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मौसम अच्छा हो तो घर पर ही मन जाती है पिकनिक -व्यंग्य


अपने जीवन में मैं अनेक बार पिकनिक गया हूं पर कहीं से भी प्रसन्न मन के साथ नहीं लौटा। वजह यह कि बरसात का मौसम चाहे कितना भी सुहाना क्यों न हो अगर दोपहर में पानी नहीं बरस रहा तो विकट गर्मी और उमस अच्छे खासे आदमी को बीमार बना देती है।
वैसे अधिकतर पिकनिक के कार्यक्रम पूर्वनिर्धारित होते हैं और उनको उस समय बनाया जाता है जब बरसात हो रही होती है। जिस दिन पिकनिक होती है पता लगा कि बरसात ने मूंह फेर लिया और सूर्य नारायण भी धरती के लालों को पिकनिक बनाते हुए देखने के लिये विराट रूप में प्रकट हो जाते हैं। वह कितने भी स्नेहपूर्ण दृष्टि से देखें पर उनका स्परूप दोपहर में विकट होता है। ऐसे में पसीने से तरबतर होते हुए जबरन खुश होने का प्रयास करना बहुत कठिन होता है।

आखिर मैं क्यों इन पिकनिकों पर क्या जाता हूं? होता यह है कि कई लोग तो ऐसे हैं जो वर्ष में एक बार इस बहाने मिल जाते हैं। दूसरा यह कि कई संगठनों और समूहों में मै। इस तरह सदस्य हूं कि हमारा पिकनिक का पैसा स्वतः ही जमा हो जाता है और भरना हो हमें होता ही है। सो चले जाते हैं
अब उस दिन भाई लोग भी जबरन पिकनिक मनाते हैं। वहां साथी और मित्र नहायेंगें, शराब पियेंगे और कभी कभार जुआ खेलेंगे। कहते यही हैं कि ‘ऐसे ही एंजोय(यही शब्द उपयोग वह करते हैं) किया जाता है।’
नाश्ता और खाना होता है। नाश्ता दोपहर में तो भोजन शाम को होता है। हम तो बातचीत करते हैं पर लगता है कि ऐसी जगहों पर शराब और नहाने से परहेज होने के कारण हम अकेले पड़ जाते हैं और फिर वहां अपने जैसे ही लोगों के साथ बतियाते हैं। खाना खाकर शाम को घर लौटते हैं तो ऐसा लगता है कि स्वर्ग में लौट कर आये। आखिर अपने आपसे ही पूछते हैं कि‘ फिर हम पिकनिक मनाने गये ही क्यों थे?’

एक बार नहीं कई बार ऐसा हुआ हैं। इन्हीं दिनों में कई लोगों के जलाशयों में डूब जाने के समाचार आते हैं और कहीं कहीं तो चार-चार लोगों के समूह जलसमाधि ले लेते हैं और फिर उनके परिवारों का विलाप कष्टकारक होता ही। अभी तक मैं जिन पिकनिक में गया हूं वहां कहीं ऐसा हादसा नहीं हुआ पर अपने चार मित्रों की ऐसी ही हृदय विदारक घटना में जान जा चुकी है। उनको याद कर मन में खिन्नता का भाव आ जाता है।

यह मौसम पिकनिक का मुझे कतई नहीं लगता पर लोग बरसात होते ही जलाशयों की तरफ देखना शूरू कर देते हैं। अक्सर सोचता हूं कि यह पिकनिक की परंपरा शूरू हुई कैसे? अगर हम अपने पुराने विद्वानों की बात माने तो उन्होंने इस मौसम में अपने मूल स्थान से की अन्यत्र जाना निषिद्ध माना है। इस नियम का पालन सामान्य आदमी ही नहीं बल्कि राजा, महाराजा और साधू संत तक करते थे। व्यापारी दूर देश में व्यापार, राजा किसी दूसरे देश पर आक्रमण और साधु संत कहीं धर्मप्रचार के लिये नहीं जाते थे। कहते हैं कि उस समय सड़कें नहीं थी इसलिये ऐसा किया जाता था पर मुझे लगता है कि यह अकेला कारण नहीं था जिसकी वजह से पारगमन को निषिद्ध किया गया।

इस समय आदमी मनस्थिति भी बहुत खराब होती है और सड़क कितनी भी साफ सुथरी हो उमस के माहौल में एक अजीबोगरीब बैचेनी शरीर में रहती है। बहुत पहले एक बार एक पिकनिक में मुझे एक दोस्त ने एक पैग शराब पीने को प्रेरित किया तो मैंने सोचा चलो लेते हैं। उस दिन मैंे नहाने की जलाशय में उतरा। मुझे तो बिल्कुल मजा नहीं आया। जब बाहर निकला तो तुरंत पसीना निकलने लगा। घर लौटते हुए ऐसा लग रहा था कि बीमार हो गया हूं।
जलाशयों में उतरने पर एक तो ऊपर की गर्मी और फिर पानी के थपेड़े किसी भी स्वस्थ आदमी को विचलित कर सकते हैं यह मेरा अनुभव है पर लोगों में अति आत्मविश्वास होता है और फिर कुछ लोगों को इसका दुष्परिणाम भुगतना पड़ता है।
आजकल बरसात जमकर हो रही है तो शायद कई लोगों को ऐसा नहीं लगता होगा पर अगर ठंडी हवाओं का आनंद तो कहीं भी लिया जा सकता है। उस दिन सुबह मैं योग साधना कर रहा था तो कड़े आसनो के बाद भी मुझे पसीना नहीं आया तब मुझे आभास हुआ कि मौसम अच्छा है। प्राणायम करते हुए नाक के द्वारा अंदर जाती शीतल हवा ऐसा सुखद आभास देती थी कि उसके भाव को व्यक्त करने के लिये मेरे पास शब्द ही नहीं है। वैसे भी योगसाधना के समय मौसम के अच्छे बुरे होने की तरफ मेरा ध्यान कम ही जाता है।

वहां से निवृत होकर मैं नहाया और फिर अपने नियमित अध्यात्मिक कार्यक्रम के बाद मैंने चाय पी। उस समय घर में बिजली नहीं थी। इसलिये मैं बाहर निकला। बाहर आते ही मैंने देखा कि आसमान में बादल थे और शीतल हवा बह रही थी। उस सुखद अनुभूति से मेरा मन खिल उठाा और शरीर में एक प्रसन्नता के भाव का संचार हुआ। तब मैं सोच रहा था कि ‘क्या पिकनिक के लिये इससे कोई बढि़या जगह हो सकती है।’
मैने साइकिल उठाई और अपने घर से थोड़ी देर एक मंदिर में पहुंच कर ध्यान लगाने लगा। मंदिर के आसपास पेड़ और पौघों की हरियाली और शीतल पवन का जो अहसास हुआ तो मुझे नहीं लगा कि कभी किसी पिकनिक में ऐसा हुआ होगा। उसी दिन एक मित्र का फोन आया कि‘पिकनिक चलोगे?’
उसने पांच दिन आगे की तारीख बताई तो मैंने उससे कहा-‘अगर मौसम अच्छा रहा तो मेरे आसपास अनेक पिकनिक मनाने वाली जगह हंै वहीं जाकर मना लूंगा और अगर उस दिन खराब रहा तो कहीं भी सुखद अहसास नहीं हो सकता। इसलिये मैं तुम्हारे साथ नहीं चल सकता।’

हमारे अनेक कवियों ने वर्षा पर श्रृंगाार रस से भरपूर रचनाएं कीं पर किसी ने पिकनिक का बखान नहीं किया। सच भी है कि अगर ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ ऐसे ही नहीं कहा जाता। ऐसी पिकनिक मनाने से क्या फायदा जो बाद में मानसिक संताप में बदलती हो। घर आकर यह सोचते हों कि‘आज का समय व्यर्थ ही गंवाया’।

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क्या फायदा विषय का पहाड़ खोदने से-हास्य कविता



समाज के शिखर पर बैठे लोग
हांकते हैं ऐसे आदमी को
जैसे भेड़-बकरी हों
जो न बोले
न कहे
न देखे
उनके काले कारनामें दिन के उजाले में भी
अपने डंडे के जोर पर चलता उनका फरमान
टूट जाये चाहे किसी का भी अरमान
उन पर कोई नहीं उठाता उंगली
फिर भी समाज की गलियों में
गोल-गोल घूमता है
चाहे वह कितनी भी संकरी हों
………………………………………………..

अब तो मुद्दे जमीन पर नहीं बनते
हवा में लहराये जाते
राई से विषय पहाड़ बताये जाते
मसले अंदर कमरे में कुछ और होते
बाहर कुछ और बताये जाते
चर्चा होती रहे पब्लिक में
पर समझ में न आये किसी के
ऐसे ही विषय उड़ाये जाते

कहें महाकवि दीपक बापू
‘कई बार विषयों का पहाड़ खोदा
कविता जैसी निकली चुहिया
भाई लोग उस पर हंसी उड़ाये जाते
बहुत ढूंढा पढ़ने को मिला नहीं
होती कहीं कोई व्यापार की डील
करता कोई तो कोई और लगाता सील
कुछ को होता गुड फील
तो किसी को लगती पांव में कील है
कोई समझा देता तो
न लिखने का होता गिला नहीं
कोई खोजी पत्रकार नहीं
जैसा मिला वैसा ही चाप (छाप) दें
हम तो खोदी ब्लागर ठहरे
विषयों का पहाड़ खोदते पाताल तक पहुंच जाते
कोई जोरदार पाठ बनाये जाते
पर पहले कुछ बताता
या फिर हमारे समझ में आता
तो कुछ लिख पाते
इसलिये केवल हास्य कविता ही लिखते जाते
क्या फायदा विषय का पहाड़ खोदने से
जब केवल निकले चुहिया
उसे भी हम पकड़ नहीं पाते
………………………………
दीपक भारतदीप

गीत संगीत की महफिल की बजाय महायुद्ध सजाते-हास्य कविता


गीत और संगीत से
दिल मिल जाते हैं पर
अब तो उसकी परख के लिये
प्रतियोगितायें को अब वह
महायुद्ध कहकर जमकर प्रचार कराते
वाद्ययंत्र हथियारों की तरह सजाये जाते
जिन सुरों से खिलना चाहिये मन
उससे हमले कराये जाते
मद्धिम संगीत और गीत से
तन्मय होने की चाहत है जिनके ख्याल में
उन पर शोर के बादल बरसाये जाते

कहें महाकवि दीपक बापू
‘अब गीत और संगीत
में लयताल कहां ढूंढे
बाजार में तो ताल ठोंककर बजाये जाते
महफिलें तो बस नाम है
श्रोता तो वहां भाड़े के सैनिक की
तरह सजाये जाते
जो हर लय पर तालियों का शोर मचाते
देखने वाले भी कान बंद कर
आंखों से देखने की बजाय
उससे लेते हैं सुनने का काम
गायकों को सैनिक की तरह लड़ते देख
फिल्म का आनंद उठाये जाते
किसे समझायें कि
भक्ति हो या संगीत
एकांत में ही देते हैं आनंद
शोर में तो अपने लिये ही
जुटाते हैं तनाव
जिनसे बचने के लिये संगीत का जन्म हुआ
क्या उठाओगे गीत और संगीत का आंनद
जैसे हम उठाते
लगाकर रेडियो पर विविध भारती पर
अपनी अंतर्जाल की पत्रिका पर लिखते जाते
यारों, संगीत सुनने की शय है देखने की नहीं
गीत वह जिसके शब्द दिल को भाते हैं
सुरों के महायुद्ध में जीत हार होते ही
सब कुछ खत्म हो जाता है
पर तन्हाई में लेते जब आनंद तब
वह दिल में बस जाते
बाजार में दिल के मजे नहीं बिकते
अकेले में ही उसके सुर पैदा किये जाते
……………………………

दीपक भारतदीप

चिंतन शिविर-हास्य कविता


अपने संगठन का चिंतन शिविर
उन्होंने किसी मैदान की बजाय
अब एक होटल में लगाया
जहां सभी ने मिलकर
अपना समय अपने संगठन के लिये
धन जुटाने की योजनायें बनाने में बिताया
खत्म होने पर एक समाज को सुधारने का
एक आदर्श बयान आया
तब एक सदस्य ने कहा
-‘कितना आराम है यहां
खुले में बैठकर
खाली पीली सिद्धांतों की बात करनी पड़ती थी
कभी सर्दी तो गर्मी हमला करती थी
यहां केवल मतलब की बात पर विचार हुआ
सिर्फ अपने बारे में चिंतन कर समय बिताया’
……………………………

दीपक भारतदीप

हर रोज जंग का माडल, हर समय होता-व्यंग्य कविता


हर इंसान के दिल की पसंद अमन है
पर दुनियां के सौदागरों के लिये
इंसान भी एक शय होता
जिसके जज्बातों पर कब्जा
होने पर ही सौदा कोई तय होता
बिकता है इंसान तभी बाजार में
जब उसके ख्याल दफन होते
अपने ही दिमाग की मजार में
जब खुश होता तो भला कौन किसको पूछता
सब होते ताकतवर तो कौन किसको लूटता
ढूंढता है आदमी तभी कोई सहारा
जब उसके दिल में कभी भय होता
उसके जज्बातों पर कब्जो करने का यही समय होता

चाहते हैं अपने लिये सभी अमन
पर जंग देखकर मन बहलाते हैं
इसलिये ही सौदागर रोज
किसी भी नाम पर जंग का नया माडल
बेचने बाजार आते हैं
खौफ में आदमी हो जाये उनके साथ
कर दे जिंदगी का सौदा उनके हाथ
सब जगह खुशहाली होती
तो सौदागरों की बदहाली होती
इसलिये जंग बेचने के लिये बाजार में
हमेशा खौफ का समय होता

बंद कर दो जंग पर बहलना
शुरू कर दो अमन की पगडंडी पर टहलना
मत देखो उनके जंग के माडलों की तरफ
वह भी बाकी चीजों की तरह
पुराने हो जायेंगे
नहीं तो तमाम तरह की सोचों के नाम पर
रोज चले आयेंगे
पर ऐसा सभी नहीं कर सकते
आदमी में हर आदमी से बड़े बनने की ख्वाहिश
जो कभी उसे जंग से दूर नहीं रहने देगी
क्योंकि उसे हमेशा अपने छोटे होने का भय होता
सदियां गुजर गयी, जंगों के इतिहास लिखे गये
अमन का वास्ता देने वाले हाशिये पर दिखे गये
इसलिये यहां हर रोज जंग का माडल हर समय होता
………………………………..

ख्याल तो हैं जलचर की तरह-हिंदी शायरी



मन का समंदर है गहरा
जहां ख्याल तैरते हैं जलचर की तरह
कुछ मछलियां सुंदर लगती हैं
कुछ लगते हैं खौफनाक मगरमच्छ की तरह

देखने का अपना अपना नजरिया है
मोहब्बत हर शय को खूबसूरत बना देती है
नफरत से फूल भी चुभते हैं कांटे की तरह
इस चमन में बहती है कभी ठंडी तो कभी गर्म हवा
मन जैसा चाहे नाचे या चीखे
नहीं उसके दर्द की दवा
न एक जगह ठहरते
न एक जैसा रूप धरते
ख्याल तो हैं बहते जलचर की तरह
…………………………..

दीपक भारतदीप

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मैं नहीं हूं कोई सिकंदर-हिंदी शायरी


किसे मित्र कहें किसे शत्रू
आदमी बंटा हुआ है अपने अंदर
सिमट जाता है अपने ख्यालों में
एक तालाब की तरह
जब मिलती है जिंदगी जीने के लिये जैसे एक समंदर

दोस्ती के लिये फैले हैं इतने लोग
पर दायरों मेंे ही वह निभाता
जिनको जानता है उनसे करता सलाम
अजनबियों से मूंह फेर जाता
दोस्तों में भी अपने और गैर का करता भेद
कीड़े की तरह बहुत से नाम वाले समूह में
अपने लिये ढूंढता छेद
नाचता ऐसे है जैसे बंदर

देखा है अकेले में लोगों को अपना कहते हुए
अपने मिलते ही दूर होते हुए
फिर अपनी हालातों पर अपनों की
बेवफाई पर रोते हुए
फिर भी निकल नहीं पाते दायरों से
लगते हैं कायरों से
फिर भी नहीं तोड़ता भरोसा उनका
वह तोड़ जायें अलग बात है
मजबूर और लाचार हैं
दायरों में कैद रहने की आदत है उनकी
भला मैं उनको कैसे निकाल पाऊंगा
जो जन्म से उनको बांधे हैं
मैं नहीं हूं कोई सिकंदर
……………………………………………
दीपक भारतदीप

पाठ का इतना हिट होना मेरे लिये विस्मय का विषय-आलेख


मुझे विस्मय इस बात का है कि कबीरदास जी के मात्र दोहे और उनका अनुवाद प्रस्तुत करने वाले उस पाठ पर पाठकों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। कल उस पर चालीस व्यूज थे। मैंने पाठकों के आने का मार्ग देखा तो पाया कि गूगल के अनुवाद टूल पर अंग्रेजी में पढ़ी गयी थी। दोहे उसमें सही नहीं आ रहे थे। यह पाठ मात्र चार दिनों में ही ढाई सौ से अधिक व्यूज जुटा चुका है।

मैंने कबीरदास के इतने दोहे अनुवाद कर प्रकाशित किये कुछ पर अपनी सीमित बुद्धि से व्याख्याएं लिखी हैं कि उनकी संख्या का अनुमान मुझे भी नहीं है। यह पाठ मैंने उन दिनों लिखा था जब मैं यूनिकोड में रोमन लिपि में लिखता था और इस कारण सुबह अपनी व्याख्या लिखने का मेरे पास समय नहीं होता था। इस बात का उल्लेख करना ठीक रहेगा कि आजकल इस ब्लाग/पत्रिका पर मैं सामान्य आलेख और कवितायें ही लिखता हूं पर यह पाठ जिस तरह पढ़ा जा रहा है उससे मुझे हैरानी है। एक ने तो नारे में रूप में लिखा है कि हम तो कबीर के दोहे पढ़ना चाहते हैं। हालत यह है कि मेरे नये पाठ जितने व्यूज जुटाते हैं उससे तीन गुना तो यही पाठक जुटा रहा है।

लगता है कि कहीं हिंदी अंग्रेजी टूल के प्रयोग के लिये इसका चयन तो नहीं किया गया कि जिससे सभी प्रकार के दोहे भी अंग्रेजी में अनुवाद हो सकें और इसे देखा जा रहा हो। वैसे इस बीच मुझे यह लग रहा है कि शायद हिंदी अंग्रेजी टूल हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद करने में थोड़ा सुधार लिया गया है। आजकल वर्डप्रेस के शीर्षक में अंग्रेजी टूल से अनुवाद कर देखता हूं तो ठीकठाक दिखते हैं। मैंने एक अंग्रेजी के जानकार से इसकी पुष्टि भी करवाई थी। हां, अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद ठीक नहीं लगा रहा पर एक बार अगर हिंदी अनुवाद देखकर अंग्रेजी को पढ़ा जाये तो समझने में सुविधा तो होती है।
जिस पाठ की मैं चर्चा कर रहा हूं एक सामान्य पाठ है और कबीरदास जी के दोहों से तो मेरे अनेक ब्लाग भरे पड़े हैं। ऐसे में इस पाठ के लिये इतना आकर्षण क्यों दिखाई दे रहा है? हालांकि यह दोनों दोहे जीवन के रहस्य को समेटे हुए हैं पर कबीरदास जी के तो अनेक दोहे इसी प्रकार के हैं। कभी कभी तो लगता है कि अब मुझे अन्य कुछ लिखने की आवश्यकता ही नहीं या दोहे ही शायद मुझे वह ख्याति दिलवा देंगे जिसकी कल्पना मैंने नहीं की है। हालांकि यह मजाक लगता है पर जिस तरह यह पाठ पढ़ा जा रहा है उससे देखकर कोई भी यह कह सकता है। यह क्रम चल रहा है देखना है कब तक चलता है और इसका रहस्य क्या है? यह मेरे लिये दिलचस्पी का विषय बना हुआ है। यह पाठ अभी तक 1115 बार पढ़ा जा चुका है

इंसान कभी चिराग नहीं हो सकते-हिन्दी शायरी


यूं तो चमकता चाँद देखकर
अपना दिल बहला लेते
पर जब आकाश में नहीं दिखता वह
छोटा चिराग जला लेते हैं
जिन्दगी में अपने
रौशनी के लिए क्यों
किसी एक के आसरे रहें
इसलिए कई इंतजाम कर लेते हैं
इंसानों का भी क्या भरोसा
उजियाले में करते हैं
हमेशा साथ निभाने का
अँधेरा ही होते मुहँ फेर लेते हैं
—————————————
मांगी थी उनसे कुछ पल के लिए रौशनी उधार
उन्होंने अपना चिराग ही बुझा दिया
हमारा रौशनी में रहना
उनको कबूल नहीं था
अँधेरे को अपने पास इसलिए बुला लिया
इंसान कभी चिराग नहीं हो सकते यह बता दिया
————————
दीपक भारतदीप

बेजान चीजों की नीलामी, जिंदगी की नीलामी नहीं होती-हास्य कविता


आया फंदेबाज और बोला
‘दीपक बापू तुम्हारे हिट होने का
एक नुस्खा लाया हूं
सफलता बतलाने वाले डाक्टर से
सलाह कर आया हूंं
लोग कर रहे हैं अंतर्जाल पर
अपनी जिंदगी नीलाम
बेच रहे अपनी संपत्ति
तुम भी अपने ब्लाग के साथ
यही करो अनोखा काम
एक बार लोगों से टेंडर (निविदा) मंगवा लो
अपने ब्लाग की बोली लगवा लो
जब हो जायेंगे सब नीलाम
हो जायेगा तुम्हारा भी नाम
लोग अपनी संपत्ति बेचकर
हवा में उड़ जाने का प्लान बना रहे हैं
तुम तो वैसे ही रहते हो हवा में
कोई छद्म नाम से ब्लाग बना लेना
नहीं बिकते तो कोई बात नहीं
हो जाओगे तुम भी हिट
जब पढ़ेंगे सब तुम्हारा नाम
यह सोच विचार कर प्रस्ताव लाया हूं’

कंप्यूटर पर टंकित करने से
हाथ रोकते हुए
अपनी टोपी को सिर पर ढोते हुए
पलट कर गुस्से में लालपीले होकर देखा
फिर बोले महाकवि दीपक बापू
‘कम्बख्त तुम्हारी हर बात
हमारे ब्लाग पर ही क्यों चली आती है
हम लिखते और पढ़ते हैं
पर तुम्हारी नजर कभी नहीं जाती है
होना चाहिए पागल हमें पर
तुम होते नजर आ रहे हो
जिंदगी की नीलामी तो आसान है
उसमें मकान, फ्रिज, ऐसी, कार और
शानौशौकत का सामान है
भला कोई जिंदा चीज थोड़े ही उसमें शामिल है
लोग आजकल इसी को ही जिंदगी कहते हैं
इसलिये ही इनकी नीलामी को
जिंदगी की नीलामी कहते हैं
ब्लाग में बसते हैं हमारे जिंदा जज्बात
जब चाहे लिखते हैं दिन हो या रात
अंग्रेजी का होता तो सोचते
हिंदी ब्लाग तो
लोग अभी देखना भी पंसद नहीं करते
अंग्रेजी पढ़ने में न आये तो
फोटो देखकर काम चला लेंगे
जिंदगी का सच हिंदी में पढ़ने से लोग डरते
अगर होते भी हैं ब्लाग नीलाम तो समझो
कोई छद्म ताकत कर रही है काम
इसलिये इतना चिंतित न हो
फ्लाप होकर भी हम विचलित नहीं
तुम क्यों डरते हो
ब्लाग कोई जिंदगी नहीं है
भले ही उसके जज्बात हम इसमें लिखते हैं
कभी गंभीर तो कभी हंसते दिखते हैं
नीलामी पर हिट लेकर क्या करेंगे
फ्लाप होकर कुछ तो लिख लेते हैं
बेजान चीजों को जिंदगी मानने वाले लोगों में
जिंदादिल होकर लिखना ही ठीक है
कम से कम फ्लाप होने पर कोई सवाल तो
नहीं उठाता
मैं तो इसी निष्कर्ष पर पहुंच पाया हूं
…………………………
दीपक भारतदीप

कबीर साहित्य के पाठ की पाठक संख्या एक हजार के पार


मेरे इस ब्लाग/पत्रिका पर संत शिरोमणि कबीरदास के दोहों वाला एक पाठ आज एक हजार की पाठक संख्या पार गया। इसको मैं पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं और मूल पाठ को पढ़ने के लिये यहां क्लिक भी कर कर सकते हैं। जिस समय में इस पाठ को लिख रहा हूं तब उस पर पाठक संख्या 1029 है।

मुझे जैसे अस्त पस्त लेखक के लिये यह बहुत महत्वपूर्ण बात है क्योंकि कोई काम व्यवस्थित ढंग से न करने की वजह से मुझे अधिकतर सफलता इतनी आसानी से नहीं मिल जाती। इस पाठ के एक हजार पाठक संख्या पार करने में कोई विशेष बात नहीं है पर इस छोटे पाठ की इस सफलता में जो संदेश मेरे को मिलते हैं उसकी चर्चा करना जरूरी लगता है। इस हिंदी ब्लाग जगत पर तमाम तरह के विश्लेषण करने वाले लोग उसमें रुचि लेंगे इसकी मुझे पूरी जानकारी है और जो संदेश मिल रहे हैं वह कई धारणाओं का बदलाव का संकेत हैं वह समाज शास्त्र के विद्वानों के लिये भी दिलचस्पी का विषय हो सकते हैं कि आखिर अंतर्जाल पर भी आधुनिक युग में लोग कबीर साहित्य के रुचि ले रहे हैं।

सबसे पहली बात तो यह कि दो दोहों और उनका भावार्थ प्रस्तुत करना मेरे लिये इस समय आसान है क्योंकि मैं अब पहले देवनागरी फोंट कृतिदेव में टाइप कर उस पर अपनी कभी छोटी तो कभी बड़ी व्याख्या भी प्रस्तुत करता हूं पर जब यह पाठ लिखा गया था तब मुझे अंग्रेजी टाईप से यूनिकोड में टाईप करना पड़ता था। यह काम मेरे लिये कठिन ही नहीं अस्वाभाविक भी था। सुबह इतना संक्षिप्त पाठ लिखना ही बहुत बड़ी उपलब्धि होता था-आज भले ही मुझे भी लगता है कि इतने छोटे पाठ- जिसमें मेरा टंकक से अधिक योगदान नहीं है- की सफलता पर क्या इतना बड़ा आलेख लिखना।

कुछ पाठक कहते थे कि आप अपनी व्याख्या भी दीजिये क्योंकि उन्होंने कुछ जगह मेरी ऐसी व्याख्यायें देखीं थीं जो मैं एक दिन पहले ही टाईप कर रखता था। संत शिरोमणि कबीरदास के दोहे वैसे अपने आप ही कई गूढ रहस्यों को प्रकट कर देते हैं पर लोग यह भी चाहते हैं कि जो इनको प्रस्तुत कर रहा है वह भी अपनी बात कहे। इस ब्लाग को मैंने पहले अध्यात्मिक विषयों के रखा था पर बाद में ब्लागस्पाट पर अंतर्जाल पत्रिका पर यही विषय लिखने के कारण मैंने इसे अन्य विषयों के लिये सुरक्षित कर दिया। वर्डप्रेस का शब्दलेख पत्रिका इस समय अध्यात्म विषयों के लिये है और उसी पर ही लिख रहा हूं। इसके अलावा ब्लागस्पाट का शब्दलेख सारथी है जो अध्यात्मिक विषयों से संबंधित है। अब सोच रहा हूं कि इस ब्लाग को भी अध्यात्मिक विषयों के लिये रख दूं।

सभी ब्लाग एक जैसे दिखते हैं पर मेरे लिये सभी के परिणाम एक जैसे नहीं हैं। वर्डप्रेस में विविध श्रेणियां पाठ के लिए अधिक पाठक जुटातीं हैं इसलिये अब मैं ब्लागस्पाट के अच्छे पाठ यहां लाने वाला हूं। मुझे ब्लाग स्पाट और वर्डप्रेस के ब्लाग दो अलग अलग स्थान दिखते हैं। हिंदी के सभी ब्लाग एक जगह दिखाने वाले फोरमो पर उनको एक जैसा देखा जाता है पर मेरे लिये स्थिति वैसी नहीं है।
मैंने शुरूआती दिनों में कई लोगों को ब्लाग लिखने के बारे में अनेक भ्रांत धारणायें फैलाते देखा था जिसमें यह बताया गया था कि आप ढाई सौ अक्षर अवश्य लिखें वरना लोग आपके बारे में यह कहेंगे कि यह लिख नहीं रहा बल्कि मेहनत बचा रहा है। इसके प्रत्युत्तर में मैंने हमेशा ही लिखा है कि मुख्य विषय है आपका कथ्य न कि शब्दों की संख्या। हालांकि मैने हमेशा बड़े ही पाठ लिखे हैं पर दूसरों को इस बात के लिये प्रेरित किया है कि वह अपने मन के अनुसार लिखें पर प्रभावी विषय और शब्दों का चयन इस तरह करें कि गागर में सागर भर जाये। संत कबीरदास और रहीम के दोहों पर तो ऐसी कोई शर्त लागू हो भी नहीं सकती।

एक जो महत्वपूर्ण बात कि आज भी संत कबीर और रहीम इतने प्रासंगिक हैं कि उनका लिखा अपने आप पाठक जुटा लेता है-यह बात मुझे बहुत अचंभित कर देती है। हिंदी के भक्ति काल को स्वर्णिम काल कहा जाता है जिसे वर्तमान में अनेक कथित संत आज भी भुना रहे हैं और मैं अनजाने मेंे ही वह कर बैठा जिसके लिये में उन पर आरोप लगाता हूं कि वह ज्ञान का व्यापार कर रहे हैं। हां, इतना अंतर है कि वह लोग अपने भक्तों को कथित ज्ञान देकर दान-दक्षिणा वसूल करते हैं और मैं इंटरनेट के साढ़े छहः सौ रुपये व्यय करने के साथ ही अपना पसीना भी लिखने में बहाता हूं। इसमें कोई संशय नहीं है कि ऐसे प्रयासों से मेरी लोकप्रियता बनी होगी। लोग कह नहीं पाते पर जिस तरह पाठक अध्यात्मिक विषयों को पढ़ रहे हैं वह मुझे अचंम्भित कर देता है। सुबह लिखते समय मेरे मन में कोई भाव नहीं होता। न तो मुझे पाठ के हिट या फ्लाप होने की चिंता होती है और न कमेंट की परवाह। मैंने आध्यात्मिक विषय पर तो पहले ही दिन से लिखना आरंभ किया और हिंदी में दिखाये जाने वाले फोरमों पर तो मेरे ब्लाग बाद में दिखने के लिये आये अगर उन्मुक्त और सागरचंद नाहर मुझे प्रेरित नहीं करते तो ब्लाग लेखक मेरे मित्र नहीं बनते और आज की तारीख में जिस तरह मेरे ब्लाग कुछ वेबसाईट लिंक कर रहीं हैं उस पर झगड़ा और कर बैठता। नारद फोरम पर मैं उन दिनों भी प्रतिदिन जाता था पर मुझे अपना ब्लाग पंजीकृत कराना नहीं आ रहा था। मतलब यह है कि मैंने कई चीजें अपने ब्लाग मित्रों से सीखीं हैं और वह नहीं सीखता तो अल्पज्ञानी रहता और सब जानते हैं कि जिस विषय में कम जानता है वहां उसमें अहंकार आ जाता है। प्रसंगवश इस पोस्ट को इतने पाठक इसलिये भी मिले कि मैंने ब्लाग पर नवीनतम पाठों और पाठकों की पसंद के स्तंभ स्थापित किये और वहां यह पाठ लंबे समय से बना हुआ है और इतने सारे पाठक मिलने के पीछे यह भी एक वजह हो सकती है। इसका श्रेय श्री सागरचंद नाहर जी को जाता है जिनकी एक पाठ से मैंने यह बात सीखी थी। मैं अगर किसी से कुछ सीखता हूं तो उसका दस बार नाम लेता हूं क्योंकि ऐसा न करने वाला कृतघ्न होता है।

