संस्थाओं में कहीं हिन्दी सप्ताह तो कही पखवाड़ा मनाया जायेगा।  इस अवसर पर सभी जगह जो कार्यक्रम आयोजित होंगे उसमें निबंध, कहानी तथा कविता लेखन के साथ ही वादविवाद प्रतियोगितायें होंगी। कहीं परिचर्चा आयोजित होगी।  अनेक लोग भारत में हिन्दी दिवस मनाये जाने पर व्यंग्य करते हैं। उनका मानना है कि यह देश के लिये दुःखद है कि राष्ट्रभाषा के लिये हमें एक दिन चुनना पड़ता है।  उनका यह भी मानना है कि हिन्दी भाषा अभी भी अंग्रेजी के सामने दोयम दर्जे की है।  कुछ लोग तो अब भी हिन्दी को देश में दयनीय स्थिति में मानते हैं। दरअसल ऐसे विद्वानों ने अपने अंदर पूर्वाग्रह पाल रखा है। टीवी चैनल, अखबार तथा पत्रिकाओं में उनके लिये छपना तो आसान है पर उनका चिंत्तन और दृष्टि आज से पच्चीस या तीस वर्ष पूर्व से आगे जाती ही नहीं है।  ऐसे विद्वानों को मंच भी सहज सुलभ है क्योंकि हिन्दी का प्रकाशन बाज़ार उनका प्रयोजक है। इनमें से कई तो ऐसे हैं जो हिन्दी लिखना ही नहीं जानते बल्कि उनके अंग्रेजी में लिखे लेख हिन्दी प्रकाशनों में अनुवाद के साथ आते हैं। उनका सरोकार केवल लिखने से है। एक लेखक का इससे ज्यादा मतलब नहीं होना चाहिये पर शर्त यह है कि वह समय के बदलाव के साथ अपना दृष्टिकोण भी बदले।

                        एक संगठित क्षेत्र का लेखक कभी असंगठित लेखक के साथ बैठ नहीं सकता।  सच तो यह है कि जब तक इंटरनेट नहीं था हमें दूसरे स्थापित लेखकों को देखकर निराशा होती थी पर जब इस पर लिखना प्रारंभ किया तो इससे बाहर प्रकाशन में दिलचस्पी लेना बंद कर दिया।  यहां लिखने से पहले हमने बहुत प्रयास किया कि भारतीय हिन्दी क्षितिज पर अपना नाम रोशन करें पर लिफाफे भेज भेजकर हम थक गये।  सरस्वती माता की ऐसी कृपा हुई कि हमने इंटरनेट पर लिखना प्रारंभ किया तो फिर बाहर छपने का मोह समाप्त हो गया।  यहंा स्वयंभू लेखक, संपादक, कवित तथा चिंत्तक बनकर हम अपना दिल यह सोचकर ठंडा करते हैं कि चलो कुछ लोग तो हमकों पढ़ ही रहे हैं।  कम से कम हिन्दी दिवस की अवधि में हमारे ब्लॉग जकर हिट लेते हैं।  दूसरे ब्लॉग  लेखकों का पता नहीं पर इतना तय है कि भारतीय अंतर्जाल पर हिन्दी की तलाश करने वालों का हमारे ब्लॉग से जमकर सामना होता है।  दरअसल निबंध, कहानी, कविता तथा टिप्पणी लिखने वालों को अपने लिये विषय चाहिये।  वादविवाद प्रतियोगिता में भाग लेने वाले युवाओं तथा परिचर्चाओं में बोलने वाले विद्वानों को हिन्दी विषय पर पठनीय सामग्रंी चाहिये और अब किताबों की बजाय ऐसे लोग इंटरनेट की तरफ आते हैं।  सर्च इंजिनों में उनकी तलाश करते हुए हमारे बलॉग उनके सामने आते हैं।  यही बीस ब्लॉग बीस  किताब की तरह हैं।  यही कारण है कि हम अब अपनी किताब छपवाने का इरादा छोड़ चुके हैं।  कोई प्रायोजक हमारी किताब छापेगा नहीं और हमने छपवा लिये तो हमारा अनुमान है कि हम हजार कॉपी बांट दें पर उसे पढ़ने वाले शायद उतने न हों जितना हमारी एक कविता यहां छपते ही एक दिन में लोग पढ़ते हैं।  इतना ही नहीं हमारे कुछ पाठ तो इतने हिट हैं कि लगता है कि उस ब्लॉग पर बस वही हैं।  अगर वह पाठ  हम किसी अखबार में छपवाते तो उसे शायद इतने लोग नहीं देखते जितना यहां अब देख चुके हैं। आत्ममुग्ध होना बुरा हेाता है पर हमेशा नहीं क्योंकि अपनी अंतर्जालीय यात्रा में हमने देख लिया कि हिन्दी के ठेकेदारों से अपनी कभी बननी नहीं थी।  यहां हमें पढ़ने वाले जानते हैं कि हम अपने लिखने के लिये बेताब जरूर रहते हैं पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि हमें कोई प्रचार की भूख है।  कम से कम इस बात से  हमें तसल्ली है कि अपने समकालीन हिन्दी लेखकों में स्वयं ही अपनी रचना टाईप कर लिखने की जो कृपा प्राकृतिक रूप से हुई है कि हम  उस पर स्वयं भी हतप्रभ रह जाते हैं क्योंकि जो अन्य लेखक हैं वह इंटरनेट पर छप तो रहे हैं पर इसके लिये उनको अपने शिष्यों पर निर्भर रहना पड़ता है।  दूसरी बात यह भी है कि टीवी चैनल ब्लॉग, फेसबुक और ट्विटर जैसे अंतर्जालीय प्रसारणों में वही सामग्री उठा रहे हैं जो प्रतिष्ठत राजनेता, अभिनेता या पत्रकार से संबंधित हैं।  यह सार्वजनिक अंतर्जालीय प्रसारण पूरी तरह से बड़े लोगों के लिये है यह भ्रम बन गया है।  अखबारों में भी लोग छप रहे हैं तो वह अंतर्जालीय प्रसारणों का मोह नहीं छोड़ पाते।  कुछ मित्र पाठक पूछते हैं कि आपके लेख किसी अखबार में क्या नहीं छपतें? हमारा जवाब है कि जब हमारे लिफाफोें मे भेजे गये लेख नहीं छपे तो यहां से उठाकर कौन छापेगा?  जिनके अंतर्जालीय प्रसारण अखबारों या टीवी में छप रहे हैं वह संगठित प्रकाशन जगत में पहले से ही सक्रिय हैं। यही कारण है कि अंतर्जाल पर सक्रिय किसी हिन्दी लेखक को राष्ट्रीय क्षितिज पर चमकने का भ्रम पालना भी नहीं चाहिये।  वह केवल इंटरनेट के प्रयोक्ता हैं। इससे ज्यादा उनको कोई मानने वाला नहीं है।

                        दूसरी बात है कि मध्यप्रदेश के छोटे शहर का होने के कारण हम जैसे लेखको यह आशा नहीं करना चाहिये कि जिन शहरों या प्रदेशों के लेखक पहले से ही प्रकाशन जगत में जगह बनाये बैठे हैंे वह अपनी लॉबी से बाहर के आदमी को चमकने देंगे।  देखा जाये तो क्षेत्रवाद, जातिवाद, धर्म तथा विचारवाद पहले से ही देश में मौजूद हैं अंतर्जाल पर हिन्दी में सक्रिय लेाग उससे अपने को अलग रख नहीं पाये हैं।  अनेक लोगों से मित्र बनने का नाटक किया, प्रशंसायें की और आत्मीय बनने का दिखावा किया ताकि हम मुफ्त में यहां लिखते रहें।  यकीनन उन्हें कहीं से पैसा मिलता रहा होगा।  वह व्यवसायिक थे हमें इसका पता था पर हमारा यह स्वभाव है कि किसी के रोजगार पर नज़र नहीं डालते।  अब वह सब दूर हो गये हैं।  कई लोग तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर को होने का दावा भी करने लगे हैं पर उनका मन जानता है कि वह इस लेखक के मुकाबले कहां हैं? वह सम्मान बांट रहे हैं, आपस में एक दूसरे की प्रशंसा कर रहे हैं। कभी हमारे प्रशंसक थे अब उनको दूसरे मिल गये हैं। चल वही रहा है अंधा बांटे रेवड़ी चीन्ह चीन्ह कर दें।  दरअसल वह इंटरनेट पर हिन्दी फैलाने से अधिक अपना हित साधने में लगे हैं। यह बुरा नहीं है पर अपने दायित्व को पूरा करते समय अपना तथा पराया सभी का हित ध्यान में न रखना अव्यवसायिकता है। पैसा कमाते सभी है पर सभी व्यवसायी नहीं हो जाते। चोर, डाकू, ठग भी पैसा कमाते हैं।  दूसरी बात यह कि कहीं एक ही आदमी केले बेचने वाला है तो उसे व्यवसायिक कौशल की आवश्यकता नहीं होती। उसके केले बिक रहे हैं तो वह भले ही अपने व्यवसायिक कौशल का दावा करे पर ग्राहक जानता है कि वह केवल लाभ कमा रहा है।  अंतर्जाल पर हिन्दी का यही हाल है कि कथित रूप से अनेक पुरस्कार बंट जाते हैं पर देने वाला कौन है यह पता नहीं लगता।  आठ दस लोग हर साल आपस में ही पुरस्कार बांट लेते हैं।  हमें इनका मोह नहीं है पर अफसोस इस बात का है कि यह सब देखते हुए हम किसी दूसरे लेखक को यहां लिखने के लिये प्रोत्साहित नहीं कर पाते।  हमारे ब्लॉगों की पाठक संख्या चालीस लाख पार कर गयी है। यह सूचना हम देना चाहते हैं। इस पर बस इतना ही।  हिन्दी दिवस पर कोई दूसरा तो हमें पूछेगा नहंी इसलिये अपना स्म्मान स्वयं ही कर दिल बहला रहे हैं। 

 

 लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

 

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

 

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
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सूरज की रौशनी में-हिंदी व्यंग्य कविता


रोज पर्दे पर देखकर उनके चेहरे

मन उकता जाता है,

जब तक दूर थे आंखों से

तब तक उनकी ऊंची अदाओं का दिल में ख्वाब था,

दूर के ढोल की तरह उनका रुआब था,

अब देखकर उनकी बेढंगी चाल,

चरित्र पर काले धब्बे देखकर होता है मलाल,

अपने प्रचार की भूख से बेहाल

लोगों का असली रूप  बाहर आ ही जाता है।

कहें दीपक बापू

बाज़ार के सौदागर

हर जगह बैठा देते हैं अपने बुत

इंसानों की तरह जो चलते नज़र आते हैं,

चौराहों पर हर जगह लगी तस्वीर

सूरज की रौशनी में

रंग फीके हो ही जाते हैं,

मुख से बोलना है उनको रोज बोल,

नहीं कर सकते हर शब्द की तोल,

मालिक के इशारे पर उनको  कदम बढ़ाना है,

कभी झुकना तो कभी इतराना है,

इंसानों की आंखों में रोज चमकने की उनकी चाहत

जगा देती है आम इंसान के दिमाग की रौशनी

कभी कभी कोई हमाम में खड़े

वस्त्रहीन चेहरों पर नज़र डाल ही जाता है,

एक झूठ सौ बार बोलो

संभव है सच लगने लगे

मगर चेहरों की असलियत का राज

यूं ही नहीं छिप पाता है।

——————

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”,Gwalior madhya pradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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क्रिकेट में सिर पर सवार पैसा-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन


        इस समय इंग्लैंड में चैम्पियन ट्राफी क्रिकेट प्रतियोगिता चल रही है। इसमें बीसीसीआई की टीम जोरदार प्रदर्शन करते हुए आगे बढ़ती जा रही है। अनेक क्रिकेट विशेषज्ञ चकित हैं। बीसीसीआई के क्रिकेट खिलाड़ी जिस तरह तूफानी बल्लेबाजी कर रहे है तो दूसरी टीमों के खिलाड़ी धीमे धीमे चल रहे हैं उससे लगता है कि जैसे पिचें अलग अलग हैं। कभी कभी लगता है कि बल्ला या गेंदें भी अलग अलग हैं। मतलब यह कि भारतीय बल्लेबाज दूसरों के मुकाबले ज्यादा आक्रामक हैं। किसी के समझ में नहीं आ रहा है।

          हम समझाते हैं कि आखिर मामला क्या है? गुरुगोविंद सिंह ने कहा है कि पैसा बहुत जरूरी चीज है पर खाने के लिये दो रोटी चाहिये। मतलब यह कि जिंदगी में पैसा जरूरी है।  एक विद्वान कहते हैं कि पैसा कुछ हो या न हो पर जीवन में आत्मविश्वास का बहुत बड़ा स्तोत्र होता है।  जी हां, आईपीएल में बीसीसीआई की टीम के बल्लेबाजों ने जमकर पैसा कमाया है।  यह उनके आत्मविश्वास का ही  कारण बन गया है।  उनको मालुम है कि हमारे पास पैसा बहुत है और यह भाव उनको आक्रामक बना देता है। सीधी बात कहें कि पैसा सिर चढ़कर बोलता है।  हम यहां बीसीसीआई के खिलाडियों की आलोचना नहीं कर रहे बल्कि यह बता रहे हैं कि जिस तरह अन्य टीमों के खिलाड़ी बुझे मन से खेल रहे हैं उससे तो यही लगता है कि उनमें वैसा विश्वास नहीं है जैसा बीसीसीाआई की टीम में हैं। इसे कहते हैं कि पैसा सिर चढ़कर बोलता है।

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja ‘Bharatdeep’

Gwalior, Madhya Pradesh

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दरबारी बुत-हिन्दी कविता


एक दूसरे के तख्ते बजाते लोग
किसी ऊंचे तख्त पर होंगे विराजमान
फिर हथियारों के पहरे में
अपनी ढपली अपना राग बजायेंगे।
सस्ते तोहफे से बनाकर लोगों को बुत
कर लेंगे दुनियां अपनी मुट्ठी में
अपने ही दरबार में उनको सजायेंगे।
कहें दीपक बापू
ज़माने का भला करने वाले ठेकेदार
फैले हें चारों ओर
उनके दाव से कब तक खुद को बचायेंगे।

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

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खबरों का बाज़ार-हिन्दी व्यंग्य कविता


कुछ खबरें खुशी में झुलाती हैं,

कुछ खबरें जोर से रुलाती हैं।

कमबख्त!

किस पर देर तक गौर करें

अपनी खूंखार असलियतें भी

जल्दी से अपनी तरफ बुलाती हैं।

कहें दीपक बापू

खबरचियों का धंधा है

लोगों के जज़्बातों से खेलना,

कभी होठों में हंसी लाने की कोशिश होती

कभी शुरु होता आंखों में आंसु पेलना,

बिकने के लिये बाज़ार में बहुत सामान है,

ग्राहक खुश है खरीद कर शान में,

हमारे जज़्बातों से न कर पाये खिलवाड़ कोई

इसलिये फेर लेते हैं नज़रे

विज्ञापनों में दिखने वाली सुंदरियों से

खबर और बहस के बीच कंपनियों के

उत्पाद बिकवाने के लिये

अपने हाथ में झुलाती हैं।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””

Gwalior, madhyapradesh

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खुद के लिये कमाई और दूसरे पर हंसना संसार के दो सरल काम-हिन्दी चिंत्तन लेख


       आदमी का मन उसे भटकाता है।  थोड़ा है तो आदमी दुःखी है और ज्यादा है तो भी खुश नहीं है। धन, संपदा तथा पद अगर कम है तो आदमी इस बात का प्रयास करता है कि उसमें वृद्धि हो।  यदि वह सफलता के चरमोत्कर्ष है तो वह उसका मन इस  चिंता में घुलता है कि वह किसी भी तरह अपने वैभव की रक्षा  करता रहे।

           कहा जाता है कि दूसरे की दौलत बुद्धिमान को चार गुनी और मूर्ख को सौ गुनी दिखाई देती है।  इसका मतलब यह है कि मायावी संसार बुद्धिमान को भी विचलित करता है भले ही मूर्ख की अपेक्षा उसके तनाव की मात्रा कम हो।  कुछ महानुभाव अच्छा काम करने के इच्छुक हैं तो समय नहीं मिलता और समय मिलता है तो उनका मन नहीं करता।

   एक सज्जन उस दिन अपनी शारीरिक व्याधियों का बखान दूसरे सज्जन से कर  रहे थे।  पैर से शुरु हुए तो सिरदर्द कर ही दम लिया।  दूसरे सज्जन ने कहा-‘‘यार, आप सुबह उठकर घूमा करो। हो सके तो कहीं योग साधना का अभ्यास करो।’’

      पहले सज्जन ने कहा-‘‘कैसे करूं? रात को देर से सोता हूं!  दुकान से से घर दस बजे आता हूं। फिर परिवार के सदस्यों से बात करने में ही दो बज जाते हैं। किसी भी हालत में सुबह आठ बजे से पहले उठ नही सकता।

      दूसरे सज्जन ने कहा-‘‘अब यह तो तुम्हारी समस्या है। बढ़ती  उम्र के साथ शारीरिक व्याधियां बढ़ती ही जायेंगी।  अब तो तरीका यह है कि दुकान से जल्दी आया करो। अपने व्यापार का कुछ जिम्मा अपने लड़के को सौंप दो।  दूसरा उपाय यह है कि रात को जल्दी सोकर सुबह जल्दी उठने का प्रयास करो।  बाहर से घूमकर आओ और चाय के समय परिवार के सदस्यों से बातचीत करो।

      पहले सज्जन ने कहा-‘‘बच्चे को तो मैं इंजीनियरिंग पढ़ा रहा हूं।  मैं नहीं चाहता कि बच्चा व्यापार में आये।  व्यापार की अब कोई इज्जत नहीं बची है। कहीं अच्छी नौकरी मिल जायेगी तो उसकी भी जिंदगी में चमक होगी।’’

         दूसरे सज्जन ने कहा-‘‘अगर बच्चे को इंजीनियर बनाना है तो फिर इतना कमाना किसके लिये? तुम दुकान से जल्दी आ जाया करो।’’

      पहले सज्जन ने कहा-‘‘यह नहीं हो सकता।  भला कोई अपनी कमाई से मुंह कैसे मोड़ सकता है।

         दूसरे सज्जन ने एक तीसरे सज्जन का नाम लेकर कहा-‘‘हम दोनों के ही  एक मित्र ने भी अपनी बच्चे को चिकित्सा शिक्षा के लिये भेजा है। अब वह जल्दी घर आ जाता है। सुबह उठकर उसे उद्यान में घूमने जाते मैंने  कई बार देखा है।’’

         पहले सज्जन ने कहा-‘‘अरे, उसकी क्या बात करते हो? उसकी दुकान इतनी चलती कहां है? उसने अपनी जिंदगी में कमाया ही क्या है? वह मेरे स्तर का नहीं है।  तुम भी किसकी बात लेकर बैठ गये। मैं अपनी बीमारियों के बारे में तुमसे उपाय पूछ रहा हूं और तुम हो कि उसे बढ़ा रहे हो।’

             दूसरे सज्जन ने हंसते हुए कहा-‘‘तुम्हारी बीमारयों का कोई उपाय मेरे पास तो नहीं है।  किसी चिकित्सक के पास जाओ।  मैं तुम्हें गलत सलाह दे बैठा।  दरअसल इस संसार में मन लगाने के लिये दो बढ़िया साधन हैं एक है कमाना दूसरा परनिंदा करना। कुछ लोगों के लिये तीसरा काम है मुफ्त में सलाह देना जिसकी गलती मैं कर ही चुका।’’

          वास्तव में हर आदमी राजनीति, धर्म, अर्थ, फिल्म, साहित्य तथा कला के क्षेत्रों पर स्थित प्रतिष्ठित लोगों को देखकर उन जैसा बनने का विचार तो करता है पर उसके लिये जो निज भावों का त्याग और परिश्रम चाहिये उसे कोई नहीं करना चाहता।  जिन लोगों को प्रतिष्ठत क्षेत्रों में सफलता मिली है उन्होंने पहले अपने समय का कुछ भाग मुफ्त में खर्च किया होता है।  जबकि सामान्य हर आदमी हर पल अपनी सक्रियता का दाम चाहता है। कुछ लोग तो पूरी जिंदगी परिवार के भरण भोषण में इस आशा के साथ गुजार देते है कि वह उनसे फुरसत पाकर कोई रचनात्मक कार्य करेंगे।  हालांकि उन्हें अपने काम के दौरान भी फुरसत मिलती है तो वह उस दौरान दूसरों के दोष निकालकर उसे नष्ट कर देते हैं।  राजनीति, धर्म, अर्थ, फिल्म, साहित्य तथा कला के क्षेत्र में प्रतिष्ठत लोगों के बारे में आमजन में यह भावना रहती है कि वह तो जन्मजात विरासत के कारण बने हैं।  सच बात तो यह है कि हमारे समाज में अध्यात्म ज्ञान से लोगों की दूरी बढ़ती जा रही है।  अनेक लोगों ने अपने आसपास सुविधाओं का इस कदर संग्रह कर लिया है कि उन्हें अपने पांव पर चलना भी बदनामी का विषय लगता है।  लोग परोपकार करना तो एकदम मूर्खता मानते हैं  इसी कारण एक दूसरे की प्रशंसा करने की बजाय निंदा कर अपनी श्रेष्ठता साबित करते हैं। दूसरे को दोष गिनाते हैं ताकि अपने को श्रेष्ठ साबित कर सकें।  रचनात्मक प्रवृत्तियों से परे लोगों के पास दो ही काम सहज रहे गये हैं कि एक अपने स्वार्थ की पूर्ति दूसरा परनिंदा करना।

         रुग्ण हो चुके समाज में कुछ लोग ऐसे हैं जो स्वयं अध्यात्म ज्ञान के साधक हैं पर सांसरिक विषयों से संबंध रखने की बाध्यता की वजह से दूसरों के अज्ञान के दोष को सहजता से झेलते हैं।  यही एक तरीका भी है।  अगर आप योग, ज्ञान, ध्यान और भक्ति साधक हैं तो दूसरों के दोषों को अनदेखा करें।  अब लोगों के सहिष्णुता का भाव कम हो गया है। थोड़ी आलोचना पर लोग बौखला जाते है।  पैसे, पद और प्रतिष्ठा से सराबोर लोगों के पास फटकना भी अब खतरनाक लगता है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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समाज में चेतना की कोशिश-हिंदी व्यंग्य कविता



समाज में चेतना अभियान
कहां से प्रारंभ करें
यहां कोई दुआ
कोई दवा
और कोई दारु के लिये बेकरार है,
अपने शब्दों से किसे  खुश करे
कोई रोटी
कोई कपड़ा
कोई छत पाने के लिये
जंग लड़ने को खड़ा तैयार है।
कहें दीपक बापू
अपनी समस्याओं पर सोचते हुए लोग रोते,
हर पल  चिंताओं में होते,
दिल उठा रहा है
लाचारियों का बोझ
दिमाग में बसा है वही इंसान
जो उनके मतलब का यार है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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सुख का योग दु:ख से है-पतंजलि योग साहित्य


         पंचतत्वों से बनी इस देह में मन, बुद्धि और अहंकार प्रकृति स्वतः विराजती हैं। मनुष्य का मन तो अत्यंत चंचल माना जाता है। यही मन मनुष्य का स्वामी बन जाता है और जीवात्मा का ज्ञान नहीं होने देता। अध्यात्म के ज्ञान के अभाव में सांसरिक क्रियाओं के अनुकूल मनुष्य प्रसन्न होता है तो प्रतिकूल होने पर भारी तनाव में घिर जाता है। मकान नहीं है तो दुःख है और है उसके होने पर सुख होने के बावजूद उसके रखरखाव की चिंता भी होती है। धन अधिक है तो उसके लुटने का भय और कम है नहीं है या कम है, तो भी सांसरिक क्रियाओं को करने में परेशानी आती है मनुष्य सारा जीवन इन्हीं  अपनी कार्यकलापों के अंतद्वंद्वों में गुजार देता है। विरले ज्ञानी ही इस संसार में रहकर हर स्थिति में आनंद लेते हुए परमात्मा की इस संसार रचना को देखा करते हैं। अगर किसी वस्तु का सुख है तो उसके प्रति मन में राग है और यह उसके छिन जाने पर क्लेश पैदा होता है। कोई वस्तु नहीं है तो उसका दुःख इसलिये है कि वह दूसरे के पास है। यह द्वेष भाव है जिसे पहचानना सरल नहीं है। मृत्यु का भय तो समस्त प्राणियों को रहता है चाहे वह ज्ञानी ही क्यों न हो। मनुष्य का पक्षु पक्षियों में भी यह भय देखा जाता है।

पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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सुखानुशयी रागः।
‘‘सुख के अनुभव के पीछे रहने वाला क्लेश राग है।’’
‘‘दुःखानुशयी द्वेषः।
‘‘दुःख के अनुभव पीछे रहने वाला क्लेश द्वेष है।’’
स्वरसवाही विदुषोऽपि तथा रूडोऽभिनिवेशः।।
‘‘मनुष्य जाति में परंपरागत रूप से स्वाभाविक रूप से जो चला आ रहा है वह मृत्यु का क्लेश ज्ञानियों में भी देखा जाता है। उसे अभिनिवेश कहा जाता है।’’
ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः।
‘‘ये सभी सूक्ष्मावस्था से प्राप्त क्लेश चित्त को अपने कारण में विलीन करने के साधन से नष्ट करने योग्य हैं।’’
ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः।।
‘‘उन क्लेशों की वृत्तियां ध्यान से नष्ट करने योग्य हैं।’’

       इस तरह अंतद्वंद्वों में फंसी अपनी मनस्थिति से बचने का उपाय बस ध्यान ही है। ध्यान में जो शक्ति है उसका बहुत कम प्रचार होता है। योगासन, प्राणायाम और मंत्रजाप से लाभ होते हैं पर उनकी अनुभूति के लिये ध्यान का अभ्यास होना आवश्यक है। दरअसल योग साधना भी एक तरह का यज्ञ है। इससे कोई भौतिक अमृत प्रकट नहीं होता। इससे अन्तर्मन   में जो शुद्ध होती है उसकी अमृत की तरह अनुभूति केवल ध्यान से ही की जा सकती है। इसी ध्यान से ही ज्ञान के प्रति धारणा पुष्ट होती है। हमें जो सुख या दुःख प्राप्त होता है वह मन के सूक्ष्म में ही अनुभव होते हैं और उनका निष्पादन ध्यान से ही करना संभव है।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

a सौदागरों के हाथ में दुनिया-हिंदी कविता


लोकतंत्र में
आम आदमी का मन लगाने के लिये
हर रोज नये चेहरे लाना जरूरी है,
चाल जैसी भी हो
मगर अदायें खूबसूरत रहें
भीड़ का दिल बहलाना जरूरी है।
कहें दीपक बापू
बाज़ार के सौदागरों के हाथ में फंसी दुनियां
दौलत से भरे महलों के आदी हैं सभी
ज़माने को काबू रखने के लिये
उनके  पहरेदारों के पास रहता डंडा
बिठा देते सिंहासनों पर खामोश बुत
झूठ छिपा रहे
इसलिये बेजान सच साथ रखना जरूरी है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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देश के विकास के लिए मंत्र जपें-हिंदी आध्यामिक चिंत्तन


       आज भारत में चल हिन्दी टीवी चैनलों पर चल रहे कार्यक्रमों को देखा जाये तो लगेगा कि हमारे देश में केवल युवाओं की  इश्क बाज़ी, क्रिकेट, फिल्म और तथा प्रशासनिक घोटालों के अलावा अन्य कोई विषय नहीं है। सबसे बड़ी बात तो यह मान ली गई लगती है कि आम आदमी की कोई स्वयं  की  सोच नहीं है। उसकी कोई  आवाज़ नहीं है। प्रचार और समाज सेवा से जुड़े लोग चाहे जैसे अपने हिसाब से आम आदमी की अभिव्यक्ति प्रदर्शित करते दिखते हैं।  देश एक तरह से दो भागों में बाँट गया है। एक तरफ है इंडिया तो दूसरी तरफ हैं भारत।
    इंडिया का मुख बाहर की तरफ है तो भारत का रूप विश्व परिदृश्य से अज्ञात दिखता है। इस इंडिया में  देश के आठ दस बड़े शहर हैं जो विश्व बिरादरी से जुड़े हैं और यहीं के सामाजिक,आर्थिक,राजनीतिक तथा धार्मिक शिखर पर विराजमान लोग और उनके  पालित विद्वान बुद्धिजीवी जैसा देश का रूप दिखा रहे हैं वैसा ही सभी देख रहे हैं।  इतना ही नहीं देश के अंदर भी यही लोग भाग्य विधाता बना गए हैं।  यह सब बुरा नहीं होता अगर स्वार्थवाश कार्य करने वाले इन लोगों  की बुद्धि संकुचित और शारीरिक क्षमता सीमित नहीं होती।  एक बात निश्चित है कि स्वार्थ मनुष्य को संकीर्ण और सीमित क्षमता वाला बना देता हैं इसलिए  इन शिखर  पुरुषों से यह अपेक्षा तो करनी ही नहीं चाहिए कि वह अपने दृष्टिकोण  यह u को कभी व्यापक रखकर काम करें क्योंकि उन्होंने हमेशा ही दायरों में रहकर जीवन बिताया है।  यह इनके  लिए संभव ही नहीं है।  कहा जाता है जो  देह के पास हैं वही दिल के पास है।  बड़े शहरों में यही शिखर पुरुष और इनके पालित बुद्धिमान रहते हैं।  इनके पास सारी सुविधाएँ हैं जो इन्होने सारे देश से कमाई हैं मगर अपने पास स्थापित वैभव के इनको कुछ नहीं दिखता।  यह सब भी स्वीकार्य होता  अगर पूरे देश को प्रभैत करने का माद्दा इनके पास नहीं होता।
        इन्हीं शिखर पुरुषों के पास देश का  भविष्य और व्यवस्था को प्रभावित करने वाली शक्ति  है जिसका उपयोग  यह अपने पालित बुद्धिजीवियों कि राय से तय करते हैं।  यह दोनों मिलकर एक दुसरे के हितों की चिंता के अलावा कुछ नहीं करते।  इनका  दावा यह कि यह आम आदमी को जानते हैं। दूर की बात क्या  बड़ी इमारतों में रहने वाले इन लोगों को अपने ही बड़े शहरों के छोटे लोगों का ज्ञान नहीं है।  समाज, कला, अर्थ, धर्म   और प्रबंध के क्षेत्र में कार्यरत लोग आमजन निराश है। देश में जो निराशा और हताशा का वातावरण हैं उसके लिए जिम्मेदार कौन है? इस पर कोई विचार कोई नहीं करता ।
        सच बात तो यह कि इसके लिए हमारे देश  के वही आमजन जिम्मेदार  हैं जो हमेशा  ही इन शक्तिशाली, वैभवशाली और ऊंची जगहों पर बैठे लोगों की तरफ मूंह किए बैठे रहते हैं, जिससे इनको अपनी विशिष्टता का बोध होता है जिससे  यह उदार होने की बजाय आत्ममुग्ध हो जाते हैं।  आमजन उनमें अपने वैभव का अहंकार भरते हैं। यही कारण  है की   दौलत, शौहरत  और ताकत में मदांध यह लोग अपने कार्यों सामान्य  कार्यों में भी विशिष्टता की अनुभूति  कराना  नहीं भूलते।  सच बात तो यह है देश भगवान भरोसे चल रहा है। अगर इसी तरह चलता रहा तो आगे हालात  और कठिन होने वाले हैं।  फिर भी हम मानते हैं हमारी  भूमि देव भूमि है और वही इसकी रक्षा करते हैं।  उनमें वह शक्ति  है जो इस अपनी भूमि की रक्षा के लिए अदृश्य रहकर भी काम करते  हैं और समय आने पर किसी की बुद्धि और ताकत कम या ज्यादा  आकर अंतत: हमारी रक्षा करेंगे।  वेदों में इस तरह की ऐसी अनेक प्रार्थनाएँ हैं उनमें से रोज एक जपना चाहिए।  हमारा मानना है उससे लाभ अपने को तो होगा ही पूरे समाज को भी होगा। अब यह नहीं सोचना चाहिए कि इससे  तो उन लोगों को भी लाभ होगा जो प्रार्थना नहीं करते।  हम जब शिखर पुरुषों और उनके पालित बुद्धिजीवियों पर संकीर्ण होने का संदेह करते हैं तब अपने व्यापक दृष्टिकोण अपनाकर उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। जय श्री राम, जय श्री कृष्ण, जय श्री शिव शंकर,हरिओम।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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कसाब को फांसी के साथ दूसरे अभियुक्तों को भी दंड दें-हिंदी लेख


           मुंबई हमले में पकड़े गये एक अपराधी कसाब को फांसी की सजा सुप्रीम कोर्ट ने बहाल रखी है।  प्रचार माध्यमों में इसे प्रमुखता से इस तरह प्रचारित किया गया है जैसे कि इस कांड का असली अपराधी वह एक ही है।  एक बात तय है कि कसाब को मौत से कम सजा नहीं मिल सकती क्योंकि वह अपराध में प्रत्यक्ष  रूप् से शामिल है पर इसका एक दूसरा प़क्ष यह भी है कि वह इस अपराध मे एक अस्त्र शस्त्र के रूप में उपयोग लाया गया है।  जिन लोगों के हृदय में इस हमले को लेकर बहुत क्षोभ है उनके लिये कसाब को सजा देना एक मामूली बात है।  यह ऐसे ही जैसे कि किसी हत्या में प्रयुक्त चाकू, तलवार और पिस्तौल को जब्त कर लेना। जब्त हथियार किसी को फिर प्रयोग के लिये नहीं  देकर उसे नष्ट कर  दिया जाता।  कसाब की जिंदगी भी वापस नहीं होगी पर उसकी मौती की सजा किसी हथियार को नष्ट करने से अधिक नहीं है।
     एक प्राणहीन हथियार इंसान के निर्देश के अनुसार चलता है पर जिस इंसान की बुद्धि ही  हर ली जाये वह भी प्राणहीन हथियार की तरह अन्य व्यक्ति के इशारे पर  अपराध की राह पर चलता है। जिस तरह हम किसी हथियार को सजा न देकर उसे नष्ट करते हैं पर प्रयोग करने वाले इंसान को ही दंड देते हैं वैसे ही इस कांड कसाब को हथियार की तरह उपयोग करने वाले इंसानों का सजा दिये बिना इस कांड की सजा पूरी नहीं मानी जा सकती है।  जब किसी इंसान के हाथ के हथियार से किसी व्यक्ति की हत्या होती है तो हम यह नहीं कहते कि अमुक हथियार ने मारा है। तब उसका इस्तेमाल करने वाले इंसान को दंड देते हैं।  हथियार को नष्ट करते हैं यह अलग बात है।
       जब हम मुंबई के दर्दनाक हादसे को याद करते हैं तो कसाब प्रत्यक्ष रूप से दिखता है  पर उसे हथियार की तरह इस्तेमाल करने वाले लोग अभी भी पाकिस्तान में घूम रहे हैं।
        अस्त्र वह है जो आदमी अपने हाथ में पकड़कर कर इस्तेमाल करता है-जैसे तलवार, चाकू , गदा और त्रिशूल। उसी तरह शस्त्र वह है जो फैंककर उपयोग में लाया जाता है जैसे तीर, भाला या पत्थर।  तीरकमान और गोली अस्त्रों शस्त्रों का संयुक्त रूप है।  यहां कसाब शस्त्र का रूप है जिसे भारत में फैंका गया है कि ताकि निर्दोष  लोग मारे जायें।
      भारतीय प्रचार माध्यम हर छोटे बड़े विषय को अपने हल्के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बनाकर उस पर चर्चा करते हैं।  उसमें शामिल विद्वानों  के विचार भी अत्यंत हल्के होते हैं। कसाब एक युवक है जो गरीब परिवार का है पर लालच लोभ तथा क्रूरता के कारण वह इस अपराध में शामिल हुआ। जिन लोगों ने उसे इस अपराध में शामिल किया उन्होंने उसे तमाम तरह के प्रलोभन देकर जीवन की सुरक्षा वादा कर इसमें शामिल किया।  कसाब ने जिनको मारा उनसे उसकी प्रत्यक्ष शत्रुता नहीं थी।  वह तो भारत पर हमले के लिये दुश्मनों का हथियार बना। हम इस हथियार को समाप्त कर यह मान रहे हैं कि भारी जीत मिल गयी तो मुंबई अपराध से नाखुश लोगों को हैरानी होती है।
        जिन लोगों के दिमाग में 1971 के भारत पाक युद्ध की स्मृतियां हैं उन्हें स्मरण होगा कि अनेक जगह पाकिस्तानी सेना के हाथ से भारतीय सेना ने जो हथियार छीने थे उनकी प्रदर्शनी हुई थी। चूंकि भारत ने उस युद्ध में पाकिस्तान को परास्त किया था इसलिये रुचि के साथ यह हथियार देखे गये।  कसाब की मौत तो ऐसे युद्ध का हथियार दिखाना भर होगी जो अभी जीता नहीं गया है। कुछ लोगों ने कसाब नाम का यह शस्त्र फैंककर हमारे निर्दोष लोगों को मारा है हम उसे नष्ट कर जीत का जश्न नहीं मना सकते।  जब मुंबई के गुनाहगारों के पाकिस्तान में खुलेआम घूमते देखते हैं तो कसाब जैसे शस्त्र को नष्ट करना एक मामूली बात नज़र आती है।  हमारा मानना है कि कसाब को जल्द से जल्द सजा देने के साथ ही पाकिस्तान से असली गुनाहगारों लेने का प्रयास करना चाहिए।  कसाब के साथ कानूनी रूप से कोई रियायत नहीं होना चाहिए।  उसे खाने पीने मेंवह सब भी नहीं देना चाहिए जो वह मांगता है।  वह शस्त्र है पर मनुष्य भी है।  उसकी बुद्धि हर ली गयी और उसने ऐसा होने दिया यह भी उसका अपराध है इसलिये उसे मानसिक प्रताड़ना देना भी बुरा नहीं है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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सुख के वहम में दू:ख की तरफ -हिंदी व्यंग्य कविता


चंद पल की खुशी की खातिर
हमने जिंदगी के कई साल बरबाद किये,
जब पढ़ते हैं हम अपनी कहानी
तब पता लगता है कि
अमृत से ज्यादा जहर के प्याले पिये।
कहें दीपक बापू
जुबान से निकले अपने बहुत से बोल
बाहर आते ही जमीन पर गिरते देखे
खामोशी में हम खुशी से जिये,
बहुत से दृश्यों में आंखों फोड़ी
शोर सुनकर कान भी बहरे किये,
मगर मजे से रहे तभी
जब लोग दौड़े सुख के वहम में दुखों की तरफ
हम खड़े रहे बांधे हाथ पीछे किये।
………………………………….
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’ग्वालियर
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आती जाती बिजली-हिंदी हास्य कविता


कवि सम्मेलन में
बिजली गुल हो गयी
एकदम सन्नाटा छा गया
कवियों की हो गयी बोलती बंद,
सब श्रोता चिल्लाने लगे
नहीं रहे थे वह अब शांति के पाबंद,
एक श्रोता बोला
‘‘कवि भाईयों
इस बिजली गुल होने पर
कोई कविता सुनाओ,
अंधेरे पर कुछ गुनगुनाओ,
देशभक्ति पर बाद में
अपने गीत और गज़लें सुनाना,
मौका है तुम्हारे पास
चाहो तो तरक्की का मखौल उड़ाना,
हमारे अंदर का दर्द बाहर आ जाये,
आप में से कोई ऐसा गीत गाये।
सुनकर एक कवि बोला
‘‘अंधेरा मेरा गुरु है
जिससे प्रेरित होकर मैंने शब्द शास्त्र चुना
उसका मखौल मैं उड़ा नहीं सकता,
बिजली की राह भी अब नहीं तकता,
आ जाये तो कुछ लिख पाता हूं,
नहीं आती तो सो जाता हूं,
इस देश में अंधेरा बसता है
यह बिजली ने आकर ही बताया,
हैरानी है यह देख कर
अंधेरे ने पुराने लोगों को नहीं सताया,
हंसी यही सोचकर आती है
बिजली की रौशनी के हम गुलाम हो गये,
सूरज का प्रकाश अब मायने नहीं रखता
तरक्की में इंसानी जज़्बात कहीं खो गये,
इस अंधेरे में
मैं बोल सकता हूं
तुम सुन सकते हो
मगर इस कमरे में
अपनी आदतों से मजबूर हम
लाचार साये हो गये,
ओढ़ ली है बेबसी हमने खुद
उतना ही चलते हैं जितना बिजली चलाये,
कुदरत ने इंसान बनाया
मगर हम रोबोट बन गये,
यह अलग बात है कि
बिजली से चलने वाले रोबोट हमने बनाये,
वह हमारे काम आते हैं,
पर हम खुद कभी किसी के काम न आये।
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लेखक एवं कवि- दीपक राज कुकरेजा,ग्वालियर

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माया में महामंडलेश्वर और हिन्दू धर्म-विशेष हिन्दी लेख


      जब धर्म केवल कर्मकांडों तक सिमटता है तब वहां ज्ञान की बात करना निरर्थक है। मूलतः धर्म का आधार अध्यात्म है पर अध्यात्मिक दर्शन और धर्म के बीच कोई स्पष्ट रेखा हमारे यहां खींची नहीं गयी है इसी कारण कर्मकांडों के विद्वान आमजन की संवेदनसओं का दोहन करने में सफल हो जाते हैं।  प्रसंग है एक कथित महिला को महामंडलेश्वर बनाने का जिसका चहुं ओर विरोध हुआ तो उसे वहां से निलंबित कर दिया गया।

उस महिला के अनेक दृश्य टीवी चैनलों पर दिखाई दिये। जिसमें नृत्य और भजन थे।  तत्वज्ञान की बात करते हुए तो उसे देखा ही नहीं गया।  वह महिला धर्म के व्यापार में ढेर सारी माया अपने चरणों में स्थापित कर चुकी है। उसका श्रृंगार देखकर कोई भी इस बात को नहीं मानेगा कि उसके पास अध्यात्मिक ज्ञन का ‘अ’ भी होगा। आरोप लगाने वालों ने  ने इस पदवी में धन के लेनदेन का आरोप भी लगाया है। सच क्या है पता नहीं पर हम यहां बात कर रहे हैं महामंडलेश्वर की उस उपाधि की जिसकी जानकारी अनेक लोगों के  लिये नयी नहीं है पर उसको प्रदाने करने की कोई प्रक्रिया है यह बात पहली बार इतने प्रचार के  साथ सामने आयी ।  आदि गुरु शंकराचार्य ने धर्म प्रचार के लिये चार मठ बनाये जिनके सर्वेसर्वा अब शंकराचार्य कहलाते हैं।  इनका भारतीय समाज में स्थान कितना है यह अलग से विचार का विषय हो सकता है पर भारतीय अध्यात्म की जो धारा सदियों से बह रही है उसके प्रवाह में इनका योगदान अधिक नहीं है यह  वर्तमान लोगों की जानकारी देखकर लगता है।  हिन्दू धर्म तथा भारतीय अध्यात्म के इतिहास तथा तत्वज्ञान का अध्ययन करने वाले हर शख्स का आदि शंकराचार्य का पता है पर वर्तमान शंकराचार्यों के प्रति उनके मन में मामूली श्रद्धा है जो कि हमारे देश की धरती पर उपजते सहज मानवीय  स्वभाव के ही कारण है।  वह यह कि सभी संतों का सम्मान करना चाहिए। न भी करें तो उनकी निंदा करने से बचना चाहिए।

एक बात तय है कि बिना तत्वज्ञान के भारतीय जनमानस में सम्मान प्राप्त नहीं कर सकता।  वैसे तो कई संत हैं जो नृत्य और भजन कर भक्तों को प्रसन्न करते हैं। ऐसे संत तत्वज्ञानियों से अधिक धनवान होते हैं। जिनकी ज्ञान में रुचि नहीं है वह भक्त भी सांसरिक विषयों से ऊबकर इन संतों के सानिध्य में भक्ति और मनोरंजन के मिश्रित सत्संग का आनंद उठाते हैं।  वह इनको दान, चंदे या गुरुदक्षिणा देकर भगवान को प्रसन्न हुआ मानते हैं। इस तरह बिताया गया समय  क्षणिक रूप से उनको लाभ द्रेता है पर जब अध्यात्मिक शांति की बात मन में आती है तो उनको अपना मन खाली दिखता है।

बहरहाल अब समय बदल गया है पर भारतीय अध्यात्मिक दर्शन सत्य पर आधारित है इसलिये उसके संदर्भ आज भी प्रासांगिक हैं।  नृत्य और गीत के सहारे भक्तों को सत्संग प्रदान करने वाली जिस महिला को विवादास्पद ढंग से महामंडलेश्वर बनाया गया उस पर बवाल उठा तब उसका नाम प्रचार में आया। अगर यह विवाद प्रचार माध्यमों में नहीं आता तो शायद अनेक  लोग यह समझ ही नहीं पाते कि महामंडलेश्वर होता क्या है? संभव है पैसे का लेनदेन हुआ हो। हमारे यह धार्मिक संगठनों में भी अब माया ने इस कदर अपनी पैठ बना ली है कि वहा उच्च पदों पर बैठे लोगों से सात्विक प्रवृत्ति की हमेशा आशा नहीं की जा सकती।  जिसने उपािध ली और जिन्होंने दी उन पर क्या आक्षेप किया जा सकता है? जब समाज ने क्रिकेट खिलाड़ियों में भगवान और फिल्मों अभिनेताओं में देवता होने की अवधाराणा को मान लिया है तब पेशेवर धार्मिक संगठनों या उनके पदाधिकारियों से-जिनको बिना किसी विद्यालय में गये ज्ञानी और धर्म का प्रतीक होने का प्रमाणपत्र मिला हुआ है-यह अपेक्षा करना व्यर्थ है कि वह अपनी उपाधियां उन नर्तकों और गायकों को न दें जो मनोरंजन को भक्ति के रूप में बदलने की कला में माहिर हों।

जहां तक तत्वज्ञान का प्रश्न है तो वेदों और शास्त्रों के जानकार होने का दावा करने वाले अनेक संत जब श्रीमद्भागवत गीता पर बोलते हैं तो यह देखकर आश्चर्य होता है कि वह उस ज्ञान से स्वयं ही दूर हैं।  ऐसी घटनाओं से अधिक आश्चर्य इसलिये भी नहीं करना चाहिए क्योंकि भारतीय समाज में ऐसे तत्व हमेशा ही मौजूद रहेंगे जो धर्म के नाम कर्मकांड और भक्ति के नाम पर मनोरंजन का व्यवसाय करते हैं।

लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 

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उम्मीद और वफा-हिन्दी शायरी


हमने देखा उनकी तरफ
बड़ी उम्मीद के साथ
शायद वह हमारी जिंदगी में
कभी बहार लायेंगे,
दोष हमारा ही था कि
बिना मतलब के
उनका साथ निभाया,
उनमें वफा करने की कला है कि नहीं
यह जाने बिना
जरूरत से ज्यादा
अपनी सादगी का रूप दिखाया,
फिर भी भरोसा है कि
इस भटकाव में भी
हम कोई नया रास्ता पायेंगे।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
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इश्क़ नहीं है आसान-हिन्दी व्यंग्य कविता


इश्क आसान है
अगर दिल से करना जानो तो
जिस्म से ज्यादा रूह को मानो तो
जहां कुछ पाने की ख्वाहिश पाली दिल में
सौदागरों के चंगुल में फंस जाओगे।
कहें दीपक बापू
कोई दौलत पाता है,
कोई उसे गँवाता है,
सिक्कों के खेल में
किसका पेट भरता है,
आम इंसान की ज़िंदगी
कभी कहानी नहीं बनती
चाहे जीता या मरता है,
किसी को होंठों से चूमना,
हाथ पकड़कर साथ साथ घूमना,
दिल का दिल से मिले होने का सबूत नहीं है,
जज़्बात बाहर दिखाये कोई ऐसा भूत नहीं,
इंसान के कायदे अलग हैं,
जिंदगी के उसूल अलग हैं,
करीब से जब जान लोगे
तभी सारे जहां पर हंस पाओगे।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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दिल से बाहर-हिन्दी कविता


अब अपने दिल के घर से
बाहर आकर
न हम रोते
न हँसते हैं,
पर्दे पर चलते अफसाने
देखते देखते
हो गए इस जहान के लोग
हर पल प्रपंच रचने के आदी
हम उनके जाल में यूं नहीं फँसते हैं।
कहें दीपक बापू
फिल्म की पटकथाएँ
और टीवी धारावाहिकों की कथाएँ
ले उड़ जाती हैं अक्ल पढ़े लिखे लोगों की
ख्याली दुनियाँ के पात्रों को ढूंढते हुए
ज़मीन की हक़ीक़तों में खुद ही धँसते हैं,
रोना तो छूट गया बरसों पहले
अब ज़माने के कभी बहते घड़ियाली आंसुओं
कभी फीकी उड़ती मुस्कान देखकर
अब अपने दिल को साथ लेकर
बस, हम भी हँसते हैं।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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हँसते नगमे दिल पर परचम फहराते-हिन्दी कविता


पत्थरों के खेल होते हैं
मगर वह जीते नहीं जाते,
कुछ घायल होते
कुछ बेमौत मर जाते।
कहें दीपक बापू
आओ
चंद शब्द मन में दुहराएँ,
कलम से होते जो कागज पर उतार आयें,
इंसान खुशनसीब है
भाषा मिली है बोलने के वास्ते,
क्यों चुने फिर पत्थर के रास्ते,
जज़्बातों में कुब्बत हो तो
दहशत के माहौल में भी
हँसते नगमे दिल पर परचम फहराते।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
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बात का बतंगड़ बन जाता है-हिन्दी शायरियाँ


