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अंतहीन सिलसिला -व्यंग्य कविता


एक तलाश पूरी होते ही
आदमी दूसरी में जुट जाता
अंतहीन सिलसिला है
अपने मकसद रोज नये बनाता
पूरे होते ही दूसरे में जुट जाता
भरता जाता अपना घर
पर कीमती समय का जो मिला है खजाना
नहीं देखता उसकी तरफ
जो हर पल लुट जाता

धरती के सामानो से जब उकता जाता
तब घेर लेती बैचेनी
तब चैन पाने के लिये आसमान
की तरफ अपने हाथ बढ़ता
दिल को खुश कर सके
ऐसा सामान भला वहां से कब टपक कर आता
हाथ उठाये सर्वशक्तिमान का नाम पुकारता
कभी नीली छतरी के नीचे
कभी पत्थर की छत को टिकाये
दीवारों के पीछे
पर फिर भी उसे तसल्ली का एक पल नहीं मिल पाता

हर पल दौड़ते रहने की आदत ऐसी
कि रुक कर सोचने का ख्याल कभी नहीं आता
जिंदगी में लोहे, लकड़ी और प्लास्टिक के सामान
जुटाता रहा
पर फिर उनका घर कबाड़ बन जाता
जिनके आने पर मनाता है जश्न
फिर उनके पुराने होने पर घबड़ाता
आदमी दिमाग के सोचने से परे होने का आदी होता
जब आये सोच की बारी वह हार जाता
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