इस पाठ पर किसी ब्लाग लेखक की कमेंट नहीं है और किसी पाठक ने कल ही इस पर अपनी टिप्पणी लिखी। 18 जनवरी 2008 को यह पोस्ट उस समय लिखी गयी थी जब हिंदी ब्लाग जगत में मैं हास्य कविताओं की बरसात कर रहा था और उस समय लोगों ने शायद इस पर कम ही ध्यान दिया कि मैं प्रातः अध्यात्मिक विषयों पर लिखने के बाद चला जाता हूं और शाम को होता है वह समय जब मैं अन्य विषयों पर लिखता हूं। इसलिये लोग सुबह के लिखे इस पाठ पर ध्यान नहीं दे पाये और उनको इंतजार करते होंगे उस दिन शाम को मेरी हास्य कविताओं का जो आज किसी भी मतलब की नहीं है। एक बात मैंने अनुभव की है कि अब मैं पिछले कई दिनों से शाम को भी लिखते समय संयम बरतने का विचार करता हूं क्योकि अध्यात्मिक विषय पर लिखने से लोग थोड़ा सम्मान की दृष्टि से देखते हैं और मुझे यह सोचना चाहिये कि इस कारण कोई मेरी गुस्से में कही बात का प्रतिकार न करते हों। वैसे सच यह है कि मैंने अपने महापुरुषों का संदेश लिखते समय कुछ भी विचार नहीं किया और न मेरे को ऐसा लगता था कि इससे मेरे ब्लाग@पत्रिकाओं को लोकप्रियता मिलेगी। अन्य विषयों में हास्य कविता भी मेरे लिये कोई प्रिय विषय नहीं रही पर ताज्जुब है कि उससे भी अनेक पाठकों तक पहुंचने में सहायता की। सुबह लिखते समय मैं अपने को लेखक नहीं बल्कि एक टंकक की तरह देखता हूं पर कहते हैं कि आप आपके परिश्रम का कोई न कोई अच्छा परिणाम निकलता है।
कुल मिलाकर साफ संदेश यही है कि आम पाठकों के लिये रुचिकर लिखकर ही उन्हें अपने ब्लाग पर आने के लिये बाध्य किया जा सकता है। इसके लिये त्वरित हिट और टिप्पणियों का मोह तो त्यागना ही होता है किसी सम्मान आदि से वंचित होने की आशंका भी साथ लेकर चलनी पड़ती है और मुझे अधिक से अधिक आम पाठकों तक पहुंचना है इसलिये ऐसे विषयों पर लिखने का प्रयास करता हूं जो सार्वजनिक महत्व के हों। फोरमों पर अपने चार-पांच हिट देखकर अगर विचलित हो जाता तो शायद इतना नहीं लिख पाता। मेरी स्मृति में यह बात आज तक है कि उस दिन इस पाठ पर सभी तरफ से केवल 19 हिट थे जिसमें वर्डप्रेस के डेशबोडे से ही अधिक थे। विभिन्न फोरमों से संभवतः 8 हिट थे। वहां अधिक हिट न लेने वाला यह पाठ 1000 से अधिक पाठकों तक पहुंच गया क्या यह विश्लेषण करने का विषय नहीं है। कबीर साहित्य पर एक अन्य ब्लाग एक अन्य पाठ भी हजार की संख्या के पास पहुंच रहा है और यह जानकारी चर्चा का विषय हो सकती है।
आज मुझे भी लगता है कि मैंने कोई मेहनत नहीं की है पर उस समय इतनी पोस्ट लिखने में ही मुझे बहुत समय लग जाता था। इसलिये मैं अपने उन सभी ब्लाग लेखक मित्रों का आभारी हूं जिन्होंने हमेशा मुझे नये नयी जानकारियां और टूल देकर आगे बढ़ने के लिये प्रेरित किया है और इस पाठ की सफलता के लिये उनको श्रेय देने में मुझे कोई संकोच भी नहीं है। हां, मुझे अपने को श्रेय लेने में संकोच बना हुआ है।

अकेले होने के गम में इसलिये रोते रहे-कविता


भीड़ में हमेशा खोते रहे
अपने से न मिलने के गम में रोते रहे
नहीं ढूंढा अपने को अंदर
आदमी होकर भी रहा बंदर
लोगों के शोर को सुनकर ही बहलाया दिल
अपनी अक्ल की आंख बंद कर सोते रहे

जमाने भर का बेजान सामान
जुटाते हुए सभी पल गंवा दिये
दिल का चैन फिर नहीं मिला
जो आज आया था घर में
उसी से ही कल हो गया गिला
उठाये रहे अपने ऊपर भ्रम का बोझ
सच समझ कर उसे ढोते रहे
कब आराम मिले इस पर रोते रहे
झांका नहीं अपने अंदर
मिले नहीं अपने अंदर बैठे शख्स से
अकेले होने के गम में इसलिये रोते रहे
………………………….
दीपक भारतदीप

कभी कभी आंखों में आंसू आ जाते हैं-हिन्दी शायरी


अपने दर्द से भला कहां
हमारे आंखों में आसू आते हैं
दूसरों के दर्द से ही जलता है मन
उसी में सब सूख जाते हैं

अगर दर्द अपना हो तो
बदन का जर्रा जरौ
जंग में लड् जाता है
तब भला आंखों से आंसु बहाने का
ख्याल भी कब आता है
जो बहते भी हैं आंखों के कभी तो
वह दूसरों के दर्द का इलाज न कर पाने की
मजबूरी के कारण बह आते हैं

कोई नहीं आया इस पर
कभी रोना नहीं आता
कोई नापसंद शख्स भी आया
तो भी कोई बुरा ख्याल नहीं आता
कोइ वादा कर मुकर गया
इसकी कब की हमने परवाह
हम वादा पूरा नहीं कर पाये
कभी कभी इस पर आंखों से आंसू आ जाते हैं
…………………………….
दीपक भारतदीप

फिर भी तुम बरसते रहना-कविता


सूरज की गर्मी में झुलसते हुए
पानी में नहा गया था बदन
जलती हवाओं में
गर्म मोम की तरह पिघल रहा था मन
चारों तरफ फैला था क्रंदन
ऐसे में जो आये आकाश पर बादल
बिछ गयी पानी की चादर
जैसे स्वर्ग का अनुभव हुआ जमीन पर
लहराने लगा जलती धूप से त्रस्त लोगों का बदन

कहैं महाकवि दीपक बापू
तुम सभी जगह बरसते जाना
जल से जीवन बहाते जाना
किसी के भरोसे मत छोड़ना
इस धरती पर विचरने वाले जीवों को
बड़े बांध बनवाये या तालाब
पर किसी की प्यास बुझाये
यह विचार इंसान नहीं करता
ढूंढता है अपनी चाहत के लिये
सोने, चांदी और संगमरमर के पत्थर जैसे निर्जीवों को
अमीरों के आसरे तो बहुत हैं
एक ढूंढें हजार पानी पिलाने वाले जायेंगे
पर गरीब का आसरा हो तुम बादल
शायद इसलिये कहलाते हो पागल
फिर भी तुम बरसते रहना
नहीं तो हमें रहेगा पानी के लिये तरसते रहना
तुम हो आत्मा इस धरा के
जो है हम सबका बदन
………………..

दीपक भारतदीप

बिना पूछे रास्ता बताने लगे-कविता


लिखे उन्होंने चंद शब्द
और दूसरों को लिखना सिखाने लगे
मुश्किल है कि बिना समझे लिखा था
पर दूसरों में समझ के दीप जलाने लगे

खरीद ली चंद किताबें और रट लिये कुछ शब्द
अब दूसरों को पढ़ाने लगे
खुद कुछ नहीं समझा था अर्थ
दूसरों का जीवन का मार्ग बताने लगे

जो भटके हैं अपने रास्ते
अपने लक्ष्य का पता नहीं
पर चले जा रहे सीना तानकर
सूरज की रोशनी में मशाल वह जलाने लगे
ज्ञानी रहते हैं खामोश
इसलिये अल्पज्ञानी
शब्दों का मायाजाल बनाने लगे

कहें दीपक बापू
समझदार भटक जाता है
तो पूछते पूछते लक्ष्य तक
पहुंच ही जाता है
पर नासमझ भटके तो
पूछने की बजाय रास्ता बताने लग जाता है
अपनी समझदारी दिखाने के लिये
तमाम नाम लेता है रास्तों का
शायद कोई बिना पूछे रास्ता बताने लगे
नहीं भी बताया तो
अपने जैसा ही रास्ता वह भी भटकने लगे
………………………….

hasya kavita-प्यार कोई कारखाने में बनने वाली चीज नहीं है-कविता


मन में प्यास थी प्यार की
एक बूंद भी मिल जाती तो
अमृत पीने जैसा आनंद आता
पर लोग खुद ही तरसे हैं
तो हमें कौन पिलाता

स्वार्थों की वजह से सूख गयी है
लोगों के हृदय में बहने वाली
प्यार की नदी
जज्बातों से परे होती सोच में
मतलब की रेत बसे बीत गईं कई सदी
कहानियों और किस्सों में
प्यार की बहती है काल्पनिक नदी
कई गीत और शायरी कही जातीं
कई नाठकों का मंचन किया जाता
पर जमीन पर प्यार का अस्तित्व नजर नहीं आता

गागर भर कर कभी हमने नहीं चाहा प्यार
एक बूंद प्यार की ख्वाहिश लिये
चलते रहे जीवन पथ पर
पर कहीं मन भर नहीं पाता

जमीन से आकाश भी फतह
कर लिया इंसान
प्यार के लिये लिख दिये कही
कुछ पवित्र और कुछ अपवित्र किताबों
जिनका करते उनको पढ़ने वाले बखान
पर पढ़ने सुनने में सब है मग्न
पर सच्चे प्यार की मूर्ति सभी जगह भग्न
लेकर प्यार का नाम सब झूमते
सूखी आंखों से ढूंढते
पर उनकी प्यास का अंत नजर नहीं आता
प्यार कोई जमीन पर उगने वाली फसल नहीं
कारखाने में बन जाये वह चीज भी नहीं
मन में ख्यालों से बनते हैं प्यार के जज्बात
बना सके तो एक बूंद क्या सागर बन जाता
पर किसी को खुश कोई नहीं कर सकता
इसलिये हर कोई प्यार की एक बूंद के
हर कोई तरसता नजर नहीं आता
………………………………..

तीन क्षणिकाऐं



किसी को खुश देखकर ही
जब मजा आता हो तब
कही तारीफें झूठ में भी
लोग कर जाते हैं
सच से फरेब करने में नहीं सकुचाते हैं
…………………….

सांप से नेवले से पूछा
‘क्या तुम मुझसे दोस्ती करोगे?’
नेवले ने कहा
‘हां, क्यों नहीं
हम दोनों ही जंगली हैं
जंग का मैदान बन चुके
शहर में अपने लिए
कोई जगह बची नहीं
कुछ जगह मालिक अड़े
तो कहीं मजदूर खड़े
दोनों में दोस्ती कभी संभव नहीं
पर हम दोनों में कोई
शोषक या शोषित नहीं
इसलिये खूब जमेगी जब
मिलकर बैठेंगे दो यार
करेंगे एक दूसरे के लिए शिकार
फिर तुमसे क्यों घबड़ाऊंगा
तुम मुझसे क्यों डरोगे‘
………………….

संवेदनहीन हो चुके समाज में
अपनी जिंदगी किसी
दूसरे की दया पर मत छोड़ना
अवसर पाते ही सांप छोड़ दे
पर इंसान नहीं चाहते डसना छोड़ना
……………………..

उसे भी समाज कहते हैं-कविता


आदमी से ही डरा आदमी
अपने लिये एक झुंड बना लेता है
जिसे समाज कहते हैं
अकेले होने की सोच से घबड़ाया आदमी
उस झुंड के कायदे कानून
अक्ल के दरवाजे बंद कर
मानता इस उम्मीद में
कभी संकट में उसके काम आयेगा
पर संकट में जो हंसता है आदमी पर
उसे भी समाज कहते हैं
…………………………………………..

समाज के शिखर पर बैठे लोग
हांकते हैं ऐसे आदमी को
जैसे भेड़-बकरी हों
जो न बोले
न कहे
न देखे
उनके काले कारनामें दिन के उजाले में भी
अपने डंडे के जोर पर चलता उनका फरमान
टूट जाये चाहे किसी का भी अरमान
उन पर कोई नहीं उठाता उंगली
फिर भी समाज की गलियों में
गोल-गोल घूमता है
चाहे वह कितनी भी संकरी हों
………………………….

दीपक भारतदीप

अपने ददे को बाहर आने दो-कविता


कुछ नहीं कह सकते तो कविता ही कह दो
कुछ नहीं लिख सकते तो कविता ही लिख दो
कुछ पढ़ नहीं सकते तो कविता ही पढ़ लो
कुछ और करने से अच्छा अपने कवित्व का जगा लो
पूजे जाते हैं यहां बैमौसम राग अलापने वाले भी
क्योंकि सुनने वालों को शऊर नहीं होता
कुछ कहना है पर कह नहीं पाते
अपनी अभिव्यक्ति को बाहर लाने में
सकपकाते लोग
अपने दर्द को हटाने शोर की महफिल में चले जाते
जो सुन लिया
उसे समझने का अहसास दिलाने के लिये ही
तालियां जोर-जोर से बजाते
बाहर से हंसते पर
अंदर से रोते दिल ही वापस लाते
तुम ऐसे रास्तों पर जाने से बचना
जहां बेदिल लोग चलते हों
समझ से परे चीजों पर भी
दिखाने के लिए मचलते हों
खड़े होकर भीड़ में देखो
कैसे गूंगे चिल्ला रहे हैं
दृष्टिहीन देखे जा रहे हैं
बहरे गीत सुनते जा रहे है
साबुत आदमी दिखता जरूर है
पर अपने अंगों से काम नहीं ले पाता
सभी लाचारी में वाह-वाह किये जा रहे हैं
सत्य से परे होते लोगों पर
लिखने के लिए बहुत कुछ है
कुछ न लिखो तो कविता ही लिख दो
कोई सुने नहीं
पढ़े नहीं
दाद दे नहीं
इससे बेपरवाह होकर
अपने ददे को बाहर आने दो
और एक कविता लिख दो
……………………………………………….

समीर लाल जी, आपकी कविताएं पढ़ी। अच्छा लगा। मेरे मन में भी कुछ शब्द आये जो कह डाले।
दीपक भारतदीप

बस नजर आता है अपना साया-कविता


धूप में पसीने से नहाते हुए
जब देखता हूं अपना साया
दिल भर आता है
वह जमीन पर गिरा होता है
मैं ढोकर चल रहा हूं आग में अपनी काया
कहीं राह में फूल की खुशबू आती है
मैं देखता हूं सड़क किनारे
कहीं फूलो का पेड़ है
जो बिखेर रहा है सुगंध की माया

रात में चांद की रोशनी में भी मेरे साथ
चलता आ रहा है मेरा साया
मैं उसे देख रहा हूं वह अब भी
जमीन पर गिरा हुआ है
शीतल पवन छू रही मेरे बदन को
पर उठ कर खड़ा नहीं होता मेरा साया
उसे कभी कभी ही देख पाता हूं
अपने ख्यालों में ही गुम हो जाता हूं
खामोश रहता है मेरा साया

कई लोग मिले इस राह पर
बिछड़ गये अपनी मंजिल आते ही
दिल में बसा रहा उनका साया
चंद मुलाकातों में रिश्ता गहरा होता लगा
पर जो बिछड़े तो फिर
उनका चेहरा कभी नजर नहीं आया
तन्हाई में जब खड़ा होकर
इधर-उधर देखता हूं
बस नजर आता है अपना साया
………………………
दीपक भारतदीप

कभी खिलता हूं, कभी मुरझा जाता हूं-कविता


अपने घर पर रखे गमलों में
पौधों को लगाते हुए देखकर माली को
बहुत खुश होता हूं
उनमें कुछ मुरझा जाते हैं
कुछ खिलकर फूलों के झुंड बन जाते है
फिर वह भी मुरझा जाते हैं
अपना जीवन जीते हैं
फिर साथ छोड़ जाते हैं
फिर लगवाता हूं नये पौधे
इस तरह वह मेरे जीवन को
कभी महकाते हैं
तो कभी मुरझाकर दर्द दे जाते हैं
घर के बाहर खड़ा पेड़
जिसे पशुओं से बचाने के लिये
लगा गया था एक मजदूर बबूल के कांटे चारो ओर
खड़ा है दस बरस से
कई बार वही मजदूर काटकर
उसकी बड़ी डालियां ले जाता है
मैं उससे पेड़ को जीवन बनाये
रखने का आग्रह करता हूं
तो वह मुस्कराता है
कुछ दिन पेड़ उतना ही बड़ा हो जाता है
इस तरह प्रकृति का यह खेल देखकर
कई बार मैं मंद मंद मुस्कराता हूं
कभी खिलता हूं कभी मुरझा जाता हूं
…………………………………..

दीपक भारतदीप

भ्रम का सिंहासन-व्यंग्य कविता


एक सपना लेकर
सभी लोग आते हैं सामने
दूर कहीं दिखाते हैं सोने-चांदी से बना सिंहासन

कहते हैं
‘तुम उस पर बैठ सकते हो
और कर सकते हो दुनियां पर शासन

उठाकर देखता हूं दृष्टि
दिखती है सुनसार सारी सृष्टि
न कहीं सिंहासन दिखता है
न शासन होने के आसार
कहने वाले का कहना ही है व्यापार
वह दिखाते हैं एक सपना
‘तुम हमारी बात मान लो
हमार उद्देश्य पूरा करने का ठान लो
देखो वह जगह जहां हम तुम्हें बिठायेंगे
वह बना है सोने चांदी का सिंहासन’

उनको देता हूं अपने पसीने का दान
उनके दिखाये भ्रमों का नहीं
रहने देता अपने मन में निशान
मतलब निकल जाने के बाद
वह मुझसे नजरें फेरें
मैं पहले ही पीठ दिखा देता हूं
मुझे पता है
अब नहीं दिखाई देगा भ्रम का सिंहासन
जिस पर बैठा हूं वही रहेगा मेरा आसन

सभी की सोच मतलब के घर में बंद है-हिंदी शायरी



कोई लिखकर कहे या
अपनी जुबां से बोले
कोई ऐसे शब्द कान में अमृत घोले
मन में छा जाये प्रसन्नता की सरिता
इसी चाहत में उम्र गुजार दी

पर प्यासे रहे हमेशा
कोई नहीं बोल पाया
नहीं लिख पाया कुछ मीठे शब्द
हमने बोले कुछ प्यार के
तो लिखे भी बहुत
पर जमाना ही है लाचार और बेबस
जूझता है अपने दर्द और गमों से
कोई नहीं समझता
प्यार के शब्दों की असलियत
सभी ढूंढते हैं खुशी उधार की
………………………..
मैं कहां तलाश करूं प्यार से
सराबोर शब्दों की
सभी दरवाजे बंद हैं

अपने दिल के दर्द से टूटे लोग
ढूंढ रहे हैं खुशियां
रौशनी के पीछे अंधेरे में
अपने शब्दों से जला सकें
किसी के दिल में उम्मीद का चिराग
कोई ख्याल में भी नहीं लाता
सभी की सोच
अपने मतलब के घर में बंद है
………………………..

जैसी अभिव्यक्ति वैसी ही अनुभूति-हिन्दी शायरी


राह पर चलते हुए जो
मैंने देखी जोर से चिल्लाते लोगों की भीड़
वहां एक खड़े एक आदमी से पूछा
‘यहां क्या हो रहा है’
उसने कहा-‘झगड़ा हो रहा है’

मैं कुछ दूर चला तो जोर जोर से
लोगों को स्तुतिगान गाते सुना
मैंने एक आदमी से पूछा
‘यह इतना शोर क्यों हो रहा है’
उसने गुस्से से कहा

पाठक रूपी सारथि ही बनाता है लेखक महारथी-आलेख


सभी पाठक लेखक हों यह आवश्यक नहीं है पर सभी लेखकों को पाठक अवश्य होना चाहिए। एक लेखक को कभी किसी अन्य की रचना एक लेखक के रूप में नही बल्कि एक पाठके के रूप में पढ़ना चाहिए। एक लेखक में बैठा उसका पाठक ही उसकी रचना रूपी रथ का सारथि हो सकता है। कभी कभी किसी का पाठक ऐसा अमरत्व भी प्राप्त कर लेता है जब वह किसी अन्य लेखक का की रचना को पढ़ने के बाद फिर उसे अपने रचनाकर्म के लिये किसी अन्य की पढ़ने की आवश्यकता ही नहीं पढ़ती। हमारे धर्मग्रंथ कुछ इसी प्रकार की अमर सामग्री से परिपूर्ण हैं जिनको पढ़ने वाले फिर कोई अन्य पुस्तक या रचना न भी पढ़ें तो भी अच्छे लेखक हो सकते हैं।

पाठक की दृष्टि से पढ़ते हुए हर व्यक्ति विषय सामग्री को पढ़ता है और उसके अंतर्मन में उतार चढ़ाव आते हैं और उनके साथ एक धारणा उसके मस्तिष्क में स्थापित होती है। जो लेखक होते हैं उन धारणाओं के आधार पर अपनी रचनाआंें का सृजन हुए अपनी एक अलग पहचान बनाते हैं। कुछ तो लेखक महानता की श्रेणी में आ जाते हैं। जिस तरह सारथि समरांगण में अपने रथ पर बैठे महाराथी के लिए वहां स्थितियों को देखते हुए रथ का संचालन करता है। समरांगण में सारथि वहां की स्थितियों का अवलोकर संचालन करते हैं कि ‘कहां उसकी युद्ध में किस स्थान पर आवश्यकता है जहां वह अपने महाराथी को ले जाये’, ‘कहां उसके महाराथी के लिए प्रतिकूल स्थितियां है और वहां से वह उसे हटा ले और ‘ कहीं उसका महारथी कहीं युद्ध लडते लड़ते घायल तो नहीं हो गया ताकि उसे वहां से दूर ले जाये।’ ऐसे अनेक निर्णय होते हैं जब सारथि अपने महारथी की रक्षा करने के उद्देश्य से अपने विवेक के अनुसार लेते हैं। महारथी का कार्य केवल युद्ध में अपना ध्यान रणनीतिक कौशल के साथ अपने अस्त्रों शस्त्रों का उपयोग करते हुए युद्ध जीतना होता है। यही स्थिति लेखक के अर्तमन में पाठक की है।

एक लेखक को किसी अन्य लेखक की रचना पढ़ते हुए अपने पाठक को एक सारथि की तरह विचरण करने देना चाहिए। एक पाठक के रूप में ही रचना का प्रभाव को ग्रहण किया जा सकता हैं। अगर किसी अन्य लेखक की कहानी पढ़ें तो उसके पात्रों के साथ जुड़ जायें और किसी की कविता पढ़े तो उसके भावों को सहजता से अंदर जाने दें। कोई आलेख या निबंध पढ़े तो उसकी विषय वस्तु को आत्मसात करना उसके लिए बेहद आवश्यक है।

एक महारथी को आक्रामक होना पड़ता है तभी वह युद्ध जीत सकता है। वैसे ही लेखक को अपनी रचना लिखते समय अपने अंदर आत्मविश्वास स्थापित करना चाहिए कि वह अच्छा लिख रहा है। यह तभी संभव है जब उसके अंदर अपने विचार और विषय सामग्री में प्रति दृढ़ता और प्रतिबद्धता होने के साथ अपना मौलिक भाव होगा। यह तभी संभव है जब उसने उस विषय का गहन अध्ययन किया हो जो कि दूसरे लेखकों की रचनाओं से प्राप्त होता है। यह तभी संभव होता है जब उन रचनाओं को एक पाठक की तरह पढ़ा होगा।

अक

मौसम पर कविता नहीं लिखेंगे-हास्य कविता


आया फंदेबाज और बोला
‘दीपक बापू, गर्मी में हो रही बरसात
जहां रुलाता पसीना, वहां करती बहार अपनी बात
लिखो कोई जोरदार कविता
बहने लगे श्रृंगार रस की सरिता
शायद तुम्हारे नाम से फ्लाप का लेबल हट जाये
हिट होकर तुम्हारा नाम आकाश पर चमक जाये
कोई कुछ भी कहे तुम करो
अपनी पत्रिका पर मौसम पर कविता की बरसात’

जाने को तैयार खड़े थे
बांध रहे थे धोती
सिर पर रख रहे टोपी
सुनकर पहले देखा फंदेबाज को घूरकर
फिर कहैं दीपक बापू
‘दो दिन पहले गर्मी पर
लिखने को कह रहे थे हास्य कविता
अब प्रवाहित करवाना चाहते हो
श्रृंगार रस की सरिता
बहुत लिख चुके तुम्हारे विषयों पर
नहीं बनी हमारी पत्रिका के हिट होने की बात
मौसम का कोई भरोसा नहीं
सर्दी के मौसम में सुबह लिख रहे थे
कंपाकंपाते हुए उस पर गर्म कविता
दोपहर तक निकलने लगा गर्मी में पसीना
गर्मी में लिखने बैठते हैं शाम को
रात तक पानी बरसता है बनकर नगीना
हवा बंद पर लिखने बैठते हैं तो
आंधी चली आती है
मौसम का कोई भरोसा नहीं
यह अंतर्जाल है मेरे मित्र
सारी दुनियां में एक जैसा मौसम नहीं रहता
कहीं कोई बहार में नहाता
तो कोई धूप में गर्मी में सहता
अब पहले जैसा माहौल नहीं है
जो लिखेंगे यहीं पढ़ा जायेगा
अब तो लिखो अपने शहर में
वह विदेश में भी दिखने में आयेगा
इसलिये समझ में नहीं आती
मौसम पर लिखकर हिट होने की बात
यहां हमेशा ही होने लगी है
बेमौसम गर्मी, सर्दी, और बरसात
हमें नहीं जमी तुम्हारी मौसम पर
हास्य कविता लिखने की बात
…………………………….

अपनी असली पहचान खोते जाते-कविता


प्रसिद्ध होने के लिए
चले जाते है उस राह पर
जहां बुरे नाम वाले हो जाते हैं
अगर नाम चमका आकाश में तो
जमीन पर गिरकर चकनाचूर
होने के खतरे भी बढ़ जाते हैं

पत्थरों पर नाम लिखवाने से
लोगों के हृदय में जगह नहीं मिल जाती
हंसी की करतूतों पर लोगों के ताली बजाने से
कुछ पल अच्छा लगता है
पर कोई इज्जत नहीं बढ़ जाती
कुछ पलों की प्रशंसा से
क्यों फूल कर कुप्पा हो जाते हैं
आकाश में उड़ने की ख्वाहिश रखने वालों
पहले जमीन पर चलना सीख लो
जहां खड़े रहने से ही
तुम्हारे पांव लड़खड़ने लग जाते हैं
दूसरे की आंखों में पहचान ढूंढने की
निरर्थक कोशिश में
अपनी असली पहचान खोते चले जाते हैं
………………………..

दिल बहलाने के लिए देख लो सुंदर तस्वीरें कहीं-कविता


हंसते चेहरे देखकर हंसता हूं
दिल बहलाने के लिये दूसरों की
हंसी भी सहारा बन जाती है
किसी के दर्द पर हंसने वाले बहुत हैं
दूसरों को हंसा दें ऐसी सूरतें
कभी कभी नजर आती हैं
नहीं मिलता तो देख लेता हूं
हंसते हुए लोगों तस्वीरें
दर्द से परे जो ले जातीं हैं
………………………………………………

आंखों से देखने का उम्र से
कभी कोई वास्ता नहीं
अगर बहलता हो मन तस्वीरों से
तो कोई हर्ज नहीं
अपनी उम्र देखकर शर्माने से
भला समय कट पाता है
राह चलते किसी का सौंदर्य देखने पर
अगर घबड़ाते हो तो
देख लो सुंदर तस्वीरें कहीं
…………………………………..

सदियों से धोखा देता आया चांद-कविता


 

आज महक जी  के ब्लाग पर एक फोटो और अच्छी गजल देखी। ऐसे में मेरा कवित्व मन जाग उठा। कुछ पंक्तियां मेरे हृदय में इस तरह आईं-

समंदर किनारे खड़े होकर
चंद्रमा को देखते हुए मत बहक जाना
अपने हृदय का समंदर भी कम गहरा नहीं
उसमें ही डूब कर आनंद उठाओ
वहां  से फिर भी निकल सकते हो
अपनी सोच के दायरे से निकलकर
आगे  चलते-चलते कहीं समंदर में डूब न जाना
अभी कई गीतों और गजलों के फूल
इस इस जहां* में  तुम्हें है महकाना

वहां मैंने “अंतर्जाल” लिखा था पर जहां लिख दिया

कभी कभी अंतर्जाल पर ऐसे पाठ आ जाते हैं जिन पर लिखने का मन करता है। तब वहां लिखने के विचार से जब अपना विंडो खोलता हूं और सहजता पूर्वक जो विचार आते हैं लिखता हूं। मैं हमेशा यही सोचता हूं कि अंतर्जाल पर अब मनोरंजक और ज्ञानवद्र्धक मिल जाता है तब उसके लिये कहीं और हाथ पांव क्यों मारे जायें?

इसी कविता पर एक फिर कुछ और विचार आये

समंदर के किनारे
चमकता चांद पुकारे
ऊपर निहारते हुए
एक कदम उठाए खड़े हो
जैसे तुम उसे पकड़ लोगे
पर अपना दूसरा कदम
तुम आगे मत बढ़ाना
सदियों से धोखा देता आया है चांद
किसी के हाथ नहीं आया
इसने कई प्रेमियों को ललचाया
शायरों को रिझाया
पर कोई उसे छू नहीं पाया
उसकी चमक एक भ्रम है
जो पाता है वह सूर्य से
यह हमारी बात पहले सुनते जाना

महक जी अपने ब्लाग पर कई बार ऐसा पाठ प्रकाशित करतीं है कि मन प्रसन्न हो जाता है। हां, मुझे याद आया एक बार उन्होंने अपने पाठ चोरी होने की शिकायत की थी और मुझे तब बहुत गुस्सा आया और उनके बताये पते जब गया था तो वहां उन्होंने अपनी प्यार भरी टिप्पणी रखी थी जिसमें कहीं गुस्सा नहीं बल्कि स्नेहपूर्ण उलाहना थी। तब लगा कि वह बहुत भावुक होकर लिखतीं हैं। यही कारण है कि उनके लिखे से जहां आनंद प्राप्त होता है वही लिखने की भी प्रेरणा मिलती है।
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शब्द अपनी दुनियां स्वयं बसाते है-आलेख और कविता


मैने कई ब्लाग पर हाइकु के रूप में कविताएं पढ़ीं, पर मेरे समझ में नही आता था कि वह होता क्या है। आज मीनाक्षी जी  के ब्लाग पर पढ़ा कि उसे त्रिपदम कहा जाता है। हिंदी में इस विधा के बारे में कहीं लिख गया है तो मुझे पता नहीं पर मुझे लगा कि यह एक मुक्त कविता की तरह ही है। शायद इस विधा को अंग्रेजी से लिया गया होगा और मैं इस आधार पर कोई विरोध करने वाला नहीं हूं। मुख्य बात है कि हम अपनी बात कहना चाहते है और उसके लिये हम गद्य या पद्य किसी में भी लिख सकते हैं।

त्रिपदम(हाइकु) पढ़कर मेरे मन में विचार आया कि आज अपने कुछ विचारों को इस विधा में  लिख कर देखें। कभी-कभी मुझे लगता है कि लोग अपने मन की हलचल को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाते या कभी वह कुछ कहना चाहते है पर कुछ और कह जाते है। हमारा मन बहुत गहरा होता है और हम उसमें डुबकी तो सभी लगा लेते हैं पर वहां से कितने मोती उठा पाते हैं यह एक विचार का विषय है। हम कई बार कहते हैं कि अमुक व्यक्ति बहुत गहराई से लिखता या विचार करता है। इसका यह आशय  यह कदापि नहीं हैं कि कि हम ऐसा नहीं कर सकते हैं। दरअसल जो लोग लिखने या विचार करने मेंे गहराई का संकेत देते हैं वह अपने अंदर से बाहर आ रहे विचार और शब्दों को रोकने का प्रयास नहीं करते। दृष्टा की तरह उनको बाहर लोगों के पास जाते देखते हैं। हां, यह मुझे लगता है। कई बार मेरे साथ ऐसा होता है। जब शब्द और और विचारों के बाह्य प्रवाह के बीच मैं स्वयं खड़ा होने का प्रयास करता हूं तो लगता है कि वह अवरुद्ध हो गया।

मुझे पता नहीं कि मैं अच्छा लिखता हूं कि बुरा? पर कुछ मित्र मेरी कुछ रचनाओं पर फिदा हो जाते हैं और कुछ पर कह देते हैं कि यह क्या लिखा है हमारे समझ में नहीं आया।’ तब मुझे इस बात की अनुभुति होती है कि मैंने खराब कही जा रही रचनाओं के समय अपने विचारों और शब्दों के प्रवाह में अपनी टांग अड़ाई थी। आज जब मेरे मन में हाइकू (त्रिपदम) लिखने का विचार आया तो मैं अपने अ्र्रंर्तमन पर दृष्टिपात कर रहा हूं कि क्या वहां कोई विचार या शब्द हैं जो बाहर आना चाहते है।

मन में उठती कुछ उमंगें
विचारों की बहती तरंगें
आशाओं की उड़ती पतंगें

मौसम के खुशनुमा होने का अहसास
किसी का हमदर्द बनने का विश्वास
प्यार में वफादारी की आस

अनुभूतियों से भरा तन
अभिव्यक्त होना चाहता मन
शब्द चहक रहे खिलाने को चमन

जब तलाशता हूं उनका रास्ता
संदर्भों से जोड़ता हूं उनका वास्ता
सोचता हूं परोसूं जैसे नाश्ता

तब असहज हो जाता हूं
अपने को भटका पाता हूं
नयी तलाश में पुराना भूल जाता हूं

जब हट जाता हूं उनके पास से
रचना होने की आस से
अपने अस्तित्व के आभास से

तब वह कोई कविता बन जाते हैं
या कोई कहानी सजाते हैं
शब्द अपनी दुनिया स्वयं बसाते है

यह मेरा त्रिपदम(हाइकु) लिखने का एक प्रयास है। मुझे इसे लिखना बहुत अच्छा लगा। यह अलग बात है कि पढ़ने वाले इस पर क्या सोचते है। मेरा प्रयास अपने को अभिव्यक्त करना होता है और प्रयास यही करता हूं कि अपने आपसे दिखावा नहीं करूं। हमेशा ऐसा नहीं कर पाता यह अलग बात है।

