Tag Archives: दीपक राज कुकरेजा

जिंदगी का हिसाब-हिंदी व्यंग्य कविता


कुदरत की अपनी चाल है

इंसान की अपनी चालाकियां है,

कसूर करते समय

सजा से रहते अनजान

यह अलग बात है कि

सर्वशक्तिमान की सजा की भी बारीकियां हैं,

दौलत शौहरत और ओहदे की ऊंचाई पर

बैठकर इंसान घमंड में आ ही जाता है,

सर्वशक्तिमान के दरबार में हाजिरी देकर

बंदों में खबर बनकर इतराता है,

आकाश में बैठा सर्वशक्तिमान भी

गुब्बारे की तरह हवा भरता

इंसान के बढ़ते कसूरों पर

बस, मुस्कराता है

फोड़ता है जब पाप का घड़ा

तब आवाज भी नहीं लगाता है।

कहें दीपक बापू

अहंकार ज्ञान को खा जाता है,

मद बुद्धि को चबा जाता है,

अपने दुष्कर्म पर कितनी खुशफहमी होती लोगों को

किसी को कुछ दिख नहीं रहा है,

पता नहीं उनको कोई हिसाब लिख रहा है,

गिरते हैं झूठ की ऊंचाई से लोग,

किसी को होती कैद

किसी को घेर लेता रोग

उनकी हालत पर

जमीन पर खड़े इंसानों को तरस ही जाता है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””
Gwalior, madhyapradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

poet, Editor and writer-Deepak  ‘Bharatdeep’,Gwalior
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माया का तिलिस्म-हिंदी व्यंग्य कविता


देश में तरक्की बहुत हो गयी है

यह सभी कहेंगे,

मगर सड़कें संकरी है

कारें बहुत हैं

इसलिये हादसे होते रहेंगे,

रुपया बहुत फैला है बाज़ार में

मगर दौलत वाले कम हैं,

इसलिये लूटने वाले भी

उनका बोझ हल्का कर

स्वयं ढोते रहेंगे।

कहें दीपक बापू

टूटता नहीं तिलस्म कभी माया का,

पत्थर पर पांव रखकर

उस सोने का पीछा करते हैं लोग

जो न कभी दिल भरता

न काम करता कोई काया का,

फरिश्ते पी गये सारा अमृत

इंसानों ने शराब को संस्कार  बना लिया,

अपनी जिदगी से बेजार हो गये लोगों ने

मनोरंजन के लिये

सर्वशक्तिमान की आराधना को

खाली समय

पढ़ने का किस्सा बना लिया,

बदहवास और मदहोश लोग

आकाश में उड़ने की चाहत लिये

जमीन पर यूं ही गिरते रहेंगे।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””
Gwalior, madhyapradesh

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शांति और हथियार के सौदागर-हिंदी व्यंग्य कविता


 

जंग के लिये जो अपने  घर में हथियार बनाते हैं,

बारूद का सामान बाज़ार में  लोगों को थमाते हैं।

दुनियां में उठाये हैं वही शांति का झंडा अपने हाथ

खून खराबा कहीं भी हो, आंसु बहाने चले आते हैं।

कहें दीपक बापू, सबसे ज्यादा कत्ल जिनके नाम

इंसानी हकों के समूह गीत वही दुनियां में गाते हैं।

पराये पसीने से भरे हैं जिन्होंने अपने सोने के भंडार

गरीबों के भले का नारे वही जोर से सुनाते हैं।

अपनी सोच किसको कब कहां और  कैसे सुनायें

चालाक सौदागरों के जाल में लोग खुद ही फंसे जाते हैं।

खरीद लिये हैं उन्होंने बड़े और छोटे रुपहले पर्दे

इसलिये कातिल ही फरिश्ते बनकर सामने आते हैं।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”,Gwalior madhya pradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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बीमार बन गए चिकित्सक -हिंदी व्यंग्य कविता


इस जहान में आधे से ज्यादा लोग

चिकित्सक हो गये हैं,

अपनी बीमारियों की दवायें खाते खाते

इतना अभ्यास कर लिया है कि

वह बीमारी और दवा के बीच

अपना अस्तित्व खो रहे हैं,

बताते हैं दूसरों को दवा

भले कभी खुद ठीक न हो रहे हों।

कहें दीपक बापू

अपनी छींक आते ही हम

रुमाल लगा लेते हैं

इस भय से कि कोई देखकर

दुःखी हो जायेगा,

बड़ी बीमारी का भय दिखाकर

बड़े चिकित्सक का रास्ता बतायेगा,

सत्संग में भी सत्य पर कम

मधुमेह पर चर्चा ज्यादा होती है,

सर्वशक्तिमान से ज्यादा

दवाओं  पर बात  होती है,

कितनी बीमारियां

कितनी दवायें

बीमार समाज देखकर लगता है

छिपकर खुशी की सांस ली जाये,

लाचार शरीर में लोग

ऊबा हुआ मन ढो रहे हैं,

बीमार खुश है अपनी बीमारी और दवाओं पर

भीड़ में सत्संग कर

यह सोचते हुए कि

वह स्वास्थ्य का बीज बो रहे हैं।

 लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
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लुटेरों की खता नही है-हिंदी व्यंग्य कविता


दौलत की दौड़ में बदहवास है पूरा जमाना

या धोखा है हमारे नजरिये में

यह हमें भी पता नहीं है,

कभी लोगो की चाल पर

कभी अपने ख्याल पर

शक होता है

दुनियां चल रही अपने दस्तूर से दूर

सवाल उठाओ

जवाब में होता यही दावा

किसी की भी खता नहीं है।

कहें दीपक बापू

शैतान धरती के नीचे उगते हैं,

या आकाश से ज़मीन पर झुकते हैं,

सभी चेहरे सफेद दिखते हैं,

चमकते मुखौटे बाजार में बिकते हैं,

उंगली उठायें किसकी तरफ

सिलसिलेवार होते कसूर पर

इंसानियत की दलीलों से जहन्नुम में

जन्नत की तलाश करते लोगों की नज़र में

पहरेदार की तलाशी होना चाहिये पहले

कहीं अस्मत लुटी,

कहीं किस्मत की गर्दन घुटी,

लुटेरों की खता नही है।

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लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
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हिंदी दिवस पर हास्य कविता-राष्ट्रभाषा का महत्व अंग्रेजी में समझाते


हिन्दी दिवस हर बार

यूं ही मनाया जायेगा,

राष्ट्रभाषा का महत्व

अंग्रेजी में बोलेंगे बड़े लोग

कहीं हिंग्लिश में

नेशनल लैंग्वेज का इर्म्पोटेंस

मुस्कराते समझाया जायेगा।

कहें दीपक बापू

पता ही नहीं लगता कि

लोग तुतला कर बोल रहे हैं

या झुंझला कर भाषा का भाव तोल रहे हैं,

हिन्दी लिखने वालों को

बोलना भी सिखाया जायेगा,

हमें तसल्ली है

अंग्रेजी में रोज सजती है महफिलें

14 सितम्बर को हिन्दी के नाम पर

चाय, नाश्ता और शराब का

दौर भी एक दिन चल जायेगा।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”,Gwalior madhya pradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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हिन्दी दिवस पर विशेष निबंध लेख-अध्यात्म की भाषा हिन्दी को चाटुकार संबल नहीं दे सकते


                        14 सितम्बर 2013 को एक बार फिर हिन्दी दिवस मनाया जा रहा है।  इस अवसर पर सरकारी तथा अर्द्धसरकारी तथा निजी संस्थाओं में कहीं हिन्दी सप्ताह तो कही पखवाड़ा मनाया जायेगा।  इस अवसर पर सभी जगह जो कार्यक्रम आयोजित होंगे उसमें निबंध, कहानी तथा कविता लेखन के साथ ही वादविवाद प्रतियोगितायें होंगी। कहीं परिचर्चा आयोजित होगी।  अनेक लोग भारत में हिन्दी दिवस मनाये जाने पर व्यंग्य करते हैं। उनका मानना है कि यह देश के लिये दुःखद है कि राष्ट्रभाषा के लिये हमें एक दिन चुनना पड़ता है।  उनका यह भी मानना है कि हिन्दी भाषा अभी भी अंग्रेजी के सामने दोयम दर्जे की है।  कुछ लोग तो अब भी हिन्दी को देश में दयनीय स्थिति में मानते हैं। दरअसल ऐसे विद्वानों ने अपने अंदर पूर्वाग्रह पाल रखा है। टीवी चैनल, अखबार तथा पत्रिकाओं में उनके लिये छपना तो आसान है पर उनका चिंत्तन और दृष्टि आज से पच्चीस या तीस वर्ष पूर्व से आगे जाती ही नहीं है।  ऐसे विद्वानों को मंच भी सहज सुलभ है क्योंकि हिन्दी का प्रकाशन बाज़ार उनका प्रयोजक है। इनमें से कई तो ऐसे हैं जो हिन्दी लिखना ही नहीं जानते बल्कि उनके अंग्रेजी में लिखे लेख हिन्दी प्रकाशनों में अनुवाद के साथ आते हैं। उनका सरोकार केवल लिखने से है। एक लेखक का इससे ज्यादा मतलब नहीं होना चाहिये पर शर्त यह है कि वह समय के बदलाव के साथ अपना दृष्टिकोण भी बदले।