खत अब हम कहाँ लिखते हैं,
जज़्बातों को फोन पर
बस यूं ही फेंकते दिखते हैं।
कहें दीपक बापू
बोलने में बह गया
ख्यालों का दरिया
खाली खोपड़ी में
लफ्जों का पड़ गया है अकाल
आवाज़ों में टूटे बोल जोड़ते दिखते हैं।
—————-
इस जहां में
लोगों से क्या बात करें
पहले अपनी रूह की तो सुन लें।

कहें दीपक बापू
बात का बतंगड़ बन जाता है
मज़े की महफिलों में
दूसरों की बातें सुनकर
हैरान या परेशान हों
बेहतर हैं लुत्फ उठाएँ
अपने दिल के अंदर ही
जिन्हें खुद सुन सकें
उन लफ्जों का जाल बुन लें।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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भीड़ और तन्हाई-हिन्दी शायरियाँ


भीड़ का शोरशराबा देखकर
अब अपनी तन्हाई की तड़प नहीं सताती है,
कहें दीपक बापू
अकेलेपर से घबड़ाये लोग
ढूंढते हैं मेलों में खुशी का सामान
खरीदते ही हो जाता जो पुराना
फिर दौड़ते हैं दूसरी के लिये
उम्र उनकी भी ऐसे ही
तड़पते बीत जाती है
………………………………
उन दोस्तों के लिये क्या कहें
जिनसे छिपने की कोशिश हम करें
वह हमारे ठिकानों को ढूंढ ही डालते हैं,
कहें दीपक बापू
अपना चेहरा लेकर
बदल बदल कर अदाएँ
वह हर जगह सामने आते हैं
जिनसे मिलना हमेशा हम टालते हैं।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
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याचक और स्वामी -हिन्दी हाइकु (yachak-hindi haiku)


उनके पेट
कभी नहीं भरेंगे
जहरीले हैं,

रोटी की लूट
सारे राह करेंगे
जेब के लिए,

मीठे बोल हैं
पर अर्थ चुभते
वे कंटीले हैं।
————–

फिर आएंगे
वह याचक बन
कुछ मांगेंगे,
दान लेकर

वह होंगे स्वामी

हम ताकेंगे,

हम सोएँ हैं
बरसों से निद्रा में
कब जागेंगे,

सेवक कह
वह शासक होते
भूख चखाते

पहरेदार
अपना नाम कहा
लुटेरे बने

लूटा खज़ाना
आँखों के सामने है
कब मांगेंगे।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

नया आईडिया-लघु हिन्दी हास्य व्यंग्य (new idea-laghu hindi hasya vyangya or short comic satire article)


     उस्ताद ने शागिर्द से कहा-“मेरी तौंद बहुत बढ़ गई है, इसे कम करना होगा, वरना लोग मेरे उपदेशों पर यकीन नहीं करेंगे जिसमें मैं उनको कम खाने गम खाने और कसरत करो तंदुरुस्ती पाओ जैसी बातें कहता हूँ। आजकल मोटे लोगों को कोई पसंद नहीं करता, नयी पीढ़ी के लड़के लड़कियां मोटे लोगों को बूढ़ा और बीमार समझते हैं। सोच रहा हूँ कल सुबह से सैर पर जाना शुरू करूँ।”
     शागिर्द ने कहा-“उस्ताद सुबह जल्दी उठने के लिए रात को जल्दी सोना पड़ेगा। जल्दी सोने के लिए सोमरस का सेवन भी छोडना होगा।”
    उस्ताद ने कहा-“सोमरस का सेवन बंद नहीं कर सकता, क्योंकि उसी समय मेरे पास बोलने के ढेर सारे आइडिया आते हैं जिनके सहारे अपना समाज सुधार अभियान चलता है। ऐसा करते हैं सोमरस का सेवन हम दोनों अब शाम को ही कर लिया करेंगे।”
     शागिर्द ने कहा-“यह संभव नहीं है क्योंकि आपके कई शागिर्द शाम के बाद भी देर तक रुकते हैं, उनको अगर यह इल्म हो गया कि उनके उस्ताद शराब पीते हैं तो हो सकता है कि वह यहाँ आना छोड़ दें।”
    उस्ताद ने कहा-“ऐसा करो तुम सबसे कह दो कि हम अपना चित्तन और मनन का कार्यक्रम बदल रहे हैं इसलिए वह शाम होने से पहले ही चले जाया करें।”
    उस्ताद कुछ दिन तक अपने कार्यक्रम के अनुसार सुबह घूमने जाते रहे पर पेट था कि कम होने का नाम नहीं ले रहा था। उस्ताद ने शागिर्द से अपनी राय मांगी। शागिर्द बोला-“उस्ताद आप देश में फ़ेल रही महंगाई रोकने के लिए अनशन पर बैठ जाएँ। इससे प्रचार और पैसे बढ्ने के साथ आपका पेट भी कम होगा।”
    उस्ताद ने कहा-“कमबख्त तू शागिर्द है या मेरा दुश्मन1 मैं पतला होना चाहता हूँ,न कि मरना।
शागिर्द बोला-“मैं तो आपको सही सलाह दे रहा हूँ। सारा देश परेशान है। इससे आपको नए प्रायोजक और शागिर्द मिल जाएंगे। फिर आपका स्वास्थ भी अच्छा हो जाएगा।”
      उस्ताद ने कहा-“हाँ और तू बैठकर बाहर सोमरस पीना, मैं उधर अपना गला सुखाता रहूँ।”
शागिर्द ने कहा-“ठीक है,फिर आप ऐसा करें की शाम को कहीं अंदर घुस जाया करें। तब मैं बाहर बैठकर लोगों को भाषण वगैरह दिया करूंगा। अलबत्ता मेरे यह शर्त है कि मैं आपसे पहले ही जाम पी लूँगा।”
      उस्ताद ने पूछा-“वह तो ठीक है पर शराब पीकर खाली पेट कैसे सो जाएंगे?
    शागिर्द ने कहा-” आप शराब कोई नमकीन के साथ थोड़े ही पीएंगे, बल्कि काजू और सलाद भी आपको लाकर दूँगा। उस समय हमारे पास ढेर सारा चंदा होगा। वैसे आप चाहें तो कभी कभी भोजन में मलाई कोफता के साथ रोटी भी खा लेना। अपने तो ऐश हो जाएंगे।”
      उस्ताद ने कहा-“पर इससे मेरी तौंद कम नहीं होगीc”
     शागिर्द ने कहा- आप अब अभी तक तौंद करने के मसले पर ही सोच रहे हैं? अरे, आप तो नए शागिर्द बनाने के लिए ही यह सब करना चाहते हैं न! जब नया आइडिया आ गया तो फिर पुराने पर सोचना छोड़ दीजिए।”
        उस्ताद ने मुंडी हिलाते हुए कहा-“हूँ, हूँ !”
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

खामोश बहस जारी है-हिन्दी व्यंग्य कविता


खामोश
कमरे के अंदर
इस जहान के सारे खलीफा
बहस मेँ व्यस्त हैं
मुद्दा यह है कि
अलग अलग तरीके के हादसों पर
बयान किस तरह बदल बदल कर दिये जाएँ
हमलावरों को डरने की जरूरत नहीं है
उनके खिलाफ कार्रवाई का बयान आयेगा
मगर करेगा कौन
यह तय कभी नहीं होगा।
——————
इंतज़ार करो
हुकूमत की नज़र आम इंसान पर
ज़रूर जाएगी।
जब वह दिखाकर कुछ सपने
वह दिल बहलाएगी,
मांगे तो खिलाएगी खाना
और दारू भी पिलाएगी।
येन केन प्रकरेण
अपनी हुकूमत पर हुक्म की
मोहर  उस दिन सड़क पर पकड़कर लगवाएगी।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com
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दाम और दिल-हिन्दी हाइकु


सुंदरता की
पहचान किसे है
सभी भ्रमित,

दरियादिली
किसे कैसे दिखाएँ
सभी याचक,

वफा का गुण
कौन पहचानेगा
सभी गद्दार,

खाक जहाँ में
फूलों की कद्र कहाँ
सांस मुर्दा है,

बेहतर है
अपनी नज़रों से
देखते रहें,

खुद की कब्र
खोदते हुए लोग
तंगदिली में,

भरोसा तोड़ा
जिन्होने खुद से
ढूंढते वफा,

उन चीजों में
जो दिल को छूती हैं
रूह को नहीं,

उनके दाम
सिक्कों में नपे हैं
दिल से नहीं।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
poet, Writer and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
 
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समय गुजर जाता है-नववर्ष पर हास्य कविता और शायरी (samay gujar jaata hai-hasya kavita or poem and shayri on navvarsh or new year)


 वह बोले
“दीपक बापू
नव वर्ष की बधाई,
उम्मीद है इस साल आप सफल हास्य कवि  हो जाओगे,
फिर हमें जरूर दारू पिलाओगे।”
दीपक बापू बोले
“आपको भी बधाई
पर हम ज़रा गणित में कमजोर हैं,
भले ही शब्दों के  सिरमोर हैं,
यह कौनसा साल शुरू हुआ है
आप हमें बताओगे।”
वह तिलमिला उठे और
यह कहकर चल दिये
“मालूम होता तो
नहीं देते तुम्हें हम बधाई,
तुमने अपनी हास्य कविता वाली
जुबान हम पर ही  आजमाई,
वह तो हम जल्दी में हैं
इसलिए नए साल का नंबर याद नहीं आ रहा
फुर्सत में आकर तुम्हें बता देंगे
तब तुम शर्माओगे।”

दिन बीतता है
देखते देखते सप्ताह भी
चला जाता है
महीने निकलते हुए
वर्ष भी बीत जाता है,
नया दिन
नया सप्ताह
नया माह
और नया वर्ष
क्या ताजगी दे सकते हैं
बिना हृदय की अनुभूतियों के
शायद नहीं!
रौशनी में देखने ख्वाब का शौक
सुंदर जिस्म छूने की चाहत
शराब में जीभ को नहलाते हुए
सुख पाने की कोशिश
खोखला बना देती है इंसानी दिमाग को
मौज में थककर चूर होते लोग
क्या सच में दिल बहला पाते हैं
शायद नहीं!
————-
कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

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खुद के सच से आँखें फेर जाते हैं-हिन्दी शायरी (khud ke sach se aankhen fer jaate hain-hindi shayri)


न वह दिल के पास हैं
न उनके कदम कभी हमारे घर की ओर
बढ़ते नज़र आते हैं,
कहें दीपक बापू
उनसे दोस्ती का दम क्या भरें
जिनकी वफा पर लगे ढेर सारे दाग
दिखते हैं जहां को
मगर वह खूबसूरती से
खुद के  सच से ही आँखें फेर जाते हैं।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर


कौटिल्य का अर्थशास्त्र-वस्तु छिन जाने का दुःख ज्ञान से ही शांत होता है (kautilya ka arthshastra-vastu aur Gyan)


       क्रोध के दुर्गुण से निपटने का उपाय अपने अंदर सहनशीलता का गुण पैदा करना ही है। जहां दो लोग आपस में क्रोध करते हैं उनका मन और बुद्धि संतप्त हो जाती है। अंततः वह स्वयं को ही ही हानि पहुंचाते हैं। अगर हम हिंसक घटनाओं को देखें तो लोगों पर तरस आता है। छोटी छोटी बातों पर लोग आपस में लड़ पड़ते हैं। यहां तक कि उनको अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं।
          कबीर दास जी ने एक जगह कहा भी है कि ‘न सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठमलट्ठा’। जब हम अपने समाज की सांस्कृतिक विरासत की बात करते हैं तो इस बात को भूल जाते हैं कि हमारे यहां परिवार तथा समाज में जरा जरा बात पर लोग आपस में लड़ पड़ते हैं। कई बार तो यह होता है कि लोग एक दूसरे की जान ले लेते हैं और बाद में जब उनके विवाद के विषय का पता चलता है तो लगता है कि वह तो एकदम महत्वहीन था और उसमें सार तो कुछ था ही नहीं। यह सब क्रोध के दुर्गुण का परिणाम था।
                          कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
                             —————
                       अमर्षोप्रृहीतानां मन्युसन्तप्तचेतसाम्।
                     परस्परपकारेण पुंसां भवति विग्रह।।
           ‘‘दोनों और क्रोध होने पर परस्पर संतप्त चित्त वाले मनुष्य अपकार को प्राप्त होते हैं। पुरुषों में यह विग्रह सदैव उपस्थित होता है।
                    यानापहारस्मभूते ज्ञानशक्तिविधातजे
                     समस्तदर्थश्वांगन क्षान्त्या चोपेक्षणेन च।।
         “ज्ञान या ज्ञान शक्ति के अभाव में वस्तु के हरण का विग्रह प्राप्त होता है वह ज्ञान शक्ति के उपयोग से ही शांत होता है या फिर अपने अंदर सहनशीलता लाने पर ही शांति मिलती है।”
          यह जीवन तो नश्वर है और संसार के अनेक पदार्थ तो प्राणहीन हैं पर उनका आकर्षण मनुष्य के मन को बांधता है। सोना, चांदी, हीरा और जवाहरात टके के मोल नहीं है पर मनुष्य के मोह ने उनको कीमती बना दिया है। इन पदार्थों का वह संचय करता है और अगर कहीं उनसे विग्रह हो तो उसे पीड़ा होती है। इनको लेकर लोगों में आपसी विवाद होते हैं। लूटपाट तक हो जाती है। अपनी वस्तु के छिन जाने पर आदमी खिन्न हो जाता है यह जानते हुए कि यह मायारूपी लक्ष्मी तो चंचला है। अपनी वस्तु खोने या छिन जाने पर आदमी को निराशा से बचने के लिये अपने अंदर सहनशीलता के गुण की तरफ देखना चाहिए। ऐसे विग्रह होने पर जब हम अपने अंदर सहनशीलता के तत्वा को निहारेंगे तो मन शांत हो जायेगा।

———–

संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja ‘Bharatdeep’, Gwalior
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निजी क्षेत्र में भी प्रबंध कौशल की समस्या रहेगी-हिन्दी लेख


            कलकत्ता के ए.एम.आर.आई अस्पताल (AMRi culcutta hospital) में करीब 90 लोगों की मौत हो चुकी है। अगर प्रचार माध्यमों के इससे जुड़े समाचारों पर यकीन किया जाये तो कुछ लोग अभी भी अपने परिजनों को ढूंढ रहे है जिस कारण यह संख्या अधिक भी हो सकती है। हम इस हादसे में हताहत लोगों के प्रति संवेदना जताते हैं। इस दुर्घटना के बाद अनेक विचार दिमाग में आये। जिस सवाल ने यह सबसे ज्यादा परेशान किया कि यह एक निजी अस्पताल है और इससे क्या यह साबित नहीं होता हम अब निजी क्षेत्र की क्षमताओं पर पर प्रश्न उठायें? अभी तक हम मानकर चलते हैं कि सरकारी और अर्द्धसरकारी क्षेत्रों में भ्रष्टाचार और कुप्रबंध है इस दुर्घटना के बाद अब निजी क्षेत्र के प्रबंधन पर भी सवाल उठेंगें।
             जिन महान बुद्धिमानों ने सरकारी क्षेत्र को एकदम निकम्मा मानकर निजी क्षेत्र की वकालत की थी उनकी राय पर तब भी आश्चर्य हुआ था और अब तो यह लगने लगा है कि निजी क्षेत्र भी उसी कुप्रबंध का शिकार हो रहा है जिसके लिये सरकारी क्षेत्र पर बदनाम माना जाता था। अर्थशास्त्री भारत में जिन समस्याओं को उसके विकास में संकट मानते हैं उसमें कुप्रबंध भी शामिल माना गया है। कुछ हद तक खेती में उसे माना गया है पर निजी क्षेत्र में इसे कभी नहीं देखा गया। दरअसल हम जैसे निष्पक्ष चिंतक और अल्पज्ञानी अर्थशास्त्री हमेशा ही यह मानते हैं कि प्रबंध कौशल के बारे में हमारा देश बहुत कमजोर रहा है। इसका कारण हमारी प्रवृत्ति और इच्छा शक्ति है। एक तरह से देखा जाये तो हमारे वणिक वर्ग का समाज-यह जाति सूचक शब्द नहंी है क्योंकि इसमें अनेक जातियों के सदस्य ऐसे भी हैं जिनके समाज के साथ वणिक सूचक संज्ञा नहीं जुड़ी होती जैसे सिंधी, पंजाबी, और गुजराती तथा अन्य स्थानीय समाज-कमाने के लिये योजना बनाता है पर प्रबंध कौशल में बहुत कम लोग सिद्धहस्त होते हैं। भाग्य, परिश्रम, बौद्धिक अथवा प्रतिद्वंद्वी के अभाव में अनेक लोग अपने व्यवसाय में महान सफलता प्राप्त करते है पर ऐसे विरले ही होते है जिनको विपरीत परिस्थतियों में केवल अपने प्रबंध कौशल से सफलता मिली हो। जब कुछ बुद्धिमान लोग सरकारी और अर्द्धसरकार क्षेत्रों में कुप्रबंध की बात करते हैं तो अपने अनुभव से सीखे हम जैसे लोग यह भी मानते हैं कि कम से कम हम भारतीयों का नजरिया अपने काम को लेकर कमाने का अवश्य होता है पर प्रबंध कौशल दिखाने की चिंता बिल्कुल नहीं होती। ऐसे बहुत कम लोग हैं जिनको प्रबंध कौशल में महारत है। उसके बाद कुछ लोग मध्यम प्रवृत्ति के होते है जो एक समय तक प्रबंध कौशल दिखाते हैं फिर आलसी हो जाते हैं। ऐसे में जब आर्थिक जगत में निजीकरण तेजी से हो रहा था तब बहुत कम लोगों ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि प्रबंध कौशल एक कला है और उसमें महारत हासिल करने वालों को प्राथमिकता दी जाये। मुख्य बात यह है कि निजी क्षेत्र पर इतना विश्वास कैसे किया जा सकता है कि उसे अस्पताल, वायुसेवा, बस सेवा तथा अन्य जीवनोपयेागी की सेवाओं का पूरी तरह से जिम्मा सौंपा जाना चाहिए?
ए.एम.आर.आई अस्पताल (AMRi culcutta hospital) में हुई दुर्घटना चूंकि अत्यंत दर्दनाक है इसलिये इस पर चर्चा हुई पर निजी अस्पतालों में अनेक लोग गलत इलाज से मर जाते हैं तब वह एक अचर्चित खबर बनकर रह जाती है। इतना ही नहीं हम उन अन्य सेवाओं को भी देख रहे हैं जहां निजी क्षेत्र प्रभावी होता जा रहा है। वहां आम आदमी ग्राहक नहीं बल्कि एक शौषक और मजबूर प्रयोक्ता बन जाता है। उसके पास निजी क्षेत्र की सेवा के उपयोग करने के अलावा कोई मार्ग नहीं रह जाता।
              अब प्रचार माध्यमों की बात कर लें। अगर यह हादसा किसी सरकारी अस्पताल में हुआ होता तो प्रचार माध्यम कोई सरकारी आदमी शिकार के रूप में फंसते देखना चाहते। सारे राज्य के अस्पतालों की दुर्दशा को लेकर प्रशासन को कोसा जाता। निजी अस्पताल को लेकर ऐसा कोई विवाद नहीं उठा। यह ठीक है कि पश्चिम बंगाल ने अस्पताल के प्रशासन ने अस्पताल प्रबंधकों के खिलाफ कार्यवाही की है पर अगर यह सरकारी अस्पताल होता तो वही अपनी सफाई देने में लगा होता। हम यह दुर्घटना निजी क्षेत्र में अकुशल प्रबंधन के एक ऐसे प्रतीक के रूप में इसलिये देख रहे हैं क्योंकि वह प्रचार माध्यमों में चर्चित हुई वरना सच यह है कि अब तो अनेक सेवाओं में निजी क्षेत्र आम आदमी को लाचार बना रहा है।
           हम यहां यह बात नहीं कह रहे कि निजी क्षेत्र का प्रवेश पूंजीगत रूप से दखल कम होना चाहिए। जनोपयोगी सेवाओं में निजी क्षेत्र का योगदान तब भी था जब सरकारी क्षेत्र शक्तिशाली था। निजी क्षेत्र ने अनेक ऐसी सुविधायें भी जुटाई हैं जिससे आम मध्यम वर्ग को सुविधा हो रही है पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि ऐसी सेवाओं से सरकारी प्रभाव को समाप्त होने की मांग मान ली जाये। हमारा मानना है कि हर क्षेत्र में सरकारी पूंजी को सक्रिय रहना चाहिए। किसी क्षेत्र में सरकारी प्रभाव इसलिये समाप्त नहीं होना चाहिए कि वहां अब निजी क्षेत्र काम कर रहा है।
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ए.एम.आर.आई अस्पताल कलकत्ता के हादसे से सबक-हिन्दी लेख( lesson of terssdy of AMRi culcutta hospital-hindi article)

आम आदमी और कार्टून-हिन्दी हास्य कविताएँ (aam aadmi aur cartoon-hindi comic poem’s or hasya kavitaen)


बहुत मुद्दो पर बहस
टीवी चैनलों पर चलती है,
अखबारों में समाचारों के साथ
संपादकीय भी लिखे जाते हैं,
बरसों से मसले वहीं के वहीं हैं,
बस, चर्चाकार बदल जाते हैं।
लगता है आम आदमी इसी तरह
बेबस होकर कार्टूनों में खड़ा रहेगा
जिसकी समस्याओं के हल के लिये
रोज रोज बनती हैं नीतियां
कभी कार्यक्रमा भी बनाये जाते हैं।
————-
एक कार्टूनिस्ट से आम आदमी ने पूछा
‘‘यार,
आप जोरदार कार्टून बनाते हो,
हमारे दर्द को खूबसूरती बयान कर जाते हैं,
मगर समझ में नहीं आता
देश के मसले कब हल होंगे
हमारा उद्धार कब हो जायेगा।’’
सुनकर कार्टूनिस्ट ने कहा
‘‘सुबह सुबह शुभ बोलो,
जब यह देश का हर आदमी
दर्द से निकल जायेगा,
मेरे कार्टून के विषय हो जायेंगे लापता
नाम पर भी लगेेगा बट्टा
मगर भगवान की कृपा है
तुम जैसे लोग खड़े रहेंगे
मेरे कटघरे में इसी तरह
भले ही तुम अपनी जंग खुद लड़ते रहो
मगर तुम्हारे भले के लिये
कोई न कोई रोज नया आदमी खड़ा होगा,
अभिनय कर देवता बन जायेंगे
उनके नाटक पर
मेरे लिये रोज एक कार्टून तैयार हो जायेगा।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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विदेशी खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश का व्यापार-हिन्दी लेख (khudara vyapar mein videsh nivesh, forein investment fdi in bhartiya market-hindi article or lekh)


