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प्याज और प्रचार माध्यम-हिन्दी व्यंग्य (pyaj aur prachar madhyam-hindi vyangya)


प्याज के महंगे होने के लेकर हमारे देश के प्रचार माध्यम खूब छोड़ मचा रहे हैं। स्पष्टतः विज्ञापनों के बीच में प्रसारण में उनको इस विषय पर खूब सामग्री मिल रही है। सवाल यह है कि प्याज़ का महंगा होना क्या वाकई उतनी बड़ी समस्या है जितनी प्रचारित की जा रही है। संभव है देश के महानगरों में इसका असर हो पर छोटे शहरों में इसका कोई प्रभाव नहीं दिखाई दे रहा है।
एक मज़दूर से इस लेखक की चर्चा हुई।
उससे लेखक ने कहा-‘प्याज़ वाकई महंगी है।’
मज़दूर ने कहा कि‘नहीं, आज सुबह एक ठेले वाले से पूछा तो उसने पैंतीस रुपये किलो बताई।’-
लेखक ने कहा‘-वाकई बहुत महंगी है। अब देखो जो गरीब लोग सब्जी नहीं खरीद पाते उनके लिये प्याज ही सब्जी के रूप में बचती है।’
उस मज़दूर ने कहा-‘हमेशा तो नहीं खाते पर कभी कभी मिर्ची के साथ प्याज का सलाद बनाकर खा लेते हैं। बाकी महंगी तो सारी सब्जियां हो रही हैं। वैसे भी प्याज और लहसून कौन सभी लोग खाते हैं।’
जब प्याज़ के महंगे होने की बात आती है तो कहा जाता है कि गरीब लोग सब्जी की जगह इसका उपयोग कच्चे सलाद के रूप में ही करते हैं। हमारे देश में गरीब और मज़दूर की समस्याओं का रोना लेकर हिट होने का एक आसान फार्मूला है। ऐसे में जब किसी ऐसे विषय पर लिखा जाये जो वाकई संवेदनशील होने के साथ गरीब से भी जुड़ा हो तो कुछ प्रमाणिकता के साथ स्वयं भी जुड़ना चाहिए। हमने एक नहीं दो दिहाड़ी मज़दूरों को टटोला। महंगाई तथा अन्य समस्याओं से पीड़ित उन लोगों ने केवल प्याज़ की महंगाई को लेकर कोई अधिक बयान नहीं दिया।
हमारी जानकारी में यह दूसरा अवसर है जब प्याज़ की महंगाई की चर्चा हुई है। पहले चर्चा हुई तो पता चला कि उससे उस दौरान हुए राज्य विधानसभा चुनावों के परिणाम प्रभावित हुए। अब पता नहीं आगे क्या होगा?
जहां तक प्याज और लहसून का सवाल है तो इनका उपयोग सभी लोग नहंी करते। अनेक लोग तो इनका खाना ही अपराध समझते हैं। मनुस्मृति में प्याज़ को लेकर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया पर लहसून के सेवन के लिये मना किया गया है जो कि संभवतः प्याज की प्रजाति की ही उत्पति है। अनेक लोग तो प्याज खाने वालों को किराये पर मकान देने से मना कर देतें हैं और देते भी हैं तो न खाने की शर्त के साथ! लहसून को तो तामस पदार्थ माना गया है।
ऐसे में प्याज की कीमतें बढ़ने की चर्चा सीमित वर्ग को प्रभावित करतीं दिखती है वह भी केवल बड़े शहरों के बुद्धिमान नागरिकों को! प्रचार माध्यम इस पर प्रायोजित आंसु बहा रहे हैं। ऐसा लगता है कि उनको देश की बहुत फिक्र हैं। जबकि सच यह है कि प्याज़ के बढ़ने के समाचारों वजह से अन्य सब्जियां महंगी हो रही हैं।
चूंकि सारे टीवी चैनल महानगरों में है तो प्याज की महंगाई पर रोने के लिये वह लाते भी ऐसे ही लोग हैं जो धनी या मध्यम वर्ग के हैं। वह प्याज हाथ में लेकर उसकी महंगाई का रोना लेते हैं। हवाला इस बात का दिया जाता है गरीब इससे रोटी खाते हैं। ऐसे लोगों को देश की स्थिति का आभास नहीं है। इस देश में तो कई जगह ऐसी स्थिति है कि प्याज क्या लोग घास खाकर भी गुजारा करते हैं। जिनके पास पैसा नहीं है वह रोटी खाने के लिये प्याज क्या खरीदेंगे उनके पास तो रोटी भी नहीं होती। मुश्किल वही है कि गरीब के लिये रोते रहो और अपना चेहरा लोगों की आंखों पर थोपे रहो-इस फार्मूले पर काम करते रहने से प्रचार माध्यमों में अपना निरंतर रूप से चलाया जा सकता है।
वैसे भी प्याज़ को भोजन की कोई आवश्यक वस्तु नहीं माना जाता। ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने पूरी जिंदगी बिना प्याज़ खाये निकाली है। फिर भी जिन लोगों को गरीबों की चिंता है वह प्याज़ न खायें तो मर नहीं जायेंगे। इसलिये हमारी तो सलाह यह है कि जिन लोगों के पास अन्य सब्जियां खरीदने की शक्ति है वह तब तक प्याज का सेवन न करें जब तक वह सस्ता न हो जाये। ताकि गरीबों के लिये रोने वालों का प्रलाप हमारे सामने न आये। टीवी चैनलों पर अच्छी साड़ियां पहने महिलायें या जोरदार पैंट शर्ट पहने चश्मा लगाये पुरुष जब प्याज़ की महंगाई का रोना रोते हैं तो अफसोस होता है यह देखकर कि उनकी सहशीलता कम हो गयी है। जिस प्याज़ के बिना उनके ही देश के अनेक लोग जिंदा रह जाते हैं उसे वह एक महीने के लिये नहीं छोड़ सकते। बहरहाल या प्याज की महंगाई का पुराण भी एक प्रचार माध्यमों का ढकोसला है जिनको विज्ञापन के बीच अपना काम चलाना है।
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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
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शराबी ईमेल-हास्य व्यंग्य (hasya vyangya)