कभी किसी का कड़वा सच उसके सामने नहीं कहना चाहिए-आलेख


सच बहुत कड़वा होता है और अगर आप किसी के बारे में कोई विचार अपने मस्तिष्क में  हैं और आपको लगता है कि उसमें कड़वाहट का अश है तो वह उसके समक्ष कभी व्यक्त मत करिये। ऐसा कर आप न  केवल उसे बल्कि उसके चाहने वालों को भी अपना विरोधी बना लेते हैं। हां, मैं इसी नीति पर चलता रहा हूं। केवल एक बार मैंने ऐसी गलती की और उसका आज तक मुझे पछतावा होता है।

कई वर्ष पहले की बात है तब मेरा विवाह हुए अधिक समय नहीं हुआ था। ससुराल पक्ष का एक युवक मेरे घर आया। उसके बारे में तमाम तरह के किस्से मैंने सुने थे। वह अपने परिवार के लिये ही आये दिन संकट खड़े करता था। वह सट्टा आदि में अपने पैसे बर्बाद करता था। उसने अपनी युवावस्था में कदम रखते ही ऐसे काम शुरू किये जो उसके माता पिता  के लिए संकट का कारण बनते थे। एक बार उसने सभी लोगों के बिजली और पानी के बिल भरने का जिम्मा लिया। वह सबसे पैसे ले गया और फिर नकली सील लगाकर उसने सबको बिल थमा दिये और उनका पूरा पैसा उसने ऐसे जुआ और सट्टे के  कामों में बर्बाद कर दिया। उसके जेल जाने की नौबत आ सकती थी पर उसके पिताजी ने सबको पैसा देकर उसे बचा लिया। उसके पिताजी के कुछ लोगों पर उधार हुआ करते और वह उनको वसूल कर लाता और घर पर कुछ नहीं बताता। ऐसे बहुत सारे किस्से मुझे पता थे पर उसका मेरे और मेरी पत्नी के प्रति ठीक था।

घर पर खाने के दौरान मैंने पता नहीं किस संदर्भ में कहा था-‘पिताजी के पैसो पर सब मजे करते हैं। जब अपना पैसा होता है तब पता चलता है कि कैसे कमाया और व्यय किया जाता है। मैंने  भी पिताजी के पैसे पर खूब मजे किये  और अब पता लग रहा है। अभी तुम कर रहे हो और तुम्हें भी अपना कमाने और विवाह करने के बाद पता लग जायेगां’।

मेरी पत्नी ने भी यह बात सुनी थी और यह एक   सामान्य बात  थी। इसमेें कोई नयी चीज नहीं थी। जब वह अपने घर गया तब उसकी प्रतिक्रिया ने मुझे और मेरी पत्नी को हैरान कर दिया। उसकी मां ने मेरी पत्नी की मां से कहा-‘‘मेरा लड़का अपने पिताजी के पैसे पर मजे कर रहा है कोई उसे दे थोड़े ही जाता है।’

लड़के के बाप की भी ऐसी टिप्पणी हम तक पहुंची। हमें बहुत अफसोस हुआ। वह अफसोस  आज तक है क्योंकि हमारे उनसे अब भी रिश्ते हैं उस लड़के के माता पिता दोनों ही उसी की चिंता मेंं स्वर्ग सिधार गये। लड़का आज भी वैसा ही है जैसे पहले था। चालीस की उम्र पार कर चुकने के बाद उसका विवाह हुआ और पत्नी ने विवाह के छह माह बाद ही उसको छोड़ दिया। कहते हैं कि उसके हाथ में जो रकम आती है वह सट्टे में लगा आता है। उसके जेब में कभी दस रुपये भी नहीं होते। हां, उसके बाप ने जो पैसा छोड़ा उस पर बहुत दिनों तक उसका काम चला। उसका बड़ा भाई जैसे तैसे कर अभी तक उसे बचाये हुए है।
मेरा उसका कई बार आमना सामना होता है पर मैं बहुत सतर्क रहता हूं कि कोई ऐसी बात न निकल जाये जो उसे गलत लगे।

उसके माता पिता की याद आती है तब लगता है कि लोग दूसरों की कड़वी सच्चाई देखकर उसे बोलना चाहते हैं पर अपनी सच्चाई से मूंह फेर लेते हैं। मेरी बात उसने घर पर इस तरह बताई ताकि उसे वहां पर लोगों की सहानुभूति मिल सके। वह उसमें सफल रहा पर अब वह इस हालत में है कि कोई उसका अपने घर आना भी पसंद नहीं करता। उसकी गलत आदतें अब भी बनीं हुईं हैं। कहने वाले तो यह भी  कहते हैं कि वह जब वह अपना वेतन ले आता है तो उसे एक दिन में ही उड़ा देता है।

पिताजी के पैसे पर मजे करने के मुझे ं भी ऐसे ताने मिलते थे पर  विचलित नहीं होता था पर चूंकि किसी गलत काम में अपव्यय नहीं करता था इसलिये कोई गुस्सा नहीं आता था। फिर वह विचलित क्यों हुआ? मेरा विचार है कि वह अपने पिता के पैसे जिस तरह पापकर्म पर खर्च कर रहा था वही उस समय उसके हृदय में घाव करने  लगे, जब मैने यह बात उसके सामने कही थी।
लोग अपने बच्चों को किस तरह बिगाड़ देते हैं यह उसे देखकर समझा जा सकता है। घर में  अपने बच्चों द्वारा पैसे के गबन के मामले  को अक्सर लोग ढंक लेते हैं-जो कि स्वाभाविक भी है-पर बाहर अगर कोई ऐसा करता है तो उसे छिपाना कठिन होता है। अगर अन्य लोगों की बात पर यकीन करें तो उनका कहना है कि ‘आपने जब उससे कहा था तब अगर उसके माता पिता उसे समर्थन नहीं देते तो वह शायद सुधर जाता। क्योंकि आपकी बात सुनने के बाद चार पांच दिन तक वह गलत आदतों से दूर रहा पर जब माता पिता से समर्थन मिला तो वह फिर उसी कुमार्ग पर चला पड़ा।’

हमारे अंतर्मन में अपनी छवि एक स्वच्छ व्यक्ति की होती है पर बाहर हमें लोग इसी दृष्टि से देख रहे हैं यह सोचना मूर्खतापूर्ण है। हर आदमी में गुण दोष होते हैं और दूसरे को दिखाई देते हैं। कोई आदमी  सामने ही हमारा दोष प्रकट करता है तो हम उतेजित होते हैं जबकि उस समय हमें आत्ममंथन करना चाहिए। खासतौर से बच्चों के मामले में लोग संवेदनशील होते हैं। अगर कोई कहता है कि आपका लड़का या लड़की कुमार्ग पर जा रहे हैं तो उतेजित हो जाते हैं और अपने अपने लड़के और लड़की के झूठे स्पष्टीकरण पर संतुष्ट होकर कहने वाले की निंदा करते हैं। एक बार उन्हें अपने बच्चे की गतिविधि पर निरीक्षण करना चाहिए। जिस व्यक्ति ने कहा है उसका आपके बच्चे से कोई लाभ नहीं है पर आपका पूरा जीवन उससे जुड़ा है। हां, संभव है कुछ लोग आपके बच्चे की निंदा कर आपको मानसिक रूप से आहत करना चाहते हों और उसमें झूठ भी हो सकता है पर इसके बावजूद आपको सतर्क होना चाहिए। 

तंबाकू, एकता और योगसाधना-आलेख


 

पिछले वर्ष जुलाई में वृंदावन से हम दोनों पति-पत्नी अपने शहर  के लिये चले। हमने मथुरा के मार्ग पर पड़ने वाले मंदिरों को देखने का फैसला किया। हम जब बिड़ला मंदिर पहुंचे तो उस समय उमस बहुत थी। हम दोनों अंदर गये और कुछ देर ध्यान लगाने के बाद बाहर निकले। मैंने वहां पानी पिया और फिर अपनी जेब से तंबाकू की डिब्बी निकाली और हाथ में घिसकर उसे मूंह में रख लिया। वहां भीषण उमस से भरी दोपहर में हमने अब अन्य मंदिर देखने की बजाय मथुरा रेल्वे स्टेशन का रुख किया।

पता चला कि गाड़ी आने में आधा घंटा देर है तब हमने वहां अपने साथ लाये खाने के सामान से कुछ नमकीन निकाला और खा लिया। फिर पानी लेकर पिया और हाथ पौंछने के लिए रुमाल निकाला तो तंबाकू की डिब्बी भी मेरे हाथ में आ गयी। मैं उसे रखना चाहता था कि एक तिलक धारी सज्जन आये और बोले-‘जरा तंबाकू की डिब्बी दीजिए। मैंने आपके पास बिड़ला मंदिर में देखी थी पर उस समय खाने का विचार नहीं था। मैं अपनी डिब्बी घर भूल कर आया और यहां कोई दुकान नहीं मिली।’

मैंने उसके हाथ में डिब्बी दी। उसने कहा-‘चूना तो सूखा हुआ हैं। मैं पानी डाल दूं।’

मेरी स्वीकृति के बाद वह पास ही नल पर गया और उसमंे पानी डालकर तंबाकू बनाने लगा। उसी समय वहां से एक कुली गुजर रहा था और बोला-‘साहब, थोड़ी मेरे लिये भी बना लीजिए।’
उन सज्जन ने हंसते हुए कुछ तंबाकू और चूना और निकाला और घिसना शूरू किया। तंबाकू बनते ही जैसे उसने उस कुली को देने के लिए हाथ बढ़ाया तो कोई अन्य एक सज्जन जो खाकी कपड़े पहने हुए थे आये और बिना कुछ कहे ही उनके हाथ से थोड़ी तंबाकू लेकर चलते बने।
सबने अपना अपना हिस्सा ले लिया और डिब्बी मेरी जेब में पहुंच गयी। तंबाकू खाने वालों के लिए ऐसी घटनाएं कोई मायने नहीं रखतीं। यह घटना भी ऐसी ही थी अगर मेरी पत्नी इस सब पर गौर नहीं कर रही होती। इतने में हमारी गाड़ी आ गयी। हमारे से पहले चूंकि तीन गाडि़यां जा चुकीं थीं इसलिये हमें सामान्य डिब्बे में  बैठने के लिये जगह मिल गयी।
आगरा तक हम आराम से आये और वहां भी गाड़ी से लोग उतरने लगे। खिड़की से एक युवती ने हमसे पूछा-‘यहां क्या कोई बैठा है। अगर नहीं! तो प्लीज हमारे लिए जगह घेर लीजिए।’
मेरी पत्नी ने कहा-‘‘घेरने की कोई जरूरत नहीं है आप इन सबको निकल जाने दीजिए और आराम से अंदर आयें। यह जगह खाली पड़ी रहेगी। अभी इस समय कोई इसमें अंदर आता नहीं दिख रहा।’

वह युवती अंदर आयी तो उसके साथ उसकी माता पिता और भाई भी थे। चारों को आराम से जगह मिल गयी। वह मुस्लिम परिवार था। हम दोनो खिड़की के आमने सामने बैठे थे। मेरी पत्नी मेरे पास में आकर बैठ गयी लड़की सामने की जगह ली।
उसके थोड़ा समय बाद ही हमने चाय लेकर पीना भी शुरू कर दी। उसके बाद मैंने अपने जेब से तंबाकू निकाली और उसे हाथ में घिसने लगा। उस लड़की की पिता ने कहा-‘‘थोड़ा तंबाकू आप देंगे। मेरे दांत में दर्द है।’

लड़की ने कहा-‘‘पापा, आपको तंबाकू खाना है तो  फिर दंात के दर्द का बहाना क्यों कर रहे हैं? कहीं तंबाकू देखी नहीं कि खाने का मन करने लगता है।’

फिर वह हमारी पत्नी की तरफ देखकर हंसते हुए बोली-‘सब आदतें छूट जायें पर तंबाकू की आदत नहीं जाती।’ 
हमारी पत्नी ने उससे कहा-‘‘हां, हमारे यह योगसाधना शुरू करने के बाद शराब तो छोड़ चुके हैं पर इससे इनका भी पीछा नहीं छूटता।’
लड़की ने एकदम पूछा-‘‘रोज करते हैं? वही बाबा रामदेव वाली न!
हमारी पत्नी ने कहा-‘‘हां पिछले पांच वर्ष से कर रहे हैं, और यह इन्होंने तब शुरू की जब बाबा रामदेव का नाम इतना प्रसिद्ध नहीं था।
मैने बीच में हस्तक्षेप किया-‘‘मैंने भारतीय योग ंसंस्थान के शिविर में योग साधना सीखी थी। हां, अब यह सच है कि भारतीय योग के प्रचार में उनका बहुत योगदान है।’
फिर तो वह कहने लगी-‘हां, हमारे यहां एक औरत को कैंसर हो गया था वह टीवी पर देखकर योग साधना करने लगी और वह ठीक हो गयी। एक आदमी  की तो दोनों किडनी खराब थी वह भी ठीक हो गयीं। कई लोगोंं को इससे लाभ हुआ है।’
उसका भाई बताने लगा-‘उससे कई लोगों का फायदा हुआ है।’
मैंने कहा-‘‘खुश रहने के लिए इसके अलावा कोई और उपाय है इस पर मैं यकीन नहीं करता।’

उसकी मां ने कहा-‘‘है तो बहुत काम की चीज, पर लोग करते नहीं है। आलस्य होता है।’
उसके पिताजी ने कहा-‘हां, हमारे यहां कई लोगों की फायदे की बात सुनी है।
लड़की कहने लगी-‘आप कौनसे आसन करते हैं?
मैने उसे थोड़ा इस बारे में बताया। हमारा गंतव्य स्थान आ गया तो फिर हमने उनसे विदा ली।
बाहर निकलकर मेरी पत्नी ने कहा-‘‘हमसे कहा कि एक बात जो मैने वहां नहीं कही कि तंबाकू खाने वाले व्यसनी कोई जातपात या धर्म नहीं देखते। उनके लिए तो तंबाकू  खाने वाले आत्मीय बंधु हो जाते हैं और कभी अधिकार से तो कभी आग्रह से तंबाकू मांग कर खाते है।’
मैने कहा-‘‘हां, पर यह कई बार मैं भी करता हूं। एक विषय और है आजकल जो लोगों में  बंधुत्व की भावना जाग्रत कर रहा है। वह है योग साधना और ध्यान। हां तंबाकू से तो केवल क्षणिक रूप से बंधुत्व का भाव होता है पर देखो मैंने जिनके साथ योग साधना प्रारंभ की उनसे आजतक मेरी मित्रता है। फिर अभी गाडी में  उनसे तंबाकू पर कितनी क्षणिक बातचीत  हुई पर योग साधना पर कितनी देर तक चर्चा हुई।’
 
हमारे देश में एकता और और प्रेम के नारे बहुत लगते है। इनसे कोई मतलब नहीं निकलता। सच तो यह है कि स्वार्थ की वजह से एकता स्वयं ही बन जाती है। अगर आप यह चाहते है कि कोई आपसे एकता करे तो उसके स्वार्थ अपने में फंसाये रहो। आप अगर किसी समूह के नेता है तो केवल एकता करने या उनको अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए प्रेरित कर उसे संगठित नहीं रख सकते। उनके आपस में इस तरह स्वार्थ जोडि़ये। मैं अपने साथ स्वार्थ की वजह से जुड़ने वाले व्यक्तियों पर भी कोई आक्षेप नहीं करता क्योंकि मुझे मालुम है कि समाज में एक दूसरे के स्वार्थ सिद्धि  के लिये कार्य नहीं करेंगे तो फिर उसका औचित्य क्या रह जायेगा? आप चाहते हैं कि आपके बच्चे आपस में जुड़े रहे तो उनके अपने स्वार्थ इस जुड़वा कर रखें ताकि उनका प्रेम बना रहे। हम सब अपने स्वार्थ पूर्ति करने वालों के साथ ही एकता स्थापित करते हैं तब दूसरों से निस्वार्थ एकता की बात करना व्यर्थ है। सभी धर्मों, जातियों, विचारों और वर्गों के लोग आपस में अपने स्वार्थों से मिलते और बिछुड़ते है। जिनको आपस में स्वार्थ नहीं है उसे किसी से मिलने की जरूरत क्या है? हम उस परिवार के साथ अच्छे विषयों पर चर्चा में इतना व्यस्त रहे कि दोनों ने एक दूसरे का परिचय तक नहीं पूछा जबकि  डेढ़ घंटे तक सहयात्री के रूप में एकता और सौहार्द बनाये  रहे।

जरूरत है उन विषयों को प्रोत्साहन देने की जिनसे लोगों में एकता कायम हो सकती है। यहां मैंने तंबाकू का विषय इसलिये उठाया कि लिखते लिखते अब मैं ज्ञानी होता जा रहा हूं-ऐसा आज मेरे एक मित्र ने कहा। मैं सोचता हूं हो सकता है कि लिखने से मेरी यह आदत छूट जाये। तंबाकू खाना स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है यह तो सभी जानते है। सोच रहा हूं हो सकता है लिखने से वह छूट जाये।    

जैसी दी शिक्षा वैसा ही शिष्य पाया-हास्य कविता


गुरू चेले थे बरसों से साथ
पर उस दिन गुरू को गुस्सा आया
लग चेले पर बरसने
‘मैने कई बरस तक दी तुझे सीख
पर तू मेरे किसी काम न आया
देश की प्राचीन गुरू-परंपरा पर
तू ने बहुत बड़ा कलंक लगाया’

अभी तक कभी जवाब न देने वाले
शिष्य को भी उस दिन ताव आया
और पलटकर बोला
‘साथ-साथ रहे पर बड़े होने से
तुमकों ऐसे ही गुरू कहकर मैने भरमाया
इसलिये सब सहता आया
वैसे भी इस घोर कलियुग में
तुम्हें सतयुग का प्रसंग कैसे याद आया
उस युग में देते गुरू सात्विक शिक्षा
गुरुदक्षिणा देने के लिये शिष्य मांगते थे भिक्षा
तुमने हमेशा मुझे चाल फरेब करना ही सिखाया
जैसी दी थी शिक्षा वैसा ही शिष्य पाया’
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स्टार्ट अप को समोसा मान लेते हैं-व्यंग्य चिंतन


 

गूगल के अंग्रेजी हिंदी टूल आने का भारत के अनेक क्षेत्रों के प्रतीक्षा थी। भारत मेें भी हिंदी ब्लाग जगत पर इसकी चर्चा कुछ समय से हो रही  थी।मेरे एक ब्लाग पर एक  अंग्रेजी ब्लाग लेखक ने अपनी टिप्पणी में लिखा था कि एसा टूल आ रहा है इससे भाषा की दीवार समाप्त हो जायेगी।  अब इस टूल के प्रयोग ने कई लोगों को निराश कर दिया है। हिंदी में अंतर्जाल पर लिखने वाले हिंदी ब्लाग ही नहीं वरन् अनेक वह पाठक भी निराश हुए हैं जिनको अंग्रेजी भाषा का ज्ञान नहीं है पर उसके विषयों को पढ़ने का बहुत आकर्षण है। उन्हें लगता है कि अंग्रेजी में शायद हिंदी से बेहतर लिखा जाता है। इससे पहले भी अनेक लोग इंटरनेट पर अंग्रेजी वेब साईटों के सामने आंखें लगाकर  अपने को विश्वास दिलाते हैं कि वह उसे पढ़ रहे हैं और फिर अपने मित्रों को बताते हैं। जब उन्होंने अनुवाद टूल  के बारे में सुना तो चेहरे खिल उठे होंगे पर अब तमाम स्त्रोतों से पता चलता है कि वह निराश है।

हिंदी ब्लाग जगत के नियमित सदस्य होने के कारण मेरे पास इस टूल का बहुत शीघ्र पहुंचना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी और मैंने भी इसके हाथ लगते ही उसके आजमाने का प्रयास किया। मैंने इस टूल को खोला और अग्रेजी के एक ब्लाग की विषय सामग्री की प्रतिलिपि उठाकर अपने ब्लाग पर चिपका दी। फिर परिवर्तित बटन दबाया। कुछ ही सेकण्ड में ही हिंदी में पूरी विषय सामग्री कुछ अस्वीकृत शब्दों साथ  मेरे सामने थी। उसे मैं पढ़ सक पर समझ नहीं सकता था। इसलिये सामने ही अंग्रेजी की सामग्री को पढ़ता और फिर हिंदी को देखता। इस काम में मेहनत कुछ अधिक है पर अंग्रेजी को पूरी तरह नहीं पढ़ने आने की  यह सजा कोई बुरी भी नहीं लगी। मैं अंग्रेजी का पढ़ा समझ पा रहा था इसी से मैं संतुष्ट था। अंग्रेजी व्याकरण की अच्छी जानकारी है इसलिये मुझे पढ़ने और समझने में आ रहा था। हां, शतप्रतिशत नहीं कह सकता पर यह तो अंग्रेजी वाले भी नहीं कह सकते। अंग्रेजी क्या किसी भी भाषा में पढ़ने वाला व्यक्ति यह दावा नहीं कर सकता।

वह ब्लाग शायद किसी ब्रिटेन या अमेरिकी ब्लाग लेखक का होगा। वह कहीं इजरायल अपने व्यवसायिक कार्य से गया था और स्टार्ट अप(start up) खाने की बात लिख रहा था। अंग्रेजी में तो स्टार्ट अप (start up) जैसा था उसे परिवर्तित टूल ने देवनागरी में करने से मना कर दिया। वह कोई खाने की वस्तु होगी ऐसा मेरा अनुमान है। वह अपने मित्र और उसके परिवार साथ कहीं पिकनिक मनाने गया और वहां के दृश्यों के बारे में लिखा। उसके बारे में लिखते हुए भी स्टार्ट अप (start up)खाने की बात कर रहा था। अनुवाद टूल अगर उसे हिंदी में बता देता तो कोई बात नहीं पर हम अभी मान लेते हैं कि स्टार्ट अप कोई समोसे जैसी चीज होगी। समोसा भी तो खाने के काम आता हैं। अब खाने की कोई भी चीज है चाहे जो नाम दे दो। क्या अंतर पड़ता है? बहरहाल उसका पाठ ठीकठाक और दिलचस्प लगा। उसके ब्लाग पर आठ लाख व्यूज थे और तय बात है कि हम अगल दस वर्ष तक तो इतनी पाठक संख्या में सोच भी नहीं सकते।

फिर एक दूसरे ब्लाग की सामग्री लाया। वह पूर्वी एशिया-चीन, जापान या किसी अन्य देश-की किसी महिला ब्लाग लेखक की थी। उसने भारतीय गेहूं के आटे पर वह पोस्ट लिखी थी और उसमें भारतीय आटे के गेहूं की बोरी का फोटो भी था। उसने ऐसा करना अपने मां से सीखा था और उसने अपनी मां के प्रति बहुत भावुक होकर वैसे ही प्रेम व्यक्त किया था जैसे अपने देश की महिलायें व्यक्त करतीं हैं। हां, अंग्रेजी में कुछ कठिनाई से पढ़ते हुए यह जरूर लगा कि इससे तो हमारे हिंदी ब्लाग जगत की महिला लेखिकाएं बहुत अच्छा लिख लेतीं हैं। उनके विषयों में भी व्यापकता होती है।

फिर एक तीसरा ब्लाग बिना सोचे समझे उठा लाये। पता लगा कि वह तो खाद्य पदार्थ बनाने की विधियों से ही भरा पड़ा था। वह किसी भारतीय का नहीं लगा पर उसमें भारतीय खाद्य पदार्थ बनाने के विधियां ही थीं।

उस समय भारत के लोगों द्वारा अधिक मात्रा में भोजन खाने की बात सब जगह चर्चा का विषय थी और हम सोच रहे थे कि जो आदमी जिस विषय के अधिक अपना दिमाग निकट रखता है उसी पर ही वह लिख सकता है। हिंदी ब्लाग लेखक इस तरह कहां खाने पर अपना पाठ लिखते हैं? इसकी आशय तो  यह कि कि सभी सादा और कम खाने वाले हैं तभी तो इतना इस विषय पर नहीं लिखते। व्यंग्य, कहानी, कविता और आलेख हर विषय पर लिखे जाते हैं। 

हम आजकल भी अंग्रेजी ब्लोग देखते हैं पर कोई ऐसा विषय उन पर नहीं दिखता कि उसे पढ़ें। राजनीतिक विषयों कह भरमार है पर वह अपने देश से संबंधित नहीं होते। अब किसे पड़ी है कि अमेरिकी के राष्ट्रपति चुनाव में क्या चल रहा है? इस पर बहुंत आलेख देखे। ऐसा भी हो सकता है कि जब हम जाते हों ऐसे विषय न मिलते हों जिनको हम पढ़ना चाहते हैं। 

हिंदी के लेखक-चाहे वह अंतर्जाल पर हों या बाहर-उन्हें इस बात से दुःखी नहीं होना चाहिए कि हिंदी अंग्रेजी का टूल शतप्रतिशत परिणाम नहीं दे रहा। दरअसल यह अभी तक जो चर्चा हमने सुनी वह अग्रेजी से हिंदी अनुवाद पर सुनी। हिंदी से अंग्रेजी के अनुवाद पर अभी हम प्रतीक्षा कर रहे हैं-जिसके बारे में मेरा मानना है कि हम अपने पाठों में हिंदी से अंग्रेजी में  अधिकतम शुद्धता के प्रयास हम कर सकते है।  जिस तरह चारों तरफ उसकी निराशा की बात सुन रहे हैं उससे तो यही लगता है कि अगर यह टूल अंग्रेजी का हिंदी में शुद्धता से अनुवाद कर देता है तो फिर इतने पाठक भी नहीं मिलेंगे जितने अब मिल रहे हैं। कभी अपने आसपास मैंने इस बात से लोगों को प्रसन्न होते नहीं देखा कि अंतर्जाल पर हिंदी में भी लिखा जा रहा है इस पर किसी को प्रसन्न होते नहीं देखा पर इस टूल के निरुपयोगी होने से दुःख व्यक्त करते हुए  कुछ लोगों को देखा है। हां, देश की पत्र-पत्रिकाओं के संपादक अवश्य निराश हुए होंगे कि अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद की गयी सीधी सामग्री मिलना अभी मुश्किल है। कुछ ब्लाग लेखक भी दुःखी हो सकते हैं कि अगर यह सफल होता तो वहां से सीधे सामग्री उठाकर ब्लाग पर रख देते देखो अमुक  अमेरिकी ब्लाग लेखक का शानदार पाठ।

 वैसे भी हिंदी के कम प्रसिद्ध (मैं लेखक को छोटा बड़ा नहीं मानता) लेखकों को प्रसिद्धि देने के उद्देश्य से कोई भी उनको प्रकाशित नहीं करता। यहां प्रकाशन के लिए जरूरी है कि आप कभी फिल्मी पटकथा लेखक, अभिनेता, निर्देशक, किसी पत्र-पत्रिका के संपादक या कोई स्तंभकार रह चुके हों। फिर भी कभी किसी को महत्वहीन कालमों में छपने का अवसर मिल ही जाता है। अगर यह टूल शत प्रतिशत सफल हो जाता तो शायद इससे भी जाते।

हां, मैं प्रयोगजीवी आदमी हूं और ऐसा  प्रयास करूंगा कि मेरा हिंदी में लिखा अंग्रेजी में इस तरह अनुवाद हो कि वह कुछ पढ़ने और समझने योग्य हो। इसके लिये हम प्रयास कर सकते हैं। इसके लिये अपने कुछ पाठ मैं वहां जाकर अनुवाद कर देखता हूं। कुछ वैकल्पिक शब्दों के साथ वहां शतप्रतिशत परिणाम प्रतीत होता है और वाक्य भी समझ में आते  है- कुछ पोस्टें रखीं हैं पर परिणाम से स्वयं भी अनभिज्ञ हूं। अगर कुछ ब्लाग लेखकों ने कहीं ऐसा प्रयास किया तो हो सकता है कि उनको अंग्रेजी में भी सफलता मिले। हां,  तब भी  यह जरूर हो सकता है कि यहां हिंदी में लिखने के लिये इनाम और सम्मान कोई पा रहा है और अमेरिका और ब्रिटेन में नाम किसी और का हो रहा है। हिंदी के कल्याण से जुड़े शीर्षस्थ लोगों को वही लोग इनाम और सम्मान के लिये उपयुक्त लगते हैं जिससे उनका स्वयं का प्रचार होता हो। हिंदी के लेखकों को भूखा रखकर उससे लिखवाने की प्रवृत्ति रखने वाले लोगों को आगे चुनौती भी मिल सकती है और अगर शतप्रतिशत परिणाम वाला टूल आया तो हिंदी के लेखक भी संकट में आ सकते हैं। 
 

लिखने और प्रयोग करने में क्या हर्ज है- व्यंग्य


बहुत दिन से लोगों ने ऐसी हिंदी लिखी नहीं होगी जैसी उसे अंग्रेजी में अनुवाद टूल देखने का इच्छुक है। मैने गूगल के हिंदी टूल से समझौता करने का निर्णय किया तो मुझे जितना आसान लग रहा था उतना है नहीं।

पिछले कई वर्षों से मन में हिंदी का विख्यात लेखक बनने की इच्छा रही जो कभी पूर्ण नहीं हो सकी। विषय सामग्री की प्रशंसा तो अनेक लोगों से मिली पर ख्याति फिर भी नहीं मिली। भटकते हुए इस अंतर्जाल (अनुवाद वाला टूल इसे  इंटरनेट नहीं करता) पर आ गये। वर्डप्रेस का ब्लाग लिखने बैठ गये तो अपने देव और कृतिदेव में टाईप कर रख दिया। दो दिन तक इस बात   प्रतीक्षा की कि  यह उसको हिंदी के कर देगा। उसने नहीं किया तो हम हैरान रह गये। आखिर दूसरे लोग किस तरह लिख रहे हैं यह सोचकर हैरानी होती थी। पता नहीं कैसे हमने वर्डप्रेस में  हिंदी श्रेणी में अपना ब्लाग घुसेड दिया। इससे वहां सक्रिय अन्य ब्लाग लेखकों की उस पर वक्रदृष्टि पड़ गयी। हिंदी के सब ब्लाग एक जगह दिखाने वाले नारद फोरम के ब्लाग लेखक आखें तरेर रहे थे। ‘यह कौनसी भाषा है’, ‘इसे यूनिकोड में करो’, वगैरह….वगैरह।
हमने समझा कि यह लोग जल रहे हैं पर आगे घटनाक्रम ऐसा हुआ कि हम यूनिकोड में ही लिखने लगे। एक मित्र ने इंडिक का हिंदी टूल दिया जो रोमन लिपि में लिखी हिंदी को देवनागरी रूप देता था। देखा जाये तो एक तरह से यूनिकोड में लिखने की वजह से हम भी ब्लाग लेखक बन गये। यह तो बाद में पता लगा कि हम तो इतने बड़े साहित्यक लेखक से ब्लाग लेखक बनकर रह गये। 

इधर ब्लाग लेखक ऐसा टूल बता गये जिससे कृतिदेव बता गये जो उसे यूनिकोड में परिवर्तित करता  था। हम उस टूल को उठा तो लाये पर यकीन नहीं था कि सफल होगा। वह हुआ और हम अब ब्लाग लेखक नहीं रहे थे। जिन मित्रों ने हमें ब्लाग लेखक बनाने की गलती की थी यह टूल बताकर उसका प्रायश्चित कर दिया। कहें तो हमसे तंग होकर ब्लाग जगत से बाहर का मार्ग दिखा दिया।  अब हो गये लेखक।

एक महीना भी नहीं बीता कि एक और टूल का पता फिर यह ब्लाग मित्र ले आये-हिंदी को अंग्रेजी भाषा में बदलने का। कई पाठक अभी शायद इस बात पर यकीन नहीं करे पर यह सत्य है कि ऐसा टूल आ गया है। हमें एक लेखक की तरह हिंदी ब्लाग जगत में लिखते हुए अधिक समय नही बीता पर पुराने धाव कभी कभी हरे हो ही जाते हैं।

हमें कई वर्षों से इस बात का अनुभव रहा है कि  हम हिंदी में लिखकर विख्यात नहीं हो सकते। उल्टे कई बार विख्यात होने के चक्कर में हमारे झगड़े और हो जाते हैं जिसमें सिवाय कुख्यात होने के हमारे हाथ कुछ भी नहीं आता। ऐसे में इस टूल के जरिये अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विख्यात होने का विचार आया और अपनी कुछ पाठ-मित्रों की इस चेतावनी के बावजूद कि इसके परिणाम की संभावना का प्रतिशत बहुत कम है-हमने इस टूल का प्रयोग आरंभ किया। पहले पाठ  में कम से कम उसने बीस अक्षर परिवर्तित करने की बजाय वैसे के वैसे ही रखकर यह बता दिया कि यह काम आसान नहीं है।मैने एक-एक कर वैकल्पिक अक्षरों का इस्तेमाल किया और अपना पाठ  तैयार की और चिपका दिया। जब पढ़ने बैठा तो दंग रह गया। ‘मैं खाना खाता हूं’ में वह खाता को एकांउट कर देता है। साइकिल उसके समझ में आता है पर सायकल को मानने से मना कर देता है। पोस्ट नहीं पाठ लिखो तो समझता है। हिंदी के अधिकतर व्यंग्यकारों की यह आदत होती है कि वह ‘मैं’ की बजाय ‘हम’ शब्द का प्रयोग करते है पर इस अनुवाद के टूल से मत पढ़ कर अंग्रेजी पढ़ने वाले भ्रमित हो जायेंगे। यह टूल इतना हिंदी प्रेमी है कि उर्दू या अंगेजी शब्द को स्वीकार करने को तैयार नहीं है।

अभी लोगों ने इसका उपयोग किया नहीं है पर जितना मैंने किया है उसके अनुसार अगर शुद्ध हिंदी में लिखा जाये तो बहुत हद तक इस टूल से अपना पाठ इस तरह प्रस्तुत किया जा सकता है जिससे अंग्रेजी भाषा के पाठक भी पढ़ सकें। हिंदी में लेखक रहे या ब्लाग लेखक कोई सम्मान नहीं मिला। पहले भी मैं बहुत प्रयास करता था कि अंग्रेजी में अपनी रचनाएं लिखूं पर लिख नहीं पाया। अब विचार मेरे मस्तिष्क में आ रहा है कि क्यों न इस टूल से अंग्रेजी में घुसपैठ  की जाये। जब अंग्रेजी वाले हमारे हिंदी में हमारे अनुवादकों की सहायता से घुस सकते हैं तो फिर उनके इस टूल से उन्हींे की क्षेत्र में उसी तरह प्रवेश किया जाये।

आने वाला समय बहुत दिलचस्प है। सबसे बड़ी बात यह है कि जिस तरह अंतर्जाल पर भाषा की दीवार टूट रही है तो साथ ही कई भ्रम भी टूटने वाले हैं। अभी तक हिंदी के ठेकेदार  और मालिक  हिंदी के लेखकों को अपनी जागीर समझते थे। जिसे कोई पुरस्कार या सम्मान मिला वही प्रसिद्ध हुआ। लिखने के साथ किसी बड़े संगठन या व्यक्ति की चाटुकारिता करना आवश्यक है। हिंदी पढ़ने वाले पाठकों की कमी है पर अब यह विषय नहीं रहने वाला कि किस भाषा में लिखा गया बल्कि क्या लिख गया यह महत्वपूर्ण होने वाला है।

पिछले बहुत समय से मुझे अपने ब्लाग पर अंग्रेजी भाषा के ब्लाग लेखकों की उपस्थिति के संकेत देखे थे पर मैंने उनकी उपेक्षा की यह सोचकर कि भला उनके साथ क्या संपर्क बन पायेगा? अब संभव है कि अंतर्भाषीय ब्लाग संपर्क बनने लगें। जिस गति परिवर्तन आ रहे हैं उससे मुझे लगता है कि एक वर्ष में बहुत सारे ऐसे दृश्य हमारे समक्ष प्रस्तुत होंगे जिसकी कल्पना भी हम अभी नहीं कर सकते। मेरी दिलचस्पी अब इस ब्लाग जगत में लेखक की तरह कम एक दृष्टा की तरह अधिक है-लेखक होने के कारण मुझे भी सुखद अनुभूतियां होंगी, यह एक अलग से उपहार होगा।

अभी इस टूल के प्रयोग को सीखा जाना है और जो लेखक नये हैं और वह इस पर अपनी पोस्टों का अनुवाद जरूर कर देखें कि वह अंग्रेजी में कैसे आ रहीं हैं। हालांकि लोग उछल रहे हैं कि ‘हिंदी अंग्रेजी अनुवाद टूल‘ आ गया तो हमें अंग्रेजी में भी पढ़ा जायेगा तो उन्हें पहले यह भी तो देखना चाहिए कि उनके पाठ अनुवाद होकर अंग्रेजी में पढ़ने योग्य हैं कि नहीं। इसके साथ अभ्यास करने से हो सकता कि कुछ लोग अपने पाठ इस तरह बना लें कि अंग्रेजी के पाठक उनको आसानी से पढ़ सकें। महत्वपूर्ण बात यह है कि जो शायद हिंदी के लेखक कभी अंग्रेजी और उर्दू शब्दों के प्रयोग करने की आदत से पीछा नहीं छुड़ा सके वही काम यह टूल उनसे करा लेगा, अगर वह यह चाहते हैं कि अंग्रेजी के पाठक भी उन्हें पढ़ें। कुल मिलाकर आने वाला समय बहुत दिलचस्प रहने वाला है। हम तो लिखते रहेंगे जब तक अवसर मिल रहा है। आखिर हमें लिखने और प्रयोग करने में क्या हर्ज है?  

