Tag Archives: हिंदी व्यंग्य

जिंदगी का हिसाब-हिंदी व्यंग्य कविता


कुदरत की अपनी चाल है

इंसान की अपनी चालाकियां है,

कसूर करते समय

सजा से रहते अनजान

यह अलग बात है कि

सर्वशक्तिमान की सजा की भी बारीकियां हैं,

दौलत शौहरत और ओहदे की ऊंचाई पर

बैठकर इंसान घमंड में आ ही जाता है,

सर्वशक्तिमान के दरबार में हाजिरी देकर

बंदों में खबर बनकर इतराता है,

आकाश में बैठा सर्वशक्तिमान भी

गुब्बारे की तरह हवा भरता

इंसान के बढ़ते कसूरों पर

बस, मुस्कराता है

फोड़ता है जब पाप का घड़ा

तब आवाज भी नहीं लगाता है।

कहें दीपक बापू

अहंकार ज्ञान को खा जाता है,

मद बुद्धि को चबा जाता है,

अपने दुष्कर्म पर कितनी खुशफहमी होती लोगों को

किसी को कुछ दिख नहीं रहा है,

पता नहीं उनको कोई हिसाब लिख रहा है,

गिरते हैं झूठ की ऊंचाई से लोग,

किसी को होती कैद

किसी को घेर लेता रोग

उनकी हालत पर

जमीन पर खड़े इंसानों को तरस ही जाता है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””
Gwalior, madhyapradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

poet, Editor and writer-Deepak  ‘Bharatdeep’,Gwalior
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माया का तिलिस्म-हिंदी व्यंग्य कविता


देश में तरक्की बहुत हो गयी है

यह सभी कहेंगे,

मगर सड़कें संकरी है

कारें बहुत हैं

इसलिये हादसे होते रहेंगे,

रुपया बहुत फैला है बाज़ार में

मगर दौलत वाले कम हैं,

इसलिये लूटने वाले भी

उनका बोझ हल्का कर

स्वयं ढोते रहेंगे।

कहें दीपक बापू

टूटता नहीं तिलस्म कभी माया का,

पत्थर पर पांव रखकर

उस सोने का पीछा करते हैं लोग

जो न कभी दिल भरता

न काम करता कोई काया का,

फरिश्ते पी गये सारा अमृत

इंसानों ने शराब को संस्कार  बना लिया,

अपनी जिदगी से बेजार हो गये लोगों ने

मनोरंजन के लिये

सर्वशक्तिमान की आराधना को

खाली समय

पढ़ने का किस्सा बना लिया,

बदहवास और मदहोश लोग

आकाश में उड़ने की चाहत लिये

जमीन पर यूं ही गिरते रहेंगे।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Gwalior, madhyapradesh

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शांति और हथियार के सौदागर-हिंदी व्यंग्य कविता


 

जंग के लिये जो अपने  घर में हथियार बनाते हैं,

बारूद का सामान बाज़ार में  लोगों को थमाते हैं।

दुनियां में उठाये हैं वही शांति का झंडा अपने हाथ

खून खराबा कहीं भी हो, आंसु बहाने चले आते हैं।

कहें दीपक बापू, सबसे ज्यादा कत्ल जिनके नाम

इंसानी हकों के समूह गीत वही दुनियां में गाते हैं।

पराये पसीने से भरे हैं जिन्होंने अपने सोने के भंडार

गरीबों के भले का नारे वही जोर से सुनाते हैं।

अपनी सोच किसको कब कहां और  कैसे सुनायें

चालाक सौदागरों के जाल में लोग खुद ही फंसे जाते हैं।

खरीद लिये हैं उन्होंने बड़े और छोटे रुपहले पर्दे

इसलिये कातिल ही फरिश्ते बनकर सामने आते हैं।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”,Gwalior madhya pradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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बीमार बन गए चिकित्सक -हिंदी व्यंग्य कविता


इस जहान में आधे से ज्यादा लोग

चिकित्सक हो गये हैं,

अपनी बीमारियों की दवायें खाते खाते

इतना अभ्यास कर लिया है कि

वह बीमारी और दवा के बीच

अपना अस्तित्व खो रहे हैं,

बताते हैं दूसरों को दवा

भले कभी खुद ठीक न हो रहे हों।

कहें दीपक बापू

अपनी छींक आते ही हम

रुमाल लगा लेते हैं

इस भय से कि कोई देखकर

दुःखी हो जायेगा,

बड़ी बीमारी का भय दिखाकर

बड़े चिकित्सक का रास्ता बतायेगा,

सत्संग में भी सत्य पर कम

मधुमेह पर चर्चा ज्यादा होती है,

सर्वशक्तिमान से ज्यादा

दवाओं  पर बात  होती है,

कितनी बीमारियां

कितनी दवायें

बीमार समाज देखकर लगता है

छिपकर खुशी की सांस ली जाये,

लाचार शरीर में लोग

ऊबा हुआ मन ढो रहे हैं,

बीमार खुश है अपनी बीमारी और दवाओं पर

भीड़ में सत्संग कर

यह सोचते हुए कि

वह स्वास्थ्य का बीज बो रहे हैं।

 लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
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लुटेरों की खता नही है-हिंदी व्यंग्य कविता