उस ईमेल में सबसे ऊपर लगे फोटो में शराब की बोतलें सजी थीं। नीचे संदेश में लिखा था कि ‘कृपया इस ईमेल को ध्वस्त न करें। इसे पढ़ें और अपने अन्य मित्रों को भेजें। इस ईमेल को पढ़कर एक आदमी ने इसे ध्वस्त कर दिया तो अगले दिन ही सुबह उसके घर में रखी शराब की बोतल अपने आप ही गिर कर टूट गयी।
एक आदमी ने यह ईमेल पांच लोगों को भेजा तो उसे सुबह ही मुफ्त पांच बोतलों का पार्सल मिला।
एक आदमी ने इसे दस लोगों को भेजा तो उसे उसके मित्र ने एक बढ़िया काकटेल पार्टी दी।
एक अधिकारी ने इसे पंद्रह लोगों को भेजा तो अगले दिन ही उसे प्रमोशन मिल गया।’
यह एक मित्र ने भेजा था और साथ में लिखा था कि इसे मजाक न समझें। हम बहुत गंभीर हो गये। इस बात को लेकर कि हम जैसे व्यक्ति के साथ इस तरह का मजाक करना खतरनाक भी हो सकता था। छहः वर्ष पहले छूटी लत वापस भी आ सकती थी पर लिखने का यह नशा जो बचपन से लगा है उसकी वजह से बचने की संभावना थी पर फ्री में शराब की बोतल का मोह छोड़ना मुश्किल था।
अगले दिन हम एक शराब की दुकान के पास से गुजर रहे थे तो ईमेल की याद आ गयी तो वहीं खड़े हो गये। दरअसल हमें उस फोटो की याद आ गयी। पीछे से एक मित्र ने टोककर कहा-‘चले जाओ, खरीद लो बोतल। डरते किसलिये हो। कोई नहीं देख रहा सिवाय हमारे। हां अगर घर बुलाकर एकाध पैग पिला दो तो हम किसी से नहीं कहेंगे। वैसे तुम कवि हो और इसका सेवन तुम्हारे लिये फायदेमंद है। अच्छी कवितायें लिख लोगे।
हमने कहा-‘क्या इस शराब वाले ने तुम्हें कोई कमीशन दिया है जो प्रचार कर रहे हो? हम तो बस बोतलें देख रहे थे। वैसे ही सजी थीं जैसे कि हमारे ईमेल पर। हमने पांच लोगों को ईमेल भेजा है और सोच रहे थे कि शायद यह शराब वाला हमें मुफ्त में दो चार शराब की बोतलें देगा। सुबह से कोई पार्सल तो मिला नहीं।’
वह मित्र घूरकर हमें देखने लगा और बोला-‘यह क्या कह रहे हो?’
हमने कहा-‘सच कह रहे हैं हमने पांच लोगों को ईमेल किया है। हमें एक ईमेल मिला था जिसमें लिखा था कि यही ईमेल अगर मित्रों को भेजोगे तो कुछ न कुछ मिलेगा। हमने सोचा कि ब्लाग तो हमारे हिट होने से रहे तो हो सकता है कि शराब की एकाध बोतल ही फ्री में मिल जाये।’
उसे हमने पूरी कथा सुनाई तो वह एकदम चीख पड़ा-‘क्या बात है शराब के नाम पर अभी भी तुम बहकने लगते हो। कहते हो कि छोड़ दी है फिर यह कैसा स्वांग रचा है। लगता है कि इंटरनेट ने तुम्हारे दिमाग के सारे बल्ब फ्यूज कर दिये हैं।’
हमने कहा-‘सच कह रहे हैं हमने पांच लोगों को ईमेल भेजा है।’
’’अच्छा-‘’वह घूरकर बोला-‘आज से बीस साल पहले हमने तुम्हें एक सर्वशक्तिमान की एक दरबार के लिये एक पर्चा दिया था कि इसे छपवाकर सौ लोगों को दो तो फायदा होगा तब तुमने कहा था कि यह सब ढकोसला है और आज ईमेल पर शराब का संदेश भेजने की बात आ गयी तो सब भूल गये। क्या जमाना आया गया। आदमी सर्वशक्तिमान के संदेश छपवाता नहीं है पर शराब के ईमेल भेजने को तैयार है।’
तब हमें याद आया कि इस तरह के पर्चे पहले छपते थे कि अमुक जगह सर्वशक्तिमान के अमुक रूप की तस्वीर प्रकट हुई है। उसके बारे में यह पर्चा छपवाकर सौ लोगों को भेजो तो सारी समस्या हल हो जायेगी। दरअसल यह सर्वशक्तिमानों के दरबारों का प्रचार होता था। उसमें यह भी बताया जाता था कि अमुक जगह अमुक तस्वीर मिली तो जिसने प्रचार किया उसको लाभ हुआ जिसने वह पर्चे छपवाने की बजाय फैंक दिया तो उसे हानि हुई। हमने सतर्कता से मित्र को जवाब दिया-‘वह पर्चे छपवाने में पैसे खर्च होते हैं जबकि हमारा इंटरनेट कनेक्शन ब्राडबैंड वाला है इसलिये कोई अलग से पैसा नहीं देना पड़ता। इसलिये प्रयास करने में क्या बुराई है।’
मित्र बोला-‘हां, इससे इंटरनेट के कनेक्शन बने रहेंगे यह क्या कम है? उनकी कमाई नहीं होगी। फिर यह पूरब और पश्चिम का मेल कैसे हो रहा है? कहां अध्यात्म की बातें करते हो और कहां यह शराब की दुकान पर झांक रहे हो। निकल लो। किसी चाहने वाले ने देख लिया तो उसके सामने तुम्हारी पोल खुल जायेगी।’
हम सहम गये। हमारे दिमाग से ईमेल वाली बात निकल ही नहीं रही थी। पांच लोगों को ईमेल किया था पर कहीं से कोई पार्सल आदि नहीं मिला। फिर सोचा कि-‘यार, यह इंटरनेट पर पूरब पश्चिम का मेल कुछ इस तरह ही होगा। प्रचार का तरीका पुराना पर इष्ट तो नया होगा। कहां सर्वशक्तिमान के स्वरूप आदमी को प्रिय थे अब तो यह शराब ही प्रिय है।’