इंसान तो कठपुतली है-हास्य कविता


आदमी के पंख नहीं होते
जो वह आसमान में उड़ सके
पर उसका मन बिना पंख के ही
उड़ता चला जाता है
उसके पांव आदमी की काबू में होते नहीं
पंरिदे बनाते हैं लोगों के घर में भी घरोंदे
पर उनके बिस्तर पर सोते नहीं
खुशी में झूमकर नाचता इंसान
दुःख  में अपने ही आंखो से बहती
अश्रुधारा में करता स्नान
पर परिंदे कभी रोते नहीं
अपने मन के इशारे पर
कठपुतली की तरह नाचता
कितने भी दावे करे कि
खुद ही चल रहा है इस जीवन पथ पर
अपनी अक्ल पर है उसका काबू
कराती है इंसान की  जुबान दावे आजाद होने के
पर कभी वह सच्चे होते नहीं
अपनी जरूरतों से आगे नहीं उड़ते
इसलिये परिंदे कठपुतली नहीं होते
यह सच है
अपनी ख्वाहिशों के हमेशा गुलाम
रहने वाले  इंसानों के लिये
साबित करना बहुत मुश्किल है कि
वह कठपुतली होते नहीं
……………………………………………………..

कठपुतली ने चिडि़या से कहा
‘देखो, मैं नाच  और गा सकती हूं
पर तुम ऐसा नहीं कर सकती
मुझे तुम पर तरस आता है’

चिडि़या ने उसकी डोर पकड़ने वाल  नट की
गर्दन पर चांेच मारी तो वह चिल्लाया
छूट गयी उसके हाथ से  डोर
उसने कठपुतली को इस तरह नीचे गिराया
चिडि़या ने लौटकर चिड़े से कहा
‘आदमी कठपुतली को आगे कर बोलता
अपने मन के इशारे पर डोलता 
बोलने से पहले कभी शब्द नहीं तोलता 
दावे करता है आकाश में उड़ने का
कभी ऐसा नहीं करता तब  मचा रहा है शोर
उड़ता तो क्या हाल करता
सर्वशक्तिमान ने इसलिये इसको पंख नहीं लगाया
उड़ने के ख्वाब देखता रहे इसलिये
इंसान को मन की कठपुतली बनाया
……………………………………………………..

दीपक भारतदीप

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महिला बुद्धिजीवी सम्मेलन-हास्य व्यंग्य


सम्मेलनों के आयोजने करने के आदी लोगों की संस्था के पदाधिकारियों के  दिमाग  में ‘बुद्धिजीवी महिला सम्मेलन’ करवाने का विचार आया। कुछ लोगों ने इसका विरोध किया और कुछ लोगों ने समझाया। एक समझदार ने कहा-‘‘इस देश की शिक्षा पद्धति ने लोगों को गहरे ज्ञान से वंचित किया है और सभी प्रकार के बुद्धिजीवी चाहे वह  महिला हो या पुरुष केवल वाद का नाम और नारे लगाकर ही चलते हैं और फिर आपस में झगड़ा करते हैं। सामान्य आदमी तो बैठक आदि में जाता नहीं और जाता है तो खामोशी से चला जाता है और चार बुद्धिजीवी पूरुष जहां मिलते है लड़ पड़ते है, उनको हाथ पकड़ कर या धमकी देकर समझाया जा सकता है  कहीं महिला बुद्धिजीवी कहीं झगड़ा कर बैठीं  तो उनको समझाना कठिन हो जायेगा।’

   मगर संस्था के लोग नहीं माने। सम्मेलन कराने का नशा उन पर सवार था। उनका विचार था कि इस बहाने संस्था का नाम पुनः चमकेगा जो पहले ही डूब रहा है।

सम्मेलन घोषित हो गया। ढूंढ-ढूंढकर बुद्धिजीवी महिलाओं को आमंत्रण भेजा गया और फिर विषय रखा गया ‘सास-बहु और ननद-भाभी  के मधुर संबंध कैसे हों’?

संस्था के सभी लोग आयोजन कर चंदा वसूलने और फिर आत्मप्रचार के काम में महारात हासिल किये हुए थे पर फिर भी उनमें से कुछ कच्चे पड़ गये और उन्होंने फैसला किया कि वह इस आयोजन से दूर रहेंगे। वजह यह थी कि उनके घर की महिलायें भी इन आयोजनों में आतीं थीं और उनको लगा कि इस तरह के आयोजन से उनके घरेलू विवाद सबके सामने आयेंगे।

हालांकि संस्था के लोगों ने इस बात का पुख्ता इंतजाम किया कि उनके घर की महिला सदस्य इनमें शामिल न हों और वह बुद्धिजीवी भी हों तो उनको सूचना नहीं भेजी जाये। इसलिये जिसका नाम भी आमंत्रण पत्र पर लिखा जाता था पहले इस बात की तस्दीक कर ली जाती थीं कि वह संस्थो के सदस्यों की घर से संबद्ध न हों।

सम्मेलन का दिन आया तमाम महिलायें कार्यक्रम में पहुंची। कुछ को भाषण देना था तो कुछ को केवल सुनकर तालियां बजानीं थीं। तालियां बजाने के लिये भी बकायदा पैसे देने का आश्वासन दिया गया था। आयोजक जानते थे कि बोलने के लिये बुद्धिजीवी महिलायें तो मिल जायेंगी पर ताली बजाने के लिये उनकी उपलब्धता संदिग्ध है। इसलिये कुछ पुरुंष भी किराये पर बुलाये गये और उनको महिला अधिकारों के लिये लड़ने वाले जुझारू कार्यकर्ता कर प्रचारित किया गया।

तमाम सावधानियों के बावजूद आयोजक आमंत्रण पत्र भेजने में गल्तियां कर गये। उन्होने कई ऐसी बुद्धिजीवी महिलाओं को बोलने के लिये आमंत्रण भेज दिया जिनके आपस में सास बहु और ननद-भाभी के रिश्ते थे। उनको इस बात का ध्यान ही नहीं रहा कि बुद्धिजीवी घरों में ‘बुद्धिजीवी’ बहु की मांग ही होती है यह अलग बात है कि कोई भी बुद्धिजीवी सास दहेज की राशि को लेकर वैसे ही कोई समझौता नहीं करती जैसे कि कोई सामान्य सास।

सम्मेलन शूरू कराने के लिये एक पुरुष सदस्य माइक पर आया और बोला-‘‘आज हम अपने पहले बुद्धिजीवी सम्मेलन…………………….’’

उसकी बात पूरी होने से पहले ही एक महिला कुर्सी से उठ कर खड़ी हो गयी और बोली-‘क्या इस काम के लिये कोई महिला नहीं थी। हटो मैं संचालन करती हूं।’

वह मंच पर चढ़कर आ गयी और उससे माइक लेकर स्वयं डट गयी।उस संचालक पर तो जैसे वज्रपात हुआ क्योंकि वह उस संस्था का अध्यक्ष था और उसी ने ही इस सम्मेलन के प्रस्ताव को रखा था और पास कराया था। उसका मूंह उतर गया तो संस्था में उसके वह प्रतिद्वंद्वी खुश हो गये जो इस सम्मेलन को कराने के विरोधी थे।

उस महिला ने अखबारों की कटिंग दिखाकर  कुछ ऐसी खबरें जिनमें महिलाओं के खिलाफ अपराध किये गये थे उनको पढ़ना और उसके लिये पुरुष प्रधान समाज को जिम्मेदार ठहराने का सिलसिला शुरू किया। 

तब एक दूसरी महिला खड़ी होकर बोली-‘‘यहां हमें  बताया गया है कि आज की चर्चा का विषय है ‘सास-बहु और ननद-भाभी  के मधुर संबंध कैसे हों’? आप तो विषय से हटकर बोल रहीं हैं।’

उसके पास ही उसकी बहु भी बैठी थी वह अपनी सास से बोली-‘‘अत्याचार तो अत्याचार है। खबर बतायेंगी तभी तो यह पता लगेगा कि कहां-कहां बहुओं पर अत्याचार हुए।’

तब दूसरी बुद्धिजीवी महिला भी माइक पर पहुंच गयी और उससे छीनकर बोली-‘हम पुरुषों द्वारा तय किये गये विषय पर नहीं बोलेंगे। हमें अपना विषय तय स्वयं करना चाहिए।’

अब तो वहां हलचल मच गयी। बहुएं और भाभियां चाहतीं थीं कि उनके साथ जो दुव्र्यवहार घर में होता है उस पर चर्चा की जाये और सास और ननदें चाहतीं थीं कि इसमें बहुओं द्वारा अपने अधिकारों के दुरुपयोग पर विचार किया  जाये।

माहौल गर्मा गया था और आयोजकों की घिग्घी बंध गयी थी। संस्था के एक सदस्य ने कहा-‘आज का किसी के मरने की खबर देकर स्थगित करते हैं और अगली तारीख पर आयोजित करेंगे। अभी जो नाश्ते का समय घोषित करते हैं फिर इसे स्थगित कर देते हैं।’

संस्था का अध्यक्ष बोला-‘‘पर वहां यह घोषित करने के लिये भी तो कोई महिला चाहिए। देखा नहीं मुझे किस तरह वहां से भगा दिया।

माहौल तनाव से भरा था। अब आयोजकों के समझ में नही आ रहा था कि क्या करें? किसकी मदद लें? सब बुद्धिजीवी महिलायें तो जोर-जोर से बोल रहीं थीं। अचानक उनकी नजर एक व्यंग्यकार महिला पर पड़ गयी। उस सभा में वही एक खामोश बैठी थी और मंद-मंद मुस्करा रही थी। मजे की बात यह कि उसे नहीं बुलाया गया था वह तो कहीं से सुनकर वहां आयी थी। अध्यक्ष उसके पास गया और बोला-‘‘आप हमारी कुछ मदद करे। पहले सबके लिये नाश्ते की घोषणा करें थोड़ी देर बाद किसी बहाने इस स्थगित कर दें।’

व्यंग्यकार महिला ने कहा-‘‘पर मैं तो यहां बिना बुलाये आयी हूं।  वैसे भी मैं केाई बुद्धिजीवी नहीं हूं बल्कि व्यंग्यकार हूं। नहीं…..नहीं…………तुम क्या समझते हो कि मेरा कोई सम्मान नहीं है।’

उसने जब अधिक याचना की तो वह तैयार हो गयी। उसने मंच संभाला और पहले नाश्ते की घोषणा कर माहौल को ठंडा किया फिर थोड़ी देर बाद माइक पर आयी और बोली-‘‘ अब हम सब लोगों ने नाश्ता कर लिया है पर हमारा विषय तय नहीं है इसलिये अगली तारीख पर विषय तय कर लेंगे तब आपको सूचना दी जायेगी। हम फिर मिलेंगे।’

सब महिलायें  थोड़ा बहुत विरोध कर वहां से चलीं गयीं। थोड़ी देर बाद वह व्यंग्यकार महिला बाहर निकली तो देखा एक खाकी पेंट, सफेद शर्ट और सिर पर टोपी पहने एक आदमी खड़ा उसे देख रहा था और जैसे ही नजरें मिलीं तो वह खिसकने को हुआ तो वह पीछे से चिल्लाकर  बोली-‘अरे, तुम व्यंग्यकार होकर इस तरह यहां क्यों खड़े हो। अच्छा अपने लिये विषय तलाशने चपरासी की भूमिका में आये हो। अगर मुझे पता होता तो सब महिलाओं को बता देती और तुम्हारी धुलाई करवाती। तुम्हारे व्यंग्य वैसे ही मेरे समझ में नहीं आते पर तुम हो कि लिखना बंद नहीं करते।

वह अपनी साइकिल उठाकर बोला-‘‘अब हम दोनों ही यहां से निकल लें तो अच्छा रहेगा। मै इस वेश में इसलिये आया था कि चपरासी तो चपरासी होता है उसकी उपस्थिति पर भला कौन आपत्ति करता है पर अगर सूटबूट पहनकर आता तो हो सकता है कि बाहर भी कोई खड़ा नहीं रहने देता। यहां दोनों ही बिना बुलाये आये हैं अगर मैं इस पर व्यंग्य लिख दूं और महिलाओं का तुम्हारे बिना आमंत्रण के यहां आगमन की बात बता दू तो कैसा रहेगा? और बुद्धिजीवी और व्यंग्यकार में अंतर होता है ऐसा मैंने तुम्हारे व्यंग्यों में ही पढ़ा है।

महिला व्यंग्यकार ने कहा-‘ महिलायें अभी भी दूर नहीं हैं बुलवा लूं। खैर छोड़ो…………..फिर उनको भी यह पता चल जायेगा कि मैं भी यहां बिना बुलाये आयी हूं और आयोजकों कहने से उनका सम्मेलन खत्म कराया गया है।’’

अगले दिन अखबार में सम्मेलन के उल्लास से संपन्न होने का समाचार था और व्यंग्यकार महिला का नाम तक उसमें नहीं था। 
यह हास्य व्यंग्य काल्पनिक रचना है और किसी व्यक्ति या घटना से इसका कोई लेना देना नहीं हैं अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार होगा। इन पंक्तियों को लेखक किसी भी महिला व्यंग्यकार से कभी नहीं मिला

अंग्रेजी नाम, हिंदी नाम-आलेख


अंतर्र्जाल पर हिंदी लिखते हुए मुझे एक बात अनुभव हो रही है कि यहां रूढ़ता का भाव अपने हृदय में रखने को कोई मायने नहीं है। अंतर्जाल पर अनेक वेब साइटों और ब्लाग पर निकल रही हिंदी  पत्र-पत्रिकाओं के नाम हिंदी में है तो अंग्रेजी में नहीं और अंग्रेजी में है तो हिंदी में नहीं। मैं दोनों से संबंध रखता हूं और मेरी रुचि इस बात में है कि किस तरह अंतर्जाल पर हिंदी के पाठक अधिक से अधिक सक्रिय हों। मेरी कुछ पत्रिकाएं ब्लाग पर हैं और कुछ वेब साईटों की पत्रिकाओं पर मैं लिखता हूं। मैंरे अपने वेब पृष्ठों (ब्लाग) पर बनी पत्रिकाओं के नाम हिंदी में रखे हैं। बीच में मैंने अपनी इन पत्रिकाओं का अंग्रेजी नाम भी रखा था पर हिंदी एग्रीगेटरों से उनके जुड़ने  के बाद अंग्रेजी नाम हटा लिये। इसका पछतावा मुझे आज तक है।

एक बात तय है कि विश्व में भाषा की दूरियां अब कम हो रही हैं और ऐसे में वेब साइटों और वेब पृष्ठोंं पर बनी पत्र-पत्रिकाओं को किसी भाषाई रूढ़ता से उबरना होगा तो साथ ही अपनी मौलिकता से निर्वाह करना होगा। मैं बात कर रहा हूं उनके वेब साईटों और वेब पृष्ठों पर बने पत्र-पत्रिकाओं के शीर्षक और  नाम की। कई जगह पत्र-पत्रिकाओं का नाम अंग्रेजी है पर हिंदी में न होने के कारण उसके शब्द सर्च इंजिन में डालने पर वह उसके सामने नहीं आती तो अंग्रेजी मेें न होने के कारण उसका भी यही हश्र होता है। अब अनुवाद  टूल आने से हमें अब इस संभावना पर भी विचार करना चाहिए कि देश विदेश के अन्य भाषी लोग हिंदी के लेखकों और संपादकों से अपना संपर्क रखना चाहेंगे और यकीन मानिए वह हिंदी शब्द सर्च इंजिन में डालकर तलाश नहीं करेंगे। ऐसे में कोई हिंदी भाषी पत्र-पत्रिका (जो वेब साईट या वेब पृष्ठों   पर हैं) अगर अपना नाम अंग्रेजी में रखती है तो उस पर आपत्ति नहीं है पर अगर वह हिंदी में भी रखें तो अच्छी बात है। वैसे यह आवश्यक नहीं है कि अंग्रेजी के पाठक हिंदी की अंतर्जाल पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ना चाहें पर यह एक संभावना है जो हाल ही में बनी है। वैसे  अंग्रेजी नाम की वजह से कई पत्र-पत्रिकाएं  अन्य भाषियों में ही क्या अपनी भाषा वालों मे भी पैठ भी नहीं बना पाईं।

एक बात और है कि हिंदी भाषी पत्र-पत्रिकाओं के अंग्रेजी शीर्षक या नाम रखने वालों को यह समझना चाहिए कि ‘हिंदी’ में नाम होने से ही उनकी मौलिकता प्रकट होगी न कि अंग्रेजी से। अगर कोई विदेशी पाठक हिंदी सामग्री  को पढ़ना चाहेगा तो उसकी दृष्टि में सम्मान तभी बढ़ेगा जब हिंदी में शीर्षक होगा भले ही वह सर्च इंजिन में अंग्रेजी शब्द डालकर वहां तक आया हो। इसलिये अंतर्जाल पर वेब साईटों और वेब पृष्ठों (ब्लाग) पर चल रहीं पत्र-पत्रिकाओं को अपने नाम अंग्रेजी नाम के साथ हिंदी में रखना चाहिए, जिनके शीर्षक हिंदी में है वह अगर सोचते हैं कि अन्य भाषियों तक उनके लिए पहुंचना संभव है तो वह उसमें अंग्रेजी नाम भी जोड़ सकते हैं। वैसे श्रेणियों और टैग लगाकर भी यह काम हो ही रहा है। 

मोबाइल मोहब्बत हो गई-हास्य कविता


प्रेमी ने प्रेमिका के मोबाइल की
घंटी बड़ी उम्मीद से बजाई
जा रही थी वह गाड़ी पर
चलते चलते ही उसने
अपने मार्ग में होने की बात उसे बताई
फिर भी वह बातें करता रहा
वह भी सुनती रही
सफर गाड़ी पर उसका चलता रहा
अचानक वह कार  से टकराई
प्रेमी को भी फोन पर आवाज आई
प्रेमी ने पूछा
‘क्या हुआ प्रिये
यह कैसी आवाज आई
कोई ऐसी बात हो तो मोटर साइकिल पर
चढ़कर वहीं आ जाऊं
मुझे बहुत चिंता घिर आई’
प्रेमिका ने कहा
‘घबड़ाओ नहीं कार से
मेरी गाड़ी यूं ही टकराई
अपनी मरहम पट्टी कराकर अभी आई
करा देगा यह कार वाला उसकी भरपाई+’

प्रेमी करता रहा इंतजार
फिर नहीं प्रेमिका की कोई खबर आई
एक दिन भेजा संदेश
‘जिससे मेरी गाड़ी टकराई
उसी कार वाले से हो गयी  मेरी सगाई
बहुत हैंडसम और स्मार्ट है
उसने मुझ पर बहुत दया दिखाई
इन दो पहियों की गाड़ी से
तो अब हो गयी ऊब
चार पहियों वाली गाड़ी में ही
अब घूमने की इच्छा आई’

प्रेमी सुनकर चीखा
‘यह कैसा मोबाइल है
जिसने मोहब्बत को भी बनाया
अपने जैसा
कितना बुरा किया मैंने जो
उस दिन मोबाइल की घंटी बजाइ
……………………………………….

नोट-यह हास्य कविता काल्पनिक है तथा इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई लेना-देना नहीं है। अगर किसी की कारिस्तानी से मेल हो जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा।

संत कबीर वाणीःभक्ति के लिये हृदय में शुद्ध भावना जरूरी


पाहन पानी पूजि से, पचि मुआ संसार
भेद अलहदा रहि गयो, भेदवंत सो पार
 
संत शिरोमणि कबीदासजी कहते हैं कि पत्थर और पानी को पूज कर सारे संसार के लोग नष्ट हो गये पर अपने तत्व ज्ञान को नहीं जान पाये। वह ज्ञान तो एकदम अलग है। अगर कोई ज्ञानी गुरु मिल जाये तो उसे प्राप्त कर इस दुनियां से पार हुआ जा सकता है।

पाहन ही का देहरा, पाहन ही का देव
पूजनहारा आंधरा, क्यौं करि मानै सेव

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मूर्ति  पत्थर की होती है और उसको घर में रखा जाता है वह भी पत्थर का है और लोग उसकी पूजा कर रहे हैं। जिसे खुद कुछ नहीं दिखाई देता वह भला आदमी की सेवा और भक्ति को कैसे स्वीकार कर सकता है।
आज के संदर्भ में व्याख्या-सच तो यह है कि पत्थरों की प्रतिमाएं या मकान बनाकर उसमेें लोगों को अपनी आस्था और भक्ति व्यक्त करने के परंपरा इस संसार में शूरू हुई है तब से इस संसार में लोगों के मन में तत्वज्ञान के प्रति जिज्ञासा कम हो गयी है। लोग पत्थरों की प्रतिमाओं या स्थानों के जाकर अपने दिल को तसल्ली देते है कि हमने भक्ति कर ली और दुनियां के साथ भगवान ने भी देख लिया।  मन में जो विकास है वह जस के  तस रहते है जबकि सच्ची भक्ति के लिये उसका शुद्ध होना जरूरी है। इस तरह भक्ति या सेवा करने का कोई लाभ नहीं है। पत्थर की पूजा करते हुए मन भी पत्थर हो जाता है और उसकी मलिनता के कारण ं शुद्ध भक्ति और सेवा का  भाव नहीं बन पाता और  आध्यात्मिक शांति पाने के लिये किये गये प्रयास भी कोई लाभ नहीं देते। अगर हम चाहते हैं कि हमारे अंदर सात्विक भाव सदैव रहे तो ओंकार की भक्ति करें या निरंकार की भावना शुद्ध रखना चाहिए। 

 

चाणक्य नीतिःधन कमाने वाले धर्म की स्थापना नहीं कर सकते


अर्थाधीतांश्च  यैवे ये शुद्रान्नभोजिनः
मं द्विज किं करिध्यन्ति निर्विषा इन पन्नगाः

जिस प्रकार विषहीन सर्प किसी को हानि नहीं पहुंचा सकता, उसी प्रकार जिस विद्वान ने धन कमाने के लिए वेदों का अध्ययन किया है वह कोई उपयोगी कार्य नहीं कर सकता क्योंकि वेदों का माया से कोई संबंध नहीं है। जो विद्वान प्रकृति के लोग असंस्कार लोगों के साथ भोजन करते हैं उन्हें भी समाज में समान नहीं मिलता।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- आजकल अगर हम देखें तो अधिकतर वह लोग जो ज्ञान बांटते फिर रहे हैं उन्होंने भारतीय अध्यात्म के धर्मग्रंथों को अध्ययन किया इसलिये है कि वह अर्थोपार्जन कर सकें। यही वजह है कि वह एक तरफ माया और मोह को छोड़ने का संदेश देते हैं वही अपने लिये गुरूदक्षिणा के नाम भारी वसूली करते हैं। यही कारण है कि इतने सारे साधु और संत इस देश में होते भी अज्ञानता, निरक्षरता और अनैतिकता का बोलाबाला है क्योंकि  उनके काम में निष्काम भाव का अभाव है। अनेक संत और उनके करोड़ों शिष्य होते हुए भी इस देश में ज्ञान और आदर्श संस्कारों का अभाव इस बात को दर्शाता है कि धर्मग्रंथों का अर्थोपार्जन करने वाले धर्म की स्थापना नही कर सकते।

सच तो यह है कि व्यक्ति को गुरू से शिक्षा लेकर धर्मग्रंथों का अध्ययन स्वयं ही करना चाहिए तभी उसमें ज्ञान उत्पन्न होता है पर यहंा तो गुरू पूरा ग्रंथ सुनाते जाते और लोग श्रवण कर घर चले जाते। बाबआों की झोली उनके पैसो से भर जाती। प्रवचन समाप्त कर वह हिसाब लगाने बैठते कि क्या आया और फिर अपनी मायावी दुनियां के विस्तार में लग जाते हैं। जिन लोगों को सच में ज्ञान और भक्ति की प्यास है वह अब अपने स्कूली शिक्षकों को ही मन में गुरू धारण करें और फिर वेदों और अन्य धर्मग्रंथों का अध्ययन शुरू करें क्योंकि जिन अध्यात्म गुरूओं के पास वह जाते हैं वह बात सत्य की करते हैं पर उनके मन में माया का मोह होता है और वह न तो उनको ज्ञान दे सकते हैं न ही भक्ति की तरफ प्रेरित कर सकते हैं। वह करेंगे भी तो उसका प्रभाव नहीं होगा क्योंकि जिस भाव से वह दूर है वह हममें कैसे हो सकता है।

क्रिकेट में अब देशप्रेम का सुख नहीं उठाते-हास्य कविता


आया फंदेबाज और बोला
‘क्या दीपक बापू किक्रेट भूल गये देखना
पता नहीं तुम्हें अब यहां
क्रिकेट मैच चल रहे हैं
तुम्हारे नेत्र उनका आनंद उठाने की बजाय
कंप्यूटर में जल रहे हैं
क्यों नहीं कुछ मजा उठाते’

सुन कर पहले उदास हुए
फिर टोपी लहराते हुए कहें दीपक बापू
‘जजबातों में बहकर देख लिया
जिनकी जीत पर हंसे
और हारने पर रोए
उनके खिलवाड़ को सहकर देख लिया
कमबख्तों ने  पहले राष्ट्रप्रेम जगाने के लिये
आजादी के गाने सुनवाये
और हमारे जजबातों से खूब पैसे बनाये
अब क्रिकेट हो गया बाकी सब जगह कंगाल
विदेशी खिलाड़ी हो रहे बेहाल
किसी भी तरह इस देश में ही कमाना है
पर बाहर ही तो रखना अपना खजाना है
इसलिये देश में अंदर ही बंटने के लिये
देश की बजाय टीमों के नाम की भक्ति के लिये
नये-नये मनोरंजक तराने बनवाये
अब तो देशप्रेम उनको सांप की तरह
डसने लगता है
क्योंकि विदेशी नाराज न हो जायें
इससे शरीर उनका कंपता है
हमें तो लगने लगा है कि
इतिहास में ही आडम्बर भरा पड़ा है
गुलामी का दैत्य तो अब भी यहीं खड़ा है
कभी इस देश को एक करने के लिये
सब जगह नारे लगे
अब बांटने के लिये सितारे लगे
पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण में
मनोरंजन के नाम पर बांटा जा रहा है
देशप्रेम से शायद व्यापार नहीं होता
विश्व के सबसे उपभोक्ता यहीं हैं
उनको बांटने से ही कई लोगों का
बेड़ा पार यहीं होता
देशप्रेम हम नहीं छोड़ पाते
उसके नाम के बिना क्रिकेट में सुख नहीं पाते
लोग उसे भुलाने के लिये
बन  रहे हैं बैट बाल के खेल में
पेश कर रहे हैं नृत्य और गाने
उसे देखेंगे शोर के दीवाने
हास्य कविता लिखेंगे हम जैसे सयाने
अब हम क्रिकेट से मनोरंजन नहीं उठाते
……………………………………

आठ साल की बच्ची का हाथ कैसे कुचला जा सकता है-आलेख


आज श्री सुरेश चिपलूनकर जी ने कुछ फोटो की श्रृंखला भेजी जिसने मेरा मन विचलित कर दिया। वह अकेले ऐसे ब्लागर हैं जिनसे मैं व्यक्तिगत रूप से मिल चुका हूं। मुलाकात के बाद वह अपने ब्लाग और ऐसे फोटो ईमेल से भेज देते हैं। उनका लेखन कितना प्रभावी है यह बताने की आवश्यकता नहीं है पर उनके द्वारा प्रेषित फोटो भी बहुत संदेश देते हैं।

उनके बारे में विस्तार से कभी समीक्षा लिखूंगा पर आज उनके द्वारा भेजे गये फोटो ने तत्काल  कुछ लिखने को मजबूर कर दिया। उनके कथानुसार यह फोटो ईरान से लिया गया है। वहां एक आठ वर्षीय लड़की पर ब्रेड चुराने का आरोप लगाया गया और फिर उसका हाथ कार के नीचे कुचला गया। उसके पास एक पेंटशर्ट पहने आदमी बकायदा इसकी घोषणा माइक पर करते दिखाया गया है। उसके आसपास भारी भीड़ खड़ी है।  मुझे यह फोटो देखकर बहुत तकलीफ हुई।

हमारे देश में भी अंधविश्वासों के कारण कई ऐसी घटनाएं होतीं हैं पर एक तो वह अशिक्षित लोगों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में की जातीं है और अगर उसकी जानकारी प्रशासन पर आये तो वह कार्रवाई भी करता है, दूसरे ऐसे कुकृत्यों को कोई सामूहिक सामाजिक समर्थन प्राप्त नहीं होता। मैं ऐसी घटनाओं पर बहुत लिख चुका हूं और एक बात तय है कि ऐसी घटनाओं को कानून की दृष्टि से कोई समर्थन नहीं मिलता। हम ईरान की बात कर रहे हैं वहां के धार्मिक कानून के अनुसार चोरी की सजा हाथ काट देने या कुचलना ही है। मतलब वहां उसे कानूनी संरक्षण प्राप्त है।

अपराध की दृष्टि से देखें तो चोरी सबसे छोटा अपराध है पर हम उसको बड़ा कहते हैं क्योंकि वह कमजोर लोगों द्वारा अपनी  भूख मिटाने के लिये किया जाता है। मैंने तो एक व्यंग्य भी लिखा है ‘‘चोरी करना पाप है’ यह एक नारे की तरह पढ़ाया जाता है। कहीं यह नहीं पढ़ाया जाता कि ‘रिश्वत लेना पाप है’ या अपहरण करना पाप है। अगर कोई स्कूल यह पढ़ाना शुरू कर दे तो उसके यहां लोग अपने बच्चों को भेजना ही बंद कर देंगे। आखिर वह बच्चों को इसलिये नहीं पढ़ाते कि उनका बच्चा पढ़लिखकर उच्च पद पर तो पहुंचे और ऊपरी कमाई न करे।

पर मैं इन फोटो पर कोई व्यंग्य नहीं लिख सकता। यह मेरे मन को विचलित करने वाली फोटों है। वह तो बच्ची है मैं तो बड़ी आयु के आदमी पर भी ऐसा करने के  विरुद्ध हूं। खासतौर से तब यह वह डबलरोटी चोरी करने के आरोप में दी गयी है। एक समय की भूख के लिये उस बच्ची का जिंदगी भर का हाथ नष्ट करना एक जघन्य अपराध है। होना तो चह चाहिए था कि उस बच्ची की व्यथा सुनकर उसके लिये कोई उपाय किया जाता पर उल्टे उसका हाथा कुचला गया। मैं उन फोटो को अपने ब्लाग पर लाने में सफल नहीं हो पाया और वैसे भी मैने अपने शब्दों में ही जो चित्र खींचा उसे आप पढ़कर समझें तो ठीक रहेगा। वैसे मैंने चिपलूनकर जी सच ईमेल किया है कि वह ऐसी फोटो के लिये एक अलग ब्लाग शुरू करें क्योंकि कई बार चित्र भी बहुत कुछ कह जाते हैं।  आखिर एक गरीब आठ साल की बच्ची का हाथ केवल इसलिये जिंदगी भर के लिये कैसे नष्ट किया जा सकता है जिसने एक समय के खाने के लिये डबलरोटी चुराई हो। यहां मैं स्पष्ट कर दूं कि मैंने जो भी  कुछ लिखा है वह चिपलूनकर जी के उसी फोटो को देखकर ही लिखा है।

तब तक बहुत देर हो जायेगी-हास्य कविता


हर शाख पर उल्लू बिठा दो
जब बिजली चली जायेगी
वह तरक्की-तरक्की के नारे लगायेगा
लोग समझेंगे सब ठीक-ठाक है
अंधेरे में भला किसे तरक्की नजर आयेगी
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तरक्की हो रही चारों तरफ
भ्रमित लोग चले जा रहे यह सोचकर कि 
कहीं हमें भी मिल जायेगी
जमीन में धंसता जा रहा  है पानी
आदमी में कहां रहेगा
घर में बढ़ते कबाड़ में खोया
जब गला तरसेगा  पानी को
तब उसे समझ आयेगी
पर तब तक बहुत देर हो जायेगी
…………………………………………………………..