        खेरिज किराना व्यापार में विदेशी निवेश लाने के फैसले पर देश में बवाल बचा है और इस पर बहस हो रही है। एक आम लेखक और नागरिक के रूप में हमें इस फैसले के विरोध या समर्थन करने की शक्ति नहीं रखते हैं क्योंकि इस निर्णय तो शिखर पुरुषों को करना होता है। साथ ही चूंकि प्रचार माध्यमों में चर्चा करने में हम समर्थ नहीं है इसलिये अपने ब्लाग पर इसका आम नागरिकों की दृष्टि से विश्लेषण कर रहे हैं। हमने देखा कि आम जनमानस में इस निर्णय की कोई अधिक प्रतिक्रिया नहीं है। इसका कारण यह है कि आम जनमानस समझ नहीं पा रहा है कि आखिर मामला क्या है?
        अगर भारतीय बुद्धिजीवियों की बात की जाये तो उनका अध्ययन भले ही व्यापक होता है जिसके आधार वह तर्क गढ़ लेते हैं पर उनका चिंत्तन अत्यंत सीमित हैं इसलिये अधिक गहन जानकारी उनसे नहीं मिल पाती और उनके तक भी सतही होते हैं। यही अब भी हो रहा है। अगर खेरिज किराने के व्यापार में विदेशी निवेश की बात की जाये तो उस पर बहस अलग होनी चाहिए। अगर मसला संगठित किराना व्यापार ( मॉल या संयुक्त बाज़ार) का है तो वह भी बहस का विषय हो सकता है। जहां तक खेरिज किराना व्यापार में विदेशी निवेश का जो नया फैसला है उसे लेकर अधिक चिंतित होने वाली क्या बात है, यह अभी तक समझ में नहीं आया। दरअसल यह निर्णय हमारी उदारीकरण की उस नीति का इस पर सारे राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक संगठन चल रहे हैं। अगर हम यह मानते हैं कि केवल वाल मार्ट के आने से इस देश के छोटे किराने व्यापारी और किसान तबाह हो जायेंगे तो यह एक भारी भ्रम होगा क्योंकि हम जिन नीतियों पर समाज को चलता देख रहे हैं वह उससे अधिक खतरनाक हैं। यह खतरा लगातार हमारे साथ पहले से ही चल रहा है जिसमें छोटे मध्यम व्यवसाय अपनी महत्ता खोते जा रहे हैं।
           हमें याद है कि इससे पहले भी बड़ी कंपनियों के किराना के खेरिज व्यापार में उतरने का विरोध हुआ पर अंततः क्या हुआ? बड़े शहरों में बड़े मॉल खुल गये हैं। हमने अनेक मॉल स्वयं देखे हैं और यकीनन उन्होंने अनेक छोटे व्यवसायियों के ग्राहक-प्रगतिवादियों और जनवादियों के दृष्टि से कहें तो हक- छीने हैं। हम जब छोटे थे तो मेलों में बच्चों को खिलाने के लिये विभिन्न प्रकार के झूले लगते थे। कभी कभार मोहल्ले में भी लोग ले आते थे। आज मॉल में बच्चों के आधुनिक खेल हैं और तय बात है कि उन्होंने कहीं न कहीं गरीब लोगों की रोजी छीनी है। हम यहां यह भी उल्लेख करना चाहेंगे कि तब और बच्चों के रहन सहन और पहनावे में भी अंतर था। हम अगर उन्हीं झूलों के लायक थे पर आज के बच्चे अधिक धन की फसल में पैदा हुए हैं। तब समाज में माता पिता के बच्चों को स्वयं घुमाने फिराने का फैशन आज की तरह नहीं  था। यह काम हम स्वयं ही कर लेते थे। एक तरह से साफ बात कहें तो तब और अब का समाज बदला हुआ है। यह समाज उदारीकरण की वजह से बदला या उसके बदलते हुए रूप के आभास से नीतियां पहले ही बन गयी। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि उदारीकरण में पूंजीपतियों का पेट भरने के लिये समाज का बौद्धिक वर्ग पहले ही लगा हुआ था।
                 अब खुदरा किराना व्यापार की बात कर लें। धन्य है वह लोग जो आज भी खुदरा किराना व्यापार कर रहे हैं क्योंकि जिस तरह अब नौकरियों के प्रति समाज का रुझान बढ़ा है उसमें नयी पीढ़ी के बहुत कम लोग इसे करना चाहते हैं।
          हम यहां शहरी किराना व्यापार की बात कर रहे हैं क्योंकि मॉल और संयुक्त व्यापार केंद्र शहरों में ही हैं। पहली बात तो यह है कि जो पुराने स्थापित किराने व्यापारी हैं उनकी नयी पीढ़ी यह काम करे तो उस पर हमें कुछ नहीं कहना पर आजकल जिसे देखो वही किराना व्यापार कर रहा है। देखा जाये तो किराना व्यापारी अधिक हैं और ग्राहक कम! हमारे एक मित्र ने आज से पंद्रह साल पहले महंगाई का करण इन खुदरा व्यापारियों की अधिक संख्या को बताया था। उसने कहा था कि यह सारे व्यापारी खाने पीने की चीजें खरीद लेते हैं। फिर वह सड़ जाती हैं तो अनेक दुकानें बंद हो जाती हैं या वह फैंक देते हैं। इनकी वजह से अनेक चीजों की मांग बढ़ी नज़र आती है पर होती नहीं है मगर उनके दाम बढ़ जाते हैं। उसका मानना था कि इस तरह अनेक कंपनियां कमा रही हैं पर छोटे दुकानदार अपनी पूंजी बरबाद कर बंद हो जाते हैं। इसका अन्वेषण हमने नहीं किया पर जब हम अनेक दुकानदारों के यहां वस्तुओं की मात्रा देखते हैं तो यह बात साफ लगता है कि कंपनियों का सामान अधिक होगा ग्राहक कम!
          हमारे देश में बेरोजगारी अधिक है। एक समय तो यह कहा जाने लगा था कि कि जो भी अपने घर से रूठता है वही किराने की दुकान खोल लेता है। इधर मॉल खुल गये हैं। ईमानदारी की बात करें तो हमें मॉल से खरीदना अब भी महंगा लगता है। एक बात यह भी मान लीजिये कि मॉल से खरीदने वाले लोगो की संख्या अब भी कम है। हमारे मार्ग में ही एक कंपनी का खेरिज भंडार पड़ता है जहां सब्जियां मिलती हैं पर वहां से कभी खरीदी नहीं क्योंकि ठेले वाले के मुकाबले वहां ताजी और सस्ती सब्जी मिलेगी इसमें संशय होता है। हमारे शहर में कम से कम दो कंपनियों के खेरिज भंडार खुले और बंद भी हो गये यह हमने देखा।
          भारतीय अर्थव्यवस्था के अंतद्वंद्वों और उनके संचालन की नीतियों की कमियों पर हम लिखने बैठें तो बहुत सारी सामग्री है पर उसे यहां लिखना प्रासंगिक है। हम इन नीतियों को जब देश के लाभ या हानि से जोड़कर देखते हैं तो लगता है कि यह चर्चा का विषय नहीं है। इस देश में दो देश सामने ही दिख रहे हैं-एक इंडिया दूसरा भारत! कभी कभी तो ऐसा लगता है कि हम एक भारतीय होकर इंडियन मामले में दखल दे रहे हैं। कुछ लोगों को यह मजाक लगे पर वह मॉल और मार्केट में खड़े होकर चिंत्तन करें तो यह बात साफ दिखाई देगी। वॉल मार्ट एक विदेशी कंपनी है उससे क्या डरें, देशी कंपनियों ने भला कौन छोड़ा है? सीधी बात कहें तो नवीन नीति से देश के किसानों या खुदरा व्यापारियों के बर्बाद होने की आशंका अपनी समझ से परे है। हम मान लें कि वह कंपनी लूटने आ रही है तो उसका मुकाबला यहां मौजूद देशी कंपनियों से ही होगा। मॉल के ग्राहक ही वॉल मार्ट में जायेंगे जो कि देशी कंपनियों के लिये चुनौती है। बड़े शहरों का हमें पता नहीं पर छोटे शहरों में हमने देखा है कि कम से पचास ग्राम चाय खरीदने कोई मॉल नहीं जाता। देश में रोज कमाकर खाने वाल गरीब बहुत हैं और उनका सहारा खुदारा व्यापारी हैं। गरीब रहेगा तो खुदरा व्यापारी भी रहेगा। वॉल मार्ट या गरीबी मिटाने नहीं आ रही भले ही ऐसा दावा किया जा रहा है।
            अपने पास अधिक लिखने की गुंजायश नहीं है क्योंकि पढ़ने वाले सीमित हैं। इतना जरूर कह सकते हैं कि यह बड़े लोगों का आपसी द्वंद्व है जो अंततः आमजन के हित का नारा लगाते हुए लड़ते हैं। आज के आधुनिक युग में शक्तिशाली प्रचारतंत्र के कारण आमजन भी इतना तो जान गया है कि उसके हित का नारा लगाना इन शक्तिशाली आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा धार्मिक समूहों के शिखर पुरुषों की मजबूरी है। इसलिये उनके आपसी द्वंद्वों को रुचि से देखता है।
———-
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

गुलाम बुत-हिन्दी कविता (gulam but-hindi kavita)


पत्थर के देवता
पूजने पर अफसोस नहीं होता,
क्योंकि देवताओं को पूजने वाले इंसान
अब पत्थरों जैसे हो गए,
दौलत, शोहरत और हुकूमत के गुलाम लोग
बुतों की तरह खड़े नज़र आते हैं,
अपनी भलाई और कमाई तक
मतलब रखते
फिर मुंह फेर जाते हैं,
पत्थरों को पूजने का अफसोस नहीं होता
मालूम है कि
उन पर कभी फूल उग नहीं पाते हैं,
उन इंसानों से तो ठीक हैं
जो वादे को धोखे में बदल जाते हैं। 
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
poet, Writer and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
 
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हैरान लोग-हिन्दी कविता


मेरे दिल में न खुशी है
न कोई गम है
अपनी हालातों से परेशान लोग
हैरान है यह देखकर
यह कभी रोता नहीं
कभी हंसता भी नहीं
बिचारे नहीं जानते
बाज़ार में बिकने वाले
जज़्बात मैंने खरीदना छोड़ दिया है,
इंसानों के फरिश्ते होने की
उम्मीद कभी नहीं करता
अपनी रूह से दिमाग का
अटूट रिश्ता जोड़ दिया है।
———-
कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

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गरीबी और विकास दर-हिन्दी व्यंग्य कविताएँ (garibi aur vikas dar-hindi vyangya kavitaen)


अपने घर में सोने के भंडार
तुम भरवाते रहो,
गरीब इंसान की रोटी से
टुकड़ा टुकड़ा कर चुरवाते रहो,
जब तक बैठे हो महलों में
झौंपड़ियों को उजड़वाते रहो।
यह ज्यादा नहीं चलेगा,
ज़माने की भलाई करने के नाम पर
सिंहासनों पर बुत बनकर बैठे लोगों
सुनो जरा यह भी
किसी दिन इतिहास अपना रुख बदलेगा,
किसी दिन तुम्हारी शख्सियत का
काला चेहरा भी हो जायेगा दर्ज
तब तक भले ही अपने तारीफों के पुल
कागजों पर जुड़वाते रहो।
———-
वातानुकूलित कक्षों में बैठकर वह
देश से गरीबी हटाने के साथ
विकास दर बढ़ाने पर चिंत्तन करते हैं,
बहसों के बाद
कागजों पर दौलतमंदों के
घर भरने के लिये शब्द भरते हैं।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  ‘Bharatdeep’,Gwalior
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समाज सेवा का धंधा-हिन्दी हास्य कविता (samaj seva ka dhandha-hindi hasya kavita


समाज सेवक की पत्नी ने कहा
‘‘सुनते हो जी!
आज नौकर छुट्टी पर गया है
तुम थैला लेकर जाओ,
उसमें आलु, टमाटर और धनिया
खरीद कर लाना
जब घर वापस आओ।’’
समाज सेवक ने कहा
‘‘अभी तक तुम्हारे मस्तिष्क का विकास हुआ नहीं है,
घर पर खाना जरूरी है क्या
मेरे साथ चलो जहां में जा रहा हूं
खाने का होटल भी वहीं है,
अगर किसी ने देख लिया
थैले में हम सब्जी भर भरने लगे हैं,
तब दानदाता भी
हमारे थैले में पैसे की जगह
आलु और टमाटर भरने लगेंगे
छवि के दम पर चल रहा है अपना धंधा
वरना कौन लोग अपने सगे हैं,
नौकर एक दिन की छुट्टी पर गया है
तुम हमें हमेशा के लिये
समाज के धंधे से रिटायर न कराओ।’’
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देश फिर भी अपना कमाकर खायेगा-हिन्दी व्यंग्य कविता (desh fir bhi kamakar khayega-hindi vyangya kavita)


यह खौफ क्यों सताता है तुमको
कि देश बिक जायेगा
कमबख्त, पहले लुटेरे
खुद लूटने आये इस देश का खजाना,
देश फिर भी फलाफूला
हो गये वह अपने देश रवाना,
अब उनके दलाल कमाकर दलाली
जमा कर रहे लुटेरों के घर दौलत,
फिर उसे उधार लेकर आते हैं,
ब्याज भी यहीं से कमाते हैं
अपने बनकर पा रहे वफादार जैसी शौहरत
सब मिट जायेंगे एक दिन
देश फिर भी अपना कमाकर खायेगा
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महात्मा गांधी का दर्शन भी निरापद नहीं-गांधी जयंती पर विशेष हिन्दी लेख (mahatma gandhi ka darshan aur bharat-special article on gandhi jaynati)


         दो अक्टोबर देश में गांधी जयंती मनाई जायेगी। प्रसंगवश इस दिन भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री का भी जन्म दिन मनाया जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इतिहास में किसी भी महापुरुष का नाम बिना किसी योग्यता, कठिन परिश्रम या त्याग के दर्ज नहीं होता पर यह भी सत्य है कि एतिहासिक पुरुषों के व्यक्तित्व और कृतित्व का मूल्यांकन समय समय पर अनेक लोग अपने ढंग से करते हैं। एतिहासिक पुरुषों के परमधाम गमन के तत्काल बाद सहानुभूति के चलते जहां उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का मूल्यांकन करने वाले अत्यंत सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनाते हैं। उस समय कोई प्रतिकूल टिप्पणियां नहीं करता पर समय के साथ ही एतिहासिक पुरुषों के व्यक्तित्व का प्रभाव क्षीण होने लगता है तब विचारवान लोग प्रतिकूल टिप्पणियां भले न करें पर कुछ प्रश्न उठाने ही लगते हैं।
          गांधीजी के दर्शन  पर भी अनेक सवाल उठते हैं तो श्रीलाल बहादुर शास्त्री के बारे में भी यह पूछा जाता है कि पाकिस्तान से युद्ध जीतने के बाद भी उन्होंने मास्को जाकर सोवियत संघ की मध्यस्थता स्वीकार कर हारने जैसा काम क्यों किया? बहुत समय तक यह सवाल किसी ने नहीं पूछा था पर जब कारगिल युद्ध के बंद होने के बाद यह बात उठी थी तब शास्त्री जी की भूमिका सामने आयी थी भले ही उस समय सीधे किसी ने उनका नाम लेकर आक्षेप नहीं किया गया। फिर यह सवाल चर्चा में अधिक नहीं आया पर विचारवान लोगों के लिये इतना ही बहुत था। पाकिस्तान को परास्त करने के बाद विजेता भारत के प्रधानमंत्री का इस तरह मास्को जाकर पाकिस्तान के हुक्मरानों से समझौता करना वाकई देश के लिये कोई सम्मान की बात नहीं थी-यह बात आज अनेक लोग मानते हैं। इस समझौते में पाकिस्तान की जमीन बिना कुछ लिये दिये वापस कर दी गयी थी।
            गांधीजी को विश्व में महान सम्मान प्राप्त हुआ है पर भारतीय जनमानस में अब उनकी छवि क्षीण हो रही है फिर अब फिल्म, क्रिकेट और अन्य प्रतिष्ठित क्षेत्रों में सक्रिय नये नये महापुरुषों का भी प्रचार हो रहा है। सरकारी और गैर सरकारी तौर पर गांधी जयंती के समय खूब प्रचार होने के साथ ही अनेक कार्यक्रम भी होते हैं पर लगता नहीं कि आज के कठिन समय का सामना कर रहा भारतीय जनमानस उसमें बढ़चढ़कर हिस्सा लेता हो। गांधीजी को राजनीतक संत कहना उनके दर्शन को सीमित दायरे में रखना है। मूलतः गांधी जी एक सात्विक प्रवृत्ति के धार्मिक विचार वाले व्यक्ति थे। निच्छल हªदय और सहज स्वभाव की वजह से उनमें उच्च जीवन चरित्र निर्माण हुआ। एक बात तय है कि उन्होंने भारत को अंग्रेजों से आजाद कराने का जब अभियान प्रारंभ किया होगा तब उनका लक्ष्य आत्मप्रचार पाना नहीं बल्कि देश के आम इंसान का उद्धार करना रहा होगा। अलबत्ता अपने आंदोलन के दौरान उन्होंने इस बात को अनुभव किया होगा कि उनके सभी सहयोग उनकी तरह निष्काम नहीं है। इसके बावजूद वह इस बात को लेकर आशावदी रहे होंगे कि समय के अनुसार बदलाव होगा और अपने ही देश के भले लोग राज्य अच्छी तरह चलायेंगे। कालांतर में जो हुआ वह हम सब जानते हैं। उनके सपनों का भारत कभी न बना न बनने की आशा है। स्थिति यह है कि अनेक अनुयायी अब दूसरे स्वाधीनता आंदोलन का बात करने लगे हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि गांधी जी का सपना पूरा नहीं हुआ और जिस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये उन्होंने स्वाधीनता आंदोलन प्रारंभ किया वह पूरा नहीं हुआ। दूसरे शब्दों में 15 अगस्त 1947 को मिली आजादी केवल एक ऐसा प्रतीक है जिसकी स्मृतियां केवल उस दिन मनाये जाये वाले कार्यक्रमों में ही मिलती है। जमीन पर अभी गांधीजी के सपनों का पूरा होना बाकी है।
        यहां हम गांधीजी के व्यक्तित्व और कृतित्व की आलोचना नहीं कर रहे क्योंकि हम जैसा मामूली शख्स भला उन पर क्या लिख सकता है? अलबत्ता देश के हालात देखकर वैचारिक रूप से गांधी दर्शन अब निरापद नहीं माना जा सकता है। सबसे पहला सवाल तो यह है कि भारत का स्वाधीनता आंदोलन अंततः एक राजनीतिक प्रयास था जिसमें राजकाज भारतीयों के हाथ में होने का लक्ष्य तय किया गया था। दूसरी बात यह कि गांधीजी ने अंग्रेज सरकार के विरुद्ध आंदोलन किया था जिस पर भारतीयों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करने का आरोप था। इसके अलावा देश की समस्याओं के प्रति अंग्रेज सरकार की प्रतिबद्धता पर भी संदेह जताया गया था। इसका अर्थ सीधा है कि गांधीजी एक ऐसी सरकार चाहते थे जो देश के लोगों की होने के साथ ही जनहित का काम करे। ऐसे में राजकाज के पदों पर बैठने वाले महत्वपूर्ण लोगों की गतिविधियां महत्वपूर्ण होती हैं। तब गांधी जी ने राजकाज प्रत्यक्ष रूप से चलाने के लिये कोई पद लेने से इंकार क्यों किया? क्या वह इन पदों को भोग का विषय समझते थे या दायित्व निभाने के लिये अपने अंदर क्षमता का अभाव अनुभव करते थे। अगर यह दोनों बातें नहीं थी तो क्या उनको भरोसा था कि जो लोग राजकाज देखेंगे वह उनके रहते हुए अच्छा काम ही करेंगे? क्या उनको यकीन था कि जिन लोगों को वह राजकाज का जिम्म सौंपेंगे वह अच्छा ही काम करेंगे?
यकीनन सरकार का सैद्धांतिक रूप उनके सपनों में रहा हो पर व्यवहारिक  रूप से उनको इसका कोई अनुभव नहीं था। वह राजनीतिक के सैद्धांतिक पक्ष और व्यवहारिक स्थिति के अंतर को नहीं जानते थे। उन्होंने एक ऐसा राजनीतिक अभियान शुरु किया जो कालांतर में सीमित लक्ष्य प्राप्त कर समाप्त हो गया। आज उसी प्राप्त लक्ष्य को भी चुनौती मिल रही है। गांधी जी के अनुयायी और आज के महानायक अन्ना हजारे मानते हैं कि आज का शासन भी अंग्रेजों जैसा ही है। श्री अन्ना हजारे स्वयं भी कोई पद नहीं लेना चाहते पर देश के स्वच्छ और विकसित होने की का जिम्मा सरकार का ही मानते हैं। तब ऐसा लगता है कि एक राजनीति शास्त्र का ज्ञान न रखने वाला व्यक्ति भी राजनीति कर सकता है या राजकाज कोई पद संभाल सकता है। हमारा तो मानना है कि अंग्रेजों के विरुद्ध गांधीजी के आंदोलन के बारे में अब इतिहास पढ़ने की आवश्यकता ही नहीं अन्ना जी का आंदोलन बता रहा है कि उस समय क्या क्या हुआ होगा?
        28 अगस्त को अन्ना साहिब का जनलोकपाल विधेयक लाने संबंधी आंदोलन समाप्त हुआ। हासिल कुछ नहीं हुआ पर उन्होंने कहा कि हमें आधी जीत मिली है। तब हम जैसे लोग सड़कों पर घूमते हुए उस आधी जीत को ढूंढते हुए सोच रहे थे कि 16 अगस्त को भी कोई हम जैसा शख्स रहा होगा जो उस आजादी को ढूंढ रहा होगा जिसका दावा उस समय किया जा रहा था। बहरहाल गांधीजी के आंदोलन के पीछे उस समय के धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक, तथा आर्थिक शिखरों पर बैठे लोग रहे होंगे जो अपने हित साधन के लिये ही ऐसी आजादी चाहते होंगे ताकि वह देश के आम इंसान को गुलाम बनाये रख सके। पता नहीं गांधीजी यह देख पाये या नहीं पर इतना तय है कि वह जैसा भारत चाहते थे वैसा बन नहीं पाया। आखिरी बात यह है कि गांधीजी सात्विक प्रवृत्ति के थे और उनका आंदोलन राजस वृत्ति का था। बात अगर राजनीति की है तो उसमे सात्विक प्रवृत्ति की आशा करना व्यर्थ है। यह राजसी वृत्ति वाले लोगों का काम है। राजसी वृत्ति बुरी नहीं है बशर्त व्यक्ति अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिये उचित ढंग से कार्य करे। मुश्किल यह है कि तामसी वृत्ति वाले लोग अब राजकाज करने लगे हैं। भारत में दूसरी भी समस्या है। राजसी लोगों को स्वार्थी जानकर लोग हªदय से सम्मान नहीं करते जबकि सामूहिक नेतृत्व करना उन्हीं के बूते का होता है। सात्विक लोगों को समाज सम्मान देता है पर वह निष्काम होने के कारण राजकाज का काम नहीं करते। यही कारण है कि राजसी वृत्ति के लोग सात्विक लोगों को ढाल बनाकर आगे चलते हैं ताकि समाज उनका नेतृत्व और शासन स्वीकार करे। इसी कारण पूरे विश्व के राष्ट्राध्यक्ष अपने संपर्क धार्मिक नेताओं  से रखते हैं। गांधी को हमने देखा नहीं और अन्ना से कभी मिले नहीं पर प्रचार माध्यमों में देखकर हमने अनुभव किया वह लिख दिया। इस अवसर पर महात्मा गांधी जी और शास्त्री जी को हमारी हार्दिक श्रद्धांजलि!
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
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नजारों की असलियत-हिन्दी कविता (nazaron ki asaliyat-hindi kavita or hindi poem)


पुराने सामान रंगने के बाद भी
बिकने के लिये बाज़ार में सज जाते हैं,
बूढ़े चेहरे भी पुतकर क्रीम से आते पर्दे पर
लोगों के हाथ उनकी तारीफ में बज जाते हैं,
ज़माने ने आंखें भले खोलकर रखी हैं,
मगर सभी के नजरिये पर ताले लग जाते हैं।
………………………
आंखें खुली हों
मगर दिमाग बंद हो
नजारों की असलियत
लोग नहीं समझ पाते हैं,
जुबान से वह क्या बयान करेंगे
दूसरों की आवाज सुनकर
कान उनके झूमने लग जाते हैं,
कहें दीपक बापू
जगायें तो उन लोगों को
जो सो रहे हों,
यहां तो सभी जागते हुए भी
सोते नज़र आते हैं।
—————
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  “Bharatdeep”,Gwalior
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हिंदी भाषा का महत्व और गरीब-हिन्दी व्यंग्य (hindi ka mahtav aur garib-hindi vyangya)