                        एक संगठित क्षेत्र का लेखक कभी असंगठित लेखक के साथ बैठ नहीं सकता।  सच तो यह है कि जब तक इंटरनेट नहीं था हमें दूसरे स्थापित लेखकों को देखकर निराशा होती थी पर जब इस पर लिखना प्रारंभ किया तो इससे बाहर प्रकाशन में दिलचस्पी लेना बंद कर दिया।  यहां लिखने से पहले हमने बहुत प्रयास किया कि भारतीय हिन्दी क्षितिज पर अपना नाम रोशन करें पर लिफाफे भेज भेजकर हम थक गये।  सरस्वती माता की ऐसी कृपा हुई कि हमने इंटरनेट पर लिखना प्रारंभ किया तो फिर बाहर छपने का मोह समाप्त हो गया।  यहंा स्वयंभू लेखक, संपादक, कवित तथा चिंत्तक बनकर हम अपना दिल यह सोचकर ठंडा करते हैं कि चलो कुछ लोग तो हमकों पढ़ ही रहे हैं।  कम से कम हिन्दी दिवस की अवधि में हमारे ब्लॉग जकर हिट लेते हैं।  दूसरे ब्लॉग  लेखकों का पता नहीं पर इतना तय है कि भारतीय अंतर्जाल पर हिन्दी की तलाश करने वालों का हमारे ब्लॉग से जमकर सामना होता है।  दरअसल निबंध, कहानी, कविता तथा टिप्पणी लिखने वालों को अपने लिये विषय चाहिये।  वादविवाद प्रतियोगिता में भाग लेने वाले युवाओं तथा परिचर्चाओं में बोलने वाले विद्वानों को हिन्दी विषय पर पठनीय सामग्रंी चाहिये और अब किताबों की बजाय ऐसे लोग इंटरनेट की तरफ आते हैं।  सर्च इंजिनों में उनकी तलाश करते हुए हमारे बलॉग उनके सामने आते हैं।  यही बीस ब्लॉग बीस  किताब की तरह हैं।  यही कारण है कि हम अब अपनी किताब छपवाने का इरादा छोड़ चुके हैं।  कोई प्रायोजक हमारी किताब छापेगा नहीं और हमने छपवा लिये तो हमारा अनुमान है कि हम हजार कॉपी बांट दें पर उसे पढ़ने वाले शायद उतने न हों जितना हमारी एक कविता यहां छपते ही एक दिन में लोग पढ़ते हैं।  इतना ही नहीं हमारे कुछ पाठ तो इतने हिट हैं कि लगता है कि उस ब्लॉग पर बस वही हैं।  अगर वह पाठ  हम किसी अखबार में छपवाते तो उसे शायद इतने लोग नहीं देखते जितना यहां अब देख चुके हैं। आत्ममुग्ध होना बुरा हेाता है पर हमेशा नहीं क्योंकि अपनी अंतर्जालीय यात्रा में हमने देख लिया कि हिन्दी के ठेकेदारों से अपनी कभी बननी नहीं थी।  यहां हमें पढ़ने वाले जानते हैं कि हम अपने लिखने के लिये बेताब जरूर रहते हैं पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि हमें कोई प्रचार की भूख है।  कम से कम इस बात से  हमें तसल्ली है कि अपने समकालीन हिन्दी लेखकों में स्वयं ही अपनी रचना टाईप कर लिखने की जो कृपा प्राकृतिक रूप से हुई है कि हम  उस पर स्वयं भी हतप्रभ रह जाते हैं क्योंकि जो अन्य लेखक हैं वह इंटरनेट पर छप तो रहे हैं पर इसके लिये उनको अपने शिष्यों पर निर्भर रहना पड़ता है।  दूसरी बात यह भी है कि टीवी चैनल ब्लॉग, फेसबुक और ट्विटर जैसे अंतर्जालीय प्रसारणों में वही सामग्री उठा रहे हैं जो प्रतिष्ठत राजनेता, अभिनेता या पत्रकार से संबंधित हैं।  यह सार्वजनिक अंतर्जालीय प्रसारण पूरी तरह से बड़े लोगों के लिये है यह भ्रम बन गया है।  अखबारों में भी लोग छप रहे हैं तो वह अंतर्जालीय प्रसारणों का मोह नहीं छोड़ पाते।  कुछ मित्र पाठक पूछते हैं कि आपके लेख किसी अखबार में क्या नहीं छपतें? हमारा जवाब है कि जब हमारे लिफाफोें मे भेजे गये लेख नहीं छपे तो यहां से उठाकर कौन छापेगा?  जिनके अंतर्जालीय प्रसारण अखबारों या टीवी में छप रहे हैं वह संगठित प्रकाशन जगत में पहले से ही सक्रिय हैं। यही कारण है कि अंतर्जाल पर सक्रिय किसी हिन्दी लेखक को राष्ट्रीय क्षितिज पर चमकने का भ्रम पालना भी नहीं चाहिये।  वह केवल इंटरनेट के प्रयोक्ता हैं। इससे ज्यादा उनको कोई मानने वाला नहीं है।

                        दूसरी बात है कि मध्यप्रदेश के छोटे शहर का होने के कारण हम जैसे लेखको यह आशा नहीं करना चाहिये कि जिन शहरों या प्रदेशों के लेखक पहले से ही प्रकाशन जगत में जगह बनाये बैठे हैंे वह अपनी लॉबी से बाहर के आदमी को चमकने देंगे।  देखा जाये तो क्षेत्रवाद, जातिवाद, धर्म तथा विचारवाद पहले से ही देश में मौजूद हैं अंतर्जाल पर हिन्दी में सक्रिय लेाग उससे अपने को अलग रख नहीं पाये हैं।  अनेक लोगों से मित्र बनने का नाटक किया, प्रशंसायें की और आत्मीय बनने का दिखावा किया ताकि हम मुफ्त में यहां लिखते रहें।  यकीनन उन्हें कहीं से पैसा मिलता रहा होगा।  वह व्यवसायिक थे हमें इसका पता था पर हमारा यह स्वभाव है कि किसी के रोजगार पर नज़र नहीं डालते।  अब वह सब दूर हो गये हैं।  कई लोग तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर को होने का दावा भी करने लगे हैं पर उनका मन जानता है कि वह इस लेखक के मुकाबले कहां हैं? वह सम्मान बांट रहे हैं, आपस में एक दूसरे की प्रशंसा कर रहे हैं। कभी हमारे प्रशंसक थे अब उनको दूसरे मिल गये हैं। चल वही रहा है अंधा बांटे रेवड़ी चीन्ह चीन्ह कर दें।  दरअसल वह इंटरनेट पर हिन्दी फैलाने से अधिक अपना हित साधने में लगे हैं। यह बुरा नहीं है पर अपने दायित्व को पूरा करते समय अपना तथा पराया सभी का हित ध्यान में न रखना अव्यवसायिकता है। पैसा कमाते सभी है पर सभी व्यवसायी नहीं हो जाते। चोर, डाकू, ठग भी पैसा कमाते हैं।  दूसरी बात यह कि कहीं एक ही आदमी केले बेचने वाला है तो उसे व्यवसायिक कौशल की आवश्यकता नहीं होती। उसके केले बिक रहे हैं तो वह भले ही अपने व्यवसायिक कौशल का दावा करे पर ग्राहक जानता है कि वह केवल लाभ कमा रहा है।  अंतर्जाल पर हिन्दी का यही हाल है कि कथित रूप से अनेक पुरस्कार बंट जाते हैं पर देने वाला कौन है यह पता नहीं लगता।  आठ दस लोग हर साल आपस में ही पुरस्कार बांट लेते हैं।  हमें इनका मोह नहीं है पर अफसोस इस बात का है कि यह सब देखते हुए हम किसी दूसरे लेखक को यहां लिखने के लिये प्रोत्साहित नहीं कर पाते।  हमारे ब्लॉगों की पाठक संख्या चालीस लाख पार कर गयी है। यह सूचना हम देना चाहते हैं। इस पर बस इतना ही।  हिन्दी दिवस पर कोई दूसरा तो हमें पूछेगा नहंी इसलिये अपना स्म्मान स्वयं ही कर दिल बहला रहे हैं। 

 

 लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

 

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

 

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सूरज की रौशनी में-हिंदी व्यंग्य कविता


रोज पर्दे पर देखकर उनके चेहरे

मन उकता जाता है,

जब तक दूर थे आंखों से

तब तक उनकी ऊंची अदाओं का दिल में ख्वाब था,

दूर के ढोल की तरह उनका रुआब था,

अब देखकर उनकी बेढंगी चाल,

चरित्र पर काले धब्बे देखकर होता है मलाल,

अपने प्रचार की भूख से बेहाल

लोगों का असली रूप  बाहर आ ही जाता है।

कहें दीपक बापू

बाज़ार के सौदागर

हर जगह बैठा देते हैं अपने बुत

इंसानों की तरह जो चलते नज़र आते हैं,

चौराहों पर हर जगह लगी तस्वीर

सूरज की रौशनी में

रंग फीके हो ही जाते हैं,

मुख से बोलना है उनको रोज बोल,

नहीं कर सकते हर शब्द की तोल,

मालिक के इशारे पर उनको  कदम बढ़ाना है,

कभी झुकना तो कभी इतराना है,

इंसानों की आंखों में रोज चमकने की उनकी चाहत

जगा देती है आम इंसान के दिमाग की रौशनी

कभी कभी कोई हमाम में खड़े

वस्त्रहीन चेहरों पर नज़र डाल ही जाता है,

एक झूठ सौ बार बोलो

संभव है सच लगने लगे

मगर चेहरों की असलियत का राज

यूं ही नहीं छिप पाता है।

——————

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

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क्रिकेट में सिर पर सवार पैसा-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन


        इस समय इंग्लैंड में चैम्पियन ट्राफी क्रिकेट प्रतियोगिता चल रही है। इसमें बीसीसीआई की टीम जोरदार प्रदर्शन करते हुए आगे बढ़ती जा रही है। अनेक क्रिकेट विशेषज्ञ चकित हैं। बीसीसीआई के क्रिकेट खिलाड़ी जिस तरह तूफानी बल्लेबाजी कर रहे है तो दूसरी टीमों के खिलाड़ी धीमे धीमे चल रहे हैं उससे लगता है कि जैसे पिचें अलग अलग हैं। कभी कभी लगता है कि बल्ला या गेंदें भी अलग अलग हैं। मतलब यह कि भारतीय बल्लेबाज दूसरों के मुकाबले ज्यादा आक्रामक हैं। किसी के समझ में नहीं आ रहा है।

          हम समझाते हैं कि आखिर मामला क्या है? गुरुगोविंद सिंह ने कहा है कि पैसा बहुत जरूरी चीज है पर खाने के लिये दो रोटी चाहिये। मतलब यह कि जिंदगी में पैसा जरूरी है।  एक विद्वान कहते हैं कि पैसा कुछ हो या न हो पर जीवन में आत्मविश्वास का बहुत बड़ा स्तोत्र होता है।  जी हां, आईपीएल में बीसीसीआई की टीम के बल्लेबाजों ने जमकर पैसा कमाया है।  यह उनके आत्मविश्वास का ही  कारण बन गया है।  उनको मालुम है कि हमारे पास पैसा बहुत है और यह भाव उनको आक्रामक बना देता है। सीधी बात कहें कि पैसा सिर चढ़कर बोलता है।  हम यहां बीसीसीआई के खिलाडियों की आलोचना नहीं कर रहे बल्कि यह बता रहे हैं कि जिस तरह अन्य टीमों के खिलाड़ी बुझे मन से खेल रहे हैं उससे तो यही लगता है कि उनमें वैसा विश्वास नहीं है जैसा बीसीसीाआई की टीम में हैं। इसे कहते हैं कि पैसा सिर चढ़कर बोलता है।

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja ‘Bharatdeep’

Gwalior, Madhya Pradesh

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दरबारी बुत-हिन्दी कविता


एक दूसरे के तख्ते बजाते लोग
किसी ऊंचे तख्त पर होंगे विराजमान
फिर हथियारों के पहरे में
अपनी ढपली अपना राग बजायेंगे।
सस्ते तोहफे से बनाकर लोगों को बुत
कर लेंगे दुनियां अपनी मुट्ठी में
अपने ही दरबार में उनको सजायेंगे।
कहें दीपक बापू
ज़माने का भला करने वाले ठेकेदार
फैले हें चारों ओर
उनके दाव से कब तक खुद को बचायेंगे।

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

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वीडियो पर हिंदी व्यंग्य प्रस्तुत करने का एक प्रयास