उसने कहा
‘मैं तरक्की करूंगा
आकाश में तारे की तरह
लोगों के बीच चमकूंगा
मेरी ख्याति चारों और फैल जायेगी’
बरसों हो गये वह घूमता रहा
रोटी से अधिक कुछ हाथ नहीं आया
अब कहता है
‘‘इतनी कट गयी जिंदगी
जो बची है वह भी कट जायेगी’
पढना जारी रखे

हमने भी कुछ खोया नहीं-हिन्दी शायरी


अपनी राह चलते जाना है
कहीं फूल बरसेंगे
तो कहीं लोग ताने कसेंगे
थोड़ी खुशी के लिये
बहुत दूर तक ढूंढते बहाने
निराश होने पर
भागने लगते हैं गम भुलाने
ऐसे लोगों के इशारे पर
अगर चले जिंदगी की राह पर
तो ताउम्र अपनी मंजिल को तरसेंगे
……………………………………………….

उनके इशारे पर लड़ते रहे जमाने से
वह तो रहे पर्दे में, मतलब रख कमाने से
जो वक्त आया तो फेर लीं नजरें हमसे
जब मिलने गये तो लगे अनजाने से
उन्होंने बहुत कुछ पा लिया
पर हमने भी कुछ खोया नहीं
हमें भी मतलब था
कुछ जिंदगी के सच देखने से
अपना मकसद पूरा किया
अपनी जिंदगी को आजमाने से

मानसिक गुलामी किसी को दिखाई नहीं देती-आलेख


मनोरंजन के नाम पर जिस तरह के कार्यक्रम विभिन्न टीवी कार्यक्रमों में अंधविश्वासों और रूढियों को प्रतिपादित किया जा रहा है उससे तो ऐसा लगता है कि कुछ लोगों के मन में आज भी यह बात है कि इस देश के लोग ज्ञान की दृष्टि से अंधेरे में ही रहे ताकि उनका उल्लू सीधा होता रहे।

आचार्य चाणक्य, विद्वान विदुर, संत कबीर और रहीम के संदेशों को जब मैं अपने ब्लागों पर रखता हूं तो अपना ज्ञान नही बघारता बल्कि उनका उपयोग मैं अपना ज्ञान बढ़ाने के लिये भी करता हूं। मैं नही जानता बाकी ब्लागर मेरे बारे में क्या सोचते हैं पर एक बात मुझे लगने लगी है कि उससे मेरी अच्छी छवि बनी है। मुझे याद है मैने शब्दलेख सारथि पर जब छद्म नाम से चाणक्य और कबीर दास जी के संदेश अपने ब्लाग पर रख रहा था तब मेरा कोई प्रयोजन नहीं था। हां, बस यह सोचता था कि अगर यह रखूंगा तो लोग शायद मुझे व्यंग्य और अन्य आलेख लिखते नहीं देखना चाहें इसलिये अपना असली नाम नही लिख रहा था। हालत ऐसे बने कि मुझे उस पर असली नाम लिखना पड़ा। इसके बावजूद मेरे मन में यह भाव कभी नहीं रहा कि लोग मेरे इस काम को अधिक महत्व दें। मेरा सोचना यह है कि जब सब लोग हमारे महापुरुषों के संदेश सुनाकर अपनी पूजा करवा रहे है और मैं उनका विरोध करता हूं तो मैं अपने लिये कोई ऐसी अपेक्षा रखकर अपने उस उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर पाउंगा जिसके लिये मैने इतनी तकलीफ से ब्लाग बनाकर लिखना शुरू किया।

इस देश का जितना अध्यात्म स्वर्ण की खदान है जो हमेशा अक्षुण्ण रहेगा उतना ही अंधविश्वास भी एक कीचड़ की तरह हमेशा रहेगा। यह विरोधाभास ही है जिस कारण यहां विदेशी विचारधाराओं को पनपने का अवसर मिला। होता यह है कि लोग अपने देश के अंधविश्वासों और रूढियों से तंग आकर यह सोचते हैं कि यही हमारा धर्म है और दूसरी विचारधारा की तरफ आकर्षित हो जाते हैं। इसका कारण यह है कि जिन लोगों ने धर्म के प्रचार का ठेका लिया है वह अध्यात्म के नाम अंधविश्वास की स्थापना करते हैं। ऐसा नहीं है कि यह आजकल से हो रहा है। कबीर और रहीम के समय में भी यह होता आया है और उन्होंने इसका जमकर विरोध किया।

उम्मीद यह थी कि बढ़ती शिक्षा के साथ यह सब समाप्त हो जायेगा। हुआ उल्टा ही पहले फिल्मों ने और अब टीवी चैनलों के मुख्य पात्र मंदिरों और दरगाहों के चक्कर लगाते हैं जहां कथित पंडित या पीर उनको ऊपर आकाश की तरफ इशारा कर उस पर विश्वास करने का संदेश देते हैं।

इससे भी काम नही चलता तो फिल्मों और टीवी के हीरो ऐसे धार्मिक स्थानों पर आर्शीवाद लेने जाते हैं और उनकी खबरें फिर अखबार और टीवी चैनलों पर आतीं हैं। इससे भी बात नहीं बने तो ऐसे धार्मिक स्थानों पर कुछ विवाद खड़े किये जाते हैं ताकि लोग उनके बारे में अधिक जाने। मतलब यह कि देश अंधविश्वासों और रूढियों में जकड़ा रहे ताकि उसकी आड़ में उस आर्थिक और सामाजिक शासन बना रहे। जिनका सामाजिक सीरियल कहा जाता है मेरे हिसाब से वह तो अपराध या हारर शो कहे जाने चाहिए क्योंकि उसमें अपनी तकलीफों से घबड़ाये पात्र को ऐसे धार्मिक स्थानों से ही आशीर्वाद मिलता है और जब कुछ अपराध दिखाये जाते हैं तो वह भयानक होते हैं।

अगर देखा जाये तो धर्म और अध्यात्म की आड़ में लोगों की भावनाओं को दोहन आज से नहीं सदियों से ही चल रहा है। पहले आदमी को उसे तथा पुरखों को मोक्ष और स्वर्ग दिलाने के नाम पर कर्मकांडों की जंजीर में बांधा गया तो अब भी वही चल रहा है। सच तो यह है कि दैहिक आजादी तो सबको दिखती है पर जजबातों के नाम आदमी जो मानसिक गुलामी कर रहा है वह दिखाई नही देती।

जो बडे हैं वह कभी संयम नहीं गंवाते-हास्य कविता


आया फंदेबाज और बोला
”क्या दीपक बापू हम तो
समझते थे कोई भारी भरकम लेखक को
पर हम अब समझे हमें भरमाते हो
सभ्य शब्दों की बात करते हो
गालियाँ लिखने में शर्माते हो
देखो अंतर्जाल पर बडे-बडे लेखकों के नाम का
लेखक गालिया चाप (छाप) जाते
और लोग तारीफ भी कर आते”

सुन पहले चौंके
फिर कुर्सी से उठकर
टोपी को घुमाते कहानी दीपक बापू
”लोगों की हताशा और निराशा दूर करने का
ठेका वैसे हमने नहीं लिया
अभिव्यक्ति की आजादी है
किसी का मुहँ सिलने का
काम हमने कभी नहीं किया
करते हो गालियों की बात
हम नहीं लिखेंगे
चाहे तालियाँ बजे या पड़े लात
लोगों का क्या
जो लेखक होते सामने
उनका पूछते नहीं
पीठ पीछे उनके नाम की
कविताओं के गुणगान कर जाते
समझना तो दूर कभीं पढीं भी
नहीं होगी जिन कवियों की कवितायेँ
उनके पीछे गाते हैं उनकी गाथाएं
और अपना प्रभाव जमाने के लिए
उनकी गालियाँ चिपका जाते
दूसरों पर लाशों का व्यापार करने का
आरोप लगाने वाले
स्वर्गवासी लोगों के नाम से
गालियाँ छपने के लिए आते
अपने दिल के अरमान दबाये दिल में
बडे कवियों के नाम से वाह-वाही लूट जाते
हिन्दी भाषा का है बहुत बडा इलाका
दर्द भी बहुत है यहाँ
इसलिए कवि और लेखक भी बहुत हैं
सबको कौन पढ़ पाता
इसलिए लोग अपनी बात उनसे नाम से
चिपका जाते
हम तो बस इतना जानते कि
जो बडे हैं वह कभी अपना संयम नहीं गंवाते”
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एक ढूंढो हजार मूर्ख मिलते हैं-आलेख


कल बिहार में एक स्थान पर एक महिला को जादूटोना करने के आरोप जिस बहशी ढंग से अपमानित किया गया हैं वह देश के लिये शर्म की बात है। यह कोई पहली घटना नहीं है जो ऐसा हुआ है और न शायद यह आखिरी अवसर है। पहले भी ऐसी घटनाएं हो चुकी है। यह कोई अभी नहीं हो रहीं है बल्कि सदियो से हो रहीं हैं यह अलग बात है कि अब सूचना माध्यम के शक्तिशाली होने की वह राष्ट्रीय पटल पर आ जातीं है। ऐसी घटनाओं को देख कर अपने इस समाज के बारे में क्या कहें?

एक तरफ प्रचार माध्यम यह बताते हुए थकते नहीं हैं कि भारतीय संस्कृति को विदेशी लोग अपना रहे है- कहीं कोई विदेशी जोडा+ भारतीय पद्धति से विवाह कर रहा है तो कहीं कोई विदेशी दुल्हन देशी दूल्हे से विवाह कर देशी संस्कृति अपना रही है तो कहीं विदेशी दूल्हा देशी दुल्हन के साथ सात फेरे लेकर भारत की संस्कृति आत्मसात रहा है। एसी खबरें पढ़कर लोग खुश होते है कि हमारी संस्कृति महान है।

ऐसे प्रसंग केवल विवाह तक ही सीमित रहते है और हम मान लेते हैं कि हमारी संस्कृति और संस्कार महान है। मगर क्या हमारी संस्कृति विवाह तक ही सीमित है या हमारी सोच ही संकीर्ण हो गयी है। हिंदी फिल्मो में एक प्रेम कहानी जरूर होती है जो तमाम तरह के घुमाव फिराव के बाद विवाह पर समाप्त हो जाती है। फिल्म के लेखक विवाह के आगे इसलिये नहीं सोच पाते कि वह भारतीय समाज से जुड़े है या इन फिल्मों को देखते-देखते हमारे समाज की सोच विवाह के संस्कार तक ही सिमट गयी है यह अलग विचार का विषय है। हां, समाज पर फिल्म का प्रभाव देखकर तो यही लगता है कि अब लोग इससे आगे सोच नहीं पाते।

मैंने जब यह दृश्य देखा तो बहुत क्रोध आ गया। वजह! मेरा मानना है कि महिला चाहे कितनी भी बुरी हो वह क्रूर नहीं होती। उसे गांव का एक बुड्ढा आदमी मार रहा था और अन्य औरतें भी उसे मार रहीं थीं। उसके बाल काटे गये। इस बेरहमी पर उसे बचाने वाला कोई नहीं था। मुझे तो उन गंवारों पर बहुत गुस्सा आ रहा था मेरा तो यह कहना है कि उनमें जो महिलाएं थी उन सबसे खिलाफ भी कड़ी कार्यवाही होना चाहिए।

ऐसी घटनाऐं देखकर मन में अमर्ष भर जाता है। हम जिस कथित संस्कृति की बात करते हैं उसका स्वरूप क्या है? आज तक कोई स्पष्ट नहीं कर सका। यहां मैं बता दूं कि अध्यात्म अलग मामला है और उसका जबरदस्ती संस्कारों और संस्कृति से जोड्ने की जरूरत नहीं है क्यांकि कोई भी विवाह श्रीगीता का पाठ पढ़कर संपन्न नहीं कराया जाता जो कि हमारे अध्यात्म का मुख्य आधार है। उसे कई लोग अपनी जिन्दगी में नहीं पढ़ते और अपनी औलादों को भी नहीं पढ़ने देते कि कहीं उसे पढ़कर वह विरक्त न हो जायें और बुढ़ापे में हमारी सेवा न करें। अंधविश्वास और रूढियों के कारण इस देश का समाज पूरे विश्व में बदनाम है और हम जबरन कहते हैं कि बदनाम किया जा रहा है। गाव में अनपढ़ तो क्या शहर के पढ़े लोग भी अपनी समस्याओं के लिये जादूटोना करने वाले ओझाओं और पीरों के पास जाते है।
खानपान और रहन-सहन में कमी की वजह से बच्चा बीमार हो गया तो कहते हैं कि किसी की नजर लग गयी। मां.-बाप की लापरवाही की वजह से बच्चा बहुंत समय ठीक नहीं हो रहा है तो लगाते है आरोप लगाते कि किसी ने जादूटोना किया होगा।

कमअक्ली के कारण किसी भी काम में सफल नहीं हो रहे तो दूसरों को दोष देते हैं। गांव और शहर एक बहुंत बड़ा तबका अपने आलस्य और व्यसनों की आदतों की वजह से हमेशा संकट में रहता है। आदमी दारू पीते हैं अपने घर में खर्चा नहीं देते पर घर की महिलांए किसी को अपनी पीड़ा नहीं बतातीं और फिर अपना मन हल्का करने के लिए शुरू होता है जादूटोना वाले ओझाओं के पास जाने को दौर।
वह बताते हैं कि उपरी चक्कर है किसी ने जादूटोना किया है। कभी ‘अ’ से नाम बतायेंगे तो कभी ‘ब’ से। ऐसे में कोई निरीह औरत अगर उनके गांव में हो तो उसकी आफत। गांव में एक.दूसरे के प्रति अंदर ही अंदर दुश्मनी रखने वाले लोग मौके का फायदा उठाते हैं और अगर उस औरत को कोई नहीं है और गांव के बूढ़े जो बाहर से भक्त बनते है और अंदर के राक्षस हैं अपना मौका देखते है। ऐसे में कहना पड़ता हैं कि ‘रावण मरा कहां है’। एक निरीह औरत को मारती हुई औरतें क्या भली कहीं जा सकतीं है। आखिर ऐसी समस्या किसी पुरुष के साथ क्यों नहीं आती?

एक प्रश्न अक्सर समझदार और जागरुक लोग उठाते है कि ं हमारे देश में आजकल अनेक साधु संत हैं जिनका प्रचार पूरे देश में है पर इनमें से कोई भी इन चमत्कारों के खिलाफ नहीं बोलता बल्कि ईश्वरीय चमत्कारों की कथा सुनाकर वाहवाही लूटते है। भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराम का नाम तो केवल लोग दिखावे के लिये लेते हैं। यह सही हैं कि यज्ञ, हवन, मंत्रजाप और मूर्ति पूजा से मानसिक लाभ होता है क्योंकि इससे आदमी के मन में विश्वास पैदा होता है और वह सात्विक कर्म करने के लिये प्रेरित होता है। इसका लाभ भी उसी का होता है जो स्वयं करता है। अगर एसा न होता तो ऋषि विश्वामित्र भगवान श्रीराम को अपने यज्ञ और हवन की रक्षा के लिये नहीं ले जाते और श्रीराम जी बाणों से राक्षसों का वध नहीं करते बल्कि खुद भी मंत्रजाप और यज्ञ-हवन करते। हमारें मनीषियों ने हमेशा ही जादूटोनों और चमत्कारों का विरोध करते हुए सत्कर्म को प्रधानता दी है। जबकि हमारें देश का एक बहंुत बड़ा वर्ग जो उनको मानने और उनके बताये रास्ते पर चलने के जोरशोर से चलने को दावा तो करता है पर वह ढोंगी अधिक है। आत्ममंथन तो कोई करना नहीं चाहता। इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारतीय अध्यात्म हमारे देश की अनमोल निधि है पर अपने देश में जिस तरह जादूटोना ओर चमत्कारों का प्रचार होते देखते है तो यह कहने में भी संकोच नही होता कि दुनियां के सबसे अधिक बेवकूफ हमारे देश में ही बसते है एक ढूंढो हजार मिलते है।

देशी कुत्तों की तस्करी की खबर सुनकर आयी मुझे अपने कुत्ते की याद-आलेख


देशी कुतों की तस्करी भी हो सकती है कि यह कभी हमें सोचा भी नहीं था। आज टीवी में यह खबर सुनकर हम हैरान हो गए, पर खबर तो खबर है। बाकायदा नागालेंड भेजने के लिए उनको तैयार किया गया था। वहां उसके मांस से खाद्य सामग्री बनायी जाती है जिसे बडे शौक से खाया जाता है।

हमने सबके मांस खाने की खबर पढी है पर देशी कुत्तों का भी मांस खाया जाता है यह हमने पहली बार सुना है। कुत्ता बहुत वफादार जानवर है और जिसका खाता है उसकी बजाता है। आवारा कुत्ता भी हम जिसे कहते हैं वह किसी गली या मोहल्ले का पालतू होता है जो वहां के निवासियों द्वारा फैंकी गयी खाद्य सामग्री खाकर काम चलाता है।

हमारे आध्यात्म/दर्शन के अनुसार गृहस्वामिनी को घर के भोजन पकाते समय पहली रोटी गाय के लिए और आखिरी रोटी कुते के लिए पकाना चाहिऐ। बृहद होते समाज में तमाम तरह के परिवर्तन आते गए और कुछ लोगों को याद रहा और कुछ को नहीं। गाय को तो पालतू बताया गया है कुत्ते को पालने का जिक्र नहीं किया गया पर उसका मनुष्य के साथ सह-अस्तित्त्व स्वीकार किया गया। उसकी जगह घर के बाहर मानी गयी और एक तरह से उसे सामूहिक रूप से पालतू पशु का दर्जा दिया गया है। गावों में कभी बच्चों के पत्थर खाते और कभी रोटी खाते यह देशी कुत्ते और कुछ करें या नहीं पर रात को उनकी आसपास उपस्थिति एक आत्मविश्वास जरूर देती है।

भारत में घर में निजी रूप से कुत्ते पालने का काम मुझे लगता है कि अंग्रेजों के समय में ही शुरू हुआ होगा। फिर शहरी सभ्यता में चूंकि पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव रहा है इसलिए बडे लोगों के साथ अब मध्यम वर्ग के लोग भी कुत्ते को पालने लगे हैं। हाँ इसमें भी लोगों ने देशी कुत्तो के नस्लों से अपने परहेज दिखाई है। खिलोना टाईप के पामोलियन के कुत्ते अधिक पाले जाते हैं। जब हम अपना मकान बना रहे थे तो हम जहाँ किराए पर रहते थे उसके मालिक देशी कुत्ते का बच्चा ले आये। उनकी माँ, पत्नी और बच्चों ने इसका विरोध किया। उस समय हम अपना मकान बनाने के लिए शुरू करने वाले थे तो उन्होने हमसे कहा-”यह कुत्ता आप रख लो। नये मकान में काम आएगा।”
मकान मालिक की बात का हमने प्रतिवाद किया पर हमारी श्रीमतीजी ने उसे स्वीकार कर लिया। हमें डेढ़ वर्ष मकान बनाने में लगा और फिर उसे अपने साथ ले आये। दस वर्ष तक हमारे साथ वह रहा और पिछले वर्ष उसका निधन हो गया। बिलकुल बच्चों की तरह रहा और उसकी मौत पर हमें बहुत दुख हुआ और खुशी भी क्योंकि उसका अंत हमसे देखा नहीं जा रहा था। बहरहाल देशी कुत्तों को कई लोग विदेशी कुत्तों के मुकाबले श्रेष्ठ मानते हैं और अपने स्वर्गीय कुत्ते के प्रति मेरे मन में इतना सम्मान है कि मैं उनकी नस्ल पर कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं करता।
पहले देशी कुत्तों को भोजन-पानी वगैरह बहुत आसानी से मिल जाता था पर बदलते परिवेश ने उनको भी प्रभावित किया है अब वह एक गली-मोहल्ले से दूसरे में अपना भोजन पानी उनको ढूढने जाना पड़ता है। हमारे देश में देशी आवारा कुत्तों की बहुत बड़ी संख्या में है और इस तरह उनके मांस की तस्करी की संख्या बड़ी तो हो सकता है कि एक दिन इसकी नस्ल बचाने के लिए सोचने लगें। हमेशा साथ रहने वाले इन देशी कुत्तों को वही आदमी देखते हैं जो सभी जीवों के प्रति एक जैसा दृष्टिकोण एक जैसा है। मैं अपने कुत्ते की याद करता हूँ तो लगता है कि शुरूआती दिनों में मेरा ध्यान उस पर नहीं जाता था पर वह मुझे हर पल देखता था। शाम को जब मैं घर लौटता था तो वह भले ही पामोलियन की तरह लहराता हुआ नहीं आता था पर उसकी आखों के भाव बताते थे कि वह कुछ सोच रहा है। आदमी अपने देहाभिमान में किसी तरफ नहीं देखता पर अन्य जीव उसे देखते हैं, इसकी अनुभूति अपने उसी पालतू कुत्ते से हुई। इंसान को इस धरती पर केवल अपना अस्तित्व ध्यान में रखता है जबकि अन्य जीव अपनी जीविका के लिए उस पर निर्भर हैं और उसकी जीविका का आधार भी हैं। इस मामले में भारतीय दर्शन में सबसे अग्रणी है कि उसमें जीव और जीवात्मा की प्रधानता है न कि केवल मनुष्य देह की।

होली के दिन सबका चरित्र बदल जाता है-हास्य कविता


घर से नेकर और कैप पहनकर
निकले घर से बाहर निकले लेने किराने का सामान
तो सामने से आता दिखा फंदेबाज
और बिना देख आगे बढ़ गया किया नही मान
तब चिल्ला कर आवाज दी उसे
”क्यों आँखें बंद कर जा रहे हो
अभी तो दोपहर है
बिना हमें देखे चले जा रहे हो
क्या अभी से ही लगा ली है
या लुट गया है सामान’

देखकर चौंका फंदेबाज
”आ तो तुम्हारे घर ही रहा हूँ
यह देखने कल कहीं भाग तो नहीं जाओगे
वैसे पता है तुम अपने ब्लोग पर
कल भी कहर बरपाओगे
पर यह क्या होली का हुलिया है
कहाँ है धोती और टोपी
पहन ली नेकर और यह अंग्रेजी टोपी
वैसे बात करते हो संस्कृति और संस्कार की
पर भूल गए एक ही दिन में सम्मान”

हंसकर बोले दीपक बापू
”होली के दिन सभी लोगों का
चरित्र बदल जाता है
समझदार आदमी भी बदतमीजी पर उतर आता है
बचपन में देखा है किस तरह
कांटे से लोगों की टोपी उडाई जाती थी
और धोती फंसाई जाती थी
तब से ही तय किया एक दिन
अंग्रेज बन जायेंगे
किसी तरह अपना बचाएंगे सम्मान
वैसे भी पहनने और ओढ़ने से
संस्कार और संस्कृति का कोई संबंध नहीं
मजाक और बदतमीजी में अंतर होता है
हम धोती पहने या नेकर
देशी पहने या विदेशी टोपी
लिखेंगे तो हास्य कविता
बढाएंगे हिन्दी का सम्मान
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संत कबीर वाणी:मुहँ में डाले तेल से आंखों देखा घी भला


आंखों देखा घी भला, ना सुख मेला तेल
साधू सों झगडा भला, ना साकट सों मेल

आंखों से देखा घी का दर्शन भी अच्छा है और तेल तो मुख में डाला हुआ भी अच्छा नहीं है। साधू-संतो से झगडा भी अच्छा है परन्तु निगुरा (जिसका कोई गुरू नहीं है) से मेल-मिलाप कदापि अच्छा नहीं है, क्योंकि साधू से झगडा होने पर निर्णय अच्छा हो सकता है पर निगुरे से मेल-मिलाप कभी भी फलदायी नहीं हो सकता।

सीखै सुनै विचार ले, ताहि शब्द सुख देय
बिना समझै शब्द गहै, कछु न लोहा लेय

संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि जो व्यक्ति सत्य और न्याय के शब्दों को अच्छी तरह से ग्रहण करता है उसके लिए ही फलदायी होता है। परंतु जो बिना समझे, बिना सोचे-विचारे शब्द को ग्रहण करता है तथा रटता फिरता है उसे कोई लाभ नहीं मिलता ।

संत कबीर वाणी:जैसा भोजन और पानी वैसा मन और वाणी


आवत गारी एक है, उलटत होय अनेक
कहैं कबीर नहिं उलटिए, वही एक की एक

संत कबीर जी का कहना है की गाली आते हुए एक होती है, परन्तु उसके प्रत्युत्तर में जब दूसरा भी गाली देता है, तो वह एक की अनेक रूप होती जातीं हैं। अगर कोई गाली देता है तो उसे सह जाओ क्योंकि अगर पलट कर गाली दोगे तो झगडा बढ़ता जायेगा-और गाली पर गाली से उसकी संख्या बढ़ती जायेगी।

जैसा भोजन खाईये, तैसा ही मन होय
जैसा पानी पीजिए, तैसी बानी होय

संत कबीर कहते हैं जैसा भोजन करोगे, वैसा ही मन का निर्माण होगा और जैसा जल पियोगे वैसी ही वाणी होगी अर्थात शुद्ध-सात्विक आहार तथा पवित्र जल से मन और वाणी पवित्र होते हैं इसी प्रकार जो जैसी संगति करता है उसका जीवन वैसा ही बन जाता है।

एक राम को जानि करि, दूजा देह बहाय
तीरथ व्रत जप तप नहिं, सतगुरु चरण समाय

कबीर कहते हैं की जो सबके भीतर रमा हुआ एक राम है, उसे जानकर दूसरों को भुला दो, अन्य सब भ्रम है। तीर्थ-व्रत-जप-तप आदि सब झंझटों से मुक्त हो जाओ और सद्गुरु-स्वामी के श्रीचरणों में ध्यान लगाए रखो। उनकी सेवा और भक्ति करो

रहीम के दोहे:कलारी वाले के हाथ में दूध भी मदिरा लगता है


रहिमन नीचन संग बसि, लगत कलंक न काहि
दूध कलारी कर गाहे, मद समुझै सब ताहि

कविवर रहीम का कथन है कि नीच व्यक्ति के संपर्क में रहने से सबको कलंक ही लगता है। मद्य बेचने वाले व्यक्ति के हाथ में दूध होने पर भी लोग उसे मदिरा ही समझते हैं।

रहिमन निज संपत्ति बिना, कोउ न विपति सहाय
बिनु पानी ज्यों जलज को, नहिं रवि सकै बचाय

कविवर रहीम कहते हैं कि अपने धन के अतिरिक्त आपत्ति आने पर अन्य कोई सहायता नहीं करता जैसे बिना जल के कमल के मुरझाने पर सूर्य भी उसको जीवन प्रदान नहीं कर पाता।

नंबर वन और टू का खेल-हास्य व्यंग्य


मुझे कल ही लग रहा था कि कोई चालाकी है और इन्तजार कर रहा था कि आज उसकी क्या प्रतिक्रिया होती है। कल चाकलेटी चेहरे वाले हीरो ने कहा-” मैं नंबर वन हूँ वह जो क्रिकेट के व्यापार में लगा है वह दो नम्बर है।”

लोग भले ही कड़ी प्रतिक्रिया उम्मीद लगा रहे थे पर मुझे लग रहा था कि कोई एकदम ठंडा और पहले से तय बयान आएगा और यह काल्पनिक सीटें नंबर वन और टू आपस में बंट जायेंगी।आज यही हुआ। क्रिकेट के काम में लगे हीरो ने कह दिया है-”हाँ, वह खूबसूरत हीरो नंबर वन है और उसके बाद मेरा नंबर आता है।”

जो नम्रता अपनाता है वह एक पायदान ऊपर चढ़ जाता है और इस तरह दोनों ने नंबर वन हथिया लिया और दो नंबर पर भी किसी को भी नहीं रहने दिया। अब तो कोई चुनौती भी नहीं दे सकता। फिल्म देखकर अपनी आँखें और दिमाग खराब कर रहे आम लोगों के पास कहाँ इतनी शक्ति बचती है कि इस नंबर वन के चक्कर को समझ सकें और और कई खुशफहमियों जी रहे समीक्षक इस चालाकी को नहीं पकड़ेंगे क्योंकि उनके तो दोनों हाथों में लड्डू हैं। पर हम तिरछी नजर से कंप्यूटर चलाते हुए सब पर नजर रखते हैं पर हमारे गुरु ने हमसे कह दिया है कि कोई तस्वीर दिखाए तो उसके पीछे जाकर देखो।

यह सारा खेल बिग बी के मुकाबले खडे करने के प्रयास से अधिक कुछ नहीं है। इसका फिल्म से कोई संबंध नहीं हैं। पब्लिक सब जानती है। फिल्में देखकर भूल जाती है और फिर विज्ञापन फिल्मों को ढोते हैं। फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार कहते हैं कि आजकल इतनी फिल्में बन रहीं है कि सभी के पास बहुत सारा काम है और कोई अभिनेता एक वर्ष में पांच-छः से अधिक फिल्में नहीं कर सकता इसलिए सबके पास बराबर काम है। इसलिए मैं नंबर एक और दो की रेस में नहीं पड़ता।

फिल्म समीक्षक अगर किसी फिल्म के पारिश्रमिक को अगर सफलता का पैमाना मानते हैं तो अपुष्ट आधार पर जो जानकारी बाहर आती है उसमें भी अक्षय कुमार कम नहीं है। दरअसल जब फिल्में कम बनतीं थी और प्रचार के माध्यम सीमित थे तब हिन्दी फिल्मों में सतत सफलता के हिसाब से किसी एक को सुपर स्टार कहकर प्रचारित किया जाता था। अमिताभ बच्चन इस कथित सिंहासन पर कई वर्ष रहे पर उस पर विवाद भी रहा। उनको ऋषि कपूर और विनोद खन्ना से कड़ी चुनौती मिली क्योंकि जो फिल्म हिट हुईं उनमें यह अमिताभ के टक्कर के हीरो हुआ करते थे और अभिनय भी कम नहीं था।