                14 सितंबर 2011 बुधवार को हिन्दी दिवस मनाया जाने वाला है। इस अवसर पर देश में हिन्दी बोलो, हिन्दी सुनो और हिन्दी समझो जैसे भाव का बोध कराने वाले परंपरागत नारे सुनने को मिलेंगे। प्रचार माध्यम बतायेंगे कि हिन्दी अपने देश में ही उपेक्षित है। हिन्दी को निरीह गाय की तरह देखा जायेगा भले ही वह असंख्य बुद्धिजीवियों को शुद्ध दूध, देशी की तथा मक्खन खिलाती हो। इसी दिन अनेक कार्यक्रम होंगे तो नाश्ता वगैरह भी चलेगा।
           शायद इस लेखक ने अपने ब्लागों पर कई लेखों मे खुशवंत सिंह नामक अंग्रेजी के लेखक की चर्चा की है। दरअसल उन्होंने एक बार लंदन में कहा था कि ‘ भारत में हिन्दी गरीबों की भाषा है।’ इस पर देश में भारी बवाल मचाया गया। समस्त प्रचार माध्यम राशन पानी लेकर उनके पीछे पड़ गये। उनका बयान यूं सुनाया गया कि खुशवंत सिंह ने कहा है कि हिन्दी गरीबों भाषा है। इस लेखक ने वह समाचार पढ़ा। हिन्दी को गरीब भाषा कहने पर मन व्यथित हुआ था तो एक अखबार में संपादक के नाम पत्र में उनकी खूब बखिया उधेड़ी। उसके बाद कुछ समाचार पत्रों में उनका पूरा बयान भी आया। उससे साफ हो गया कि उन्होंने हिन्दी को गरीबों की भाषा कहा है। तब भी मन ठंडा नहीं हुआ क्योंकि तब जीवन का ऐसा अनुभव नहीं था। समय ने करवट बदली। दरअसल इस प्रचार के बाद से खुशवंत सिंह के लेख हिन्दी भाषा में अनुवाद होकर छपने लगे। तब यह सोचकर हैरानी होती थी कि जिस शख्स पर यह अखबार वाले इस कदर पिल पड़े थे उनके लेख अनुवाद कर क्यों हिन्दी पाठकों के सामने प्रस्तुत कर उनको चिढ़ा रहे हैं? अब यह बात समझ में आने लगी है कि इस तरह के प्रचार से उस समय के बाज़ार प्रबंधक एक ऐसा नायक गढ़ रहे थे जिसे हिन्दी में पढ़ा जाये। उस खुशवंत सिंह को बता दिया गया होगा कि यह सब फिक्स है और अब आपकी रचनायें हिन्दी में छपा करेंगी।
        खुशवंत सिंह ने अपने उसी बयान में हिन्दी भाषा में चूहे के लिये रेट और माउस अलग अलग शब्द न होने पर अफसोस जताया था। इससे उन पर हंसी आयी थी। दरअसल वह अंग्रेजी भाषा के लेखक हैे पर उसका सही स्वरूप नहीं जानते। वह कहते है कि भारत में हिन्दी गरीबों की भाषा है यह हमने मान लिया मगर वह इस लेखक की बात-उनको हिन्दी आती नहीं और हम कोई बड़े लेखक नहीं है कि उन तक पहुंच जायेगी पर इंटरनेट पर यह संभावना हम मान ही लेते हैं कि उनके शुभचिंतक पढ़ेंगे तो उन्हें बता सकते हैं-मान लें कि अंग्रेजी भाषा इस धरती पर दो ही प्रकार के लोग लिखते और बोलते हैं एक साहब दूसरे गुलाम! जिनको अंग्रेजी से प्रेम है वह इन्हीं दो वर्गों में अपना अस्तित्व ढूंढे तीसरी स्थिति उनकी नहीं है। याद रखें यह संसार न साहबों की दम पर चलता है न गुलामों के श्रम पर पलता है। उनके अपने रिश्ते होंगे पर स्वतंत्र वर्ग वाले अपनी चाल स्वयं ही चलते हैं। स्वतंत्र वर्ग वाले वह लोग हैं जो अपनी बुद्धि से सोचकर अपने ही श्रम पर जिंदा हैं। उनका न कोई साहब है न गुलाम।
          बहरहाल हम यह तो मानते हैं कि इस देश में हिन्दी अब गरीबों की भाषा ही रहने वाली है और यहीं से शुरु होता है इसका महत्व! इंटरनेट पर हिन्दी के महत्व पर लिखे गये एक लेख पर अनेक लोग उद्वेलित हैं। वह कहते हैं कि हिन्दी का आपने महत्व तो बताया ही नहीं। उनका जवाब देना व्यर्थ है। दरअसल ऐसे लोग एक तो अपनी बात रोमन लिपि में लिखते हैं। अगर हिन्दी में लिखते हैं तो उनका सोच अंग्रेजी का है। मतलब कहंी न कहंी गुलामी से ग्रसित हैं। हम यह बात स्पष्ट करते रहते हैं कि हिन्दी अनेक लोगों को कमा कर दे रही है। अगर ऐसा नहीं है तो हिन्दी फिल्मों, समाचार पत्रों और टीवी धारावाहिकों में हिन्दी के प्रसारण प्रकाशन में अंग्रेजी शब्द क्यों घुसेड़ते हैं? अपनी बात पूरी अंग्रेजी में ही क्यों नहीं करते? हिन्दी चैनल चला ही क्यों रहे हैं? अपने चैनल में अंग्रेजी ही चलायें तो क्या समस्या है?
      नहीं! वह ऐसा कतई नहीं करेंगे! इसका सीधा मतलब है कि अंग्रेजी हमेशा हर जगह कमाने वाली भाषा नहीं हो सकती। दूसरा यह भी कि अंग्रेजी पढ़ने वाले सभी साहब नहीं बन सकते! जो साहब बनते हैं उनके हिस्से में भी ऐसी गुलामी आती है जो पर्दे के पीछे वही अनुभव कर सकते हैं भले उनके सामने सलाम ठोकने वालों का जमघट खड़ा रहता हो। आप किसी माता पिता से पूछिये कि‘‘अपने बच्चे को अंग्रेजी क्यों पढ़े रहे हैं?’
          ‘जवाब मिलेगा कि ‘‘आजकल इसके बिना काम नहीं चलता!’’
         देश के सभी लोग अमेरिका, कनाडा या ब्रिटेन  नहीं जा सकते। जायें भी तो अंग्रेजी जानना आवश्यक नहीं जितनी कमाने की कला उनके होना चाहिए। एक पत्रिका में हमने पढ़ा था कि आज़ादी से पहले एक सिख फ्रांस गया। उसे अंग्रेजी क्या हिन्दी भी नहीं आती थी। इसके बावजूद अपने व्यवसायिक कौशल से वह वहां अच्छा खासा कमाने लगा। अब हो यह रहा है कि लोगबाग अपनी भाषा से परे होकर अंग्रेजी भाषा को आत्मसात करने के लिये इतनी मेहनत करते हैं कि किसी अन्य विषय का ज्ञान उनको नहीं रहता। बस उनको नौकरी चाहिए। सच बात कहें तो हमें लगता है कि हमारी शिक्षा पद्धति में अधिक शिक्षा प्राप्त करने का मतलब है निकम्मा हो जाना। बहुत कम लोग हैं जो अंग्रेजी में शिक्षा प्राप्त करने के बाद निजी व्यवसायों में सफलता प्राप्त कर पाते हैं। उनसे अधिक संख्या तो उन लोगों की है जो कम पढ़े हैं पर छोटे व्यापार कर अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रखते हैं। अंग्रेजी में शिक्षा प्राप्त करने के बाद रोजगारी की कोई गारंटी नहीं है पर इससे एक खतरा है कि हमारे यहां के अनेक लोग परंपरागत व्यवसायों को हेय समझ कर उसे करते नहीं या उनको शर्म आती है जिसकी चरम परिणति बेरोजगार की उपाधि है।
        अंग्रेजी पढ़कर कंपनियों के उत्पादों की बिक्री करने के लिये घर घर जाने को भले ही सेल्समेनी कहा जाता हो पर अंततः पर इसे फेरी लगाना ही कहा जाता है। यह काम कम शिक्षित लोग बड़े आराम से कर जाते हैं। अलबत्ता सेल्समेन के बड़े व्यापारी बनने के संभावना क्षीण रहती है जबकि फेरीवाले एक न एक दिन बड़े व्यापार की तरफ बढ़ ही जाता है। न भी बने तो उसका स्वतंत्र व्यवसाय तो रहता ही है।
         पता नहीं हिन्दी का महत्व अब भी हम बता पाये कि नहीं। सीधी बात यह है कि हिन्दी गरीबों की भाषा है और उनकी संख्या अधिक है। वह परिश्रमी है इसलिये उपभोक्ता भी वही है। उसकी जेब से पैसा निकालने के लिये हिन्दी भाषा होना जरूरी है वह भी उसके अनुकूल। अपने अंदर हिन्दी जैसी सोच होगी तो हिन्दी वाले से पैसा निकलवा सकते हैं। उसके साथ व्यवहार में अपने हित अधिक साध सकते हैं। देखा जाये तो इन्हीं गरीबों में अनेक अपने परिश्रम से अमीर भी बनेंगे तब उनकी गुलामी भी तभी अच्छी तरह संभव है जब हिन्दी आती होगी। वैसे तो गुलामी मिलेगी नहीं पर मिल भी गयी तो क्लर्क बनकर रह जाओगे। उसकी नज़रों में चढ़ने के लिये चाटुकारिता जरूरी होगी और वह तभी संभव है जब गरीबों की भाषा आती होगी। अंग्रेजी अब बेरोजगारों की भाषा बनती जा रही है। साहबनुमा गुलामी मिल भी गयी तो क्या? नहीं मिली तो बेरोजगारी। न घाट पर श्रम कर सके न घर के लिये अनाज जुटा सके। इतना लिख गये पर हमारे समझ में नहीं आया कि हिन्दी का महत्व कैसे बखान करें। अब यह तो नहीं लिख सकते कि देखो हिन्दी में इंटरनेट पर लिखकर कैसे मजे ले रहे हैं? यह ठीक है कि इसे गरीबों की भाषा कह रहे हैं। हम इस लिहाज से तो गरीब हैं कि हमें अंग्रेजी लिखना नहीं आती। पढ़ खूब जाते हैं। वैसे लिखना चाहें तो अंग्रेजी में सौ पचास लेखों के बाद अच्छी अंग्रेजी भी लिखने लगेंगे पर यकीनन उसमें मजा हमको नहीं आयेगा। वैसे हिन्दी दिवस पर प्रयास करेंगे कि हिन्दी का महत्व जरूर बतायें। यह लेख तो इसलिये लिखा क्योंकि हिन्दी दिवस के नाम से सर्च इंजिनों पर हमारे पाठ खूब पढ़े जा रहे हैं।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
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हर कोई मतलब का सगा है-हिन्दी शायरी (har koyee matalab ka saga hai-hindi shayari


क्यों उम्मीद करते हो उन लोगों से
जो हुकूमत का पहाड़ चढ़ने के लिए
तुमसे पाँव उधार मांगने आते हैं,
बताओ ज़रा यह कि
जिनके सिर आसमान में टंगे हैं
चमकते सितारों की तरह
उनकी आँखों को नीचे के बदसूरत नज़ारे
कब नज़र आते हैं।
———–
जब से सीखा है
कौवे से किसी दूसरे पर
कभी भरोसा न करना
ज़िंदगी अपने अमन और चैन रहने लगा है,
हो गया है इस बात का अहसास कि
वफा बाज़ार में बिकने वाली शय है
यहाँ हर कोई मतलब का सगा है।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
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अन्ना हजारे (अण्णा हजारे) और बाबा रामदेव के आंदोलन और टीवी चैनलों के विज्ञापन (movement of anna hazare and baba ramdev and TV edvertisement-hindi lekh)


        अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आंदोलनों पर टीवी समाचार चैनलों और समाचार पत्रों में इतना प्रचार होता है कि अन्य विषय दबकर रह जाते हैं। एक दो दिन तक तो ठीक है पर दूसरे दिन बोरियत होने लगती है। इसमें     कोई संदेह नहीं है कि जब जब इस तरह के आंदोलन चरम पर आते हैं तब लोगों का ध्यान इस तरफ आकृष्ट होता है। अब यह कहना कठिन है कि प्रचार माध्यमों के प्रचार की वजह से भीड़ आकृष्ट होती है या उसकी वजह से प्रचार कर्मी स्वतः स्फूर्त होकर आंदोलन के समाचार देते हैं। एक बात तय है कि आम      ज जनमानस  पर उस समय गहरा प्रभाव होता है। यही कारण है कि इस दौरान समाचार चैनल ढेर सारे ब्रेक लेकर विज्ञापन भी चलाते हैं। हालांकि समाचार चैनलों के विज्ञापनों के दौरान लोग अपने रिमोट भी घुमाकर विभिन्न जगह समाचार देखते रहते हैं। इन समाचारों का प्रसारण इतना महत्वपूर्ण हो जाता है कि टीवी समाचार चैनल क्रिकेट और फिल्म की चर्चा भूल जाते हैं जिसकी विषय सामग्री उनके लिये मुफ्त में आती है। वैसे इन आंदोलनों के दौरान भी उनका कोई खर्च नहीं आता क्योंकि वेतन भोगी संवाददाता और कैमरामेन इसके लिये राजधानी दिल्ली में मुख्यालय पर नियुक्त होते हैं।
           इन आंदोलनों के प्रसारण को इतनी लोकप्रियता क्यों मिलती है? सीधा जवाब है कि इस दौरान इतनी नाटकीयतापूर्ण उतार चढ़ाव आते हैं कि फिल्म और टीवी चैनलों की कल्पित कहानियों का प्रभाव फीका पड़ जाता है। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि पूर्ण दिवसीय कोई फिल्म देख रहे हैं। अन्ना हजारे की गिरफ्तारी के बाद समाचारों में इतनी तेजी से उतार चढ़ाव आया कि ऐसा लगता था कि जैसे कोई मैच चल रहा हो। स्थिति यह थी िएक मोड़ पर विचार कर ही रहे थे कि दूसरा आ गया। फिर तीसरा और फिर चौथा! अब सोच अपनी राय क्या खाक बनायें!
          बाबा रामदेव के समय भी यही हुआ। घोषणा हो गयी कि समझौता हो गया! हो गया जी! मगर यह क्या? जैसे किसी फिल्म के खत्म होने का अंदेशा होता है पर पता लगता है कि तभी एक ऐसा मोड़ आ जिसकी कल्पना नहीं की थी। कहने का अभिप्राय यह है कि इस नाटकीयता के चलते ऐसे आंदोलन प्रचार माध्यमों के लिये मुफ्त में सामग्री जुटाने का माध्यम वैसे ही बनते हैं जैसे क्रिकेट और फिल्में। हमने आज एक आदमी को यह कहते हुए सुना कि ‘इस समय लोग शीला की जवानी और बदनाम मुन्नी को भूल गये हैं और अन्ना का मामला गरम है।’ ऐसे में हमारे अंदर यह ख्याल आया कि फिल्म और क्रिकेट वाले जिस तरह मौसम का अनुमान कर अपने प्रदर्शन की तारीख तय करते हैं उसी तरह उनको अखबार पढ़कर यह भी पता करना चाहिए कि देश में कोई इस तरह का आंदोलन तो नहीं चल रहा क्योंकि उस समय जनमानस पूरी तरह उनकी तरफ आकृष्ट होता है।
         हमने पिछले दो दिनों से इंटरनेट को देखा। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव शब्दों से खोज बहुत हो रही है। यह तब स्थिति है जब टीवी चैनल हर पल की खबर दे रहे हैं अगर वह कहीं प्रतिदिन की तरह फिल्म और क्रिकेट में लगे रहें तो शायद यह खोज अधिक बढ़ जाये क्योंकि तब लोग इंटरनेट की तरफ ताजा जानकारी के लिये भागेंगे। हमने यह भी देखा है कि इन शब्दों की खोज पर ताजा समाचार लेख लगातार आ रहे थे। अगर समाचार चैनल ढील करते तो शायद इंटरनेट पर खोज ज्यादा हो जाती।
        अब खबरों की तेजी देखिये। पहले खबर आयी कि अन्ना हजारे कारावास से बाहर आ रहे हैं। अभी हैरानी से उभरे न थे कि खबर आयी कि उन्होंने बिना शर्त आने से इंकार कर दिया है। खबर आयी कि अन्ना साहेब की तबियत खराब है। मन में उनके लिये सहानुभूति जागी और यह भी विचार आया पता नहीं क्या होगा? पांच दो मिनट में पता लगा कि वह ठीक हैं।
        ऐसी नाटकीयता भले ही आम आदमी को व्यस्त रखती हो पर गंभीर लोगों के लिये ऐसे आंदोलन मनोरंजन की विषय नहीं होते। कभी कभी तो यह लगता है कि मूल विषय चर्चा से गायब हो गया है। खबरांे की नाटकीयता का यह हाल है कि अब बहस केवल अन्ना साहेब के अनशन स्थल और समय के आसपास सिमट गयी । जबकि मूल विषय देश के भ्रष्टाचार का निरोध पर चर्चा होना चाहिए था । इस पर अनेक लोगों का अपना अपना सोच है। अन्ना साहेब का अपना सोच है। ऐसे में निष्कर्ष निकालने के लिये सार्थक बहस होना चाहिए। देश में बढ़ता भ्रष्टाचार कोई एक दिन में नहीं आया न जाने वाला है। जब हम जैसे आम लेखक लिखते हैं तो वह इधर या उधर होने के दबाव से मुक्त होते हैं इसलिये कहीं न कहीं प्रचार के साथ ही प्रायोजन की धारा में सक्रिय बुद्धिजीवियों से अलग ही बात लिखते हैं पर संगठित समूहों के आगे वह अधिक नहीं चलती। स्थिति यह थी कि भ्रष्टाचार निरोध से अधिक अनशन स्थल पर ही बहस टिक गयी। हमारा तो सीधा मानना है कि आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक संगठनों पर धनपति स्वयं या उनके अनुचर बैठ गये हैं। पूरे विश्व में प्रचार और समाज प्रबंधक उनके सम्राज्य के विस्तार तथा सुरक्षा के लिये आम जानमानस को व्यस्त रखते हैं। इससे जहां धनपतियों को आय होती है तो समाज के एकजुट होकर विद्रोह की संभावना नहीं रहती। हम अगर किसी देशी की वास्तविक स्थिति पर चिंतन करें तो यह बात करें तभी बात समझ में आयेगी। हमें तो इंटरनेट पर एक प्रकाशित एक लेख में यह बात पढ़कर हैरानी हुई थी कि अन्ना हजारे की गिरफ्तारी पर दुबई और मुंबई में भारी सट्टा लगा था। जहां भी सट्टे की बात आती है हमारे दिमाग में बैठा फिक्सिंग फिक्सिंग की कीड़ा कुलबुलाने लगता है। अभी तक क्रिकेट और अन्य खेलों के परिणामों पर सट्टेबाजों के प्रभाव से फिक्सिंग की बात सामने आती थी जिससे उनसे विरक्ति आ गयी पर जब ऐसी खबरें आयी तो यकीन नहीं हुआ। अन्ना साहेब भले हैं इसलिये उनके आंदोलन पर आक्षेप तो उनके विरोधी भी नहीं कर रहे पर इस दौरान हो रही नाटकीयता विज्ञापन प्रसारण के लिये बढ़िया सामग्री बन जाती है।

————–

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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फरिश्ते जनभक्षी हो गए–हिन्दी व्यंग्य शायरियाँ


जन जन के भले की बात करते हुए
कई फरिश्ते जनभक्षी हो गए हैं,
दाने खिलाने के लिए हाथ फैलाते हैं
जिनको खिलाने के लिए
वही जन उनके लिए
शिकार करने वाले पक्षी हो गए हैं।
———————–
नरभक्षियों का समय गया
अब खतरा जनभक्षियों का हो गया है,
चेहरे काले नहीं खूबसूरत हैं,
हाथों में तलवार की जगह
जुबान के हर शब्द में प्यार है,
मगर जन जन के भले की बात
करने वाले इन फरिश्तों के लिए
आम इंसान
शिकार करने लायक पक्षियों जैसा हो गया है।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
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आजादी दिवस की छूट-स्वतंत्रता दिवस पर हिन्दी हास्य कविता (azadi divas par riyayat-hindi hasya kavita)


कुछ लोगों ने अपनों को
गुलाम रखने की
स्वतंत्रता पाई है,
वरना तो अपने आकाओं की
अभी भी बजा रहे हैं
बस!
केवल स्वतंत्रता दिवस
हर साल मनाने की छूट उन्होंने पाई है।
——-
कहते हैं कि अंग्रेज छोड़ गये
पर अपनी अंग्रेजियत छोड़ गये हैं,
यही कारण है कि
गुलामों के सरदार आज भी बंधक है
उनके ख्यालों के
पर उनके प्रजाजन भी
अंग्रेज बनने की होड़ में लग गये हैं।
————
वह मुक्तिदाता कहलाये
वरना तो गुलाम आज भी रखते हैं।
अब तलवार और तोप से नहीं
बल्कि खज़ाना अपने यहां रखकर
ख्यालों से दिमाग को ढंककर
गुलामों में भी सरदार बनाकर,
स्वतंत्रता के भ्रमजाल को अधिक घना कर
अपना शासन बनाये हैं,
साथ ही देवता होने का स्वांग भी रचते हैं।
————-
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चमकते सितारे बदसूरत नज़ारे-हिन्दी कविता


क्यों उम्मीद करते हो उन लोगों से
जो हुकूमत का पहाड़ चढ़ने के लिए
तुमसे पाँव उधार मांगने आते हैं,
बताओ ज़रा यह कि
जिनके सिर आसमान में टंगे हैं
चमकते सितारों की तरह
उनकी आँखों को नीचे के बदसूरत नज़ारे
कब नज़र आते हैं।
———–
जब से सीखा है
कौवे से किसी दूसरे पर
कभी भरोसा न करना
ज़िंदगी अपने अमन और चैन रहने लगा है,
हो गया है इस बात का अहसास कि
वफा बाज़ार में बिकने वाली शय है
यहाँ हर कोई मतलब का सगा है।
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-जुआ और शराब मनुष्य का नाश करते हैं


            यह प्रकृति की महिमा है कि मनुष्य का ध्यान व्यसनों की तरफ बहुत आसानी से चला जाता है। इसमें मद्यपान तथा जुआ दो ऐसे व्यसन हैं जो आदमी के तन, मन और धन की क्षति करते हैं पर फिर भी वह इसे अपनाता है। यह सही है कि सारे संसार में लोग एक जैसे नहीं होते पर प्रवृत्ति तो सभी की एक जैसी है। जिनके पास धन आता है उनका ऐसी राह पर चले जाना सहज होता है। जिनके पास धनाभाव है वह ऐसी प्रवृत्तियों में लिप्त इसलिये नहीं होते क्योंकि उनके पास अवसर नहीं होता।
          आर्थिक विशेषज्ञ अपने आंकड़े बताते हैं कि भारत में धनिकों की संख्या बढ़ी है तो सामाजिक विशेषज्ञ भी यह रेखांकित करते हैं कि देश में खतरनाक प्रवृत्तियों वाले लोग भी बढ़ते जा रहे हैं। शराब और जुआ के प्रति लोगों का रूझान बढ़ रहा है। स्थिति यह है कि धनिकों की संगत वाले युवा अपनी जरूरतों के लिये अपराध की तरफ अपने कदम बढ़ाते जा रहे हैं।
पानझिप्तो हि पुरुषो यत्र तत्र प्रवर्तते।
वात्यसंव्यवहारर्यत्वै यत्र तत्र प्रवर्त्तनात्।।
                ‘‘मद्यपान का आदी पुरुष हर जगह अपना मुंह डालते हैं। मद्यपान के आदी पुरुष व्यवहार के योग्य नहीं रह जाते।’’
कामं स्त्रियं निषेवेत पानं वा साधुमात्रया।
न युतमृगये विद्वान्नात्यंव्यसने हि ते।।
             ‘‘भले ही कोई पुरुष स्त्रियों से अधिक संपर्क रखता हो और थोड़ी मात्रा में मद्यपान भी करे पर द्युतक्रीड़ा और शिकार में लिप्त होना तो बहुत बुरा व्यसन है।’’
          भारतीय समाज में अनेक विरोधाभास हैं जिनमें एक यह भी है कि जहां धर्म कर्म के नाम पर शोरशराबा बढ़ रहा है वही शराब और जुआ को सामाजिक शिष्टाचार माना जाने लगा है। अब तो यह संभव ही नहीं है कि कोई व्यक्ति यह कहे कि मैं शराबी से अपने संपर्क नहीं रखूंगा। पहले जिन रिश्तों के सामने शराब की बात तक कहना भी कठिन था उनके पास बैठक बड़े मजे से सेवन किया जाता है।
              इस तरह विचार परिवर्तन से सत्य नहीं बदल जायेगा। शराब शनै शनै मनुष्य की मानसिकता को प्रभावित करती है। उसके व्यवहार में विश्वास की कमी आने लगती है। इस बात को केवल तत्वज्ञानी ही अनुभव कर सकते हैं। वैसे आज तो यह स्थिति है कि मित्रता और व्यवहार के समूह बनते ही ऐसी आदतों पर हैं जिनको वर्जित माना जाता है। जुआ या सट्टा तो इस तरह आम हो गया है कि प्रसिद्ध खेल, धारावाहिक और चुनावों में इसका प्रभाव देखा जाता है। ऐसे में समाज के बिगड़ने की शिकायत करना बेमानी लगता है। यहां तो पूरी दाल ही काली है और जब हम समाज के बिगड़ने की बात कहते हैं तो अपनी मान्यताओं का भी विचार करना चाहिए। स्वयं तथा निकटस्थ लोगों को शराब और जुआ जैसे व्यवसनों से दूर रहने के लिये प्रेरित करना चाहिए।

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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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अपनी जुबान-हिन्दी शायरी


अपना दर्द बयान करते करते
हमारी जुबां थक गयी
पर पता नहीं
गले तक मुसीबत में डूबे इस जहां में
किसी ने सुना कि नहीं,
लोगों के कान खुले दिखते हैं
मगर अपनी बात आप ही सुनते
दूसरे का स्वर पहचानते हों
यह लगता नहीं,
हो सकता है
हमारी आवाज ही बेअसर हो कहीं
या जुबां लफ्ज असरदार बोलती नहीं।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  ‘Bharatdeep’,Gwalior
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मशविरों के चिराग-हिन्दी हास्य कविताएँ (mashviron ke chirag-hindi comic poem’s


