Tag Archives: संपादकीय

खबरों का बाज़ार-हिन्दी व्यंग्य कविता


कुछ खबरें खुशी में झुलाती हैं,

कुछ खबरें जोर से रुलाती हैं।

कमबख्त!

किस पर देर तक गौर करें

अपनी खूंखार असलियतें भी

जल्दी से अपनी तरफ बुलाती हैं।

कहें दीपक बापू

खबरचियों का धंधा है

लोगों के जज़्बातों से खेलना,

कभी होठों में हंसी लाने की कोशिश होती

कभी शुरु होता आंखों में आंसु पेलना,

बिकने के लिये बाज़ार में बहुत सामान है,

ग्राहक खुश है खरीद कर शान में,

हमारे जज़्बातों से न कर पाये खिलवाड़ कोई

इसलिये फेर लेते हैं नज़रे

विज्ञापनों में दिखने वाली सुंदरियों से

खबर और बहस के बीच कंपनियों के

उत्पाद बिकवाने के लिये

अपने हाथ में झुलाती हैं।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””

Gwalior, madhyapradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  ‘Bharatdeep’,Gwalior

http://deepkraj.blogspot.com

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सुख का योग दु:ख से है-पतंजलि योग साहित्य


         पंचतत्वों से बनी इस देह में मन, बुद्धि और अहंकार प्रकृति स्वतः विराजती हैं। मनुष्य का मन तो अत्यंत चंचल माना जाता है। यही मन मनुष्य का स्वामी बन जाता है और जीवात्मा का ज्ञान नहीं होने देता। अध्यात्म के ज्ञान के अभाव में सांसरिक क्रियाओं के अनुकूल मनुष्य प्रसन्न होता है तो प्रतिकूल होने पर भारी तनाव में घिर जाता है। मकान नहीं है तो दुःख है और है उसके होने पर सुख होने के बावजूद उसके रखरखाव की चिंता भी होती है। धन अधिक है तो उसके लुटने का भय और कम है नहीं है या कम है, तो भी सांसरिक क्रियाओं को करने में परेशानी आती है मनुष्य सारा जीवन इन्हीं  अपनी कार्यकलापों के अंतद्वंद्वों में गुजार देता है। विरले ज्ञानी ही इस संसार में रहकर हर स्थिति में आनंद लेते हुए परमात्मा की इस संसार रचना को देखा करते हैं। अगर किसी वस्तु का सुख है तो उसके प्रति मन में राग है और यह उसके छिन जाने पर क्लेश पैदा होता है। कोई वस्तु नहीं है तो उसका दुःख इसलिये है कि वह दूसरे के पास है। यह द्वेष भाव है जिसे पहचानना सरल नहीं है। मृत्यु का भय तो समस्त प्राणियों को रहता है चाहे वह ज्ञानी ही क्यों न हो। मनुष्य का पक्षु पक्षियों में भी यह भय देखा जाता है।

पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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सुखानुशयी रागः।
‘‘सुख के अनुभव के पीछे रहने वाला क्लेश राग है।’’
‘‘दुःखानुशयी द्वेषः।
‘‘दुःख के अनुभव पीछे रहने वाला क्लेश द्वेष है।’’
स्वरसवाही विदुषोऽपि तथा रूडोऽभिनिवेशः।।
‘‘मनुष्य जाति में परंपरागत रूप से स्वाभाविक रूप से जो चला आ रहा है वह मृत्यु का क्लेश ज्ञानियों में भी देखा जाता है। उसे अभिनिवेश कहा जाता है।’’
ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः।
‘‘ये सभी सूक्ष्मावस्था से प्राप्त क्लेश चित्त को अपने कारण में विलीन करने के साधन से नष्ट करने योग्य हैं।’’
ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः।।
‘‘उन क्लेशों की वृत्तियां ध्यान से नष्ट करने योग्य हैं।’’

       इस तरह अंतद्वंद्वों में फंसी अपनी मनस्थिति से बचने का उपाय बस ध्यान ही है। ध्यान में जो शक्ति है उसका बहुत कम प्रचार होता है। योगासन, प्राणायाम और मंत्रजाप से लाभ होते हैं पर उनकी अनुभूति के लिये ध्यान का अभ्यास होना आवश्यक है। दरअसल योग साधना भी एक तरह का यज्ञ है। इससे कोई भौतिक अमृत प्रकट नहीं होता। इससे अन्तर्मन   में जो शुद्ध होती है उसकी अमृत की तरह अनुभूति केवल ध्यान से ही की जा सकती है। इसी ध्यान से ही ज्ञान के प्रति धारणा पुष्ट होती है। हमें जो सुख या दुःख प्राप्त होता है वह मन के सूक्ष्म में ही अनुभव होते हैं और उनका निष्पादन ध्यान से ही करना संभव है।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

हिंदी दिवस पर लेख-इस हिंदी ब्लॉग समूह ने २५ लाख पाठक/पाठ पठन संख्या पार की-सम्पादकीय


                  अंतर्जाल पर हिन्दी ब्लॉग लेखन एक तरह से थम गया है। इसका मुख्य कारण नयी पीढ़ी का फेसबुक की तरफ मुड़ जाना है। संवाद संप्रेक्षण की बृहद सीमा के बावजूद हिन्दी के ब्लॉग जगत में कोई ऐसी रचना पढ़ने को नहीं मिल रही जिससे याद रखा जा सके। समसामयिक विषयों पर भी वैसा ही पढ़ने को मिल रहा है जैसा कि परंपरागत प्रचार माध्यमों में-टीवी चैनल और पत्र पत्रिकाऐं-पढ़ने को मिल रहा है। दरअसल जब इस लेखक ने अपना लेखन ब्लॉग पर प्रारंभ किया था तब न तो सामने कोई लक्ष्य था न ही आशा। जिज्ञासावश प्रारंभ किये गये इस लेखन के दौरान समाज के पहले से ही मस्तिष्क में कल्पित रूप को सच में सामने देखा जिसे अपनी रचनाओं में भी व्यक्त किया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि अध्यात्मिक लेखन ने न केवल जीवन में परिपक्व बनाया बल्कि लक्ष्य की तरफ बढ़ने का संकल्प मजबूत करने के साथ ही अभिव्यक्ति को तीक्ष्ण बनाया। अब आंखें बंदकर कंप्यूटर पर उंगलियों से टंकण करते हैं तो देखने वाले लोग हैरान होकर पूछते हैं कि आखिर यह करते कैसे हो?
                प्रारंभ में इस हिन्दी ब्लॉग जगत में कुछ दोस्त बने थे। अंतर्जाल पर हिन्दी में ब्लॉग लेखन उस समय प्रारंभिक दौर में था। पहले लगा कि वह वास्तविक दुनियां हैं पर जल्द लगा कि यह केवल आभास भर था। मित्र एक था या दो या पांच, कहना कठिन है। यह संभव है कि एक मित्र हो और पांच रूप धरता हो। संभव है दो हों। एक बात तय रही कि कम से कम एक आदमी ऐसा है जो हम जैसा सोच रखता है। वह दो भी हो सकते हैं यह हम नहीं मानते। अद्वितीय हम हैं यह हम मानते हैं पर बुद्धिमान या अज्ञानी यह दूसरों के लिये विश्लेषण का विषय है। जीवन में लेखन प्रारंभ करते समय हमारे एक मित्र ने हमें बता दिया था कि तुम्हारा सोच अद्वितीय है और इसे अद्वितीय आदमी ही समझेगा। एक हमारे परिचित लेखक मित्र हैं वह भी ब्लॉग लेखन करते हैं और उनकी प्रवृत्तियां भी अद्वितीय श्रेणी की है। इसका मतलब यह कि कम से हम जैसे दो लोग हैं जो हमारी बात समझते हैं। अगर इस ब्लॉग लेख्न की बात की जाये तो हमारे लिये यही संतोष का विषय है कि हम जैसे विचार वाला एक आदमी तो यहां है।
              इधर हिन्दी दिवस आ रहा है। ब्लॉग लेखन अब हमारे लिये एकाकी यात्रा हो गयी है। हिन्दी लेखन में यह दुविधा है कि अगर आप अकेले होकर लिखते हैं तो प्रचार के प्रबंधन के अभाव में आपको कोई पूछता नहीं है और अगर प्रबंधन करने जाते हैं तो लिखने की धार खत्म हो ही जाती है। हिन्दी में ब्लॉग लेखन बेपरवाह होकर ही किया जा सकता है। शुरुआती दौर में हमें एक दो मित्र ऐसे मिले जिनसे यह अपेक्षा थी कि शायद वह लंबी लड़ाई के साथी हैं पर बाद में पता लगा कि वह प्रबंध कौशल दिखाते हुए हमें अपने साथियों की भीड़ में शािमल किये हुए थे। अब शायद भीड़ बढ़ गयी तो वह उनके अगुवा होकर प्रचार अभियान में इस तरह जुटे कि हमारा नाम तक उनको याद नहीं रहा है। हिन्दी लेखन की यह दूसरी दुविधा यह है कि वही लेखक बड़ा या महान कहलाता है जिसके चार छह लेखक शागिर्द हों। हम भी किसी के शागिर्द बन जाते पर चूंकि व्यवसायिक रूप से इसका कोई लाभ हमें मिलने की संभावना नहीं लगी तो बराबरी का व्यवहार करते रहे। अखबारों में कभी हमारा नाम ब्लॉगर के रूप में दर्ज नहीं हो्रता इसलिये हमारे पाठक कभी किसी समाचार पत्र या पत्रिका ब्लॉग से संबंधित सामग्री देखकर हमारा नाम न खोजें तो अच्छा ही है। उस दिन हमारे एक दोस्त ने हमसे पूछा कि ‘‘यार तुम अंतर्जाल पर हिन्दी भाषा में इतना सारा लिखते हो पर कोई सम्मान वगैरह की खबर नहीं आती।’’
          हमने उत्तर दिया कि-‘‘एक लेखक के रूप में तुम ही क्या सम्मान देते हो कि दूसरा देगा।’’
लिखते तो हम पहले भी थे पर मानना पड़ेगा कि अंतर्जाल पर लिखते हुए हम श्रद्धेय गणेश जी भगवान की ऐसी कृपा बरसती है कि एक बार लिखना प्रारंभ करते है तो फिर रुकते नही। रचना स्वतः प्रवाहित होकर आती है। कभी कभी पुराने ब्लॉग मित्रों की याद आती है पर लेखन व्यवसाय से जुड़े उन लोगों से यह आशा करना उनके साथ ज्यादती करना है कि वह हमारे साथ जुड़े रहें या कहीं हमारी चर्चा करें।
          फेसबुक पर नयी पीढ़ी सक्रिय है और ब्लॉग लेखन में उनकी रुचि नहीं है। फिर भी जो लोग ब्लॉग लिखना चाहते हैं वह मानकर चलें कि उनकी एकाकी यात्रा होगी। हिन्दी ब्लॉग लेखन में पूरी तरह से क्षेत्रीयता तथा जातीयता उसी तरह हावी है जिस तरह पुराने समय में थी। बड़े शहर या प्रतिष्ठित प्रदेश का निवासी होने का अहंकार यहां भी लेखकों में है। इस अहंकार की वजह से लिखने की बात हम नहीं जानते पर पढ़ना कई लोगों का बिगड़ गया। पहले उनको हमारी रचनाऐं दिखती थी पर अब हम उनके लिये लापता हो गये हैं। यह कोई शिकायत नहीं है। सच बात तो यह है कि इस एकाकीपन ने हमें बेपरवाह बना दिया है। हमारी पाठक संख्या लगातार बढ़ी है। साथ ही यह विश्वास भी बढ़ा है कि जब हम कोई गद्य रचना करेंगे तो लोग उसे पूरा पढ़े बिना छोड़ेंगे नहीं। इसका कारण यह कि श्रीमद्भागवत गीता के अध्ययन ने हमें ऐसा बना दिया है कि हमारी गद्य रचनाओं में आई सामग्री कही अन्यत्र मिल ही नहीं सकती। यह सब इसी अंतर्जाल पर श्रीगीता पर लिखते लिखते ही अनुभव हुआ है। फुरसत और समर्थन के अभाव में कभी कभी कुछ बेकार कवितायें लिखते हैं तो उनमें भी कुछ ऐसा होता है कि व्याकररण की दृष्टि से अक्षम होते हुए भी सामग्री अपने भाव के कारण लोकप्रिय हो जाती है।
         ग्वालियर एक छोटा शहर है तो मध्यप्रदेश एक ऐसा प्रदेश है जिसकी प्रतिभाओं को वहीं रहते स्वीकार नहीं किया जाता। बड़े शहर में जाकर बड़े हिन्दी व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में कथित बड़े विद्वानों की चरणसेवा किये बिना राष्ट्रीय पटल पर स्थापित होना कठिन है पर अंतर्जाल पर हमें पढ़ने वाले पाठक जानते होंगे रचनायें हमेशा ही व्यापक दायरों में सोचने वाले लोगों के हाथ से होती है। कथित हिन्दी लेखक साम सामयिक विषयों में लिखकर आत्ममुग्ध होते हैं पर आम पाठक के लिये वह कोई स्मरणीय रचना नहीं लिख पाते। हमारे ब्लॉग पर ऐसी कई रचनायें हैं जो लोग पढ़कर आंदोलित या उत्तेजित होने की बजाय चिंत्तन में गोते लगाते हैं। बहरहाल यह बकवास हमने इसलिये कि हमारे बीस ब्लॉग कुल पच्चीस लाख की पाठक/पाठ पठन संख्या पार कर कर गये हैं। इस पर हम अपने पाठक तथा टिप्पणीकर्ताओं के आभारी है जिनके प्रोत्साहन की वजह से यह सब हुआ। अब चूंकि ब्लाग लेखक मित्रों से संपर्क बंद है इसलिये उनको इस बात के लिये धन्यवाद देना व्यर्थ है क्योंकि उनको तो यह मालुम भी नहीं होगा कि हमने ब्लॉग लिखना बंद नहीं किया भले ही अखबार वगैरह में हमारा नाम नहीं देते। जय श्री राम, जय श्री कृष्ण!
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””

Gwalior, madhyapradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  ‘Bharatdeep’,Gwalior

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कसाब को फांसी के साथ दूसरे अभियुक्तों को भी दंड दें-हिंदी लेख


           मुंबई हमले में पकड़े गये एक अपराधी कसाब को फांसी की सजा सुप्रीम कोर्ट ने बहाल रखी है।  प्रचार माध्यमों में इसे प्रमुखता से इस तरह प्रचारित किया गया है जैसे कि इस कांड का असली अपराधी वह एक ही है।  एक बात तय है कि कसाब को मौत से कम सजा नहीं मिल सकती क्योंकि वह अपराध में प्रत्यक्ष  रूप् से शामिल है पर इसका एक दूसरा प़क्ष यह भी है कि वह इस अपराध मे एक अस्त्र शस्त्र के रूप में उपयोग लाया गया है।  जिन लोगों के हृदय में इस हमले को लेकर बहुत क्षोभ है उनके लिये कसाब को सजा देना एक मामूली बात है।  यह ऐसे ही जैसे कि किसी हत्या में प्रयुक्त चाकू, तलवार और पिस्तौल को जब्त कर लेना। जब्त हथियार किसी को फिर प्रयोग के लिये नहीं  देकर उसे नष्ट कर  दिया जाता।  कसाब की जिंदगी भी वापस नहीं होगी पर उसकी मौती की सजा किसी हथियार को नष्ट करने से अधिक नहीं है।
     एक प्राणहीन हथियार इंसान के निर्देश के अनुसार चलता है पर जिस इंसान की बुद्धि ही  हर ली जाये वह भी प्राणहीन हथियार की तरह अन्य व्यक्ति के इशारे पर  अपराध की राह पर चलता है। जिस तरह हम किसी हथियार को सजा न देकर उसे नष्ट करते हैं पर प्रयोग करने वाले इंसान को ही दंड देते हैं वैसे ही इस कांड कसाब को हथियार की तरह उपयोग करने वाले इंसानों का सजा दिये बिना इस कांड की सजा पूरी नहीं मानी जा सकती है।  जब किसी इंसान के हाथ के हथियार से किसी व्यक्ति की हत्या होती है तो हम यह नहीं कहते कि अमुक हथियार ने मारा है। तब उसका इस्तेमाल करने वाले इंसान को दंड देते हैं।  हथियार को नष्ट करते हैं यह अलग बात है।
       जब हम मुंबई के दर्दनाक हादसे को याद करते हैं तो कसाब प्रत्यक्ष रूप से दिखता है  पर उसे हथियार की तरह इस्तेमाल करने वाले लोग अभी भी पाकिस्तान में घूम रहे हैं।
        अस्त्र वह है जो आदमी अपने हाथ में पकड़कर कर इस्तेमाल करता है-जैसे तलवार, चाकू , गदा और त्रिशूल। उसी तरह शस्त्र वह है जो फैंककर उपयोग में लाया जाता है जैसे तीर, भाला या पत्थर।  तीरकमान और गोली अस्त्रों शस्त्रों का संयुक्त रूप है।  यहां कसाब शस्त्र का रूप है जिसे भारत में फैंका गया है कि ताकि निर्दोष  लोग मारे जायें।
      भारतीय प्रचार माध्यम हर छोटे बड़े विषय को अपने हल्के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बनाकर उस पर चर्चा करते हैं।  उसमें शामिल विद्वानों  के विचार भी अत्यंत हल्के होते हैं। कसाब एक युवक है जो गरीब परिवार का है पर लालच लोभ तथा क्रूरता के कारण वह इस अपराध में शामिल हुआ। जिन लोगों ने उसे इस अपराध में शामिल किया उन्होंने उसे तमाम तरह के प्रलोभन देकर जीवन की सुरक्षा वादा कर इसमें शामिल किया।  कसाब ने जिनको मारा उनसे उसकी प्रत्यक्ष शत्रुता नहीं थी।  वह तो भारत पर हमले के लिये दुश्मनों का हथियार बना। हम इस हथियार को समाप्त कर यह मान रहे हैं कि भारी जीत मिल गयी तो मुंबई अपराध से नाखुश लोगों को हैरानी होती है।
        जिन लोगों के दिमाग में 1971 के भारत पाक युद्ध की स्मृतियां हैं उन्हें स्मरण होगा कि अनेक जगह पाकिस्तानी सेना के हाथ से भारतीय सेना ने जो हथियार छीने थे उनकी प्रदर्शनी हुई थी। चूंकि भारत ने उस युद्ध में पाकिस्तान को परास्त किया था इसलिये रुचि के साथ यह हथियार देखे गये।  कसाब की मौत तो ऐसे युद्ध का हथियार दिखाना भर होगी जो अभी जीता नहीं गया है। कुछ लोगों ने कसाब नाम का यह शस्त्र फैंककर हमारे निर्दोष लोगों को मारा है हम उसे नष्ट कर जीत का जश्न नहीं मना सकते।  जब मुंबई के गुनाहगारों के पाकिस्तान में खुलेआम घूमते देखते हैं तो कसाब जैसे शस्त्र को नष्ट करना एक मामूली बात नज़र आती है।  हमारा मानना है कि कसाब को जल्द से जल्द सजा देने के साथ ही पाकिस्तान से असली गुनाहगारों लेने का प्रयास करना चाहिए।  कसाब के साथ कानूनी रूप से कोई रियायत नहीं होना चाहिए।  उसे खाने पीने मेंवह सब भी नहीं देना चाहिए जो वह मांगता है।  वह शस्त्र है पर मनुष्य भी है।  उसकी बुद्धि हर ली गयी और उसने ऐसा होने दिया यह भी उसका अपराध है इसलिये उसे मानसिक प्रताड़ना देना भी बुरा नहीं है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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माया में महामंडलेश्वर और हिन्दू धर्म-विशेष हिन्दी लेख


      जब धर्म केवल कर्मकांडों तक सिमटता है तब वहां ज्ञान की बात करना निरर्थक है। मूलतः धर्म का आधार अध्यात्म है पर अध्यात्मिक दर्शन और धर्म के बीच कोई स्पष्ट रेखा हमारे यहां खींची नहीं गयी है इसी कारण कर्मकांडों के विद्वान आमजन की संवेदनसओं का दोहन करने में सफल हो जाते हैं।  प्रसंग है एक कथित महिला को महामंडलेश्वर बनाने का जिसका चहुं ओर विरोध हुआ तो उसे वहां से निलंबित कर दिया गया।

उस महिला के अनेक दृश्य टीवी चैनलों पर दिखाई दिये। जिसमें नृत्य और भजन थे।  तत्वज्ञान की बात करते हुए तो उसे देखा ही नहीं गया।  वह महिला धर्म के व्यापार में ढेर सारी माया अपने चरणों में स्थापित कर चुकी है। उसका श्रृंगार देखकर कोई भी इस बात को नहीं मानेगा कि उसके पास अध्यात्मिक ज्ञन का ‘अ’ भी होगा। आरोप लगाने वालों ने  ने इस पदवी में धन के लेनदेन का आरोप भी लगाया है। सच क्या है पता नहीं पर हम यहां बात कर रहे हैं महामंडलेश्वर की उस उपाधि की जिसकी जानकारी अनेक लोगों के  लिये नयी नहीं है पर उसको प्रदाने करने की कोई प्रक्रिया है यह बात पहली बार इतने प्रचार के  साथ सामने आयी ।  आदि गुरु शंकराचार्य ने धर्म प्रचार के लिये चार मठ बनाये जिनके सर्वेसर्वा अब शंकराचार्य कहलाते हैं।  इनका भारतीय समाज में स्थान कितना है यह अलग से विचार का विषय हो सकता है पर भारतीय अध्यात्म की जो धारा सदियों से बह रही है उसके प्रवाह में इनका योगदान अधिक नहीं है यह  वर्तमान लोगों की जानकारी देखकर लगता है।  हिन्दू धर्म तथा भारतीय अध्यात्म के इतिहास तथा तत्वज्ञान का अध्ययन करने वाले हर शख्स का आदि शंकराचार्य का पता है पर वर्तमान शंकराचार्यों के प्रति उनके मन में मामूली श्रद्धा है जो कि हमारे देश की धरती पर उपजते सहज मानवीय  स्वभाव के ही कारण है।  वह यह कि सभी संतों का सम्मान करना चाहिए। न भी करें तो उनकी निंदा करने से बचना चाहिए।

एक बात तय है कि बिना तत्वज्ञान के भारतीय जनमानस में सम्मान प्राप्त नहीं कर सकता।  वैसे तो कई संत हैं जो नृत्य और भजन कर भक्तों को प्रसन्न करते हैं। ऐसे संत तत्वज्ञानियों से अधिक धनवान होते हैं। जिनकी ज्ञान में रुचि नहीं है वह भक्त भी सांसरिक विषयों से ऊबकर इन संतों के सानिध्य में भक्ति और मनोरंजन के मिश्रित सत्संग का आनंद उठाते हैं।  वह इनको दान, चंदे या गुरुदक्षिणा देकर भगवान को प्रसन्न हुआ मानते हैं। इस तरह बिताया गया समय  क्षणिक रूप से उनको लाभ द्रेता है पर जब अध्यात्मिक शांति की बात मन में आती है तो उनको अपना मन खाली दिखता है।

बहरहाल अब समय बदल गया है पर भारतीय अध्यात्मिक दर्शन सत्य पर आधारित है इसलिये उसके संदर्भ आज भी प्रासांगिक हैं।  नृत्य और गीत के सहारे भक्तों को सत्संग प्रदान करने वाली जिस महिला को विवादास्पद ढंग से महामंडलेश्वर बनाया गया उस पर बवाल उठा तब उसका नाम प्रचार में आया। अगर यह विवाद प्रचार माध्यमों में नहीं आता तो शायद अनेक  लोग यह समझ ही नहीं पाते कि महामंडलेश्वर होता क्या है? संभव है पैसे का लेनदेन हुआ हो। हमारे यह धार्मिक संगठनों में भी अब माया ने इस कदर अपनी पैठ बना ली है कि वहा उच्च पदों पर बैठे लोगों से सात्विक प्रवृत्ति की हमेशा आशा नहीं की जा सकती।  जिसने उपािध ली और जिन्होंने दी उन पर क्या आक्षेप किया जा सकता है? जब समाज ने क्रिकेट खिलाड़ियों में भगवान और फिल्मों अभिनेताओं में देवता होने की अवधाराणा को मान लिया है तब पेशेवर धार्मिक संगठनों या उनके पदाधिकारियों से-जिनको बिना किसी विद्यालय में गये ज्ञानी और धर्म का प्रतीक होने का प्रमाणपत्र मिला हुआ है-यह अपेक्षा करना व्यर्थ है कि वह अपनी उपाधियां उन नर्तकों और गायकों को न दें जो मनोरंजन को भक्ति के रूप में बदलने की कला में माहिर हों।

जहां तक तत्वज्ञान का प्रश्न है तो वेदों और शास्त्रों के जानकार होने का दावा करने वाले अनेक संत जब श्रीमद्भागवत गीता पर बोलते हैं तो यह देखकर आश्चर्य होता है कि वह उस ज्ञान से स्वयं ही दूर हैं।  ऐसी घटनाओं से अधिक आश्चर्य इसलिये भी नहीं करना चाहिए क्योंकि भारतीय समाज में ऐसे तत्व हमेशा ही मौजूद रहेंगे जो धर्म के नाम कर्मकांड और भक्ति के नाम पर मनोरंजन का व्यवसाय करते हैं।

लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 

poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

 

writer aur editor-Deepak ‘Bharatdeep’ Gwalior

निजी क्षेत्र में भी प्रबंध कौशल की समस्या रहेगी-हिन्दी लेख


            कलकत्ता के ए.एम.आर.आई अस्पताल (AMRi culcutta hospital) में करीब 90 लोगों की मौत हो चुकी है। अगर प्रचार माध्यमों के इससे जुड़े समाचारों पर यकीन किया जाये तो कुछ लोग अभी भी अपने परिजनों को ढूंढ रहे है जिस कारण यह संख्या अधिक भी हो सकती है। हम इस हादसे में हताहत लोगों के प्रति संवेदना जताते हैं। इस दुर्घटना के बाद अनेक विचार दिमाग में आये। जिस सवाल ने यह सबसे ज्यादा परेशान किया कि यह एक निजी अस्पताल है और इससे क्या यह साबित नहीं होता हम अब निजी क्षेत्र की क्षमताओं पर पर प्रश्न उठायें? अभी तक हम मानकर चलते हैं कि सरकारी और अर्द्धसरकारी क्षेत्रों में भ्रष्टाचार और कुप्रबंध है इस दुर्घटना के बाद अब निजी क्षेत्र के प्रबंधन पर भी सवाल उठेंगें।
             जिन महान बुद्धिमानों ने सरकारी क्षेत्र को एकदम निकम्मा मानकर निजी क्षेत्र की वकालत की थी उनकी राय पर तब भी आश्चर्य हुआ था और अब तो यह लगने लगा है कि निजी क्षेत्र भी उसी कुप्रबंध का शिकार हो रहा है जिसके लिये सरकारी क्षेत्र पर बदनाम माना जाता था। अर्थशास्त्री भारत में जिन समस्याओं को उसके विकास में संकट मानते हैं उसमें कुप्रबंध भी शामिल माना गया है। कुछ हद तक खेती में उसे माना गया है पर निजी क्षेत्र में इसे कभी नहीं देखा गया। दरअसल हम जैसे निष्पक्ष चिंतक और अल्पज्ञानी अर्थशास्त्री हमेशा ही यह मानते हैं कि प्रबंध कौशल के बारे में हमारा देश बहुत कमजोर रहा है। इसका कारण हमारी प्रवृत्ति और इच्छा शक्ति है। एक तरह से देखा जाये तो हमारे वणिक वर्ग का समाज-यह जाति सूचक शब्द नहंी है क्योंकि इसमें अनेक जातियों के सदस्य ऐसे भी हैं जिनके समाज के साथ वणिक सूचक संज्ञा नहीं जुड़ी होती जैसे सिंधी, पंजाबी, और गुजराती तथा अन्य स्थानीय समाज-कमाने के लिये योजना बनाता है पर प्रबंध कौशल में बहुत कम लोग सिद्धहस्त होते हैं। भाग्य, परिश्रम, बौद्धिक अथवा प्रतिद्वंद्वी के अभाव में अनेक लोग अपने व्यवसाय में महान सफलता प्राप्त करते है पर ऐसे विरले ही होते है जिनको विपरीत परिस्थतियों में केवल अपने प्रबंध कौशल से सफलता मिली हो। जब कुछ बुद्धिमान लोग सरकारी और अर्द्धसरकार क्षेत्रों में कुप्रबंध की बात करते हैं तो अपने अनुभव से सीखे हम जैसे लोग यह भी मानते हैं कि कम से कम हम भारतीयों का नजरिया अपने काम को लेकर कमाने का अवश्य होता है पर प्रबंध कौशल दिखाने की चिंता बिल्कुल नहीं होती। ऐसे बहुत कम लोग हैं जिनको प्रबंध कौशल में महारत है। उसके बाद कुछ लोग मध्यम प्रवृत्ति के होते है जो एक समय तक प्रबंध कौशल दिखाते हैं फिर आलसी हो जाते हैं। ऐसे में जब आर्थिक जगत में निजीकरण तेजी से हो रहा था तब बहुत कम लोगों ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि प्रबंध कौशल एक कला है और उसमें महारत हासिल करने वालों को प्राथमिकता दी जाये। मुख्य बात यह है कि निजी क्षेत्र पर इतना विश्वास कैसे किया जा सकता है कि उसे अस्पताल, वायुसेवा, बस सेवा तथा अन्य जीवनोपयेागी की सेवाओं का पूरी तरह से जिम्मा सौंपा जाना चाहिए?
ए.एम.आर.आई अस्पताल (AMRi culcutta hospital) में हुई दुर्घटना चूंकि अत्यंत दर्दनाक है इसलिये इस पर चर्चा हुई पर निजी अस्पतालों में अनेक लोग गलत इलाज से मर जाते हैं तब वह एक अचर्चित खबर बनकर रह जाती है। इतना ही नहीं हम उन अन्य सेवाओं को भी देख रहे हैं जहां निजी क्षेत्र प्रभावी होता जा रहा है। वहां आम आदमी ग्राहक नहीं बल्कि एक शौषक और मजबूर प्रयोक्ता बन जाता है। उसके पास निजी क्षेत्र की सेवा के उपयोग करने के अलावा कोई मार्ग नहीं रह जाता।
              अब प्रचार माध्यमों की बात कर लें। अगर यह हादसा किसी सरकारी अस्पताल में हुआ होता तो प्रचार माध्यम कोई सरकारी आदमी शिकार के रूप में फंसते देखना चाहते। सारे राज्य के अस्पतालों की दुर्दशा को लेकर प्रशासन को कोसा जाता। निजी अस्पताल को लेकर ऐसा कोई विवाद नहीं उठा। यह ठीक है कि पश्चिम बंगाल ने अस्पताल के प्रशासन ने अस्पताल प्रबंधकों के खिलाफ कार्यवाही की है पर अगर यह सरकारी अस्पताल होता तो वही अपनी सफाई देने में लगा होता। हम यह दुर्घटना निजी क्षेत्र में अकुशल प्रबंधन के एक ऐसे प्रतीक के रूप में इसलिये देख रहे हैं क्योंकि वह प्रचार माध्यमों में चर्चित हुई वरना सच यह है कि अब तो अनेक सेवाओं में निजी क्षेत्र आम आदमी को लाचार बना रहा है।
           हम यहां यह बात नहीं कह रहे कि निजी क्षेत्र का प्रवेश पूंजीगत रूप से दखल कम होना चाहिए। जनोपयोगी सेवाओं में निजी क्षेत्र का योगदान तब भी था जब सरकारी क्षेत्र शक्तिशाली था। निजी क्षेत्र ने अनेक ऐसी सुविधायें भी जुटाई हैं जिससे आम मध्यम वर्ग को सुविधा हो रही है पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि ऐसी सेवाओं से सरकारी प्रभाव को समाप्त होने की मांग मान ली जाये। हमारा मानना है कि हर क्षेत्र में सरकारी पूंजी को सक्रिय रहना चाहिए। किसी क्षेत्र में सरकारी प्रभाव इसलिये समाप्त नहीं होना चाहिए कि वहां अब निजी क्षेत्र काम कर रहा है।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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ए.एम.आर.आई अस्पताल कलकत्ता के हादसे से सबक-हिन्दी लेख( lesson of terssdy of AMRi culcutta hospital-hindi article)