महिला और पुरुष:कौन आगे कौन पीछे-महिला दिवस पर विशेष लेख


       हमारे देश में आजकल रोज एक दिवस मनता दिखता है।  वैसे तो भारत को वैसे भी त्यौहारों का ही देश कहा जाता है पर वह सप्ताह या माह के अंतराल बाद ही आते हैं। पूर्णमासी तथा अमावस्या हर महीने ही आती हैं।  कैलेंडर में देखें तो रोज कोई न कोई खास दिन होता है। इधर पश्चात्य संस्कृति ने अपने पांव पसारे हैं तो लगता है कि हर दिन ही त्यौहार है। मित्र दिवस, मातृ दिवस, पितृ दिवस और नया वर्ष जैसे दिन तो बहुत सुनते हैं। कभी एड्स विरोधी दिवस तो कभी कैंसर निरोधी दिवस भी सुनाई देता हैं  इधर हाल ही में महिला दिवस मना। व्यवसायिक बुद्धिमानों ने जहां अपनी वाणी और चेहरे से टीवी चैनलों के साथ ही रेडियों पर अपने भाषण झाड़े वही आमजनों में अपना रुतवा रखने वाले महानुभावों ने नारी शक्ति अनौपचारिक बैठकों में  बखान किया।

हमने देखा है कि पुरुष दिवस कभी नहीं मनता। इसका सीधा मतलब यह है कि यह मान लिया गया है कि यह संसार पुरुषों की संपत्ति है जिसमें महिलायें उनकी अनुकंपा से जी रही हैं।  हमारे देश के जनवादी और प्रगतिशील  बुद्धिमान हमेशा ही जाति, वर्ण, भाषा तथा क्षेत्र के आधार पर भेदभाव का आरोप लगाते हैं पर नारी विषय पर उनका रुख बदल जाता है।  वहां वह पुरुष को एक तरह से राक्षसी वृत्ति का मान लेते हैं यह अलग बात है कि वह स्वयं भी पुरुष ही होते हैं। उनके तर्कों पर हम हंसते हैं।  कहते हैं कि समाज में पुरुषवादी मानसिकता है।  हम पूछते हैं कि जब आप नारी अनाचार के विरुद्ध विषवमन करते हो तब क्या कभी यह देखा है कि वास्तव में उनका शत्रु कौन होता है?

कुछ नारीवादी बुद्धिमान तो नारी के लिये विवाह बंधन ही खतरनाक मानते हैं यह अलग बात है कि उनमें अविवाहित या ब्रह्चारी कोई नहीं होता।  आयुवर्ग में भी वह युवा न होकर उस अवस्था में होते हैं जब देह में रोमांस का असर काम हो जाता है।  अपनी बात वह युवाओं पर तब लादते दिखते हैं जब उनका खुद का समय बीत गया होता है। अपने युवा दिनों की मटरगस्ती को वह भूल जाते हैं।  कहा जाता है कि विवाह का लड्डू जो खाये वह भी दुःखी जो न खाये वह भी दुःखी।  जिन्होंने स्वयं खा लिया है वह दूसरों को न खाने की सलाह देते हैं।  मजे की बात यह कि भारतीय पारिवारिक संस्कारों के साथ जीने वाले लोग उसका मजाक बनाते हैं पर स्वयं के लिये उनका नियम पुराना ही होता है। वह विद्रोह का झंडा दूसरों के हाथ में देकर स्वयं आराम से सामाजिक फिल्म देखना चाहते हैं ताकि उसकी समीक्षायें लिखी और सुनाईं जा सकें।  समस्या यह है कि वह इस बात नियम को नहीं मानते कि नारी के लिये पुरुष कम नारियां ही अधिक समस्या खड़ी करती हैं।  भारतीय रिश्तों में नहीं वरन् पूरे विश्व में ही ननद-भाभी, सास-बहु, देवरानी-जेठानी तथा अन्य बहन जैसे रिश्तों में तनाव की बात सामने आती है।  अपवाद स्वरूप ही देवर-भाभी, ससुर-बहु, नन्दोही-सलहज और साली बहनोई के रिश्ते में खटास वाली घटनायें होती हैं।  सामाजिक विशेषज्ञों का अनुभव तो यह भी कहता है कि पर्दे के पीछे नारियों के विवाद होते हैं पर समाज के सामने फंसता पुरुष ही है क्योंकि परिवार उसके नाम पर जाना जाता है।  हमारे यहां घरेलु नारियों की रक्षा के नाम पर जितने भी प्रयास हुए हैं उनमें जड़ में नारियों का आपसी विवाद होता है पर परेशान पुरुष ही होता है।  इन मामलों में यह देखा गया है कि मामलों को बाहर सुलझाने के लिये घर से बाहर ले जाने जो प्रयास होते हैं उनमें से अधिकतर शिकायतें गलत आधार पर गलत व्यक्ति के खिलाफ होती है।  दहेज विरोधी कानून का जमकर दुरुपयोग हुआ।  अनेक सामाजिक विशेषज्ञ तो यह कहते हैं कि इस कानून का दुरुपयोग करने का यह परिणाम हुआ है कि ऐसे अनेक दंपत्ति जो एक साथ समझाने पर रह सकते थे वह मामला बाहर आने में मन में  बढ़ी हुई  खटास के कारण अलग हो गये।  अनेक लोगों की कथा तो इसलिये भी दर्दनाक रही है कि वह उस शादी में एक समय का भोजन करना उन्हें महंगा लगा जिसका भांडा चौराहे पर फूटा और उन पर भी घाव हुए। स्थिति इतनी खराब है कि कहीं नवदंपत्ति का विवाद होने  पर निकटस्थ रिश्तेदार बीच में आकर सुलझाना ही नहीं चाहते क्योंकि उनको लगता है कि कहीं उनका नाम चौराहे पर न घसीट लिया जाये।  विवाह एक सामाजिक मामला है और उसे उसके नियमों के दायरे में ही रखना चाहिये न कि उसमें राजकीय हस्तक्षेप हो।  राजकीय हस्तक्षेप से समाज के सुधार का प्रयास पाश्चात्य विचाराधारा से उपजा है जो निहायत अव्यवाहारिक है।  ऐसे प्रयासों से भारतीय समाज बिखरा है। दूसरी बात यह कि जिस तरह सारे पुरुष देवता नहीं है तो राक्षस भी नहीं है उसी तरह नारियों का भी हमेशा सकारात्म स्वरूप रहता है यह माना नहीं माना जा सकता।  अगर समाज में नारियों के विरुद्ध अपराध बढ़े हैं तो उसमें शामिल नारियों की संख्या भी बढ़ी है।

अब मुश्किल यह है कि जनवादियों और प्रगतिवादियों ने देश के अभिव्यक्ति के साधनों पर इस कदर कब्जा कर लिया है कि उनके प्रतिकूल सर प्रथक  किसी बात कहने पर किसी पर प्रभाव नहीं होता।  समाज में आयु, वर्ण, जाति, भाषा, धर्म और लिंग के आधार पर कल्याण के दावे हो रहे हैं पर खुश कोई नहीं है।  वजह साफ है कि  समाज को एक इकाई मानते हुए देश में सभी शहरों के साथ गांवों में भी सड़कों का जाल बिछा होना चाहिये।   सभी जगह शुद्ध पेयजल प्रदाय की सहज व्यवस्था हो।  इसके साथ ही बिजली हर घर में पहुंचना चाहिये।  यह मूलभूत सुविधायें हैं अगर यह देश के किसी हिस्से में नहीं है तो हम अपने पूर्ण विकास का दावा नहीं कर सकते।  इसके विपरीत देश के बुद्धिमान किश्तों में अलग अलग समाज को भागों में बांटकर विकास देखना चाहते हैं।  हमारे देश में गरीब परिवारों जो स्थिति है उसमें नारी दयनीय जीवन जीती है पर यकीनन पुरुष भी कोई खुशहाल नहीं होता।   अपने पिता, पति और पुत्र को जूझते देखकर नारी स्वयं की दयनीय स्थिति से समझौता कर लेती है।  सीधी बात कहें तो नारी और पुरुष के बिना मानवीय संसार नहीं चल सकता।  दोनों परिवार के पहिये हैं।  एक पहिया पीछे तो एक आगे चलता है।  आगे का पहिया पुरुष है और अगर नारीवादी चाहते हैं कि नारी आगे पहिये के रूप में चले तो ठीक है।  उनके प्रयास बुरे नहीं है पर उन्हें यह समझना होगा कि तब पुरुष को पिछला पहिया बनना होगा। एक पहिया आगे तो एक पीछे रखना ही होगा। हालांकि तब इन नारीवादियों को तब पुरुषवादी बनना पड़ेगा।

  दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja ‘Bharatdeep’

Gwalior, Madhya Pradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
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खबरों का बाज़ार-हिन्दी व्यंग्य कविता


कुछ खबरें खुशी में झुलाती हैं,

कुछ खबरें जोर से रुलाती हैं।

कमबख्त!

किस पर देर तक गौर करें

अपनी खूंखार असलियतें भी

जल्दी से अपनी तरफ बुलाती हैं।

कहें दीपक बापू

खबरचियों का धंधा है

लोगों के जज़्बातों से खेलना,

कभी होठों में हंसी लाने की कोशिश होती

कभी शुरु होता आंखों में आंसु पेलना,

बिकने के लिये बाज़ार में बहुत सामान है,

ग्राहक खुश है खरीद कर शान में,

हमारे जज़्बातों से न कर पाये खिलवाड़ कोई

इसलिये फेर लेते हैं नज़रे

विज्ञापनों में दिखने वाली सुंदरियों से

खबर और बहस के बीच कंपनियों के

उत्पाद बिकवाने के लिये

अपने हाथ में झुलाती हैं।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””

Gwalior, madhyapradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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खुद के लिये कमाई और दूसरे पर हंसना संसार के दो सरल काम-हिन्दी चिंत्तन लेख


       आदमी का मन उसे भटकाता है।  थोड़ा है तो आदमी दुःखी है और ज्यादा है तो भी खुश नहीं है। धन, संपदा तथा पद अगर कम है तो आदमी इस बात का प्रयास करता है कि उसमें वृद्धि हो।  यदि वह सफलता के चरमोत्कर्ष है तो वह उसका मन इस  चिंता में घुलता है कि वह किसी भी तरह अपने वैभव की रक्षा  करता रहे।

           कहा जाता है कि दूसरे की दौलत बुद्धिमान को चार गुनी और मूर्ख को सौ गुनी दिखाई देती है।  इसका मतलब यह है कि मायावी संसार बुद्धिमान को भी विचलित करता है भले ही मूर्ख की अपेक्षा उसके तनाव की मात्रा कम हो।  कुछ महानुभाव अच्छा काम करने के इच्छुक हैं तो समय नहीं मिलता और समय मिलता है तो उनका मन नहीं करता।

   एक सज्जन उस दिन अपनी शारीरिक व्याधियों का बखान दूसरे सज्जन से कर  रहे थे।  पैर से शुरु हुए तो सिरदर्द कर ही दम लिया।  दूसरे सज्जन ने कहा-‘‘यार, आप सुबह उठकर घूमा करो। हो सके तो कहीं योग साधना का अभ्यास करो।’’

      पहले सज्जन ने कहा-‘‘कैसे करूं? रात को देर से सोता हूं!  दुकान से से घर दस बजे आता हूं। फिर परिवार के सदस्यों से बात करने में ही दो बज जाते हैं। किसी भी हालत में सुबह आठ बजे से पहले उठ नही सकता।

