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माया का असली और नकली खेल-हिन्दी व्यंग्य (maya ka asli aur nakali khel-hindi vyangya)


काग़ज के नोट वैसे भी नकली माया की प्रतीक है क्योंकि उनसे कोई वस्तु खरीदी जा सकती है पर उनका कोई उपयोग नहीं है। हर नोट पर रिजर्व बैंक इंडिया के गवर्नर का एक प्रमाण पत्र रहता है जिस पर लिखा रहता है कि मैं इसके धारा को अंकित रुपया देने का वचन देता हूं। चूंकि वह एक सम्मानित व्यक्ति होता है इसलिये उसका प्रमाण पत्र नोट को नोट प्रमाण बना देता है। कहने का अभिप्राय यह है कि नोट असली माया का प्रतीक है पर स्वयं नकली है पर कमबख्त अब तो नकली माया में भी नकली का संकट खड़ा हो गया लगता है।
इधर सुनते हैं कि चारों तरफ नकली नोटों का बोलबाला है। कहीं  दूध तो कहीं खोए के भी नकली होने की चर्चा आती है। एक तो सारा संसाद ही मिथ्या माया का प्रतीक और उसमें भी मिथ्या।
बड़े बड़े अध्यात्मिक चिंतक इस देश में हुए हैं पर किसी ने अपनी तपस्या, यज्ञ या सत्संग में मिथ्या संसार में भी मिथ्या माया की खोज नहीं की। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि अपना अध्यात्मिक चिंतन भी चूक गया है क्योंकि वह तो संसार के मिथ्या होने तक ही सीमित है। मिथ्या में भी मिथ्या के आगे वह बेबस हो जाता है।
इधर एक दूग्ध संघ के अधिकारी के पास जांच अधिकारियों को माया के अपरंपार भंडार मिले हैं और उनके लाकर नित नित नये प्रमाण उगल रहे हैं। अब यह कहना मुश्किल है कि सरकारी दुग्ध भंडार के अधिकारी ने दूध से काली कमाई कैसे की? नकली दूध बनाकर बेचा या फिर पानी मिलाकर आम उपभोक्ता को पिलाया! उनके खज़ाने में नकली नोट भी मिल रहे हैं और इससे एक बात जाहिर होती है कि जब आदमी के सामने नोट आता है तो वह उसके आने के अच्छे या बुरे रास्ते आने पर विचार नहीं कर सकता पर अब तो यह हालत है कि नकल और असल की भी पहचान नहीं रही।
मुश्किल यह है कि दूध सफेद ही बेचा जा सकता है पर उससे काली कमाई करने के दो तीन तरीके प्रचलित हैं-पानी मिलाकर, नकली बनाकर या पावडर से तैयार कर! शुद्ध दूध तो आजकल उनको ही मिलना संभव है जिन्होंने पिछले जन्म में पुण्य किये हों या स्वयं ही दूसरों को शुद्ध दूध प्रदान किया हो।
देश की जनसंख्या बढ़ रही है और उसके कारण महंगाई भी! खाद्य और पेय पदार्थों की कमी के कारण यह सभी हो रहा है। दुनियां के बहुत सारे झूठ हैं जिनमें यह भी एक शामिल है क्योंकि अपना मानना है कि सारा संकट अकुशल प्रबंध से जुड़ा है जिसे छिपाने के लिये ऐसा कहा जाता है। मुश्किल यह है कि इस देश में शिखर पर बैठे लोगों ने तय किया है कि कोई काम आसानी से नहीं होने देंगे। पूंजीपति के लिये सारे रास्ते आसान है पर आम इंसान के लिये सभ्ीा जगह मुश्किलों का ढेर है। जिसके पास अवसर आ रहा है वही नोट एकत्रित करने लगता है-न वह काला रास्ता देखता है न सफेद।
अलबत्ता दूध सफेद है तो वह सफेद ही रहेगा-असली हो या नकली। नोट भी नोट रहेगा असली या नकली। किसी भी दुग्ध संध के बड़े अधिकारी स्वयं दूध नहीं बेचते। दूध के विपणन में उनकी अप्रत्यक्ष भूमिका होती है पर उसका निर्णायक महत्व होता है। दूध खरीदना बेचने की सामान्य प्रक्रिया के बीच एक तंत्र है जिसमें ठेके और कमीशन का खेल चलता है। तय बात है कि यह नकली नोट भी किसी ने अपने काम के लिये दिये होंगे। उसका काम असली हुआ पर माल नकली दे गया। किसने देखा कि माल भी नकली रहा हो।