दौलत की दौड़ में बदहवास है पूरा जमाना

या धोखा है हमारे नजरिये में

यह हमें भी पता नहीं है,

कभी लोगो की चाल पर

कभी अपने ख्याल पर

शक होता है

दुनियां चल रही अपने दस्तूर से दूर

सवाल उठाओ

जवाब में होता यही दावा

किसी की भी खता नहीं है।

कहें दीपक बापू

शैतान धरती के नीचे उगते हैं,

या आकाश से ज़मीन पर झुकते हैं,

सभी चेहरे सफेद दिखते हैं,

चमकते मुखौटे बाजार में बिकते हैं,

उंगली उठायें किसकी तरफ

सिलसिलेवार होते कसूर पर

इंसानियत की दलीलों से जहन्नुम में

जन्नत की तलाश करते लोगों की नज़र में

पहरेदार की तलाशी होना चाहिये पहले

कहीं अस्मत लुटी,

कहीं किस्मत की गर्दन घुटी,

लुटेरों की खता नही है।

————–

 

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
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हिंदी दिवस पर हास्य कविता-राष्ट्रभाषा का महत्व अंग्रेजी में समझाते


हिन्दी दिवस हर बार

यूं ही मनाया जायेगा,

राष्ट्रभाषा का महत्व

अंग्रेजी में बोलेंगे बड़े लोग

कहीं हिंग्लिश में

नेशनल लैंग्वेज का इर्म्पोटेंस

मुस्कराते समझाया जायेगा।

कहें दीपक बापू

पता ही नहीं लगता कि

लोग तुतला कर बोल रहे हैं

या झुंझला कर भाषा का भाव तोल रहे हैं,

हिन्दी लिखने वालों को

बोलना भी सिखाया जायेगा,

हमें तसल्ली है

अंग्रेजी में रोज सजती है महफिलें

14 सितम्बर को हिन्दी के नाम पर

चाय, नाश्ता और शराब का

दौर भी एक दिन चल जायेगा।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”,Gwalior madhya pradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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हिन्दी दिवस पर विशेष निबंध लेख-अध्यात्म की भाषा हिन्दी को चाटुकार संबल नहीं दे सकते


                        14 सितम्बर 2013 को एक बार फिर हिन्दी दिवस मनाया जा रहा है।  इस अवसर पर सरकारी तथा अर्द्धसरकारी तथा निजी संस्थाओं में कहीं हिन्दी सप्ताह तो कही पखवाड़ा मनाया जायेगा।  इस अवसर पर सभी जगह जो कार्यक्रम आयोजित होंगे उसमें निबंध, कहानी तथा कविता लेखन के साथ ही वादविवाद प्रतियोगितायें होंगी। कहीं परिचर्चा आयोजित होगी।  अनेक लोग भारत में हिन्दी दिवस मनाये जाने पर व्यंग्य करते हैं। उनका मानना है कि यह देश के लिये दुःखद है कि राष्ट्रभाषा के लिये हमें एक दिन चुनना पड़ता है।  उनका यह भी मानना है कि हिन्दी भाषा अभी भी अंग्रेजी के सामने दोयम दर्जे की है।  कुछ लोग तो अब भी हिन्दी को देश में दयनीय स्थिति में मानते हैं। दरअसल ऐसे विद्वानों ने अपने अंदर पूर्वाग्रह पाल रखा है। टीवी चैनल, अखबार तथा पत्रिकाओं में उनके लिये छपना तो आसान है पर उनका चिंत्तन और दृष्टि आज से पच्चीस या तीस वर्ष पूर्व से आगे जाती ही नहीं है।  ऐसे विद्वानों को मंच भी सहज सुलभ है क्योंकि हिन्दी का प्रकाशन बाज़ार उनका प्रयोजक है। इनमें से कई तो ऐसे हैं जो हिन्दी लिखना ही नहीं जानते बल्कि उनके अंग्रेजी में लिखे लेख हिन्दी प्रकाशनों में अनुवाद के साथ आते हैं। उनका सरोकार केवल लिखने से है। एक लेखक का इससे ज्यादा मतलब नहीं होना चाहिये पर शर्त यह है कि वह समय के बदलाव के साथ अपना दृष्टिकोण भी बदले।