विदेशी खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश का व्यापार-हिन्दी लेख (khudara vyapar mein videsh nivesh, forein investment fdi in bhartiya market-hindi article or lekh)


        खेरिज किराना व्यापार में विदेशी निवेश लाने के फैसले पर देश में बवाल बचा है और इस पर बहस हो रही है। एक आम लेखक और नागरिक के रूप में हमें इस फैसले के विरोध या समर्थन करने की शक्ति नहीं रखते हैं क्योंकि इस निर्णय तो शिखर पुरुषों को करना होता है। साथ ही चूंकि प्रचार माध्यमों में चर्चा करने में हम समर्थ नहीं है इसलिये अपने ब्लाग पर इसका आम नागरिकों की दृष्टि से विश्लेषण कर रहे हैं। हमने देखा कि आम जनमानस में इस निर्णय की कोई अधिक प्रतिक्रिया नहीं है। इसका कारण यह है कि आम जनमानस समझ नहीं पा रहा है कि आखिर मामला क्या है?
        अगर भारतीय बुद्धिजीवियों की बात की जाये तो उनका अध्ययन भले ही व्यापक होता है जिसके आधार वह तर्क गढ़ लेते हैं पर उनका चिंत्तन अत्यंत सीमित हैं इसलिये अधिक गहन जानकारी उनसे नहीं मिल पाती और उनके तक भी सतही होते हैं। यही अब भी हो रहा है। अगर खेरिज किराने के व्यापार में विदेशी निवेश की बात की जाये तो उस पर बहस अलग होनी चाहिए। अगर मसला संगठित किराना व्यापार ( मॉल या संयुक्त बाज़ार) का है तो वह भी बहस का विषय हो सकता है। जहां तक खेरिज किराना व्यापार में विदेशी निवेश का जो नया फैसला है उसे लेकर अधिक चिंतित होने वाली क्या बात है, यह अभी तक समझ में नहीं आया। दरअसल यह निर्णय हमारी उदारीकरण की उस नीति का इस पर सारे राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक संगठन चल रहे हैं। अगर हम यह मानते हैं कि केवल वाल मार्ट के आने से इस देश के छोटे किराने व्यापारी और किसान तबाह हो जायेंगे तो यह एक भारी भ्रम होगा क्योंकि हम जिन नीतियों पर समाज को चलता देख रहे हैं वह उससे अधिक खतरनाक हैं। यह खतरा लगातार हमारे साथ पहले से ही चल रहा है जिसमें छोटे मध्यम व्यवसाय अपनी महत्ता खोते जा रहे हैं।
           हमें याद है कि इससे पहले भी बड़ी कंपनियों के किराना के खेरिज व्यापार में उतरने का विरोध हुआ पर अंततः क्या हुआ? बड़े शहरों में बड़े मॉल खुल गये हैं। हमने अनेक मॉल स्वयं देखे हैं और यकीनन उन्होंने अनेक छोटे व्यवसायियों के ग्राहक-प्रगतिवादियों और जनवादियों के दृष्टि से कहें तो हक- छीने हैं। हम जब छोटे थे तो मेलों में बच्चों को खिलाने के लिये विभिन्न प्रकार के झूले लगते थे। कभी कभार मोहल्ले में भी लोग ले आते थे। आज मॉल में बच्चों के आधुनिक खेल हैं और तय बात है कि उन्होंने कहीं न कहीं गरीब लोगों की रोजी छीनी है। हम यहां यह भी उल्लेख करना चाहेंगे कि तब और बच्चों के रहन सहन और पहनावे में भी अंतर था। हम अगर उन्हीं झूलों के लायक थे पर आज के बच्चे अधिक धन की फसल में पैदा हुए हैं। तब समाज में माता पिता के बच्चों को स्वयं घुमाने फिराने का फैशन आज की तरह नहीं  था। यह काम हम स्वयं ही कर लेते थे। एक तरह से साफ बात कहें तो तब और अब का समाज बदला हुआ है। यह समाज उदारीकरण की वजह से बदला या उसके बदलते हुए रूप के आभास से नीतियां पहले ही बन गयी। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि उदारीकरण में पूंजीपतियों का पेट भरने के लिये समाज का बौद्धिक वर्ग पहले ही लगा हुआ था।
                 अब खुदरा किराना व्यापार की बात कर लें। धन्य है वह लोग जो आज भी खुदरा किराना व्यापार कर रहे हैं क्योंकि जिस तरह अब नौकरियों के प्रति समाज का रुझान बढ़ा है उसमें नयी पीढ़ी के बहुत कम लोग इसे करना चाहते हैं।
          हम यहां शहरी किराना व्यापार की बात कर रहे हैं क्योंकि मॉल और संयुक्त व्यापार केंद्र शहरों में ही हैं। पहली बात तो यह है कि जो पुराने स्थापित किराने व्यापारी हैं उनकी नयी पीढ़ी यह काम करे तो उस पर हमें कुछ नहीं कहना पर आजकल जिसे देखो वही किराना व्यापार कर रहा है। देखा जाये तो किराना व्यापारी अधिक हैं और ग्राहक कम! हमारे एक मित्र ने आज से पंद्रह साल पहले महंगाई का करण इन खुदरा व्यापारियों की अधिक संख्या को बताया था। उसने कहा था कि यह सारे व्यापारी खाने पीने की चीजें खरीद लेते हैं। फिर वह सड़ जाती हैं तो अनेक दुकानें बंद हो जाती हैं या वह फैंक देते हैं। इनकी वजह से अनेक चीजों की मांग बढ़ी नज़र आती है पर होती नहीं है मगर उनके दाम बढ़ जाते हैं। उसका मानना था कि इस तरह अनेक कंपनियां कमा रही हैं पर छोटे दुकानदार अपनी पूंजी बरबाद कर बंद हो जाते हैं। इसका अन्वेषण हमने नहीं किया पर जब हम अनेक दुकानदारों के यहां वस्तुओं की मात्रा देखते हैं तो यह बात साफ लगता है कि कंपनियों का सामान अधिक होगा ग्राहक कम!
          हमारे देश में बेरोजगारी अधिक है। एक समय तो यह कहा जाने लगा था कि कि जो भी अपने घर से रूठता है वही किराने की दुकान खोल लेता है। इधर मॉल खुल गये हैं। ईमानदारी की बात करें तो हमें मॉल से खरीदना अब भी महंगा लगता है। एक बात यह भी मान लीजिये कि मॉल से खरीदने वाले लोगो की संख्या अब भी कम है। हमारे मार्ग में ही एक कंपनी का खेरिज भंडार पड़ता है जहां सब्जियां मिलती हैं पर वहां से कभी खरीदी नहीं क्योंकि ठेले वाले के मुकाबले वहां ताजी और सस्ती सब्जी मिलेगी इसमें संशय होता है। हमारे शहर में कम से कम दो कंपनियों के खेरिज भंडार खुले और बंद भी हो गये यह हमने देखा।
          भारतीय अर्थव्यवस्था के अंतद्वंद्वों और उनके संचालन की नीतियों की कमियों पर हम लिखने बैठें तो बहुत सारी सामग्री है पर उसे यहां लिखना प्रासंगिक है। हम इन नीतियों को जब देश के लाभ या हानि से जोड़कर देखते हैं तो लगता है कि यह चर्चा का विषय नहीं है। इस देश में दो देश सामने ही दिख रहे हैं-एक इंडिया दूसरा भारत! कभी कभी तो ऐसा लगता है कि हम एक भारतीय होकर इंडियन मामले में दखल दे रहे हैं। कुछ लोगों को यह मजाक लगे पर वह मॉल और मार्केट में खड़े होकर चिंत्तन करें तो यह बात साफ दिखाई देगी। वॉल मार्ट एक विदेशी कंपनी है उससे क्या डरें, देशी कंपनियों ने भला कौन छोड़ा है? सीधी बात कहें तो नवीन नीति से देश के किसानों या खुदरा व्यापारियों के बर्बाद होने की आशंका अपनी समझ से परे है। हम मान लें कि वह कंपनी लूटने आ रही है तो उसका मुकाबला यहां मौजूद देशी कंपनियों से ही होगा। मॉल के ग्राहक ही वॉल मार्ट में जायेंगे जो कि देशी कंपनियों के लिये चुनौती है। बड़े शहरों का हमें पता नहीं पर छोटे शहरों में हमने देखा है कि कम से पचास ग्राम चाय खरीदने कोई मॉल नहीं जाता। देश में रोज कमाकर खाने वाल गरीब बहुत हैं और उनका सहारा खुदारा व्यापारी हैं। गरीब रहेगा तो खुदरा व्यापारी भी रहेगा। वॉल मार्ट या गरीबी मिटाने नहीं आ रही भले ही ऐसा दावा किया जा रहा है।
            अपने पास अधिक लिखने की गुंजायश नहीं है क्योंकि पढ़ने वाले सीमित हैं। इतना जरूर कह सकते हैं कि यह बड़े लोगों का आपसी द्वंद्व है जो अंततः आमजन के हित का नारा लगाते हुए लड़ते हैं। आज के आधुनिक युग में शक्तिशाली प्रचारतंत्र के कारण आमजन भी इतना तो जान गया है कि उसके हित का नारा लगाना इन शक्तिशाली आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा धार्मिक समूहों के शिखर पुरुषों की मजबूरी है। इसलिये उनके आपसी द्वंद्वों को रुचि से देखता है।
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कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

महात्मा गांधी का दर्शन भी निरापद नहीं-गांधी जयंती पर विशेष हिन्दी लेख (mahatma gandhi ka darshan aur bharat-special article on gandhi jaynati)


         दो अक्टोबर देश में गांधी जयंती मनाई जायेगी। प्रसंगवश इस दिन भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री का भी जन्म दिन मनाया जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इतिहास में किसी भी महापुरुष का नाम बिना किसी योग्यता, कठिन परिश्रम या त्याग के दर्ज नहीं होता पर यह भी सत्य है कि एतिहासिक पुरुषों के व्यक्तित्व और कृतित्व का मूल्यांकन समय समय पर अनेक लोग अपने ढंग से करते हैं। एतिहासिक पुरुषों के परमधाम गमन के तत्काल बाद सहानुभूति के चलते जहां उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का मूल्यांकन करने वाले अत्यंत सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनाते हैं। उस समय कोई प्रतिकूल टिप्पणियां नहीं करता पर समय के साथ ही एतिहासिक पुरुषों के व्यक्तित्व का प्रभाव क्षीण होने लगता है तब विचारवान लोग प्रतिकूल टिप्पणियां भले न करें पर कुछ प्रश्न उठाने ही लगते हैं।
          गांधीजी के दर्शन  पर भी अनेक सवाल उठते हैं तो श्रीलाल बहादुर शास्त्री के बारे में भी यह पूछा जाता है कि पाकिस्तान से युद्ध जीतने के बाद भी उन्होंने मास्को जाकर सोवियत संघ की मध्यस्थता स्वीकार कर हारने जैसा काम क्यों किया? बहुत समय तक यह सवाल किसी ने नहीं पूछा था पर जब कारगिल युद्ध के बंद होने के बाद यह बात उठी थी तब शास्त्री जी की भूमिका सामने आयी थी भले ही उस समय सीधे किसी ने उनका नाम लेकर आक्षेप नहीं किया गया। फिर यह सवाल चर्चा में अधिक नहीं आया पर विचारवान लोगों के लिये इतना ही बहुत था। पाकिस्तान को परास्त करने के बाद विजेता भारत के प्रधानमंत्री का इस तरह मास्को जाकर पाकिस्तान के हुक्मरानों से समझौता करना वाकई देश के लिये कोई सम्मान की बात नहीं थी-यह बात आज अनेक लोग मानते हैं। इस समझौते में पाकिस्तान की जमीन बिना कुछ लिये दिये वापस कर दी गयी थी।
            गांधीजी को विश्व में महान सम्मान प्राप्त हुआ है पर भारतीय जनमानस में अब उनकी छवि क्षीण हो रही है फिर अब फिल्म, क्रिकेट और अन्य प्रतिष्ठित क्षेत्रों में सक्रिय नये नये महापुरुषों का भी प्रचार हो रहा है। सरकारी और गैर सरकारी तौर पर गांधी जयंती के समय खूब प्रचार होने के साथ ही अनेक कार्यक्रम भी होते हैं पर लगता नहीं कि आज के कठिन समय का सामना कर रहा भारतीय जनमानस उसमें बढ़चढ़कर हिस्सा लेता हो। गांधीजी को राजनीतक संत कहना उनके दर्शन को सीमित दायरे में रखना है। मूलतः गांधी जी एक सात्विक प्रवृत्ति के धार्मिक विचार वाले व्यक्ति थे। निच्छल हªदय और सहज स्वभाव की वजह से उनमें उच्च जीवन चरित्र निर्माण हुआ। एक बात तय है कि उन्होंने भारत को अंग्रेजों से आजाद कराने का जब अभियान प्रारंभ किया होगा तब उनका लक्ष्य आत्मप्रचार पाना नहीं बल्कि देश के आम इंसान का उद्धार करना रहा होगा। अलबत्ता अपने आंदोलन के दौरान उन्होंने इस बात को अनुभव किया होगा कि उनके सभी सहयोग उनकी तरह निष्काम नहीं है। इसके बावजूद वह इस बात को लेकर आशावदी रहे होंगे कि समय के अनुसार बदलाव होगा और अपने ही देश के भले लोग राज्य अच्छी तरह चलायेंगे। कालांतर में जो हुआ वह हम सब जानते हैं। उनके सपनों का भारत कभी न बना न बनने की आशा है। स्थिति यह है कि अनेक अनुयायी अब दूसरे स्वाधीनता आंदोलन का बात करने लगे हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि गांधी जी का सपना पूरा नहीं हुआ और जिस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये उन्होंने स्वाधीनता आंदोलन प्रारंभ किया वह पूरा नहीं हुआ। दूसरे शब्दों में 15 अगस्त 1947 को मिली आजादी केवल एक ऐसा प्रतीक है जिसकी स्मृतियां केवल उस दिन मनाये जाये वाले कार्यक्रमों में ही मिलती है। जमीन पर अभी गांधीजी के सपनों का पूरा होना बाकी है।
        यहां हम गांधीजी के व्यक्तित्व और कृतित्व की आलोचना नहीं कर रहे क्योंकि हम जैसा मामूली शख्स भला उन पर क्या लिख सकता है? अलबत्ता देश के हालात देखकर वैचारिक रूप से गांधी दर्शन अब निरापद नहीं माना जा सकता है। सबसे पहला सवाल तो यह है कि भारत का स्वाधीनता आंदोलन अंततः एक राजनीतिक प्रयास था जिसमें राजकाज भारतीयों के हाथ में होने का लक्ष्य तय किया गया था। दूसरी बात यह कि गांधीजी ने अंग्रेज सरकार के विरुद्ध आंदोलन किया था जिस पर भारतीयों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करने का आरोप था। इसके अलावा देश की समस्याओं के प्रति अंग्रेज सरकार की प्रतिबद्धता पर भी संदेह जताया गया था। इसका अर्थ सीधा है कि गांधीजी एक ऐसी सरकार चाहते थे जो देश के लोगों की होने के साथ ही जनहित का काम करे। ऐसे में राजकाज के पदों पर बैठने वाले महत्वपूर्ण लोगों की गतिविधियां महत्वपूर्ण होती हैं। तब गांधी जी ने राजकाज प्रत्यक्ष रूप से चलाने के लिये कोई पद लेने से इंकार क्यों किया? क्या वह इन पदों को भोग का विषय समझते थे या दायित्व निभाने के लिये अपने अंदर क्षमता का अभाव अनुभव करते थे। अगर यह दोनों बातें नहीं थी तो क्या उनको भरोसा था कि जो लोग राजकाज देखेंगे वह उनके रहते हुए अच्छा काम ही करेंगे? क्या उनको यकीन था कि जिन लोगों को वह राजकाज का जिम्म सौंपेंगे वह अच्छा ही काम करेंगे?
यकीनन सरकार का सैद्धांतिक रूप उनके सपनों में रहा हो पर व्यवहारिक  रूप से उनको इसका कोई अनुभव नहीं था। वह राजनीतिक के सैद्धांतिक पक्ष और व्यवहारिक स्थिति के अंतर को नहीं जानते थे। उन्होंने एक ऐसा राजनीतिक अभियान शुरु किया जो कालांतर में सीमित लक्ष्य प्राप्त कर समाप्त हो गया। आज उसी प्राप्त लक्ष्य को भी चुनौती मिल रही है। गांधी जी के अनुयायी और आज के महानायक अन्ना हजारे मानते हैं कि आज का शासन भी अंग्रेजों जैसा ही है। श्री अन्ना हजारे स्वयं भी कोई पद नहीं लेना चाहते पर देश के स्वच्छ और विकसित होने की का जिम्मा सरकार का ही मानते हैं। तब ऐसा लगता है कि एक राजनीति शास्त्र का ज्ञान न रखने वाला व्यक्ति भी राजनीति कर सकता है या राजकाज कोई पद संभाल सकता है। हमारा तो मानना है कि अंग्रेजों के विरुद्ध गांधीजी के आंदोलन के बारे में अब इतिहास पढ़ने की आवश्यकता ही नहीं अन्ना जी का आंदोलन बता रहा है कि उस समय क्या क्या हुआ होगा?
        28 अगस्त को अन्ना साहिब का जनलोकपाल विधेयक लाने संबंधी आंदोलन समाप्त हुआ। हासिल कुछ नहीं हुआ पर उन्होंने कहा कि हमें आधी जीत मिली है। तब हम जैसे लोग सड़कों पर घूमते हुए उस आधी जीत को ढूंढते हुए सोच रहे थे कि 16 अगस्त को भी कोई हम जैसा शख्स रहा होगा जो उस आजादी को ढूंढ रहा होगा जिसका दावा उस समय किया जा रहा था। बहरहाल गांधीजी के आंदोलन के पीछे उस समय के धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक, तथा आर्थिक शिखरों पर बैठे लोग रहे होंगे जो अपने हित साधन के लिये ही ऐसी आजादी चाहते होंगे ताकि वह देश के आम इंसान को गुलाम बनाये रख सके। पता नहीं गांधीजी यह देख पाये या नहीं पर इतना तय है कि वह जैसा भारत चाहते थे वैसा बन नहीं पाया। आखिरी बात यह है कि गांधीजी सात्विक प्रवृत्ति के थे और उनका आंदोलन राजस वृत्ति का था। बात अगर राजनीति की है तो उसमे सात्विक प्रवृत्ति की आशा करना व्यर्थ है। यह राजसी वृत्ति वाले लोगों का काम है। राजसी वृत्ति बुरी नहीं है बशर्त व्यक्ति अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिये उचित ढंग से कार्य करे। मुश्किल यह है कि तामसी वृत्ति वाले लोग अब राजकाज करने लगे हैं। भारत में दूसरी भी समस्या है। राजसी लोगों को स्वार्थी जानकर लोग हªदय से सम्मान नहीं करते जबकि सामूहिक नेतृत्व करना उन्हीं के बूते का होता है। सात्विक लोगों को समाज सम्मान देता है पर वह निष्काम होने के कारण राजकाज का काम नहीं करते। यही कारण है कि राजसी वृत्ति के लोग सात्विक लोगों को ढाल बनाकर आगे चलते हैं ताकि समाज उनका नेतृत्व और शासन स्वीकार करे। इसी कारण पूरे विश्व के राष्ट्राध्यक्ष अपने संपर्क धार्मिक नेताओं  से रखते हैं। गांधी को हमने देखा नहीं और अन्ना से कभी मिले नहीं पर प्रचार माध्यमों में देखकर हमने अनुभव किया वह लिख दिया। इस अवसर पर महात्मा गांधी जी और शास्त्री जी को हमारी हार्दिक श्रद्धांजलि!
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
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अन्ना हजारे (अण्णा हजारे) और बाबा रामदेव के आंदोलन और टीवी चैनलों के विज्ञापन (movement of anna hazare and baba ramdev and TV edvertisement-hindi lekh)


        अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आंदोलनों पर टीवी समाचार चैनलों और समाचार पत्रों में इतना प्रचार होता है कि अन्य विषय दबकर रह जाते हैं। एक दो दिन तक तो ठीक है पर दूसरे दिन बोरियत होने लगती है। इसमें     कोई संदेह नहीं है कि जब जब इस तरह के आंदोलन चरम पर आते हैं तब लोगों का ध्यान इस तरफ आकृष्ट होता है। अब यह कहना कठिन है कि प्रचार माध्यमों के प्रचार की वजह से भीड़ आकृष्ट होती है या उसकी वजह से प्रचार कर्मी स्वतः स्फूर्त होकर आंदोलन के समाचार देते हैं। एक बात तय है कि आम      ज जनमानस  पर उस समय गहरा प्रभाव होता है। यही कारण है कि इस दौरान समाचार चैनल ढेर सारे ब्रेक लेकर विज्ञापन भी चलाते हैं। हालांकि समाचार चैनलों के विज्ञापनों के दौरान लोग अपने रिमोट भी घुमाकर विभिन्न जगह समाचार देखते रहते हैं। इन समाचारों का प्रसारण इतना महत्वपूर्ण हो जाता है कि टीवी समाचार चैनल क्रिकेट और फिल्म की चर्चा भूल जाते हैं जिसकी विषय सामग्री उनके लिये मुफ्त में आती है। वैसे इन आंदोलनों के दौरान भी उनका कोई खर्च नहीं आता क्योंकि वेतन भोगी संवाददाता और कैमरामेन इसके लिये राजधानी दिल्ली में मुख्यालय पर नियुक्त होते हैं।
           इन आंदोलनों के प्रसारण को इतनी लोकप्रियता क्यों मिलती है? सीधा जवाब है कि इस दौरान इतनी नाटकीयतापूर्ण उतार चढ़ाव आते हैं कि फिल्म और टीवी चैनलों की कल्पित कहानियों का प्रभाव फीका पड़ जाता है। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि पूर्ण दिवसीय कोई फिल्म देख रहे हैं। अन्ना हजारे की गिरफ्तारी के बाद समाचारों में इतनी तेजी से उतार चढ़ाव आया कि ऐसा लगता था कि जैसे कोई मैच चल रहा हो। स्थिति यह थी िएक मोड़ पर विचार कर ही रहे थे कि दूसरा आ गया। फिर तीसरा और फिर चौथा! अब सोच अपनी राय क्या खाक बनायें!
          बाबा रामदेव के समय भी यही हुआ। घोषणा हो गयी कि समझौता हो गया! हो गया जी! मगर यह क्या? जैसे किसी फिल्म के खत्म होने का अंदेशा होता है पर पता लगता है कि तभी एक ऐसा मोड़ आ जिसकी कल्पना नहीं की थी। कहने का अभिप्राय यह है कि इस नाटकीयता के चलते ऐसे आंदोलन प्रचार माध्यमों के लिये मुफ्त में सामग्री जुटाने का माध्यम वैसे ही बनते हैं जैसे क्रिकेट और फिल्में। हमने आज एक आदमी को यह कहते हुए सुना कि ‘इस समय लोग शीला की जवानी और बदनाम मुन्नी को भूल गये हैं और अन्ना का मामला गरम है।’ ऐसे में हमारे अंदर यह ख्याल आया कि फिल्म और क्रिकेट वाले जिस तरह मौसम का अनुमान कर अपने प्रदर्शन की तारीख तय करते हैं उसी तरह उनको अखबार पढ़कर यह भी पता करना चाहिए कि देश में कोई इस तरह का आंदोलन तो नहीं चल रहा क्योंकि उस समय जनमानस पूरी तरह उनकी तरफ आकृष्ट होता है।
         हमने पिछले दो दिनों से इंटरनेट को देखा। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव शब्दों से खोज बहुत हो रही है। यह तब स्थिति है जब टीवी चैनल हर पल की खबर दे रहे हैं अगर वह कहीं प्रतिदिन की तरह फिल्म और क्रिकेट में लगे रहें तो शायद यह खोज अधिक बढ़ जाये क्योंकि तब लोग इंटरनेट की तरफ ताजा जानकारी के लिये भागेंगे। हमने यह भी देखा है कि इन शब्दों की खोज पर ताजा समाचार लेख लगातार आ रहे थे। अगर समाचार चैनल ढील करते तो शायद इंटरनेट पर खोज ज्यादा हो जाती।
        अब खबरों की तेजी देखिये। पहले खबर आयी कि अन्ना हजारे कारावास से बाहर आ रहे हैं। अभी हैरानी से उभरे न थे कि खबर आयी कि उन्होंने बिना शर्त आने से इंकार कर दिया है। खबर आयी कि अन्ना साहेब की तबियत खराब है। मन में उनके लिये सहानुभूति जागी और यह भी विचार आया पता नहीं क्या होगा? पांच दो मिनट में पता लगा कि वह ठीक हैं।
        ऐसी नाटकीयता भले ही आम आदमी को व्यस्त रखती हो पर गंभीर लोगों के लिये ऐसे आंदोलन मनोरंजन की विषय नहीं होते। कभी कभी तो यह लगता है कि मूल विषय चर्चा से गायब हो गया है। खबरांे की नाटकीयता का यह हाल है कि अब बहस केवल अन्ना साहेब के अनशन स्थल और समय के आसपास सिमट गयी । जबकि मूल विषय देश के भ्रष्टाचार का निरोध पर चर्चा होना चाहिए था । इस पर अनेक लोगों का अपना अपना सोच है। अन्ना साहेब का अपना सोच है। ऐसे में निष्कर्ष निकालने के लिये सार्थक बहस होना चाहिए। देश में बढ़ता भ्रष्टाचार कोई एक दिन में नहीं आया न जाने वाला है। जब हम जैसे आम लेखक लिखते हैं तो वह इधर या उधर होने के दबाव से मुक्त होते हैं इसलिये कहीं न कहीं प्रचार के साथ ही प्रायोजन की धारा में सक्रिय बुद्धिजीवियों से अलग ही बात लिखते हैं पर संगठित समूहों के आगे वह अधिक नहीं चलती। स्थिति यह थी कि भ्रष्टाचार निरोध से अधिक अनशन स्थल पर ही बहस टिक गयी। हमारा तो सीधा मानना है कि आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक संगठनों पर धनपति स्वयं या उनके अनुचर बैठ गये हैं। पूरे विश्व में प्रचार और समाज प्रबंधक उनके सम्राज्य के विस्तार तथा सुरक्षा के लिये आम जानमानस को व्यस्त रखते हैं। इससे जहां धनपतियों को आय होती है तो समाज के एकजुट होकर विद्रोह की संभावना नहीं रहती। हम अगर किसी देशी की वास्तविक स्थिति पर चिंतन करें तो यह बात करें तभी बात समझ में आयेगी। हमें तो इंटरनेट पर एक प्रकाशित एक लेख में यह बात पढ़कर हैरानी हुई थी कि अन्ना हजारे की गिरफ्तारी पर दुबई और मुंबई में भारी सट्टा लगा था। जहां भी सट्टे की बात आती है हमारे दिमाग में बैठा फिक्सिंग फिक्सिंग की कीड़ा कुलबुलाने लगता है। अभी तक क्रिकेट और अन्य खेलों के परिणामों पर सट्टेबाजों के प्रभाव से फिक्सिंग की बात सामने आती थी जिससे उनसे विरक्ति आ गयी पर जब ऐसी खबरें आयी तो यकीन नहीं हुआ। अन्ना साहेब भले हैं इसलिये उनके आंदोलन पर आक्षेप तो उनके विरोधी भी नहीं कर रहे पर इस दौरान हो रही नाटकीयता विज्ञापन प्रसारण के लिये बढ़िया सामग्री बन जाती है।

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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

त्रावनकोर (त्रावणकोर) के स्वामी पद्मनाभ मंदिर का खजाना और भारत का आम आदमी-हिन्दी लेख (travancor ke swami padmanabh mandir ka khazana aur bharat ka aam aadmi-hindi lekh)