हजार और पांच सौ नोटों का मामला अज़ीब है। एक तरह से समानातंर व्यवस्था चलती दिख रही है। जब सब्जी या अन्य छोटा सामान खरीदना होता है तो सौ, पचास और दस का नोट जेब में देखकर चलना होता है। बैंक से एटीएम में पांच सौ हजार का नोट जब निकलता है तो एक तो चिंता यह होती है कि कहीं नकली न आ जाये दूसरा यह भी कि उनके खर्च करने के लिये कौनसी बड़ी खरीददार होगी। हम यह दावा तो नहीं कर सकते कि कभी नकली नहीं आया क्योंकि अगर आया भी होगा तो चल गया हो, कौन कह सकता है। अलबत्ता कुछ लोगों ने ऐसी शिकायते की हैं कि बैंकों से भी नकली नोट निकले हैं। बहरहाल बड़े नोटों को बड़ी खरीददारी में खर्च कर छोटे नोट जुटाते हैं ताकि उनका छोटी खरीददारी में उपयोग किया जाये। इस तनाव में थोड़ा दृष्टिपात करें तो अपने आप को दो अर्थव्यवस्थाओं के बीच फंसा पायेंगे।
ऐसे में कभी कभी बड़ा डर लगता है कि कहीं अपने हाथ एक हजार या पांच सौं का नोट आ गया तो क्या कहेंगे-माया में भी नकली माया!

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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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वैश्विक समाजों का अंतर्द्वंद्व और अंतर्जाल-आलेख (hindi article on the social matter)


यहां हम इस मुद्दे पर चर्चा नहीं करने जा रहे कि किसी अश्लील वेबसाईट पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिये या नहीं और न ही इसके देखने या न देखने के औचित्य पर सवाल उठा रहे हैं बल्कि हमारा मुख्य ध्येय है यह है कि हम समाज के उस अंतद्वंद्व को देखें जिस पर किसी अन्य की नजर नहीं जा रही। यहां हम चीन और भारतीय समाजों को केंद्र बिंदु में रखकर यह चर्चा कर रहे हैं जहां इस तरह की अश्लील वेबसाईटों पर प्रतिबंध लगाने की चर्चा है। भारत में तो केवल एक ही वेबसाईट पर रोक लगी है-जिसके बारे में अंतर्जाल के लेखक कह रहे हैं कि यह तो समंदर से बूंद निकलाने के बराबर है-पर चीन तो सारी की सारी वेबसाईटों के पीछे पड़ गया है।

कुछ दिनों पहले तक कथित समाज विशेषज्ञ चीन के मुकाबले दो कारणों से पिछड़ा बताते थे। एक तो वहां औसत में कंप्यूटर भारत से अधिक उपलब्ध हैं दूसरा वहां इंटरनेट पर भी लोगों की सक्रियता अधिक है। इन दोनों की उपलब्धता अगर विकास का प्रमाण है तो दूसरा यह भी सच है कि अंतर्जाल पर इन्हीं यौन साहित्य और सामग्री से सुसज्जित वेबसाईटों ने ही अधिक प्रयोक्ता बनाने के लिये इसमें योगदान दिया है। अंतर्जाल ने शिक्षा, साहित्य, व्यापार तथा आपसी संपर्क बढ़ाने मे जो योगदान दिया है उससे कोई इंकार नहीं कर सकता पर सवाल यह भी कि ऐसे सात्विक उद्देश्य की पूर्ति कितने प्रयोक्ता कर रहे हैं? यह लेखक ढाई वर्ष से इस अंतर्जाल को निकटता से देख रहा है और उसका यह अनुभव रहा है कि भारत में प्रयोक्ताओं का एक बहुत बड़ा वर्ग केवल मनोरंजन के लिये इसे ले रहा है। इससे भी आगे यह कहें कि वह असाधारण मनोरंजन की चाहत इससे पूरी करना चाहता है। जिस तरह चीन सरकार आक्रामक हो उठी है तो उससे तो यही लगता है कि वहां भी इसी तरह का ही समाज है।