      दूसरे सज्जन ने कहा-‘‘अब यह तो तुम्हारी समस्या है। बढ़ती  उम्र के साथ शारीरिक व्याधियां बढ़ती ही जायेंगी।  अब तो तरीका यह है कि दुकान से जल्दी आया करो। अपने व्यापार का कुछ जिम्मा अपने लड़के को सौंप दो।  दूसरा उपाय यह है कि रात को जल्दी सोकर सुबह जल्दी उठने का प्रयास करो।  बाहर से घूमकर आओ और चाय के समय परिवार के सदस्यों से बातचीत करो।

      पहले सज्जन ने कहा-‘‘बच्चे को तो मैं इंजीनियरिंग पढ़ा रहा हूं।  मैं नहीं चाहता कि बच्चा व्यापार में आये।  व्यापार की अब कोई इज्जत नहीं बची है। कहीं अच्छी नौकरी मिल जायेगी तो उसकी भी जिंदगी में चमक होगी।’’

         दूसरे सज्जन ने कहा-‘‘अगर बच्चे को इंजीनियर बनाना है तो फिर इतना कमाना किसके लिये? तुम दुकान से जल्दी आ जाया करो।’’

      पहले सज्जन ने कहा-‘‘यह नहीं हो सकता।  भला कोई अपनी कमाई से मुंह कैसे मोड़ सकता है।

         दूसरे सज्जन ने एक तीसरे सज्जन का नाम लेकर कहा-‘‘हम दोनों के ही  एक मित्र ने भी अपनी बच्चे को चिकित्सा शिक्षा के लिये भेजा है। अब वह जल्दी घर आ जाता है। सुबह उठकर उसे उद्यान में घूमने जाते मैंने  कई बार देखा है।’’

         पहले सज्जन ने कहा-‘‘अरे, उसकी क्या बात करते हो? उसकी दुकान इतनी चलती कहां है? उसने अपनी जिंदगी में कमाया ही क्या है? वह मेरे स्तर का नहीं है।  तुम भी किसकी बात लेकर बैठ गये। मैं अपनी बीमारियों के बारे में तुमसे उपाय पूछ रहा हूं और तुम हो कि उसे बढ़ा रहे हो।’

             दूसरे सज्जन ने हंसते हुए कहा-‘‘तुम्हारी बीमारयों का कोई उपाय मेरे पास तो नहीं है।  किसी चिकित्सक के पास जाओ।  मैं तुम्हें गलत सलाह दे बैठा।  दरअसल इस संसार में मन लगाने के लिये दो बढ़िया साधन हैं एक है कमाना दूसरा परनिंदा करना। कुछ लोगों के लिये तीसरा काम है मुफ्त में सलाह देना जिसकी गलती मैं कर ही चुका।’’

          वास्तव में हर आदमी राजनीति, धर्म, अर्थ, फिल्म, साहित्य तथा कला के क्षेत्रों पर स्थित प्रतिष्ठित लोगों को देखकर उन जैसा बनने का विचार तो करता है पर उसके लिये जो निज भावों का त्याग और परिश्रम चाहिये उसे कोई नहीं करना चाहता।  जिन लोगों को प्रतिष्ठत क्षेत्रों में सफलता मिली है उन्होंने पहले अपने समय का कुछ भाग मुफ्त में खर्च किया होता है।  जबकि सामान्य हर आदमी हर पल अपनी सक्रियता का दाम चाहता है। कुछ लोग तो पूरी जिंदगी परिवार के भरण भोषण में इस आशा के साथ गुजार देते है कि वह उनसे फुरसत पाकर कोई रचनात्मक कार्य करेंगे।  हालांकि उन्हें अपने काम के दौरान भी फुरसत मिलती है तो वह उस दौरान दूसरों के दोष निकालकर उसे नष्ट कर देते हैं।  राजनीति, धर्म, अर्थ, फिल्म, साहित्य तथा कला के क्षेत्र में प्रतिष्ठत लोगों के बारे में आमजन में यह भावना रहती है कि वह तो जन्मजात विरासत के कारण बने हैं।  सच बात तो यह है कि हमारे समाज में अध्यात्म ज्ञान से लोगों की दूरी बढ़ती जा रही है।  अनेक लोगों ने अपने आसपास सुविधाओं का इस कदर संग्रह कर लिया है कि उन्हें अपने पांव पर चलना भी बदनामी का विषय लगता है।  लोग परोपकार करना तो एकदम मूर्खता मानते हैं  इसी कारण एक दूसरे की प्रशंसा करने की बजाय निंदा कर अपनी श्रेष्ठता साबित करते हैं। दूसरे को दोष गिनाते हैं ताकि अपने को श्रेष्ठ साबित कर सकें।  रचनात्मक प्रवृत्तियों से परे लोगों के पास दो ही काम सहज रहे गये हैं कि एक अपने स्वार्थ की पूर्ति दूसरा परनिंदा करना।

         रुग्ण हो चुके समाज में कुछ लोग ऐसे हैं जो स्वयं अध्यात्म ज्ञान के साधक हैं पर सांसरिक विषयों से संबंध रखने की बाध्यता की वजह से दूसरों के अज्ञान के दोष को सहजता से झेलते हैं।  यही एक तरीका भी है।  अगर आप योग, ज्ञान, ध्यान और भक्ति साधक हैं तो दूसरों के दोषों को अनदेखा करें।  अब लोगों के सहिष्णुता का भाव कम हो गया है। थोड़ी आलोचना पर लोग बौखला जाते है।  पैसे, पद और प्रतिष्ठा से सराबोर लोगों के पास फटकना भी अब खतरनाक लगता है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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समाज में चेतना की कोशिश-हिंदी व्यंग्य कविता



समाज में चेतना अभियान
कहां से प्रारंभ करें
यहां कोई दुआ
कोई दवा
और कोई दारु के लिये बेकरार है,
अपने शब्दों से किसे  खुश करे
कोई रोटी
कोई कपड़ा
कोई छत पाने के लिये
जंग लड़ने को खड़ा तैयार है।
कहें दीपक बापू
अपनी समस्याओं पर सोचते हुए लोग रोते,
हर पल  चिंताओं में होते,
दिल उठा रहा है
लाचारियों का बोझ
दिमाग में बसा है वही इंसान
जो उनके मतलब का यार है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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पाकिस्तान का अस्तित्व भारत में शांति के लिए अब खतरा बना-हिंदी लेख


         पाकिस्तानी सेना ने दो भारतीय सैनिकों की बेरहमी से हत्या कर उनके सिर कलम कर दिये। इस घटना की भारत में कड़ी प्रतिक्रिया हुई है।  कुछ लोगों का मानना है कि पाकिस्तान के साथ मधुर संबंध बनाने का प्रयास व्यर्थ है तो कुछ मानते हैं कि इस घटना पर युद्ध जैसी खतरनाक कोशिश से बचना चाहिए।  पाकिस्तान के साथ भारत के अनेक बार युद्ध हो चुका है पर कोई युद्ध कश्मीर समस्या के लिये निर्णायक नहीं हुआ।  हैरानी की बात है कि युद्ध के बाद हुए समझौतों में पाकिस्तान को इस मुद्दे से हटने का दबाव क्यों नहीं डाला गया? पाकिस्तान हर युद्ध में हारा है पर फिर भी कश्मीर का मुद्दा नहीं छोड़ता। यह बात संशय पैदा करने वाली है।

        दरअसल भारत में रणनीतिकारों का एक शक्तिशाली वर्ग मानता है कि पाकिस्तान का अस्तित्व बना रहे यह भारत के हित में है और कश्मीर मुद्दा छोड़ने से वह खत्म हो जायेगा।  लगता है इसी कारण  उसे भारत के प्रति नफरत बनाये रखने के लिये यह मुद्दा उसके पास बने रहने दिया गया।  ऐसा लगता है कि भारत में अनेक बुद्धिमानों के एक समूह को पाकिस्तान के लोगों के बारे में जानकारी नहीं है।  वहां भारत और यहां के धर्मों के प्रति वहां भारी वैमनस्य है।  मुख्य बात यह है कि वहां की र्शैक्षणिक किताबों में भारत तथा यहां पैदा हुए धर्मों के प्रति अनादर वाली सामग्री है।  भारतीय रणनीतिकार शुतुरमुर्ग की तरह यह राग अलापते हैं कि भारत का विभाजन धर्म की वजह से नहीं हुआ पर पाकिस्तान की अवाम में यह बात अब पैठ कर गयी है कि धर्म ही विभाजन का कारण है।  हम समझते हैं कि वह हमें राष्ट्र की तरह ललकार रहे हैं जबकि वह अपनी धार्मिक पहचान के साथ हम पर हमला करते हैं।  वह कश्मीर पर अपना दावा भौगोलिक परिस्थितियों के कारण नहीं वरन् अपने धर्म के कारण करते हैं।

         पाकिस्तान के क्रिकेट खिलाड़ियों,कलाकारों और शायरों का भारत निरंतर  आने से अपेक्षा करना मूर्खतापूर्ण है कि उससे कोई स्थाई मित्रता बनेगी।  वैसे पाकिस्तान एक सार्वभौमिक राष्ट्र है यह कभी अनेक लोगों को नहीं लगता है ।  हम भारत में रह रहे  पाकिस्तान के सहधर्मियों  को देखकर वहां के लोगों की मनस्थिति का अनुमान करते है जो कि गलत है। वहां सिंध, बलुचिस्तान और पश्चिमी प्रांत के लोग यह मानते हैं कि पंजाब के लोगों ने उन पर कब्जा कर रखा है।  खासतौर से सिंध में तो पाकिस्तान के प्रति अत्यंत नाखुशी  का भाव है।  इसका कारण यह है कि सारे पाकिस्तान में वहां के पंजाब प्रांत के  लोगों ने ही दबदबा बनाये रखा है।  क्रिकेट से लेकर फिल्म तक उनका ही वर्चस्व है।  इतना ही नहीं पाकिस्तान की अनेक फिल्मों में सन्यासियों को खलपात्र के रूप में चित्रित किया गया।  यही कारण है कि पाकिस्तान में बहुत बड़ी संख्या में हिन्दू या तो पलायन कर गये या फिर धर्म बदलने के लिये बाध्य हुए।  वहां अक्सर मंदिरों पर हमले होते रहते हैं। इतना ही नहीं पुराने हिन्दू प्रतीकों को लगभग मिटा दिया गया है।  हालांकि वहां कुछ मंदिरों के पुनरोद्धार की बात की जाती है पर वह भारत से पर्यटकों को लुभाने का प्रयास लगता है।  इससे यह नहीं समझना चाहिये कि पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दुओं को कोई सम्मान मिलने वाला है।  पाकिस्तान आज विश्व में अपनी पहचान बना चुका है पर यह सफलता उसे धार्मिक उन्माद में योगदान की वजह से मिली है। कहने का अभिप्राय यह है कि हम भले ही अपनी अक्ल के पर्दे बंद किये रहें पर पाकिस्तानी अपनी धार्मिक पहचान को श्रेष्ठ मानते हैं और अन्य धर्म उनकी दृष्टि में कमतर हैं।  किसी भारतीय-चाहे वह किसी भी धर्म का हो-का मरना उनकी नज़र में कोई  महत्व नहीं रखता क्योंकि वह उनके सहधर्मी राष्ट्र का नहीं है।  यह अंतिम सत्य है और अगर कोई मुगालते हैं तो उसे समझाना कठिन है।