           केरल ट्रावनकोर में स्वामी पद्मनाभ मंदिर में खजाना मिलने की घटना इस विश्व का आठवां आश्चर्य मानना चाहिए। आमतौर से भारत में गढ़े खजाने होने की बात अक्सर कही जाती है। अनेक सिद्ध तो इसलिये ही माने जाते हैं कि वह गढ़े खजाने का पता बताते हैं। यह अलग बात है कि वह अपने चेलों से पैसा ऐंठकर गायब हो जाते हैं। इससे एक बात तो सिद्ध होती है कि धर्म और भगवान अंध श्रद्धा रखने वालों को गढ़े खजाने में बहुत दिलचस्पी होती है और ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है।
            ट्रावणकोर का खजाना पांच लाख करोड़ से ऊपर पहुंच जायेगा ऐसा कुछ आशावादी कह रहे हैं तो कुछ विचारक लोग इस बात से चिंतित हैं कि कहीं यह खजाना भी लुट न जाये। प्रचार माध्यमों में भले ही इस खबर की चर्चा हो रही है पर आम जनमानस की उदासीनता भी कम आश्चर्य का विषय नहीं है। मिल गया तो और लुट गया तो इसमें उनको अपना कोई हित या अहित नहीं दिखता। इससे एक बात निश्चित लग रही है कि देश के समाज, अर्थ और धर्म के शिखर पर बैठे लोग की तरह उनमें दिलचस्पी रखने का आदी बौद्धिक वर्ग के लोग भी आमजन के चिंताओं से दूर हो गया है। उसे पता ही नहीं कि जनमानस के मन में क्या चल रहा है? यह देश के लिये खतरनाक स्थिति है पर ऐसा होना अस्वाभाविक भी नहीं है क्योंकि बाजार और प्रचार से प्रयोजित बौद्धिक समूह समाज से कट चुका है।
            दरअसल हमारे देश में आधुनिक लोकतंत्र ने जहां आम आदमी के लिये सत्ता में भागीदारी का दरवाजा खोला है वहीं ऊंचा पद पाने की उसकी लालसा को बढ़ाया भी है। जिन लोगों को यह मालुम है कि उच्च पद उनके भाग्य नहीं है वह उच्च पदस्थ लोगों के अनुयायी बनकर उनके प्रचारक बन जाते हैं। यही प्रचारक अपनी बात समाज की अभिव्यक्ति को प्रस्तुत करने का दावा करते हैं। शिखर पुरुषों का आपस में एक तयशुदा युद्ध चलता है और आम आदमी उसे मूकभाव से देखता है। फिर इधर धनवान, पदवान, कर्मवान, धर्मवान तथा अधर्मवान लोगों का एक समूह है जो पूरे विश्व पर शासन करने लगा है। उसने इस तरह का वातावरण बनाया है कि हर व्यक्ति और क्रिया का व्यवसायीकारण हो गया है। लिखने, पढ़ने, बोलने और देखने की क्रियाओं में स्वतंत्रता नहीं रही। न अभिव्यक्ति में मौलिकता है। विचाराधाराओं, धर्मो, जातियों और भाषाओं के क्षेत्र में सक्रिय लोग प्रायोजित हैं। उनकी अभिव्यक्ति स्वतंत्र नहीं प्रायोजित है। उनकी अभिव्यक्ति सतही है। बाज़ार जैसी प्रेरणा निर्मित करता है प्रचार में वैसी ही अभिव्यक्ति दिखाई देती है।
           ऐसे में नये आदमी और नये विचार को वैसे भी कोई स्थान नहीं मिलता फिर प्रायोजन की प्रवृत्ति ने आमजान को भी इतना संकीर्ण मानसिकता का बना दिया है कि उसे गूढ़ बात समझ में नहीं आती। भारत में अभी तक कहा जाता था कि आर्थिक संकट है पर किसी ने यह नहीं कहा कि बौद्धिकता का संकट है। कुछ दिन पहले स्विस बैंक में कथित रूप से भारतीयों के चार लाख करोड़ जमा होने की बात सामने रखकर कुछ लोग कह रहे थे कि यह पैसा अगर देश में आ जाये तो देश की तस्वीर बदल जाये। अगर त्रावणकोर के खजाने की बात कही जाये तो वह भी कम नहीं है तब क्या कोई उसके सही उपयोग की बात कोई नहीं कर रहा है। ढोल जब दूर हैं तो सुहावने बताये और पास आया तो कहने लगे कि हमें बजाना नहीं आता इसलिये इसे सजाकर रखना है। फिर एक सवाल यह भी है कि इसका उपयोग किया जाये तो क्या वाकई इस देश की स्थिति सुधर जायेगी। कतई नहीं क्योंकि हमारे देश की समस्या धन की कमी नहीं बल्कि मन की कमी है। मन यानि आत्मविश्वास की कमी ही देश का असली संकट है और यह विचारणीय विषय है। इस विषय पर वह लेख एक साथ प्रस्तुत हैं जो इस लेखक ने इंटरनेट पर लिखे और पाठकीय दृष्टि से फ्लाप रहे।
सोने के खजाने से बड़ा है आम आदमी का पसीना-हिन्दी लेख (sone ke khazane se bada hai aam admi ka pasina-hindi lekh)      
  त्रावणकोर के स्वामी पद्मनाभ मंदिर में सोने का खजाना मिलने को अनेक प्रकार की बहस चल रही है।  एक लेखक, एक योग साधक और एक विष्णु भक्त होने के कारण इस खजाने में इस लेखक दिलचस्पी बस इतनी ही है कि संसार इस खजाने के बारे में क्या सोच रहा है? क्या देख रहा है? सबसे बड़ा
सवाल इस खजाने का क्या होगा?        
          कुछ लोगों को यह लग रहा है कि इस खजाने का प्रचार अधिक नहीं होना चाहिए था
क्योंकि अब इसके लुट जाने का डर है।  इतिहासकार अपने अपने ढंग सेइतिहास का व्याख्या करते हैं पर अध्यात्मिक ज्ञानियों का अपना एक अलग नजरिया होता है। दोनों एक नाव पर सवारी नहीं करते भले ही एक घर में रहते हों। इस समय लोग स्विस बैंकों में कथित रूप से भारतीयों के जमा चार लाख
करोड़ के काले धन की बात भूल रहे हैं। इसके बारे में कहा जा रहा था कि यह रकम अगर भारत आ जाये तो देश के हालत सुधर जायें।  अब त्रावनकोर के पद्मनाभ मंदिर के खजाने की राशि पांच लाख करोड़ तक पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है। बहस अब स्विस बैंक से हटकर पद्मनाभ मंदिर में  पहुंच
गयी है।
    हमारी दिलचस्पी खजाने के संग्रह की प्रक्रिया में थी कि त्रावणकोर के राजाओं ने इतना सोना जुटाया कैसे? इससे पहले इतिहासकारों से यह भी पूछना चाहेंगे कि उनके इस कथन की अब क्या स्थिति है जिसमें वह कहते हैं कि भारत की स्वतंत्रता के समय देश के दो रियासतें सबसे अमीर थी एक हैदराबाद दूसरा ग्वालियर।  कहा जाता है कि उस समय हैदराबाद के निजाम तथा ग्वालियर के सिंधियावंश के पास सबसे अधिक  संपत्ति थी। त्रावणकोर के राजवंश का नाम नहीं आता पर अब लगता है कि इसकी संभावना अधिक है कि वह सबसे अमीर रहा होगा। मतलब यह कि इतिहास कभी झूठ भी बोल सकता है इसकी संभावना सामने आ रही है। बहरहाल त्रावणकोर के राजवंश विदेशी व्यापार करता था।  बताया जाता है कि इंग्लैंड के राजाओं के महल तक उनका सामान जाता था। हम सब जानते हैं कि केरल प्राकृतिक रूप से संपन्न राज्य रहा है।  फिर त्रावणकोर समुद्र के किनारे बसा है।  इसलियेविश्व में जल और नभ परिवहन के विकास के चलते उसे सबसे पहले लाभ होना ही था।  पूरे देश के लिये विदेशी सामान वहां के बंदरगाह पर आता होगा तो  यहां से जाता भी होगा।  पहले भारत का विश्व सेसंपर्क थल मार्ग से था। यहां के व्यापारी सामान लेकर मध्य एशिया के मार्ग से जाते थे। तमाम तरह के राजनीतिक और धार्मिक परिवर्तनों के चलते यह मार्ग दुरुह होता गया होगा तो जल मार्ग के साधनों के विकास का उपयोग तो बढ़ना ही था।  भारत में उत्तर और पश्चिम से मध्य एशियाई देशों से हमले हुएपर जल परिवहन के विकास के साथ ही  पश्चिमी देशों से भी लोग आये।पहले पुर्तगाली फिर फ्रांसिसी और फिर अंग्रेज।  ऐसे में भारत के दक्षिणी भाग में भी उथल पुथल हुई।  संभवत अपने काल के शक्तिशाली और धनी राज्य होने के कारण त्रावनकोर के तत्कालीन राजाओं को विदेशों से संपर्क बढ़ा ही होगा।  खजाने के इतिहास की जो जानकारी आरही है उसमें विदेशों से सोना उपहार में मिलने की भी चर्चा है।  यह उपहार फोकट में नहीं मिले होंगे।  यकीनन विदेशियों को अनेकप्रकार का लाभ हुआ होगा। सबसे बड़ी बात यह है कि इस मार्ग से भारत में आना सुविधाजनक रहा होगा।  विदेशियों ने सोना दिया तो उनको क्या मिला होगा? यकीनन भारत की प्रकृतिक संपदा मिली होगी जिसे हम कभी सोने जैसा नहीं मानते। बताया गया है कि त्रावणकोर का राजवंश चाय, कॉफी और काली मिर्च के व्यापार से जुड़ा रहा है।  मतलब यह कि चाय कॉफी और काली मिर्च हमारे लिये सोना नहीं है पर विदेशियों से उसे सोने के बदले लिया। सोना भारतीयों की कमजोरी रहा है तो भारत की प्राकृतिक और मानव संपदाविदेशियों के लिये बहुत लाभकारी रही है।  केवल त्रावणकोर का राजवंश ही नहीं भारत के अनेक बड़े व्यवसायी उस समय सोना लाते  और भारत की कृषि और हस्तकरघा से जुड़ी सामग्री बाहर ले जाते  थे।  सोने की खदानों में मजदूर काम करता है तो प्रकृतिक संपदा का दोहन भी मजदूर ही करता है। मतलब पसीना ही सोने का सृजन करता है।   
          अपने लेखों में शायद यह पचासवीं बार यह बात दोहरा रहे हैं कि विश्व के भूविशेषज्ञ भारत पर प्रकृति की बहुत कृपा मानते हैं।  यहां भारतका अर्थ व्यापक है जिसमें पाकिस्तान, अफगानिस्तान नेपाल, श्रीलंका,बंग्लादेश और भूटान भी शामिल है।  इस पूरे क्षेत्र को भारतीय उपमहाद्वीप कहा जाता रहा है पर पाकिस्तान से मित्रता की मजबूरी के चलते इसे हम लोग आजकल दक्षिण एशिया कहते हैं।        
          कहा जाता है कि कुछ भारतीय राज्य तो ऐसे भी हुए हैं जिनका तिब्बत तक राज्य फैला हुआ था।  दरअसल उस समय के राजाओं में आत्मविश्वास था और इसका कारण था अपने गुरुओं से मिला  अध्यात्मिक ज्ञान! वह युद्ध और शांति में अपनी प्रजा का हित ही सोचते थे।  अक्सर
अनेक लोग कहते हैं कि केवल अध्यात्मिक ज्ञान में लिप्तता की वजह से यह देशविदेशी आक्राताओं का शिकार बना। यह उनका भ्रम है। दरअसल अध्यात्मिक शिक्षा से अधिक आर्थिक लोभ की वजह से हमें सदैव संकटों का सामना करना पड़ा।  समय के साथ अध्यात्म के नाम पर धार्मिक पांखड और उसकी आड़ में आमजन की भावनाओं से खिलवाड़ का ही यह परिणाम हुआ कि यहां के राजा,जमीदार, और साहुकार उखड़ते गये।   
          सोने से न पेट भरता है न प्यास बुझती है।  किसी समय सोने की मुद्रायें प्रचलन में थी पर उससे आवश्यकता की वस्तुऐं खरीदी बेची जाती थी। बाद में अन्य धातुओं की राज मुद्रायें बनी पर उनके पीछे उतने ही मूल्य  के सोने का भंडार रखने का सिद्धांत पालन में लाया जाता था। आधुनिक समय में पत्र मुद्रा प्रचलन में है पर उसके पास सिद्धातं यह बनाया गया कि राज्य जितनी मुद्रा बनाये उतने ही मूल्य का सोना अपने भंडार में रखे।  गड़बड़झाला यही से शुरु हुआ। कुछ देशों ने अपनी पत्र मुद्रा जारी करने के पीछे कुछ प्रतिशत सोना रखना शुरु किया।  पश्चिमी देशों का पता नहीं पर विकासशील देशों के गरीब होने कारण यही है कि जितनी मुद्रा प्रचलन में है उतना सोना नहीं है।  अनेक देशों की सरकारों पर आरोप है कि प्रचलित मुद्रा के पीछे सोने का प्रतिशत शून्य रखे हुए हैं। अगर हमारी मुद्रा के पीछे विकसित देशों की तरह ही अधिक प्रतिशत में सोना हो तो शायद उसका मूल्य विश्व में बहुत अच्छा रहे।विशेषज्ञ बहुत समय से कहते रहे हैं कि भारतीयों के पास अन्य देशों से अधिकअनुपात में सोना है।  मतलब यह सोना हमारी प्राकृतिक तथा मानव संपदा की वजह से है।  यह देश लुटा है फिर भी यहां इतना सोना कैसे रह जाता है? स्पष्टतः हमारी प्राकृतिक संपदा का दोहन आमजन अपने पसीने से करता है जिससे सोना ही   सोने में बदलता है।  सोना लुटने की घटनायें तो कभी कभार होती होंगी पर आमजन के पसीने से सोना बनाने की पक्रिया कभी थमी नहीं होगी।
             भारत में आमजन जानते हैं कि सोना केवल आपातकालीन मुद्रा है।  लोग कह रहे थे कि स्विस बैंकों से अगर काला धन वापस आ जाये तो देश विकासकरेगा मगर उतनी रकम तो हमारे यहां मौजूद है।  अगर ढूंढने निकलेंतो सोने के बहुत सारे खजाने सामने आयेंगे पर समस्या यह है कि हमारे यहां प्रबंध कौशल वाले लोग नहीं है।  अगर होते तो ऐसे एक नहीं हजारोंखजाने बन जाते। प्रचार माध्यम इस खजाने की चर्चा खूब कर रहे हैं पर आमजनउदासीन है। केवल इसलिये उसे पता है कि इस तरह के खजाने उसके काम नहीं आनेवाले। सुनते हैं कि त्रावणकोर के राजवंश ने अपनी प्रजा की विपत्ति में भीइसका उपयोग नहीं किया था।  इसका मतलब है कि उस समय भी वह अपनेसंघर्ष और परिश्रम से अपने को जिंदा रख सकी थी। बहरहाल यह विषय बौद्धिकविलासिता वाले लोगों के लिये बहुत रुचिकर है तो अध्यात्मिक साधकों के लिये अपना बौद्धिक ज्ञान बघारने का भी आया है।  जिनके सिर पर सोन का ताज था वही कटे जिनके पास खजाने हैं वही लुटे जो अपने पसीने से अपनी रोटी का सोना कमाता है वह हमेशा ही सुरक्षित रहा।  हमारे देश में पहले अमीरी और खजाने भी दिख रहे हैं पर इससे बेपरवाह समाज अधिक है क्योंकि उसके पास सोना के रूप में बस अपना पसीना है।  यह अलग बात है कि उसकी एक रोटी में से आधी छीनकर सोना बनाया जाता है।
हम प्रबंध योग सीख लें-हिन्दी व्यंग्य (hum prabandhyog seekh len-hindi
vyangya)
        
         देखा जाये तो अपना देश अब गरीबों का देश भले ही है पर गरीब नहीं है। सोने की चिड़िया पहले भी था अब भी है। यह अलग बात है कि अभी तक तो यह चिड़ियायें पैदा होकर विदेशों में घोंसला बना लेती और अपने यहां लोग हाथ मलते। कहने को तो यह भी कहा जाता है कि यहां कभी दूध की नदियां बहती थी अब भी बहती हैं पर उनमें दूघ कितना असली है और कितना नकली यह अन्वेषण का विषय है।    
             हम दरअसल स्विस बैंकों में जमा भारतीयों के काले धन और केरल के पद्मनाभ
मंदिर में मिले खजाने की बात कर रहे हैं। इस खबर ने हमारे दिलोदिमाग के सारे तार हिला दिये हैं कि पदम्नाभ मंदिर में अभी तक एक लाख करोड़ के हीरेजवाहरात, कीमती सिक्के और सोने के आभूषण मिले हैं। अभी कुछ अन्य कमरे खोले जाने हैं और यकीनन यह राशि बढ़ने वाली है। हम मान लेते हैं कि वहां चार लाख करोड़ से कुछ कम ही होगी। यह आंकड़ा स्विस बैंक में जमा भारतीयों की रकम का भी बताया जाता है। वैसे इस पर विवाद है। कोई कहता है कि दो लाख करोड़ है तो कोई कहता तीन तो कोई कहता है कि चार लाख करोड़। हम मान लेते हैं कि स्विस बैंकों में जमा काला धन और मंदिर में मिला लगभग बराबर की राशि का होगा। न हो तो कम बढ़ भी हो सकता है।   
         हमें क्या? हम न स्विस बैंकों की प्रत्यक्ष जानकारी रखते हैं न ही पद्मनाभ मंदिर कभी गये हैं। सब अखबार और टीवी पता लगता है। जब लाख करोड़ की बात आती है तो लगता है कि दो अलग राशियां होंगी। तीन लाख करोड़ यानि तीन लाख और एक करोड़-यह राशियां मिलाकर पढ़ना कठिन लगता है। । अक्ल ज्यादा काम करती  करना चाहते भी नहीं क्योंकि अगर आंकड़ों में उलझे तो दिमाग काम करना बंद कर देगा ।
         इधर खबरों पर खबरें इस तरह आ रही हैं कि पिछली खबर फलाप लगती है। सबसे पहले टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले की बात सामने आयी। एक लाख 79 हजार करोड़ का घोटाला बताया गया। फिर स्विस बैंक के धन पर टीवी और अखबार में चले सार्वजनिक विवाद में चार लाख करोड़ के जमा होने की बात आई। विवाद और आंदोलनके चलते साधु संतों की संपत्ति की बात भी सामने आयी। हालांकि उनकी संपत्तियां हजार करोड़ में थी पर उनकी प्रसिद्धि के कारण राशियां महत्वपूर्णनहीं थी। फिर पुट्टापर्थी के सत्य सांई बाबा की संपत्ति की चर्चा भी हुई तो लोगों की आंखें फटी की फटी रह गयी। चालीस हजारे करोड़ का अनुमान कियागया। यह रकम बहुत छोटी थी इसलिये स्विस बैंकों की दो से चार लाख करोड़ का मसला लगातार चलता रहा। अब पद्मनाभ मंदिर के खजाने मिलने की खबर से उस पर पानी फिर गया लगता है।       
          पिछले कुछ दिनों से अनेक महानुभाव यह कह रहे हैं कि विदेशों में जमा भारत का धन वापस आ जाये तो देश का उद्धार हो जाये। अनेक लोग इस रकम का अर्थव्यवस्था के लिये अत्यंत महत्व बताते हुए अनेक तरह की विवेचना कर रहेहैं। अब पद्मनाभ मंदिर के नये खजाने की राशि के लिये भी यही कहा जा रहा है। ऐसे में हमारा कहना है कि जो महानुभाव विदेशों से काले धन को भारत लाने के लिये जूझ रहे हैं वह अपने प्रयास अब ऐसे उपलब्ध धन के सही उपयोग करने के लिये लगा दें। वैसे भी हमारे देश के सवौच्च न्यायालय ने विदेशों से काला धन लाने के लिये अपने संविधानिक प्रयास तेज कर दिये हैं इसलिये निज प्रयास अब महत्वहीन हो गये हैं। वैसे केरल के पद्मनाभ मंदिर का खजाना भी न्यायालीयन प्रयासों के कारण सामने आया है। यकीनन आगे यह देश के खजाने में जायेगा। उसके बाद न्यायालयीन प्रयासों की सीमा है। धन किस तरह कहां और कब खर्च हो यह तय करना अंततः देश के प्रबंधकों का है। ऐसे में उनकी कुशलता
ही उसका सही उपयोग में सहयोग कर सकती है।
          यहीं आकर ऐसी समस्या शुरु होती है जिसे अर्थशास्त्र में भारत में कुशल प्रबंध का अभाव कहा जाता है। अगर आप देश की आर्थिक स्थिति की बात करें तो भूतकाल और वर्तमान काल में धन की बहुतायात के प्रमाण हैं। प्रकृति की कृपा से यहां दुनियां के अन्य स्थानों से जलस्तर बेहतर है इसलिये खेती तथा पशुपालन अधिक होता है। असली सोना तो वह है जो श्रमिक पैदा करता है यह अलग बात है कि उसके शोषक उसे धातु के सोने के बदलकर अपने पास रख लेते हैं। जब तक हिमालाय है तब तब गंगा और यमुना बहेगी और विंध्याचल है तो नर्मदा की कृपा भी रहेगी। मतलब भविष्य में भी यहां सोना उगना है पर हमारे देश के लोगों का प्रेम तो उस धातु के सोने से है जो यहां पैदा ही नहीं होता। मुख्यसमस्या यह है कि हमारे देश में सामाजिक सामंजस्य कभी नहीं रहा दावे चाहे हम जितने भी करते रहें। जिसे कहीं धन, पद और बल मिला वह राज्य करना चाहता है। इससे भी वह संतुष्ट नहीं होता। मेरा राज्य है इसके प्रमाण के लिये शोषण और हिंसा करता है। राज्य का पद उपभोग के लिये माना जाता हैं जनहित करने के लिये नहीं। जनहित का काम तो भगवान के भरोसे है। किसी को एक रोटी की जगह दो देने की बजाय जिसके पास एक उसकी आधी भी छीनने का प्रयास किया जाता है यह सोचकर कि पेट भरना तो भगवान का काम है हमें तो अपना संसार निभाना है इसलिये किसी की रोटी छीने।
           भारतीय अध्यात्म में त्याग और दान की अत्यंत महिमा इसलिये ही बतायी गयी है कि धनिक, राजपदवान, तथा बाहबली आपने से कमजोर की रक्षा करें। भारतीय मनीषियों से पूर्वकाल में यह देखा होगा कि प्रकृति की कृपा के चलते यह देश संपन्न है पर यहां के लोग इसका महत्व न समझकर अपने अहंकार में डूबे हैं इसलिये उन्होंने समाज क सहज भाव से संचालन के सूत्र दिये। हुआ यह कि उनके इन्हीं सूत्रों को रटकर सुनाने वाले इसका व्यापार करते हैं। कहीं धर्म भाव तो कहीं कर्मकांड के नाम पर आम लोगों को भावनात्मक रूप से भ्रमित कर उसके पसीने से पैदा असली सोने को दलाल धातु के सोने में बदलकर अपनी तिजोरी भरने लगते हैं। वह अपने घर भरने में कुशल हैं पर प्रबंधन के नाम पर पैदल हैं।
अलबत्ता समाज चलाने का प्रबंधन हथिया जरूर लेते हैं। जाति, भाषा, धर्म, व्यापार, समाज सेवा और जनस्वास्थ्य के लिये बने अनेक संगठन और समूह है पर प्रबंधन के नाम पर बस सभी लूटना जानते हैं। जिम्मेदारी की बात सभी करते हैंपर जिम्मेदार कहीं नहीं मिलता ।
    हमारे कहने का अभिप्राय यह है कि देश गरीब इसलिये नहीं है यहां धन नहीं है बल्कि उसका उपयेाग करना जिम्मेदार लोगों का उसका वितरण करना नहीं आता।भ्रष्टाचार आदत नहीं शौक है। मजबूरी नहीं जिम्मेदारी है। जिसके पास राजपद है अगर वह उपरी कमाई न करे तो उसका सम्मान कहीं नहीं रहता।
        स्विस बैंक हो या पद्मनाभ का मंदिर हमारे देश के खजाने की रकम बहुत बड़ी है। कुछ लोग तो कहते हैं कि ऐसे खजाने देश में अनेक जगह मिल सकते हैं। उनकी रकम इतनी होगी कि पूरे विश्व को पाल सकते हैं। यही कारण है कि विदेशों के अनेक राजा लुटेरे बनकर यहां आये। मुख्य सवाल यह है कि हमें पैसे का इस्तेमाल करना सीखना और सिखाना है। इसे हम प्रबंध योग भी कह सकते हैं।
पतंजलि योग में कहीं प्रबंध योग नहीं बताया जाता है पर अगर उसे कोई पढ़े और समझे तो वह अच्छा प्रबंध बन सकता है। मुख्य विषय संकल्प का है और वह यह कि पहले हम अपनी जिम्मेदारी निभाना सीखें। त्याग करना सीधें। संपत्ति संचय न करें। जब हम कोई आंदोलन और अभियान चलाते हैं तो स्पष्टतः यह बात हमारे मन में रहती है कि कोई दूसरा हमारा उद्देश्य पूरा करे। जबकि होना यह चाहिए कि हम आत्मनियंत्रित होकर काम करें।
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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श्रीमद्भागवत गीता से समझा जा सकता है समाजवाद का रूप-मज़दूर दिवस पर हिन्दी लेख (shri madbhawat gita aur soscilism-mazdoor diwas, divas or may day par vishesh lekh)


           भारत में मजदूर दिवस मनाने की कोई परंपरा नहीं है, अलबत्ता यहां विश्वकर्मा जयंती मानी जाती है जिसे करीब करीब इसी तरह का ही माना जा सकता है।  हमारे देश  में  विश्वकर्मा जी को ही श्रम शक्ति का देवता मन जाता है।  हमारा  अध्यात्मिक दर्शन   पाश्चात्य सभ्यता द्वारा प्रदाय अधिकतर दिवसों को खारिज करता है यथा माता दिवस, पिता दिवस, मैत्री दिवस, प्र्रेम दिवस तथा नारी दिवस। मजदूर दिवस भी पश्चिम से ही आयातित विचारधारा से जुड़ा है पर इसे मनाने का समर्थन करना चाहिये। दरअसल इसे तो बहुत शिद्दत से मनाना चाहिए हालाँकि हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में निष्काम दान तथा निष्प्रयोजन दया में हमेशा लिप्त रहने के प्रेरित किया जाता है न की एक दिन के लिए ।
           आधुनिक युग में कार्ल मार्क्स को मजदूरों का मसीहा कहा जाता है। उनके नाम पर मजदूर दिवस मनाया जाता है तो इसमें मजदूर या श्रम शब्द जुड़ा होने से संवेदनायें स्वभाविक रूप जाग्रत हो उठती हैं। एक बात याद रखिये आज भारत में जो हम नैतिक, अध्यात्म, तथा तथा देशप्रेम की भावना का अभाव लोगों में देख रहे हैं वह शारीरिक श्रम को निकृष्ट मानने की वजह से है। हर कोई सफेद कालर वाली नौकरी चाहता है और शारीरिक श्रम करने से शरीर में से पसीना निकलने से घबड़ा रहे हैं। भारतीय तथा पाश्चात्य दोनों ही   प्रकार के स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि शरीर को जितना चलायेंगे उतना ही स्वस्थ रहेगा तथा जितना सुविधाभोगी बनेंगे उतनी ही तकलीफ होगी।
           सबसे बड़ी बात यह है कि गरीब और श्रमिक को तो एक तरह से मुख्यधारा से अलग मान लिया गया है। वह दया योग्य समझा जाता है न की साथ बिठाने लायक।  संगठित प्रचार माध्यमो में-टीवी चैनल, रेडियो तथा समाचार पत्र पत्रिकाओं-इस तरह के प्रसारण तथा प्रकाशन देखने को मिलते हैं जैसे कि श्रम करना एक तरह से घटिया लोगों का काम है। संगठित प्रचार माध्यमों को इसके लिये दोष नहीं दिया जा सकता क्योंकि वह आधुनिक बाज़ार के विज्ञापनों पर ही अपना साम्राज्य खड़े किये हुए  हैं। यह बाजार सुविधाभोगी पदार्थों का निर्माता तथा विक्रेता है। स्थिति यह है कि फिल्म और टीवी चैनलों के अधिकतर कथानक अमीर घरानों पर आधारित होते हैं जिसमें नायक तथा नायिकाओं को मालिक बनाकर प्रस्तुत किया जाता है। उनमें नौकर के पात्र भी होते हैं पर नगण्य भूमिका में। क्हीं नायक या नायिका मज़दूर या नौकर की भूमिका में दिखते हैं तो उनका पहनावा अमीर जेसा ही होता है। फिर अगर नायक या नायिका का पात्र मजदूर या नौकर है तो कहानी के अंत में वह अमीर बन ही जाता है। जबकि जीवन में यह सच नज़र नहीं आता। ऐसे अनेक उदाहरण समाज में देखे जा सकते हैं कि जो मजदूर रहे तो उनके बच्चे भी मज़दूर बने। आम आदमी इस सच्चाई के साथ जीता भी है कि उसकी स्थिति में गुणात्मक विकास भाग्य से ही आता है
         कार्ल मार्क्स मजदूरों का मसीहा मानने पर विवाद हो सकता है पर पर देश के बुद्धिमान लोगों को अब इस बात के प्रयास करना चाहिये कि हमारी आने वाली पीढ़ी में श्रम के प्रति रूझान बढ़े। यहां श्रम से हमारा स्पष्ट आशय अकुशल श्रम से है-जिसे छोटा काम भी कहा जा सकता है। कुशल श्रम से आशय इंजीनियरिंग, चिकित्सकीय तथा लिपिकीय सेवाओं से है जिनको करने के लिये आजकल हर कोई लालायित है। इसी अकुशल श्रम को सम्मान की तरह देखने का प्रयास करना चाहिये। यह नहीं समझना चाहिए कि जो लोग अकुशल श्रम करते हैं वह भी इंसान है कोइ यन्त्र  या पालतू पशु नहीं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने पास या साथ काम करने वाले श्रमजीवी को कभी असम्मानित या हेय दृष्टि से नहीं देखना चाहिये। मनुष्य मन की यह कमजोरी है कि वह धन न होते हुूए भी सम्मान चाहता है। दूसरी बात यह है कि श्रमजीवी मजदूरों के प्रति असम्माजनक व्यवहार से उनमें असंतोष और विद्रोह पनपता है जो कालांतर में समाज के लिये खतरनाक होता है। यही श्रमजीवी और मजदूरी ही धर्म की रक्षा में प्रत्यक्ष सहायक होता है। यही कारण है कि हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में सभी को समान दृष्टि से देखने की बात कही जाती है। इस विषय पर दो वर्ष पूर्व एक लेख यहां प्रस्तुत है। इसी लेख को कल सैकंड़ों पाठकों द्वारा देखने का प्रयास किया इसलिये इसे इस पाठ के नीचे भी प्रस्तुत किया जा रहा है।
        आज मजदूर दिवस है और कई जगह मजदूरों के झुंड एकत्रित कर रैलियाँ निकालीं जायेंगी। ऐसा नहीं है कि हमारे दर्शन में मजदूरों के लिए कोई सन्देश नहीं है पर उसमें मनुष्य में वर्गवाद के वह मन्त्र नहीं है जो समाज में संघर्ष को प्रेरित करते हैं। हमारे अध्यात्मिक दर्शन द्वारा प्रवर्तित जीवनशैली पर दृष्टिपात करें तो उसमें पूंजीपति मजदूर और गरीब अमीर को आपस में सामंजस्य स्थापित करने का सन्देश है। भारत में एक समय संगठित और अनुशासित समाज था जो कालांतर में बिखर गया। इस समाज में अमीर और गरीब में कोई सामाजिक तौर से कोई अन्तर नहीं था।
           श्री मद्भागवत गीता में कहा गया है कि
             —————————————–
            न द्वेष्टयकुशर्ल कर्म कुशले नातुषज्जजते।
           त्यागी सत्तसमाष्टिी मेघावी छिन्नसंशयः।।
            “जो मनुष्य अकुशल कर्म से तो द्वेष नहीं करता और कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता- वह शुद्ध सत्वगुण से युक्त पुरुष संशय रहित, बुद्धिमान और सच्चा त्यागी है।”
            श्रीमदभागवत गीता के १८वे अध्याय के दसवें श्लोक में इस श्लोक में उस असली समाजवादी विचारधारा की ओर संकेत किया गया है जो हमारे देश के लिए उपयुक्त है । जैसा कि सभी जानते हैं कि हमारे इस ज्ञान सहित विज्ञानं से सुसज्जित ग्रंथ में कोई भी संदेश विस्तार से नहीं दिया क्योंकि ज्ञान के मूल तत्व सूक्ष्म होते हैं और उन पर विस्तार करने पर भ्रम की स्थिति निमित हो जाती है, जैसा कि अन्य विचारधाराओं के साथ होता है। श्री मद्भागवत गीता में अनेक जगह हेतु रहित दया का भी संदेश दिया गया है जिसमें अपने अधीनस्थ और निकटस्थ व्यक्तियों की सदैव सहायता करने के प्रेरित किया गया है।
              श्री मद्भागवत गीता में भी कहा गया है कि 
             —————————————
              स्वै स्वै कर्मण्यभिरतः संसिद्धि लभते नरः।
              सव्कर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु।।
          “अपने अपने स्वाभाविक कार्ये में तत्परता से लगा मनुष्य भक्ति प्राप्त करते हुए उसमें सिद्धि प्राप्त लेता है। अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार से कर्म करके परम सिद्धि प्राप्त करता है उस विधि को सुन।”
          यतः प्रवृत्तिभूंतानां वेन सर्वमिद्र ततम्।
          स्वकर्मणा तमभ्यच्र्य सिद्धिं विन्दति मानवः।।
        “जिस परमेश्वर से संपूर्ण प्राणियों की उत्तपति हुई है और जिससे यह समस्त जगत व्याप्त है, उस परमेश्वर को अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त हो जाता है।”
             श्रीमदभागवत गीता में ऊपर लिखे दोनों  श्लोक को  तो यह साफ लगता है अकुशल श्रम से आशय मजदूर के कार्य से ही है । आशय साफ है कि अगर आप शरीर से श्रम करे हैं तो उसे छोटा न समझें और अगर कोई कर रहा है तो उसे भी सम्मान दे। यह मजदूरों के लिए संदेश भी है तो पूंजीपतियों के लिए भी है ।
श्री गीता में ही हेतु रहित दया का सन्देश तो स्पष्ट रुप से धनिक वर्ग के लोगों के लिए ही कहा गया है-ताकि समाज में समरसता का भाव बना रहे। कार्ल मार्क्स एक बहुत बडे अर्थशास्त्री माने जाते है जिन के विचारों पर गरीबों और शोषितों के लिए अनेक विचारधाराओं का निर्माण हुआ और जिनका नारा था “दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ”।
              शुरू में नये नारों के चलते लोग इसमें बह गये पर अब लोगों को लगने लगा है कि अमीर आदमी भी कोई ग़ैर नहीं वह भी इस समाज का हिस्सा है-और जो उनके खिलाफ उकसाते हैं वही उसने हाथ भी मिलाते हैं । जब आप किसी व्यक्ति या उनके समूह को किसी विशेष संज्ञा से पुकारते हैं तो उसे बाकी लोगों से अलग करते हैं तो कहीं न कहीं समाज में विघटन के बीज बोते हैं।
               दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि श्रीगीता में अपने स्वाभाविक कर्मों में अरुचि न दिखाने का संदेश दिया गया है। सीधा आशय यह है कि कोई भी काम छोटा नहीं है और न तो अपने काम को छोटा और न किसी भी छोटा काम करने वाले व्यक्ति को हेय समझना चाहिये। ऐसा करना बुद्धिमान व्यक्ति का काम नहीं करना चाहियैं। कई बार एसा होता है कि अनेक धनी लोग किसी गरीब व्यक्ति को हेय समझ कर उसकी उपेक्षा करते हैं-यह तामस प्रवृत्ति है। उसी तरह किसी की मजदूरी कम देना या उसका अपमान केवल इसलिये करना कि वह गरीब है, अपराध और पाप है। हमेशा दूसरे के गुणों और व्यवहार के आधार पर उसकी कोटि तय करना चाहिये।
भारतीय समाज में व्यक्ति की भूमिका उसके गुणों, कर्म और व्यक्तित्व के आधार पर तय होती है उसके व्यवसाय और आर्थिक शक्ति पर नहीं। अगर ऐसा नहीं होता तो संत शिरोमणि श्री कबीरदास, श्री रैदास तथा अन्य अनेक ऎसी विभूतियाँ हैं जिनके पास कोई आर्थिक आधार नहीं था पर वे आज हिंदू विचारधारा के आधार स्तम्भ माने जाते हैं।
           कुल मिलाकर हमारे देश में अपनी विचारधाराएँ और व्यक्तित्व रहे हैं जिन्होंने इस समाज को एकजुट रखने में अपना योगदान दिया है और इसीलिये वर्गसंघर्ष के भाव को यहां कभी भी लोगों के मन में स्थान नहीं मिल पाया-जो गरीबो और शोषितों के उद्धार के लिए बनी विचारधाराओं का मूल तत्व है। परिश्रम करने वालों ने रूखी सूखी खाकर भगवान का भजन कर अपना जीवन गुजारा तो सेठ लोगों ने स्वयं चिकनी चुपडी खाई तो घी और सोने के दान किये और धार्मिक स्थानों पर धर्म शालाएं बनवाईं । मतलब समाज कल्याण को कोई अलग विषय न मानकर एक सामान्य दायित्व माना गया-बल्कि इसे मनुष्य समुदाय के लिए एक धर्म माना गया वह अपने से कमजोर व्यक्ति की सहायता करे। आज के दिन अकुशल काम करने वाले मजदूरों के लिए एक ही संदेश मैं देना चाहता हूँ कि अपने को हेय न समझो । सेठ साहूकारों और पूंजीपतियों के लिए भी यह कहने में कोइ संकोच नहीं है अपने साथ जुडे मजदूरों और कर्मचारियों पर हेतु रहित दया करें ।
—————————————-
कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप” 
poet,writter and editor-Deepak “BharatDeep”
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हिन्दी ब्लाग लेखकों का मार्ग अत्यंत कठिन-हिन्दी लेख (hindi blog writing and society-article)