अमिताभ ने बीच में फिल्मों से विराम लिया तो अनिल कपूर इस कथित नंबर वन पर आ गये। इधर प्रचार माध्यमों का भी विस्तार हो गया और इस पर बहस ख़त्म हो गई कि कौन नंबर वन है और कौन टू। अब फिर नये सिरे से इस कथित प्रथा को शुरू किया जा रहा है-क्योंकि लोगों का ध्यान बंटाने के लिए प्रचार माध्यमों को कुछ तो चाहिए। अब इसे आधार बनाया जा रहा है कि कौन ख़बरों में अधिक बना रहता है और इसके लिए जरूरी है फिल्मों के अभिनय से हटकर कोई अन्य लोकप्रिय व्यापार करना या विवाद खडे करना। अक्षय कुमार ने बहुत सारी फिल्में हिट दीं हैं और उनकी संख्या इन दोनों से अधिक है पर वह कहते हैं कि मैं कभी किसी फिल्म का निर्माता नहीं बनूंगा। विवाद से तो वह हमेशा परहेज करते रहे। यह दोनों हीरो जिन फिल्मों में काम करते हैं उनके प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से निर्माता भी होते हैं-हालांकि और भी कई अभिनेता भी यही करते हैं। अक्षय कुमार ऐसा नहीं करते और उनका केवल अभिनय से ही वास्ता है।
आजकल विज्ञापन का युग है और बाजार में उत्पाद बेचने की सिफारिश करने वाले प्रसिद्ध चेहरों की उसे जरूरत है। उनमें अपने क्षेत्र की काबलियत के अलावा अनेक प्रकार की अलग से योग्यता की जरूरत भी होती है और सधी भाषा में कहें तो विवाद अपने साथ जोड़ना। शायद इसी वजह से यह नंबर वन और टू का खेल खेला जा रहा है। ऐसा खेल जिसमें दोनों बराबर रहें और जो बाजार के मतलब के नहीं हैं-क्योंकि अनावश्यक विवादों से परे हैं-उनको नंबर दो से भी धकेल दिया गया है। मगर आजकल प्रचार माध्यम सशक्त हैं अगर वह अपने हिसाब से किसी को नंबर वन दिलवाते हैं तो उसकी मजाक भी कम नहीं बनाते। इधर से खबर देते हैं उधर खिल्ल्ली उडाना शुरू कर देते हैं। वैसे और भी अभिनेता काफी सक्रिय हैं और उनका अभिनय काम नहीं हैं-संजय दत्त, अक्षय खन्ना, इमरान हाशमी, ऋतिक रोशन, सन्नी और बोबी देओल, सुनील शेट्टी और अजय देवगन जैसे अभिनेता भी हिन्दी फिल्मों में बहुत लोकप्रिय हैं, पर यह लोग विवादों से दूर रहते हैं इसलिए इनको कोई नंबर वन में शामिल नहीं करता। सलमान खान भी लोकप्रिय हैं और उनको भी इस दौड़ से बाहर रखा जा रहा है-शायद इसलिए कि उन्होने कोई प्रचार की कोई ऐसी चालाकी नहीं अपनाई। और अमिताभ बच्चन? जहाँ तक मेरी जानकारी हैं उन्होने अभी फिल्मों से सन्यास नहीं लिया है! बहरहाल यह नंबर एक और दो का खेल है दिलचस्प।

अपने मुहँ से अपनी तारीफ़-हास्य व्यंग्य


अब दो फिल्म अभिनेताओं में झगडा शुरू हो गया है कि वह नंबर वन हैं। आज जब मैंने यह खबर एक टीवी चैनल पर सुनी तो मुझे हैरानी नहीं हुई क्योंकि हमारे बुजुर्ग कहते रहे हैं कि चूहे को मिली हल्दी की गाँठ तो गाने लगा कि ”मैं भी पंसारी, मैं भी पंसारी”। ऐसा भाव आदमी में स्वाभाविक रूप से होता भी है थोडा बहुत नाच-गा लेता है या लिख लेता तो उसके दिमाग में नंबर वन का कीडा कुलबुलाने लगता है। थोडे ठुमके लगा लिए और कुछ इधर-उधर टीप कर लिख लिया। और फिर सोचने लगता है कि अब कोई कहेगा कि अब तुम नंबर वन हो। जब कोई नहीं कहता तो खुद ही कहने लगता है कि ‘मैं नंबर वन हूँ’। उसकी बात कोई न सुने तो वह और अधिक चीखने और चिल्लाने लगता है कि जैसे कि उसका मानसिक संतुलन गड़बड़ होता दिखता है।

कम से कम इस मामले में मैं बहुत भाग्यशाली हूँ कि खराब लेखनी की वजह से मेरे अन्दर एक कुंठा हमेशा के लिए भर गयी कि लिखने के मामले में मुझे कहीं भी नंबर नहीं मिलेगा। निबंध लिखता था तो टीचर कहते थे तुम्हारी राईटिंग खराब है इसलिए नंबर कम मिलेंगे पर पास होने लायक जरूर मिलेंगे क्योंकि लिखा अच्छा है। इस कुंठा को साथ लेकर साथ चले तो फिर नंबर वन की कभी चिंता नहीं की। अंतर्जाल पर लिखते समय यह तो मालुम था कि कोई नंबर वन का शिखर हमारे लिए नहीं है इसलिए अपने शिखर को साथ लेकर उतरे और वह था सतत संघर्ष की भावना और आत्मविश्वास जिसके बारे में हमारे गुरु ने कह दिया कि वह तुम में खूब है और कहीं अगर किसी क्षेत्र में कोई नंबर वन का शिखर खाली हुआ तो तुम जरूर पहुंचोगे। हम उनकी बात सुनकर खुश हुए पर आगे उन्होने कहा पर इसकी आशा मत करना क्योंकि इसके लिए तुम्हें विदेश जाना होगा भारत में तो इसके लिए सभी जगह सिर-फुटटोबल होती मिलेंगी। इस देश में लोग हर जगह नंबर वन के लड़ते मिलेंगे और तुम यह काम नहीं करो पाओगे।

हमने देखा तो बिलकुल सही लगा। घर-परिवार, मोहल्ला-कालोनी, नाटक–फिल्म और गीत-संगीत, साहित्य और व्यापार में सब जगह जोरदार द्वंद्व नजर आता है। हम भी कई जगह सक्रिय हैं और जब लोगों को नंबर वन के लिए लड़ते देखते हैं तो हँसते हैं। एक बात मजे की है कि कोई हमें नंबर वन के लिए आफर भी नहीं करता और हमें भी अफ़सोस भी नहीं होता। एक बार एक संस्था के अध्यक्ष पद पर भाई लोगों ने खडा कर दिया और मैंने अन्तिम समय में अपना नाम वापस ले लिया, क्योंकि मुझे लगा कि पूरे साल मैं अपनी आजादी खो बैठूंगा पर कार्यकारिणी के सदस्य पर लड़ा और जीता। सात सौ सदस्यों वाली उस समिति में सात कार्यकारिणी सदस्यों में नंबर वन पर आया। तब मुझे हैरानी हुई पर यह सम्मान मुझे अपने लेखक होने के प्रताप से मिला था और फिर आगे कई संस्थाओं से जुडे होने के बावजूद मैंने कहीं चुनाव नहीं लड़ा क्योंकि अगर मुझे अपने लिखे से ही लोगों का प्यार मिलना है तो मुझे कुछ और क्या करने की जरूरत है।

हिन्दी फिल्मों में अभिनेता करोडों रुपये कमा रहे हैं पर उनका मन भटकता हैं नंबर वन के लिए। उसका आधार क्या है? फिल्मी समीक्षक फिल्म के परिश्रम को मानते हैं। आजादी देते समय अंग्रेज जाते समय हमारे अक्ल भी ले गए और हम सारे आधार पैसे के अनुसार ही करते हैं। आजकल क्रिकेट के व्यापार में उतरे फिल्मी हीरो और चाकलेटी हीरो में नंबर वन का मुकाबला प्रचार माध्यम चला रहे हैं एक हीरों खुद ही दावा कर दिया कि वह नम्बर वन हैं। सच कहूं तो आजकल प्रचार माध्यम में कुंठित लोगों का जमावडा है और उनको खुद पता नहीं क्या कह रहे हैं? किसी समय मिथुन चक्रवर्ती को गरीबों का अमिताभ बच्चन कहा जाता था और इसलिए उनको नंबर वन फिर भी किसी ने नहीं कहा क्योंकि उनका पारिश्रमिक अमिताभ बच्चन जितना नहीं था।मैं अमिताभ बच्चन का कभी प्रशंसक नहीं रहा पर आज मैं मानता हूँ अपने दूसरी पारी में अमिताभ एक नंबर से नौ नंबर तक हैं और दसवें पर कोई है तो अक्षय कुमार। बाकी जो खुद को नंबर वन के लिए प्रोजेक्ट कर रहे हैं या मीडिया प्रचार कर रहा हैं वह किसी अन्य व्यवसायिक कारणों से कर रहे हैं।
जिनकी मुझे आलोचना करनी होती है मैं उनके नाम नहीं देता क्योंकि उसे इस बहाने व्यर्थ प्रचार देना है और जिनकी मुझे प्रशंसा करनी होती है उनका नाम लेने में मुझे कोई हिचक नहीं होती। अक्सर मेरी हर वर्ग और आयु के लोगों से चर्चा होती है और उनसे मुझे बात कर यही लगता है कि कुछ लोगों को मीडिया जबरन लोगों पर थोप रहा है। अगर अभिनय की बात करें तो ओमपुरी और नसीरुद्दीन शाह, सदाशिव अमरापुरकर और अमरीशपुरी जैसे अभिनेताओं को तो फिल्म समीक्षकों और प्रचार माध्यमों द्वारा कभी गिना ही नहीं जाता जबकि लोग आज भी इनके कायल हैं। वैसे भी अमिताभ बच्चन अभी सक्रिय है और नंबर वन का सिंहासन अभी उनके नाम है और उनके बाद अक्षय कुमार की छवि लोगों में अच्छी है।
अगर इस लेख को लिखते हुए हमें अपनी प्रशंसा कर डाली हो तो अनदेखा कर दें आखिर जब इस बीमारी सब ग्रस्त हैं तो हम कैसे बच सकते हैं. हमें कोई नहीं कह रहा कि तुन नबर वन ब्लोगर है इसलिए कभी ऐसा दावा करें तो मजाक समझना. माफी वगैरह तो हम मांगेंगे नहीं फिर व्यंग्य कैसे लिखेंगे.

हॉकी में ओलंपिक से बाहर होने के मायने-आलेख


ओलंपिक में भारत की हॉकी टीम नहीं होगी। टीम ओलंपिक जाती थी तो कौनसे तीर मारती थी कहने वाले तो कह सकते हैं। ओलंपिक दुनिया का सबसे बड़ा महाकुंभ है और उसमें भारत की पहचान केवल हॉकी से ही है और किसी खेल में भारत का नाम इतना नहीं है। जब ओलंपिक में सारे खिलाड़ी हार कर वापस लौटते हैं पर हॉकी टीम आखिर तक खेलती है और समापन कार्यक्रम में उसके खिलाड़ी भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं। अब कौन बचेगा। यह भूमिका निभाने के लिए? तय बात है इसके लिए अब विचार होगा।

हमारी स्थिति अच्छी नहीं है यह सब जानते थे। चक डे इंडिया फिल्म महिला हॉकी पर बनी जिसमें भारत को काल्पनिक विजेता बना दिया। लोग फूले नहीं समाये। जिधर देखो चक दे इंडिया का गाना बज रहा था। ट्वंटी-ट्वंटी क्रिकेट विश्व कप में जब भारत जीता तो सारे अख़बार और टीवी चैनल इसे बजा रहे थे। मगर जिस हॉकी की पृष्ठ भूमि पर यह काल्पनिक कथानक गढा गया वह खेल सिसक रहा था। मैंने उस समय एक ब्लोग पर इस फिल्म के कथानक की तारीफ पढी तो मुझे हँसी आयी और मैंने उस पर खूब लिखा। जिस क्रिकेट खेल पर इस देश के प्रचार माध्यम कमा रहे है उसमें विश्व कप में बंगलादेश से हारा था यह भूलने वाली बात नहीं है। यह इतिहास में दर्ज रहेगा कि २००७ में भारत की क्रिकेट टीम अपमानित रूप से हार कर विश्वकप क्रिकेट से बाहर हुआ और इसे कोई बदल नहीं सकता।

मजे की बात यह है कि हॉकी की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म में हीरो की भूमिका निभाने वाला हीरो आज क्रिकेट के बाजार में प्रवेश कर गया है और हॉकी कान तो नाम भी उसकी जुबान पर नहीं था। आखिर सवाल यह है कि चक दे इंडिया को हॉकी की पृष्ठभूमि पर क्यों बनाया गया क्रिकेट की क्यों नहीं? मेरा अनुमान है कि भारत के लोग क्रिकेट देखते हैं पर हॉकी को चूंकि राष्ट्रीय खेल के रूप में प्रचारित किया जाता है इसलिए लोगों का उससे आत्मिक लगाव है और इसी कारण उनकी भावनाओं का दोहन करना आसान है।फिल्म बनाना एक व्यवसाय है और इसमें कोई बुराई भी नहीं है पर हमारे देश के लोग बहकावे में आ जाते हैं तब उस पर विचार तो करना ही होता है। बहुत दिन तक गूंजा चके दे इंडिया का नारा पर अब क्या?
हॉकी से पूरे विश्व में हमारी पहचान थी। अब चीन में होने वाले ओलंपिक में भारत हॉकी नहीं खेल सकेगा। इस समय मुझे कोई ऐसा कोई खिलाड़ी दिखाई भी नहीं देता जिसके वहाँ कोई ओलंपिक में पदक पा सकेगा। टेनिस के कुछ नाम चर्चित हैं पर उनकी विश्व में रेकिंग भी देख लेना जरूरी है। हाँ एक जो मजेदार बात मुझे लगती है और हंसी भी आती है कि भारत में एशियाड, कॉमनवेल्थ और ओलंपिक में कराने के प्रयास किये जाते हैं तो किस बूते पर?केवल पैसे के दम पर न! फिर हाकी पर पैसा खर्च क्यों नहीं करते? हम खेलों के मेले लगाने की बात करते हैं तो पर खिलाडियों को प्रोत्साहन देने के नाम पर सांप सूंघ जाता है।
क्रिकेट हो या टेनिस बहुत लोकप्रिय हैं पर हाकी भारत के खेलों का प्रतीक और आत्मा है। यह ठीक है कि वहाँ बहुत समय से कोई पदक नहीं जीता पर फिर भी एक संतोष था कि चलो अपना प्रतीक बना हुआ है। अब वहाँ से बाहर होने पर जो वास्तव में खेल प्रेमी हैं वह बहुत आहत हुए हैं और जो केवल आकर्षण के भाव से देखने वाले दर्शक हैं उनको इसका अहसास भी नहीं हो सकता कि भारत ने क्या खोया है? हॉकी हमारे आत्सम्मान का प्रतीक है जो हमने खो दिया है।

हम अपने आर्थिक विकास और सामरिक मजबूती का दावा कितना भी कर लें पर हमारे पडोसी देश चीन की जनता को अगले ओलंपिक में इस पर हंसने का खूब अवसर मिलेगा। आखिरी बात खेलों के किसी भी राष्ट्र के विकास का प्रमाण माना जाता है और जो ऐसे विकास के दावे करते हैं उन्हें हॉकी में भारत की हार एक आईने की तरह दिखाई जा सकती है। हॉकी खेल में विश्व के मानचित्र में बने रहना ही हमारे लिए ताज था और अब चाहे कितना भी कर लो अब वह आसानी से वापस आने वाला नहीं है अगर ऐसा करने वाले लोग होते तो इतने साल से गर्त में जा रहे इस खेल को बचाने की कोशिश नहीं करते।

दुआएं ही कर सकते हैं कि हाकी का अस्तित्व बचे-आलेख


अगले ओलंपिक में भारत की हाकी टीम नहीं खेलेगी। देश के नये खेल प्रेमियों को शायद ही इससे मतलब हो पर फिर भी पुराने खेल प्रेमियों को लिए यह खबर सदमें से कम नहीं है। इस देश के अधिकतर खेल प्रेमियों को क्रिकेट पसंद हैं पर सभी को नहीं वरना हाकी खेलने के लिए नये लड़के कहाँ से आते हैं? स्पष्टत: कुछ जगह अभी भी यह खेल खेलने वाले लड़के हैं और खासतौर से पंजाब में अभी भी यह लोकप्रिय है-हालंकि देश के अनेक भागों में लड़के आज भी हाकी खेलते हैं और उनकी संख्या इतनी है कि अगर सावधानी, ईमानदारी और कुशलता से प्रशिक्षण और चयन हो तो अभी भी हमारी विश्व में बादशाहत कायम हो सकती हैं।

क्रिकेट की लोकप्रियता को हॉकी के विकास में बाधा मानना बेकार का तर्क है। आस्ट्रेलिया, इंग्लेंड और दक्षिण अफ्रीका की हॉकी टीमें अच्छा खेलतीं है और क्रिकेट में भी उनकी बादशाहत है। एक श्रंखला में आस्ट्रेलिया पर जीत क्या हुई हमारे देश के प्रचार माध्यम सीना फुलाने लगे थे और अब हॉकी की दुर्दशा पर एक दिन रोकर सब बैठ जायेंगे। हाकी को राष्ट्रीय खेल (इसके लिए कोइ आधिकारिक दस्तावेज है इसकी जानकारी मेरे पास नहीं है) भी कहा जाता है और इसी खेल में हमारा अस्तित्व ही ख़त्म हो गया। अभी तक अनेक लड़के ओलंपिक और विश्व कप में जाने का ख्वाब यह सोचकर पालते थे कि क्रिकेट में सबको जगह तो मिल नहीं सकती तो क्यों न इसमें हाथ आजमाया जाये। कई नये लड़के राष्ट्रीय खेल में इसलिए भी आते हैं कि हो सकता है अच्छा खेलने पर कैरियर बन जाये। उनके लिए यह खबर बहुत दुखद: है।

जिस तरह हाकी में सब चल रहा है उससे तो नहीं लग रहा है कि अब इसमें इतनी आसानी से वापसी होगी। क्रिकेट जिसमें इतना पैसा है उसमें अभी भी वापसी कहाँ हुई है? एक दिवसीय मैचों में जब विश्व कप के दूसरे दौर में टीम पहुंचे तब कहना कि हाँ टीम में दम है। इक्का-दुक्का एक दिवसीय श्रंखला तो टीम जीत जाती है पर विश्व में हार कर बाहर आ जाती है। बात हाकी की हो रही है। इसमें हालत बहुत खराब है सबको मालुम था पर एकदम इसका अस्तित्व ही खतरे में आ जायेगा ऐसा सोचा नहीं था।

मैं थोडा कभी दार्शनिक भी हो जाता हूँ और इधर-उधर की बात भी कर ही जाता हूँ। हमारे देश में आजकल लोग कहते हैं कि सारे काम पैसे से होते हैं तो यहाँ बता दें अपने देश में ओलंपिक, एशियाड, और कॉमनवेल्थ खेलों का आयोजन कराने के लिए बहुत उत्साह जताया जाता है और वह बिना पैसे के नहीं होते और इसका मतलब तो यह है कि हमारे देश में पैसा तो है फिर हमारे खिलाडी बाकी खेलों में फिसड्डी क्यों है? मतलब पैसे से सब काम नहीं होते। सच तो क्रिकेट के विश्व कप में भारत की टीम की हार पर मुझे कोई अफ़सोस नहीं हुआ था क्योंकि मुझे पहले ही लग रहा था कि वह एक असंतुलित टीम है। हॉकी को कम देखता हूँ पर उसमें मेरी बहुत दिलचस्पी है और इस हर से मुझे वाकई दुख पहुंचा। सिवाय दुआ करने के अलावा क्या किया जा सकता है कि हाकी का खेल फिर वापस लोकप्रिय हो।

आंकडों का खेल भी इन्द्रजाल जैसा -आलेख


आज एक ब्लोग पर हमने वह वेब साईट देखी जिसमें सभी ब्लोग की कीमत का मूल्यांकन किया जा सकता है. उत्सुकतावश हमें उसे खोल कर देखा और अपने सभी ब्लोग की रेट लिस्ट ले आये. देखकर हैरान रह गए कि हमारे सभी ब्लोग फ्लॉप श्रेणी में हैं पर कुल जमा हम फ्लॉप नहीं हैं. आईये ज़रा इन ब्लोग की रेट लिस्ट पर नजर डालें. यह सही है की हमें अभी तक एक धेला भी पैसा नहीं मिला और आगे भी इसके आसार नहीं है पर अगर इसी तरह चलते रहे तो कोई न कोई ब्लोग अधिक कीमत पर आकर सबको चौंका देगा. अब यह वेब साईट विश्वास योग्य है या नहीं हमको नहीं पता. इधर हम अंतर्जाल पर अब किसी भी प्रकार का यकीन नहीं करते जबकि उसका कोई प्रत्यक्ष लाभ हमको नहीं हो फिर यह कंप्यूटर है इसमें आंकडों का हेरफेर तो आसानी से दिया जा सकता है.
ब्लोग का नाम और पता ——————– राशि डालरों में
१.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका——————— १५२४२.५८
२.दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका ——————– १२९८४.४२
३.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका ——————— १२४१९.८८
४.दीपक बापू कहिन ——————– ११८५५.३४
५.दीपक भारतदीप का चिंतन——————— १०१६१.७२
६.अनंत शब्दयोग——————– ९०३२.६४
७.शब्दलेख सारथी——————— ८४६८.१०
८.शब्दलेख पत्रिका——————– ६७७४.४८
९.शब्दज्ञान पत्रिका——————— ५६४५.४०
१० अंतर्जाल पत्रिका——————– ५०८०.८६
११.शब्द योग पत्रिका——————– २८२८.७०
१२. राजलेख की हिन्दी पत्रिका ——————— ००.००

कुल योग ——————– १००५३५.१२

१२ वें नंबर का ब्लोग क्यों नहीं आ रहा यह समझ में नहीं आया क्योंकि यह मेरा सबसे पहला ब्लोग है और इस पर ८० करीब पोस्टें हैं और उसका न आना आश्चर्य की बात है.
हमने अवलोकन किया तो उस ब्लोग पर ७३ हजार से ऊपर के ब्लोग था. अब यह पता नहीं है कि हिन्दी का सबसे महंगा ब्लोग कौनसा है पर जो नाम उनमें थे उससे अगर काल्पनिक रूप से सही माना जाये तो हमारे ब्लोग के कुल योग के आधार पर हम तो ठीकठाक हैं. भौतिक रूप से कुल राशि हमारे लिए वहाँ तभी हो सकती है अगर सब ब्लोग बिकने लगें. अगर हमारे सब ब्लोग को एक इकाई माना जाये तो कुल उनका मूल्य १००५३५.१२ डालर दिखाया गया है. अपने आप में मुझे यह एक रोचक हास्य लग रहा था. अगर कोई एक ब्लोगर एक ब्लोग के साथ ७५ हजार मूल्य के साथ हैं तो वह महंगा लगता है पर अगर एक ब्लोगर १२ ब्लोग के साथ उससे अधिक है तो क्या कहा जा सकता है? वाणिज्य का विधार्थी होने के नाते मुझे सांख्यिकी में बहुत दिलचस्पी रही है और इन आंकडों में अधिक माथा पच्ची करना मुझे ठीक नहीं लगा. भारत के हिन्दी ब्लोगर बहुत उत्साही हैं और वह नित-प्रतिदिन कुछ न कुछ ढूंढते रहते हैं. आज जब वह वेब साईट देखी तो मुझे आश्चर्य हुआ. हालांकि उसके सॉफ्ट वेयर की प्रमाणिकता के बारे में कुछ कहना मुशिकल है और हो सकता है उस पर काम चल रहा हो.

मैं हिट हूँ या फ्लॉप इस मसले पर माथापची करने की बजाय कोई फालतू कविता लिखना पसंद करता हूँ. भारत के उत्साही ब्लोगर किस तरह क्या करते हैं इस पर मेरी नजर रहती है. हाँ आंकडों के इस खेल में मैं यह सोच रहा था कि यार, मुझे भी एक या दो ब्लोग रखना था तो सब मिलाकर मेरा रेट कितना अधिक दिखता. सांख्यिकी किताब में ही मैंने पढा था कि आंकडे धोखा देने के लिए योजनाबद्ध ढंग से बनाए भी जाते हैं जो लोगों को गुमराह भी कर देते हैं पर एक लेखक होने के नाते यह भी जानता हूँ कि लोग इनमें रूचि भी बहुत लेते हैं. अगर आप रेट के हिसाब से देखेंगे तो मेरे ब्लोग बहुत पीछे होंगे पर कुल जमा में मेरा स्थान कोई कम रहने वाला नहीं है. हाँ आंकडों के खेल में हार जीत भी इसी तरह होती है.

इस समय हिन्दी ब्लोगर तेजी से बढ़ते जा रहे हैं और उन पर बाजार की नजर है. इस समय अभिव्यक्ति के सब माध्यम बहुत तेजी से अपनी आभा खो रहे हैं और अंतर्जाल पर ब्लोग अपना एक महत्वपूर्ण स्थान बनाने वाले हैं. मेरा स्थान तो मेरी रचनाएं तय करेंगी पर कई ऐसे अन्य ब्लोगर यहाँ आयेंगे जो चमकेंगे. हाँ इसके लिए उनको आम पाठक के लिए लिखना होगा और उनको फोरमों पर मिलने वाले त्वरित टिप्पणी का मोह छोड़ना होगा. मेरे इस तर्क को चुनौती नहीं दे सकते क्योंकि मैं भी उनकी तरह अपने ब्लोगों पर ऐसे प्रयोग कर रहा हूँ. जिन रचनाओं को ब्लोगरों में सम्मान मिलता है वह आम पाठक के लिए कोई महत्त्व नहीं रखतीं और जो आम पाठक के लिए लिखी जाती हैं ब्लोगर उसे अधिक नहीं पढ़ते.

अंतर्जाल पर काम करना बहुत अच्छा है पर उसके साथ यह मानना कि कंप्यूटर पर रचे गए प्रमाणिक हैं तब तक ठीक नहीं होगा जब तक उसका कोई भौतिक पैमाना हमारे पास न हो. तमाम तरह के ईमेल मुझे आते हैं और अगर उनको सच मान लिया जाये तो मुझे अभी करोड़पति हो जाना चाहिऐ. जो रेट लगे हैं इसकी आधी कीमत पर भी कोई मेरा ब्लोग नहीं खरीदेगा. इसलिए आजकल के युवक-युवतियां इंटरनेट पर व्यवहार के दौरान किसी पर तब तक यकीन न करें जब तक उसका भौतिक सत्यापन न कर लें. इसी तरह अगर उनके सामने कोई आंकडे रखे जाते हैं तो उसका सत्यापन वह स्वयं करें. जब आदमी प्रत्यक्ष सामने खडा होकर झूठ बोल सकता है तो इस कंप्यूटर पर बिना सामने आये तो वह उसे भी बड़ा झूठ बोल सकता है. याद रखने वाली बात यह है कि कड़ी मेहनत करने से ही सफलता मिलती है और अगर असफल होते हैं तो इसका मतलब यह है कि हमारी नीयत में ही कोई खोट है. मैंने अपने जीवन में बहुत देखा है पर मैंने कोई ऐसा व्यक्ति नहीं देखा जिसने ईमानदारी से मेहनत की हो और सफल नहीं हुआ हो. अगर में कहीं असफल हुआ हूँ तो उसमें मैंने अपने अन्दर ही खोट पाया है. यही कारण है कि इतने आत्मविश्वास से अंतर्जाल पर लिख रहा हूँ. मैं अपनी बात पूरे भारत में पहुंचाना चाहता हूँ और जानता हूँ इसमें कड़ी मेहनत ही एक उपाय है और अब बिना किसी की परवाह किये लिखे जा रहा हूँ और कई लोग ऐसे भी हैं जो बहुत विश्वास योग्य और मेरे मित्र हैं पर मेरा लक्ष्य है आम पाठक तक पहुंचना. मैं अपने मुहँ से अपना नाम नहीं लेना चाहता मैं चाहता हूँ कि लोग मेरा नाम लें और मैं अपने कानों से सुनूं. शेष फिर कभी

जो आम पाठक मेरे ब्लोग पढ़ना चाहते हैं वह मेरे इस ब्लोग का पता लिख लें.

https://dpkraj.wordpress.com

सुनने से पहले ही लोग भूल जाते बात-कविता


पहले तोड़कर फिर जोड़ने की बात
पहले रुलाकर फिर हँसाने की बात
अपनी नाकामियों को छिपाने के
लिए रोज नया मोर्चा खोलने की बात
बौना चरित्र, खोखला ख्याल और
खोटी नीयत से समाज में बदलाव की बात
बरसों से चल रही है यहाँ
कहने वालों को लोग सिर उठा लेते हैं
सौंप देते अपने दिल के ताज
फिर भी चल रही है बात पर बात
लोगों की याददाश्त कमजोर होती है
सुना था
पर यहाँ तो लापता है वह
सुनने से पहले ही लोग भूल जाते बात
——————————————-

किसी को यादों में बसाएं
ऐसा साथी मिलता नहीं
किसी के वादों पर भरोसा करें
ऐसा यार अब मिलता नहीं
भूलने की आदत अच्छी लगती है
अब यादों से डरने की कोई बात नहीं
वफाएं तो मिलती कहाँ
बेवफाई का दर्द दिल मी बसता नहीं
———————–

तुम्हारी रक्षा करेगा ज्ञान-साहित्यक कविता


गुरु ने शिष्य को विदा
करने से पहले पूछा
”तुम अब जाओगे
जीवन के पथ पर
चल्रते जाओगे प्रगति पथ पर
सेवा करोगे या चाहोगे सम्मान
शिष्य ने कहा
”गुरु आपने कहा था
ज्ञान कभी पूरा किसी का हो नहीं सकता
मैं तो अभी भी चाहूंगा ज्ञान”

गुरु ने खुश होकर कहा
”तब तो तुम सेवा से स्वत: बडे हो जाओगे
हर सम्मान से परे पाओगे
नहीं होगा अभिमान
हमेशा तुम्हारी रक्षा करेगा ज्ञान’
——————————-

अप्रवासी और प्रवासी हिन्दी लेखक-आलेख


अप्रवासी ब्लोगरों को लेकर मेरे मन में बहुत जिज्ञासा रहती है क्योंकि उनके लिखे पर उस देश के परिवेश और संस्कृति की जानकारी मिल जाती है जो अन्य कहीं नहीं मिल पाती. हांलांकि समाचार पत्र-पत्रिकाओं में इस बारे में अक्सर छपता है पर वह अधिकतर सारे देश को इकाई मानकर लिखा जाता है और जो लिखते हैं वह अधिकतर विदेशी फोबिया से ग्रसित होते हैं. वहाँ रह रहे लोगों की मानसिक उतार-चढाव पर उनका नजरिया अधिक नहीं रहता है. हिन्दी के अप्रवासी भारतीयों से ही विदेशों में रह रहे अपने लोगों की बहुत अच्छी जानकारी मिल जाती है. इस बारे में ब्लोग तथा ई-पत्रिकाओं में सक्रिय लेखकों की रचनाओं से मैंने बहुत कुछ सीखा है.

शुरुआत में ई-पत्रिकाओं में मैंने कुछ कहानियां देखीं तो मुझे आश्चर्य हुआ यह देखकर कि अगर कुछ अच्छे लोग अपने साथ अच्छी बातें ले गए हैं तो कुछ बुरे भी हैं जो बुरी बातें ले गए हैं और यह भी कि सभी विदेशों में रह रहे लोग भले नहीं है. उनमें अपने देश के लोगों के साथ धोखा देने के प्रुवृतियाँ वैसी हैं जैसे यहाँ. कुछ कहानियां तो आँखें खोल देने वाली भी होतीं हैं. ब्लोग जगत में सक्रिय अप्रवासी भारतीयों के लिए ब्लोग अपने लोगों से भावनात्मक रूप से जुडे रहने का साधन भी है यह मैं मानता हूँ. चौपालों पर ब्लोगर भीड़ की तरह हैं और भीड़ में कौन क्या है यह समझ पाना मुश्किल होता है पर एक लेखक का काम यही है कि वह भी में न केवल अपनी पहचान बनाए बल्कि उसमें अपने लिए विषय के साथ अपने मित्र और साथी सही ढंग से तलाशने के साथ उसमें हर व्यक्ति को अलग-अलग कर पहचानने का प्रयास करे. अप्रवासी भारतीयों का लेखन के विषय भी हम प्रवासी भारतीयों की तरह हैं पर उनमें एक पृथक भाव अवश्य होता है और वह अपनी जन्मभूमि और लोगों से दूर रहने का भाव.
हम प्रवासी ब्लोगर यहाँ बैठकर जिन कठिनाईयों में-जैसी लाईट, यातायात, अपने कार्य और अपने सामाजिक तनाव- लिखते हैं वह अप्रवासियों को नहीं छूते पर उनके सामने और समस्याएं तो रहतीं हैं. उनके कार्यस्थल निवास स्थान से बहुत दूर होते हैं और सबसे बड़ी चीज जो मेरी नजर में आई हैं अपने देश के लोगों से उपेक्षा का भाव उन्हें वहाँ भी सालता है. एक जो सबसे अच्छी बात यह लगती है कि वह रुचिकर लिखने का प्रयास वह लोग करते हैं और नई जानकारियाँ भी उनसे मिलती हैं. शायद मेरे जैसे प्रवासी भारतीय ब्लोगर सोच रहे होंगे कि आखिर यह मैं सब कुछ लिख क्यों रहा हूँ? इसका जवाब यह है कि हम सब अपने देश के बारे में बहुत कुछ लिखते हैं पर रहन-सहन की हालातों को देखने तो सभी जगह कमोबेश एक जैसे हैं और इसलिए सतत पढ़ते रहने के बाद जब कुछ नया पढ़ने की इच्छा होती है तो इन्हीं अप्रवासी भारतीयों का लिखा मददगार होता है. ईपत्रिकाओं में मैंने कुछ ऐसी कहानियां भी पढी हैं जिनसे पता लगता है कि सब कुछ वैसा विदेशों में नहीं है जैसा यहाँ प्रचारित किया जाता है.
अप्रवासी ब्लोगर आमतौर से फोरमों पर चल रहे विवादों से दूर रहते हैं क्योंकि इससे उन्हें अपने सहृदय ब्लोगरों से दूरी होने की आशंका रहती हैं. इसके विपरीत हम प्रवासी इस खतरे से डरते नहीं क्योंकि यहाँ एक नहीं तो दूसरा मित्र बहुत सहजता से मिल जायेगा-शहर-प्रदेश, जाति, भाषा, कार्य की प्रकृति, विचारधारा और अन्य आधारों पर हमारे पास संपर्क बनाने के बहुत आधार हैं जिन पर देश में रहते हुए हमें कभी परेशानी नहीं आती और कुछ नहीं तो जिससे विवाद किया उससे समझौता करने में भी आसानी होती है. एक बात आपने देखी होगी कि समाज में विदेशों में नौकरी पाने और जाने का बहुत आकर्षण है पर प्रवासी ब्लोगर कभी इसके लिए ऐसा लालायित नहीं दिखाई देते क्योंकि इन्हीं अप्रवासी ब्लोगरों की पोस्टों से उन्होने वहाँ के हाल समझ लिए हैं. इसलिए अनेक पोस्टों पर ऐसी टिप्पणियाँ दिखाईं देतीं है कि’हम तो सोचते थे कि यहीं होता है वहाँ भी ऐसा होता है जानकार आश्चर्य होता है’.