घायल का दर्द हो
चाहे टूटे आशिक का गम हो
बाज़ार के लिए कमाए का जरिया है,
लोगों के आँखों के सामने
पर्दे पर  नज़ारे
मुफ्त में नहीं चलते,
चीजों को खरीदने के
मशविरों के चिराग भी साथ जलते,
दौलतमंदों के घर की खुशियां हों
चाहे नटों के जन्मदिन
बन जाता है
हर समय कमाई का दरिया।
—————-
टीवी चैनल का संवाददाता
ज़ोर से चिल्लाया
“संपादक जी
बड़ी जोरदार रेल दुर्घटना हुई है
कई लोगों के मरने की आशंका है।”
सुनते ही संपादक ने खुश होकर
संवाददाता को आगे की खबर
थोड़ी देर बाद देने को कहा
और फिर अपने प्रबंधक से कहा
“जनाब, अपने विज्ञापन विभाग से कहें,
अगले 48 घंटे तक सजग रहें,
रेल दुर्घटना में जहां मरने के दर्द भी होंगे,
तो संजोग से बचे कुछ खुश मर्द भी होंगे,
इसलिए अपना समय अच्छा पास होगा
बजने वाला आपकी कमीशन का डंका है।
——————-
संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक   ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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बचपन और पचपन-हिन्दी व्यंग्य कवितायें


हिसाब किताब में
जिंदगी का खेल लोग यूं ही खेलते जाते हैं,
ज्ञान का संदेश सुने
या माया के अंक गुने
बीच रास्ते पर चलते हुए
इसलिये सर्वशक्तिमान का नाम भी
गिन गिनकर लिये जाते हैं।
———-
एक बंदे ने दूसरे बंदे से पूछा
‘सर्वशक्तिमान का नाम
माला फिराते हुए क्यों लेते हो,
क्या डर है कि कहीं गिनती भूल जाओगे,
ज्यादा लेने पर फल नहीं मिलेगा
कम लिया तो शायद कम पाओगे,
इसलिये हिसाब किताब से काम करते हो।

दूसरे बंदे ने कहा
‘‘हमें कच्चा मत समझना,
सर्वशक्तिमान का नाम
माला के साथ जपते हुए भी
गिनती गिनते जाते हैं,
दिन भर दुकान पर
रुपये गिनने का अभ्यास बना रहे
इसलिये मन ही मन अंक भी गाये जाते हैं,
नाम स्मरण तो बचपन की आदत है,
पचपन में बनी मजबूरी बनी यह इबादत है,
लेते हैं सर्वशक्तिमान का नाम
यह सोचकर कि हम रुपये गिने जाते हैं।’’
————

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
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नाम और गिनती-हास्य कविताएँ


हिसाब किताब में
जिंदगी का खेल लोग यूं ही खेलते जाते हैं,
ज्ञान का संदेश सुने
या माया के अंक गुने
बीच रास्ते पर चलते हुए
इसलिये सर्वशक्तिमान का नाम भी
गिन गिनकर लिये जाते हैं।
———-
एक बंदे ने दूसरे बंदे से पूछा
‘सर्वशक्तिमान का नाम
माला फिराते हुए क्यों लेते हो,
क्या डर है कि कहीं गिनती भूल जाओगे,
ज्यादा लेने पर फल नहीं मिलेगा
कम लिया तो शायद कम पाओगे,
इसलिये हिसाब किताब से काम करते हो।

दूसरे बंदे ने कहा
‘‘हमें कच्चा मत समझना,
सर्वशक्तिमान का नाम
माला के साथ जपते हुए भी
गिनती गिनते जाते हैं,
दिन भर दुकान पर
रुपये गिनने का अभ्यास बना रहे
इसलिये मन ही मन अंक भी गाये जाते हैं,
नाम स्मरण तो बचपन की आदत है,
पचपन में बनी मजबूरी बनी यह इबादत है,
लेते हैं सर्वशक्तिमान का नाम
यह सोचकर कि हम रुपये गिने जाते हैं।’’
————

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
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त्रावनकोर (त्रावणकोर) के स्वामी पद्मनाभ मंदिर का खजाना और भारत का आम आदमी-हिन्दी लेख (travancor ke swami padmanabh mandir ka khazana aur bharat ka aam aadmi-hindi lekh)


           केरल ट्रावनकोर में स्वामी पद्मनाभ मंदिर में खजाना मिलने की घटना इस विश्व का आठवां आश्चर्य मानना चाहिए। आमतौर से भारत में गढ़े खजाने होने की बात अक्सर कही जाती है। अनेक सिद्ध तो इसलिये ही माने जाते हैं कि वह गढ़े खजाने का पता बताते हैं। यह अलग बात है कि वह अपने चेलों से पैसा ऐंठकर गायब हो जाते हैं। इससे एक बात तो सिद्ध होती है कि धर्म और भगवान अंध श्रद्धा रखने वालों को गढ़े खजाने में बहुत दिलचस्पी होती है और ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है।
            ट्रावणकोर का खजाना पांच लाख करोड़ से ऊपर पहुंच जायेगा ऐसा कुछ आशावादी कह रहे हैं तो कुछ विचारक लोग इस बात से चिंतित हैं कि कहीं यह खजाना भी लुट न जाये। प्रचार माध्यमों में भले ही इस खबर की चर्चा हो रही है पर आम जनमानस की उदासीनता भी कम आश्चर्य का विषय नहीं है। मिल गया तो और लुट गया तो इसमें उनको अपना कोई हित या अहित नहीं दिखता। इससे एक बात निश्चित लग रही है कि देश के समाज, अर्थ और धर्म के शिखर पर बैठे लोग की तरह उनमें दिलचस्पी रखने का आदी बौद्धिक वर्ग के लोग भी आमजन के चिंताओं से दूर हो गया है। उसे पता ही नहीं कि जनमानस के मन में क्या चल रहा है? यह देश के लिये खतरनाक स्थिति है पर ऐसा होना अस्वाभाविक भी नहीं है क्योंकि बाजार और प्रचार से प्रयोजित बौद्धिक समूह समाज से कट चुका है।
            दरअसल हमारे देश में आधुनिक लोकतंत्र ने जहां आम आदमी के लिये सत्ता में भागीदारी का दरवाजा खोला है वहीं ऊंचा पद पाने की उसकी लालसा को बढ़ाया भी है। जिन लोगों को यह मालुम है कि उच्च पद उनके भाग्य नहीं है वह उच्च पदस्थ लोगों के अनुयायी बनकर उनके प्रचारक बन जाते हैं। यही प्रचारक अपनी बात समाज की अभिव्यक्ति को प्रस्तुत करने का दावा करते हैं। शिखर पुरुषों का आपस में एक तयशुदा युद्ध चलता है और आम आदमी उसे मूकभाव से देखता है। फिर इधर धनवान, पदवान, कर्मवान, धर्मवान तथा अधर्मवान लोगों का एक समूह है जो पूरे विश्व पर शासन करने लगा है। उसने इस तरह का वातावरण बनाया है कि हर व्यक्ति और क्रिया का व्यवसायीकारण हो गया है। लिखने, पढ़ने, बोलने और देखने की क्रियाओं में स्वतंत्रता नहीं रही। न अभिव्यक्ति में मौलिकता है। विचाराधाराओं, धर्मो, जातियों और भाषाओं के क्षेत्र में सक्रिय लोग प्रायोजित हैं। उनकी अभिव्यक्ति स्वतंत्र नहीं प्रायोजित है। उनकी अभिव्यक्ति सतही है। बाज़ार जैसी प्रेरणा निर्मित करता है प्रचार में वैसी ही अभिव्यक्ति दिखाई देती है।
           ऐसे में नये आदमी और नये विचार को वैसे भी कोई स्थान नहीं मिलता फिर प्रायोजन की प्रवृत्ति ने आमजान को भी इतना संकीर्ण मानसिकता का बना दिया है कि उसे गूढ़ बात समझ में नहीं आती। भारत में अभी तक कहा जाता था कि आर्थिक संकट है पर किसी ने यह नहीं कहा कि बौद्धिकता का संकट है। कुछ दिन पहले स्विस बैंक में कथित रूप से भारतीयों के चार लाख करोड़ जमा होने की बात सामने रखकर कुछ लोग कह रहे थे कि यह पैसा अगर देश में आ जाये तो देश की तस्वीर बदल जाये। अगर त्रावणकोर के खजाने की बात कही जाये तो वह भी कम नहीं है तब क्या कोई उसके सही उपयोग की बात कोई नहीं कर रहा है। ढोल जब दूर हैं तो सुहावने बताये और पास आया तो कहने लगे कि हमें बजाना नहीं आता इसलिये इसे सजाकर रखना है। फिर एक सवाल यह भी है कि इसका उपयोग किया जाये तो क्या वाकई इस देश की स्थिति सुधर जायेगी। कतई नहीं क्योंकि हमारे देश की समस्या धन की कमी नहीं बल्कि मन की कमी है। मन यानि आत्मविश्वास की कमी ही देश का असली संकट है और यह विचारणीय विषय है। इस विषय पर वह लेख एक साथ प्रस्तुत हैं जो इस लेखक ने इंटरनेट पर लिखे और पाठकीय दृष्टि से फ्लाप रहे।
सोने के खजाने से बड़ा है आम आदमी का पसीना-हिन्दी लेख (sone ke khazane se bada hai aam admi ka pasina-hindi lekh)      
  त्रावणकोर के स्वामी पद्मनाभ मंदिर में सोने का खजाना मिलने को अनेक प्रकार की बहस चल रही है।  एक लेखक, एक योग साधक और एक विष्णु भक्त होने के कारण इस खजाने में इस लेखक दिलचस्पी बस इतनी ही है कि संसार इस खजाने के बारे में क्या सोच रहा है? क्या देख रहा है? सबसे बड़ा
सवाल इस खजाने का क्या होगा?        
          कुछ लोगों को यह लग रहा है कि इस खजाने का प्रचार अधिक नहीं होना चाहिए था
क्योंकि अब इसके लुट जाने का डर है।  इतिहासकार अपने अपने ढंग सेइतिहास का व्याख्या करते हैं पर अध्यात्मिक ज्ञानियों का अपना एक अलग नजरिया होता है। दोनों एक नाव पर सवारी नहीं करते भले ही एक घर में रहते हों। इस समय लोग स्विस बैंकों में कथित रूप से भारतीयों के जमा चार लाख
करोड़ के काले धन की बात भूल रहे हैं। इसके बारे में कहा जा रहा था कि यह रकम अगर भारत आ जाये तो देश के हालत सुधर जायें।  अब त्रावनकोर के पद्मनाभ मंदिर के खजाने की राशि पांच लाख करोड़ तक पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है। बहस अब स्विस बैंक से हटकर पद्मनाभ मंदिर में  पहुंच
गयी है।
    हमारी दिलचस्पी खजाने के संग्रह की प्रक्रिया में थी कि त्रावणकोर के राजाओं ने इतना सोना जुटाया कैसे? इससे पहले इतिहासकारों से यह भी पूछना चाहेंगे कि उनके इस कथन की अब क्या स्थिति है जिसमें वह कहते हैं कि भारत की स्वतंत्रता के समय देश के दो रियासतें सबसे अमीर थी एक हैदराबाद दूसरा ग्वालियर।  कहा जाता है कि उस समय हैदराबाद के निजाम तथा ग्वालियर के सिंधियावंश के पास सबसे अधिक  संपत्ति थी। त्रावणकोर के राजवंश का नाम नहीं आता पर अब लगता है कि इसकी संभावना अधिक है कि वह सबसे अमीर रहा होगा। मतलब यह कि इतिहास कभी झूठ भी बोल सकता है इसकी संभावना सामने आ रही है। बहरहाल त्रावणकोर के राजवंश विदेशी व्यापार करता था।  बताया जाता है कि इंग्लैंड के राजाओं के महल तक उनका सामान जाता था। हम सब जानते हैं कि केरल प्राकृतिक रूप से संपन्न राज्य रहा है।  फिर त्रावणकोर समुद्र के किनारे बसा है।  इसलियेविश्व में जल और नभ परिवहन के विकास के चलते उसे सबसे पहले लाभ होना ही था।  पूरे देश के लिये विदेशी सामान वहां के बंदरगाह पर आता होगा तो  यहां से जाता भी होगा।  पहले भारत का विश्व सेसंपर्क थल मार्ग से था। यहां के व्यापारी सामान लेकर मध्य एशिया के मार्ग से जाते थे। तमाम तरह के राजनीतिक और धार्मिक परिवर्तनों के चलते यह मार्ग दुरुह होता गया होगा तो जल मार्ग के साधनों के विकास का उपयोग तो बढ़ना ही था।  भारत में उत्तर और पश्चिम से मध्य एशियाई देशों से हमले हुएपर जल परिवहन के विकास के साथ ही  पश्चिमी देशों से भी लोग आये।पहले पुर्तगाली फिर फ्रांसिसी और फिर अंग्रेज।  ऐसे में भारत के दक्षिणी भाग में भी उथल पुथल हुई।  संभवत अपने काल के शक्तिशाली और धनी राज्य होने के कारण त्रावनकोर के तत्कालीन राजाओं को विदेशों से संपर्क बढ़ा ही होगा।  खजाने के इतिहास की जो जानकारी आरही है उसमें विदेशों से सोना उपहार में मिलने की भी चर्चा है।  यह उपहार फोकट में नहीं मिले होंगे।  यकीनन विदेशियों को अनेकप्रकार का लाभ हुआ होगा। सबसे बड़ी बात यह है कि इस मार्ग से भारत में आना सुविधाजनक रहा होगा।  विदेशियों ने सोना दिया तो उनको क्या मिला होगा? यकीनन भारत की प्रकृतिक संपदा मिली होगी जिसे हम कभी सोने जैसा नहीं मानते। बताया गया है कि त्रावणकोर का राजवंश चाय, कॉफी और काली मिर्च के व्यापार से जुड़ा रहा है।  मतलब यह कि चाय कॉफी और काली मिर्च हमारे लिये सोना नहीं है पर विदेशियों से उसे सोने के बदले लिया। सोना भारतीयों की कमजोरी रहा है तो भारत की प्राकृतिक और मानव संपदाविदेशियों के लिये बहुत लाभकारी रही है।  केवल त्रावणकोर का राजवंश ही नहीं भारत के अनेक बड़े व्यवसायी उस समय सोना लाते  और भारत की कृषि और हस्तकरघा से जुड़ी सामग्री बाहर ले जाते  थे।  सोने की खदानों में मजदूर काम करता है तो प्रकृतिक संपदा का दोहन भी मजदूर ही करता है। मतलब पसीना ही सोने का सृजन करता है।   
          अपने लेखों में शायद यह पचासवीं बार यह बात दोहरा रहे हैं कि विश्व के भूविशेषज्ञ भारत पर प्रकृति की बहुत कृपा मानते हैं।  यहां भारतका अर्थ व्यापक है जिसमें पाकिस्तान, अफगानिस्तान नेपाल, श्रीलंका,बंग्लादेश और भूटान भी शामिल है।  इस पूरे क्षेत्र को भारतीय उपमहाद्वीप कहा जाता रहा है पर पाकिस्तान से मित्रता की मजबूरी के चलते इसे हम लोग आजकल दक्षिण एशिया कहते हैं।        
          कहा जाता है कि कुछ भारतीय राज्य तो ऐसे भी हुए हैं जिनका तिब्बत तक राज्य फैला हुआ था।  दरअसल उस समय के राजाओं में आत्मविश्वास था और इसका कारण था अपने गुरुओं से मिला  अध्यात्मिक ज्ञान! वह युद्ध और शांति में अपनी प्रजा का हित ही सोचते थे।  अक्सर
अनेक लोग कहते हैं कि केवल अध्यात्मिक ज्ञान में लिप्तता की वजह से यह देशविदेशी आक्राताओं का शिकार बना। यह उनका भ्रम है। दरअसल अध्यात्मिक शिक्षा से अधिक आर्थिक लोभ की वजह से हमें सदैव संकटों का सामना करना पड़ा।  समय के साथ अध्यात्म के नाम पर धार्मिक पांखड और उसकी आड़ में आमजन की भावनाओं से खिलवाड़ का ही यह परिणाम हुआ कि यहां के राजा,जमीदार, और साहुकार उखड़ते गये।   
          सोने से न पेट भरता है न प्यास बुझती है।  किसी समय सोने की मुद्रायें प्रचलन में थी पर उससे आवश्यकता की वस्तुऐं खरीदी बेची जाती थी। बाद में अन्य धातुओं की राज मुद्रायें बनी पर उनके पीछे उतने ही मूल्य  के सोने का भंडार रखने का सिद्धांत पालन में लाया जाता था। आधुनिक समय में पत्र मुद्रा प्रचलन में है पर उसके पास सिद्धातं यह बनाया गया कि राज्य जितनी मुद्रा बनाये उतने ही मूल्य का सोना अपने भंडार में रखे।  गड़बड़झाला यही से शुरु हुआ। कुछ देशों ने अपनी पत्र मुद्रा जारी करने के पीछे कुछ प्रतिशत सोना रखना शुरु किया।  पश्चिमी देशों का पता नहीं पर विकासशील देशों के गरीब होने कारण यही है कि जितनी मुद्रा प्रचलन में है उतना सोना नहीं है।  अनेक देशों की सरकारों पर आरोप है कि प्रचलित मुद्रा के पीछे सोने का प्रतिशत शून्य रखे हुए हैं। अगर हमारी मुद्रा के पीछे विकसित देशों की तरह ही अधिक प्रतिशत में सोना हो तो शायद उसका मूल्य विश्व में बहुत अच्छा रहे।विशेषज्ञ बहुत समय से कहते रहे हैं कि भारतीयों के पास अन्य देशों से अधिकअनुपात में सोना है।  मतलब यह सोना हमारी प्राकृतिक तथा मानव संपदा की वजह से है।  यह देश लुटा है फिर भी यहां इतना सोना कैसे रह जाता है? स्पष्टतः हमारी प्राकृतिक संपदा का दोहन आमजन अपने पसीने से करता है जिससे सोना ही   सोने में बदलता है।  सोना लुटने की घटनायें तो कभी कभार होती होंगी पर आमजन के पसीने से सोना बनाने की पक्रिया कभी थमी नहीं होगी।
             भारत में आमजन जानते हैं कि सोना केवल आपातकालीन मुद्रा है।  लोग कह रहे थे कि स्विस बैंकों से अगर काला धन वापस आ जाये तो देश विकासकरेगा मगर उतनी रकम तो हमारे यहां मौजूद है।  अगर ढूंढने निकलेंतो सोने के बहुत सारे खजाने सामने आयेंगे पर समस्या यह है कि हमारे यहां प्रबंध कौशल वाले लोग नहीं है।  अगर होते तो ऐसे एक नहीं हजारोंखजाने बन जाते। प्रचार माध्यम इस खजाने की चर्चा खूब कर रहे हैं पर आमजनउदासीन है। केवल इसलिये उसे पता है कि इस तरह के खजाने उसके काम नहीं आनेवाले। सुनते हैं कि त्रावणकोर के राजवंश ने अपनी प्रजा की विपत्ति में भीइसका उपयोग नहीं किया था।  इसका मतलब है कि उस समय भी वह अपनेसंघर्ष और परिश्रम से अपने को जिंदा रख सकी थी। बहरहाल यह विषय बौद्धिकविलासिता वाले लोगों के लिये बहुत रुचिकर है तो अध्यात्मिक साधकों के लिये अपना बौद्धिक ज्ञान बघारने का भी आया है।  जिनके सिर पर सोन का ताज था वही कटे जिनके पास खजाने हैं वही लुटे जो अपने पसीने से अपनी रोटी का सोना कमाता है वह हमेशा ही सुरक्षित रहा।  हमारे देश में पहले अमीरी और खजाने भी दिख रहे हैं पर इससे बेपरवाह समाज अधिक है क्योंकि उसके पास सोना के रूप में बस अपना पसीना है।  यह अलग बात है कि उसकी एक रोटी में से आधी छीनकर सोना बनाया जाता है।
हम प्रबंध योग सीख लें-हिन्दी व्यंग्य (hum prabandhyog seekh len-hindi
vyangya)
        
         देखा जाये तो अपना देश अब गरीबों का देश भले ही है पर गरीब नहीं है। सोने की चिड़िया पहले भी था अब भी है। यह अलग बात है कि अभी तक तो यह चिड़ियायें पैदा होकर विदेशों में घोंसला बना लेती और अपने यहां लोग हाथ मलते। कहने को तो यह भी कहा जाता है कि यहां कभी दूध की नदियां बहती थी अब भी बहती हैं पर उनमें दूघ कितना असली है और कितना नकली यह अन्वेषण का विषय है।    
             हम दरअसल स्विस बैंकों में जमा भारतीयों के काले धन और केरल के पद्मनाभ
मंदिर में मिले खजाने की बात कर रहे हैं। इस खबर ने हमारे दिलोदिमाग के सारे तार हिला दिये हैं कि पदम्नाभ मंदिर में अभी तक एक लाख करोड़ के हीरेजवाहरात, कीमती सिक्के और सोने के आभूषण मिले हैं। अभी कुछ अन्य कमरे खोले जाने हैं और यकीनन यह राशि बढ़ने वाली है। हम मान लेते हैं कि वहां चार लाख करोड़ से कुछ कम ही होगी। यह आंकड़ा स्विस बैंक में जमा भारतीयों की रकम का भी बताया जाता है। वैसे इस पर विवाद है। कोई कहता है कि दो लाख करोड़ है तो कोई कहता तीन तो कोई कहता है कि चार लाख करोड़। हम मान लेते हैं कि स्विस बैंकों में जमा काला धन और मंदिर में मिला लगभग बराबर की राशि का होगा। न हो तो कम बढ़ भी हो सकता है।   
         हमें क्या? हम न स्विस बैंकों की प्रत्यक्ष जानकारी रखते हैं न ही पद्मनाभ मंदिर कभी गये हैं। सब अखबार और टीवी पता लगता है। जब लाख करोड़ की बात आती है तो लगता है कि दो अलग राशियां होंगी। तीन लाख करोड़ यानि तीन लाख और एक करोड़-यह राशियां मिलाकर पढ़ना कठिन लगता है। । अक्ल ज्यादा काम करती  करना चाहते भी नहीं क्योंकि अगर आंकड़ों में उलझे तो दिमाग काम करना बंद कर देगा ।
         इधर खबरों पर खबरें इस तरह आ रही हैं कि पिछली खबर फलाप लगती है। सबसे पहले टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले की बात सामने आयी। एक लाख 79 हजार करोड़ का घोटाला बताया गया। फिर स्विस बैंक के धन पर टीवी और अखबार में चले सार्वजनिक विवाद में चार लाख करोड़ के जमा होने की बात आई। विवाद और आंदोलनके चलते साधु संतों की संपत्ति की बात भी सामने आयी। हालांकि उनकी संपत्तियां हजार करोड़ में थी पर उनकी प्रसिद्धि के कारण राशियां महत्वपूर्णनहीं थी। फिर पुट्टापर्थी के सत्य सांई बाबा की संपत्ति की चर्चा भी हुई तो लोगों की आंखें फटी की फटी रह गयी। चालीस हजारे करोड़ का अनुमान कियागया। यह रकम बहुत छोटी थी इसलिये स्विस बैंकों की दो से चार लाख करोड़ का मसला लगातार चलता रहा। अब पद्मनाभ मंदिर के खजाने मिलने की खबर से उस पर पानी फिर गया लगता है।       
          पिछले कुछ दिनों से अनेक महानुभाव यह कह रहे हैं कि विदेशों में जमा भारत का धन वापस आ जाये तो देश का उद्धार हो जाये। अनेक लोग इस रकम का अर्थव्यवस्था के लिये अत्यंत महत्व बताते हुए अनेक तरह की विवेचना कर रहेहैं। अब पद्मनाभ मंदिर के नये खजाने की राशि के लिये भी यही कहा जा रहा है। ऐसे में हमारा कहना है कि जो महानुभाव विदेशों से काले धन को भारत लाने के लिये जूझ रहे हैं वह अपने प्रयास अब ऐसे उपलब्ध धन के सही उपयोग करने के लिये लगा दें। वैसे भी हमारे देश के सवौच्च न्यायालय ने विदेशों से काला धन लाने के लिये अपने संविधानिक प्रयास तेज कर दिये हैं इसलिये निज प्रयास अब महत्वहीन हो गये हैं। वैसे केरल के पद्मनाभ मंदिर का खजाना भी न्यायालीयन प्रयासों के कारण सामने आया है। यकीनन आगे यह देश के खजाने में जायेगा। उसके बाद न्यायालयीन प्रयासों की सीमा है। धन किस तरह कहां और कब खर्च हो यह तय करना अंततः देश के प्रबंधकों का है। ऐसे में उनकी कुशलता
ही उसका सही उपयोग में सहयोग कर सकती है।
          यहीं आकर ऐसी समस्या शुरु होती है जिसे अर्थशास्त्र में भारत में कुशल प्रबंध का अभाव कहा जाता है। अगर आप देश की आर्थिक स्थिति की बात करें तो भूतकाल और वर्तमान काल में धन की बहुतायात के प्रमाण हैं। प्रकृति की कृपा से यहां दुनियां के अन्य स्थानों से जलस्तर बेहतर है इसलिये खेती तथा पशुपालन अधिक होता है। असली सोना तो वह है जो श्रमिक पैदा करता है यह अलग बात है कि उसके शोषक उसे धातु के सोने के बदलकर अपने पास रख लेते हैं। जब तक हिमालाय है तब तब गंगा और यमुना बहेगी और विंध्याचल है तो नर्मदा की कृपा भी रहेगी। मतलब भविष्य में भी यहां सोना उगना है पर हमारे देश के लोगों का प्रेम तो उस धातु के सोने से है जो यहां पैदा ही नहीं होता। मुख्यसमस्या यह है कि हमारे देश में सामाजिक सामंजस्य कभी नहीं रहा दावे चाहे हम जितने भी करते रहें। जिसे कहीं धन, पद और बल मिला वह राज्य करना चाहता है। इससे भी वह संतुष्ट नहीं होता। मेरा राज्य है इसके प्रमाण के लिये शोषण और हिंसा करता है। राज्य का पद उपभोग के लिये माना जाता हैं जनहित करने के लिये नहीं। जनहित का काम तो भगवान के भरोसे है। किसी को एक रोटी की जगह दो देने की बजाय जिसके पास एक उसकी आधी भी छीनने का प्रयास किया जाता है यह सोचकर कि पेट भरना तो भगवान का काम है हमें तो अपना संसार निभाना है इसलिये किसी की रोटी छीने।
           भारतीय अध्यात्म में त्याग और दान की अत्यंत महिमा इसलिये ही बतायी गयी है कि धनिक, राजपदवान, तथा बाहबली आपने से कमजोर की रक्षा करें। भारतीय मनीषियों से पूर्वकाल में यह देखा होगा कि प्रकृति की कृपा के चलते यह देश संपन्न है पर यहां के लोग इसका महत्व न समझकर अपने अहंकार में डूबे हैं इसलिये उन्होंने समाज क सहज भाव से संचालन के सूत्र दिये। हुआ यह कि उनके इन्हीं सूत्रों को रटकर सुनाने वाले इसका व्यापार करते हैं। कहीं धर्म भाव तो कहीं कर्मकांड के नाम पर आम लोगों को भावनात्मक रूप से भ्रमित कर उसके पसीने से पैदा असली सोने को दलाल धातु के सोने में बदलकर अपनी तिजोरी भरने लगते हैं। वह अपने घर भरने में कुशल हैं पर प्रबंधन के नाम पर पैदल हैं।
अलबत्ता समाज चलाने का प्रबंधन हथिया जरूर लेते हैं। जाति, भाषा, धर्म, व्यापार, समाज सेवा और जनस्वास्थ्य के लिये बने अनेक संगठन और समूह है पर प्रबंधन के नाम पर बस सभी लूटना जानते हैं। जिम्मेदारी की बात सभी करते हैंपर जिम्मेदार कहीं नहीं मिलता ।
    हमारे कहने का अभिप्राय यह है कि देश गरीब इसलिये नहीं है यहां धन नहीं है बल्कि उसका उपयेाग करना जिम्मेदार लोगों का उसका वितरण करना नहीं आता।भ्रष्टाचार आदत नहीं शौक है। मजबूरी नहीं जिम्मेदारी है। जिसके पास राजपद है अगर वह उपरी कमाई न करे तो उसका सम्मान कहीं नहीं रहता।
        स्विस बैंक हो या पद्मनाभ का मंदिर हमारे देश के खजाने की रकम बहुत बड़ी है। कुछ लोग तो कहते हैं कि ऐसे खजाने देश में अनेक जगह मिल सकते हैं। उनकी रकम इतनी होगी कि पूरे विश्व को पाल सकते हैं। यही कारण है कि विदेशों के अनेक राजा लुटेरे बनकर यहां आये। मुख्य सवाल यह है कि हमें पैसे का इस्तेमाल करना सीखना और सिखाना है। इसे हम प्रबंध योग भी कह सकते हैं।
पतंजलि योग में कहीं प्रबंध योग नहीं बताया जाता है पर अगर उसे कोई पढ़े और समझे तो वह अच्छा प्रबंध बन सकता है। मुख्य विषय संकल्प का है और वह यह कि पहले हम अपनी जिम्मेदारी निभाना सीखें। त्याग करना सीधें। संपत्ति संचय न करें। जब हम कोई आंदोलन और अभियान चलाते हैं तो स्पष्टतः यह बात हमारे मन में रहती है कि कोई दूसरा हमारा उद्देश्य पूरा करे। जबकि होना यह चाहिए कि हम आत्मनियंत्रित होकर काम करें।
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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बड़े लोग और आम इंसान-हिन्दी कविता (bade log aur aam insan-hindi kavita)