इस लेखक के ब्लाग ईपत्रिका ने पाठक तथा पाठन संख्या दो लाख पार कर ली है। यह कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है पर फिर भी यह बताना जरूरी है कि हिन्दी पत्रिका के बाद यह दूसरा ब्लाग है जिसने यह उपलब्धि प्राप्त की है।
दूसरे की रचना सभी के लिये समालोचना-प्रशंसा और आलोचना-का विषय होती है। फिल्म, नाटक, साहित्य, पत्रकारिता तथा चित्रकारी जैसे विषयों से रचनात्मक लोग निर्वाह कर पाते हैं क्योंकि उनके पास अपनी अभिव्यक्ति बाह्य रूप से प्रकट करने की क्षमता होती है जबकि सामान्य आदमी केवल रचना करने की सोचकर रह जाता है। वैसे देखा जाये तो हर मनुष्य अपने अंतर्मन की अभिव्यक्ति करना चाहता है पर कभी संकोच तथा कभी उचित ज्ञान का अभाव उसे ऐसा करने नहीं देता। तब मनुष्य दूसरे की अभिव्यक्ति में अपने मन के उतार चढ़ाव देखकर प्रसन्न होता है। यही कारण है कि इस संसार में रचनाकारों की हर प्रकार की रचना आम इंसानों के लिये मनोरंजन का विषय होती है। विश्व में इंटरनेट के आगमन ने अभिव्यक्ति के स्वरूप का विस्तार किया पर इसमें तकनीकी ज्ञान होने की अनिवार्यता ने असहज भी बनाया है। हम यहां केवल हिन्दी भाषा के संदर्भ में ही विचार करें तो अच्छा रहेगा क्योंकि अन्य भाषाओं की अपेक्षा इससे संबद्ध लोगों की संख्या अधिक होने के बावजूद इसे इंटरनेट पर प्रतिष्ठित होने में समय लग रहा है।
पहली बात तो यह कि हिन्दी में रचनाकारों की संख्या में कभी कमी नहीं रही पर स्तरीय रचनाओं को समाज के सामने प्रकट होने का मार्ग हमेशा दुरूह रहा है। हिन्दी में लिखने की क्षमता होना ही पर्याप्त नहीं बल्कि उसे पाठकों के सामने जाने का मार्ग प्रशस्त करने की कला भी आना चाहिए। आज़ादी के बाद इस देश में हिन्दी का प्रचलन बढ़ा जरूर मगर इससे जुड़े आर्थिक तथा सामाजिक ढांचे में कार्यरत प्रबंधकों ने लेखक को कभी महत्व नहीं दिया। एक तरह से यह योजना जाने अनजाने अपना काम करती रही कि इस भाषा में कोई लेखक केवल अपनी लेखन क्षमता के कारण पूज्यनीय नहीं बनना चाहिए। उसकी स्थिति लिपिकीय रहना चाहिये न कि उसके स्वामित्व का बोध समाज के सामने प्रकट हो। यही कारण है फिल्म, पत्रकारिता, साहित्य तथा कला के क्षेत्र में ऐसे लोगों को प्रतिष्ठा मिली जिनका समाज न कभी स्तरीय नहीं माना या फिर उनकी रचनाओं को वर्तमान समाज के सरोकारों से दूर काल्पनिक माना गया।
अगर हम आज हिन्दी की स्थिति को देखें तो पाएंगे कि भक्ति काल के सूर, तुलसी,मीरा, कबीर,रहीम,रसखान तथा अन्य कवि रचनाकार कम संत अधिक माने जाते हैं। इस काल का हिन्दी भाषा का स्वर्णिम काल माना जाता है जबकि दिलचस्प बात यह कि इनमें से एक की भी रचना आधुनिक हिन्दी में नहीं है। ऐसे में अन्य कालों के लेखकों को श्रेष्ठ दर्जा न मिल पाना न केवल हमारे भाषा के विकास परप्रश्नचिन्ह लगाता है बल्कि समाज को आत्ममंथन के लिये भरी प्रेरित करता है। इससे हम एक बात समझ सकते हैं कि भारतीय जनमानस ऐसे साहित्य में कम दिलचस्पी लेता है जिससे उसको अध्यात्मिक शांति नहीं मिलती।
जब हम आधुनिक काल के रचनाकारों को देखते हैं तो वह समाज की घटनाओं को अपनी रचना में जगह देते हैं तो वह केवल तथ्यात्मक हो जाते हैं। वह मानकर चलते हैं कि उनकी प्रस्तुति से समाज स्वयं चिंतन कर निष्कर्ष निकाले। इसके विपरीत भारतीय जनमानस ऐसी स्पष्ट रचना चाहता है जिसमें तथ्यों के साथ स्पष्ट निष्कर्ष और प्रेरणा हो। देश की गरीबी, बेरोजगारी तथा अपराध का ग्राफ बढ़ा है और अगर हम समाज की स्थिति का अवलोकन करें तो यह बात साफ हो जाती है कि लोगों में चेतना इसलिये नहीं है क्योंकि वह चिंतन नहीं करते। चिंतन से चेतना आती है और चेतना से ही चिंतन होता है। तब ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि ऐसी रचनायें हों जिससे चिंतन पैदा हो या चेतना। यह तभी संभव है जब कोई अपनी रचनाओं को तथ्यात्मक प्रस्तुति की सीमा से बाहर निकालकर स्पष्ट संदेश दे। हालांकि जरूरत इस बात की भी है कि समाज उनको प्रोत्साहित करे। जबकि हो यह रहा है कि मनोरंजन परोसकर उनकी चेतना और चिंतन क्षमता को समाप्त किया जा रहा है।
ऐसे में जब इंटरनेट पर हिन्दी लिखने का सवाल आता है तो यह भी स्थिति सामने होती है कि पढ़ने वाले बहुत कम हैं। इस पर दूसरी समस्या यह कि यहां लेखक के स्वामी होने का प्रश्न तो दूर उसकी लिपिकीय स्थिति भी नहीं है जो कार्यालय में लिख कर पैसा कमाते हैं। उसे एकदम फोकटिया प्रयोक्ता मानकर छोड़ दिया गया है। ऐसे में वही लोग इस पर लिख सकते हैं जिनके पास इंटरनेट पर पैसा खर्च करने की क्षमता के साथ लिखने के साथ ही पढ़ने का शौक है। जिन लोगों को यहां लिखने से पैसा मिल सकता है तो उनकी भी स्थिति परांपरागत बाज़ार के बंधुआ से अधिक नहीं है और ऐसे में वैसी रचनायें आयेंगी जो बाहर मिल जाती हैं। तब ऐसी अपेक्षा करना व्यर्थ है कि हिन्दी का आम पाठक सरलता से पढ़ सके जाने वाले अखबार की जगह अपनी आंखें यहां बरबाद करेगा।
इधर इंटरनेट पर पिछले सात आठ वर्ष से हिन्दी में लिखने का प्रयास हो रहा है पर इसमें तेजी से बढ़ोतरी पिछले चार वर्ष में हुई है। वह भी एकदम नाकाफी है। हम इसके लिये हिन्दी पाठकों को दोष नहीं दे सकते क्योंकि यह बात नहीं भूलना चाहिए कि हमारे यहां नयी तकनीकी को अपनाने की क्षमता तो है पर उसमें सुविधा की चाहत भी है। इंटरनेट खोलने और उसमें लिखने के लिये थोड़ा अधिक तकनीकी ज्ञान चाहिए। इसके विपरीत घर आये अखबार को उठाकर पढ़ने में कोई अधिक कष्ट नहीं होता। फिर लिखना स्वयं की अभिव्यक्ति की चाहत वालों के लिये है और मोबाइल इसके लिये अच्छा काम करता है। हाथ में उठाकर किसी को भी संदेश भेज दो। वह चाहे जैसा भी हो दिवाली या होली की बधाई का हो या इश्क के इजहार के लिये। मतलब यह कि इंटरनेट का अभी अभिव्यक्ति के लिये उपयोग करने के लिये लोग तैयार नहीं है।
ऐसे में लोग अपनी अभिव्यक्ति को दूसरे के सामने देखकर खुश होते हैं। बड़े पाठ या कविताओं की रचना का माद्दा सभी में नहीं हो सकता। अगर देखा जाये तो मोबाइल ने भारतीय समाज में अंतिम व्यक्ति के हाथ में अपनी जगह बना ली है। मोबाइल में कैमरा, टीवी और रेडियो की सुविधायें हैं और लोग धड़ल्ले से उनका उपयोग कर रहे हैं। उसमें भी तकनीकी ज्ञान चाहिए पर अपनी सुविधा के लिये भारतीय जनमानस उस हद तक चला जाता है। मोबाइल के इर्दगिर्द सिमट रहे समाज में अभिव्यक्ति के लिये कंप्यूटर या लैपटाप के लिये कम ही जगह बची है। यह अलग बात है कि कंप्यूटर पर काम कर चुके आदमी के लिये मोबाईल छोटी चीज हो जाती है। चाहे कितने भी प्रयास किये जायें मोबाईल पर संदेश तो सीमित शब्द संख्या में ही लिखा जायेगा। उसमें भी आंख और हाथ को जो कष्ट होता है उसकी अनुभूति संदेश की अभिव्यक्ति के कारण नहीं होती है पर अंततः उबाऊ तो है।
एक बात तय हो गयी है कि भारतीय समाज प्रचार से संचालित होता है। जिनके पास प्रचार की शक्ति है वह चाहें तो लोगों के दिमाग में जगह बना सकते हैं। जब पहले ब्लाग की चर्चा प्रचार माध्यम करते थे तब लोगों का ध्यान इसकी तरफ आकर्षित हुआ। फिर ट्विटर आया और अब फेसबुक। ट्विटर में एक बार में सीमित संख्या के शब्द दर्ज किये जा सकते हैं जबकि फेसबुक असीमित शब्द संजो सकती है। प्रचार माध्यम जब पहले ब्लाग की चर्चा करते थे तो प्रचार में शिखर पर प्रतिष्ठत लोगों के ब्लाग की चर्चा अवश्य करते थे। अब ट्विटर या फेसबुक की चर्चा भी होती है तो लगभग यही रवैया है। मतलब सीधी बात यह है कि जो भी शिखर पुरुष करते हैं वही समाज देखे, यह प्रचार माध्यमों का रवैया है। यही वजह है कि अनेक लोगों ने ट्विटर और फेसबुक पर अपना खाते खोल लिये। यह आसान था पर ब्लाग बनाना थोड़ा कठिन है यह अलग बात है कि लेखकों के लिये ब्लाग से बढ़िया कोई चीज नहीं है। यह अलग बात है कि हिन्दी लेखक के लिये यह मार्ग कठिन है। अगर वह केवल लेखक हैं तो उनके विचार, कवितायें, या लेख के अंश कोई भी चुरा कर अपने नाम से अभिव्यक्ति दे सकता है। यह हो भी रहा है। जैसा कि भारतीय बाज़ार व्यवस्था की योजना वह लेखक को केवल लिखने के दम पर पनपने नहीं दे सकती। यही कारण है कि राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और अपराध के विषयों पर प्रचार माध्यमों में प्रतिष्ठित लेखक हमेशा उसी लकीर पर चलते हैं जो एक बार बनाई तो उसके स्वामी हो गये। उथले विचारों और निरर्थक बहसों के साथ ही अंगभीर संवाद होता है। गंभीर विषय पर बात करते हास्य की बात कहकर अगर कहा जाये कि लोगों का जायका कदला जा रहा है तो समझ लीजिये कि लेखक-पाठक तथा वक्ता-श्रोता में सहज भाव की कमी है।
हम जब ब्लाग पर लिखते हैं तो यह लक्ष्य नहीं रखते कि कौन पढ़ रहा है बल्कि यह सोचते हैं कि हम लिख रहे हैं। पैसा नहीं मिलता। फोकटिया लेखक है इसलिये रचनायें हमेशा ही मनस्थिति से प्रभावित होती हैं। कुछ तो ऐसी हैं जो बहुत समय बाद पढ़ने पर ऐसा लगता है कि यह बेकार लिखा गया। जो अच्छी लगती हैं उन पर भी यह ख्याल आता है कि इससे अच्छा लिखा जा सकता था। आभासी दुनियां में यह शब्दों का सफर अपने होने की आत्ममुग्धता से भरपूर है। लोगों ने क्या समझा यह कभी विचार नहीं किया। लिखते लिखते हम क्या सीखे, नजरिये में कैसे सुधार आया, कई मिथक कैसे टूट गये, समाज की व्यवस्था में कैसे शिखर बनते बिगड़ते हैं, यह सब हमने इंटरनेट पर लिखते लिखते देखा। सच बात तो यह है कि हम पहले भी परंपरागत विषयों पर दूसरों के तर्क नहीं मानते थे तब बहस होती तो अपने तर्क ठोस ढंग से नहीं कह पाते। अब अपनेत तर्क हैं जिनसे किसी भी विषय पर किसी को भी घेरा जा सकता है। यह लिखने से आये आत्मविश्वास का ही परिणाम है। ईपत्रिका के दो लाख पठन/पाठक संख्या पर करने पर बस इतना ही है।
—————–
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Bharatdeep,Gwalior, madhyapradesh
http://dpkraj.blogspot.com

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बसंत पंचमी और महंगाई-हिन्दी व्यंग्य कविता (basant panchami aur mehangai-hindi vyangya kavita)


महंगाई बढ़ गयी है,
गर्मी पहले ही चढ़ गयी हैं,
मगर फिर भी लोग मनाकर जश्न
बसंत पंचमी का अहसास करायेंगे।
भूखे हैं पर कत्ल नहंी करते,
गरीब हैं पर भीख नहीं मांगते,
लोग अपनी खुशी यूं ही मनायेंगे।
लुटेरों के घर पहरे हैं
हुक्मरान बहरे हैं,
दान लूटकर कमीशन बता लिया,
किया व्यापार, कल्याण जता दिया,
आम इंसान लुटते रहे,
घुटते रहे,
फिर भी यह भारत की धरती है
जहां कभी सूख बरसाता कहर
तो कभी बसंत बरसती है,
यहां आग के देवता का डेरा है,
जलदेवता का भी बसेरा है,
हताशा के मौसम में भी
खून की नदियां बहते न देखकर
बुद्धिमान होते हैं निराश
हैरान है दुनियां
बसंत पंचमी में गरीबों के भी
मन खुशी के अहसास से लहरायेंगे।
————-

बसंत पंचमी के इस अवसर पर सभी पाठकों तथा ब्लॉग लेखक मित्रों को  हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ।

लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
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गर्मी के प्रकोप के साथ बसंत पंचमी का आगमन -हिन्दी लेख (basant panchami ka aagman aur garmi ka prakop-hinid lekh)


यह बसंत आया कि गर्मी आई! विश्व में मौसम अपने अपने नये अंदाज दिखा रहा है। सूर्यनारायण उत्तरायण क्या हुए सर्दी ने अपना बिस्तरा बांध लिया। इसके बाद कश्मीर में बर्फबारी हुई पर फिर भी सर्दी उस तरह वापस नहीं लौटी जैसे मकर सक्रांति के पहले थी। 2011 की बसंत पंचमी इतनी गर्म रहेगी इसका अनुमान उस समय नहीं लग रहा था जब इस वर्ष के प्रारंभ में ही सर्दी उग्र रूप में थी।
ग्वालियर में तापमान 6 फरवरी को 34 के पास पहुंच गया। यह उग्र गर्मी के मौसम की शुरुआत का संकेत होता है। इस बार भारत में विकट गर्मी रही तो बरसात भी जोरदार हुई। इसके बाद सर्दी भी जमकर पड़ी मगर मौसम विशेषज्ञों की चिंताऐं यथावत हैं। धरती का तापमान बढ़ रहा है। इसके लिये पूरे विश्व में गैसों का उत्सर्जन बताया जाता है। कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि इन गैसों का दुष्प्रभाव ओजोन परत पर पड़ता है जिसमें बहुत बड़ा छेद हो गया है जिसके कारण उस भाग से सूर्य की किरणें सीधे धरती पर आती हैं जिससे गर्मी बढ़ रही है। जहां तक हमारी जानकारी है उसके ओजोन परत एक तरह का कांच या वह सतह है जहां से सूर्य की किरणें बाधित होती हैं जिससे उनकी उष्मा कम हो जाती हैं और धरती का मौसम सामान्य बना रहता है। दूसरी भाषा में कहें तो आजोन परत एक छलनी की तरह है जो सूर्य की उष्मा की उग्रता को अपने में समेट लेती है ताकि धरती को परिष्कृत उष्मा मिल सके।
जहां विश्व के पर्यावरण को शुद्ध रखकर गैसों के उत्सर्जन पर नियंत्रण करने की बात आती है वहां विभिन्न देशों के राजनयिक नाटक करने लगते हैं और एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप कर अपने देश को स्वयं के पर्यावरण हितैषी होने का प्रमाण पेश करते हैं। चीन और भारत पर अमेरिका अधिक गैस उत्सर्जन होने का आरोप लगाता है तो यह दोनों उस पर ही तोहमत जमाते हैं। मुख्य बात यह है कि सारी दुनियां का राजतंत्र धनपतियों-पहले इसमें उद्योगपति और व्यापारी शामिल होते थे और आजकल अपराधी भी इस शब्द के हकदार हो गये हैं-के हाथ में है जो एक नहीं अनेक प्रकार से इस धरती का ही बल्कि अंतरिक्ष का भी वातावरण बिगाड़ रहे हैं। हम इनके निरंकुश होने पर यह कहकर नहीं रो सकते कि राज्यतंत्र इनके इशारों पर चल रहा है बल्कि अब तो यह सवाल भी उठने लगा है कि आम आदमी क्या कर रहा है? वह स्वयं भी तो इनके बनाऐ ऐजेंडे पर चल रहा है। बाज़ार और उसके प्रचार माध्यमों में विज्ञापित वस्तुओं के साथ ही सुविधाओं के भुगतान के लिये आम आदमी प्राणप्रण से जुटा है।
टीवी, फ्रिज, एसी, कूलर, तथा पर्यावरण प्रदूषित करने वाले वाहनों का प्रयोक्ता होने की आम आदमी में ऐसी आदत हो गयी है कि वह सड़क, उद्यान तथा ऐतिहासिक धरोहरों को भी अपनी उपभोग की वस्तु समझने लगा है। सड़कों को खोदना, उद्यानों को गंदा करना तथा एतिहासिक धरोहरों के प्रति बेपरवाही दिखाना आम आदमी ने अपना अधिकार समझ लिया है। हम यहां पर अमेरिका और चीन पर आक्षेप करने की बजाय अपने देश के गिरेबान में झांके। जिस तरह विशेषज्ञ बताते हैं उससे यह बात तो साफ लगती है कि गैसें आसानी से नष्ट नहीं होती। ऐसे में भारत में आबादी के साथ घरेलू गैस का उपभोग बढ़ा है। तय बात है यह चीन में भी बढ़ा होगा पर अमेरिका में जनंसख्या इतनी नहीं है। इसी गैस को लेकर यह सवाल उठता है कि जलने के बाद वह जाती कहां है? यकीनन वह इसी पर्यावरण में ही बहती है। वातावरण में जिस तरह अप्रत्याशित रूप से गर्मी बढ़ रही है उससे तो यही लगता है कि कहीं न कहंी मानव ही इसके लिये जिम्मेदार है। विशेषज्ञ क्या कहते हैं कि हम नहीं जानते पर रसोई की आग में गैस के बढ़ते उपभोग के साथ ही यह गर्मी हमने बढ़ती देखी है। अमेरिका के अनेक कारखाने भी इससे अनेक गुना गैस उत्सर्जन के लिये जिम्मेदार माने जाते हैं। हम उस पर आक्षेप करने का अनावश्यक उत्साह नहीं दिखाना चाहते। हमारे यहां रसोई गैस के बढ़ते उपयोग के साथ ही विकास के नाम पर चौड़ी सड़के करने के लिये अनेक पेड़ पौद्यों की बलि दी जा रही है। आम आदमी को जहां भूखंड में खुली जगह रखने का कहा जाता है वहां वह पक्के निर्माण करा लेता है। जिनका मन करता है वह सरकारी जमीन पर पेड़ लगाकर पर्यावरण हितैषी होने का दावा करते हैं। मतलब पर्यावरण संतुलन रखने के लिये आम आदमी अपने जिम्मे से बचना चाहता है।
यह बकवास लिखने का विचार आखिर क्यों आया? यह लेखक प्रतिदिन अक्सर पार्कों में जाता है। कुछ पार्क कभी साफ लगते हैं। ऐसा लगता है कि उनको कोई राजकीय कर्मी साफ कर गया होगा पर फिर वही हालत! वहां प्लास्टिक की पन्नियां, बिस्कुट के खाली पैकेटों के झुंड, शराब की बोतले और तंबाकु के पाउच देखने गंदगी के रूप में विराजते हुए देखे जा सकते हैं। यकीनन यह राजकीय कर्मियों ने नहीं वरन् उन लोगों ने किया होता है जो कथित रूप से प्रयोक्ता बनकर आते हैं। केवल दोहन करने की प्रवृत्ति पर सृजन और सतर्कता से मुंह फेरने की आम आदमी की इस आदत ने शिखर पुरुषों को बेलगाम बना दिया है। अकर्मण्य तथा अचिंतक समाज में थोड़ी सक्रियता से ही बेईमानों को सत्ता मिल जाती है। जब बसंत पंचमी पर ग्रीष्म पंचमी का अहसास हो तो पर्यावरण प्रदूषण के लिये अपनी भड़ास निकालने के लिये दूसरा और क्या लिखा जा सकता है?
बहरहाल 8 फरवरी पर बसंत पंचमी पर अपने ब्लाग लेखकों तथा पाठकों को बधाई।
लेखक दीपक भारतदीप 
कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
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आधुनिक तथा प्राचीन व्यवस्थाओं का संघर्ष-हिन्दी लेख