संत कबीर वाणी:ज्ञान रुपी हाथी की सवारी कीजिए, भौंकने पर ध्यान न दीजिये


हस्ती चढ़िए ज्ञान की, सहज दुलीचा डार
श्वान रूप संसार है, भूंकन दे झकमार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं की ज्ञान रूपी हाथी पर सहज भाव से दुलीचा डालकर उस पर सवारी कीजिए और संसार के दुष्ट पुरुषों को कुत्ते की तरह भोंकने दीजिये, उनकी पवाह मत करिये.

कहते को कहि जान दे, गुरु की सीख तू लेय
साकट जन और स्वान को, फेरि जवाब न देय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि दुनिया के लोग आलोचना और निंदा करते हैं और उनकी परवाह नहीं करना चाहिऐ. अपने गुरु की शिक्षा लेकर उस पर चलना चाहिऐ और कुछ दुष्ट लोग अगर निंदा करते हैं तो उनके भोंकने पर जवाब नहीं देना चाहिऐ.

चाणक्य नीति:समय का ख्याल करना पशु-पक्षियों से सीखें


1.जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुचाने वाले मर्मभेदी वचन बोलते हैं, दूसरों की बुराई करने में खुश होते हैं। अपने वचनों द्वारा से कभी-कभी अपने ही वाचों द्वारा बिछाए जाल में स्वयं ही घिर जाते हैं और उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जिस तरह रेत की टीले के भीतर बांबी समझकर सांप घुस जाता है और फिर दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है।

2.समय के अनुसार विचार न करना अपने लिए विपत्तियों को बुलावा देना है, गुणों पर स्वयं को समर्पित करने वाली संपतियां विचारशील पुरुष का वरण करती हैं। इसे समझते हुए समझदार लोग एवं आर्य पुरुष सोच-विचारकर ही किसी कार्य को करते हैं।
3.मनुष्य को कर्मानुसार फल मिलता है और बद्धि भी कर्म फल से ही प्रेरित होती है। इस विचार के अनुसार विद्वान और सज्जन पुरुष विवेक पूर्णता से ही किसी कार्य को पूर्ण करते हैं।जब तक बारिश नहीं आती कोयल नहीं गाती, वह समयानुकूल स्वर निकालती है।

4.पशु-पक्षी समय के अनुसार अपने क्रियाएँ करते हैं और जो मनुष्य समय का ध्यान नहीं रखते वह पशु-पक्षियों से भी गए गुजरे हैं।
5.उसी कवि की शोभा और उपयोगिता होती है जो समयानुकूल होता है। बेमौसम राग अलापना जग हँसाई कराना है।

चाणक्य नीति:देवता तो बस भावना में बसते हैं


1.जिस प्रकार फूल में गंध, तिल में तेल, लकडी में आग, दूध में घी और ईख में गुड होता है वैसे ही शरीर में आत्मा होती है यह विचार करना चाहिऐ।
2.देवता न कंठ में, न मिटटी की मूर्ति में होते हैं। वह तो केवल भावना में बसते हैं। इसलिए ही भावना ही सब कुछ है।
3.धातु, काष्ट और पाषाण की मूर्ति को भावनानुसार पूजन करने से ही भगवान की कृपा की सिद्धि होती है।
4. जो इंसान मुक्ति की इच्छा रखते हों तो उसे विषय रुपी विष को त्याग देना चाहिऐ। सरलता, पवित्रता और सत्य का अमृत की तरह पान करना चाहिए।
5.सोने में महक, ईख में फल, चन्दन में फूल, धनी-विज्ञान , दीर्घजीवी राजा क्या विधाता ने इनको नहीं बनाया। क्या ब्रह्मा की तरह कोई बुद्धि दाता न था। *
*इसका आशय यह है कि भला कहीं सोने में सुगंध होती है। ईख में फल और चन्दन में फूल नहीं होते। विज्ञान कभी धनी नहीं होता और राजा कभी दीर्घजीवी नहीं होता। विधाता ने ऐसा नहीं किया। क्या विधाता को ऐसी बुद्धि देने वाला कोई नहीं मिला था। सीधा आशय यह है की विधाता ने सब सोच समझकर बनाया है। उसकी महिमा इसलिए अपरंपार मानी जाती है।

रहीम के दोहे:हृदय कुएँ से अधिक गहरा नहीं होता


गुन ते लेत रहीम जन, सलिल कूप ते काढि
कूपहु ते कहुं होत है, मन काहु को बाढि

कविवर रहीम कहते हैं की जिस प्रकार रस्सी के द्वारा कुएँ से पानी निकल लेते हैं, उसी प्रकार अच्छे गुणों द्वारा दूसरों के ह्रदय में अपने लिए प्रेम उत्पन्न कर सकते हैं, क्योंकि किसी का हृदय कुएँ से गहरा नहीं होता।

कविवर रहीम कहते हैं की अपना प्रभाव और सम्मान सबको अच्छा लगता है। अपने शरीर की सुन्दरता आती है तो जाती भी है। जैसे ह्रदय पर पयोधर सुन्दर प्रतीत होते हैं परन्तु अन्यत्र रसौली भी होती है जो अच्छी नहीं लगती।

भावार्थ- मनुष्य में गुण और अवगुण दोनों ही होते हैं और समय पर उनका प्रकट होना आवश्यक भी है। अपना सम्मान अच्छा लगता है पर कभी अपमान का भी सामना करना पड़ता है। देह और मुख पर सुन्दरता होती है तो अच्छी लगती है पर अगर शरीर के किसी हिस्से पर रसौली है तो बहुत बुरी लगती है। ऐसे में हमें दुख-सुख में कभी विचलित नहीं होना चाहिऐ।

बसन्त पंचमी की समस्त साथियों, पाठकों और मित्रों को बधाई

दीपक भारतदीप

विदुर नीति:अकेले वृक्ष के बलवान होने पर भी आंधी उसे गिरा देती है


*जलती लकडियाँ अलग-अलग होने पर धुआं और एक साथ होने पर अग्नि को प्रज्जवलित करतीं हैं इसी प्रकार फ़ुट होने पर लोग कष्ट उठाते हैं और एक होने पर सुखी होते हैं।
*यदि वृक्ष अकेला है तो बलवान, दृढ़ और बृहद होने पर भी एक ही क्षण में आंधी के द्वारा बलपूर्वक शाखाओं सहित धराशायी किया जा सकता है।
*जो बहुत बडे वृक्ष एक साथ रहकर समूह में खडे रहते हैं वह एक दूसरे को सहारा देकर बहुत शक्तिशाली तूफ़ान का भी सामना करते हैं
*समस्त गुणों से संपन्न होने पर भी शत्रु अपनी ताकत के अन्दर समझते हैं जैसे अकेले वृक्ष को वायु किन्तु परस्पर मेल होने से एक दूसरे के साथ रहने वाले लोग ऐसी ही शोभा प्राप्त करते हैं जैसे तालाब में कमल।

रहीम के दोहे:सज्जन सौ बार रूठे तो भी मनाएं


जैसी जाकी बुद्धि है, तैसे कहैं बनाय
ताकौं बुरो न मानी, लें कहाँ सो जाय

कविवर रहीम जी कहते हैं कि जिस मनुष्य की जैसी बुद्धि है वह उसके अनुरूप ही तो काम करता है। उस मनुष्य का बुरा मत मानिए क्योंकि वह और बुद्धि कहाँ लेने जायेगा।

टूटे सुजन मनाइये, जौ टूटे सौ बार
रहिमन फिरि फिरि पोहिए, टूटे मुक्ताहार
कविवर रहीम कहते हैं कि जिस प्रकार सच्चे मोतियों का हार टूट जाने पर बार-बार पिरोया जाता है, उसी प्रकार यदि सज्जन सौ बार भी नाराज हो जाएं तो भी उन्हें सौ बार ही मना लेना चाहिऐ क्योंकि वह मोतियों की तरह मूल्यवान होते हैं।

सच का भला कौन साथी होता-कविता


अगर अकेले चल सकते हो
जिन्दगी की राह पर
तो सत्य बोलो जो
हमेशा कड़वा होता
अगर अपने इर्द-गिर्द जुटाना चाहते हो
लोगों की भीड़ तो
झूठ बड़ी सफाई से बोलो
जो हमेशा मीठा होता

यहाँ सब सच से घबडाए
भ्रम की छाया तले
जिंदा रहने के आदी हैं लोग
सर्वशक्तिमान के नाम पर
बताये संदेशों की दवा बनाकर
किया जाता है उसका दूर रोग
पर सच यह कि
भ्रम का कोई इलाज नहीं होता
जिसने जीवन दिया
उसी सर्वशक्तिमान के क्रुद्ध होने का भय
दिखाते कई सयाने
तंत्र-मन्त्र से लगते दर्द भगाने
उनको ढोंगियों के चंगुल से
कभी कोई बचा नहीं सकता
जाली धंधे का जाल भी
इतना कमजोर नहीं होता

मन का अँधेरा आदमी को
खुशी की खातिर कहाँ-कहाँ ले जाता
मिलता रौशन चिराग का पता
वहाँ अपनी देह खींच ले जाता
जिन पर हैं जमाने के दिल को रौशन
करने का ठेका
वह भी नकली चिराग बेच रहे हैं
पुरानी किताबों के संदेशों पर
चुटकुलों के पैबंद लगाकर
लोगों से पैसे अपनी और खींच रहे हैं
सच कह पाना लोगों से कठिन है
क्योंकि उसमें आदमी अकेला होता
सच का भला कौन साथी होता

जहाँ ले जाता मन-कविता साहित्य


दिल में हो कड़वाहट तो मीठा कैसे लिखें
उदासी हो दिल में, चेहरे से हँसते कैसे दिखें
कितना कठिन अपने को छिपाना मन की आँखों से
जैसे अपने को लगें वैसे ही दूसरों को भी दिखें
जमाने के साथ कब तक चल सकती है चालाकी
कब तक अपने दिल का हाल छिपा कर लिखें
कहीं कोई आस नहीं, फिर भी दिल निराश नहीं
जब तक चल रही सांस, कैसे जिन्दगी से हारते दिखें
कभी अपने कागज़ पर लिखे शब्द थके हुए लगते हैं
हम रुक जाते, पर फिर वह शेर की तरह दौड़ते दिखे
कहाँ ले जाएं इस जमाने से आहत अपना मन
रुकने की सोचें, अगले ही पल उसके कहे पर चलते दिखें

महिला जाग्रति के लिए-हास्य कविता


प्रदूषण पर आयोजित कार्यक्रम में वह विद्वान
बोल रहे थे
”घर से कितना भी सजकर
सड़क पर खुले में जाएं
तो गाड़ियों के धुएं में
सबके चेहरे काले हो जाएं
अगर जाएं बंद गाडी में
करें अपना सफर पूरा तो
लोगों को अपनी सुन्दरता पर
ध्यान कैसे दिलाएं
दुनिया में फैले प्रदूषण से
महिलाओं को खास परेशानी है
हम चाहते हैं कि इस समस्या को सब
मिलकर सुलझाएं”

कार्यक्रम की समाप्ति पर
वह आयोजकों से बोले
देखो मैं महिलाओं की समस्याओं को ही
उठाता हूँ और अब मेरा नाम
महिला जागृति के लिए
जहाँ भी पुरस्कार मिलता हो
वहाँ जरूर भिजवाएं’
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रहीम के दोहे:जहाँ ईर्ष्या की गाँठ है वहाँ आनंद रस नहीं


जहाँ गाँठ तहँ रस नहीं, यह रहीम जग होय
मंड़ए तर की गाँठ में, गाँठ गाँठ रस होय

कविवर रहीम कहते हैं कि यह संसार खोजकर देख लिया है, जहाँ परस्पर ईर्ष्या आदि की गाँठ है, वहाँ आनंद नहीं है. महुए के पेड़ की प्रत्येक गाँठ में रस ही रस होता है वे परस्पर जुडी होतीं हैं.

जलहिं मिले रहीम ज्यों, कियो आपु सम छीर
अंगवहि आपुहि आप त्यों, सकल आंच की भीर

कविवर रहीम कहते हैं कि जिस प्रकार जल दूध में मिलकर दूध बन जाता है, उसी प्रकार जीव का शरीर अग्नि में मिलकर अग्नि हो जाता है.

सुबह और शाम का दृश्य-लघुकथा


वह एक गृह स्वामी की तरह अपने पोर्च के नीचे खडा था . कालोनी का चौकीदार पैसे मांगने आया और बोला-”बाबूजी नमस्कार.
उसने अपने पहले दोनों हाथ जोड़े और अपना एक हाथ मांगने के लिए बढाया.
उसके जेब में दस, बीस, पचास और सौ के नोट थे, पर उसे तीस रूपये देने का मन नहीं हुआ और बोला-”यार, अभी हमें वेतन नहीं मिला. जब मिलेगा तो ले जाना.
वह चला गया. घर पर काम करने वाले बाई आई और काम कर जब जाने वाली थी तब बोली-”बाबूजी, आज हमें अपने दो सौ रूपये दे दीजिये.हमें अपने बेटे के लिए फीस भरनी है.”
यह उसके जेब में रखी रकम से कोई कम नहीं थी फिर भी उसने कहा-”अभी वेतन नहीं मिला. जब मिल जायेगा तो दे दूंगा.
वह चली गयी. कुछ देर बाद सड़क पर झाडू लगाने वाला आया और उसने नमस्कार की. उसे हर महीने बीस रूपये देने होते थे. उसे भी उसने वही जवाब दिया.
पत्नी ने कहा-”इतना पैसा तो अपने पास होता है, फिर आपने दिया क्यों नहीं? मुझसे ही लेकर देते.”
उसने कहा-”ठीक है. कल दे देंगे. क्या जाता है. कौनसा पहाड़ टूट पड़ रहा है. सुबह-सुबह सब भिखारियों की तरह मांगने चले जाते हैं. मुझे तो उनकी शक्ल देखकर ही नफरत होती है.

शाम को उसने अपना काम समाप्त किया और अपना वेतन मांगने के लिए प्रबंधक के पास गया. उसका जवाब था-”
कल ले लेना.”
”आज क्यों नहीं?आपके यहाँ तो पैसा हमेशा रहता है.”
प्रबंधक ने कहा-”हाँ, पर आज मुझे जल्दी जाना है, फिर आज मेरा असिस्टेंट भी नहीं है. अपनी तनख्वाह लेकर चला गया. उसे खरीददारी करनी थी.”

उसे बहुत गुस्सा आ गया और बोला-”क्या हम मेहनत नहीं करते? उस क्लर्क को जल्दी खरीददारी करनी थी पर हम क्या करेंगे?”
प्रबंधक ने कहा-”चिल्लाओ नहीं. वह मालिकों का रिश्तेदार है, अगर किसी ने सुन लिया तो इस नौकरी से भी जाओगे.
वह गुस्से में घर आया और अपनी पत्नी के सामने प्रबंधक और क्लर्क को गाली देना लगा गो वह बोली-”सुबह हमने क्या किया था? वही उन्होने हमारे साथ किया. अगर वह छोटे लोग कल तक इन्तजार कर सकते हैं तो फिर हम क्यों नहीं?”

वह हतप्रभ खडा था. देर रात तक सोते समय सुबह और शाम के दृश्य उसके सामने घूम रहे थे.

कमेन्ट ही रजाई का काम कर जायेगी-हास्य कविता


आकर फंदेबाज बोला
”दीपक बापू
इस ठंड में क्या
कीबोर्ड पर उंगली नचा रहे हो
लो लाया हूँ बोतल
तुम तो अब हो गए हो काईयाँ
शराब का नशा छोड़
ब्लोग पर पोस्ट पर लगे कमेन्ट के
पैग पीकर
जेब के पैसे बचा रहे हो’

सुनकर उखड़े दीपक बापू पहले
फिर सिर पर रखी टोपी घुमाते बोले
‘कह गए बुजुर्ग
अधिक नशा करना ठीक नहीं
साथ ही यह भी कहा है कि
अधिक खर्च करना ठीक नहीं
ब्लोग पर पोस्ट लिखने का नशा भी
सिर पर चढा हो
तो फिर शराब क्या काम करेगी
डबल हो गया नशा तो हैरान करेगी
तुमने बताया है तो देखो ठंड के मारे
हमारे हाथ काँप रहे हैं
वरना हमें क्या पता कि
कल पारा जीरों पर जायेगा
तुम घर में ही घुसे रहना
यहाँ आकर हमें खबर न करना
वरना पोस्ट लिखने का नशा उतर जायेगा
यह बोतल भी ले जाओ
ठंड से यह क्या बचायेगी
एकाध कमेन्ट टपक पडी तो
उसकी गर्मी ही रजाई का काम कर जायेगी
अगर कमेन्ट नहीं आयी तो
चौपालों पर जाकर ढूंढेंगे
अंतर्जाल का कोई गरम पोस्ट वाला ब्लोग उसी पर
फड़कती कमेन्ट लगाकर
लिखेंगे कोई हास्य कविता
जो हमारी क्या सब साथियों को
सर्दी में भी गर्मी का अहसास कराएगी
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जल्दी टीवी बनवा लेना-हास्य कविता


घर में घुसते ही बाप ने बेटे से कहा
”बेटा तुम्हारी मां के कमरे में रखा टीवी
खराब हो गया है
अगर तुम बचना चाहते हो
गृहयुद्ध से तो आज
अपने कमरे में रखे टीवी के
प्लग में गडबडी कर देना
ताकि सास के मन को भी हो जाये तसल्ली
आज खामोश रहे
कल छुट्टी के दिन मां का टीवी
किसी भी तरह बनवा लेना
वैसे भी सास-बहु के सीरियल की
भयानक आवाजे सुनते
और बीभत्स दृश्य देखते
बोर हो गया हूँ
पर फिर भी टीवी जल्दी बनवा लेना
नहीं तो जो अभी तक
सीरियल में चल रहा है
उसे अपने घर के परदे पर
देखने का मन बना लेना
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एक सामान्य पहल से अधिक कुछ नहीं-आलेख


भारत में हिन्दी ब्लोग अभी शैशव काल में है और ब्लोगरों की संख्या देखें तो अपने देश के विशाल क्षेत्र को देखते हुए अभी भी नगण्य है, और जैसे जैसे इसका प्रचार होगा वैसे-वैसे ही इसमें बदलाव आयेंगे और उस समय जो स्वरूप होगा जिसकी कल्पना कोई इस समय तो नहीं कर सकता
किसी समय नारद हिन्दी ब्लोग का एकमात्र ऐसा फोरम था जिस पर सब ब्लोग एकत्रित होते थे, और दूसरे फोरम बनाने के बावजूद लोग उस पर नहीं जा रहे थे. एक बार नारद के तीन दिन तक खराब रहने के बाद भी लोग उस पर नहीं जा रहे थे तब मैंने एक पोस्ट डाली थी ”नारद का मोह न छोडें पर दूसरी चौपालों पर भी जाएं”. इसका असर हुआ और लोग दूसरी चौपालों पर जाना शुरू हुए. आज भी मेरे तरह कुछ लोग हैं जिनको नारद से मोह है पर उसकी ब्लोगवाणी से प्रतिस्पर्धा है जिसे मेरे लेख के बाद पाठक मिले तो ऐसे कि वह इस समय ब्लोगरों का पसंदीदा फोरम है.

अगर यह चौपाल वाले दूसरों की खबर रखते हैं तो दूसरों को भी इनकी खबर रखनी चाहिए. नारद और चिटठा जगत आपसे में जुड़ें फोरम हैं. आप कोई नया ब्लोग बनाएं और उसे चिटठा जगत पर पंजीकृत करें तो वह उसके अलावा नारद और हिन्दी ब्लोग्स पर अपने आप आ जायेगा पर ब्लोग वाणी पर आपको पंजीकृत कराना पडेगा. जो लोग चिट्ठाजगत के परिवर्तनों से चिंतित हैं उन्हें बता दूं कि इस तरह की कोई बात नहीं है. नारद अपने ऐसे बदलाव नहीं करेगा क्योंकि वह जानते हैं कि वह किसी काम का नहीं है. ब्लोगवाणी के संचालक कभी भी ऐसे परिवर्तन नहीं करेंगे क्योंकि इसका सीधा मतलब है नारद के पास अपने ब्लोगर भेजना.
नारद के कर्णधार इस समय अपने पास पाठक खींचने के लिए जूझ रहे हैं, वह चिट्ठाजगत के परिवर्तनों का प्रचार कर रहे हैं पर ब्लोगवाणी शायद ही इसमें आयें.

कल सर्वश्रेष्ठ चिट्ठाकार २००७ के लिए किया गया एलान इसी का हिस्सा है. नारद के फोरम से ही चलाया गया है-ऐसा मुझे लगता है. उसका एक कर्णधार ही इससे सीधा जुडा हुआ है. हालांकि इसके एक कर्णधार का मत रहा है कि वेब साईट को ब्लोग नहीं माना जा सकता है, पर इस राय से हटने के अलावा उनके पास कोई रास्ता नहीं है. उन्होने कुछ पुराने ब्लोगरों के साथ ऐसे नये ब्लोगर जोड़े हैं जो उनके साथ एक मित्र की तरह पहले से ही हैं .

बहरहाल ऐसे बहुत से पुरस्कार बनेंगे और बटेंगे, इनसे विचलित होने की बजाय नये ब्लोगर अपने कौशल का प्रदर्शन करते हुए आगे बढ़ें. हमें इन फोरमों के आपसी द्वंद में नहीं जाना है क्योंकि इसके लोग बडे शहरों में रहते हैं और आपस में मित्रों की तरह ही हैं. इनकी लाबियाँ है और इसमें तो निकट के लोग ही हो सकते हैं. अभी पिछले पुरस्कार के समय भी विवाद उठे थे और इसमें भी उठेंगे पर इतने प्रभावशाली ढंग से नहीं क्योंकि इसमें कई ऐसी चीजों का ध्यान रखा गया है जो विवाद उठाने वाले लोग हैं वह डरेंगे-दबे स्वर में तो कल ही कुछ पोस्ट और कमेन्ट देखी थी. अगर आप इनके नामों और उनके सक्रियता को देखें तो नारद अब भी वहीं हैं जहाँ पहले था. वरिष्ठ वेब साईट धारकों को आगे कर वह ऐसा समझ रहे हैं कि कोई इस चालाकी को नही पकडेगा और पकडेगा तो कहेगा नहीं. मैं भी लिख रहा हूँ क्योंकि मैं जानता हूँ कि कोई मुझसे सवाल नहीं करेगा क्योंकि मेरे पास और भी सवाल हैं. एक धुर विरोधी नाम के ब्लोगर थे और कहते हैं कि वह गुस्से में ब्लोग जगत से चले गए पर मेरे के मित्र ब्लोगर से जब भेंट हुई (वह अकेले ऐसे ब्लोगर हैं जिनसे मैं मिला हूँ) तो पता लगा कि वह एक छद्म नाम था और वह असली नाम से कोई वेब साईट चला रहे हैं-और मेरा मानना है कि कई लोग ऐसे होते है कि लगता है अब झांसे में आये पर आते नहीं है. इन फोरम वालों का द्वंद है चलता रहेगा. इसमें रूचि लें पर अपने लक्ष्य से नहीं भटकें. यह इस सम्मान का खूब प्रचार करेंगे और ऐसा दिखाएँगे कि जैसे कोई बहुत बड़ी उपाधि है पर उस पर ध्यान देना चाहे तो वोट डाल देना पर कोई टेंशन मत लेना. यह भी बता दूं इनकी यह योजना हाल ही में बनी हैं क्योंकि कुछ नये नाम लोगों की जुबान पर चढ़ते जा रहे हैं तो इन लोगों ने सोचा कि अपने पुराने लोगों को पुन: सक्रिय किया जाये ताकि वह उनके चौपाल पर आयें, और हम जैसे लोग तो वैसे ही जाते है और ऐसे पुरस्कारों में रूचि नहीं है जो अपने ही ब्लोगर वर्ग के लोगों से मिले क्योंकि बड़ा तो बाहर सिद्ध होना है यहाँ क्या? कुल मिलाकर एक दम सामान्य पहल है. आज मेरा इस पर हास्य कविता लिखने का मन था पर उसे अब मैंने स्थगित कर दिया क्योंकि इसमें दम नजर नहीं आया.

संत कबीर वाणी:माया के स्वरूप को भी कोई नहीं जानता


माया मया सब कहैं, माया लखै न कोय
जो मन में ना उतरे, माया कहिए सोय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि माया-माया कहकर उसके पीछे तो सब पड़े हैं पर उसका सही स्वरूप कोई नहीं जानता. सभी एक दूसरे को सन्देश देते हैं कि माया के चक्कर में मत पडो पर पर सभी उसके इर्द-गिर्द जिन्दगी भर घूमते हैं.

भावार्थ-आपने देखा होगा कि सब लोग एक दूसरे को तमाम तरह के उपदेश देते हैं कि पैसे से सब कुछ नहीं होता है और धर्म-कर्म भी करना चाहिए और दिखाने के लिए भक्ति भी करते हैं पर उनके मन से माया का मोह नहीं निकलता और भगवान् का नाम लेते हैं पर उनको मन में स्थान नहीं दे पाते.

संत कबीर वाणी:जो दंभ रखता है वह साधू नहीं


जौन चाल संसार के जौ साधू को नाहिं
डिंभ चाल करनी करे, साधू कहो मत ताहिं

संत शिरोमणि कबीरदास जीं कहते हैं कि जो आचरण संसार का वह साधू का हो नहीं सकता। जो अपने आचरण और करनी का दंभ रखता है उसको साधू मत कहो।

सोई आवै भाव ले, कोइ अभाव लै आव
साधू दौऊँ को पोषते, भाव न गिनै अभाव

कोई भाव लेकर आता है और कोई अभाव लेकर आता है। साधू दोनों का पोषण करते हैं, वह न किसी के प्रेम पर आसक्त होते हैं और न किसी के अभाव देखकर उससे विरक्ति दिखाते हैं।

‘कबीर’ सो धन संचिये, जो आगै कू होइ
सीस चढाये पोटली, ले जात न देख्या कोइ

उसी धन का संचय करो, जो आगे काम आए, तुम्हारे इस धन में क्या रखा है। गठरी सिर पर रखकर किसी को भी आज तक ले जाते नहीं देखा।

कूड़े में भी सोना हो सकता है-हास्य कविता


अभी तक दे रहे थे पहरा
तकनीकी ज्ञान का डंडा लेकर
इस घर के पहरेदार बनकर
करते रहे अपने मन की
उस समय कहते यहाँ सोना है
कभी कोई विचार नहीं आया
जो हटा दिया गया
उनको अपने काम से तो
बरस रहे हैं सब पर
कहते हैं ”मैंने सब छोड़ दिया
वहाँ तो सब कूडा है
बदबू आती है वहाँ
खडा नहीं रह सकता कभी तनकर”

कहै दीपक बापू
होता रहता है यार
जब हमें कही से भागना होता है
हम भी यही कहते हैं
पर कोई शालीन शब्द गढ़ते हैं
कह गए चाणक्य महाराज
”कूड़े में भी सोना हो तो उठा लेना चाहिए
कभी नहीं रहना चाहिए मदांध बनकर’
हम तो महापुरुषों की बात
मानते और सब जगह जाते
कूड़े में भी सोना हो सकता है
कोई छोटा कभी हो सकता है
सबके सामने खडा बड़ा आदमी बनकर
नोट-यह एक काल्पनिक रचना है और इसका किसी व्यक्ति या घटना से कोई लेना देना नहीं है और किसी से इसका कोई लेना-देना नहीं है

स्वेट मार्डेन-अपने को रोगी बताकर अपना रोग बढाओगे


1.निरंतर सोच-विचार भी मनुष्य को क्षति पहुंचाता है. अगर आप हमेशा अपने शरीर में रोग के लक्षणों पर ही उधेड़ बुन करते रहें तो आप निश्चित रूप से रोग ग्रस्त जो जायेंगे. आप वहमी कहे जाने लगेंगे.

2.बहुत से लोग रोग ग्रस्त होते हुए भी अपने को रोगी नहीं मानते. अत: वे जल्दी ही रोग मुक्त हो जाते हैं. उनका आत्मविश्वास उन्हें निरोगी बना देता है.

3.प्राय: यह देखा जाता है की लोग अपने रोग के लक्षणों और अपनी दुर्बलताओं को बढा-चढाकर बताते हैं. शायद वे समझते हैं हों की इससे उन्हें लाभ मिलेगा. मगर नहीं, इससे उनके रोग एवं क्षीणता में वृद्धि होती है. वे और ज्यादा दुर्बल हो जाते हैं. निरंतर सोच-विचार व्यक्ति को विक्षिप्त कर देता है.

रहीम के दोहे:जागते हुए अनीति करे उसे शिक्षा देना अनुचित


जलहिं मिले रहीम ज्यों किल्यो आप सम छीर
अंगवहि आपुहि त्यों, सकल आंच की भीर

कविवर रहीम का कहाँ है की जिस प्रकार जल दूध में मिलकर दूध बना जाता है, उसी प्रकार जीव का शरीर अग्नि में मिलकर अग्नि हो जाता है.

जानि अनीति जे करै, जागत ही रह सोइ
ताहि सिखाइ जगाईयो, रहिमन उचित न होइ

समझ-बूझकर भी जो व्यक्ति अन्याय करता है वह तो जागते हुए भी सोता है. कवि रहीम कहते हैं की ऐसे इंसान को जाग्रत रहने की शिक्षा देना भी उचित नहीं है.

चजई-अक्ल का करो व्यायाम, लगाओ चालाकियों पर विराम-हास्य कविता


चतुरों के होते चार कान
सुने किसी की नहीं
हमेशा अपनी छेड़ें तान
ज्ञान, विज्ञान, पत्रकारिता, उद्योग और व्यापार में
जहाँ भी गए
मात खा जाते हैं हम
इधर से बचाएँ उधर से पकड़ लेते कान
हम ठहरे अल्हड़ और मस्त
सब जगह फ्लॉप हो जाते थे
वह दूसरों को टोपी पहनाकर
खुद भी हिट हो जाते थे
हम झेलते अपमान
कहते हैं कि काठ की हांडी
सिर्फ एक बार ही चढ़ती
पर उनकी चतुराई होती है ऐसी कि
कई बार बीरबल की खिचडी की तरह पकती
सहृदय लोगों को नहीं होता इसका भान

कहै दीपक बापू
सब करो अक्ल का व्यायाम
सुबह उठकरलगाओ हमेशा ध्यान
तो दुनिया में हर धोखे का आभास
तुम्हें पहले ही हो जायेगा
हम तो हैरान होते हैं जब लोग
हो जाते हैं ठगी का शिकार
अपनी अक्ल को नहीं करते
दूसरे का मान लेते हैं सही विचार
हम भी रहे हमेशा चालाकियों का शिकार
पर अब पल-पल रहते हैं सजग
अपने शब्दों से खेलते हैं
न गाली देना न धमकाना
बस व्यंजना विधा में
हास्य कविता ही बरसाना
तुम भी सीख लोगे ऐसी शब्दों की जादूगरी
जब लगाओगे ध्यान
तुम्हारा भी लोग करेंगे सम्मान
———————————–

नोट-यह काल्पनिक हास्य रचना है. इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है.

सस्ती कार आने पर ही होगी शादी और सगाई-हास्य कविता


एक पडोसन दूसरी पडोसन के पास पहुँची
और बोली
‘बहिन तुम्हारे छोरे के लिए
एक रिश्ता मैं हूँ लाई
जल्दी करो सगाई
तुमने कहा था मोटर साइकिल चाहिए
दहेज़ में
वह तुम्हें मिल जायेगी
अगले महीने तक ही मुहूर्त हैं
कर लोग जल्दी-जल्दी
फिर न शादी होगी न सगाई’

दूसरी बोली
‘मुझे अब जल्दी नहीं है
अब आ रही है कुछ महीने में
सस्ती कार
उसके आने पर ही करूंगी
अपने लड़के की शादी का विचार
मोटर साइकिल का चला जायेगा ज़माना
अब तो है मेरे लड़को को कार चलाना
मेरे पति मुझसे कह गए
तब तक मुद्रा स्फीति भी बढ़ जायेगी
इसलिए मैंने तय किया है कि
सस्ती कार आने पर ही करूंगी
अपने लाडले की सगाई.’