अनेक ब्लाग लेखकों ने यह बताया है कि यौन सामग्री वाली वेबसाईटों में ढेर सारी कमाई है और यह इतनी है कि गूगल और याहू जैसी कंपनियों के लिये भी कल्पनातीत है। कोई वेबसाईट दस माह में ही इतनी प्रसिद्ध हो जाती है कि उस पर प्रतिबंध लग जाता है। इसमें समाज के बिगड़ने की चिंता के साथ आर्थिक पक्ष भी हो सकता है। एक आश्चर्य की बात यह है कि दस माह में कोई वेबसाईट इतनी लोकप्रिय कैसे हो जाती है? निश्चित रूप से चीन ने अपने देश की बहुत बड़ी राशि बाहर जाने से रोकने के लिये ही ऐसा किया होगा। उसे रोकने के लिये अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रयास हो रहे हैं जो कि इस बात का प्रमाण है कि कहीं न कहीं इन प्रतिबंधों के पीछे आर्थिक कारण भी है।
भारत और चीनी समाज में बहुत सारी समानतायें हैं। अंतर है बस इतना कि यहां वेबसाईट पर प्रतिबंधों का विरोध मुखर ढंग से किया जा सकता है पर वहां यह संभव नहीं है। वैसे दोनों ही समाजों में बूढ़ों को सम्मान से देखा जाता है और यही कारण है कि समाज पर नियंत्रण के लिये उनकी राय ली जाती है। समस्या यह है आदमी जब युवा होता है तब वह यौन साहित्य छिपकर पढ़ाा है पर बूढ़ा होने पर युवाओं को पढ़ने से रोकना चाहता है। यही दोनों समाजों की समस्या भी है। इसके अलावा सभी चाहते हैं कि वह पश्चिम द्वारा बनाये आधुनिक साधनों का उपयोग तो करें पर उसके रहन सहन की शैली और नियम न अपनायें। सभी लोग भौतिक परिलब्धियों के पीछे अंधाधुंध भाग रहे पर चाहते हैं कि देश की संस्कृति और स्वरूप की रक्षा सरकार करे।
इसमें एक मजेदार विरोधाभास दिखाई देता है। भारत और चीन के समाजों में माता, पिता, गुरु और धर्म चारों ही हमेशा संस्कृति और संस्कार का आधार स्तंभ माना जाते हैं। माता को तो प्रथम गुरु माना जाता है जो बच्चे में संस्कार और संस्कृति के बीच बोती है। गुरुपूर्णिमा हमारे यहां मनायी जाती है पर अब पश्चिमी प्रभाव से माता पिता दिवस भी मनाने लगे हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जब हम संस्कृति के लड़खड़ाने की बात करते हैं तो क्या हमारा यह आशय है कि हमारे यह चारों स्तंभ अब काम नहीं करे रहे? अगर कर रहे हैं तो फिर युवाओं के बिगड़ने का भय क्यों सता रहा है? अगर नहीं कर रहे हैं तो फिर संस्कृति को बचाने की जरूरत ही क्या है?
सीधी बात तो यह है कि हम पश्चिमी साधनों को तो हासिल कर लेते हैं पर उसके उपयोग के नियमों को नहीं अपनाना चाहते। कंप्यूटर सभी जगह अपनाना जा रहा है पर उस पर काम करने के कायदे कहीं लागू नहीं है। कंप्यूटर अधिक काम करता है पर चलाता तो आदमी ही है न! मगर उसे भी कंप्यूटर मानकर उससे कैसे काम लिया जाता है? यह कौन देख रहा है? यही हालत हवाई जहाज की है। उसे उड़ाने वाले पायलटों का नियम से कितना चलाया जाता है? यह अलग से बहस का विषय है।
हम चलना तो चाहते हैं कि पश्चिम की खुले समाज की अवधारणा की राह पर अपनी शर्तों के साथ। हम कंप्यूटर और अंतर्जाल प्रयोक्ताओं की अधिक संख्या को विकास का प्रतीक मानकर चर्चा करते हैं पर क्या यह सच नहीं है कि लोगों के यौन साहित्य पढ़ने और देखने की ललक ही इसके लिये अधिक जिम्मेदार है। सही आंकड़े तो इस लेखक के पास नहीं है पर अनुमान से यह कह सकता है कि चीन ने यौन सामग्री की वेबसाईटों को अगर प्रभावपूर्ण ढंग से लागू किया तो यकीनन उसका इन दोनों मामलों में ग्राफ नीचे गिर सकता है। शिक्षा, साहित्य सृजन, रचनात्मक कार्य, आपसी संपर्क और व्यापार में इंटरनेट की अहम भूमिका है पर क्या उसके प्रयोक्ताओं के दम पर ही इतना बड़ा अंतर्जाल चल सकता है? यह विशेषज्ञों को देखना होगा।