टुयूनिशिया तथा मिस्त्र की घटनाओं में जनआंदोलनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका दिखाई जरूर देती है पर शक की पूरी यह गुंजायश है कि विश्व में अप्रत्यक्ष रूप से शासन कर रहे पूंजीपतियों की इसमें कोई न कोई योगदान हो सकता है। संभव है कि यह वर्ग महसूस कर रहा हो कि तेल क्षेत्रों में उसका काम चलता रहे इसलिये जनता में फैले विद्रोह को हवा देकर अपने नये मुखौटे खाड़ी तथा अरब क्षेत्रों में लाये जायें। इससे उनको दो लाभ होंगे कि एक तो नये मुखोटे जनता को ताजा लगेंगे कि दूसरा यह कि पुराने मुखोटे इन पूंजीपतियों को अभी भी केवल एक प्रयोजक मानकर राजकाज के काम में उपेक्षा करते होंगे इसलिये नये मुखौटे लाकर उनको अपना सीधा वर्चस्प स्थापित किया जाये क्योंकि वह औकात से अधिक पद मिल जाने के कारण हमेशा दबे रहेंगे।
संभव ऐसा न हो। वाकई जनविद्रोह हो रहा हो, पर भारतीय प्रचार माध्यम जिस तरह दुनियां के पचास तानाशाहों के लिये खतरा बता रहे हैं वह कहीं न कहंी दुनियां के पूंजीपति और अपराधियों के गिरोह में व्याप्त एक सोच का प्रतिबिंब भी हो सकते हैं जो प्रजा तथा राज्य को भरमाये रखने के लिये हमेशा नये मुखौटे तलाशता है। यह तानाशाह अफ्रीकी तथा खाड़ी देशों में हैं। इनमें अधिकतर धार्मिक राज्य हैं और उन पर अपने धर्म के आधार पर आतंकवाद को शह देने का संदेह भी किया जाता है। मुख्य बात यह है कि प्रत्यक्ष भले ही इन राष्ट्रों के वर्तमान प्रमुख भ अमेरिका का पिछलग्गू होने का दावा न करें या संभव है इनमें से कुछ अमेरिका का विरोधी होने का नाटक करते हों पर कमोबेश सभी उसके बंधक हैं। यह सभी तेल उत्पादक राष्ट्र हैं जहां अमेरिकी कंपनियों का प्रभुत्व हैं जो कि अपने व्यापार के लिये राजनीति संस्थाओं को अपने कब्जे में लेकर काम करती हैं। कई जगह तो अमेरिकी सेना अपना डेरा डाले बैठी है। अधिकतर तेल उत्पादक राष्ट्र तानाशाही का शिकार हैं भले ही कई जगह लोकतंत्र का दिखावा किया जाता है। मुख्य बात यह है कि यह सभी धर्म पर आधारित संवैधानिक व्यवस्था वाले राष्ट्र हैं। मगर जिस लोकतंत्र के लिये वहां जनआंदोलन हो रहे हैं कहीं न कहंी उसके पीछे वहां के धार्मिक तत्वों की सक्रियता दिखाई दे रही है उससे नहीं लगता कि अगर वहां तख्ता पलट हुआ भी तो सही मायने में लोकतंत्र आयेगा। ईरान इसका एक उदाहरण है जहां राजशाही पलटकर लोकतंत्र के लिये आंदोलन एक मौलवी ने किया और बाद में वहां का धार्मिक तानाशाह बन बैठा।
मिस्र में जनविद्रोह के लिये धार्मिक स्थलों का उपयोग हुआ। दिन भी शुक्रवार का चुना गया। एशियाई देशों में धर्म की महत्ता है पर मुश्किल यह है कि जब इसकी आड़ लेकर कोई आंदोलन होता है तो वह धार्मिक ठेकेदारों के नेतृत्व में ही होता है। वैसे भारतीय प्रचार माध्यमों ने सीधे नाम नहीं लिया पर सऊदी अरब की तरफ बदलाव के उनके संकेत कोई व्यवाहारिक नहीं लगते। वहां के शासक धार्मिक आधार पर सबसे ज्यादा मज़बूती से टिके हैं। दुनियां के एक सौ बीस करोड़ से अधिक लोगों का पवित्र स्थान वहंीं है। तानाशाही का अंत अगर वहां होता है तो वह संसार का नक्श पलट सकता है। वहां जन आंदोलन की आहट तो है पर वह गुर्राहट नहीं है। वैश्विक आतंकवाद में गैर अमेरिकी विरोधी संगठनों को उसका खुला प्रश्रय मिलता है। भारत के अनेक वांछित लोग वहां जाते हैं। मज़े की बात यह है कि भारतीय रणनीतिकार कभी उसका नाम नहीं लेकर पाकिस्तान तक ही अपना लक्ष्य रखते हैं। सऊदी अरब में ऐसा कोई जनआंदोलन होता है तो उसके एतिहासिक परिणाम होंगे क्योंकि तब वहां जो दौर चलेगा वह पूरे विश्व को प्रभावित करेगा।
पश्चिमी देशों में धर्म की नाम पर ही तानाशाही है और राष्ट्र प्रमुख अपनी जनता का ध्यान अपनी समस्याओं से हटाकर दूसरी जगह धर्म की जंग कराकर इसलिये लगाते हैं ताकि वह अंधविश्वास में पड़ी रहे। वहां के शेखों का धर्म केवल पैसा बनाना तथा उसके लिये चाहे जैसी जुगाड़ करना है। वह अपरे देशों के सबसे बड़े अमीर हैं तो वहां शासन भी करते हैं। दुनियां भर में लोकतंत्र का हामी अमेरिका ही इन तानाशाह शेखों पर अपना हाथ रखे हुए है। ऐसे में अगर कहीं आंदोलन हो रहा है तो अमेरिका रणीनीतिकार आंखें मूंदें नहीं बैठे होंगे। संभव है कि वह कोई नया मुखोटा ट्यूनिशिया और मिस्र में लाना चाहते हों। यह भी हो सकता है कि आंदोलन के चलते वह कोई नया मुखोटा वहां लाने की योजना बना रहे हों। मिस्र में स्थिति खराब है पर उसमें जल्दी सुधार आयेगा यह संभव नहीं लगता। वह एक तेल उत्पादक राष्ट्र और वहां सक्रिय पूंजीपतियों का समूह कहीं न कहीं अपनी भूमिका निभा रहा होगा और यह यकीन करना कठिन है कि तख्ता पलट से उनके हितों पर कोई आंच आयेगी।
इन दोनों जगहों पर हो रहे जनआंदोलनों का अन्य देशों में विस्तार लेने की अभी कोई संभावना नहीं दिखती जैसा कि भारतीय प्रचार माध्यम बता रहे हैं। इसका कारण यह है कि पूंजीपतियों, अपराधियों तथा उनके पाले बुद्धिजीवी समूहों ने विश्व को इस तरह टुकड़ों में बांट दिया है कहीं भी सामान्य जनों में एकता संभव नहीं है-किसी राष्ट्रप्रमुख को हटाने के लिये आंदोलन चलाने के लिये कतई नहीं। ऐसे में वहां जो आंदोलन चल रहे हैं वहां व्यवस्थापक तो बदल सकते हैं पर व्यवस्था नहीं। इन आंदोलनों को विश्व में किसी नयी आशा का संकेत भी नहीं माना जा सकता क्योंकि कहीं न कहीं इन देशों में धर्म आधारित व्यवस्था रहनी है जो आंतकवाद का मार्ग प्रशस्त करती है। धार्मिक स्थलों पर अवकाश के दिन एकत्रित होकर लोगों के आंदोलन करने से तो यही निष्कर्ष निकलता है। आगे क्या होगा यह देखने वाली बात होगी।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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दिवाली(दीपावली) का शुभ दिन बीत गया-आलेख (hindi article on diwali festival


होश संभालने के बाद शायद जिंदगी में यह पहली दिवाली थी जिसमें मिठाई नहीं खाई। कभी इसलिये मिठाई नहीं खाते थे कि बस अब दिवाली आयेगी तो जमकर खायेंगे।  हमें मिठाई खाने का शौक शुरु से रहा है और कुछ लोग मानते हैं कि मिठाई के शौकीन झगड़ा कम करते हैं क्योंकि उनकी वाणी में मधुरता आ जाती है। हम भी इस बात को मानते हैं पर वजह दूसरी है। दरअसल अधिक मीठा खाने वाले मोटे हो जाते हैं इसलिये उनके झगड़ा करने की ताकत कम होती है।  अगर कहीं शारीरिक श्रम  की बात आ जाये तो हांफने लगते हैं। हमारे साथ भी यही होता रहा है, अलबत्ता हमने शारीरिक श्रम खूब किया है और साइकिल तो आज भी चलाते हैं।  हां, यह सच है कि मोटे अपने खाने की चिंता अधिक करते हैं क्योंकि उनके खाली पेट में जमा गैस उनको सताने लगती है जिसे हम भूख भी कहते हैं।  इसके बावजूद हम मानते हैं कि मोटे लोग शांतिप्रिय होते हैं-कहने वाले कहते रहें कि डरपोक होते हैं पर यह सच है कि कोई उन पर आसानी से हाथ डालने की भी कोई नहीं सोचता। 
दिवाली के अगली  सुबह बाजार में निकले तो देखा कि  बाजार में मिठाईयां बिक रही थीं। बिकने की जगह देखकर ही मन दुःखी हो रहा था।  इधर हम घर पर ही जब कभी खाने की कोई सामग्री देखने को मिलती है तो उसे हम स्वतः ही प्लेट से ढंकने लगते हैं।  मंगलवार हनुमान जी का प्रसाद ले आये और अगर कभी उसका लिफाफा खुला छूट गया तो फिर हम न तो खाते हैं न किसी को खाने देते हैं।  मालुम है कि आजकल पर्यावरण प्रदूषण की वजह से अनेक प्रकार की खतरनाक गैसें और कीड़े हवा में उड़कर उसे विषाक्त कर देते हैं।  ऐसे में बाजार में खुली जगह पर रखी चीज-जिसके बारे में हमें ही नहीं पता होता कि कितनी देर से खुले में पड़ी है-कैसे खा सकते हैं।  पिछले सात वर्षों से योग साधना करते हुए अब खान पान की तरह अधिक ही ध्यान देने लगे हैं तब जब तक किसी चीज की शुद्धता का विश्वास न हो उसे ग्रहण नहीं करते।  यही कारण है कि बीमार कम ही पड़ते हैं और जब पड़ते हैं तो दवाई नहीं लेते क्योंकि हमें पता होता है कि हम क्या खाने से बीमार हुए हैं? उसका प्रभाव कम होते ही फिर हमारी भी वापसी भी हो जाती है।
बाजार में सस्ती मिठाईयां गंदी जगहों के बिकते देखकर हम सोच रहे थे कि कैसे लोग इसे खा रहे होंगे।  कई जगह डाक्टरों की बंद दुकानें भी दिखीं तब तसल्ली हो जाती थी कि चलो आज इनका अवकाश है कल यह उन लोगों की मदद करेंगी जो इनसे परेशान होंगे।  वैसे मिठाई के भाव देखकर इस बात पर यकीन कम ही था कि वह पूरी तरह से शुद्ध होंगी।
ज्यादा मीठा खाना ठीक नहीं है अगर आप शारीरिक श्रम नहीं करते तो।  शारीरिक श्रम खाने वाले के लिये मीठा हजम करना संभव है मगर इसमें मुश्किल यह है कि उनकी आय अधिक नहीं होती और वह ऐसी सस्ती मिठाई खाने के लिये लालायित होते हैं।  संभवतः सभी बीमार इसलिये नहीं पड़ते क्योंकि उनमें कुछ अधिक परिश्रमी होते हैं और थोड़ा बहुत खराब पदार्थ पचा जाते हैं पर बाकी के लिये वह नुक्सानदेह होता है।  वैसे इस बार अनेक हलवाईयों ने तो खोये की मिठाई बनाई हीं नहीं क्योंकि वह नकली खोए के चक्कर में फंसना नहीं चाहते थे। इसलिये बेसन जैसे दूध न बनने वाले पदार्थ उन्होंने बनाये तो कुछ लोगों ने पहले से ही तय कर रखा था कि जिस प्रकार के मीठे में मिलावट की संभावना है उसे खरीदा ही न जाये।
पटाखों ने पूरी तरह से वातावरण को विषाक्त किया। अब इसका प्रभाव कुछ दिन तो रहेगा।  अलबत्ता एक बात है कि हमने इस बार घर पर पटाखों की दुर्गंध अनुभव नहीं की। कुछ लोगों ने शगुन के लिये पटाखे जलाये पर उनकी मात्रा इतनी नहीं रही कि वह आसपास का वातावरण अधिक प्रदूषित करते। महंगाई का जमाना है फिर अब आज की पीढ़ी-कहीं पुरानी भी- लोग टीवी और कंप्यूटर से चिपक जाती है इसलिये परंपरागत ढंग से दिवाली मनाने का तरीका अब बदल रहा है।
अपनी पुरानी आदत से हम  बाज नहीं आये। घर पर बनी मिठाई का सेवन तो किया साथ ही बाजार से आयी सोहन पपड़ी भी खायी।  अपने पुराने दिनों की याद कभी नहीं भूलते।  अगर हमसे पूछें तो हम एक ही संदेश देंगे कि शारीरिक श्रम को छोटा न समझो। दूसरा जो कर रहा है उसका ख्याल करो।  उपभोग करने से सुख की पूर्ण अनुभूति नहीं होती बल्कि उसे मिल बांटकर खाने में ही मजा है।  इस देश में गरीबी और बेबसी उन लोगों की समस्या तो है जो इसे झेल रहे हैं पर हमें भी उनकी मदद करने के साथ सम्मान करना चाहिए।  ‘समाजवाद’ तो एक नारा भर है हमारे पूरे अध्यात्मिक दर्शन में परोपकार और दया को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है ताकि समाज स्वतः नियंत्रित रहे। यह तभी संभव है जब अधिक धन वाले अल्प धन वालों की मदद बिना प्रचार के करें।  कहते हैं कि दान देते समय लेने वाले से आंखें तक नहीं मिलाना चाहिए।  इसके विपरीत हम देख रहे हैं कि हमारे यहां के नये बुद्धिजीवी डंडे और नियम कें जोर पर ऐसा करना चाहते हैं।  इसके लिये वह राज्य को मध्यस्थ की भूमिका निभाने का आग्रह करते हैं। इसका प्रभाव यह हुआ है कि समाज के धनी वर्ग ने सभी समाज कल्याण अब राज्य का जिम्मा मानकर गरीबों की मदद से मूंह फेर लिया है और हमारे सामाजिक विघटन का यही एक बड़ा कारण है।
खैर, इस दीपावली के निकल जाने पर मौसम में बदलाव आयेगा। सर्दी बढ़ेगी तो हो सकता है कि मौसम बदलने से भी बीमारी का प्रभाव बढ़े।  ऐसे में यह जरूरी है कि सतर्कता बरती जाये।  बदलते मौसम में सावधानी न बरतने से बुखार, खांसी तथा सर दर्द जैसी परेशानियां  आती हैं
इधर ब्लाग पर अनेक टिप्पणीकर्ता लिखते हैं कि आप अपना फोटो क्यों नहीं लगाते? या लिखते हैं कि आप अपना फोन नंबर दीजिये तो कभी आपके शहर आकर आपके दीदार कर ले। हम दोनों से इसलिये बच रहे हैं कि कंप्यूटर पर लिखने की वजह से हमारा पैदल चलने का कार्यक्रम कम हो गया है इसलिये पेट अधिक बाहरं निकल आया है। फोटो भी अच्छा नहीं खिंच रहा।  इसलिये सोचा है कि कल से योगासन का समय बढ़ाकर अपना चेहरा मोहरा ठीक करें तो फोटो खिंचवाकर लगायेंगे और नंबर भी ब्लाग पर लिखेंगे।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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हाक़ी के विशिष्ट दर्शक-हिंदी व्यंग्य (hocky ke vishisht darshak-hindi vyangya)


लगभग मृतप्रायः हो चुकी भारतीय हाकी को उबारने के लिये बल्ला और गेंद से खेलकर महान बन चुके भगवान अब दर्शक के रूप में अवतरित हो रहे हैं।
‘हमारे देश में हाकी         का विश्व कप हो रहा है, क्या उसे हम नहीं देखेंगे?’
‘मैं  अब खेलूगा नहीं बल्कि दर्शकों की तरह हाकी के मैच देखूंगा!’
‘अपने देश के हाकी खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ायें।’
इस तरह के नारे उस क्रिकेट खेल के खिलाड़ी दे रहे हैं जिसने राष्ट्रीय खेल कही जाने वाली हाॅकी को लगभग मृत स्थिति में पहुंचा दिया। अगर एतिहासिक उपलब्धियों की बात की जाये तो हाकी में भारत का खाता आज भी चमकदार है क्योंकि  ओलंपिक और विश्व कप उसके नाम पर दर्ज हैं जबकि क्रिकेट में केवल एक विश्व कप दर्ज है वह भी 1983 में मिला था।  उसके बाद भले ही बल्ले और बाल से खेलने  वाले धन कमाते रहे पर इस खाते में 2007 में एक बीस ओवरीय विश्व कप के अलावा कुछ अधिक नहीं जुड़ा।  हो सकता है कि देश के युवा क्रिकेट प्रेमी परीक्षण मैच-पांच दिवसीय, पचास ओवरीय तथा बीस ओवरीय-देखकर भले ही बहल जाते हों और खिलाड़ियों के विज्ञापनों से मिलने वाले प्रचार के साथ पैसे मिलने को देखकर युवा खेल प्रशंसिकायें उनकी दीवानी हो जाती हों पर सच यही है कि श्रेष्ठता के लिये वास्तविक पैमाना वैश्विक स्तर की प्रतियोगिताओं से ही प्रमाणित होता है।
हो सकता है कि अनेक युवा खेल   प्रशंसकों में कई ऐसे भी हों जिनको हाकी शब्द ही समझ में न आये।  कई युवाओं को यह खेल नया ईजाद किया हुआ भी लगा सकता है-क्योंकि उनकी स्मृति में हाकी का स्वर्णिम समय नहीं होगा। कुछ लोगो को यह भ्रम भी हो सकता है कि यही खिलाड़ी किकेट में तो अपनी टीम नहीं उबार सके पर शायद अब राष्ट्रीय खेल हाकी में कुछ जरूर कर दिखायेंगे।  देश की हाकी को इन दर्शक अवतारों के सहारे तारने की कोशिश हो रही है या उसके विश्व कप से जुड़ी विज्ञापन कंपनियों के लिये दर्शक जुटाने का यह प्रयास है, यह कहना कठिन है। 
पुराणों में कथा आती है कि जब जब प्रथ्वी पर संकट आता है तब वह सर्वशक्तिमान की दरबार में हाजिरी लगाकर अपना बोझ हल्का करने का आग्रह करती है और वह अवतार लेकर उसका उद्धार करते हैं। प्रथ्वी की सांसें शेष होती हैं इसलिये वह चलकर सर्वशक्तिमान के दरबार पहुंचती है।  यहां प्राणविहीन हाॅकी से यह आशा करना बेकार है कि उसने क्रिकेट के इन विज्ञापन  अवतारों के  ‘सजावट कक्ष’ में-अंग्रेजी में बोलें तो ड्रैसिंग रूम-में हाजिरी लगाई होगी।
मृतप्रायः हाकी समझकर कुछ लोग शायद समझें नहीं इसलिये यह बताना जरूरी है कि अगर यह विश्व कप भारत में नहीं हो रहा होता तो भारतीय टीम इसमें नहीं खेल सकती थी क्योंकि वह क्वालीफाइग दौर में बाहर हो चुकी थी-यानि इसमें भाग लेने का अवसर योग्यता के कारण नहीं बल्कि इसके आयोजन पर पैसा खर्च करने के कारण मिल रहा है। दूसरी भाषा में इसे कृपांक से पास होना भी कह सकते हैं-अपने यहां ऐसा भी होता है कि किसी कारण वश कहीं परीक्षा नहीं हो पाती तो सामूहिक रूप से विद्यार्थियों को पास कर दिया जाता है-यह भी इसी तरह का ही है।
ऐसा नहीं है कि भारतीय हाकी टीम की यह दुर्दशा केवल एक दिन में हुई है। बरसों से हाकी के प्रेमी और शुभचिंतक आर्त भाव से इसके कर्णधारों की तरफ देखते रहे, कुछ लोगों ने अपनी भावनायें अखबारों में भी व्यक्त की। हाॅकी के उद्धार करने के लिये कई महापुरुष प्रकट भी होते रहे पर नतीजा ढाक के तीन पात!

हाकी का विश्वकप कप होने की घोषणा भी कोई दो चार दिन पहले नहीं  हुई। चार साल पहले पता था-पर यह नहीं पता कि इसे जीतने के लिये क्या योजना बनी है? उल्टे कुछ दिन पहले खिलाड़ियों द्वारा वेतन तथा सुविधाऐं न मिलने की शिकायत करते हुए हड़ताल कर दी।  बड़ी हायतौबा मची।  इस देश में शिखर पर अभी भी सज्जन लोग हैं और वह भारतीय हाकी की मदद के लिये आगे भी आये।  अब यह मामला थम गया है पर भारतीय टीम किस स्थिति में है पता नहीं।
बाकी देशों का पता नहीं पर हमारे देश में अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताऐं केवल अपनी वैश्विक छबि बनाने के लिये आयोजित किये जाते हैं।  खेल तो जाये भाड़ में बस विश्व में सभ्य देश माना जाना चाहिये!  इस छबि का लाभ जिसे मिल सकता है वही उठा सकता है। जहां तक खिलाड़ियों का सवाल है तो जिसमें अपना दमखम हो खेल ले-अगर क्रिकेट के अलावा कोई अन्य खेल खेलता है तो अपने दम पर रोटी कमाये।  या फिर जिसे प्रचार चाहिये वह किसी भी अन्य खेल में आये और शिखर पुरुषों की जीहुजूरी कर टीम में स्थान बनाकर प्रचार प्राप्त करे-मतलब जिसे आत्मविज्ञापन की जरूरत हो वही दूसरा खेल खेले।  वैसे आजकल सभी प्रकार की खेल प्रतियोगितायें कंपनियों द्वारा ही प्रायोजित किये जाते हैं जिनको अपने विज्ञापन से मतलब होता है-आशय यह है कि हाकी खेल से अधिक कंपनियों के विज्ञापन महत्वपूर्ण है उसके लिये जरूरी है अधिक से अधिक लोग इसके मैचों को देखें।
अगले कुछ दिनों में हम देखेंगे कि अनेक ‘विज्ञापन नायक नायिकायें-फिल्मी अभिनेता अभिनेत्रियां और क्रिकेट के खिलाड़ी-हाकी के लिये अपने आपको विशिष्ट दर्शक के रूप में प्रस्तुत करते नज़र आयेंगे।  अब यह कहना कठिन है कि वह इन विज्ञापनों के लिये प्रत्यक्ष धन ले रहे हैं या ‘पुराने ग्राहकों’ के लिये उपहार स्वरूप अभिनय कर रहे हैं-अपने यहां पुराने व्यवसायिक संबंधो के आधार पर रियायत करने की पंरपरा है। अनेक बार दिवाली के अवसर पर अनेक चीजें बड़े व्यापारी छोटे व्यापारियों और ग्राहकों उपहार स्वरूप देते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि हाकी के विश्व कप को आकर्षण प्रदान करने के लिये प्रयास हो रहे हैं जिसका खेल से कोई अधिक संबंध नहीं दिखता।
जो हाॅकी के खेल को जानते हैं उनको पता है कि अपनी टीम का मनोबल बहुत गिरा हुआ है। खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाने की बात कहकर केवल विज्ञापनों के लिये दर्शक जुटाना भर है।  आखिर हाकी की विश्व कप प्रतियोगिता के लिये प्रायोजक तैयार कैसे हुए? जबकि उनके पास क्रिकेट और टेनिस जैसे भी खेल हैं जहां उनके विज्ञापन देखने वाले दर्शक पहले से ही अधिक होते हैं, तब हाकी की तरफ उनका ध्यान क्यों गया? शायद वह यह सोचकर ही शामिल हुईं होंगी कि इस देश से खेलों के नाम पर बहुत कमाया है चलो ‘हाकी’ के माध्यम से दर्शकों  को थोड़ा उपहार दे दो।  अब यह देखने वाली बात होगी कि भारत में  आयोजित इस हाॅकी प्रतियोगिता को कितना जनसमर्थन मिलेगा? अब वह पहले वाली बात नहीं है कि हाकी का विश्व कहीं भी हो लोग उसका इंतजार ऐसे ही करते थे जैसे कि आजकल क्रिकेट का करते हैं।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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मानवाधिकार-व्यंग्य आलेख (manvadhikar-vyanyga chittan)


वर्तमान भौतिकवादी युग में यह मानना ही बेवकूफी है कि कोई बिना मतलब के जनसेवा करता है। अगर लाभ न हो तो आदमी अपने रिश्तेदार को पानी के लिये भी नहीं पूछता। वैसे यह मानवीय प्रवृत्ति पुराने समय से है कि बिना मतलब के कोई किसी का काम नहीं करता पर आजकल के समय में कुछ कथित समाज सेवक देखकर यह साफ लगता है कि वह अप्रत्यक्ष रूप से लाभ लिये बिना काम नहीं कर रहे हैं । यही स्थिति मानवाधिकार के लिये काम करने वाले लोगों और उनके संगठनों के बारे में देखी जा सकती है। हम तो सीधी बात कहें कि जब हम किसी को जनकल्याण, मानवाधिकार या किसी अन्य सार्वजनिक अभियान चलाते हुए देखते हैं तो उसके उद्ददेश्य से अधिक इस बात को जानने का प्रयास करते हैं कि वह उसके पीछे कौनसा अपना हित साध कहा है।
आतंकवाद के बारे में कुछ विशेषज्ञों का स्पष्टतः मानना है कि यह एक उद्योग है जिसके सहारे अनेक दो नंबरी व्यवसाय चलते हैं। आंकड़े इस बात का प्रमाण है कि जहां आतंकवाद दृष्टिगोचर होता है वहीं दो नंबर का व्यापार अधिक रहता है। आतंकवाद को उद्योग इसलिये कहा क्योंकि किसी नवीन वस्तु का निर्माण करने वाला स्थान ही उद्योग कहा जाता है और आतंकवाद में एक इंसान को हैवान बनाने का काम होता है। इसी आतंकवाद या हिंसा का सहायक व्यापार मानवाधिकार कार्यक्रम लगता है। नित अखबार और समाचार पत्र पढ़ते हुए कई प्रश्न कुछ लोगों के दिमाग में घुमड़ते हैं। इसका जवाब इधर उधर ढूंढते हैं पर कहीं नहीं मिलता। जवाब तो तब मिले जब वैसे सवाल कोई उठाये। कहने का तात्पर्य यह है सवाल करने वालों का भी टोटा है।
बहरहाल एक बड़ा उद्योग या व्यवसाय अनेक सहायक व्यवसायों का भी पोषक होता है। मान लीजिये कहीं कपड़े के नये बाजार का निर्माण होता है तो उसके सहारे वहां चाय और नाश्ते की दुकानें खुल जाती हैं। वजह यह है कि कपड़े का बाजार है पर वहां रहने वाले दुकानदार और आगंतुकों के लिये खाने पीने की व्यवस्था जरूरी है। इस तरह कपड़े का मुख्य स्थान होते हुए भी वहां अन्य सहायक व्यवसाय स्थापित हो जाते हैं। कहीं अगर बुनकरी का काम होता है तो उसके पास ही दर्जी और रंगरेज की दुकानें भी खुल जाती हैं। यही स्थिति शायद आतंकवाद के उद्योग के साथ है। जहां इसका प्रभाव बढ़ता है वहीं मानवाधिकार कार्यकर्ता अधिक सक्रिय हो जाते हैं। उनकी यह बात हमें बकवाद लगती है कि वह केवल स्व प्रेरणा की वजह से यह काम कर रहे हैं। यह ऐसे ही जैसे कपड़े की बाजार के पास कोई चाय की दुकान खोले और कहे कि ‘मैं तो यहां आने वाले व्यापारियों की सेवा करने आया हूं।’
ऐसे अनेक निष्पक्ष विशेषज्ञ हैं जो भले ही साफ न कहते हों पर विश्व भर में फैले आतंकवाद के पीछे काम कर रहे आर्थिक तत्वों का रहस्ययोद्घाटन करते हैं पर वह समाचार पत्रों में अंदर के कालम में छपते हैं और फिर उन पर कोई अधिक नहीं लिखता क्योंकि विश्व भर में बुद्धिजीवियों को तो जाति, भाषा, धर्म, और क्षेत्र के नाम पर फैल रहे आतंकवाद की सच्चाई पर ध्यान देने की बजाय उसके कथित विषयों पर अनवरत बहस करनी होती है। अगर वह इस सच को एक बार मान लेंगे कि इसके पीछे दो नंबर का धंधा चलाने वाले किसी न किसी रूप से अपना आर्थिक सहयोग इसलिये देते हैं ताकि प्रशासन का ध्यान बंटे और उनका काम चलते रहे, तो फिर उनके लिये बहस की गुंजायश ही कहां बचेगी? फिर मानवाधिकार कार्यकताओं का काम भी कहां बचेगा, जिसके सहारे अनेक लोग मुफ्त का खाते हैं बल्कि प्रचार माध्यमों को अपने कार्यक्रमों की जगह भरने के लिये अपने शब्द और चेहरा भी प्रस्तुत करते हैं।
शक की पूरी गुंजायश है और यह टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में छपी सामग्री पर थोड़ा भी चिंतन करें तो वह पुख्ता भी हो जाता है। यहां यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि मानवाधिकारों का हनन हो रहा है। ऐसा कोई भी गांव या शहर नहीं है जो इससे मुक्त हो। अलबत्ता घटना केवल उन्हीं जगहों की सामने आती हैं जिनको प्रचार माध्यम इन्हीं मानवाधिकार कार्यकताओं के सहारे प्राप्त करते हैं।
आप जरा ध्यान से अखबार पढ़ें कि भारत के मध्य क्षेत्र में ऐसे अनेक एनकांउटर होते हैं जिनमें किसी कुख्यात अपराधी को मार दिया जाता है। उस पर उसके परिवार वाले विरोध भी जताते हैं पर वहां कोई मानवाधिकार कार्यकर्ता या संगठन सक्रिय नहीं होता क्योंकि इसके लिये उनको कोई प्रायोजक नहीं मिलता। प्रायोजक तो वहीं मिलेगा जहां से आय अच्छी होती हो। सीमावर्ती क्षेत्रों से तस्करी और घुसपैठ को लेकर अनेक संगठन कमाई करते हैं और इसलिये वहां आतंकवादियों की सक्रियता भी रहती है। इसलिये वहां सुरक्षाबलों से उनकी मुठभेड भी होती है जिसमें लोग मारे जाते हैं। मानवाधिकर कार्यकर्ता वहां एकदम सक्रिय रहते हैं। उनकी सक्रियता पर कोई आपत्ति नहीं है पर मध्य क्षेत्र में उनकी निष्क्रियता संदेह पैदा करती है। पूर्वी क्षेत्र को लेकर इस समय हलचल मची हुई है। हिंसक तत्व वहां की प्राकृत्तिक संपदा का दोहन करने का आरोप लगाते हुए सक्रिय हैं। वह अनेक बार अनेक सामान्य सशस्त्र कर्मियों को मार देते हैं पर इन हिंसक तत्वों में कोई मरता है तो मानवाधिकार कार्यकर्ता उसका नाम लेकर चिल्लाते हैं। सवाल यह है कि क्या यह मानवाधिकार कार्यकर्ता यह मानते हैं कि सामान्य सुरक्षा अधिकारी या कर्मचारी का तो काम ही मरना है। उसका तो कोई परिवार ही नहीं है। उसके लिये यह कभी आंसु नहीं बहाते।
कुछ निष्पक्ष विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि अगर कहीं संसाधनों के वितरण को लेकर हिंसा हो रही है तो वह इसलिये नहीं कि आम आदमी तक उसका हिस्सा नहीं पहुंच रहा बल्कि यह कि उसका कुछ हिस्सा हिंसक तत्व स्वयं अपने लिये चाहते हैं। इसके अलावा यह हिंसक तत्व आर्थिक क्षेत्र की आपसी प्रतिस्पर्धा में एक दूसरे को निपटाने के काम भी आते हैं
इसके बाद भी एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि कुछ लोगों ने तो बड़ी बेशर्मी से खास जाति, भाषा और धर्म के समूह पकड़ कर उनके मानवाधिकारों के हनन का प्रचार कर रखा है। इसमें भी उनका स्वार्थ दिखाई देता है। इनमें अगर जातीय या भाषाई समूह हैं तो उनका धरती क्षेत्र ऐसा है जो धन की दृष्टि से उपजाऊ और धार्मिक है तो उसके लिये कहीं किसी संस्था से उनको अप्रत्यक्ष रूप से पैसा मिलता है-उनकी गतिविधियां यही संदेह पैदा करती हैं। इधर फिर कुछ ऐसे देश अधिक धनवान हैं जो धर्म पर आधारित शासन चलाते हैं और उनके शासनध्यक्षों से कृपा पाने के लिये कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ता उनके धर्म की पूरे विश्व में बजा रहे हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि यह मानवाधिकार कार्यक्रम चलाने वाले जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र की दृष्टि से बंटे समाज में ऐसे छिद्र ढूंढते हैं जिनको बंद करने का प्रयास सुधारक करते हैं।
अखबार में एक नहीं अनेक ऐसी खबरें छपती हैं जिनमें मानवाधिकार हनन का मामला साफ बनता है पर वहां कार्यकर्ता लापता होते हैं। कल एक ब्लाग में पढ़ने को मिला जिसमें बताया कि सरकार ने धारा 498-ए के तहत मामले छानबीन के बाद दर्ज करने का आदेश जारी किया है क्योंकि पाया गया कि इसमें फर्जी मामले दर्ज हुए और शिकायत में ढेर सारे नाम थे पर छानबीन के बाद जांच एजेंसियों ने पैसा खाकर कुछ लोगों को छोड़ा। इतना ही नहीं कई में तो शिकायत ही झूठी पायी गयी। इससे अनेक लोगों को परेशानी हुई। इस तरह के कानून से हमारे भारतीय समाज के कितने लोगों को परेशानी झेलनी पड़ी है इस पर कथित रूप से कोई मानवाधिकार संगठन कभी कुछ नहीं बोला। सरकार ने स्वयं ही यह काम किया। यह कैसे मान लें कि सरकार समाज का दर्द नहीं जानती। मानवाधिकार कार्यकर्ता तो केवल चिल्लाते हैं पर सरकार अपना काम करती है,यह इसका प्रमाण है
सच तो हम नहीं जानते। अखबार और टीवी के समाचारों के पीछे अपने चिंत्तन के घोड़े दौड़ाते है-हमारे गुरु जी का भी यही संदेश है- तब यही सवाल हमारे दिमाग में आते हैं। दूसरा हमारा फार्मूला यह है कि आज कल कोई भी आदमी बिना स्वार्थ के समाज सेवा नहीं करता। फिर उनके चेहरे भी बताते हैं कि वह कितने निस्वार्थी होंगे। हम ब्रह्मा तो हैं नहीं कि सब जानते हों। हो सकता है कि हमारी सोच में ही कमी हो। एक आम लेखक के रूप में यही अभिव्यक्ति दिखी, व्यक्त कर दी।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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रामचरित मानस की चर्चा-चिंतन आलेख (ramcharit manas-hindi article)