हमने गलत नहीं सोचा। टीवी, कूलर,फ्रिज, और गाड़ियों का अविष्कार इस देश में नहीं हुआ पर उपलब्ध सभी को हैं। हां, उनके उपयोग का तरीका जरूर पश्चिमी देशों से नहीं मिलता। कारें तो एक से एक सुंदर आ रही हैं पर रोड पुरानी और खटारा है। फ्र्रिज है पर लाईट की उठक बैठक उसके साथ लगी हुई है। टीवी आया पर विदेश के लोग उसका आनंद उठाते हैं जबकि हम लोग चिपक जाते हैं। फिर यह सभी चीजें चाहिये पर दहेज के रूप में। मतलब यह कि हम अपने चलने फिरने का ढर्रा नहीं बदल सकते पर इस्तेमाल करने वाली चीजों का बदल देते हैं। यही हाल उस शराब की ईमेल का है। पहले सर्वशक्तिमान की दरबारें कमाई का जरिया होती थी तो अब शराब की दुकानें हो गयी हैं इसलिये प्रचार के लिये उनका ही तो फोटा लगेगा न!
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मुस्कराहट का मुखौटा-व्यंग्य कविता


बेकद्रों की महफिल में मत जाना
बहस के नाम पर वहां बस कोहराम मचेगा
पर कौन, किसकी कद्र करेगा।
मुस्कराहट का मुखौटा लगाये सभी
हर शहर में घूम रहे हैं
जो मिल नहीं पाती खुशी उसे
ढूंढते हुए झूम रहे हैं
दूसरे के पसीने में तलाश रहे हैं
अपने लिये चैन की जिंदगी
उनके लिये अपना खून अमृत है
दूसरे का है गंदगी
तुम बेकद्रों को दूर से देखते रहकर
उनकी हंसी के पीछे के कड़वे सच को देखना
दिल से टूटे बिखरे लोग
अपने आपसे भागते नजर आते हैं
शोर मचाकर उसे छिपाते हैं
उनकी मजाक पर सहम मत जाना
अपने शरीर से बहते पसीने को सहलाना
दूसरा कोई इज्जत से उसकी कीमत
कभी तय नहीं करेगा।

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