          भारत के लिये पाकिस्तान को निपटाना कोई कठिन काम नहीं है।  भारतीय सेना एक व्यवसायिक सेना है  जबकि पाकिस्तान की सेना अब धर्मांध होकर ऐसी राह पर चल पड़ी है जहां अब सिवाय आंतक फैलाने के उसके पास कोई मार्ग नहीं है।  यह सच है कि युद्ध में बहुत हानि होती है पर इतिहास गवाह है कि अपना प्रभाव बनाये रखने के लिये अंततः ताकतवर लोगों को युद्ध करने ही पड़ते हैं।  मनुष्य हमेशा ही योगी बनकर ध्यान में नहीं लगा रह सकता।  कभी कभी उसे योद्धा बनकर लड़ना भी पड़ता है।  इस संसार में दैवीय तथा आसुरी दो प्रकृति के लोग होते हैं।  देवताओं केा अनेक बार असुरों से युद्ध करना पड़ा है।  पाकिस्तान और उसके सहयोगी देश आसुरी प्रवृत्ति के हैं और उनसे यह अपेक्षा करना निरर्थक है कि वह दैवीय प्रकृति के लोगों को आराम से रहने देंगे।  हम यहां रावण का उल्लेख भी करना चाहेंगे जिसका तत्कालीन सभ्यता में उन लोगों से बैर था जो उसकी निज धार्मिक पंरपरा से प्रथक थे। वह  ऋषि, मुनियों और तपस्वियों का इसलिये बैरी था क्योंकि वह उसकी धार्मिक पंरपरा मानने वाले नहीं थे।  सच बात तो यह है कि रावण सीता हरण अगर वह नहीं भी करता तो भी उसका भगवान श्रीराम के साथ युद्ध अवश्यंभावी था क्योंकि वह उन्हीं ऋषि, मुनियों, तपस्वियों की रक्षा के लिये प्रयासरत थे।

         हमारा मानना है कि प्रत्यक्ष रूप से युद्ध न भी करें तो अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान को तोड़ देना चाहिये।  भारत के प्रति नफरत वहां पंजाब प्रांत के वर्चस्व के कारण ही फैली है क्योंकि वही अपना प्रभाव बनाये रखना चाहते हैं।  पाकिस्तान मध्य एशिया के देशों के सहारे धर्म के नाम पर एक रखे हुए है और एक बार वहां क्षेत्रीयता को बढ़ावा मिला तो ऐसा संकट बढ़ेगा कि पाकिस्तान मिट जायेगा।  वहां के शिखर पुरुष यह कहते हैं कि हम स्वयं ही आतंकवाद की चपेट में है पर यह दिखावा है।  वैसे  भी इस तरह का छुटपुट आतंकवाद पाकिस्तान को मिटा नहीं पायेगा।  एक बार पाकिस्तान की सेना ध्वस्त हो गयी तो पाकिस्तान मिट जायेगा।  कुछ लोगों को मानना है क भारत को अगर अमन चैन से रहना है तो उसे हर हालत में पाकिस्तान को मिटाना ही होगा।

       यह भी न करना है तो पाकिस्तान से अब बेहतर संबंधों के लिये यह भी शर्त रखनी होगी कि वह अपनी शैक्षणिक किताबों से भारत तथा यहां के धर्मों के विरुद्ध अनादर वाली सामग्री हटाये।  अगर वह ऐसा नहीं करता तो उससे राजनीतिक संबंध भी खत्म करना चहिये।  यह एक तरह का सभ्य प्रयास है और आसुरी प्रवृत्ति से युक्त पाकिस्तान इसे मानेगा यह कठिन है पर जब हमारे रणनीतिकार यह मानते हैं कि हम उससे ज्यादा ताकतवर है तो दबाव काम आ सकता है।  हालांकि यह कदम भी पाकिस्तान के लिये आत्मघाती होगा क्योंकि भारत के प्रति नफरत के बाद उसे वैसे ही संकट का सामना करना पड़ेगा जो कश्मीर मुद्दा छोड़ने पर हो सकता है। इसके लिये मानसिक दृढ़ता का परिचय देना होगा।

 

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सुख का योग दु:ख से है-पतंजलि योग साहित्य


         पंचतत्वों से बनी इस देह में मन, बुद्धि और अहंकार प्रकृति स्वतः विराजती हैं। मनुष्य का मन तो अत्यंत चंचल माना जाता है। यही मन मनुष्य का स्वामी बन जाता है और जीवात्मा का ज्ञान नहीं होने देता। अध्यात्म के ज्ञान के अभाव में सांसरिक क्रियाओं के अनुकूल मनुष्य प्रसन्न होता है तो प्रतिकूल होने पर भारी तनाव में घिर जाता है। मकान नहीं है तो दुःख है और है उसके होने पर सुख होने के बावजूद उसके रखरखाव की चिंता भी होती है। धन अधिक है तो उसके लुटने का भय और कम है नहीं है या कम है, तो भी सांसरिक क्रियाओं को करने में परेशानी आती है मनुष्य सारा जीवन इन्हीं  अपनी कार्यकलापों के अंतद्वंद्वों में गुजार देता है। विरले ज्ञानी ही इस संसार में रहकर हर स्थिति में आनंद लेते हुए परमात्मा की इस संसार रचना को देखा करते हैं। अगर किसी वस्तु का सुख है तो उसके प्रति मन में राग है और यह उसके छिन जाने पर क्लेश पैदा होता है। कोई वस्तु नहीं है तो उसका दुःख इसलिये है कि वह दूसरे के पास है। यह द्वेष भाव है जिसे पहचानना सरल नहीं है। मृत्यु का भय तो समस्त प्राणियों को रहता है चाहे वह ज्ञानी ही क्यों न हो। मनुष्य का पक्षु पक्षियों में भी यह भय देखा जाता है।

पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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सुखानुशयी रागः।
‘‘सुख के अनुभव के पीछे रहने वाला क्लेश राग है।’’
‘‘दुःखानुशयी द्वेषः।
‘‘दुःख के अनुभव पीछे रहने वाला क्लेश द्वेष है।’’
स्वरसवाही विदुषोऽपि तथा रूडोऽभिनिवेशः।।
‘‘मनुष्य जाति में परंपरागत रूप से स्वाभाविक रूप से जो चला आ रहा है वह मृत्यु का क्लेश ज्ञानियों में भी देखा जाता है। उसे अभिनिवेश कहा जाता है।’’
ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः।
‘‘ये सभी सूक्ष्मावस्था से प्राप्त क्लेश चित्त को अपने कारण में विलीन करने के साधन से नष्ट करने योग्य हैं।’’
ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः।।
‘‘उन क्लेशों की वृत्तियां ध्यान से नष्ट करने योग्य हैं।’’

       इस तरह अंतद्वंद्वों में फंसी अपनी मनस्थिति से बचने का उपाय बस ध्यान ही है। ध्यान में जो शक्ति है उसका बहुत कम प्रचार होता है। योगासन, प्राणायाम और मंत्रजाप से लाभ होते हैं पर उनकी अनुभूति के लिये ध्यान का अभ्यास होना आवश्यक है। दरअसल योग साधना भी एक तरह का यज्ञ है। इससे कोई भौतिक अमृत प्रकट नहीं होता। इससे अन्तर्मन   में जो शुद्ध होती है उसकी अमृत की तरह अनुभूति केवल ध्यान से ही की जा सकती है। इसी ध्यान से ही ज्ञान के प्रति धारणा पुष्ट होती है। हमें जो सुख या दुःख प्राप्त होता है वह मन के सूक्ष्म में ही अनुभव होते हैं और उनका निष्पादन ध्यान से ही करना संभव है।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

किस पर भरोसा करें-हिंदी कविता


किस पर भरोसा करें
यहां हर कदम पर धोखा खाया,
हुकूमत पर क्या इल्जाम डालें
जनता के  हाथ पांव के साथ
दिमागी सोच को भी
पुरानी जंजीरों में बंधा पाया।
कहें दीपक बापू
हाथ में तख्तियां और मशाल
लेकर  बहुत लोग चले जुलूसों में
नारों से गूंजा बहुत बार आकाश
फिर भी ज़माना अंधकार से बाहर न आया,
शिकारी भीड़ में भेड़ों के साथ शामिल रहे
अकेले में भेड़िये बन गये
हालातों में बदलने की बात
सुनते सुनते पक गये कान
अच्छे समय की आस बनी रही
अलबत्ता ईमानदारी और यकीन को
हर दिन गर्त में जाते पाया।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश 
poet and writer-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

विज्ञापन में शोक कि शोक में विज्ञापन-हिंदी व्यंग्य


                     दो प्रचार प्रबंधक एक बार में सोमरस का उपभोग करने के लिये   गये। बैरा उनके कहे अनुसार सामान लाता और वह उसे उदरस्थ करने के बाद इशारा करके पास दोबारा बुलाते तब फिर आता। दोनों आपस में अपने व्यवसाय से संबंधित बातचीत करते रहे।  एक प्रचार प्रबंधक ने दूसरे से कहा‘-‘‘यार, मेरे चैनल का मालिक विज्ञापनों का भूखा है।  कहता है कि तुम समाचार अधिक चलाते हो विज्ञापन कम दिखाते हो।’’

दूसरा बोला-‘‘यार, मेरे चैनल पर तो समाचारों का सूखा है।  इतने विज्ञापन आते हैं कि समझ में नहीं आता कि समाचार चलायें कि नहीं। जिन मुद्दों पर पांच मिनट की बहस होती है  हम पच्चपन मिनट के विज्ञापन चलाते हैं।  हालांकि इस समय मुसीबत यह है कि हर रोज कोई मुद्दा मिलता नहीं है।’’

पहला बोला-‘‘अरे, इसकी चिंता क्यों करते हो? हम और तुम मिलकर कोई कार्यक्रम बनाते हैं। राई को पर्वत और रस्सी को सांप बना लेंगे। अरे दर्शक जायेगा कहां? मेरे चैनल  या तुम्हारे चैनल पर जाने अलावा उसके पास कोई चारा नहीं है।

इतने में बैरा उनके आदेश के अनुसार सामान ले आया।  उसकी आंखों में आंसु थे। यह देखकर पहले प्रचार प्रबंधक ने उससे पूछा कि ‘‘क्या बात है? रो क्यों रहे हो? जल्दी बताओ कहीं हमारे लिये जोरदार खबर तो नहीं है जिससे हमारे विज्ञापन हिट हो जाये।’’

बैरा बोला-‘‘नहीं साहब, यह शोक वाली खबर है।  वह मर गयी।’’

दोनों प्रबंधक उछलकर खड़े हुए पहला बोला-‘‘अच्छा! यार तुम यह पैसा रख लो। सामान वापस ले जाओ। हम अपने काम पर जा रहे है। आज समाचार और बहसों के लिये ऐसी सामग्री मिल गयी जिसमे हमारे ढेर सारे विज्ञापन चल जायेंगे।’’

दूसरा बोला-‘‘यार, पर शोक और उसकी बहस में विज्ञापन! देखना लोग बुरा न मान जायें।’’

पहला बोला-‘‘नहीं यार, लोग आंसु बहायेंगे। विज्ञापन देखकर उनको राहत मिलेगी। हम फिर उनको रुलायेंगे। देखा नहीं उसके  बस से लेकर उसके अस्पताल रहने तक  हमने समाचार और बहस में कितने विज्ञापन चलाये।’’

दूसरा बोला-‘‘पहले यह तो इससे पूछो मरी कौन है?’’