                        एक संगठित क्षेत्र का लेखक कभी असंगठित लेखक के साथ बैठ नहीं सकता।  सच तो यह है कि जब तक इंटरनेट नहीं था हमें दूसरे स्थापित लेखकों को देखकर निराशा होती थी पर जब इस पर लिखना प्रारंभ किया तो इससे बाहर प्रकाशन में दिलचस्पी लेना बंद कर दिया।  यहां लिखने से पहले हमने बहुत प्रयास किया कि भारतीय हिन्दी क्षितिज पर अपना नाम रोशन करें पर लिफाफे भेज भेजकर हम थक गये।  सरस्वती माता की ऐसी कृपा हुई कि हमने इंटरनेट पर लिखना प्रारंभ किया तो फिर बाहर छपने का मोह समाप्त हो गया।  यहंा स्वयंभू लेखक, संपादक, कवित तथा चिंत्तक बनकर हम अपना दिल यह सोचकर ठंडा करते हैं कि चलो कुछ लोग तो हमकों पढ़ ही रहे हैं।  कम से कम हिन्दी दिवस की अवधि में हमारे ब्लॉग जकर हिट लेते हैं।  दूसरे ब्लॉग  लेखकों का पता नहीं पर इतना तय है कि भारतीय अंतर्जाल पर हिन्दी की तलाश करने वालों का हमारे ब्लॉग से जमकर सामना होता है।  दरअसल निबंध, कहानी, कविता तथा टिप्पणी लिखने वालों को अपने लिये विषय चाहिये।  वादविवाद प्रतियोगिता में भाग लेने वाले युवाओं तथा परिचर्चाओं में बोलने वाले विद्वानों को हिन्दी विषय पर पठनीय सामग्रंी चाहिये और अब किताबों की बजाय ऐसे लोग इंटरनेट की तरफ आते हैं।  सर्च इंजिनों में उनकी तलाश करते हुए हमारे बलॉग उनके सामने आते हैं।  यही बीस ब्लॉग बीस  किताब की तरह हैं।  यही कारण है कि हम अब अपनी किताब छपवाने का इरादा छोड़ चुके हैं।  कोई प्रायोजक हमारी किताब छापेगा नहीं और हमने छपवा लिये तो हमारा अनुमान है कि हम हजार कॉपी बांट दें पर उसे पढ़ने वाले शायद उतने न हों जितना हमारी एक कविता यहां छपते ही एक दिन में लोग पढ़ते हैं।  इतना ही नहीं हमारे कुछ पाठ तो इतने हिट हैं कि लगता है कि उस ब्लॉग पर बस वही हैं।  अगर वह पाठ  हम किसी अखबार में छपवाते तो उसे शायद इतने लोग नहीं देखते जितना यहां अब देख चुके हैं। आत्ममुग्ध होना बुरा हेाता है पर हमेशा नहीं क्योंकि अपनी अंतर्जालीय यात्रा में हमने देख लिया कि हिन्दी के ठेकेदारों से अपनी कभी बननी नहीं थी।  यहां हमें पढ़ने वाले जानते हैं कि हम अपने लिखने के लिये बेताब जरूर रहते हैं पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि हमें कोई प्रचार की भूख है।  कम से कम इस बात से  हमें तसल्ली है कि अपने समकालीन हिन्दी लेखकों में स्वयं ही अपनी रचना टाईप कर लिखने की जो कृपा प्राकृतिक रूप से हुई है कि हम  उस पर स्वयं भी हतप्रभ रह जाते हैं क्योंकि जो अन्य लेखक हैं वह इंटरनेट पर छप तो रहे हैं पर इसके लिये उनको अपने शिष्यों पर निर्भर रहना पड़ता है।  दूसरी बात यह भी है कि टीवी चैनल ब्लॉग, फेसबुक और ट्विटर जैसे अंतर्जालीय प्रसारणों में वही सामग्री उठा रहे हैं जो प्रतिष्ठत राजनेता, अभिनेता या पत्रकार से संबंधित हैं।  यह सार्वजनिक अंतर्जालीय प्रसारण पूरी तरह से बड़े लोगों के लिये है यह भ्रम बन गया है।  अखबारों में भी लोग छप रहे हैं तो वह अंतर्जालीय प्रसारणों का मोह नहीं छोड़ पाते।  कुछ मित्र पाठक पूछते हैं कि आपके लेख किसी अखबार में क्या नहीं छपतें? हमारा जवाब है कि जब हमारे लिफाफोें मे भेजे गये लेख नहीं छपे तो यहां से उठाकर कौन छापेगा?  जिनके अंतर्जालीय प्रसारण अखबारों या टीवी में छप रहे हैं वह संगठित प्रकाशन जगत में पहले से ही सक्रिय हैं। यही कारण है कि अंतर्जाल पर सक्रिय किसी हिन्दी लेखक को राष्ट्रीय क्षितिज पर चमकने का भ्रम पालना भी नहीं चाहिये।  वह केवल इंटरनेट के प्रयोक्ता हैं। इससे ज्यादा उनको कोई मानने वाला नहीं है।