पहले अपनी फिक्र और
फिर अपनों की चिंता में
बड़े लोग महान बनते जा रहे हैंे,
कहीं पूरी बस्ती
कहीं पूरे शहर
खास पहचान लिये
इमारतों से तनते जा रहे हैं।
वहां बेबस और लाचार
आम इंसान का प्रवेश बंद है,
हर आंख पसरी है उनके लिये
जिनके पास सोने के सिक्के चंद हैं,
दब रही है गरीब की झुग्गी
अमीरी के आशियाने उफनते आ रहे हैं।
———
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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अच्छे काम का जिम्मा दूसरों पर डालने की आदत-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन (accha kam ka jimma-hindi vyangya lekh)


      सब चाहते हैं कि कोई भगतसिंह बनकर भ्रष्टाचार का सफाया करे पर हमारे कार्य और व्यापार निरंतर सामान्य गति के साथ अपनी यथास्थिति मे चलता रहे। माननीय शहीद भगतसिंह का पूरा देश सम्मान करता है पर सच यह है कि इस देश में लड़ने की ताकत अब उन लोगों में नहीं है जिनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वह भ्रष्टाचार से युद्ध करे। यहां हमारा युद्ध से आशय गोलीबारी चलाने से नहीं बल्कि अभियान, आंदोलन तथा अन्य अहिंसक प्रयासों से हैं। हम अगर शहीद भगतसिंह की बात करें तो उन्हें समाज से प्रोत्साहन होने के अलावा चंद्रशेखर आज़ाद जैसे अन्य महारथियों का सानिध्य प्राप्त था। शहीद भगतसिंह अकेले नहीं थे और समकालीनों में कई लोगों को उनके समक्ष रखा जा सकता है। ऐसे में अगर हम किसी एक व्यक्ति पर ही भरोसा करें तो वह हास्यास्पद लगता है। यहां सभी एक नायक देखना चाहते हैं पर उसके साथ नायकत्व की भूमिका निभाने में उनको डर लगता है।
       हम केवल सोच रहे हैं। हम केवल द्वंद्व देख रहे हैं। हम केवल भ्रष्टाचार और ईमानदार का संघर्ष देखना चाहते हैं। ऐसा लगता है कि हम किसी फिल्म का सीधा प्रसारण देखना चाहते हैं। शायद हमें देश की समस्याओं से सरोकार नहीं है ऐसे ही जैसे किसी फिल्म के विषय से नहीं होता। अंग्रेजी शिक्षा ने या तो साहब पैदा किये या गुलाम! जो साहबी प्रवृत्ति के हैं उनके लिये भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन एक देखने लायक आंदोलन है जिसमें उनको भागीदारी नहीं करनी। जो गुलाम है वह भी केवल देखना चाहते हैं क्योंकि उनको तो अपनी गुलामी से ही फुरसत नहीं है। जब फुरसत मिले टीवी के सामने बैठकर वह द्वंद्व का मजा लेना चाहते हैं। इस पर हिन्दी फिल्मों की कहानियों ने पूरे समजा को कायर बना दिया है। सारी समस्यायें कोई नायक ही हल करेगा हमें तो केवल भीड़ के सहनायकों की भूमिका निभानी है।
       फिर भी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन चलते आ रहे हैं। जिनको नायकत्व का मोह है वह नेतृत्व कर रहे हैं ओर जिनको यह भूमिका नहीं मिल सकती या लेना नहीं चाहते वह लोग उप नायक की भूमिका के लिये स्वयं को प्रस्तुत कर रहे हैं। दुनियां को दिखाने के लिये देश में हलचल होना जरूरी है। सभी जगह हलचल है और भ्रष्टाचार के लिये बदनाम होते जा रहे इसलिये विश्व के परिदृश्य में देश को चेतन साबित करने के लिये आंदोलन या अभियान जरूरी है। इसके दूसरे लाभ भी हैं जिससे समाज को फुरसत में टीवी के सामने चिपकाया जा सकता है। सुबह अखबार पढ़ने के लिये पाठकों को बाध्य किया जा सकता है। अनेक उत्पादों के विज्ञापन एक ही जगह दिखाने में भी इससे सहायता मिलती है। लोगों को मजबूर करना है कि वह सब देखें। प्रयोक्ताओं की संख्या बढ़े।
      यह तभी संभव है जब प्रकाशन और प्रसारण सामग्री द्वंद्वों से सजी हो। जो उत्पादक सामान बेचकर कमा रहे हैं वही फिल्म भी बना रहे हैं। टीवी भी चला रहे हैं। अखबार भी उनके सहारे चल रहा है। वही कहानी लिखवा रहे हैं तो वही अभिनय करने वालों पात्रों का चयन कर रहे हैं। अगर आपको समाज सेवक बनना है तो जरूरी नहीं है कि आपको समाज सेवा करना आये बल्कि बस कोई धनपति प्रायोजक मिलना चाहिए। उसी तरह अभिनय न आने अपन अभिनेता, लेखन में रुचि न होने पर भी लेखक, आढ़ी तिरछी रेखायें खींचना जानते हों तो चित्रकार और संगीन न भी आये तो भी अपने साथ चार पांच वाद यंत्र बजाने वाले रखकर संगीतकार बन सकते हैं बशर्ते कि धनपतियों की कृपा हो।
       कहीं हास्य तो कहीं सनसनी तो कहीं प्रेम से सजी कहानियां सीधे प्रस्तुत हो रही हैं। देश को मनोरंजन में व्यस्त रखना है इसलिये उसके लिये भिन्न प्रकार की कहानियां जरूरी हैं। काल्पनिक कथाओं से उकता गये तो कुछ सत्य कहानियों की सीधा प्रसारण भी हो रहा है। देश में ढेर सारे आंदोलन और अभियान हुए उनमें से किसका क्या परिणाम निकला किसी को नहीं पता! आगे भी होंगे।
      कहा भी जाता है कि जनता की याद्दाश्त कमजोर होती है। यहां तो अब बची ही नहीं है। लोग कितनी कहानियेां को याद रखेंगे। याद रखने की जरूरत है क्या रोज नयी कहानी बन रही है। वैसे भी आचार्य रजनीश यानि ओशो ने कहा है कि स्मृति आदमी की सबसे बड़े शत्रु हैं। इसलिये हमें इस बात पर तो खुश होना चाहिए कि अब तो लोगों की याद्दाश्त लुप्त हो रही है। आम इंसान अधिक याद्दाश्त रखेगा तो रोटी से भी जायेगा। वह जानता है कि उसकी कोई भूमिका समाज निर्माण में नहीं हो सकते हैं। वह देख रहा है। अनेक फिल्मों को एक साथ देख रहा है। फिर अपने कड़वे सच को भी देख रहा है। बस, सभी देख रहे हैं।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप” 
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शायद कोई हालात बदल दे-हिंदी कविता(shayad koyee halat badal de-hindi poem


जमाने को बदल देंगे
यह ख्याल अच्छा है
पर कोई चाबुक नहीं
किसी इंसान के पास
जिससे दूसरे का ख्याल बदल दे।
अमीरी खूंखार ख्याल लाती है,
कहर बरपाने के कदमों में
ताकत का सबूत पाती है,
गरीबी मदद के लिये
भटकाती है इधर से उधर,
दरियादिली के इंतजार में खड़े टूटे घर,
न बदलती किस्मत
न होती हिम्मत
बस उम्मीद जिंदा रहती है कि
शायद कोई हालात बदल दे।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
jpoet, Writer and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
 
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बिना ‘एक्शन’ के योग साधना लोगों को प्रभाहीन लगती है-हिन्दी लेख (yog sadhna without action no popular-hindi lekh)


              बाबा रामदेव अब राष्ट्रीय प्रचार पटल से एकदम गायब है। अपना अनशन तोड़ने के बाद वह फिर लोगों के सम्मुख नहीं आये। एक अध्यात्मिक योगी के लिये राजयोग करना कोई आसान नहीं है यह अब समझ में आने लगा है। अगर कोई योगी राजयोग करने पर आमदा हो ही जाता है तो समझ लेना चाहिए कि वह राजस भाव के वशीभूत होकर अपनी साधना कर रहा था। यहां हम श्रीमद्भागवत के कर्म तथा गुण विभाग की विस्तृत चर्चा नहीं कर रहे पर इतना बताना जरूरी है कि आदमी सामान्य भक्त हो या योगी या फिर नास्तिक हो पर वह त्रिगुणमयी सृष्टि के चक्कर से नहीं बच सकता। सात्विक, राजस तथा तामस प्रवृत्ति के लोग हर जगह और हालत में मिलेंगे। तीनों गुणों से परे कोई महायोगी होता है हालांकि यह आवश्यक नहीं है कि वह सामान्य संसार कर्म में अपने देह व्यस्त न रखे और सन्यास लेकर हिमालय पर चला जाये। हमारा कहने का अभिप्राय यह है कि आदमी अपनी इन तीन प्रवृत्तियों से ही कर्म करते हुए लिप्त होता है पर महायोगी केवल काम करना है यही सोचकर काम करता है उसे उसके फल में कदापि रुचि नहीं होती। जिसके मन में संतोष है वही सात्विक है पर संतोष तथा असंतोष से परे है तो वह योगी है।
     आलोचकों का कहना है कि बाबा रामदेव ने लोगों को योग की गलत शिक्षा दी यह अलग से बहस का विषय है क्योंकि इसका निर्णय तो केवल प्रवीण योगशास्त्री ही कर सकते हैं। कुछ योग शास्त्री मानते हैं कि ध्यान और धारणा के पतंजलि योग साहित्य में प्रतिपादित सूत्रों का उनका अध्ययन अधिक नहीं है। उनके विचार, वाणी तथा भाव भंगिमा से यही लगता है। इतना तय ही कि उनकी योग से प्रतिबद्धता असंदिग्ध है।
                   पतंजलि योग विज्ञान के सूत्र के अनुसार परिणाम से कर्म का ज्ञान हो जाता है। दूसरे शब्दों में अगर किसी की व्यक्ति या उसकी गतिविधि से निकले परिणाम को देखते हुए उसके पूर्व कर्म का आभास किया जा सकता है। यह बहुत गंभीर अध्ययन करने वाला सूत्र है। इससे हम अपनी जिंदगी में किसी कर्म के नाकाम होने पर उसका विश्लेषण करते हुए अपनी गलतियों को ढूंढ सकते हैं। अपनी नाकामी पर हम चिंता में पड़े रहें या दूसरों को उसके लिये जिम्मेदार बताने लगें यह ठीक नहीं है। अपने संकल्प की शुद्धता और शुद्धता पर दृष्टिपात कर सकते हैं। परिणाम से कर्म का ज्ञान होने सूत्र. के लिये हमें जासूसी का नियम भी कह सकते हैं। जिस तरह कोई व्यक्ति कहीं बेहोश होकर घाायल पड़ा है और उसके पास कोई बड़ा पत्थर, चाकू या गोली का खोल पड़ा है। उसका घाव और खून देखकर जासूस यह अनुमान करता है कि उसे कौनसी चीज से मारा गया होगा। अगर आंधी तूफान के बाद राह चलतते हुए हम देखते हैं कहीं पेड़ के नीचे कोई जानवर दबा पड़ा है तो हम सहजता से यह अनुमान करते हैं कि वह पेड़ आंधी में गिरा होगा।
           योग विधा में पांरगत मनुष्य छोटी मोटी घटनाओं से ही नहीं बड़ी बड़ी राजनीतिक और एतिहासिक घटनओं का भी अनुमान कर सकते हैं कि उनमें सक्रिय लोगों की गतिविधियों किससे और कैसे प्रभावित होती होंगी। परिणामों से कार्य का अनुमान करना तभी संभव है जब ध्यान आदि के माध्यम से अपना बौद्धिक चिंत्तन विकसित करे। ज्ञानी लोग अभौतिक क्रियाओं का अनुमान सहजता से कर सकते हैं। बाबा रामदेव चूंकि प्रसिद्ध योग शिक्षक हैं इसलिये उनकी गतिविधियां अनेक ज्ञात अज्ञात योगियों और हम जैसे योग साधकों के लिये बहुत समय से अनुसंधान का विषय रही हैं। दिल्ली में अनशन के दौरान और उसके बाद उनके व्यक्त्तिव का पूरा स्वरूप सामने आ रहा था। उनकी राजनीतिक गतिविधियों में योगियों और योगसाधकों की दिलचस्पी कम थी पर उसके परिणाम और अभियान के संचालन को योग विज्ञान की कसौटी पर कसने का यह स्वर्णिम अवसर था। प्राणायामों तथा योगासनों की शिक्षा देने वाले बाबा रामदेव ने अपनी साधना से कैसा व्यक्तित्व पाया है यह देखने का इससे बेहतर अवसर नहीं मिल सकता था। अभी यह कहना कठिन है कि आगे उनकी क्या योजना है? वह विश्राम करने के बाद फि कौनसा काम करते हैं यह देखने वाली बात होगी पर इतना तय है कि भारतीय अध्यात्म की योग विधा को प्रचार दिलाने में उनका कम अनुकरणीय रहा यह अलग बात है कि बाज़ार और प्रचार के संयुक्त उपक्रम के प्रबंधकों ने उनकी मदद की। बाज़ार और प्रचार में सक्रिय महानुभावों का पूरे विश्व में दबदबा है और वह समय समय पर अपने नायक आम लोगों के सामने प्रस्तुत करते हैं। जब भारतीय समाज पर राजकीय विलासिता हावी हो रही है तो वहां राजरोगों का पनपना स्वाभाविक है। ऐसे बाबा रामदेव के योगासन उपयोगी  साबित रहे रहे थे। उनको नायकत्व का दर्जा मिला पर आलोचकों ने आरोप लगाया कि बाबा इस तरह समाज में व्यायाम का प्रचार कर लोगों की उपभोग क्षमता बढ़ा रहे हैं जिससे बाज़ार को अपने उत्पादों के ग्राहक बनाये रखने में मदद मिलेगी। उस समय अनेक लोगों ने इस बात की अपेक्षा की पर योग साधना में दक्ष लोगों ने स्पष्टतः कहा था कि उनकी शिक्षा पूरी तरह से योग विधा का प्रतिनिधित्व नहीं करती।
           बाबा रामदेव ने पतंजलि के आष्टांग योग की चर्चा अनेक बार की पर वह प्राणायाम तथा योगासनों के अलावा बाकी छह भागों में अपनी विशिष्टता प्रमाणित नहीं कर पाये थे। मुख्य बात यह कि ध्यान की शक्ति का महत्व वह सिद्ध नहीं कर पाये जो कि सबसे अधिक आवश्यक था। अगर वह आगे योगशिक्षा जारी रखते हैं तो उनको ध्यान और धारणा का महत्व भी बताना चाहिए।
            अपने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान उन्होंने राजनीतिक विषयों में अपनी अपरिपक्वता का ही प्रमाण उन्होंने दिया। उनके कुछ बयान तो चौंकाने वाले थे जो कि यह बात साफ करते थे कि अभी उनको अपने ही शब्दों का प्रभाव नहीं मालुम। अपने समकक्ष ही खड़े अन्ना हजारे के आंदोलन के ऐसे मुद्दों पर अपनी असहमति दी जिनकी कोई आवश्यकता नहीं थी। उनका यह बयान उनके प्रशंसकों चौंकाने वाला लगा था। किसी महत्वपूर्ण मुद्दे पर देश में चर्चा होती है तो तमाम तरह के पहलू देखकर ही कोई निष्कर्ष निकलता है। ऐसे में अपने बयान सोच समझकर देना चाहिए।
उस समय कुछ लोगों को लगा कि वह अपना गुप्त लक्ष्य लेकर ही वह सत्याग्रह चला रहे हैं। एक मजे की बात यह है कि दिल्ली आने तक यह पता नहीं था कि वह धरना देंगे कि सत्याग्रह करेंगे या आमरण अनशन। वह तीनों का मतलब भी नही जानत लग रहे थे। अनशन तो उनको करना ही नहीं था क्योंकि वह अन्न ग्रहण ही नहीं करते तब उसे छोड़ना कैसा?
                वह शायद श्री अन्ना हजारे का अनशन देखकर वह प्रभावित हुए थे। जब नौ दिन के अनशन से बाबा रामदेव का शरीर अस्थिर हो गया तो उनके सहयोगी एक नेता ने कहा कि उनको तो नीबू पानी पीकर अनशन करना था। कुछ लोग उनको अन्ना हजारे की अपेक्षा दैहिक रूप से कमजोर बता रहे हैं जो कि सोलह दिन तक अनशन कर चुके हैं। चिकित्सकों ने यह बात मानी थी कि उनके शरीर में चर्बी की कमी है इसलिये उन पर अनशन का बुरा प्रभाव जल्दी पड़ा। दरअसल यह बाबा रामदेव के ही अपरिपक्व होने के साथ ही पतंजलि योग से पूरी तरह अनभिज्ञ होने का प्रमाण है। अन्ना हजारे अन्न खाते हैं इसलिये उनके शरीर में इतनी चर्बी मौजूद रहती है जो अनशन के समय उनकी सहायक बनती है। बाबा रामदेव अन्न नहीं खाते इसलिये उनके शरीर में चर्बी की कमी है इसलिये भूखे रहना अपने शरीर से खिलवाड़ करने जैसा ही है।
          श्रीमद्भागत गीता में कहा गया है कि न कम खाने वाले का न ज्यादा खाने वाले का, न कम सोने वाले का न अधिक सोने वाले का और न ही असंयमी का कभी योग सिद्ध नहीं होता। ऐसे में अन्न का त्याग कर चुके बाबा रामदेव को सतर्क रहना चाहिए था। स्थिति यह हो गयी कि दूसरों को स्वस्थ रहने के लिये योग शिक्षा देने वाले बाबा रामदेव को अंग्रेजी शिक्षा पद्धति के वही डाक्टर परामर्श दे रहे थे जिनके बारे में बाबा रामदेव का दावा था कि वह उनके पास कभी नहीं जायेंगे। आधुनिक राजनीतिक क्षेत्र में जय पराजय का महत्व नहीं होता पर योग में यह पराजय बाबा रामदेव के लिये एक चुनौती है। इसे वह योग साधना से ही विजय में बदल सकते हैं। पिछले अनेक दिनों से वह योग शिविरों में नहीं दिख रहे पर इसका मतलब यह नहीं है कि योग शिक्षा का काम कहीं नहीं चल रहा है यह अलग बात है कि उसे प्रचार न मिलता है न जरूरत है।
               इस देश में एक नहीं सैंकड़ों योग शिक्षक हैं। भारतीय योग संस्थान इसके लिये मुफ्त में अनेक शिविर लगाता है। उसके अनेक शिक्षक योग विज्ञान में इतना प्रमाणिक रूप से पारंगत हैं कि अनेक लोग उनका लोहा मानते हैं। समस्या यह है कि योग साधना में सक्रियता यानि एक्शन नहीं है। एक्शन वाले आसन व्यायाम होते हैं। इसके अलावा प्राणायाम, ध्यान, धारणा और समाधि में तो व्यक्ति एकदम निष्क्रिय रहता इसलिये प्रभावी नहीं लगता। जबकि बाबा रामदेव सतत सक्रिय रहते हैं। उनके कई आसान सामान्य व्यायाम की तरह हैं इसलिये ही शायद आलोचना अधिक हो रही है पर सच यह है कि उनके पास आने वाली भीड़ आती भी इसलिये है। बहरहाल आगे वह क्या करेंगे यह देखने वाली बात होगी। अलबत्ता उन्होने अपने आलोचकों को अपने भड़ास निकालने का अवसर दे दिया है। हालांकि इस बात की भी संभावना है कि उन जैसा योगी अधिक समय तक चुप नहीं बैठ सकता।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

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छीनने से सिंहासन नहीं मिल जाता-हिन्दी व्यंग्य कविता


तेल उधार लेकर

घर के चिराग न जलाएँ,

मांगी मिठाई से

दिवाली न मनाएँ,

अँधेरों में जीना,

जुबान चाहे मांगे स्वाद

अपने होंठ भूख से सीना,

वरना गुड़ बनकर

अमीरों के हत्थे चढ़ जाओगे।

फिर गुलामी की जज़ीरों से

लड़ते रहोगे

आज़ादी के लिए छटपटाओगे।

————–

मांगने से मिलती नहीं अमीरी

छीनने से सिंहासन नहीं मिल जाता है।

अपनी दौलत, शौहरत और ताकत

पर भले ही तुम इतराते रहो

अपने घमंड से काँपते देखो ज़माना

सच यह है कि

तुम्हारी ताकत से

क्या हिलेगा देश में कोई पेड़

किसी शहर का पत्ता तक हिल नहीं पाता है।


कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 

poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

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कब तब छिपोगे दूसरों के दर्द से-हिन्दी साहित्यक कवितायें