रामचरित मानस लिखने के 387 वर्ष बाद एक संत ने यह शोध प्रस्तुत किया है कि उसमें व्याकरण और भाषा की तीन हजार गल्तियां हैं। हाय! भगवान राम जी के भक्त यह सुनकर उद्वेलित हो जायेंगे कि ‘देखो, रामचरित मानस का अपमान हो रहा है।’

शायद ऐसा न हो क्योंकि वह भारतीय धर्म से ही जुड़े एक संत हैं अगर ऐसा न होता तो उस पर अनेक लोग क्रोध प्रकट कर चुके होते। तुलसीदासजी ने रामचरित मानस बड़े पावन हृदय से लिखा था इसमें संदेह नहीं है। एक तो कवि मन होता ही बहुत भोला है दूसरे उन्होंने पहले ही अपने विरोधियों को यह बता दिया था कि उनका भाषा ज्ञान अल्प है-क्षमा याचना भी पहले ही कर ली थी।
यह अलग बात है कि 387 वर्ष बाद -भई, यह आंकड़ा हमें टीवी पर ही सुनाई दिया, अगर गलती हो तो क्षमा हम भी मांग लेते हैं- एक संत को यह क्या सूझा कि उसमें दोष ढूंढने बैठ गये। अगर कोई प्रगतिशील होता तो उस पर तमाम तरह की फब्तियां कसी जा सकती थीं यह कहते हुए कि ‘आप तो उसमें दोष ही ढूंढोगे’ मगर वह तो विशुद्ध रूप से पंरपरावादी विद्वान हैं। फिर संत! हमारे समाज मे जो भी कोई संतों का चोगा पहन ले वह पूज्यनीय हो जाता है-फिर लोग उसकी नीयत का फैसला उसी पर छोड़कर उसे प्रणाम करते हुए अपनी राह पकड़ते हैं। वैसे आजकल तो कथित संतों पर फब्तियां कसने वालों की कमी नहीं है पर वह लोग भी सावधानी बरतते हैं कि कहीं अधिक न लिखें।

हम भाषा से पैदल रहे हैं-इससे कमी से स्वतः ही अवगत हैं। कभी कभी कोई शब्द लिखने से कतराते हैं कि कहीं पढ़ने वाले भाषा ज्ञान को संदिग्ध न मान ले। हिंदी के बारे में हमारे गुरु की बस एक ही बात हमारे गले उतरी कि ‘जैसी बोली जाती है वैसी लिखी जाती है।’ फिर इधर हमने यह भी बात गांठ बांधली है कि ‘यहां हर पांच कोस पर बोली बदल जाती है’,मतलब किसी शब्द पर कोई बहस करे तो उससे पूछ लेते हैं कि हमसे कितना दूर रहता है? उसके पता बताने पर जब अपने घर से पांच कोस की दूरी अधिक मिलती है तो कह देते हैं कि-‘भई, हमारे इलाके में ऐसा ही है। तुम ठहरे दूर इलाके के। हमारे यहां जैसा बोला जाता है वैसा ही तो लिखा भी जायेगा न! हिंदी का नियम है।’
मगर संतों से बहस कैसे करें-तिस पर तुलसीदास जी की भाषा हिंदी की सहयोगी भाषा रही हो तब तो और भी कठिन है-संभव हो वह संत उस भाषा के ज्ञाता हों और उनके निवास की पांच कोस की परिधि मेें ही रहते हों। फिर हम तो उस प्रदेश के बाहर के ही हैं जहां तुलसीदास जी बसते थे और संभवतः संत उन्हीं के प्रदेश के हैं। एक बात तय रही कि तुलसीदास कोई दूसरा बन नहीं सकता-पर बनने की चाहत सभी में है। कई लोग इसके लिये संघर्ष करते हुए स्वर्ग में जगह बनाने में सफल रहे पर नहीं मिला तो तुलसीदास जी जैसा वह पद, जिसकी जगह लोगों के हृदय में सदैव रहती है।

तुलसीदास जी की रामचरित मानस न केवल भाषा साहित्य बल्कि अध्यात्मिक दृष्टि से भी बहुत महत्व रखती है। पहले एक पुस्तक आती थी जिसमें तुलसीदास जी को समाज का पथप्रदर्शक न बताकर पथभ्रष्ट बताया जाता था। उसमें बताया गया कि उन्होंने बाल्मीकी रामायण के श्लोकों का हुबहु अनुवाद भर किया है। इसके अलावा भी तमाम तरह की टीका टिप्पणियां भी थी।
इस पर हमने एक अखबार में संपादक के नाम पत्र में लिखा था-हां, हमारे अधिकतर कचड़ा चिंतन वहीं जगह पाते थे-कि ‘चलिये, सब बात मान ली। मगर एक बात हम कहना चाहते हैं कि उस दौर में जब समाज के सामने वैचारिक संकट था तब भगवान श्रीराम जी के चरित्र को लगभग लुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी संस्कृत भाषा से निकालकर देशी भाषा में इतने बृहद ढंग से प्रस्तुत करने का जो काम तुलसीदास जी ने किया उसके लिये समाज उनका हमेशा ऋणी रहेगा। इसका केवल साहित्य महत्व नहीं है बल्कि उन्होंने राम को इस देश जननायक बनाये रखने की प्रक्रिया को निरंतरता प्रदान की जो संस्कृत के लुप्त होने के बाद बाधित हो सकती थी। वैसे राम चरित्र भारत में सदियों गाया जाता रहेगा पर रामचरित मानस ने उसे एक ऐसा संबल दिया जिससे उसमें अक्षुण्ण्ता बनी रहेगी।’
वैसे तुलसीदासकृत राम चरित मानस एक भाव ग्रंथ है। उसमें शब्द गलत हों या सही पर वह पढ़ने वाले के हृदय को उनके भाव वैसे ही छूते हैं जैसे उनका अर्थ है। उसमें भाषा और व्याकरण संबंध त्रुटियों को निकलाने की क्षमता शायद ही किसमें हो क्योंकि अपने यहां बोली वाकई हर पांच कोस पर बदलती है। अभी भी गांव से जुड़े शिक्षित लोग शहर में आकर ‘इतके आ’, ‘काहे चलें’ ‘वा का मोड़ा’ तथा कई ऐसे शब्द बोलते हैं पर उनकी बात पर कोई आपत्ति नहीं करता। वजह! वह अपने अर्थ के अनुसार भाव को संपूर्णता से प्रकट करते हैं। इनको आप भाषा संबंधी त्रुटि मानकर अपनी अज्ञानता और असहजता का परिचय देते हैं।
आखिरी बात संत कहते हैं कि दूसरे में दोष मत देखो। उनकी बात सिर माथे पर। संत एक सामाजिक चिकित्सक हैं इसलिये उनको तो इलाज करने के लिये दोष और विकार देखने ही पड़ते हैं-यह भी सच! मगर एक सच यह भी है कि संत को किसीके दोषों की चर्चा दूसरों के सामने-कम से कम सार्वजनिक रूप से-तो नहीं करना चाहिए। वैसे उस संत की महत्ता ज्ञानियों की दृष्टि में कम हो जाती है जो दूसरों के दोष इस तरह गिनाते हैं। कहते हैं कि तुलसीदासकृत रामचरित मानस में तीन हजार गल्तियां ढूंढने वाले विद्वान ने स्वयं भी अस्सी पुस्तके लिखी हैं, मगर इससे उनको इस तरह की टिप्पणी से बचना ही चाहिये था।
आप कितने भी अच्छे हिंदी भाषी ज्ञाता हों पर लेखक अच्छे नहीं हो जाते। लेखक होते हैं तो भी पाठक पसंद करे तो यह जरूरी नहीं। यह सच है कि लिखने में जितना हो सके त्रुटियों से बचें पर यह भी याद रखें दूसरे के लिखे का अगर भाव सही मायने में प्रकट हो तो आक्षेप न करना ही अच्छा। दूसरी बात हिंदी का यह नियम याद रखें कि जैसी बोली जाती है वैसी ही लिखी जाती है। ऐसे में यह भी देखना चाहिये कि लेखक किस इलाके का है और उसका शब्द कहीं ऐसे ही तो नहीं बोला जाता। सच तो यह है कि तुलसीदास जी की रामचरित मानस एक शाब्दिक या साहित्य रचना नही बल्कि भाव ग्रंथ है और उसमें तीन लाख त्रुटियां भी होती तो इसकी परवाह कौन करता जब समाज का वह अभिन्न हिस्सा बन चुका है। वैसे इसकी टीवी पर चर्चा सुनी तो लगा कि संभव है कि इस बहाने उस पर अपनी विद्वता दिखाने और प्रचार पाने का एक नुस्खा हो।
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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।

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हिंदी ब्लाग अंग्रेजी से आगे निकल सकते हैं-आलेख (hindi blog, inglish blog-hindi article)


अंतर्जाल पर कौन कितना सफल है यह तो कहना कठिन है क्योंकि यहां अनेक तरह के फर्जीवाड़े हैं जिनको समझना एक कठिन काम है। चाहे किसी भी भाषा के ब्लाग हैं उनको लेकर अनेक तरह के भ्रम बने ही रहते हैं। अनेक दिलचस्प बातें सामने आती हैं। लोग तमाम तरह की वेबसाईटों पर अपने ब्लाग की रेटिंग दिखाकर अपने को सबसे सफल ब्लाग या वेबसाईट लेखक होने का दावा भी करते हैं। अनेक लोगों को तो यह लगता है कि हम तो अच्छा लिख नहीं रहे इसलिये सफल नहीं है।
अनेक समझदार ब्लाग लेखक ऐसी बातें लिख जाते हैं उनके आशय कुछ भी लिये जा सकते हैं। अभी कुछ दिनों पहले एक समाचार था कि अंतर्जाल पर लिखे जा रहे ब्लागों को एक ही आदमी पढ़ता है। इसका आशय यह भी हो सकता है कि लेखक स्वयं ही पढ़ता है या यह भी हो सकता है कि जिन वेबसाईटों पर ब्लाग बने हैं वहीं से उनकी सामग्री देखी जा सकती है या कहीं उनके द्वारा कुछ लोग इसके लिये नियुक्त हैं जिन्हें रोज ब्लाग पर व्यूज भेजने के लिये रखा गया है।
एक कमाने वाले ब्लाग लेखक ने लिखा था कि ‘हजारों ऐसे पाठक लेकर क्या करूंगा जिनसे मुझे एक पैसा भी न मिले। मुझे तो दस ऐसे ही पाठक काफी हैं जो मेरे विज्ञापनों से मुझे आय अर्जित करायें।’
अब सच क्या है कोई नहीं जानता। अलबत्ता इतना तय है कि अनेक तरह के फर्जीवाड़े संभावित हैं इसलिये यह कहना कठिन है कि कौन कितना सफल है? यह बात केवल ब्लाग लेखकों तक नहीं बड़ी बड़ी वेबसाईटों पर भी लागू होती है। अलबत्ता आॅनलाईन से जनता का काम करने वाली व्यवसायिक वेबसाईटें जरूर अधिक देखी जाती हैं पर वह सफलता और असफलता के दायरे से बाहर हैं। संभव है कोई ऐसा ब्लाग या वेबसाईट लेखक हो जिसको एक हजार पाठक रोज देखते हों और वह कमाता भी हो तो उसे सफल मान लिया जाये और जिसे सौ पाठक देखते हों और वह न कमाता हो उसे असफल मान लिया जाये। इसमें एक पैंच ही फंसता है कि जिसके पास सौ पाठक हों संभव है वह पूरी तरह से सौ हों और जिसके पास हजार हों उसके लिये केवल बीस ही सक्रिय हों। जो ब्लागर कमा रहे हैं उनकी इस बात के लिये प्रशंसा करना चाहिए कि वह आय अर्जित करने का गुर सीख गये हैं और नये लोगों को उनसे प्रेरणा भी लेना चाहिए। मुश्किल यह है कि जिनके लिये अंगूर खट्टे हैं वह कैसे संतोष करें। न पैसा मिले न प्रतिष्ठा उनके लिये क्या है यहां पर? ऐसे में उनके पास एक ही चारा है कि वह अपने पास ऐसे कांउटर लगायें जिससे पता लगे कि उनको कितने लोग पढ़ रहे हैं और कहीं मित्र लोग ही तो केवल फर्जी व्यूज नहीं दे रहे क्योंकि सफलता का भ्रम तो असफलता से भी अधिक बुरा होता है।
इधर हमने शिनी का स्टेट कांउटर लगाकर देखा। यह कांउटर केवल वर्डप्रेस के ब्लाग पर लगाया यह देखने के लिये कि आखिर देखें तो सही कि हमारे ब्लाग किस दिशा में जा रहे हैं। इस कांउटर के साथ अच्छी बात यह है कि इसने ब्लाग के वर्गीकरण कर दिये हैं। पंजीकृत समझ में अधिक नहीं आया पर जो उचित लगा वह वर्ग ले लिया। इसमें मनोरंजन और साहित्य के अलग अलग वर्ग लिये।
इसका अवलोकन करने के बाद करने पर पता चला कि अंग्रेजी के ब्लागों पर भी अब हिंदी ब्लाग की बढ़त बन सकती है। इतना ही नहीं यौन सामग्री से सुसंज्जित सामग्री के मुकाबले भी साहित्य का स्थान बन सकता है। इस कांउटर पर अभी अन्य ब्लाग अधिक पंजीकृत नहीं है इसलिये यह कहना कठिन है कि उनके मुकाबले इस लेखक के ब्लाग का क्या स्तर है? अलबत्ता प्रारंभ में ही हिंदी ब्लागों को पचास में 10 से 13 तक अंक और समाज में ई पत्रिका और दीपक बापू कहिन को साहित्य वर्ग मे 22, 23 स्थान मिलना अच्छा संकेत है। वैसे हिंदी पत्रिका को मनोरंजन के अन्य वर्ग में 82 वां स्थान मिला है पर वहां उसके सामने अंग्रेजी ब्लाग हैं जो शायद अधिक पढ़े जाते है। यह ब्लाग दो दिन पहले तक 92 वें स्थान पर था। यह आंकड़े ऊपर नीचे होंगे। यह कोई बड़ी सफलता का प्रमाण भी नहीं है पर इससे एक बात साफ है कि अंतर्जाल पर हिंदी की पाठक संख्या ठीक ठाक है और भविष्य में हिंदी ब्लाग अंग्रेजी को जरूर चुनौती देंगे। वैसे ब्लाग स्पाट के ब्लाग की सफलता का सबसे अच्छा आंकलन गूगल विश्लेषण प्रस्तुत करता है जिसका दावा है कि वह आपको फर्जी व्यूज से भ्रमित होने से बचाता है। इसके बावजूद अन्य वेबसाईटों पर भी ब्लाग की स्थिति देखी जा सकती है पर उनके साफ्टवेयरों पर अनेक लोग संदेह जाहिर करते हैं। अलबत्ता शिनी ने जो अलग वर्ग बनाये हैं वह एक अच्छी बात है। हमने यह कांउटर एक किसी हिंदी ब्लाग लेखक के ब्लाग से दो सप्ताह पहले ही लिया था पर यह पता नहीं वह किस श्रेणी में पंजीकृत हैं क्योंकि हमने अपनी श्रेणियों में उनको देखने का प्रयास किया था पर दिखाई नहीं दिया। यहां यह भी याद रखने लायक है कि अनेक वेबसाईटें ऐसी हैं जो वहां पंजीकरण कराने पर रैकिंग देती हैं इसलिये उनको लेकर अपना यह दावा करना ठीक नहीं लगता कि हम सफल हैं, क्योंकि संभव है कि अन्य अपंजीकृत ब्लाग हमसे भी श्रेष्ठ हो सकते हैं।

हां, एक मजेदार बात सामने आई। कहा जाता है कि अधिकतर ब्लाग को एक आदमी पढ़ता है। लेखक समेत हम दो मान लें तो सफलता का एक पैमाना यह भी होता है कि आपके ब्लाग को तीसरा आदमी भी पढ़ता दिखे। इस काउंटर पर हमने अपने ब्लाग पर आनलाईन पाठक की संख्या पांच से सात तक देखी है। इसका आशय यह है कि हमारे ब्लाग उस दायरे से तो बाहर निकल गये हैं जो उसे एक या दो पाठक तक ही सीमित रहते हैं।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

हिन्दी के कवि और शायर बिना पढ़े ही गीता पर लिखते हैं-हिन्दी आलेख (Hindi poet writes on without reading the Gita – Hindi article)


              अक्सर अनेक कवितायें, शायरियों गीत, और गद्य रचनायें हमारे सामने आती हैं जिसमें भारतीय धर्म ग्रंथों के साथ ही अन्य धर्मों की पवित्र पुस्तकें भूलकर इंसान से प्रेम करने का संदेश शामिल होता है। जिन कवियों और शायरों को देशभक्ति, एकता और धार्मिक सद्भावना सुसज्जित कर अपनी रचनाओं में दिखानी होती है वह अक्सर भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों के साथ ही अन्य धार्मिक ग्रंथों पर भी बरसने लगते हैं। इस पर कोई आपत्ति नहीं करता क्योंकि अपने देश के लोगों का यह रवैया है कि चलो हमारे साथ दूसरे धर्म की पुस्तक को भी भुलाने की बात तो कही। हमारा कान पकड़ तो दूसरे का भी तो नहीं छोड़ा।
              अगर कोई कवि या शायर अकेली यह बात कहे कि श्री रामायण या श्री रामचरित मानस पढ़ना छोड़ दो, श्रीगीता और वेद पुराण और श्रीगीता भूल जाओ तो उस पर हाहाकार मच जायेगा। लोग उस पर छद्म धर्मनिरपेक्ष होने का आरोप लगा देंगे। अगर उसने किसी अन्य धर्म का नाम लिया तो उस पर सांप्रदायिक होने का आरोप लग जायेगा। अगर भारतीय अध्यात्म ग्रंथों के साथ अन्य धर्म की पुस्तकों को त्यागने की बात कोई शायर, कवि या निबंधकार कहता है तो कोई उस पर ध्यान नहीं देता। चलो हमें काना कहा तो दूसरे को भी तो एक आंख वाला कहा।
                अगर कोई अन्य भारतीय धर्मग्रंथ की बात कहे तो हम भी मुंह  फेर सकते हैं पर जब मामला श्रीगीता का हो तब बात हमें कुछ जमती नहीं। हमें याद है कि बचपन में हमने जब हिंदी का प्रारंम्भिक ज्ञान प्राप्त किया था तब महाभारत ग्रंथ पढ़ते समय हमने श्रीगीता को पढ़ा था तब समझ में नहीं आया, पर कहते हैं कि बचपन में कोई बात भले ही समझ में न आये पर उसका अर्थ कहीं न कहीं आदमी के जेहन में रहता है। यही हाल हमारे साथ श्रीगीता का हुआ। अन्य किसी धर्मग्रंथ से जब भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथ की तुलना किसी फिल्मी या साहित्यक गीत, कविता, शायरी या आलेख में होती तो हम सहजता से लेते पर श्रीगीता का नाम आते ही असहज होते हैं। जब हिंदी का पूर्णता से ज्ञान हुआ तब पता लगा कि यह दुनियां की इकलौती ऐसी पुस्तक है जिसमें ज्ञान और विज्ञान है। समय के साथ हम भी चलते रहे पर श्रीगीता का ज्ञान कहीं न कहीं हमारे मस्तिष्क में रहा। इस पर अनेक लेख समाचार पत्रों में भेजे पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। तब हम सोचते थे कि हो सकता है कि हमारे लिखे में कमी हो।

               इधर जब से अंतर्जाल पर लिखने का सौभाग्य मिला तो हमने सोचा कि चलो यहां अपनी अध्यात्मिक भूख भी मिटा लो। ऐसा करते हुए हमारा ध्यान श्रीगीता की तरफ जाना स्वाभाविक था। सच बात तो यह है कि अंतर्जाल पर लिखने से पहले हम इतना नहीं लिखते थे पर कहते हैं कि लिखते लिखते लव हो जाये। जब भी अवसर मिलता है श्रीगीता पर अवश्य लिखते हैं और यही लिखते लिखते हमें ऐसा लग रहा है कि या तो हम ही कुछ दिमाग से विचलित हैं या फिर शायर और कवि लोग ही सतही रूप से लिखते रहे हैं। एक तरह से वह कार्ल माक्र्स और अंग्रेजों के चेलों की संगत में नारे और वाद ढोने आदी हो गये हैं।
                नारों और वाद पर चलने के आदी हो चुके इस समाज से यह आशा ही नहीं करना चाहिये कि वह कवियों और शायरों की चालाकियों को समझकर उनकी योग्यता पर उंगली उठाये। हम तो दूसरी बात कहते हैं कि जिस विषय पर आप जानते नहीं उस पर नहीं लिखें। हमने केवल भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथ ही पढ़े हैं इसलिये उन पर लिखते हैं-वह भी सकारात्मक पक्ष में। न तो हमने विदेशी लेखकों को पढ़ा है न ही गैर भारतीय धर्म ग्रंथों को देखा है इसलिये उन पर नहीं लिखते। उनकी आलोचना भी नहीं करते क्योंकि उर्दू शायरों की यह प्रवृत्ति हमें बिल्कुल नहीं भाती कि बिना जाने ही किसी विषय पर भी कुछ लिखने लगो।
एक सवाल हमारे दिमाग में आता है कि अगर कोई अन्य धर्म का भारतीय व्यक्ति भारतीय धर्म ग्रंथ पर कुछ प्रतिकूल बात कहता है तो हम उस पर चढ़ दौड़ते हैं चाहे भले ही उसने अपने धर्म ग्रंथ पर भी प्रतिकूल लिखा या कहा हो पर अगर कोई भारतीय धर्म का व्यक्ति ऐसा करे तो उसे हम सामान्य कहकर नजरअंदाज करते हैं-क्या यह हमारी बौद्धिका संकीर्णता का प्रमाण नहीं है।
              दरअसल हुआ यह है कि उर्दू शायरों की लच्छेदार शायरियों से प्रभावित होकर जब देश के लोग वाह वाह करने लगे होंगे तो तो हिंदी कवि भी इसी राह पर चल पड़े होंगे। इसमें भी एक पैंच हैं। भले ही उर्दू और हिंदी समान भाषायें लगती हैं पर दोनों का भाव अलग है। एक बार धर्म को लेकर मामला बढ़ गया था तब एक विद्वान ने कहा कि अंग्रेजी में रिलीजन शब्द का भाव सीमित है पर हिंदी में धर्म शब्द का भाव बहुत व्यापक है। यही हाल उर्दू का है। उर्दू का प्यार शब्द दैहिक संबंधों तक ही सीमित है जबकि हिंदी का प्रेम शब्द इतना व्यापक है कि उसे इंसान के अलावा सर्वशक्तिमान और अन्य जीवों से भी जोड़ जाता है और उसे तभी समझा जा सकता है जब हमारे अपने आध्यात्मिक ज्ञान के प्रति आस्था हो। मुख्य बात संकल्प की है और हिंदी के प्रेम शब्द का उच्चारण करते ही हमारे अंदर समस्त जीवों के प्रति दया, करुणा और सहृदयता का भाव आता है।

                बात कहां से शुरु हुई और कहां पहुंच गयी। उर्दू शायरों में केवल श्रोताओं और लेखकों में सतही भाव पैदा करने की ललक होती है। इसके विपरीत हिंदी कवियों में इसके साथ ही अध्यात्मिक ज्ञान जाग्रत करने का भाव भी पैदा होता है। मगर उर्दू शायरों की सफलता ने हिंदी कवियों को भी पथभ्रष्ट कर दिया है। यही कारण है कि कबीर, रहीम, तुलसी और मीरा के बाद फिर कोई कवि रत्न पैदा ही नहीं हुआ। यह शिकायत नहीं है और न ही किसी कवि विशेष के विरुद्ध प्रचार है बल्कि अपनी बात कहने का अंतर्जाल पर कहने का जो अवसर मिला है उसका लाभ उठाने का एक प्रयास भर है। हमें तो हर पाठक और लेखक प्रिय है। जो लिखने और पढ़ने में परिश्रम करते हैं। परिश्रम करने वालों का प्रेम करते हुए उनका सम्मान करना चाहिये- श्रीगीता को पढ़ने और समझने के बाद हम इसी निष्कर्ष पर पहुंचे हैं। शेष फिर कभी

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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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वैश्विक समाजों का अंतर्द्वंद्व और अंतर्जाल-आलेख (hindi article on the social matter)


यहां हम इस मुद्दे पर चर्चा नहीं करने जा रहे कि किसी अश्लील वेबसाईट पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिये या नहीं और न ही इसके देखने या न देखने के औचित्य पर सवाल उठा रहे हैं बल्कि हमारा मुख्य ध्येय है यह है कि हम समाज के उस अंतद्वंद्व को देखें जिस पर किसी अन्य की नजर नहीं जा रही। यहां हम चीन और भारतीय समाजों को केंद्र बिंदु में रखकर यह चर्चा कर रहे हैं जहां इस तरह की अश्लील वेबसाईटों पर प्रतिबंध लगाने की चर्चा है। भारत में तो केवल एक ही वेबसाईट पर रोक लगी है-जिसके बारे में अंतर्जाल के लेखक कह रहे हैं कि यह तो समंदर से बूंद निकलाने के बराबर है-पर चीन तो सारी की सारी वेबसाईटों के पीछे पड़ गया है।