                        दूसरी बात है कि मध्यप्रदेश के छोटे शहर का होने के कारण हम जैसे लेखको यह आशा नहीं करना चाहिये कि जिन शहरों या प्रदेशों के लेखक पहले से ही प्रकाशन जगत में जगह बनाये बैठे हैंे वह अपनी लॉबी से बाहर के आदमी को चमकने देंगे।  देखा जाये तो क्षेत्रवाद, जातिवाद, धर्म तथा विचारवाद पहले से ही देश में मौजूद हैं अंतर्जाल पर हिन्दी में सक्रिय लेाग उससे अपने को अलग रख नहीं पाये हैं।  अनेक लोगों से मित्र बनने का नाटक किया, प्रशंसायें की और आत्मीय बनने का दिखावा किया ताकि हम मुफ्त में यहां लिखते रहें।  यकीनन उन्हें कहीं से पैसा मिलता रहा होगा।  वह व्यवसायिक थे हमें इसका पता था पर हमारा यह स्वभाव है कि किसी के रोजगार पर नज़र नहीं डालते।  अब वह सब दूर हो गये हैं।  कई लोग तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर को होने का दावा भी करने लगे हैं पर उनका मन जानता है कि वह इस लेखक के मुकाबले कहां हैं? वह सम्मान बांट रहे हैं, आपस में एक दूसरे की प्रशंसा कर रहे हैं। कभी हमारे प्रशंसक थे अब उनको दूसरे मिल गये हैं। चल वही रहा है अंधा बांटे रेवड़ी चीन्ह चीन्ह कर दें।  दरअसल वह इंटरनेट पर हिन्दी फैलाने से अधिक अपना हित साधने में लगे हैं। यह बुरा नहीं है पर अपने दायित्व को पूरा करते समय अपना तथा पराया सभी का हित ध्यान में न रखना अव्यवसायिकता है। पैसा कमाते सभी है पर सभी व्यवसायी नहीं हो जाते। चोर, डाकू, ठग भी पैसा कमाते हैं।  दूसरी बात यह कि कहीं एक ही आदमी केले बेचने वाला है तो उसे व्यवसायिक कौशल की आवश्यकता नहीं होती। उसके केले बिक रहे हैं तो वह भले ही अपने व्यवसायिक कौशल का दावा करे पर ग्राहक जानता है कि वह केवल लाभ कमा रहा है।  अंतर्जाल पर हिन्दी का यही हाल है कि कथित रूप से अनेक पुरस्कार बंट जाते हैं पर देने वाला कौन है यह पता नहीं लगता।  आठ दस लोग हर साल आपस में ही पुरस्कार बांट लेते हैं।  हमें इनका मोह नहीं है पर अफसोस इस बात का है कि यह सब देखते हुए हम किसी दूसरे लेखक को यहां लिखने के लिये प्रोत्साहित नहीं कर पाते।  हमारे ब्लॉगों की पाठक संख्या चालीस लाख पार कर गयी है। यह सूचना हम देना चाहते हैं। इस पर बस इतना ही।  हिन्दी दिवस पर कोई दूसरा तो हमें पूछेगा नहंी इसलिये अपना स्म्मान स्वयं ही कर दिल बहला रहे हैं। 

 

 लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

 

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

 

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सूरज की रौशनी में-हिंदी व्यंग्य कविता