हम अंतर्जाल के प्रयोक्ताओं को यह समझा सकते हैं कि टीवी, अखबार, बाहर मिलने वाली किताबों और सीडी आदि से जो काम चल सकता है उसके लिये यहंा आंखें न फोड़कर अपनी सात्विक जिज्ञासाओं के लिये इसका उपयोग करे। इसके लिये इंटरनेट और टेलीफोन कंपनियों को प्रयास कर ऐसे लोगों को सहायता करनी होगी जो अपने रचनात्मक भूमिका से समाज के युवकों के मन में सात्विक जिज्ञासायें जगाये रख सकते हैं। यह काम कम से कम समाजों के वर्तमान शिखर पुरुषों का बूते का तो नहीं लगता जो उनके नेतृत्व करने का दावा तो करते हैं पर जब नियंत्रण की बात आती है तो वह लट्ठ और नियम के आसरे बैठ कर अपने मूंह से शब्दों की जुगाली करते हैं। समाज के नये संत तो अब वही बन सकते हैं जो इंटरनेट पर रचनात्मक काम करते हुए युवा पीढ़ी में सात्विक जिज्ञासा और इच्छा उत्पन्न कर सकते हैं-वह कोई पुराना धार्मिक या सामाजिक चोला पहनने वालों हों यह जरूरी नहीं है। हो सकता है कि यौन सामग्री और साहित्य प्रस्तुत करने वाली वेबसाईटों से इंटरनेट और टेलीफोन कंपनियां इसलिये भी खुश हों कि वह उनके लिये प्रयोक्ता जुटा रही हैं पर इससे उनका भविष्य सुरक्षित नहीं हो जायेगा। जिस तरह आदमी समाचार पत्र पत्रिकाओं, किताबों, टीवी चैनलों और फिल्मों की यौन सामग्री से बोर होकर अंतर्जाल पर सक्रिय हो रहा है तो आगे उसमें वैसी विरक्ति भी आ सकती है। संभव है अन्य प्रचार माध्यम अपने यहां कुछ नया करें कि अंतर्जाल को प्रयोक्ता इसे छोड़कर वहां चला जाये। क्या यह दिलचस्प नहीं है कि हर मुद्दे को उठाकर सनसनी फैलाने और आजादी की दुहाई देने वाले टीवी चैनल और अखबार एक वेबसाईट पर प्रतिबंध लगने की तरफ से उदासीन हो गये हैं। उन्हें डर रहा होगा कि कहीं उस वेबसाईट का नाम लें तो उनका उपभोक्ता उसकी तरफ न चला जाये।
इंटरनेट में रचनात्मक काम, संवाद प्रेषण, साहित्य सृजन और व्यापार की संभावनायें और इस पर ही अधिक काम किया जाये तो इसमें निरंतरता बनी रहेगी। वेबसाईटों पर प्रतिबंध के क्या परिणाम है यह तो पता नहीं मगर यह बात निश्चित है कि पश्चिम में भी अंतर्जाल के विकास में इन्हीं यौन साहित्य और सामग्री से सुसज्तित वेबसाईटों को योगदान रहा है। कुछ लोग कह रहे हैं कि पश्चिम में लोग अब अंतर्जाल यौन साहित्य से ऊब कर सात्विक विषयों की तरफ बढ़ रहे हैं। संभव है कि भारत और चीन में भी आगे यह हो पर तब इंटरनेट और टेलीफोन कंपनियां रचनात्मक कर्म करने वाले लोगों को ढूंढती रह जायेंगी पर उनको वह मिलेंगे नहीं। रचनात्मक काम करना एक आदत होती है जिसे बनाये रखने के लिय सामान्य आदमी श्रम करता है तो धनी आदमी को उसमें विनिवेश करना चाहिये। हो सकता है कि लेखक की यह सोच औार धारणायें गलत हों पर अंतर्जाल पर जो अनुभव पाया है उसके आधार पर लिख रहा है। यह लेखक कोई ब्रह्मा तो है नहीं कि उसका सत्य अंतिम मान लिया जाये।
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