क्रिकेट में फिल्म जैसा एक्शन


फिल्म चल रही कि क्रिकेट
हो रहा है मतिभ्रम
बैट-बाल का खेल होते-होते
एक्शन सीन आ जाता है कि
फिल्म वालों को भी आये शर्म
जिसे फिल्म से परहेज जो
वह भी अपने खिलाड़ी को पिटते देख
हो जाता गर्म

कहैं दीपक बापू
विश्वास तो पहले भी नहीं था
अब भी नहीं होता
फिल्म वालों की संगत जब से
क्रिकेट वालों से हुई है
पटकथा लेखकों के सहारे
मैच में एक्शन चलता लग रहा है
एक्शन की वजह से
फिल्में देखना बंद कर दीं
पर क्रिकेट में भी उसका रंग
चढ़ता लग रहा है
कोई पटकथा लिख रहा है
पीछे बैठकर
जो जानता है मैच और कहानी का मर्म
वरना ऐसे कैसे हो जाता है
जब लगता है कि बस अब होगा
इस श्रंखला का दुखांत अंत
पर हो जाता है सुखांत
जो गरम होकर प्रहार करने की
मुद्रा दिखाता है
अचानक हो जाता है नरम
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पुराने रिकार्ड के सहारे अब नहीं चलेगा नाम-हास्य कविता


कितने दिनों के बाद
प्राचीनतम बल्लेबाज सह्बाग ने
बना शतक और अब
कगारुओं पर पर बरस रहे
तब तक मुहँ पर ताला जब
बल्ला खामोश
लोग अभी बडे मैच में उनके रनों को तरस रहे

कहै दीपक बापू
नाम ने उनका कंगारू
उनके लिए एक बकनर क्या
कई अंपायर उस जैसा बनने के लिए तरस रहे
पर अभी भी तुम्हारा इम्तहान बाकी है
छोटे मैच का शतक तुम्हें हीरो नहीं बनाता
बडे मैच में महीनों हो गए
रन बनाने में तुम्हारा नाम नहीं आता
जुबान से गर्जना होता आसान
बाल खेलने के लिए
हाथों और पांवों कर जोर काम आता
तुम्हारे ‘फुटवर्क’ में अभी ढेर दोष नजर आता
कहीं फिर न हो जाओ टाँय-टाँय फिस्स
अपना मुहँ चलाते रहो
पर अभी बाकी है
तुम्हारे लिए रन बनाने का काम
पुराने रिकार्ड के सहारे अब नहीं चलेगा नाम

चजइ-अंतर्जाल पर भी होंगे भेड़ की खाल में भेडिया


हिन्दी का परचम फहराने का
उनका तो बहाना है
बस उनको अपनी दुकान ज़माना है
बोलने में शब्द तो बह जाते
पर लिखते हुए हाथ काँप जाते
पर अपने लेखक होने का अहसास कराना
कहीं अखबारों से कटिंग ढूंढ कर लाते
कही उठा लाते किसी का छपा अफ़साना

जब कहीं हिन्दी के नाम पर
बनते पुरस्कार तो मुहँ में लार आ जाती
जब मिलते नहीं देखते तो
निर्णायक की कुर्सी पर बुरी नजर जाती
कहीं न कहीं तो ढूंढना है उनको ठिकाना
लोगों को किसी तरह होता है भरमाना

अखबार और पत्रिकाओं से
चलकर अंतर्जाल पा भी लाये वह जमाना
दुनिया भर के वाद और नारे
उनके भी खून में हैं
चाहते हैं किसी तरह उसे छिपाना
हिन्दी को अंतर्जाल पर बढ़ाने के नाम पर
सर्वश्रेष्ट ब्लोगर के लिए
चुन लेंगे अपने-अपने लोग
पुरस्कार वजनदार लगे इसलिए
हिट ब्लोगरों को भी होगा जरूरी फ्लॉप दिखाना

कहैं दीपक बापू
अंतर्जाल पर लिखने वाले ब्लोगरों में भी
भेड़ की खाल में भेडिया
न हो यह कैसे हो सकता है
छल-कपट के लिए
गढ़ लेते हैं तर्कों का बहाना
सो डरना या विचलित नहीं होना
बंटवाने दो अपनों-अपनों को पुरस्कार
अपना मन मैला मत करो
हमें तो हिन्दी का है परचम फहराना
जिन्होंने छेडा है हमारे ब्लॉग का डंडा
उनके ब्लॉग तो वैसे ही हैं अंडा
हमें तो चलते जाना है
माँ सरस्वती ने सौंपा है
शब्दों का खजाना
उसे अपने दोस्तों पर बरसाते जायेंगे
उनकी करनी पर ही
अब हास्य कविता लिखते जायेंगे
उन्हें पुरस्कार मिलते रहेंगे
हमें मिलेगा हास्य कविता लिखने का बहाना

नोट-यह काल्पनिक हास्य रचना है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका लेना-देना नहीं है अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाए तो वही इसके लिए जिम्मेदार होगा.

आसमान से अब फ़रिश्ते नहीं आते


आसमान से अब फ़रिश्ते नहीं आते
विचार खुले होना अच्छा है
पर आंख्ने भी खुली रखना
यकीन करना अच्छा है
पर कदम-कदम पर है
धोखे भीं हजार हैं
अपना हर कदम
सतर्कता से रखना

सुन्दर शब्दों का जाल
फैलाया जाता है चहूं ओर
अर्थहीन लाभ दिखाए जाते है
जिनका नहीं होता कहीं ठौर
शिकारी अब ऐसा जाल बिछाते हैं
पंक्षी बिना दाना डाले फंस जाते हैं
तुम शिकार होने से बचना

कहीं एक के साथ एक फ्री का नारा
कहीं भारी भरकम गिफ्ट का नज़ारा
कोई करता हैं भारी छूट का वादा
कोई बताता अपने ही लुटने का aaj
खरीदने निकलो बाजार में तो तुम भी
एक सौदागर बन जाना
अपनी नज़र पैनी रखना

कहैं दीपक बापू
अब आसमान से नहीं आते
ऐसे फ़रिश्ते
जो दूसरे को मालामाल कर दें
लोगों के झुंड के झुंड जुटे हैं
अमीर बनने के लिए
वह ऐसे नही है
किसी दूसरे के लिए कमाल कर दें
तुम अपना ईमान नहीं छोड़ना
अपने ख्वाबों को सच करने की
जंग खुद ही जीतने की बाट जोहना
किसी दूसरे के दिखाए सपने में
अपनी जिन्दगी फंसाने से बचना
यहां कोई ख़्याल से फ्री दिखता है
किसी का माल फ्री बिकता है
कोई फ्री में लिखता है
पर यहां कुछ फ्री नहीं है
सिवाय तुम्हारी जिन्दगी के
इसे फ्री में बेकार करने से बचना
——————-

जो बीस में नहीं चला उसे सौ में चलाना आसान नहीं है


इधर-उधर की बात करते जाओ
लोगों का ध्यान बांटते जाओ
जो नोट बीस में नहीं चलता
उसे एक सौ मैं चलाना आसान नहीं है
एक दो आदमी को भ्रम में
डालकर खोटा सिक्का चलाना सहज है
पर जमाने भर को नचा दे
जाने और माने तभी
जब ऐसी कहानी लिखकर बताओ

एक फिल्म के हिट होने पर
उसका हीरो भी हिट हो जाता है
दूसरा टापता रह जाता है
पर क्रिकेट खेल ही ऐसा है
जिसमें एक कमाता है बीस का नोट
पर जो कौडी का नहीं उसकी आड़ में
दूसरा खिलाड़ी भी
सौ रूपये का हकदार हो जाता है
कहते रहो बीस का नोट सौ में नहीं चलेगा
पर वह तो चला रहे हैं
किस्से और कहानी गढ़कर
तुम में दम है तो चलाकर बताओ

जब बन्दर क्रिकेट खेलने लगे


मैदान पर खेलते हुए
बोलर ने बैट्समैन से कहा ‘बन्दर’
बैट्समैन ने कहा-”तू होगा बन्दर”
दोनों में झगडा हो गया
साथियों ने सुलझाने की कोशिश
पर नहीं रहा उनके बस के अन्दर
अचानक एक खिलाड़ी चिल्लाया
”भागो, देखो आ रहे हैं झुंड बनाकर
जब हम खेल रहे थे
तब कुछ देख रहे थे बन्दर
और अब झुंड बनाकर लड़ने आ रहे हैं
अब हमें नहीं छोडेंगे बन्दर

सब भाग गए वहाँ से
सब बंदरों ने जमा लिया अपना खेल
बेट-बल्ला लेकर खेलने लगे
एक बन्दर ने कहा
”क्या किसी आदमी को अंपायर बना लें
दूसरा बोला
”हमें आदमी की तरह क्रिकेट नहीं खेलना
बेईमानी तो कभी देखी भी नहीं
और वह करता है खूब
उसमें भी कुछ को दिखता नहीं
अंपायरिंग क्या कर पायेंगे
भला क्या हम उनके लिए पहले
आंखों का डाक्टर जुटा पायेंगे
फिर कब खेल पायेंगे
अभी तो मौका मिला है तो खेल लो
हम आदमी नहीं बनेंगे
रहेंगे तो बन्दर”

धर्म के रास्ते


दुनिया से ऊबकर लोग
धर्म के रास्ते जाते
ढूंढते ठिकाने वही
जहाँ तख्तियाँ लगी होती
सर्वशक्तिमान के नाम की
पीछे अधर्म के होते अहाते
अपने अन्दर बैठे शख्स को देख पाते
तो शायद जान पाते
जिन्दगी केवल पाते रहने का नाम नहीं
जिस पर अपने जीवन के सभी पल लुटाते
————————————-

शांति लाने का दावा
——————–

बारूद के ढेर चारों और लगाकर
हर समस्या के इलाज के लिए
नये-नयी चीजें बनाकर
आदमी में लालच का भूत जगाकर
वह करते हैं दुनिया में शांति लाने का दावा

बंद कमरों में मिलते अपने देश की
कुर्सियों पर सजे बुत
चर्चाओं के दौर चलते
प्रस्ताव पारित होते बहुत
पर जंग का कारवाँ भी
चल रहा है फिर भी हर जगह
होती कुछ और
बताते और कुछ वजह
जब सब चीज बिकाऊ है
तो कैसे मिल सकता है
कहीं से मुफ्त में शांति का वादा
बहाने तो बहुत मिल जाते हैं
पर कुछ लोग का व्यवसाय ही है
देना अशांति को बढावा

एक दुकान से खरीदेंगे शांति
दूसरा अपनी बेचने के लिए
जोर-जोर से चिल्लाएगा
फैलेगी फिर अशांति
जब फूल अब मुफ्त नहीं मिलते
तो बंदूक और गोली कैसे
उनके हाथ आते हैं
जहाँ से चूहा भी नहीं निकल सकता आजादी से
वहाँ कोहराम मचाकर
वह कैसे निकल जाते हैं
विकास के लिए बहता दौलत का दरिया
कुछ बूँदें वहाँ भी पहुंचा देता है
जहाँ कहीं शांति का ठेकेदार
कुछ समेट लेता है
जानते सब हैं पर
दुनिया को देते हैं भुलावा
न दें तो कैसे करेंगे शांति लाने का दावा

समाज से कमाने वालों, बांटकर खाना सीखो


अमीरों के घर और होटलों पर
मनाते जश्न भला
गरीब कहाँ देख पाते हैं
पर भरते हैं जो आहें
अपनी गरीबी देखकर
उसे अमीर भी कहाँ सुन पाते हैं
दौलत से खुशियाँ खरीदी
जा सकती हैं पर दुआएं नहीं
पर आहें भी व्यर्थ नहीं जातीं
कहीं मन में ही रहतीं तो
कहीं अपराध के रूप में सामने आते हैं
============================
जब दौलतमंद हो जाते हैं तंगदिल
तब गरीब भी हो जाते हैं बेदिल
समाज से कमाने वालों
बांटकर खाना सीखो
समाज पर आने वाली मुसीबतें
सबसे पहले दौलत के शिखर पर बैठे
लोगों पर ही करती हैं हमला
तब हमदर्द नहीं बनता किसी का दिल
-----------------------------------------

चिंता का रोग


टूटते-बिखरते समाज को
बचाने के लिए जूझते लोग
रिवाजों और रीतियों को निभाकर
अपने लिए सम्मान ढूंढते लोग
चिंताओं में पाल रहे हैं रोग
——————————-

चिंता देती है कई रोगों को जन्म
पर उनसे क्या कहेंगे
जिनको चिंता के साथ जीने की
आदत हो गयी
ज्ञान सब बघारते हैं सभी
‘करने वाला तो करतार है’
पर फिर आ जाता है ख्याल
तो कहते हैं कि
”चिंता तो करनी पड़ती है
वरना हमारे काम कैसे होंगे
हमारी जिन्दगी तो हराम हो गयी’

नववर्ष नही कर सकता मैं तेरा अभिनन्दन


नववर्ष नही कर सकता मैं तेरा अभिनन्दन
जब चारों और देखता हूँ पीडा और क्रंदन

अच्छी खबरें ही मिलती रहेंगी तेरे इस दौर में
यकीन नही होता जब करता हूँ अपने मन में मंथन

लोग खुशी के आसमान में उड़ना चाहते हैं
पर तोड़ नही पाते अपने पुराने मन के बन्धन

उत्पात और अशांति के बादल गरज रहे हैं सब तरफ
कहीं न कहीं किसी आदमी की तबाह करेंगे गरदन

कुछ पल अच्छे लग सकते हो कैलेंडर बदलते समय
पर फिर अपनी राह चलोगे, भूलकर अभिनन्दन

पुराना साल, नया साल


पुराना अभी गया नहीं
और अभी दूर हैं नया साल
सजने लगे हैं लोगों के लिए
पहले से ही काकटेल के थाल
इतनी भी क्या जल्दी है
समझ में नहीं आती
शौकीन लोगों का
समय मुश्किल से निकल रहा है
पुराना भी क्या बुरा, जो चल रहा है
कैलेंडर की बदलती तारीखें
देखने से कोई तसल्ली नहीं होती
अगर दिमाग है अपने से बेहाल

आ रहा है और जा रहा है साल
बरसों से सुनते और देखते रहे
कैलेंडर बदले और बदली तारीखें
पर हालत वही रहे
झूठे आनंद में लोग बहते रहे
नैतिक चरित्र होता गया बदहाल

जब तक दिल में नहीं खुशी
कहीं से नहीं आ सकती
सुख का कोई कुआं नहीं हैं
जहाँ से बाल्टी भरी जा सकती
अगर तेज रोशनी में
शराब पीकर नाचते हुए
असली खुशी मिल जाती
तो दुनिया में भारत की संस्कृति की
तारीफ नहीं हो पाती
इतने गुजर गए साल
अब भी लोग हैं, इस पर निहाल

”मैं अपनी पोस्ट का शीर्षक बदलता हूँ”


एक ब्लोगर ने अपने ब्लोगर ने
अपनी पोस्ट पर लिखी कहानी
शीर्षक लिखा ”मैं प्यार करता चाहता हूँ’
पढ़ने वालों ने बस उसे ही
पढा और अपने लिए प्रस्ताव समझकर
कई ने लगा दिए
स्वीकृति भरे कमेन्ट
ब्लोगर हैरान हुआ
समझ गया केवल शीर्षक ने ही किया है
यह घोटाला
तब उसने दूसरी पोस्ट लिखी
”मैं अपनी पोस्ट का शीर्षक बदलता हूँ’
——————————–


पोस्ट भले फटीचर हो शीर्षक फड़कता हुआ लगाएं
————————————–

किसी भी रचना की मुख्य पहचान उसका शीर्षक होता है। अगर कभी कोई शीर्षक आकर्षक होता है तो लोग उसे बडे चाव से पढ़ते हैं और कही वह प्रभावपूर्ण नहीं है तो लोग उसे नजरंदाज कर जाते हैं। हालांकि इसमें पढ़ने वाले का दोष नहीं होता क्योंकि हो सकता है उसे वह विषय ही पसंद न हो दूसरा विषय पसंद हो पर शीर्षक से उस पर प्रभाव न डाला हो. वैसे भी हम जब अखबार या पत्रिका देखते हैं तो शीर्षक से ही तय करते हैं कि उसे पढ़ें या नहीं।

मैने एक ब्लोग पर एक नाराजगी भरी पोस्ट देखी थी जिसमें चार ब्लोगरों के नाम शीर्षक में लिखकर नीचे इस बात पर नाराजगी व्यक्त की गयी थी कि लोग शीर्षक देखकर कोई पोस्ट पढ़ते हैं। इसलिए प्रसिद्ध ब्लोगरों के नाम दिये गये हैं ताकि ब्लोगर लोग अपनी गलती महसूस करें। जैसा की अनुमान था और कई ब्लोगरों ने उसे खोला और वहां कुछ न देखकर अपना बहुत गुस्सा कमेंट के रूप में दिखाया। उत्सुक्तवश मैने भी वह पोस्ट खोली और उससे उपजी निराशा को पी गया। इस तरह पाठकों की परीक्षा लेना मुझे भी बहुत खला क्योंकि उस ब्लोगर ने यह नहीं सोचा ही ब्लोग पर कोई ऐसा पाठक भी हो सकता है और जो ब्लोगर नहीं है और उसे कुछ समझ नहीं आयेगा।

हालांकि मैं कई बार ऐसी रचनाएँ- जो की कवितायेँ होतीं है- अनाकर्षक शीर्षक से डाल जाता हूं जिनके बारे में मेरा विचार यह होता है कि इसे आकर्षक शीर्षक डालकर अधिक लोगों को पढ़ने के लिए प्रेरित करना ठीक नहीं होगा, यह अलग बात है कि मुझे जो नियमित रूप से पढ़ते हैं वह मुझे जानने लगे हैं और वह मेरी कोई पोस्ट नहीं छोड़ते। एक मित्र ने लिखा भी था कि आप कभी-कभी ऐसा हल्का शीर्षक क्यों लगाते हैं कि अधिक लोग न पढ़ें।

अभी दो भारत में ही रहने वाले ब्लोगरों से शीर्षक में ही पूछा गया था कि क्या अफगानिस्तान में रहते हैं। उस ब्लोगर ने लिखा था कि लोगों का ध्यान आकर्षित हो इसलिए ऐसा लिखा है ताकि दूसरे ब्लोगर भी अपनी गलती सुधार लें। मैं उस ब्लोगर की तारीफ करूंगा कि उसने सही शीर्षक लगाया था ताकि उसे अधिक ब्लोगर पढ़ें। उसकी पूरी जानकारी काम की थी। उसके बाद मैने अपने एक ब्लोग को देखा तो वह भी अफगानिस्तान में बसा दिख रहा था और उसे सही किया। पोस्ट छोटी थी पर काम की थी-और जैसा कि मैं हमेशा कह्ता हूं कि अच्छी या बुरी रचना का निर्णय पाठक पर ही छोड़ देना चाहिये। इसलिए अपनी पोस्ट भले ही फटीचर लगे पर शीर्षक तो फड़कता लगाना चाहिये पर पाठकों की परीक्षा लेने का प्रयास नहीं करना चाहिये। एक बार अगर किसी के मन में यह बात आ गयी कि उसे मूर्ख बनाया गया है तो वह फिर आपकी पोस्ट की तरफ देखेगा भी नहीं।

रहीम के दोहे:अभिवादन करने वाले सभी मित्र नहीं हो जाते


सब को सब कोऊ करै, कै सलाम कै राम
हित रहीम तब जानिए, जब कछु अटकै काम

कविवर रहीम कहते हैं की सब एक दुसरे को सलाम और राम-राम कहकर अभिवादन तो सभी करते हैं पर मित्र तो उसे ही मानिए जो समय पर काम पर आये.

संपादकीय अभिमत-इसमें रहीम जी ने कितना बड़ा गूढ़ रहस्य प्रकट किया है. दिन में कई लोगों से हमारा सलाम और राम-राम कहकर अभिवादन होता है और समझते हैं की वह हमारे अपने हो गए. कई लोग इसे भे होते हैं जिनसे हमारा प्रतिदिन अभिवादन का आदान-प्रदान और अन्य वार्तालाप होता है पर वह सब मित्र नहीं हो जाते जबक हम मन ही मन उन्हें अपना समझने लगते हैं. जब काम अटकता है तो हम उनसे उम्मीद करते हैं जब वह इनकार कर देते हैं तब कहीं जाकर हमारा भ्रम टूटता है.

स्कूल. ऑफिस और दुकानों पर हमारे साथ ऐसे अनेक जुड़ते हैं जो केवल वहाँ काम करने की वजह से होते हैं पर उन्हें मित्र नहीं माना जा सकता. हाँ, वहाँ मित्र बनते हैं पर वही लोग जो दु:ख और सुख में हमारे यहाँ शरीक होते हैं.

संत कबीर वाणी:संतों की निंदा करना ठीक नहीं


सीखै सुनै विचार ले, ताहि शब्द सुख देय
बिना समझै शब्द गहै, कछु न लोहा लेय

 

संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि जो व्यक्ति सत्य और न्याय के शब्दों को अच्छी तरह से ग्रहण करता है उसके लिए ही फलदायी होता है। परंतु जो बिना समझे, बिना सोचे-विचारे शब्द को ग्रहण करता है तथा रटता फिरता है उसे कोई लाभ नहीं मिलता ।

जो कोय निन्दै साधू को, संकट आवै सोय

नरक जाय जन्मै मरै, मुक्ति कबहु नहिं होय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो भी साधू और संतजनों की निंदा करता है, उसके अनुसार अवश्य ही संकट आता है। वह निम्न कोटि का व्यक्ति नरक-योनि के अनेक दु:खों को भोगता हुआ जन्मता और मरता रहता है। उसके मुक्ति कभी भी नहीं हो सकती और वह हमेशा आवागमन के चक्कर में फंसा रहेगा।

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बेनजीर एक नजीर बन गयी


सुन्दर चेहरा
समुन्दर जैसे गहरी ऑंखें
खुशदिल और शिक्षित व्यक्तित्व
की मल्लिका बेनजीर को
किसकी  नजर लग गयी

५४ वर्ष में खिला एक
फूल पल भर में मसल डाला
दानव नहीं लगा सकते एक फूल भी
पर बाग़-बाग़ के उजाड़ डालते हैं
इंसानों के भेष में सब इंसान नहीं होते
भला क्या सब यह जानते हैं
भोली भाली एक औरत
मर्दों की राजनीति की बलि चढ़ गयी

हिंसा का खेल कौन रचता है
अपने लिए  रखता है आजादी
औरत को गुलाम बनाने के लिए
कई किताबें लिख बचता है
लिखी जायेगी कोई किताब उस पर
फिर कभी किसी आदमी द्वारा
बेनजीर किताब का एक पन्ना बन गई

उसने किया उन लोगों पर भरोसा
जिनके घर के चिराग 
भले लोगों के खून से रौशन होते हैं
अपने कफ़न  बेचने के लिए
बाजार में कत्लेआम बेचते हैं
धोखे तो हर पल होते हैं यहाँ
बेनजीर भी एक नजीर बन गयी   

छोटा आदमी-बड़ा आदमी


आदमी बड़ा या उसकी माया
दौलत बड़ी की आदमी की काया
हर पल बदलती इस दुनिया में
रूप बदलती है माया
पर ढहती जाती है काया
कभी साइकिल थी अमीर की सवारी
आज हो गई है कार
कभी पैडल मार कर चलते हुए बडे आदमी को
देख रास्ता छोड़ देते थे कि
कहीं टक्कर न मारे साथ में
जड़ दे गाल पर दो हाथ
आज घर से निकलते हैं
भय खाते हुए कि कार चढाकर
न निकल जाये और बना जाये लाश
उन पर तो है काली दौलत की छाया
पर हादसे किसका पीछा छोड़ते हैं
छोटा आदमी तो जमीन का
जमीन पर ही गिरता है
बडों को ऊपर भी नहीं छोड़ती
हादसों की छाया
आदमी करता माया के
चक्कर में छोटे-बडे का भेद
जिन्दगी और मौत ने कभी
यह भेद नहीं दिखाया
———————

जिन्होंने अमीरी के पलने में
आँख खोली है
उन्हें गरीबी में भी सौदर्य का
बोध होता है
और ईर्ष्या होती है
उन्हें बिना सुविधाओं के जिंदा देखकर
जिन्होंने गरीबी ने पाला है
उन्हें शायद इस बात का आभास नहीं होता
कि दौलतमंद के दिल में
उसके दुख के लिए कोई दर्द नहीं
वरन सह नहीं पाते अमीर
उसकी चलती साँसें भी देखकर
———————————————

अपने मन में है बस व्यापार


जो हाथ मांगने के लिए उठते हैं
उनके हाथ कुछ तो आ जाता है
पर सम्मान पाने की आशा
उनको नहीं करना चाहिए
जिनकी जुबान का हर शब्द
मांगने में खर्च हो जाता है
———————————–

अपने मन में है बस व्यापार
बाहर ढूंढते हैं प्यार
मन में ख्वाहिश
सोने, चांदी और धन
के हों भण्डार
पर दूसरा करे प्यार
मन की भाषा में हैं लाखों शब्द
पर बोलते हुए जुबान कांपती है
कोई सुनकर खुश हो जाये
अपनी नीयत पहले यह भांपती है
हम पर हो न्यौछावर
पर खुद किसी को न दें सहारा
बस यही होता है विचार
इसलिए वक्त ठहरा लगता है
छोटी मुसीबत बहुत बड़ा कहर लगता है
पहल करना सीख लें
प्यार का पहला शब्द
पहले कहना सीख लें
तो जिन्दगी में आ जाये बहार
—————–

मनुस्मृति:एक दिन से अधिक ठहरने वाला अतिथि नहीं


1.एक सज्जन व्यक्ति के घर से बैठने या विश्राम के लिए भूमि, तिनकों से बने आसन, जल तथा मृदु वचन कभी दूर नहीं रहते। यह सब आसानी से उपलब्ध रहते हैं। अत: अतिथि को यदि अन्न, फल-फूल और दूध आदि से सेवा करना संभव नहीं हो तो उसे सही स्थान पर आसन पर आदर सहित बैठाकर जल तथा मृदु वचनों से संतुष्ट करना चाहिऐ।
2.एक रात गृहस्थ के घर ठहरने वाला व्यक्ति ही अतिथि कहलाता है क्योंकि उसके आने की कोई तिथि निश्चित नहीं होती। एक रात से अधिक ठहरने वाला अतिथि कहलाने का अधिकारी नहीं होता।
3.यदि एक स्थान से दूसरे स्थान या नगर में रोजी-रोटी कमाने के उद्देश्य से जाकर कोई व्यक्ति बस जाता है तथा उसके गृह क्षेत्र का कोई दूसरा व्यक्ति उसके यहाँ ठहरता है या वह स्वयं अपने गृहक्षेत्र में जाकर ठहरता है तो उसे अतिथि नहीं माना जाता। इसी प्रकार मित्र, सहपाठी और यज्ञ आदि कराने वाला पुरोहित भी अतिथि नहीं कहलाता।
4.जो मंद बुद्धि गृहस्थ उत्तम भोजन के लालच में दूसरे गाँव में जाकर दूसरे व्यक्ति के घर अतिथि बनकर रहता है वह मरने के बाद अन्न खिलाने वाले के घर पशु के रूप में उस भोजन का प्रतिफल चुकाता है।
सूर्यास्त हो जाने के बाद असमय आने वाले मेहमान को भी घर से बिना 5.भोजन कराए वापस भेजना अनुचित है। अतिथि समय पर आये या असमय पर उसे भोजन कराना ही गृहस्थ का धर्म है।
6.जो खाद्य पदार्थ अतिथि को नहीं परोसे गए हों उन्हें गृहस्थ स्वयं न ग्रहण करे। अतिथि का भोजन आदि से आदर सत्कार करने से धन, यश, आयु एवं स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
7.उत्तम, मध्यम एवं हीन स्तर के अतिथियों को उनकी अवस्था के अनुसार स्थान, विश्राम के लिए शय्या और अभिवादन प्रदान कर उनकी पूजा करना चाहिऐ।

अड़ जाये तो ब्लोगर भी कम नहीं


बाबू ने एक हाथ में फाईल पकडी
और ब्लोगर की तरफ हाथ बढाया
पहले तो वह समझा नहीं और
जब समझा तो गुस्सा आया
उसने कहा
”तुम मेरी फाइल दो
मैं तुम्हें रिश्वत नहीं दे सकता
मैंने अपनी जिन्दगी में
कभी किसी को रिश्वत न देने का व्रत उठाया’

बाबू ने मूहं से पान की पीक थूकते हुए कहा
‘क्या पगला गए हो
यहाँ क्या धर्मादा खाता खोले बैठें है
नही देते तो जाओ फाईल नहीं है
मैंने भी बिना कुछ लिए
काम न करने का फास्ट उठाया”
दोनों में मूहंवाद हो गया
आसपास के लोगों का झुंड दोनों के
इर्द-गिर्द सिमट आया
उसमें था एक ब्लोगर का एक दोस्त
उसने जब पूरा माजरा समझा
तो ब्लोगर को समझाया
”यार, जब तुम ब्लोग पर कोई
पोस्ट लिखते तो कमेन्ट आती हैं कि नहीं
कोई लिखता है तो तुम उसे देते कि नहीं
ऐसे ही समझ लो
इसकी पोस्ट पर एक कमेन्ट रख दो
पांच सौ का पता ही दे दो
इतने बडे ब्लोगर होकर तुम्हें
लेनदेन का रिवाज समझ में नहीं आया’

ब्लोगर ने दिया पांच सौ का नोट
और फाईल हाथ में लेकर बाबू से हाथ मिलाया
और मोबाइल दिखाते हुए कहा
”धन्यवाद आपका
आपने एक के साथ दूसरा काम भी बनाया
इसम मोबाइल में सब रिकार्ड है
आज पोस्ट कर दूंगा
आपको दी है एक कमेन्ट
सब शाम तक वसूल कर लूंगा
वाह क्या आईडिया अपने आप बन आया’

वह चल पडा तो
दोस्त और वह बाबू पीछे दौडे
बाबू हाथ पांव जोड़ने लगा और पैसे
वापस करते हुए बोला
मैं मर जाऊंगा
आप ऐसा मत करना
यह आपका दोस्त ही दलाल है
इसके कहने पर चलने का मलाल है
आप कुछ मत करना
अपने बच्चों पर है मेरा ही साया’
दोस्त भी तन कर बोला
”नहीं यह धोखा है
तुम ब्लोग लिखते हो कोई
स्टिंग आपरेशन करने का कोई हक़ नहीं है
यार, अगर तुम मुझसे पहले मिलते तो
यह परेशानी नहीं आती.
मेरी दोस्ती की कसम
ऐसा कुछ मत करना
यह प्रपंच तुमने ठीक नहीं रचाया’
ब्लोगर हंस पडा
”चलो तुम्हें माफ़ किया
क्योंकि ब्लोग पर स्टिंग आपरेशन भी
कभी हो सकता है
यह आईडिया तुमने ही दिया”

वहाँ से चल कर उसने मोबाइल को देखा
और कहा
‘पर इसमें फोटो का तो कोई प्रोविजन नहीं है
अड़ जाये तो ब्लोगर भी कम नहीं है
कैसा दोनों का उल्लू बनाया
कैसा जोरदार ख्याल आया’

नोट-यह एक हास्य-व्यंग्य रचना है और किसी घटना या व्यक्ति से इक्सा कोई लेना देना नहीं है और अगर किसे से मेल खा जाये तो वही इसके लिए जिम्मेदार होगा

जब ब्लोगर कार के मुहूर्त से बिना कमेन्ट के लौटा


ब्लोगर पहुंचा सर्वशक्तिमान के घर
ध्यान लगाने
कुछ पल का चैन पाने
निकला जब बाहर तो देखा
उसका मित्र अपनी नयी कार लेकर
खडा था
उस घर के सेवक से पुजवाने
ब्लोगर को देखकर मित्र खुश हो गया
और इशारा कर बुलाया और बोला
”यार, आज ही खरीदी है
लाया हूँ इसे इसकी नजर उतरवाने
तुम भी रुक जाओ
और प्रसाद पाओ
फिर कभी ले चलूँगा तुम्हें घुमाने’

ब्लोगर रुक गया
विश्वास बहुत था उसका सर्वशक्तिमान में
पर अंधविश्वास से परे था
पर मित्र के आगे वह झुक गया
मित्र ने फूल दिए और कहा
जब हो जाये सब
तक यह हैं कार पर बरसाने’
जब हो गयी कार की पूजा
तब ब्लोगर ने भी फूल बरसाए
और दूर हो गया पानी पीने के बहाने
उधर मिठाई बंटी
ख़त्म हो गया मिठाई का डिब्बा
ब्लोगर पहुंचा मित्र के सामने
हिस्से का हक़ जमाने
मित्र ने खाली डिब्बा दिखाया और
दिया आश्वासन कल उसका
हिस्सा घर पहुँचाने के लिए
ब्लोगर बोला
”यार, क्या मेरे लिए
एक टुकडा नहीं बचा सके
मैंने तुम्हारी कार पर
फूल पोस्ट किये थे
पर कमेन्ट की बात आयी
तो लगे टरकाने
हमें तो मजा तब आता है
जब पोस्ट रखते ही कमेन्ट आये
वह बहुत ताजा लगती है
कल-परसों वाली बासी लगती है
तुम कल भी कुछ मत लाना
अरे, हमें हर पोस्ट पर कमेन्ट नहीं मिलती
मैं यही समझ लूंगा
यह पोस्ट भी औंधे-मुहँ गिरी
चित हो गयी चारों खाने
—————————————-
नोट-यह काल्पनिक हास्य-व्यंग्य रचना है और इसका किसी घटना से कोई लेना देना नहीं है और किसी की कारिस्तानी इससे मेल खा जाये तो वही इसके लिए जिम्मेदार होगा.