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तब तक अधूरा है अभिव्यक्ति का सृजन-हिंदी शायरी


जो सरल और सहज हैं
जिन के दिल में हैं नेकनीयति
करते हैं वही रचना का सृजन
जिन पर खुद की ख्वाहिशों और
अरमानों को पूरा करने का बोझ है
समाज में तनाव का करते हैं वही विसर्जन

दूसरे के दर्द को अपने दिल की
आंखों से देखकर जो करते हैं विचार
सृजक वही बन पाते हैं
जो सतह पर तैरते हुए केवल
दिखाने के लिए बनते हैं हमदर्द
वह तो शब्द के सौदागर हैं
बेच लें बाजार में ढेर सारी रचनाएं
पर फिर भी सृजक नहीं कहलाते हैं
प्रसिद्धि और प्रशंसा के ढेर सारे शब्द
अपने खजाने में जमा करते लेते
पर सृजन की उपाधि का नहीं कर पाते अर्जन

कहने से कोई सृजक नहीं हो जाता
चंद शब्द लिखने से कोई सृजन नहीं हो पाता
आखों से पढ़कर
कानों से सुनकर
हाथों से स्पर्श कर
जब तक अपनी अनुभूतियों को
दिल में डुबोया न जाए
तब तक रस और श्रृंगार के बिना
अधूरा है अभिव्यक्ति का सृजन
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

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