पहले ने बैरे से पूछा-‘‘यह तो बताओ मरी कौन है?’’

बैरा रोता रहा पर कुछ बोला नहीं। दूसरे ने कहा-‘‘यार, यह तो मौन है।’’

पहला बोला-‘‘चलो यार, अपने विज्ञापन का काम देखो।  यह हमारा कौन है?’’

दोनों ही बाहर निकल पड़े। पहले ने एक विद्वान को मोबाइल से फोन किया और बोला-‘‘जनाब, आप जल्दी आईये।  अपने साथ अपनी मित्र मंडली भी लाना। सभी अच्छा बोलने वाले हों ताकि दर्शक अधिक से अधिक हमने चैनल पर बने रहें। हमारा विज्ञापन का समय निकल सके।’’

दूसरे ने भी मोबाईल निकाला और अपने सहायक से बोला-‘‘सुनो, जल्दी से विज्ञापन की तैयारी कर लो। एक खबर है जिस पर लंबी बहस हो सकती है। इसमें अपनी आय का लक्ष्य पूरा करने में मदद मिलेगी।’’

दोनों अपने लक्ष्यों की तरफ चल दिये। उन्होंने यह जानने का प्रयास भी नहीं किया कि ‘मरी कौन है’। इससे उनका मतलब भी नहीं था।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश 

poet and writer-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 

poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

विदुर नीति-बड़ों का आदर करने से छोटों के प्राण स्थिर होते हैं


       हमारे भारतीय दर्शन में जिन संस्कारों को मनुष्य समाज के लिये आवश्यक बनाया गया है उनका कोई न कोई वैज्ञानिक आधार है।  अक्सर हमारे यहां कहा जाता है कि बुजुर्गों का सम्मान होना चाहिए।  इसके पीछे वजह यह है कि उनकी सामने उपस्थिति होने पर आयु तके  छोटे मनुष्य की मनस्थिति पर कुछ न कुछ ऐसा तीव्र हलचल के साथ  तीक्ष्ण प्रभाव पड़ता है जिसकी समझ होना जरूरी है।  दरअसल जब बड़ी आयु का आदमी सामने खड़ा हो तब किसी भी युवक के हृदय में ऐसा प्रभाव होता है कि उसके प्राण ऊपर आ जाते हैं। आंखों में आदर के भाव प्रकट होने के लिये तत्पर होते हैं।  उस समय अगर कोई ढीठता वश सीना तानकर खड़ा रहे तो यकीनन वह अपने हृदय और मस्तिष्क की नासिकाओं के लिये दुष्प्रभाव वाले कीटाणुओं का सृजन करता है। हालांकि अधिकतर युवक युवतियां स्वाभाविक रूप से मर्यादा का पालन करते हैं और इससे हम उनको संस्कारवान माने पर सच यह है कि बड़ो का आदमी करना छोटों का स्वाभाविक गुण होता है।  जिनके मन मे ढीठता का भाव है वह भले ही ऐसा न करें पर कहीं न कहीं वही अपने प्राणों को स्थिर  असुविधा के साथ विलंब  से कर पाते हैं।

विदुर महाराज की नीति के अनुसार
————————-
ऊधर्व प्राणा ह्युत्क्रामति पुनः स्थावरः आयति।
प्रत्युथानाभिवादाभ्यां पुनस्तान। प्रतिपद्यते।।

      हिन्दी में भावार्थ-किसी  माननीय बुजुर्ग पुरुष के निकट आने पर पर नवयुवक के प्राण ऊपर गले तक आ जाते हैं फिर जब वह स्वागत में खड़ा होकर प्रणाम करता है तब उसके प्राणः पुनः पूर्ववत स्थापित होते हैं।

पीठं दत्त्वा साधवेऽभ्यागताय आनींयामः परिनिर्णिज्य पापौ।
सुख पृष्टवा प्रतिवेद्यात्मासंस्था ततो दद्यादन्नमवेक्ष्य धीरः।।

      हिन्दी में भावार्थ-धीर पुरुष को चाहिए कि वह अपने यहां सज्जन व्यक्ति के आने पर उसे उचित आसन प्रदान करने के साथ ही जल से उसके चरण पखारने के बाद उसकी कुशल क्षेम जानने के बाद अपनी बात कहे और फिर भोजन कराये।
     मनुष्य गुणों का ऐसा पुतला है जिसका इंद्रियां स्वाभाविक रूप से होता है।  सच बात तो यह है कि किसी को अधिक ज्ञान देना उसे भ्रमित कर सकता है। उसी तरह ज्यादा ज्ञान प्राप्त करने से भी अनेक तरह के विरोधाभास सामने आते हैं। बेहतर यह है कि अपनी दिलचर्या को सहज रखा जाये।  जब कोई दृश्य सामने आये या फिर कहीं हमें अपनी सक्रियता दिखानी हो वहां मन में सहज भाव रखना चाहिए तब स्वाभाविक रूप से हमारी इंद्रियां अंगों को संचालित करती हैं।  अपने घर आये सज्जन लोगों का आदर करना चाहिए पर जहां अपना सम्मान न हो और हमारे स्वाभाविक गुणों के अनुसार कार्य की स्थितियां न हों वहां न जाना ही बेहतर है। भारतीय दर्शन इसलिये भी वैज्ञानिक आधारों वाला माना जाता है क्योंकि वह स्वाभाविक रूप से सहज कर्म में मनुष्य को लिप्त रहने की प्रेरणा  देता है।

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
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विदुर नीति-कटु वाणी बोलने वाला निंदा का पात्र बनता है


      मनुष्य में पूज्यता का भाव स्वाभाविक रूप से रहता है।  दूसरे लोग उसे देखें और सराहें यह मोह विरले ही छोड़ पाते हैं।  हमारे देश में जैसे जैसे  समाज अध्यात्मिक ज्ञान से परे होता गया है वैसे वैसे ही हल्के विषयों ने अपना प्रभाव लोगों पर जमा लिया है।  फिल्म और टीवी के माध्यम से लोगों की बुद्धि हर ली गयी है।  स्थिति यह है कि अब तो छोटे छोटे बच्चे भी क्रिकेट खिलाड़ी, फिल्म या टीवी अभिनेता अभिनेत्री और गायक कलाकर बनने के लिये जूझ रहे हैं।  आचरण, विचार और व्यवहार में उच्च आदर्श कायम करने की बजाय बाह्य प्रदर्शन से समाज में प्रतिष्ठा पाने के साथ ही धन कमाने का स्वप्न लियेे अनेक लोग विचित्र विचित्र पोशाकें पहनते हैं जिनको देखकर हंसी आती है।  ऐसे लोग  अन्मयस्क व्यवहार करने के इतने आदी हो गये हैं कि देश अब सभ्रांत और रूढ़िवादी दो भागों के बंटा दिखता है।  जो सामान्य जीवन जीना चाहते हैं उनको रूढ़िवादी और जो असामान्य दिखने के लिये व्यर्थ प्रयास कर रहे हैें उनको सभ्रांत और उद्यमी कहा जाने लगा है।  यह समझने का कोई प्रयास कोई नहीं करता कि बाह्य प्रदर्शन से कुछ देर के लिये वाह वाही जरूर मिल जाये पर समाज में कोई स्थाई छवि नहीं बन पाती।
   विदुर नीति में कहा गया है कि
————————-
यो नोद्भुत कुरुते जातु वेषं न पौकषेणापि विकत्वत्तेऽयान्।

न मूचर््िछत्रः कटुकान्याह किंचित् प्रियं सदा तं कुरुते जनेहि।।

हिन्दी में भावार्थ-सभी लोग उस मनुष्य की प्रशंसा करते हैं जो कभी अद्भुत वेश धारण करने से परे रहने के साथ कभी  आत्मप्रवंचना नहीं  करता और क्रोध में आने पर भी कटु वाणी के उपयोग बचते हैं। 

न वैरमुद्दीययाति प्रशांतं न दर्पभाराहृति नास्तमेसि।

न दुर्गतोऽस्पीति करोत्यकार्य समार्यशीलं परमाहुरायांः।।
हिन्दी में भावार्थ- सभी लोग उत्तम आचरण वाले उस पुरुष को सर्वश्रेष्ठ कहते हैं जो कभी एक बार बैर शांत होने पर फिर उसे याद नहीं करता, कभी अहंकार में आकर किसी को त्रास नहीं देता और न ही कभी अपनी हीनता का प्रदर्शन सार्वजनिक रूप  करता है।
     इस विश्व में बाज़ार के धनपति स्वामियों और प्रचार प्रबंधकों ने सभी क्षेत्रों में अपने बुत इस तरह स्थापित कर दिये हैं कि उनके बिना कहीं एक पत्ता भी नहीं हिल सकता।  इनकी चाटुकारिता के बिना खेल, फिल्म या कला के क्षेत्र कहीं भी श्रेष्ठ पद प्राप्त नहीं हो सकता।   क्रिकेट, फिल्म और कला के शिखरों पर सभी नहीं पहुंच सकते पर जो पहुंच जाते हैं-यह भी कह सकते हैं कि बाज़ार और प्रचार समूह अपने स्वार्थों के लिये कुछ ऐसे लोगों को अपना लेते हैं जो पुराने बुतों के घर में ही उगे हों और मगर भीड़ को नये चेहरे लगें-मगर सभी को ऐसा सौभाग्य नहीं मिलता।  ऐसे में अनेक आम लोग निराश हो जाते हैं।  अलबत्ता अपने प्रयासों की नाकामी उन्हे समाज में बदनामी अलग दिलाती है।  ऐसे में अनेक लोग हीन भावना से ग्रसित रहते हैं।  पहले अहंकार फिर हीनता का प्रदर्शन आदमी की अज्ञानता का प्रमाण है।  इससे बचना चाहिए।
  हमें यह बात समझना चाहिए कि व्यक्तिगत व्यवहार और छवि समाज में लंबे समय तक प्रतिष्ठा दिलाती है। यह स्थिति गाना गाकर या नाचकर बाह्य प्रदर्शन की बजाय आंतरिक शुद्धता से व्यवहार करने पर मिलती है। खिलाड़ी या अभिनेता होने से समाज का मनोरंजन तो किया जा सकता है।  बाज़ार और प्रचार समूह भले ही वैभव के आधार पर समाज के मार्गदर्शके रूप में चाहे कितने भी नायक नायिकायें प्रस्तुत करें पर कालांतर में उनकी छवि मंद होही जाती है।
लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”
ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर

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मनु स्मृति-ढोंगियों की समाज सेवा स्वीकार्य नहीं