कुछ दिनों पहले तक कथित समाज विशेषज्ञ चीन के मुकाबले दो कारणों से पिछड़ा बताते थे। एक तो वहां औसत में कंप्यूटर भारत से अधिक उपलब्ध हैं दूसरा वहां इंटरनेट पर भी लोगों की सक्रियता अधिक है। इन दोनों की उपलब्धता अगर विकास का प्रमाण है तो दूसरा यह भी सच है कि अंतर्जाल पर इन्हीं यौन साहित्य और सामग्री से सुसज्जित वेबसाईटों ने ही अधिक प्रयोक्ता बनाने के लिये इसमें योगदान दिया है। अंतर्जाल ने शिक्षा, साहित्य, व्यापार तथा आपसी संपर्क बढ़ाने मे जो योगदान दिया है उससे कोई इंकार नहीं कर सकता पर सवाल यह भी कि ऐसे सात्विक उद्देश्य की पूर्ति कितने प्रयोक्ता कर रहे हैं? यह लेखक ढाई वर्ष से इस अंतर्जाल को निकटता से देख रहा है और उसका यह अनुभव रहा है कि भारत में प्रयोक्ताओं का एक बहुत बड़ा वर्ग केवल मनोरंजन के लिये इसे ले रहा है। इससे भी आगे यह कहें कि वह असाधारण मनोरंजन की चाहत इससे पूरी करना चाहता है। जिस तरह चीन सरकार आक्रामक हो उठी है तो उससे तो यही लगता है कि वहां भी इसी तरह का ही समाज है।
अनेक ब्लाग लेखकों ने यह बताया है कि यौन सामग्री वाली वेबसाईटों में ढेर सारी कमाई है और यह इतनी है कि गूगल और याहू जैसी कंपनियों के लिये भी कल्पनातीत है। कोई वेबसाईट दस माह में ही इतनी प्रसिद्ध हो जाती है कि उस पर प्रतिबंध लग जाता है। इसमें समाज के बिगड़ने की चिंता के साथ आर्थिक पक्ष भी हो सकता है। एक आश्चर्य की बात यह है कि दस माह में कोई वेबसाईट इतनी लोकप्रिय कैसे हो जाती है? निश्चित रूप से चीन ने अपने देश की बहुत बड़ी राशि बाहर जाने से रोकने के लिये ही ऐसा किया होगा। उसे रोकने के लिये अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रयास हो रहे हैं जो कि इस बात का प्रमाण है कि कहीं न कहीं इन प्रतिबंधों के पीछे आर्थिक कारण भी है।
भारत और चीनी समाज में बहुत सारी समानतायें हैं। अंतर है बस इतना कि यहां वेबसाईट पर प्रतिबंधों का विरोध मुखर ढंग से किया जा सकता है पर वहां यह संभव नहीं है। वैसे दोनों ही समाजों में बूढ़ों को सम्मान से देखा जाता है और यही कारण है कि समाज पर नियंत्रण के लिये उनकी राय ली जाती है। समस्या यह है आदमी जब युवा होता है तब वह यौन साहित्य छिपकर पढ़ाा है पर बूढ़ा होने पर युवाओं को पढ़ने से रोकना चाहता है। यही दोनों समाजों की समस्या भी है। इसके अलावा सभी चाहते हैं कि वह पश्चिम द्वारा बनाये आधुनिक साधनों का उपयोग तो करें पर उसके रहन सहन की शैली और नियम न अपनायें। सभी लोग भौतिक परिलब्धियों के पीछे अंधाधुंध भाग रहे पर चाहते हैं कि देश की संस्कृति और स्वरूप की रक्षा सरकार करे।
इसमें एक मजेदार विरोधाभास दिखाई देता है। भारत और चीन के समाजों में माता, पिता, गुरु और धर्म चारों ही हमेशा संस्कृति और संस्कार का आधार स्तंभ माना जाते हैं। माता को तो प्रथम गुरु माना जाता है जो बच्चे में संस्कार और संस्कृति के बीच बोती है। गुरुपूर्णिमा हमारे यहां मनायी जाती है पर अब पश्चिमी प्रभाव से माता पिता दिवस भी मनाने लगे हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जब हम संस्कृति के लड़खड़ाने की बात करते हैं तो क्या हमारा यह आशय है कि हमारे यह चारों स्तंभ अब काम नहीं करे रहे? अगर कर रहे हैं तो फिर युवाओं के बिगड़ने का भय क्यों सता रहा है? अगर नहीं कर रहे हैं तो फिर संस्कृति को बचाने की जरूरत ही क्या है?
सीधी बात तो यह है कि हम पश्चिमी साधनों को तो हासिल कर लेते हैं पर उसके उपयोग के नियमों को नहीं अपनाना चाहते। कंप्यूटर सभी जगह अपनाना जा रहा है पर उस पर काम करने के कायदे कहीं लागू नहीं है। कंप्यूटर अधिक काम करता है पर चलाता तो आदमी ही है न! मगर उसे भी कंप्यूटर मानकर उससे कैसे काम लिया जाता है? यह कौन देख रहा है? यही हालत हवाई जहाज की है। उसे उड़ाने वाले पायलटों का नियम से कितना चलाया जाता है? यह अलग से बहस का विषय है।
हम चलना तो चाहते हैं कि पश्चिम की खुले समाज की अवधारणा की राह पर अपनी शर्तों के साथ। हम कंप्यूटर और अंतर्जाल प्रयोक्ताओं की अधिक संख्या को विकास का प्रतीक मानकर चर्चा करते हैं पर क्या यह सच नहीं है कि लोगों के यौन साहित्य पढ़ने और देखने की ललक ही इसके लिये अधिक जिम्मेदार है। सही आंकड़े तो इस लेखक के पास नहीं है पर अनुमान से यह कह सकता है कि चीन ने यौन सामग्री की वेबसाईटों को अगर प्रभावपूर्ण ढंग से लागू किया तो यकीनन उसका इन दोनों मामलों में ग्राफ नीचे गिर सकता है। शिक्षा, साहित्य सृजन, रचनात्मक कार्य, आपसी संपर्क और व्यापार में इंटरनेट की अहम भूमिका है पर क्या उसके प्रयोक्ताओं के दम पर ही इतना बड़ा अंतर्जाल चल सकता है? यह विशेषज्ञों को देखना होगा।
हम अंतर्जाल के प्रयोक्ताओं को यह समझा सकते हैं कि टीवी, अखबार, बाहर मिलने वाली किताबों और सीडी आदि से जो काम चल सकता है उसके लिये यहंा आंखें न फोड़कर अपनी सात्विक जिज्ञासाओं के लिये इसका उपयोग करे। इसके लिये इंटरनेट और टेलीफोन कंपनियों को प्रयास कर ऐसे लोगों को सहायता करनी होगी जो अपने रचनात्मक भूमिका से समाज के युवकों के मन में सात्विक जिज्ञासायें जगाये रख सकते हैं। यह काम कम से कम समाजों के वर्तमान शिखर पुरुषों का बूते का तो नहीं लगता जो उनके नेतृत्व करने का दावा तो करते हैं पर जब नियंत्रण की बात आती है तो वह लट्ठ और नियम के आसरे बैठ कर अपने मूंह से शब्दों की जुगाली करते हैं। समाज के नये संत तो अब वही बन सकते हैं जो इंटरनेट पर रचनात्मक काम करते हुए युवा पीढ़ी में सात्विक जिज्ञासा और इच्छा उत्पन्न कर सकते हैं-वह कोई पुराना धार्मिक या सामाजिक चोला पहनने वालों हों यह जरूरी नहीं है। हो सकता है कि यौन सामग्री और साहित्य प्रस्तुत करने वाली वेबसाईटों से इंटरनेट और टेलीफोन कंपनियां इसलिये भी खुश हों कि वह उनके लिये प्रयोक्ता जुटा रही हैं पर इससे उनका भविष्य सुरक्षित नहीं हो जायेगा। जिस तरह आदमी समाचार पत्र पत्रिकाओं, किताबों, टीवी चैनलों और फिल्मों की यौन सामग्री से बोर होकर अंतर्जाल पर सक्रिय हो रहा है तो आगे उसमें वैसी विरक्ति भी आ सकती है। संभव है अन्य प्रचार माध्यम अपने यहां कुछ नया करें कि अंतर्जाल को प्रयोक्ता इसे छोड़कर वहां चला जाये। क्या यह दिलचस्प नहीं है कि हर मुद्दे को उठाकर सनसनी फैलाने और आजादी की दुहाई देने वाले टीवी चैनल और अखबार एक वेबसाईट पर प्रतिबंध लगने की तरफ से उदासीन हो गये हैं। उन्हें डर रहा होगा कि कहीं उस वेबसाईट का नाम लें तो उनका उपभोक्ता उसकी तरफ न चला जाये।
इंटरनेट में रचनात्मक काम, संवाद प्रेषण, साहित्य सृजन और व्यापार की संभावनायें और इस पर ही अधिक काम किया जाये तो इसमें निरंतरता बनी रहेगी। वेबसाईटों पर प्रतिबंध के क्या परिणाम है यह तो पता नहीं मगर यह बात निश्चित है कि पश्चिम में भी अंतर्जाल के विकास में इन्हीं यौन साहित्य और सामग्री से सुसज्तित वेबसाईटों को योगदान रहा है। कुछ लोग कह रहे हैं कि पश्चिम में लोग अब अंतर्जाल यौन साहित्य से ऊब कर सात्विक विषयों की तरफ बढ़ रहे हैं। संभव है कि भारत और चीन में भी आगे यह हो पर तब इंटरनेट और टेलीफोन कंपनियां रचनात्मक कर्म करने वाले लोगों को ढूंढती रह जायेंगी पर उनको वह मिलेंगे नहीं। रचनात्मक काम करना एक आदत होती है जिसे बनाये रखने के लिय सामान्य आदमी श्रम करता है तो धनी आदमी को उसमें विनिवेश करना चाहिये। हो सकता है कि लेखक की यह सोच औार धारणायें गलत हों पर अंतर्जाल पर जो अनुभव पाया है उसके आधार पर लिख रहा है। यह लेखक कोई ब्रह्मा तो है नहीं कि उसका सत्य अंतिम मान लिया जाये।
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यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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क्रिकेट में हार-मनोविज्ञान और अर्थशास्त्र


बीसीसीआई की क्रिकेट टीम बीस ओवरीय एक दिवसीय प्रतियोगिता में हार गयी और अब पता लगा कि उसमें पांच खिलाड़ी अनफिट थे। टीम जिस तरह अपने मैच खेल रही थी उससे लग तो नहीं रहा था कि वह कप जीत पायेगी पर इस कदर पिटेगी यह आभास भी नहीं था। इससे पहले एक क्लब स्तर की प्रतियोगिता हुई थी। उसमें बीसीसीआई के यह सभी खिलाड़ी बड़े शहरों के नाम पर बनी टीमों के लिये खेले।

कहने वाले तो शुरुआती दौर में ही कह रहे थे कि खिलाड़ी थक गये होंगे इसलिये शायद उनका प्रदर्शन प्रभावित होगा। हुआ भी यही पर इस दलील का विरोध करने वाले कहते हैं कि अन्य देशों के खिलाड़ी भी तो इसमें खेले थे फिर उनका प्रदर्शन प्रभावित क्यों नहीं हुआ? यानि हर तरह से इस हार को स्वाभाविक बताने का प्रयास किया जा रहा है। क्रिकेट अनिश्चताओं का खेल है पर इस आड़ में ऐसी हार के कारण छिप नहीं सकते। हारना एक अलग बात है और खराब खेलना अलग। यहां मुद्दा यह नहीं है कि बीसीसीआई की टीम बीस ओवरीय प्रतियोगता में हारी बल्कि उसका प्रदर्शन इतना खराब रहा कि लोग को रहे हैं कि भारत के किसी भी शहर से कोई टीम उठाकर भेज देते तो वह भी इनसे अच्छा खेलते। नये होने के कारण वह उत्साह से खेलते तो पता लगता कि बीस ओवरीय प्रतियोगता का विश्व कप ही जीत लाये। भारत में खिलाड़ियों की कमी नहीं है। फिर बीस ओवरीय प्रतियोगता तो ऐसी है जिसमें अनुभव वगैरह की तो जरूरत ही नहीं है-इसे तो केवल मनोबल के आधार पर ही जीता जा सकता है।
एक पुराने खिलाड़ी ने बढ़िया टिप्पणी की। उसने कहा कि हम भारतीयों में पैसा पचाने की क्षमता बहुत कम हैं। वर्तमान भारतीय खिलाड़ी इतना पैसा कमा चुके हैं कि वह फिर भूल गये कि वह इसी खेल की दम पर हैं।
वह खिलाड़ी चूंकि पेशवर है इसलिये अन्य सच नहीं कह पाया। जिन खिलाड़ियों को बीस ओवरीय मैचों का स्टार माना जाता था वह इस तरह खेले जैसे कि पचास ओवरों वाला मैच खेल रहे हैं। कहने को तो सभी कह रहे हैं कि हम चुस्त दुरस्त थे और क्लब स्तर की प्रतियोगिता में खेलने की वजह से हमारा खेल प्रभावित नहीं हुआ। दरअसल यह उसी क्लब स्तरीय प्रतियोगिता के दोबारा आयोजन में बाधा न पड़े इसलिये ही कहा जा रहा है। फिर वह उसी प्रतियोगिता में अपनी सदस्यता बनाये रखना चाह रहे हैं। यह खिलाड़ी सभी तरह की गेंदें खेलने में माहिर हैं चाहे शार्टपिच हो या स्पिन पर अब बिचारे शार्टपिच गेंदों का तोड़ ढूंढ रहे हैं। सच बात तो यह है कि चाहे खेल कोई भी हो अगर खिलाड़ी का मन नहीं है तो विपक्षी के दांव पैंच उसके लिये पहाड़ हो जाते हैं। भारतीय खिलाड़ी इतना पैसा कमा चुके थे कि अब उनको अपने परिवारों के लिये समय चाहिये था। इंकार इसलिये नहीं कर सकते थे कि कहीं उनकी जगह शामिल नया खिलाड़ी उसमें छा गया तो इससे भी जायेंगे। खेलना है इसलिये खेले। कह सकते हैं कि हाजिरी देने के लिये खेले। जीतने की खुशी या हारने के गम से परे होकर वह निर्विकार भाव से खेलते दिख रहे थे। मगर यह कोई उच्च स्थिति नहीं थी बल्कि उनके चेहरे पर खेलने की बाध्यता के भाव भी थे जो इस बात को दर्शा रहे थे कि वह न खुश हैं न उत्साहित बल्कि टालू खेल दिखा रहे हैं।
अन्य देशों के खिलाड़ी क्लब स्तर में खेलने के बावजूद यहां भी खेले तो इसलिये कि उनको इतना पैसा नहीं मिलता जितना भारत के खिलाड़ियों को मिलता है। भारतीय खिलाड़ी विज्ञापनों और रैम्पों पर इतना पैसा कमा चुके हैं कि उनका बोझ उठाना अब संभव नहीं था। वह खेल की थकवाट से नहीं बल्कि अपनी आर्थिक परिलब्धियेां का उपयोग न कर पाने की गम का बोझ उठाये हुए थे। सच कहें तो ऐसा लगता है कि इस विश्व में शायद उनके लिये मिलने वाली धनराशि इतनी उपयोगी नहीं थी जितनी क्लब स्तर की प्रतियोगिता से मिली होगी। अन्य देशों के खिलाड़ियों के लिये यह रकम भी बहुत बड़ी होगी इसलिये खेल रहे हैं।
क्रिकेट से देश के लोगों ने अपने जज्बात ख्वामख्वाह जोड़ रखे हैं पर उसके लिये यहां कोई जवाबदेह नहीं है। हार गये तो क्या कर लोगे? हां, लोगों का गुस्सा कम करने के लिये तमाम तरह की सफाई दी जा रही है वह इसलिये कि कहीं वह लोग फिर विरक्त न हो जायें और क्रिकेट का व्यापार कहीं ठप न हो जाये।
अगर खिलाड़ी अनफिट हैं तो फिर अभी बाहर जाने वाली टीम के के लिये उनको कैसे चुन लिया गया। वही कप्तान वही खिलाड़ी!
प्रबंधन के मामले में हमारा देश अप्रतिभाशाली माना जाता है। यह हमारी कमजोरी है। कोई नया बदलाव कहीं करना ही नहीं चाहता। दरअसल क्रिकेट अब बाजार का खेल है-कम से कम भारत में तो यही लगता है। खिलाड़ियों ने विज्ञापन कर रखे होते हैं जो ऐसी प्रतियोगिताओं में समय अधिक दिखाई देते हैं। इसलिये उसमें अभिनय करने वाले खिलाड़ियों का होना जरूरी है अतः अप्रत्यक्ष रूप से कहीं न कहीं यह बात भी देखी जाती है कि बाजार का ध्यान अधिक रखा जाता है फोकटिया दर्शक का कम। एक खिलाड़ी इस टीम में शामिल नहीं हुआ तो वह दर्शक दीर्घा में अन्य खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाने पहुंच गया। दरअसल उसके विज्ञापन भी दिख रहे थे और वह यकीनन उनकी वजह से ही अपनी सूरत दिखाने वहां पहुंचा होगा ताकि विज्ञापन दाता उससे खुश रहें। टीवी कैमरा हर मैच में उसका चेहरा अनेक बार दिखाता था। कितनी अच्छी बात लगती है यह बात सुनकर कि इतना बड़ा खिलाड़ी मनोबल बढ़ाने पहुंचा मगर इसके पीछे का सच कौन पढ़ पाता है। यह सब बुरा नहीं है क्योंकि सभी को कमाने का हक है पर आम लोगों को यही सच समझते हुए यह देखना चाहिये। क्रिकेट टीम का खेलना एक व्यवसाय है और उसे बाजार प्रभावित कर सकता है-इससे मान लेना चाहिये। किसी को क्या दोष देना? क्रिकेट वालों को पूरा पैसा मिल रहा है टीम हारे या जीते-तब उनसे यह आशा करना बेकार है कि वह नये और तरोताजा खिलाड़ी भेजकर प्रतियोगिता जीतने का प्रयास कर अपने प्रबंध कौशल का प्रमाण दें। अपने देश में पैसा कमाना महत्वपूर्ण है कि प्रबंध कौशल!
सो टीम हार गयी तो कोई बात नहीं। जिस कप्तान को सिर पर उठाये रखा है उसने कहा है कि कुछ महीने बाद फिर प्रतियोगिता है। उसमें दमखम दिखायेंगे। वहां यह आश्वासन देना ठीक है क्योंकि अगली बार तक लोग इंतजार कर अपना पैसा खर्च कर सकते हैं।
पिछली बीस ओवरीय प्रतियोगिता बीसीसीआई की टीम ने जीती थी। उससे पहले विश्व में हारने की वजह से पूरी टीम की जो किरकिरी हुई वह लोग भूल गये। बीस ओवरीय प्रतियोगिता में बीसीसीआई टीम की पिछली जीत की दो वजहें थी एक तो दूसरी टीमें गंभीरता से नहीं खेली दूसरा भारतीयों पर जीत का कोई दबाव नहीं था। कुछ लोग तो उस समय मान रहे थे कि इस आड़ में भारत में क्रिकेट को दोबारा प्रतिष्ठा दिलाने का योजनाबद्ध प्रयास किया गया है। यह योजना वैसे ही सफल हुई जैसे कि 1983 में एक दिवसीय विश्व क्रिकेट कप में बीसीसीआई की टीम के जीतने पर क्रिकेट का वह प्रारूप भारत में लोकप्रिय हो गया। मतलब पच्चीस साल तक बाजार उस जीत को भुनाता रहा। अब हमारे लिये यह देखने का विषय है कि पिछली बीस ओवरीय प्रतियोगता की जीत को बाजार कब तक भुनाता रहेगा। इस बात तो टीम पिट गयी इसलिये निश्चित रूप से क्रिकेट के इस व्यापर पर बुरा प्रभाव पड़ेगा-चाहे वह एक नंबर को हो या दो नंबर का। देखना है कि इस हार का मनौवैज्ञानिक और आर्थिक रूप से बाजार पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?
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इन्टरनेट पर लिखते हुए कोई संकोच न करें-आलेख


नये लेखक लेखिकाओं को लिखते हुए इस बात की झिझक हो सकती है कि उनके लिखे पर कोई हंसे नहीं। वह समाचार पत्र पत्रिकाओं में तमाम प्रसिद्ध लेखकों की रचनायें पढ़कर यह सोचते होंगे कि वह उन जैसा नहीं लिख सकते। कई युवक युवतियां तो ऐसे हैं जो अपनी रचनायें लिखकर अपने पास ही रख लेते हैं कि कहीं कोई उस पर पढ़कर हंसे नहीं। संभव है ऐसे ही कुछ नये लेखकों के पास इंटरनेट की सुविधा के साथ ब्लाग लिखने की तकनीकी जानकारी भी हो पर वह इसलिये नहंी लिखते हों कि ‘कहीं कोई पढ़कर मजाक न उड़ाये।’

ऐसे नये लेखक अपने आप को भाग्यशाली समझें कि उनके पास अंतर्जाल पर ब्लाग लिखने के अवसर मौजूद हैं जो पुराने लेखकों के पास नहीं थे। हां, उन्हें लिखने को लेकर अपने अं्रदर कोई संकोच नहीं करना चाहिये। वह जिन पत्र पत्रिकाओं के प्रसिद्ध लेखकों की रचनाओं को लेकर अपने अंदर कुंठा पाल लेते हैं उनके बारे में अधिक भ्रम उन्हें नहीं रखना चाहिये। वैसे तो हर आदमी जन्मजात लेखक होता है पर अभ्यास के बाद वह समाज में लेखक का दर्जा प्राप्त करता है। अगर आप लिखना प्रारंभ करें तो धीरे धीरे आपको लगने लगेगा कि जिन बड़े लेखकों को पढ़कर आप कुंठा पाल रहे थे उनसे सार्थक तो आप लिख रहे है। सच बात तो यह है कि स्वतंत्रता के बाद देश में हर क्षेत्र में ठेकेदारी का प्रथा का प्रचलन शुरु हो गया जिसमें बाप जो काम करता है बेटा उसके लिये उतराधिकारी माना जाता है। यही हाल हिंदी लेखन का भी रहा है।

अनेक लोग ऐसे भी हैं जो हिंदी में बेहतर नाटक,कहानी या उपन्यास न लिखने की शिकायत करते हैं। दरअसल यह वही लोग हैं जो ठेकेदारी के चलते प्रसिद्धि प्राप्त कर गये हैं पर उनको हिंदी के सामान्य लेखक के मनोभाव का ज्ञान नहीं रहा। हिंदी में बहुत अच्छा लिखने वालों की कमी नहीं है पर उनको अवसर देने वाले तमाम तरह के बंधन लगा कर उन्हें अपनी मौलिकता छोड़ने को बाध्य करे देते हैं। यही कारण है कि पिछले पचास वर्षों से जातिवाद, क्षेत्रवाद,और भाषावाद के कारण हिंदी में बहुत कम साहित्य लिखा गया है। जिन लोगों ने इन वादों और नारों की पूंछ पकड़कर प्रसिद्धि की वैतरणी पार की है उनका सच आप तभी समझ पायेंगे जब अंतर्जाल पर स्वतंत्र लेखन करेंगे। अधिकतर लेखक या तो प्रतिबद्ध रहे या बंधूआ। दोनों ही परिस्थितियों में मौलिक भाव का दायरा संकुचित हो जाता है।

अगर आप कविता लिखना चाहते हैं तो लिखिये। अब वह कविता इस तरह भी हो तो चलेगी।
होटल में जाने को मचलने लगा हमारा दिल
खाया पीया जमकर, बैठ गया वह जब आया बिल
या
फिल्मी गाने सुनते ऐसे हुए, चेहरे परं चांद जैसा लगता तिल
जब भी आता है कोई ऐसा चेहरा, गाने लगता अपना दिल

आप यह मत सोचिये कि कोई हंसेगा। हो सकता है कुछ लोग हंसें पर यह सबसे आसान काम है। कोई भी किसी पर हंस सकता है। आप तो यह मानकर चलिये कि आपने अपने मन की बात लिख ली यही बहुत है।
अगर आपको गद्य लिखने का विचार आया तो यह भी लिख सकते हैं।
आज मैं सुबह नहाया, फिर नाश्ता किया और उसके बाद बाहर फिल्म लिखने गया और रात को घर आया और खाना खाया और सो गया। अब कल सोचूंगा कि क्या करना है?

ऐसे ही आप लिखना प्रारंभ कर दीजिये। अभ्यास के साथ आप के अंदर का लेखक परिपक्व होता चला जायेगा। वैसे इसके साथ ही दूसरों का लिखा पढ़ें जरूर! दूसरे का पढ़ने से न केवल विषय के चयन का तरीका मिलता है बल्कि उससे अपनी एक शैली स्वतः निर्मित होती जाती है। हम जैसे पढ़ते हैं वैसे ही लिखने का मन करता है और फिर अपनी एक नयी शैली अपने आप हमारी साथी बन जाती है।
आप लोग पत्र पत्रिकाओं में बड़ी कहानियां,व्यंग्य और निबंध पढ़ते हैं और वैसा ही लिखना चाहते हैं तो इस पर अधिक विचार मत करिये। अंतर्जाल पर संक्षिप्तता का बहुत महत्व है। सबसे बड़ी बात यह है कि यहां मौलिकता और स्वतंत्रता के साथ लिखने की जो सुविधा है उसका उपयोग करना जरूरी है। इस लेखक से अनेक लोग अपनी टिप्पणियों में सवाल करते हैं कि आप अपनी रचनायें पत्र पत्रिकाओं में क्यों नहीं भेजते?
इसका सीधा जवाब तो यही है कि भई, हम तो पांच रुपये की डाक टिकट लगाकर लिफाफे भेजते हुए थक गये। अपनी रचना अपने हिसाब से की पर वह उन पत्र पत्रिकाओं के अनुकूल नहीं होती । वैसे अधिकतर समाचार पत्र पत्रिकाओं के वैचारिक, साहित्यक और व्यवसायिक प्रारूप हैं जिनके ढांचे में हमारी रचनायें फिट नहीं बैठती। हां, यह सच है कि आप जो लिखते हैं उसका उस पत्र या पत्रिका के निर्धारित प्रारूप में फिट होना आवश्यक है। जो लेखक इन प्रारूपों की सीमा में लिखते हैं वही प्रसिद्ध हो पाते हैं-यह सफलता भी उन्हीं लेखकों को नसीब में आती है जिनके संबंध होते हैं। अधिकतर पत्र पत्रिकाओं के मुख्यालय बड़े शहरों में होते हैं और छोटे शहरों के लेखक वहां तक नहीं पहुंच पाते। वैसे वह उनके तय प्रारूप के अनुसार लिखें तो तो भी इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि उनकी रचना छप ही जाये।
बहरहाल जिन नये लेखकों के अवसर मिल रहा है उनके लिये तो अच्छा ही है पर जिनको नहीं मिल रहा है वह यहां लिखें। उन्हें पत्र पत्रिकाओं वाले प्रारूपों का ध्यान नहीं करना चाहिये क्योंकि यहां संक्षिप्पता, मौलिकता और निष्पक्षता के साथ चला जा सकता है जबकि वहां कुछ न कुछ बंधन होता ही है। आपके ब्लाग एक जीवंत किताब की तरह हैं जो कहीं अलमारी में बंद नहीं होंगे और उन्हें पढ़ा ही जाता रहेगा। आप इस पर विचार मत करिये कि आज कितने लोगों ने इसे पढ़ा आप यह सोचिये कि आगे इसे बहुत लोग पढ़ने वाले हैं। मेरे ऐसे कई पाठ हैं जो प्रकाशित होने वाले दिन दस पाठक भी नहीं जुटा सके पर वह एक वर्ष कें अंदर पांच हजार की संख्या के निकट पहुंचने वाले हैं।
हिंदी लेखन में स्थिति यह हो गयी है कि लेखक की पारिवारिक, व्यवसायिक और सामाजिक परिस्थिति कें अनुसार उसकी रचना को देखा जाता है। यही कारण है कि पत्र पत्रिकाओं में लेखन से इतर कारणों से प्रसिद्धि हस्ती के लेखक प्रकाशित होते हैं या फिर उन अंग्रेजी लेखकों के लेख प्रकाशित होते हैं जो अंग्रेजी में आम पाठक की उपेक्षा से तंग आकर हिंदी की तरफ आकर्षित हुए-इस बारे में संदेह है कि वह स्वयं उनको लिखते होंगे क्योंकि उन्होंने ताउम्र अंग्रेजी में लिखा। संभवतः अपने लेखों को अंग्रेजी में लिखकर उसका हिंदी में अनुवाद कराते होंगे या बोलकर लिखवाते होंगे।

अगर कोई फिल्मी हीरो अपना ब्लाग बना ले तो उसे एक ही दिन में हजारों पाठक मिल जायेंगे पर आप अगर एक आप लेखक हैं तो फिर आपको अपने लिखे के सहारे ही धीरे धीरे आगे बढ़ना होगा। ऐसे में यही बेहतर है कि आप संकोच छोड़कर लिखे जायें। इस विषय में हमारे एक गुरुजी का कहना है कि तुम तो मन में आयी रचना लिख लिया करो। हो सकता है उस समय उसे कोई न पूछे पर जब तुम्हारा नाम हो जाये तो लोग उसी की प्रशंसा करें।

इसलिये जिन लोगों के पास ब्लाग लिखने की सुविधा है उन्हें अपना लेखक कार्य शुरु करने में संकोच नहीं करना चाहिये। हिंदी में गंभीर लेखन को कालांतर में बहुत महत्व मिलेगा। आपका लिखा हिंदी में पढ़ा जाये यह जरूरी नहीं है। अनुवाद टूलों ने भाषा और लिपि की दीवार ढहाने का काम शुरु कर दिया है यानि यहां लिखना शुरु करने का अर्थ है कि आप अंतर्राष्ट्रीय स्तर के लेखक बनने जा रहे हैं जो कि पूर्व के अनेक हिंदी लेखकों का एक सपना रहा है। हां इतना जरूरी है कि अपने लिखे पर आत्ममुग्ध न हों क्योंकि इससे रचनाकर्म प्रभावित होता है।
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श्रीलंका क्रिकेट टीम के घायल खिलाड़ियों का खेल जीवन खतरे में पड़ सकता है-आलेख


कल लाहौर में श्रीलंका क्रिकेट टीम पर हमले के बाद बहुत कम लोगों ने इस बारे में सोचा है कि उसके घायल खिलाडि़यों का भविष्य अब खेल की दृष्टि से अंधकारमय भी हो सकता है। इस हमले में सभी खिलाड़ी जीवित बच गये पर उनके शरीरों पर गोली के घाव हैं जो शरीर के कुछ अंगों को स्थाई हानि पहुंचा सकते हैं। स्थाई हानि न भी पहुंचे तो उनके घाव भरने और स्वस्थ होने में इतना समय लग सकता है कि वह क्रिकेट खेल में दोबारा वापसी करने में कठिनाई अनुभव करें। श्रीलंका की टीम पर जो आघात पहुंचा है उसका अनुमान तभी किया जा सकता है जब इस बारे में निश्चित पता चले कि उसके घायल खिलाड़ी अब किस स्थिति में हैं।
श्रीलंका के जो घायल खिलाड़ी बताये गये वह हैं-महेला जयवर्धने, कुमार संगकारा,चामुंडा वास,समरवीरा,थरंगा,अजंता मैंडिस। इसमें पहले चार तो इस समय श्रीलंका क्रिकेट टीम की बहुत बड़ी ताकत हैं। चामुंडा वास बहुत पुराने और बड़ी आयु के खिलाड़ी हैं। एक तरह से वह अपने जीवन की क्रिकेट पूरी तरह से खेल चुके हैं। जबकि महिला जयवर्धने,कुमार संघकारा और समरवीरा इस समय चरम पर हैं और थरंगा अजंता मैंडिस को अभी बहुत क्रिकेट खेलना बाकी है। कुमार संघकारा को तो कुछ लोग दूसरा सचिन भी कहने लगे हैं।

एक बात जो महत्वपूर्ण है एक तो वैसे ही क्रिकेट खेल में मांसपेशी खिंचने या घायल होने की वजह से अनेक खिलाड़ी बहुत जल्दी अनफिट हो जाते हैं ऐसे में गोली का प्रभाव उनका खेल जीवन ही तबाह कर सकता है। कंधे,एडि़यां,हथेली और बांह पर गोली लगने का सीधा अर्थ यही है कि लंबे समय तक उनका इलाज चलना। सेना में अनेक ऐसे जवान हैं जिनको गोली लगने के बाद शारीरिक कमजोरी आने पर ऐसी जगह तैनात किया जाता है जहां उनको जंग न करना पड़े पर क्रिकेट खिलाड़ियों के लिये टीम में ऐसी कोई जगह नहीं होती। समाचारों के अनुसार कुमार संधकारा को कंधे,महेला जयवर्धने को टखने और समरवीरा की बांह को छूती हुई गोली गयी है। इसका आशय यह ही है कि सीधे गोली वहां नहीं रुकी। यह तसल्ली का विषय है पर फिर भी उनके ठीक होने के समय का सही अनुमान किसी को नहीं है। अगर वह कहीं लंबा खिंचा तो हो सकता है कि अभ्यास से दूर रहने की वजह से उनकी दोबारा वापसी मुश्किल हो और अगर हो भी तो वह इतने प्रभावी नहीं हो पायें। ऐसे में श्रीलंका में नये खिलाड़ियों को अवसर मिलेगा और उनमें भी निश्चित रूप से बहुत प्रतिभाशाली होंगे और अगर उन्होंने अपनी टीम का प्रदर्शन अच्छा बनाये रखा तो हो सकता है कि घायल खिलाडि़यों को वापसी में दिक्कत आये।

