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हैरान हैं लुटेरे और उनके दलाल-हिन्दी व्यंग्य कविता


महंगाई में दिवाली भी मना ली
होली भी मनाएंगे,
लूट जिनका पेशा हैं
उनके कारनामों पर कितना रोयेंगे,
कब तक अपनी खुशियाँ खोएंगे,
जब आयेगा हंसने का मौक़ा
खुद भी हंसेगे दूसरों को भी हंसाएंगे.

देश से लेकर विदेश तक
हैरान हैं लुटेरे और उनके दलाल,
क्यों नहीं हुआ देश बर्बाद
इसका है उनको मलाल,
वैलेन्टाईन डे और फ्रेंड्स डे के
नाम पर मिटाने की कोशिश
होती रही है देश की परंपराएं,
हो गए कुछ लोग अमीर,
गरीब हो गया उनका ज़मीर,
मगर जो गरीब रह गए हैं,
लुटते रहते हैं रोज
पर मेहनत के दम पर वह सब सह गए हैं,
ज़िन्दगी के रोज़मर्रा जंग में
लड़ते हुए भी
होली और दिवाली पर
खुशियाँ मनाएँ,
रौशन इंडिया में
अँधेरे में खड़े भारत को जगमगाएं..
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कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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