            आजकल हमारा पूरा देश ऐसे विरोधाभासों में फंसा है जिनसे उसका निकलना बिना अध्यात्मिक ज्ञान के कठिन ही नहीं  वरन् असंभव लगता है।  एक तरफ हमारे देश में धर्म की रक्षा के लिये अनेक संगठन बने हैं तो दूसरी तरफ तथाकथित ज्ञानियों की भीड़ समाज को धर्म के मार्ग पर लाने के लिये जूझती दिखती है।  न वक्ताओं का मन पवित्र है न श्रोताओं की रुचि उनके प्रवचनों में हैं।  धार्मिक कार्यक्रमों के नाम पर टाईम पास मनोरंजन के लिये सभी जगह भीड़ जुट जाती है मगर परिणाम शून्य ही रहता है।  इसका सबसे बड़ा उदाहरण भ्रष्टाचार की समस्या को लें। सब मानते हैं कि भ्रष्टाचार देश से मिटना चाहिए मगर स्थिति यह है कि तमाम तरह के आंदोलनों के बावजूद इसमें रत्ती भर कमी नहीं आ रही है। आंदोलन करने वाले तमाम तरह के दावे करते हैं। उनको भारी भरकम राशि के रूप में चंदा भी मिल जाता है। बड़े बड़े भाषण सुनने को मिलते हैं।  स्थिति यह हो गयी है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों के कर्ताधर्ताओं ने प्रचार माध्यमों में  महापुरुष के रूप में अपनी ख्याति बना ली है। इतना ही नहीं इनके अगुआ समाज में चेतना लाने का दावा भी करते हैं।  इसके बावजूद हम जब धरती की वास्तविकता पर दृष्टिपात करते हैं तो लगता है कि पर्दे और कागज पर बयान की जा रही हकीकत अलग है।  कुछ धार्मिक पुरुष भी भ्रष्टाचार के विरुद्ध शब्दों को व्यक्त कर जनमानस में अपनी छवि बनाने का प्रयास भी कर रहे हैं।  यह अलग बात है कि इनमें से अनेक लोगों ने फाइव स्टार होटल नुमा महल और आश्रम बना लिये हैं। तय बात है कि यह सब चंदे और दान से ही हो रहा है।  अब यह अलग बात है कि कहीं आमजन प्रत्यक्ष रूप से छोटी राशि का चंदा देता है तो कहीं  बड़ा धनपति प्रायोजन करता है।  किसी की नीयत पता नहीं की जा सकती है पर जब हम परिणाम देखते हैं तो यह साफ लगता है कि आमजनों के साथ छलावा हो रहा है।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
न वार्यपि प्रचच्छेत्तु बैडालवतिके द्विजै।
न बकव्रततिके विप्रे नावेदाविवि धर्मवित्।।

         हिन्दी में भावार्थ-धार्मिक रूप धारणकर जो दूसरों को मूर्ख बनाने के साथ उनसे धन ऐंठते हैं। ऐसे लोग बाहर से देवता और अंदर से शैतान होते हैं उनको पानी तक नहीं पिलाना चाहिए।

त्रिष्वप्येतेषु दंत्तं  हि विधिनाऽप्यर्जितं धनम्।
दातुर्भवत्यनर्थाय परत्रादातुरेव च।।
             हिन्दी में भावार्थ-बिडाल (दूसरों को मूर्ख बनाकर लूटने वाले), बक (बाहर से साधु का वेश धारण करने वाले राक्षसीय वृत्ति वाले) तथा वेद ज्ञान से रहित लोगों को दान देने से आदमी पाप का भागी बनता है।
            यह कहना तो अनुचित होगा कि हमारे देश के सभी लोग मूर्ख हैं पर यह भी सत्य है कि बिडाल, बक और अध्यात्म के ज्ञान से शून्य लोग चालाकी से अपने लिये रोजीरोटी के लिये आमजन को भ्रमित कर रहे हैं।  समाज सेवा एक ऐसा पेशा बन गयी है जिससे अनेक लोग न केवल रोजीरोटी कमा रहे हैं वरन् प्रचार माध्यमों में विज्ञापन और पैसा देकर अपने महानतम होने का पाखंड रच रहे हैं। हम यह नहीं कहते कि आमजन किसी को भी चंदा या दान न दे पर इतनी अपेक्षा तो आम भारतीय से की ही जानी चाहिए कि वह उचित पात्र को अपने मेहनत की कमाई का अंश प्रदान कर अपने मन को तृप्त करे न कि अनुचित आदमी को देने के बाद जब उसकी वास्तविकता पता होने से अपने अंदर खीज को आने दे।  देश में एक तरफ अनेक तरह की समस्यायें हैं पर उनका निपटारा जनच्रेतना से हो सकता है। उसके लिये यह जरूरी है कि हम अपने शरीर की नहीं वरन् मन की आंखें भी खोलकर रखें।  स्थितियों पर आध्यात्मिक दृष्टि से विचार कर उचित और अनुचित बात का निर्णय करें।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश 
poet and writer-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

देश के विकास के लिए मंत्र जपें-हिंदी आध्यामिक चिंत्तन


       आज भारत में चल हिन्दी टीवी चैनलों पर चल रहे कार्यक्रमों को देखा जाये तो लगेगा कि हमारे देश में केवल युवाओं की  इश्क बाज़ी, क्रिकेट, फिल्म और तथा प्रशासनिक घोटालों के अलावा अन्य कोई विषय नहीं है। सबसे बड़ी बात तो यह मान ली गई लगती है कि आम आदमी की कोई स्वयं  की  सोच नहीं है। उसकी कोई  आवाज़ नहीं है। प्रचार और समाज सेवा से जुड़े लोग चाहे जैसे अपने हिसाब से आम आदमी की अभिव्यक्ति प्रदर्शित करते दिखते हैं।  देश एक तरह से दो भागों में बाँट गया है। एक तरफ है इंडिया तो दूसरी तरफ हैं भारत।
    इंडिया का मुख बाहर की तरफ है तो भारत का रूप विश्व परिदृश्य से अज्ञात दिखता है। इस इंडिया में  देश के आठ दस बड़े शहर हैं जो विश्व बिरादरी से जुड़े हैं और यहीं के सामाजिक,आर्थिक,राजनीतिक तथा धार्मिक शिखर पर विराजमान लोग और उनके  पालित विद्वान बुद्धिजीवी जैसा देश का रूप दिखा रहे हैं वैसा ही सभी देख रहे हैं।  इतना ही नहीं देश के अंदर भी यही लोग भाग्य विधाता बना गए हैं।  यह सब बुरा नहीं होता अगर स्वार्थवाश कार्य करने वाले इन लोगों  की बुद्धि संकुचित और शारीरिक क्षमता सीमित नहीं होती।  एक बात निश्चित है कि स्वार्थ मनुष्य को संकीर्ण और सीमित क्षमता वाला बना देता हैं इसलिए  इन शिखर  पुरुषों से यह अपेक्षा तो करनी ही नहीं चाहिए कि वह अपने दृष्टिकोण  यह u को कभी व्यापक रखकर काम करें क्योंकि उन्होंने हमेशा ही दायरों में रहकर जीवन बिताया है।  यह इनके  लिए संभव ही नहीं है।  कहा जाता है जो  देह के पास हैं वही दिल के पास है।  बड़े शहरों में यही शिखर पुरुष और इनके पालित बुद्धिमान रहते हैं।  इनके पास सारी सुविधाएँ हैं जो इन्होने सारे देश से कमाई हैं मगर अपने पास स्थापित वैभव के इनको कुछ नहीं दिखता।  यह सब भी स्वीकार्य होता  अगर पूरे देश को प्रभैत करने का माद्दा इनके पास नहीं होता।
        इन्हीं शिखर पुरुषों के पास देश का  भविष्य और व्यवस्था को प्रभावित करने वाली शक्ति  है जिसका उपयोग  यह अपने पालित बुद्धिजीवियों कि राय से तय करते हैं।  यह दोनों मिलकर एक दुसरे के हितों की चिंता के अलावा कुछ नहीं करते।  इनका  दावा यह कि यह आम आदमी को जानते हैं। दूर की बात क्या  बड़ी इमारतों में रहने वाले इन लोगों को अपने ही बड़े शहरों के छोटे लोगों का ज्ञान नहीं है।  समाज, कला, अर्थ, धर्म   और प्रबंध के क्षेत्र में कार्यरत लोग आमजन निराश है। देश में जो निराशा और हताशा का वातावरण हैं उसके लिए जिम्मेदार कौन है? इस पर कोई विचार कोई नहीं करता ।
        सच बात तो यह कि इसके लिए हमारे देश  के वही आमजन जिम्मेदार  हैं जो हमेशा  ही इन शक्तिशाली, वैभवशाली और ऊंची जगहों पर बैठे लोगों की तरफ मूंह किए बैठे रहते हैं, जिससे इनको अपनी विशिष्टता का बोध होता है जिससे  यह उदार होने की बजाय आत्ममुग्ध हो जाते हैं।  आमजन उनमें अपने वैभव का अहंकार भरते हैं। यही कारण  है की   दौलत, शौहरत  और ताकत में मदांध यह लोग अपने कार्यों सामान्य  कार्यों में भी विशिष्टता की अनुभूति  कराना  नहीं भूलते।  सच बात तो यह है देश भगवान भरोसे चल रहा है। अगर इसी तरह चलता रहा तो आगे हालात  और कठिन होने वाले हैं।  फिर भी हम मानते हैं हमारी  भूमि देव भूमि है और वही इसकी रक्षा करते हैं।  उनमें वह शक्ति  है जो इस अपनी भूमि की रक्षा के लिए अदृश्य रहकर भी काम करते  हैं और समय आने पर किसी की बुद्धि और ताकत कम या ज्यादा  आकर अंतत: हमारी रक्षा करेंगे।  वेदों में इस तरह की ऐसी अनेक प्रार्थनाएँ हैं उनमें से रोज एक जपना चाहिए।  हमारा मानना है उससे लाभ अपने को तो होगा ही पूरे समाज को भी होगा। अब यह नहीं सोचना चाहिए कि इससे  तो उन लोगों को भी लाभ होगा जो प्रार्थना नहीं करते।  हम जब शिखर पुरुषों और उनके पालित बुद्धिजीवियों पर संकीर्ण होने का संदेह करते हैं तब अपने व्यापक दृष्टिकोण अपनाकर उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। जय श्री राम, जय श्री कृष्ण, जय श्री शिव शंकर,हरिओम।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Gwalior, madhya pradesh
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वह क्या जाने-हिंदी कविता


उनके चेहरे पर मुखौटा है

उसके पीछे कौन है,

जवाब में वह मौन है।

कहें दीपक बापू जिंदगी में

इतने मंजर हमने देखे हैं

बस चेहरे बदलते हैं

ज़माने का भला करने की

अदायें पुरानी दिखाते हुए सभी

पर्दे पर  टहलते है,

उनका जिस्म सजा है अपने आकाओं के

दान और चंदे  पर,

भर लिये सोने और चांदी से अपने घर,

क्या जाने ज़माने का वह दर्द,

जज्बात हो गये उनके सर्द,

क्यों जानेंगे

दरवाजे पर बीमार, बेकार और भूखा

आकर खड़ा कौन है?