इस हमले ने 1972 में म्यूनिख ओलंपिक की याद दिला दी है जहां इजरायल के सात फुटबाल खिलाड़ियों की हत्या कर दी गयी थी और दुनियां में आतंकवाद की शुरुआत हुई। अब खिलाड़ी तो बचे गये पर उनके घाव भी उनका खेल खत्म कर सकते हैं। 37 साल पहले शुरु हुआ आतंकवाद भी अब युवावस्था में हैं और यह तय बात है कि कुछ देश उसको सीधा संरक्षण दे रहे हैं। यह अलग बात है कि आतंकवाद से लड़ने का दावा सभी करते हैं पर कहीं वह उनको स्वतंत्रता संग्रामी तो कहीं उनको क्रांतिकारी कहकर उनकी पीठ थपथपाने में भी कुछ देश पीछे नहीं है। यही कारण है कि आतंकवाद अब खेलों पर भी अपनी वक्र दृष्टि डाल रहा है।
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कंपनी कभी देवता तो कभी दानव -आलेख


कंपनियों का सच यही है कि वह आम निवेशक और उपभोक्ता और अपने कर्मचारी का शोषण करने के लिये बनायी जाती हैं। प्राचीन व्यापार में सेठ साहूकार यही काम करते थे पर जैसे लोगों के जागृति बढ़ने लगी उनके चेहरे स्याह दिखने लगे। तब कंपनी नाम का एक ऐसा दैत्य खड़ा किया जिसमें शोषक और अनाचारी व्यक्ति का चेहरा नहीं दिखता क्योंकि वह एक बोर्ड या तख्ती दिखाई देती है। पहले भी बोर्ड या तख्ती दिखती थी पर सेठ साहूकार की साख ही उसके साथ जुड़ी होती थी। तब यह भी निश्चित था कि आदमी के व्यापार के साथ उसका मालिक भी बदनाम होता था।
वैसे तो भारत में भी कंपनियों का प्रचलन बहुत समय से है पर पिछले बीस वर्षों से कंपनी शब्द भी आम जनता में प्रचलित हो गया है।

अमेरिका के नये राष्ट्रपति ओबामा ने अपने देश की कंपनियों के कामकाज के रवैये पर तीखी नाराजगी प्रकट की है। इसका कारण यह है कि वह एक तरफ मंदी की वजह से अपनी आय कम होने के संकट का प्रचार कर रही हैं दूसरी ओर अपने ही उच्चाधिकारियों को बोनस बांटने में लगी हैं-जी हां, यही कंपनियां सामान्य कर्मचारी को भी निकालने पर तुली हैंं। एक तरफ अपने संकट से उबरने के लिये सरकार से राहत की मांग और दूसरी तरफ अपने उच्चाधिकारियों को बोनस देना विरोधाभासी है। दरअसल कंपनी के उच्चाधिकारी भी अपने आपको सेवक के रूप में प्रस्तुत करते हैं, पर वह होते तो पुराने सेठ साहुकारों की तरह हैं। अंतर केवल यह है कि सुठ साहुकार अपनी जेब से भी पैसा लगाते थे पर यह आजकल के कंपनी प्रमुख सारे मजे सामान्य कर्मचारी के परिश्रम, आमभोक्ता के शोषण और निवेशक के धन से करना चाहते हैं। कंपनी बनाने वाले शायद ही कभी अपनी जेब से पैसा लगाते हों पर उनके ठाठ ऐसे होते हैं जैसे कि उनका खुद का धन हों। कंपनी नाम के देवता ने कई लोगों के जमीन से उठाकर आसमान में पहुंचा दिया पर इसी कंपनी नाम के दानव ने उनको आम आदमी के कर्मचारी,श्रमिक, और अपभोक्ता के शोषण का वरदान भी प्रदान किया।
समय बदल रहा है। वैश्वीकरण ने जहां बाजार को व्यापक आधार प्रदान किया है वहीं लोगों को प्रचार के शक्तिशाली माध्यम भी प्रदान किये हैं। अभी तक कंपनियां एक अंधेरे कुुएं की तरह थी पर मंदी के सूरज ने उन पर ऐसी रोशनी डाली है कि उनकी पोल पूरी दुनियों को दिखाई दे रही है।
पूरे विश्व के अनेक देशों में अनेक कंपनियों ने किसी न किसी तरह सरकारी खजाने पर अपना हाथ साफ किया है-हालांकि कई प्रसिद्ध कंपनियां इसका अपवाद भी हैं। इन्हीं कपंनी संगठनों ने इतनी शक्ति अर्जिकत कर ली कि वह सरकार बनाने और बिगाड़ने तक के काम अपनी इच्छानुसार सफलता पूर्वक कर लेती हैं। अब इस मंदी ने उनको पिचका दिया है। कहते हैं कि अमेरिका में पहली बार कोई अश्वेत व्यक्ति राष्ट्रपति बना और यह विश्व में बदलाव का संकेत है। अमेरिका में कंपनियों पर भी श्वेतों का वर्चस्व रहा और राष्ट्रपति पद पर भी। अब कंपनियों की पकड़ मंदी से संघर्ष के कारण कमजोर हो गयी है तो क्या यह बदलाव इसी कारण स्वाभाविक रूप से आ गया या कंपनियों ऐसा कुछ करने का समय नहीं निकाल सकंीं। इसका प्रमाण है कि अभी तक अमेरिका के राष्ट्रपति कभी अपने देश की कंपनियों के विरुद्ध नहीं बोलते थे पर नये अश्वेत राष्ट्रपति ने उनकी आलोचना कर यह साबित कर दिया कि कंपनी नाम के संगठन अब इतने मजबूत नहीं रहने वाले। कंपनियों में पैसा अनेक लोगों का होता है और उसके अनेक सामान्य कर्मचारी कार्यरत होते हैं पर उच्च अधिकारी-एक तरह से कहा जाये आजकल के सेठ-अपने हिसाब से मनमाने निर्णय लेते हैं। आपने सुना होगा कि अनेक कंपनियां प्रसिद्ध फिल्मी, खेल तथा समाज सेवा के क्षेत्र में कार्यरत हस्तियों को सम्मानित करने के साथ महंगे उपहार भी देती हैं। बाहर से सामान्य दिखने वाली इस बात पर अनेक लोग संशय अपने संशय भी भी व्यकत करते हैं। एक तो ऐसे सम्मानों और उपहारों का कंपनी के व्यापार से कोई संबंध नहीं होता दूसरा उसमें आम निवेशक की कोई भूमिका नहीं होती। हां, कथित उच्चाधिकारी इससे अपना नाम कमाने के साथ कंपनी से अलग अपनी भूमिका और छबि बनाने के लिये इसी तरह पैसा व्यय करते हैं। यही स्थिति कंपनियों के उत्पादों के विज्ञापनों के साथ भी है। कई कंपनियां बहुत प्रसिद्ध हैं और वह अपनी उत्पादों का विज्ञापन न भी करें तो भी उनकी बिक्री पर अंतर नहीं पड़े पर उसके उच्चाधिकारी प्रचार माध्यमों से अच्छे संबंध बनाने के लिये महंगी दरों पर विज्ञापन देकर अपने लिये एक सामाजिक सुरक्षा प्राप्त करते हैं जिससे उनके एक व दो नंबर दोनों प्रकार की गतिविधियां जान सामान्य के परिदृश्य में न आये। बहरहाल कंपनी संगठन आधुनिक व्यवस्था में आर्थिक और सामाजिक से बहुत शक्ति प्राप्त कर लेते हैं और उसके उच्चाधिकारी अपने विवेक के अनुसार उसका सदुपयोग और दुरुपयोग दोनों ही करने में समर्थ होते हैं। वैसे उदारीकरण के प्रांरम्भिक दौर में कई कंपनियां कुकुरमुतों की तरह उगे आयीं थीं और उसमें लोगों ने विनिवेश कर अपने पैसे गंवाये। अनेक कंपनियों के तो अब नाम भी नहीं आते। हां, कुछ पुरानी और प्रतिष्ठित कंपनियां आज भी लोगों के लिये बहुत बेहतर हैं और उसमें वह विनिवेश करते हैं। आजकल लोग कंपनियों के प्रबंधकों का नाम देखकर ही उस पर विश्वास या अविश्वास करते हैं। यह अलग बात है कि कभी कभी प्रसिद्ध और ईमानदार नाम जुड़े होने के बावजूद भी धोखे की गुंजायश तो रहती ही है।

इसमें भी कोई संशय नहीं है कि यह कंपनी संगठन ही है जिन्होंने पूरे विश्व में तकनीकी,सूचना,इंटरनेट तथा अन्य प्रचार माध्यमों को व्यापक आधार प्रदान किया पर अब उनका काला पक्ष भी लोगों के सामने आने लगा है। ऐसे में वही कंपनियां अपनी साख बचा सकेंगे जिनके प्रमुख वाकई प्रबंध कौशल में दक्ष होने के साथ नैतिकता और ईमानदारी के आधारों पर भी काम करेंगे। हालांकि कंपनी एक ऐसा व्यवसायिक स्वरूप है जिसमें देवत्व और दानवता दोनों साथ ही विद्यमान रहते हैं।
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समाज, संस्कार और संस्कृति की रक्षा का प्रश्न-आलेख


हम अक्सर अपने संस्कार और संस्कृति के संपन्न होने की बात करते हैं। कई बार आधुनिकता से अपने संस्कार और संस्कृति पर संकट आने या उसके नष्ट होने का भय सताने लगता है। आखिर वह संस्कृति है क्या? वह कौनसे संस्कार है जिनके समाप्त होने का भय हमें सताता है? इतना ही नहीं धार्मिक आस्था या विश्वास के नाम पर भी बहस नहीं की जाती। कोई प्रतिकूल बात लगती है तो हाल आस्था और विश्वास पर चोट पहुंचने की बात कहकर लोग उत्तेजित हो जाते हैे।

कभी किसी ने इसका विश्लेषण नहीं किया। कहते हैं कि हमारे यहां आपसी संबंधों का बड़ा महत्व है, पर यह इसका तो विदेशी संस्कृतियों में भी पूरा स्थान प्राप्त है। छोटी आयु के लोगों को बड़े लोगों का सम्मान करना चाहिये। यह भी सभी जगह होता है। ऐसे बहुत विषय है जिनके बारे में हम कहते हैं कि यह सभी हमारे यहां है बाकी अन्य कहीं नहीं है-यह हमारा भ्रम या पाखंड ही कहा जा सकता है।

स्वतंत्रता के बाद कई विषय बहुत आकर्षक ढंग से केवल ‘शीर्षक’ देकर सजाये गये जिसमें देशभक्ति,आजादी,भाषा प्रेम,देश के संस्कार और आचार विचार संस्कृति शामिल हैं। धार्मिक आजादी के नाम पर तो किसी भी प्रकार की बहस करना ही कठिन लगता है क्योंकि धर्म पर चोट के नाम पर कोई भी पंगा ले सकता है। देश में एक समाज की बात की गयी पर जाति,भाषा,धर्म और क्षेत्र के आधार पर बने समाजों और समूहों के अस्तित्व की लड़ाई भी योजनापूर्वक शुरु की गयी। बोलने की आजादी दी गयी पर शर्तों के साथ। ऐसे में कहीं भी सोच और विचारों की गहराई नहीं दिखती।

कभी कभी यह देखकर ऊब होने लगती है कि लोगों सोच नहीं रहे बल्कि एक निश्चित किये मानचित्र में घूम कर अपने विचारक,दार्शनिक,लेखक और रचनाकार होने की औपचारिकता भर निभा रहे हैं। नये के नाम एक नारे या वाद का मुकाबला करने के लिये दूसरा नारा या वाद लाया जाता है। फिल्म, पत्रकारिता,समाजसेवा या अन्य आकर्षक और सार्वजनिक क्षेत्रों में नयी पीढ़ी के नाम पर पुराने लोगों के परिवार के युवा लोगा ही आगे बढ़ते आ रहे हैं। ऐसा लगता है कि समाज जड़ हो गया है। अमीर गरीब, पूंजीपति मजदूर और उच्च और निम्न खानदान के नाम पर स्थाई विभाजन हो गया है। परिवर्तन की सीमा अब उत्तराधिकार के दायरे में बंध गयी है। कार्ल माक्र्स से अनेक लोग सहमत नहीं होते पर कम से कम उनके इस सिद्धांत को कोईै चुनौती नहीं दे सकता कि इस दुनियां में दो ही जातियां शेष रह गयीं हैं अमीर गरीब या पूंजीपति और मजदूर।

भारतीय समाज वैसे ही विश्व में अपनी रूढ़ता के कारण बदनाम है पर देखा जाये तो अब समाज उससे अधिक रूढ़ दिखाई देता हैं। पहले कम से कम रूढ़ता के विरुद्ध संघर्ष करते कुछ लोग दिखाई देते थे पर अब तो सभी ं ने यह मान लिया है कि परिवर्तन या विकास केवल सरकार का काम है। यहा तक कि समाज का विकास और कल्याण भी सरकार के जिम्मे छोड़ दिया गया है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भगतसिंह,चंद्रशेखर आजाद और अशफाकुल्ला के प्रशंसक तो बहुत मिल जायेंगे पर कोई नहीं चाहेगा कि उनके घर का लाल इस तरह बने। यह सही है कि अब कोई आजादी की लड़ाई शेष नहीं है पर समाज के लिये अहिंसक और बौद्धिक प्रयास करने के लिये जिस साहस की आवश्यकता है वह कोई स्वतंत्रता संग्राम से कम नहीं है।
अब कभी यहां राज राममोहन राय,कबीर,विवेकानेद,रहीम और महर्षि दयानंद जैसे महापुरुष होंगे इसकी संभावना ही नहीं लगती क्योंकि अब लोग समाज में सुधार नहीं बल्कि उसका दोहन करना चाहते हैं। वह चाहे दहेज के रूप में हो या किसी धार्मिक कार्यक्रम के लिये चंदा लेना के।

कभी कभी निराशा लगती है पर जब अंतर्जाल पर लिखने वाले लोगों को देखते हैं तो लगता है कि ऐसा नहीं है कि सोचने वालों की कमी है पर हां समय लग सकता है। अभी तक तो संचार और प्रचार माध्यमों पर सशक्त और धनी लोगोंं का कब्जा इस तरह रहा है कि वह अपने हिसाब से बहस और विचार के मुद्दे तय करते हैं। अंतर्जाल पर यह वैचारिक गुलामी नहीं चलती दिख रही है। मुश्किल यह है कि रूढ़ हो चुके समाज में बौद्धिक वर्ग के अधिकतर सदस्य कंप्यूटर और इंटरनेट से कतरा रहे हैं। उनको अभी भी इसकी ताकत का अंदाजा नहीं है समय के साथ जब इसको लोकप्रियता प्राप्त होगी तो परिवर्तन की सोच को महत्व मिलेगा। वैसे जिन लोगों की समाज के विचारकों, चिंतकों और बुद्धिजीवियों को गुलाम बनाने की इच्छा है वह लगातार इस पर नजर रख रहे है कि कहीं यह आजाद माध्यम लोकप्रिय तो नहंी हो रहा है। जब यह लोकप्रिय हो जायेगा तो वह यहां भी अपना वर्चस्व कायम करने का प्रयास करेंगे।

मुख्य बात यह नहीं कि विषय क्या है? अब तो इस बात का प्रश्न है कि क्या लोगों की सोच नारे और वाद की सीमाओं से बाहर निकल पायेगी क्योंकि उसे दायरों में बांधे रखने का काम समाज के ताकतवर वर्ग ने ही किया है। जब हम किसी विषय पर सोचे तो उसक हर पहलू पर सोचें। नया सोचें। देश की कथित संस्कृति या सस्कारों पर भय की आशंकाओं से मुक्त होकर इस बात पर विचार करें कि लोगोंं के आचरण में जो दोहरापन उसे दूर करें। हमारे समाज की कथनी और करनी में अंतर साफ दिखाई देता है और इसी कारण समाज के संस्कार और संस्कृति की रक्षा करने का विषय उठाया जाता है वह अच्छा लगता है पर नीयत भी देखना होगी जो केवल उसका दोहन करने तक ही सीमित रह जाती है। इसी कथनी करनी के कारण भारतीय समाज के प्रति लोगों के मन में देश तथ विदेश दोनों ही जगह संशय की स्थिति है। शेष किसी अगले अंक में
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आतंक के विरुद्ध कार्रवाई आवश्यक-आलेख


भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध की प्रत्यक्ष रूप से युद्ध की संभावना नहीं है पर इस बात से इंकार करना भी कठिन है कि कोई सैन्य कार्यवाही नहीं होगी। पाकिस्तान के राष्ट्रपति जरदारी ने स्पष्ट रूप से 20 आतंकवादी भारत को सौंपने से इंकार कर दिया पर उन्होंने यह नहीं कहा कि वह उनके यहां नहीं है। स्पष्टतः उन्होंने दोनों पक्षों के बीच अपने आप को बचा लिया या कहें कि एकदम बेईमानी वाली बात नहीं की। हालांकि इससे यह आशा करना बेकार है कि वह कोई भारत के साथ तत्काल अपना दोस्ताना निभाने वाले हैं जिसकी चर्चा वह हमेशा कर रहे हैंं।

जरदारी आतंकवादियों का वह दंश झेल चुके हैं जिसका दर्द वही जानते हैं। अगर वह सोचते हैं कि आतंकवादियों का कोई क्षेत्र या धर्म होता है तो गलती पर हैंं। भारत के आतंकवादी उनके मित्र हैं तो उन्हें यह भ्रम भी नहीं पालना चाहिये क्योंकि यही आतंकवादी उनके भी मित्र हैं जो पाकिस्तान के लिये आतंकवादी है। आशय यह है कि आतंकवादी उसी तरह की राजनीति भी कर रहे हैं जैसे कि सामान्य राजनीति करने वाले करते हैं। राजनीति करने वाले लोग समाज को धर्म, जाति,भाषा, और क्षेत्र के नाम बांटते हैं और यही काम आतंकी अपराध करने वाले समूह सरकारो में बैठे लोगों के साथ कर रहे हैं। वह उनको बांटकर यह भ्रम पैदा करते हैं कि वह तो सभी के मित्र हैं। अगर आम आदमी की तरह शीर्षस्थ वर्ग के लोग भी अगर इसी तरह आतंकी अपराध करने वाले समूहों की चाल में आ जायेंगे तो फिर फर्क ही क्या रह जायेगा? आसिफ जरदारी किस तरह के नेता हैं पता नहीं? वह परिवक्व हैं या अपरिपक्व इस बात के प्रमाण अब मिल जायेंगे। एक बात तय रही कि जब तक भारत का आतंकवाद समाप्त नहीं होगा तब तक पाकिस्तान में अमन चैन नहीं होगा यह बात जरदारी को समझ लेना चाहिये।

कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि बेनजीर के शासनकाल में ही भारत के विरुद्ध आतंकवाद की शुरुआत हुई थी। अगर जरदारी अपनी स्वर्गीय पत्नी को सच में श्रद्धांजलि देना चाहते हैं तो वह चुपचाप इन आतंकवादियों को भारत को सौंप दें पर अगर वह अभी ऐसा करने में असमर्थ अनुभव करते हैं तो फिर उन्हें राजनीतिक चालें चलनी पड़ेंगी। इसमें उनको अमेरिका और भारत से बौद्धिक सहायता की आवश्यकता है पर सवाल यह है कि क्या अमेरिका अभी भी ढुलमुल नीति अपनाएगा। हालांकि उसके लिये अब ऐसा करना कठिन होगा क्योंकि रक्षा विशेषज्ञ उसे हमेशा चेताते हैं कि आतंकवादी भारत में अभ्यास कर फिर उसे अमेरिका में अजमाते हैं। अमेरिका की खुफिया एजेंसी एफ.बी.आई. ने ऐसे ही नहीं भारत में अपना पड़ाव डाला है। भारत की खुफिया ऐजेंसियेां के उनके संपर्क पुराने हैं और जिसके तहत एक दूसरे को सूचनाओं का आदान प्रदान होता है-यह बात अनेक बार प्रचार माध्यमों में आ चुकी है।

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव वान कहते हैं कि यह अकेले भारत पर नहीं बल्कि पूरे विश्व पर हमला है। इजरायल भी स्वयं अपने पर यह हमला बताता है। पाकिस्तान इस समय दुनियां में अकेला पड़ चुका है। ऐसे में अगर वहां लोकतांत्रिक सरकार नहीं होती तो शायद उसे और मुश्किल होती पर इस पर भी विशेषज्ञ एक अन्य राय रखते हैं वह यह कि जब वहां लोकतांत्रिक सरकार होती है तब वहां की सेना दूसरे देशों में आतंकवाद फैलाने के लिये बड़ी वारदात करती है पर जब वहां सैन्य शासन होता है तब वह कम स्तर पर यह प्रयास करती है। वह किसी तरह अपने लेाकतांत्रिक शासन का नकारा साबित कर अपना शासन स्थापित करना चाहती है।

अनेक विदेश और र+क्षा मामलों में विशेषज्ञ वहां किसी तरह सीधे आक्रमण करने के प+क्ष में हैंं। यह कूटनीति के अलावा सैन्य कार्यवाही के भी पक्षधर हैं। एक बात जो महत्वपूर्ण है। वह यह कि पाकिस्तान की सीमा अफगानिस्तान से लगी अपनी सीमा पर उन तालिबानों ने को तबाह करने में वहां की सेना अक्षम साबित हुई है और इसलिये वहां से भागना चाहती है और अब भारत के तनाव के चलते ही वह भारतीय सीमा पर भागती आ रही है। हो सकता है कि यह उसकी चाल हो। मुंबई में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. और सेना के हाथ होने के प्रमाण को विशेषज्ञ इसी बात का द्योतक मानते हैंं।

इस समय पाकिस्तान पूरे विश्व की नजरों में है और भारत जो भी कार्यवाही करेगा उसके लिये वह अन्य देशों को पहले विश्वास में लेगा तभी सफलता मिल पायेगी। भारत अकेला युद्ध करेगा पर उसके लिये उसे विश्व का समर्थन चाहिये। लोग सीधे कह रहे हैं कि अकेले ही तैश में आकर युद्ध करना ठीक नहीं होगा। पाकिस्तान की सेना का वहां अभी पूरी तरह नियंत्रण है और फिलहाल वहां के लोकतांत्रिक नेताओं का उनकी पकड़ से बाहर तत्काल निकलना संभव नहीं है। ऐसे में कुटनीतिक चालों के बाद ही कोई कार्यवाही होगी तब ही कोई परिणाम निकल पायेगा। अगर भारत ने कहीं विश्व की अनदेखी की तो उसके लिये भविष्य में परेशानी हो सकती है। जिन्होंने 1971 का युद्ध देखा है वह यह बता सकते हैं कि युद्ध कितनी बड़ी परेशानी का कारण बनता है। यही कारण है कि प्रबुद्ध वर्ग वैसी आक्रामक प्रतिक्रिया नहीं दे रहा जैसी कि प्रचार माध्यम चाहते हैं। यह प्रचार माध्यम अपनी व्यवसायिक प्रतिबद्धताओं के चलते देश भक्ति के जो नारे लगा रहे हैं वह इस बात का जवाब नहीं दे सकता कि क्या उसे इससे कोई आय नहीं हो रही है। एस.एम..एस. करने पर जनता का खर्च तो आता ही है।

पाकिस्तान के प्रचार माध्यम भी भारत के प्रचार माध्यमों की राह पर चलते हुए अपने देश में कथित रूप से भारत के बारे में दुष्प्रचार कर रहे हैं पर वह उस तरह का सच अपने लोगों का नहीं बता रहे जैसा कि भारतीय प्रचार माध्यम करते हैं। भले ही भारतीय प्रचार माध्यम अपने लिये ही कार्यक्रम बनाते हैं पर कभी कभार सच तो बता देते हैं पर पाकिस्तान के प्रचार माध्यम उससे अभी दूर हैंं। उन्हें यह समझ लेना चाहिये कि यह आंतकी अपराधी उनके देश के ही दुश्मन हैं। पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ जरदारी और प्रधानमंत्री गिलानी मोहरे हैं पर उन पर यह जिम्मेदारी आन पड़ी है जिस पर पाकिस्ताने के भविष्य का इतिहास निर्भर है। भारत के दुष्प्रचार में लगे पाक मीडिया को ऐसा करने की बजाय ऐसी सामग्री का प्रकाशन करना चाहिये जिससे कि वहां की जनता के मन में भारत के प्रति वैमनस्य न पैदा हो।
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क्रिकेट मैच से अधिक अच्छा लगता है ब्लाग/पत्रिका पर लिखना-हास्य व्यंग्य


अब फ़िर क्रिकट प्रतियोगिता शुरू होने की तैयारी हो रही है। अखबारों और टीवी पर उसका धूंआधार प्रचार होते देख एसा लगा कि क्रिकेट अब मुझसे अलविदा कह रही है।

पिछली बार इन्हीं दिनों मैने विश्व कप में भारत के हारने पर एक कविता लिखी थी अलविदा किकेट। उस समय सादा हिंदी फोंट में होने के कारण कोई उसे पढ़ नहीं पाया बाद में मैने इसे स्कैन कर एक ब्लाग रखा तो एक साथी ब्लागर ने लिखा कि ‘‘क्रिकेट तो मजे के लिये देखना चाहिए। कोई भी टीम हो हमें तो खेल का आनंद उठाना चाहिए। उन्होंने सभी टीमों के नाम भी गिनाए और उनमें एक भी टीम इसमें नहीं है। अगर मेरा वह यह लेख पढ़ें और उन्हें याद आये तो वह भी मानेंगे कि इस खेल से वह अब अपने को जोड़ नहीं पायेंगे।

एक अरब से अधिक आबादी वाले इस देश में बच्चा-बूढ़ा-जवान, स्त्री-पुरुष, डाक्टर-मरीज, प्रेमी-प्रेमिका, अमीर-गरीब, और सज्जन-दुर्जन सबके लिये यह खेल एक जुनून था तो केवल इसलिये कि कहीं न कहीं इसके साथ खेलने वाली टीमों के साथ उनका भावनात्मक लगाव था पर लगता है कि वह खत्म हो गया है। ऐसा लगता है कि क्रिकेट की यह प्रतियोगिता मेरी हास्य कविता का जवाब हो जैस कह रही हो ‘अलविदा प्यारे अब नहीं हम तुम्हारे’।

कोई आठ टीमें हैं जिनके नाम मैंने पढ़ें। उनमें से किसी के साथ मेरा तो क्या उन शहरों या प्रदेशें लोगों के जज्वात भी नही जुड़ सकते जिनके नाम पर यह टीमें हैं। क्या वहां लोग संवेदनहीन है जो उनको यह आभास नहीं होगा कि देश के क्रिकेट प्रेमियों का एक बहुत बड़ा हिस्सा इससे अलग हो गया है। कहते हैं कि क्रिकेट ने इस देश को एक किया और विभाजित क्रिकेट को देखकर क्या कहें?

लोगों के पास बहुत सारे संचार और प्रचार माध्यम हैं और सब जानने लगे हैं। लोगों को एक रखने के लिये वैसे भी क्रिकेट की जरूरत नहीं थी पर जिस तरह यह प्रतियोगिता शुरू हो रही है और उसमें जबरन लोगों की दिलचस्पी पैदा करने की जो कोशिश हो रही है वह विचारणीय है। अखबारों ने लिखा है कि इस पर करोड़ों रुपये को खेल होगा। कहने की जरूरत नहीं है कि इसमें वह सब कुछ खुलेआम होगा जो पहले पर्दे के पीछे होता था। अब आम क्रिकेट प्रेमी को किसी प्रकार की शिकायत का अधिकार नहीं है क्योंकि कौन देश के नाम उपयोग कर रहा है? पहले जिसे देखो वही टीम इंडिया की हार को भी शक से देख रहा है तो जीत को भी। तमाम चेहरे जो चमके उन पर लोग कालिख के निशान देखने लगते। अब उनका यह अधिकार नहीं है। शुद्ध रूप से मनोरंजन के लिये यह सब हो रहा है। अब यह फिल्म है या क्रिकेट हमारे पूछने या जानने का हक नहीं है।

इसके बावजूद कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिनकी तरफ ध्यान देना जरूरी है। इसके सामान्य क्रिकेट पर क्या प्रभाव होंगे? चाहे कितना भी किया जाये अगर राष्ट्रीय भावनायें नहीं जुड़ने से आम क्रिकेट प्रेमी तो इससे दूर ही होगा तो फिर इसके साथ कौन जुड़ेगा? इसका अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेले जाने वाले मैचों पर क्या अच्छा या बुरा प्रभाव होगा? कहने को कहते हैं कि निजी क्षेत्र तो जनता की मांग के अनुसार काम करता है पर अब सारी शक्तियां निजी क्षेत्र के हाथ में है तो वह अपने अनुसार लोगों की मांग निर्मित करना चाहता है। देखा जाये तो टीवी चैनलो और अखबारों में इसके प्रचार का लोगों पर कोई अधिक प्रभाव परिलक्षित नहीं हो रहा तो क्या वह इसकी खबरों को प्रमुखता देकर इसके लिये लोग जुटाने के प्रयास में लगे रहेंगे? हर क्रिकेट प्रेमी के दिमाग में एक शब्द था ‘भारत’ जिससे क्रिकेट को भाव का विस्तार होता था तो क्या नयी क्रिकेट के पास ऐसा कोई अन्य शब्द है जो फिर उसे विस्तार दे।

बीस ओवर की प्रतियोगिता में भारत की जीत के बाद मेरा मन कुछ देर के लिये क्रिकेट की तरफ गया था पर अब फिर वही हालत हो गयी। कल शुरू होने वाली प्रतियोगिता के लिये जो टीमों की सूची देखी तो मैं अपने आपसे पूछ रहा था ‘‘यह कौनसी क्रिकेट’’। आखिर कौन लोग इसे देखकर आनंद उठायेंगे। इस देश में आमतौर से लोग कहते है कि‘‘हमारे पास टाईम नहीं है’’पर क्रिकेट के लिए उनके पास टाईम और पैसे आ जाते हैं। मतलब यह कि कुछ लोगों के पास पैसे हैं पर उसके खर्च करने और टाईम पास करने के लिए कोई बहाना नहीं है और उनके लिए यह एक स्वर्णिम अवसर होगा।
जो मैच टीवी पर दिखता है उसको देखने के लिये भूखे प्यासे मैदान पर पहुंच जाते है ऐसे लोगों की इस देश में कमी नहीं है। जहां तक उनकी क्रिकेट में समझ का सवाल है तो अधिकतर टीवी पर अपनी शक्ल दिखाते हुए यह कहते हैं कि हम अपने हीरो को देखने आये थे। अब वहां जाकर कोई पूछ नहीं सकते कि क्या वह तुम को टीवी पर नहीं दिखाई देता।
खैर, कुल मिलाकर क्रिकेट अब खेल नहीं मनोरंजन बन गया है यह अलग बात है कि हम जैसे ब्लागर के लिये तो ऐसे मैचों से अच्छा यही होगा कि कोई फालतू कविता लिखकर मजा ले लें आखिर छहः सो रुपया हम इस पर खर्च कर रहे है।