तुम सुनना नहीं चाहते, पर तुम्हारे कान बंद करने से
जमाने के लोगों की दर्दीली आवाज बंद नहीं हो जायेगी,
देखना नहीं चाहते किसी की पीड़ा, पर आंखें बंद करने से
लोगों के जिस्म की भूख, केवल वादों से नहीं मिट जायेगी,
 चाहे जब छिप जाओ तुम वातानुकूलित कमरों में
बाहर की आग और आंधी दीवारें उनको भी कभी ढायेगी।
————
न खेलो इस ज़माने से
लोगों को खिलौना मानकर,
दूसरों के दर्द को
अनदेखा न करो अच्छी तरह जानकर।
अपने हाथ से किये कसूरों  पर
चाहे कितनी सफाई देते रहो
कोई यकीन नहीं करेगा,
भले ही डर से कोई
सामने नहीं कहेगा,
कभी न कभी न उठेगा
तुम्हारे किये कसूरों का तूफान
गिरा देगा तुम्हारे महल
तब रहो आराम से चादर तानकर।
————
संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक   ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
Editor and writer-Deepak  ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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प्रकृति से निरंतर जुड़े रहना जरूरी-चिंत्तन लेख (nature and man-hindi thought article)


                किसी भी इमारत का-चाहे वह महल हो या मकान या झौंपड़ी-फर्श हो वह सीमेंट, मुजाइक,, संगममरमर, टाइल्स, पत्थर या मार्बल का हो सकता है जिसे देखने का शहरी आदमी आदी हो गया है और जिसकी वजह से लोग प्राकृतिक घास पर चलना ही भूल गये हैं। अगर कोई आदमी प्रकृति से दूर है तो वह इमारतों की चमक से अचंभित हो सकता है, खुश भी हो सकता है पर वह आनंद नहीं उठा सकता। फर्श पर चलते हुए वह आंखें नीचे देखकर उस पर चलने का सुख भले ही अनुभव करना चाहता हो पर वह क्या ऐसा कर नहीं पाता। 
              प्रकृति से दूर होकर आदमी अगर सुख या आनंद की अनुभूति करना चाहे तो यह उसका भ्रम है। प्रश्न यह है कि सुख या आनंद है क्या? आंनद वह है जब आप किसी वस्तु की सुगंध को नाक से , रूप का आंख से और अस्त्तिव को स्पर्श से अनुभव करें। यही आनंद है। न कि यह लगे कि हमें सुख अनुभव हो रहा है पर जिसका आभास अंदर नहीं पहुंचे। हम जबरदस्ती करें कि आनंद हमें मिल रहा है तो वह क्षणिक है। इसका पता कैसे लगे?
               जब किसी चीज को देखें, स्पर्श करें या सूंघें तो उसके आनंद का आभास उससे दूर होने पर भी लगे। हम कोई आवाज सुने और जब वह बंद हो जाये तो भी अनुभूति होती रहें। हम कोई वस्तु मुख से ग्रहण करें तो पेट में जाकर उसका रस आनंद प्रदान करे न कि जुबान पर स्वाद के बाद उसका सुख जाता रहे। सच्चा आनंद वही है जो अपने उद्गम स्तोत्र से बाहर आने के बाद भी सुख देता रहे। यह सुख कृत्रिम वस्तुओं से नहीं मिल सकता। एक बात यह भी है कि इसके विपरीत यह आभास बुरा हो तो उससे दूर होते ही समाप्त हो जाये। जिनकी इंद्रियां सुख को गहराई तक ले जाने की आदी हैं वह दुःख को बाहर ही छोड़ देती हैं।
               कभी पार्क में घुमने जायें। वहां पेड़ पत्तों से उठ रही शीतल हवा गर्मी में भी सुख प्रदान करती है। उद्यान में घास पर नंगे पांव घूमे। कहते हैं कि इससे आंखों की रौशन बढ़ती है तो जीवन में आत्मविश्वास भी आता है। इसका कारण यह है कि हमारे पांव या तो जूते पर सवारी करते हैं या पक्के फर्श पर चलते हैं। यह कठोरता उनके स्वभाव का मूल हिस्सा हो जाती है। इससे हमारे मस्तिष्क में भी लोचता का अभाव दिखाई देता है। यही कारण है कि आजकल लोग अहंकार, जिद्दी और अपनी शेखी बघारने वाले होते हैं। लोग बोलते हैं पर किसी की सुनते नहीं। सुनते हैं तो समझते नहीं। उद्यान में लोचदार घास पर घूमते हुए पांव न केवल परिवर्तन का आभास करते हैं बल्कि उनमें यह आत्मविश्वास भी आता है कि यह संसार एक जैसा रसहीन नहीं है। बल्कि कहंी ठोस धरातल है तो की घास का भी आनंद है।

                 हमने देखा है कि जो लोग पार्क में नहंी घूमते न व्यायाम करते हैं उनका व्यवहार रूढ़ और रूखा होता है जबकि जो लोग प्रातः घूमते हैं या योगसाधना करते हैं उनके व्यवहार में कहीं न कहीं आकर्षण झलकता है। जब हम श्रीमद्भागवत गीता में वर्णित ‘गुण ही गुणों में बरतते हैं’ कि सिद्धांत का व्यवहारिक रूप देखते हैं तो लगता है कि मनुष्य स्वयं कुछ नहीं है बल्कि उसका खानपान, रहनसहन तथा चाल चलन ही उसके व्यवहार का निर्धारण करते हैं। ऐसे में  हमें यह प्रयास करना चाहिए कि हम ऐसे स्तोत्रों के संपर्क में रहें जिनसे सद्गुणों का निर्माण होता है।

————–

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

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यह आजादी-हिन्दी हाइकु (yah azadi-hindi hiq)


भ्रष्टाचार
जिंदगी का हिस्सा
बन गया है,

उठता दर्द
जब मौका न होता
अपने पास,

दुख यह है
कोई धनी होकर
तन गया है।
——–
गैरों ने लूटा
परवाह नहीं थी
गुलाम जो थे,

यह आजादी
अपनों ने पाई है
लूट वास्ते

नये कातिल
रचते इतिहास
हाथ खुले हैं,

कब्र में दर्ज
लगते है पुराने
यूं नाम जो थे।

————

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप” 
poet,writter and editor-Deepak “BharatDeep”
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समाज सेवा से पहले आप सेवा-हिन्दी हास्य कविता (self service not social servic-hindi hasya kavita


देशभक्ति और जनकल्याण का
जिम्मा उठाया किसने,
अपने पेट और बैंक में जमा
अपनी रकम के आंकड़े बढ़ाने की
कसम खाई जिसने।
———-
कमरे के बाहर
लगा दिया उन्होंने
‘समाज सेवा’ का बोर्ड
अंदर काम घिनौने करने लगे,
जमाना भी अक्ल का अंधा
लोग केवल नारे पर ही यकीन कर
वाह वाह का शोर भरने लगे।

अंदर झांककर देखा
जब कुछ अक्लमंदों ने तो पाया
सजा था पूरा कमरा
गरीबों के खून की भरी बोतलों से,
कहीं शराब के छींटे थे
पलंग पर फैले चमकते बिस्तर लगे होटलों से,
खूबसूरत चेहरे
अपने गालों पर दाग लगाये,
बैठे थे प्यार की महफिल सजाये,
सभी अपनी जुबां से
‘आप सेवा’ के दावे करने लगे।’’
————–

लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Bharatdeep,Gwalior, madhyapradesh
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हास्य कविता-मिलन के बाद विरह का इंतजार (hasya kavita-vivah ke bad virah ka intajar)


टीवी पत्रकार ने कहा
अपने संपादक से
‘सर,
आप देखिए मैंने
राजघराने के राजकुमार के
विवाह प्रसंग को कितनी अच्छी तरह
अपने चैनल पर चलाया,
ढेर सारे विज्ञापन चलते रहे,
लोगों के मन में स्वयं
और औलादों की ऐसी ही शादी के
सपने मन ही मन पलते रहे,
हमने भी लिया विदेशी चैनलों से
सारा माल साभार,
हो गया अपने चैनल का बेड़ा मुफ्त में पार,
इसे कहते हैं कि हल्दी लगे न फिटकरी
रंग चोखा आया।’

सुनकर संपादक ने कहा
‘वैसे भी कौन हमारे समाचारों पर
कोई खर्चा आता है,
वह तो गनीमत समझो
कि मैंने तुम्हारी नौकरी का जुगाड़
प्रबंधकों से कर रखा है
वरना उनको तो तुम्हारा
वेतन देना भी भारी नज़र आता है,
वैसे भूल जाओ अब इस खबर को,
नहीं खींच सकते यह खबर ऐसे, जैसे रबड़ को,
अब कोई दूसरी सनसनी या रोमांचक
खबर जुटाने लग जाओ,
इस खबर को भी मत भुलाओ,
ध्यान में रखना
राजकुमार के प्रेम प्रसंग,
और सजनी से मिलन का रंग,
अभी हमने श्रृंगार रस से कार्यक्रंम सजाया,
इसलिये जवानों को बहुत भाया,
अब देखन कहीं इस प्रेम में विरह कब आता है,
धनपतियों और राजघरानों के रिश्तों में
कभी ठहराव न उनको न जनता को भाता है,
देखना कब विरह का रंग आता है,
फिर तलाक से भी पब्लिक का नाता है,
इस प्रेम प्रसंग और विवाह की फिल्म और फोटो
अपने पास संजोये रखना
देखे कब होता है हमारी सनसनी का पकना,
कभी प्रेम और विवाह का प्रसंग अधिक नहीं खिंचता
इसलिये उससे हमने इतना नहीं कमाया
जितना विरह से पाया,
जब होगा राजधराने में घरेलू झगड़ा
दर्शकों को देंगे सनसनी का झटका तगड़ा,
शादी एक दिन होती है,
पर झगड़े की बात बरसों तक
हमारे विज्ञापन ढोती है,
इसलिये बाकी खबरों में तलाश करते रहो,
कनखियों से राजघराने की तरफ भी तकते रहे,
प्रेम और शादी से अधिक प्रसंग
विरह का लंबा खिंच जाता है,
उससे ही हर प्रचारक अधिक कमाता है,
तलाक फैलाता है सनसनी,
मजा बढ़ाती है बड़े लोगों की तनातनी,
मैंने तुम्हें वही बात बताई,
जो अनुभव से पाई,
जब देखो राजकुमार और राजकुमारी का फुका चेहरा
समझ लो लंब समय तक
विज्ञापन चलाने के लिये
प्रसंग पाने का मौका पाया।’’
————

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

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श्रीमद्भागवत गीता से समझा जा सकता है समाजवाद का रूप-मज़दूर दिवस पर हिन्दी लेख (shri madbhawat gita aur soscilism-mazdoor diwas, divas or may day par vishesh lekh)


           भारत में मजदूर दिवस मनाने की कोई परंपरा नहीं है, अलबत्ता यहां विश्वकर्मा जयंती मानी जाती है जिसे करीब करीब इसी तरह का ही माना जा सकता है।  हमारे देश  में  विश्वकर्मा जी को ही श्रम शक्ति का देवता मन जाता है।  हमारा  अध्यात्मिक दर्शन   पाश्चात्य सभ्यता द्वारा प्रदाय अधिकतर दिवसों को खारिज करता है यथा माता दिवस, पिता दिवस, मैत्री दिवस, प्र्रेम दिवस तथा नारी दिवस। मजदूर दिवस भी पश्चिम से ही आयातित विचारधारा से जुड़ा है पर इसे मनाने का समर्थन करना चाहिये। दरअसल इसे तो बहुत शिद्दत से मनाना चाहिए हालाँकि हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में निष्काम दान तथा निष्प्रयोजन दया में हमेशा लिप्त रहने के प्रेरित किया जाता है न की एक दिन के लिए ।
           आधुनिक युग में कार्ल मार्क्स को मजदूरों का मसीहा कहा जाता है। उनके नाम पर मजदूर दिवस मनाया जाता है तो इसमें मजदूर या श्रम शब्द जुड़ा होने से संवेदनायें स्वभाविक रूप जाग्रत हो उठती हैं। एक बात याद रखिये आज भारत में जो हम नैतिक, अध्यात्म, तथा तथा देशप्रेम की भावना का अभाव लोगों में देख रहे हैं वह शारीरिक श्रम को निकृष्ट मानने की वजह से है। हर कोई सफेद कालर वाली नौकरी चाहता है और शारीरिक श्रम करने से शरीर में से पसीना निकलने से घबड़ा रहे हैं। भारतीय तथा पाश्चात्य दोनों ही   प्रकार के स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि शरीर को जितना चलायेंगे उतना ही स्वस्थ रहेगा तथा जितना सुविधाभोगी बनेंगे उतनी ही तकलीफ होगी।
           सबसे बड़ी बात यह है कि गरीब और श्रमिक को तो एक तरह से मुख्यधारा से अलग मान लिया गया है। वह दया योग्य समझा जाता है न की साथ बिठाने लायक।  संगठित प्रचार माध्यमो में-टीवी चैनल, रेडियो तथा समाचार पत्र पत्रिकाओं-इस तरह के प्रसारण तथा प्रकाशन देखने को मिलते हैं जैसे कि श्रम करना एक तरह से घटिया लोगों का काम है। संगठित प्रचार माध्यमों को इसके लिये दोष नहीं दिया जा सकता क्योंकि वह आधुनिक बाज़ार के विज्ञापनों पर ही अपना साम्राज्य खड़े किये हुए  हैं। यह बाजार सुविधाभोगी पदार्थों का निर्माता तथा विक्रेता है। स्थिति यह है कि फिल्म और टीवी चैनलों के अधिकतर कथानक अमीर घरानों पर आधारित होते हैं जिसमें नायक तथा नायिकाओं को मालिक बनाकर प्रस्तुत किया जाता है। उनमें नौकर के पात्र भी होते हैं पर नगण्य भूमिका में। क्हीं नायक या नायिका मज़दूर या नौकर की भूमिका में दिखते हैं तो उनका पहनावा अमीर जेसा ही होता है। फिर अगर नायक या नायिका का पात्र मजदूर या नौकर है तो कहानी के अंत में वह अमीर बन ही जाता है। जबकि जीवन में यह सच नज़र नहीं आता। ऐसे अनेक उदाहरण समाज में देखे जा सकते हैं कि जो मजदूर रहे तो उनके बच्चे भी मज़दूर बने। आम आदमी इस सच्चाई के साथ जीता भी है कि उसकी स्थिति में गुणात्मक विकास भाग्य से ही आता है
         कार्ल मार्क्स मजदूरों का मसीहा मानने पर विवाद हो सकता है पर पर देश के बुद्धिमान लोगों को अब इस बात के प्रयास करना चाहिये कि हमारी आने वाली पीढ़ी में श्रम के प्रति रूझान बढ़े। यहां श्रम से हमारा स्पष्ट आशय अकुशल श्रम से है-जिसे छोटा काम भी कहा जा सकता है। कुशल श्रम से आशय इंजीनियरिंग, चिकित्सकीय तथा लिपिकीय सेवाओं से है जिनको करने के लिये आजकल हर कोई लालायित है। इसी अकुशल श्रम को सम्मान की तरह देखने का प्रयास करना चाहिये। यह नहीं समझना चाहिए कि जो लोग अकुशल श्रम करते हैं वह भी इंसान है कोइ यन्त्र  या पालतू पशु नहीं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने पास या साथ काम करने वाले श्रमजीवी को कभी असम्मानित या हेय दृष्टि से नहीं देखना चाहिये। मनुष्य मन की यह कमजोरी है कि वह धन न होते हुूए भी सम्मान चाहता है। दूसरी बात यह है कि श्रमजीवी मजदूरों के प्रति असम्माजनक व्यवहार से उनमें असंतोष और विद्रोह पनपता है जो कालांतर में समाज के लिये खतरनाक होता है। यही श्रमजीवी और मजदूरी ही धर्म की रक्षा में प्रत्यक्ष सहायक होता है। यही कारण है कि हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में सभी को समान दृष्टि से देखने की बात कही जाती है। इस विषय पर दो वर्ष पूर्व एक लेख यहां प्रस्तुत है। इसी लेख को कल सैकंड़ों पाठकों द्वारा देखने का प्रयास किया इसलिये इसे इस पाठ के नीचे भी प्रस्तुत किया जा रहा है।
        आज मजदूर दिवस है और कई जगह मजदूरों के झुंड एकत्रित कर रैलियाँ निकालीं जायेंगी। ऐसा नहीं है कि हमारे दर्शन में मजदूरों के लिए कोई सन्देश नहीं है पर उसमें मनुष्य में वर्गवाद के वह मन्त्र नहीं है जो समाज में संघर्ष को प्रेरित करते हैं। हमारे अध्यात्मिक दर्शन द्वारा प्रवर्तित जीवनशैली पर दृष्टिपात करें तो उसमें पूंजीपति मजदूर और गरीब अमीर को आपस में सामंजस्य स्थापित करने का सन्देश है। भारत में एक समय संगठित और अनुशासित समाज था जो कालांतर में बिखर गया। इस समाज में अमीर और गरीब में कोई सामाजिक तौर से कोई अन्तर नहीं था।
           श्री मद्भागवत गीता में कहा गया है कि
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            न द्वेष्टयकुशर्ल कर्म कुशले नातुषज्जजते।
           त्यागी सत्तसमाष्टिी मेघावी छिन्नसंशयः।।
            “जो मनुष्य अकुशल कर्म से तो द्वेष नहीं करता और कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता- वह शुद्ध सत्वगुण से युक्त पुरुष संशय रहित, बुद्धिमान और सच्चा त्यागी है।”
            श्रीमदभागवत गीता के १८वे अध्याय के दसवें श्लोक में इस श्लोक में उस असली समाजवादी विचारधारा की ओर संकेत किया गया है जो हमारे देश के लिए उपयुक्त है । जैसा कि सभी जानते हैं कि हमारे इस ज्ञान सहित विज्ञानं से सुसज्जित ग्रंथ में कोई भी संदेश विस्तार से नहीं दिया क्योंकि ज्ञान के मूल तत्व सूक्ष्म होते हैं और उन पर विस्तार करने पर भ्रम की स्थिति निमित हो जाती है, जैसा कि अन्य विचारधाराओं के साथ होता है। श्री मद्भागवत गीता में अनेक जगह हेतु रहित दया का भी संदेश दिया गया है जिसमें अपने अधीनस्थ और निकटस्थ व्यक्तियों की सदैव सहायता करने के प्रेरित किया गया है।
              श्री मद्भागवत गीता में भी कहा गया है कि 
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              स्वै स्वै कर्मण्यभिरतः संसिद्धि लभते नरः।
              सव्कर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु।।
          “अपने अपने स्वाभाविक कार्ये में तत्परता से लगा मनुष्य भक्ति प्राप्त करते हुए उसमें सिद्धि प्राप्त लेता है। अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार से कर्म करके परम सिद्धि प्राप्त करता है उस विधि को सुन।”
          यतः प्रवृत्तिभूंतानां वेन सर्वमिद्र ततम्।
          स्वकर्मणा तमभ्यच्र्य सिद्धिं विन्दति मानवः।।
        “जिस परमेश्वर से संपूर्ण प्राणियों की उत्तपति हुई है और जिससे यह समस्त जगत व्याप्त है, उस परमेश्वर को अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त हो जाता है।”
             श्रीमदभागवत गीता में ऊपर लिखे दोनों  श्लोक को  तो यह साफ लगता है अकुशल श्रम से आशय मजदूर के कार्य से ही है । आशय साफ है कि अगर आप शरीर से श्रम करे हैं तो उसे छोटा न समझें और अगर कोई कर रहा है तो उसे भी सम्मान दे। यह मजदूरों के लिए संदेश भी है तो पूंजीपतियों के लिए भी है ।
श्री गीता में ही हेतु रहित दया का सन्देश तो स्पष्ट रुप से धनिक वर्ग के लोगों के लिए ही कहा गया है-ताकि समाज में समरसता का भाव बना रहे। कार्ल मार्क्स एक बहुत बडे अर्थशास्त्री माने जाते है जिन के विचारों पर गरीबों और शोषितों के लिए अनेक विचारधाराओं का निर्माण हुआ और जिनका नारा था “दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ”।
              शुरू में नये नारों के चलते लोग इसमें बह गये पर अब लोगों को लगने लगा है कि अमीर आदमी भी कोई ग़ैर नहीं वह भी इस समाज का हिस्सा है-और जो उनके खिलाफ उकसाते हैं वही उसने हाथ भी मिलाते हैं । जब आप किसी व्यक्ति या उनके समूह को किसी विशेष संज्ञा से पुकारते हैं तो उसे बाकी लोगों से अलग करते हैं तो कहीं न कहीं समाज में विघटन के बीज बोते हैं।
               दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि श्रीगीता में अपने स्वाभाविक कर्मों में अरुचि न दिखाने का संदेश दिया गया है। सीधा आशय यह है कि कोई भी काम छोटा नहीं है और न तो अपने काम को छोटा और न किसी भी छोटा काम करने वाले व्यक्ति को हेय समझना चाहिये। ऐसा करना बुद्धिमान व्यक्ति का काम नहीं करना चाहियैं। कई बार एसा होता है कि अनेक धनी लोग किसी गरीब व्यक्ति को हेय समझ कर उसकी उपेक्षा करते हैं-यह तामस प्रवृत्ति है। उसी तरह किसी की मजदूरी कम देना या उसका अपमान केवल इसलिये करना कि वह गरीब है, अपराध और पाप है। हमेशा दूसरे के गुणों और व्यवहार के आधार पर उसकी कोटि तय करना चाहिये।
भारतीय समाज में व्यक्ति की भूमिका उसके गुणों, कर्म और व्यक्तित्व के आधार पर तय होती है उसके व्यवसाय और आर्थिक शक्ति पर नहीं। अगर ऐसा नहीं होता तो संत शिरोमणि श्री कबीरदास, श्री रैदास तथा अन्य अनेक ऎसी विभूतियाँ हैं जिनके पास कोई आर्थिक आधार नहीं था पर वे आज हिंदू विचारधारा के आधार स्तम्भ माने जाते हैं।
           कुल मिलाकर हमारे देश में अपनी विचारधाराएँ और व्यक्तित्व रहे हैं जिन्होंने इस समाज को एकजुट रखने में अपना योगदान दिया है और इसीलिये वर्गसंघर्ष के भाव को यहां कभी भी लोगों के मन में स्थान नहीं मिल पाया-जो गरीबो और शोषितों के उद्धार के लिए बनी विचारधाराओं का मूल तत्व है। परिश्रम करने वालों ने रूखी सूखी खाकर भगवान का भजन कर अपना जीवन गुजारा तो सेठ लोगों ने स्वयं चिकनी चुपडी खाई तो घी और सोने के दान किये और धार्मिक स्थानों पर धर्म शालाएं बनवाईं । मतलब समाज कल्याण को कोई अलग विषय न मानकर एक सामान्य दायित्व माना गया-बल्कि इसे मनुष्य समुदाय के लिए एक धर्म माना गया वह अपने से कमजोर व्यक्ति की सहायता करे। आज के दिन अकुशल काम करने वाले मजदूरों के लिए एक ही संदेश मैं देना चाहता हूँ कि अपने को हेय न समझो । सेठ साहूकारों और पूंजीपतियों के लिए भी यह कहने में कोइ संकोच नहीं है अपने साथ जुडे मजदूरों और कर्मचारियों पर हेतु रहित दया करें ।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप” 
poet,writter and editor-Deepak “BharatDeep”
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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छोटी हास्य कविताएँ-क्रिकेट धर्म बन गया है (chhoti hasya kavitaen-crickt dharma banaa)


इंडिया में क्रिकेट भी एक धर्म है
प्रचारक जी ने बताया,
मगर फिक्सिंग की इसमें कैसी परंपरा है
यह नहीं समझाया।
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क्रिकेट वह धर्म है
जिसमें खेलने से पहले खिलाड़ी
बाज़ार में नीलाम होते हैं,
सट्टा लगाने पर मिलता है प्रसाद
कोई होता भी है इसमें बरबाद
जीतने से ज्यादा
हारने पर आमादा

क्रिकेट खेलने वाले  कई  गुलाम होते हैं

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लोग रहे हमेशा खाली हाथ-हिन्दी व्यंग्य कविता


भ्रष्टाचार शायद मिट जायेगा,देश में जंग जारी है,
कीचड़ का हथियार लिये खड़े योद्धा,जोश भारी है।
यकीन नहीं एक दूसरे पर, फिर भी साथ साथ हैं,
कर्मवीरों का जंग के नाम पर धोखा देना जारी है।
चारों तरफ फैलाये घृणा का भाव, वाणी वाचाल है
दौलत की कीचड़ में, सज्जनता की खोज जारी है।
भ्रष्टाचार मिटे या नहीं, कौन देखने आयेगा फिर
इतिहास में दर्ज कराने का उनको शौक भारी है।
दीपक बापू दिखायें आईना आंदोलनों के इतिहास का
लोग रहे हमेशा खाली, नायकों की प्रसिद्धि बहुत भारी है।
                   कवि, लेखक , संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
poet,editor,writer and auther-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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विकास से दैहिक जलीय विसर्जन अवरुद्ध-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन


               गोलगप्पे वाले का स्टिंग आपरेशन कर उस छात्रा ने कमाल ही कर दिया। गोलगप्