रोज पर्दे पर देखकर उनके चेहरे

मन उकता जाता है,

जब तक दूर थे आंखों से

तब तक उनकी ऊंची अदाओं का दिल में ख्वाब था,

दूर के ढोल की तरह उनका रुआब था,

अब देखकर उनकी बेढंगी चाल,

चरित्र पर काले धब्बे देखकर होता है मलाल,

अपने प्रचार की भूख से बेहाल

लोगों का असली रूप  बाहर आ ही जाता है।

कहें दीपक बापू

बाज़ार के सौदागर

हर जगह बैठा देते हैं अपने बुत

इंसानों की तरह जो चलते नज़र आते हैं,

चौराहों पर हर जगह लगी तस्वीर

सूरज की रौशनी में

रंग फीके हो ही जाते हैं,

मुख से बोलना है उनको रोज बोल,

नहीं कर सकते हर शब्द की तोल,

मालिक के इशारे पर उनको  कदम बढ़ाना है,

कभी झुकना तो कभी इतराना है,

इंसानों की आंखों में रोज चमकने की उनकी चाहत

जगा देती है आम इंसान के दिमाग की रौशनी

कभी कभी कोई हमाम में खड़े

वस्त्रहीन चेहरों पर नज़र डाल ही जाता है,

एक झूठ सौ बार बोलो

संभव है सच लगने लगे

मगर चेहरों की असलियत का राज

यूं ही नहीं छिप पाता है।

——————

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

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क्रिकेट में सिर पर सवार पैसा-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन


        इस समय इंग्लैंड में चैम्पियन ट्राफी क्रिकेट प्रतियोगिता चल रही है। इसमें बीसीसीआई की टीम जोरदार प्रदर्शन करते हुए आगे बढ़ती जा रही है। अनेक क्रिकेट विशेषज्ञ चकित हैं। बीसीसीआई के क्रिकेट खिलाड़ी जिस तरह तूफानी बल्लेबाजी कर रहे है तो दूसरी टीमों के खिलाड़ी धीमे धीमे चल रहे हैं उससे लगता है कि जैसे पिचें अलग अलग हैं। कभी कभी लगता है कि बल्ला या गेंदें भी अलग अलग हैं। मतलब यह कि भारतीय बल्लेबाज दूसरों के मुकाबले ज्यादा आक्रामक हैं। किसी के समझ में नहीं आ रहा है।

          हम समझाते हैं कि आखिर मामला क्या है? गुरुगोविंद सिंह ने कहा है कि पैसा बहुत जरूरी चीज है पर खाने के लिये दो रोटी चाहिये। मतलब यह कि जिंदगी में पैसा जरूरी है।  एक विद्वान कहते हैं कि पैसा कुछ हो या न हो पर जीवन में आत्मविश्वास का बहुत बड़ा स्तोत्र होता है।  जी हां, आईपीएल में बीसीसीआई की टीम के बल्लेबाजों ने जमकर पैसा कमाया है।  यह उनके आत्मविश्वास का ही  कारण बन गया है।  उनको मालुम है कि हमारे पास पैसा बहुत है और यह भाव उनको आक्रामक बना देता है। सीधी बात कहें कि पैसा सिर चढ़कर बोलता है।  हम यहां बीसीसीआई के खिलाडियों की आलोचना नहीं कर रहे बल्कि यह बता रहे हैं कि जिस तरह अन्य टीमों के खिलाड़ी बुझे मन से खेल रहे हैं उससे तो यही लगता है कि उनमें वैसा विश्वास नहीं है जैसा बीसीसीाआई की टीम में हैं। इसे कहते हैं कि पैसा सिर चढ़कर बोलता है।

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja ‘Bharatdeep’

Gwalior, Madhya Pradesh

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दरबारी बुत-हिन्दी कविता


एक दूसरे के तख्ते बजाते लोग
किसी ऊंचे तख्त पर होंगे विराजमान
फिर हथियारों के पहरे में
अपनी ढपली अपना राग बजायेंगे।
सस्ते तोहफे से बनाकर लोगों को बुत
कर लेंगे दुनियां अपनी मुट्ठी में
अपने ही दरबार में उनको सजायेंगे।
कहें दीपक बापू
ज़माने का भला करने वाले ठेकेदार
फैले हें चारों ओर
उनके दाव से कब तक खुद को बचायेंगे।

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

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किस पर भरोसा करें-हिंदी कविता


किस पर भरोसा करें
यहां हर कदम पर धोखा खाया,
हुकूमत पर क्या इल्जाम डालें
जनता के  हाथ पांव के साथ
दिमागी सोच को भी
पुरानी जंजीरों में बंधा पाया।
कहें दीपक बापू
हाथ में तख्तियां और मशाल
लेकर  बहुत लोग चले जुलूसों में
नारों से गूंजा बहुत बार आकाश
फिर भी ज़माना अंधकार से बाहर न आया,
शिकारी भीड़ में भेड़ों के साथ शामिल रहे
अकेले में भेड़िये बन गये
हालातों में बदलने की बात
सुनते सुनते पक गये कान
अच्छे समय की आस बनी रही
अलबत्ता ईमानदारी और यकीन को
हर दिन गर्त में जाते पाया।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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