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””

Gwalior, madhyapradesh

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चीजें सस्ती और जिंदगी महँगी-हिंदी व्यंग्य कविता


महंगाई बस यूं ही

बढ़ती जायेगी

आम इंसान की तरक्की

हमेषा ख्वाब में नज़र आयेगी।

कहें दीपक बापू

हम तो ठहरे सदाबाहर आम आदमी

तकलीफें झेलने की आदत पुरानी

एक आती  दूसरी जाती है

माया की तरह बदलती है रूप अपना

डरते नहीं है

जानते हैं

मुसीबतों से निजात

इस जन्म में हमें नहीं  मिल पायेगी।

तसल्ली है

चीजों की बढ़ती कीमत से

आम आदमी की ज़िन्दगी

पहले से सस्ती होती जायेगी।

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लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश

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समंदर जैसे गहरे लोग -हिंदी कविता


उनको समंदर की तरह

गहरा कहा जाता है,

इसलिये उनके घर से

हर कोई लौट जाता है प्यासा,

पानी उनकी तिजोरी में बंद है

खारा हो गया है,

मगर उनके मन में अभी तक बची पिपासा।

कहें दीपक बापू

 आम इंसान की भलाई की

जो शपथ उठा लेता है

हीरों का ताज पहनने के लिये वह नहीं  तरसता,

सिंहासन के लिये उस पर लोभ नहीं बरसता,

न नारे लगाता है,

न वादे बजाता है,

उसके अंतर्मन में बहती पवित्र जल की धारा

ज़माने का भला किये बिना

रहता है वह प्यासा।

——————————-

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

हिंदी दिवस पर लेख-इस हिंदी ब्लॉग समूह ने २५ लाख पाठक/पाठ पठन संख्या पार की-सम्पादकीय


                  अंतर्जाल पर हिन्दी ब्लॉग लेखन एक तरह से थम गया है। इसका मुख्य कारण नयी पीढ़ी का फेसबुक की तरफ मुड़ जाना है। संवाद संप्रेक्षण की बृहद सीमा के बावजूद हिन्दी के ब्लॉग जगत में कोई ऐसी रचना पढ़ने को नहीं मिल रही जिससे याद रखा जा सके। समसामयिक विषयों पर भी वैसा ही पढ़ने को मिल रहा है जैसा कि परंपरागत प्रचार माध्यमों में-टीवी चैनल और पत्र पत्रिकाऐं-पढ़ने को मिल रहा है। दरअसल जब इस लेखक ने अपना लेखन ब्लॉग पर प्रारंभ किया था तब न तो सामने कोई लक्ष्य था न ही आशा। जिज्ञासावश प्रारंभ किये गये इस लेखन के दौरान समाज के पहले से ही मस्तिष्क में कल्पित रूप को सच में सामने देखा जिसे अपनी रचनाओं में भी व्यक्त किया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि अध्यात्मिक लेखन ने न केवल जीवन में परिपक्व बनाया बल्कि लक्ष्य की तरफ बढ़ने का संकल्प मजबूत करने के साथ ही अभिव्यक्ति को तीक्ष्ण बनाया। अब आंखें बंदकर कंप्यूटर पर उंगलियों से टंकण करते हैं तो देखने वाले लोग हैरान होकर पूछते हैं कि आखिर यह करते कैसे हो?
                प्रारंभ में इस हिन्दी ब्लॉग जगत में कुछ दोस्त बने थे। अंतर्जाल पर हिन्दी में ब्लॉग लेखन उस समय प्रारंभिक दौर में था। पहले लगा कि वह वास्तविक दुनियां हैं पर जल्द लगा कि यह केवल आभास भर था। मित्र एक था या दो या पांच, कहना कठिन है। यह संभव है कि एक मित्र हो और पांच रूप धरता हो। संभव है दो हों। एक बात तय रही कि कम से कम एक आदमी ऐसा है जो हम जैसा सोच रखता है। वह दो भी हो सकते हैं यह हम नहीं मानते। अद्वितीय हम हैं यह हम मानते हैं पर बुद्धिमान या अज्ञानी यह दूसरों के लिये विश्लेषण का विषय है। जीवन में लेखन प्रारंभ करते समय हमारे एक मित्र ने हमें बता दिया था कि तुम्हारा सोच अद्वितीय है और इसे अद्वितीय आदमी ही समझेगा। एक हमारे परिचित लेखक मित्र हैं वह भी ब्लॉग लेखन करते हैं और उनकी प्रवृत्तियां भी अद्वितीय श्रेणी की है। इसका मतलब यह कि कम से हम जैसे दो लोग हैं जो हमारी बात समझते हैं। अगर इस ब्लॉग लेख्न की बात की जाये तो हमारे लिये यही संतोष का विषय है कि हम जैसे विचार वाला एक आदमी तो यहां है।
              इधर हिन्दी दिवस आ रहा है। ब्लॉग लेखन अब हमारे लिये एकाकी यात्रा हो गयी है। हिन्दी लेखन में यह दुविधा है कि अगर आप अकेले होकर लिखते हैं तो प्रचार के प्रबंधन के अभाव में आपको कोई पूछता नहीं है और अगर प्रबंधन करने जाते हैं तो लिखने की धार खत्म हो ही जाती है। हिन्दी में ब्लॉग लेखन बेपरवाह होकर ही किया जा सकता है। शुरुआती दौर में हमें एक दो मित्र ऐसे मिले जिनसे यह अपेक्षा थी कि शायद वह लंबी लड़ाई के साथी हैं पर बाद में पता लगा कि वह प्रबंध कौशल दिखाते हुए हमें अपने साथियों की भीड़ में शािमल किये हुए थे। अब शायद भीड़ बढ़ गयी तो वह उनके अगुवा होकर प्रचार अभियान में इस तरह जुटे कि हमारा नाम तक उनको याद नहीं रहा है। हिन्दी लेखन की यह दूसरी दुविधा यह है कि वही लेखक बड़ा या महान कहलाता है जिसके चार छह लेखक शागिर्द हों। हम भी किसी के शागिर्द बन जाते पर चूंकि व्यवसायिक रूप से इसका कोई लाभ हमें मिलने की संभावना नहीं लगी तो बराबरी का व्यवहार करते रहे। अखबारों में कभी हमारा नाम ब्लॉगर के रूप में दर्ज नहीं हो्रता इसलिये हमारे पाठक कभी किसी समाचार पत्र या पत्रिका ब्लॉग से संबंधित सामग्री देखकर हमारा नाम न खोजें तो अच्छा ही है। उस दिन हमारे एक दोस्त ने हमसे पूछा कि ‘‘यार तुम अंतर्जाल पर हिन्दी भाषा में इतना सारा लिखते हो पर कोई सम्मान वगैरह की खबर नहीं आती।’’
          हमने उत्तर दिया कि-‘‘एक लेखक के रूप में तुम ही क्या सम्मान देते हो कि दूसरा देगा।’’
लिखते तो हम पहले भी थे पर मानना पड़ेगा कि अंतर्जाल पर लिखते हुए हम श्रद्धेय गणेश जी भगवान की ऐसी कृपा बरसती है कि एक बार लिखना प्रारंभ करते है तो फिर रुकते नही। रचना स्वतः प्रवाहित होकर आती है। कभी कभी पुराने ब्लॉग मित्रों की याद आती है पर लेखन व्यवसाय से जुड़े उन लोगों से यह आशा करना उनके साथ ज्यादती करना है कि वह हमारे साथ जुड़े रहें या कहीं हमारी चर्चा करें।
          फेसबुक पर नयी पीढ़ी सक्रिय है और ब्लॉग लेखन में उनकी रुचि नहीं है। फिर भी जो लोग ब्लॉग लिखना चाहते हैं वह मानकर चलें कि उनकी एकाकी यात्रा होगी। हिन्दी ब्लॉग लेखन में पूरी तरह से क्षेत्रीयता तथा जातीयता उसी तरह हावी है जिस तरह पुराने समय में थी। बड़े शहर या प्रतिष्ठित प्रदेश का निवासी होने का अहंकार यहां भी लेखकों में है। इस अहंकार की वजह से लिखने की बात हम नहीं जानते पर पढ़ना कई लोगों का बिगड़ गया। पहले उनको हमारी रचनाऐं दिखती थी पर अब हम उनके लिये लापता हो गये हैं। यह कोई शिकायत नहीं है। सच बात तो यह है कि इस एकाकीपन ने हमें बेपरवाह बना दिया है। हमारी पाठक संख्या लगातार बढ़ी है। साथ ही यह विश्वास भी बढ़ा है कि जब हम कोई गद्य रचना करेंगे तो लोग उसे पूरा पढ़े बिना छोड़ेंगे नहीं। इसका कारण यह कि श्रीमद्भागवत गीता के अध्ययन ने हमें ऐसा बना दिया है कि हमारी गद्य रचनाओं में आई सामग्री कही अन्यत्र मिल ही नहीं सकती। यह सब इसी अंतर्जाल पर श्रीगीता पर लिखते लिखते ही अनुभव हुआ है। फुरसत और समर्थन के अभाव में कभी कभी कुछ बेकार कवितायें लिखते हैं तो उनमें भी कुछ ऐसा होता है कि व्याकररण की दृष्टि से अक्षम होते हुए भी सामग्री अपने भाव के कारण लोकप्रिय हो जाती है।
         ग्वालियर एक छोटा शहर है तो मध्यप्रदेश एक ऐसा प्रदेश है जिसकी प्रतिभाओं को वहीं रहते स्वीकार नहीं किया जाता। बड़े शहर में जाकर बड़े हिन्दी व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में कथित बड़े विद्वानों की चरणसेवा किये बिना राष्ट्रीय पटल पर स्थापित होना कठिन है पर अंतर्जाल पर हमें पढ़ने वाले पाठक जानते होंगे रचनायें हमेशा ही व्यापक दायरों में सोचने वाले लोगों के हाथ से होती है। कथित हिन्दी लेखक साम सामयिक विषयों में लिखकर आत्ममुग्ध होते हैं पर आम पाठक के लिये वह कोई स्मरणीय रचना नहीं लिख पाते। हमारे ब्लॉग पर ऐसी कई रचनायें हैं जो लोग पढ़कर आंदोलित या उत्तेजित होने की बजाय चिंत्तन में गोते लगाते हैं। बहरहाल यह बकवास हमने इसलिये कि हमारे बीस ब्लॉग कुल पच्चीस लाख की पाठक/पाठ पठन संख्या पार कर कर गये हैं। इस पर हम अपने पाठक तथा टिप्पणीकर्ताओं के आभारी है जिनके प्रोत्साहन की वजह से यह सब हुआ। अब चूंकि ब्लाग लेखक मित्रों से संपर्क बंद है इसलिये उनको इस बात के लिये धन्यवाद देना व्यर्थ है क्योंकि उनको तो यह मालुम भी नहीं होगा कि हमने ब्लॉग लिखना बंद नहीं किया भले ही अखबार वगैरह में हमारा नाम नहीं देते। जय श्री राम, जय श्री कृष्ण!
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””

Gwalior, madhyapradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  ‘Bharatdeep’,Gwalior

http://deepkraj.blogspot.com

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