Category Archives: hindi poem

महानायकों के झुंड के बीचआम आदमी-व्यंग्य कविता


महानायकों के झुंड के बीच
खड़ा है आम आदमी
हैरान होता  यह सोचकर कि
किसकी आरती वह पहले करे।
सुबह छाया पर्दे पर फिल्म का नायक
दोपहर को गा रहा है भजन गायक
शाम को नजर आ रहा है
आतंक का खलनायक
किसे करे प्रेम
किस पर दिखाये गुस्सा
पहले नज़रों में उसके चेहरा तो तो भरे।
मगर पर्दे पर हर पल
दृश्य बदल रहा है
कभी हंसी आती है तो
कभी दिल दहल रहा है
इतने नायक और खलनायकों को
देखने से तो पहले फुरसत तो मिले
तब वह कुछ वह सोचने की पहल करे।

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यह प्यार है बाजार का खेल-व्यंग्य कविता


खूब करो क्योंकि हर जगह
लग रहे हैं मोहब्बत के नारे
बाजार में बिक सकें
उसमें करना ऐसे ही इशारे
उसमें ईमान,बोली,जाति और भाषा के भी
रंग भरे हों सारे
जमाने के जज्बात बनने और बिगड़ने के
अहसास भी उसमें दिखते हांे
ऐसा नाटक भी रचानां
किसी एकता की कहानी लिखते हों
भले ही झूठ पर
देश दुनियां की तरक्की भी दिखाना
परवाह नहीं करना किसी बंधन की
चाहे भले ही किसी के
टूटकर बिखर जायें सपने
रूठ जायें अपने
भले ही किसी के अरमानों को कुचल जाना
चंद पल की हो मोहब्बत कोई बात नहीं
देखने चले आयेंगे लोग सारे
हो सकती है
केवल जिस सर्वशक्तिमान से मोहब्बत
बैठे है सभी उसे बिसारे

……………………………
जगह-जगह नारे लगेंगे
आज प्यार के नारे
बाहर ढूंढेंगे प्यार घर के दुलारे
प्यार का दिवस वही मनाते
जो प्यार का अर्थ संक्षिप्त ही समझ पाते
एक कोई साथी मिल जाये जो
बस हमारा दिल बहलाए
इसी तलाश में वह चले जाते

बदहवास से दौड़ रहे हैं
पार्क, होटल और सड़क पर
चीख रहे हैं
बधाई हो प्रेम दिवस की
पर लगता नहीं शब्दों का
दिल की जुबान से कोई हो वास्ता
बसता है जो खून में प्यार
भला क्या वह सड़क पर नाचता
अगर करे भी कोई प्यार तो
भला होश खो चुके लोग
क्या उसे समझ पाते
प्यार चाहिऐ और दिलदार चाहिए के
नारे लगा रहे
पर अक्ल हो गयी है भीड़ की साथी
कैसे होगी दोस्त और दुश्मन की पहचान
जब बंद है दिमाग से दिल की तरफ
जाने का रास्ता
अँधेरे में वासना का नृत्य करने के लिए
प्यार का ढोंग रचाते
यह प्यार है बाजार का खेल
शाश्वत प्रेम का मतलब
क्या वाह जानेंगे जो
विज्ञापनों के खेल में बहक जाते

———————

दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप

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दर्द से लड़ते आंसू सूख गये-हिंदी शायरी


जब हकीकतें होती बहुत कड़वी
वह मीठे सपनों के टूटने की
चिंता किसी को नहीं सताती
जहां आंखें देखती हैं
हादसे दर हादसे
वहां खूबसूरत ख्वाब देखने की
सोच भला दिमाग में कहा आती

दर्द से लड़ते आंसू सूख गये है जिसके
हादसों पर उसकी हंसी को मजाक नहीं कहना
उसकी बेरुखी को जज्बातों से परे नही समझना
कई लोग रोकर इतना थक जाते
कि हंसकर ही दर्द से दूर हो पाते
जिक्र नहीं करते वह लोग अपनी कहानी
क्योंकि वह हो जाती उनके लिये पुरानी
रोकर भी जमाना ने क्या पाता है
जो लोग जान जाते हैं
अपने दिल में बहने वाले आंसू वह छिपाते हैं
इसलिये उनकी कशकमश
शायरी बन जाती
शब्दों में खूबसूरती या दर्द न भी हो तो क्या
एक कड़वे सच का बयान तो बन जाती
……………………………………………
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दिवाली की मिठाई के बारे में लोगों को बताएंगे-हास्य कवित


दीपावली मेले में दुकान से
घर सजाने के लिये मिट्टी के बने
कुछ खिलौने खरीदने पर
उनका मिठाई का ध्यान आया तो बोले
‘भईया, तुम्हारे मिट्टी के फल तो
असली लगते हैं
हम इसे अपने ड्रांइग रूम में सजायेंगे
ऐसे ही मिठाई के भी दिखाओ
आजकल विषैले खोये की वजह
से मिठाई खरीदने की हिम्मत नहीं होती
अगर मिल जायें मिठाई के खिलौने तो बहुत अच्छा
उसे भी इनके साथ सजायेंगे
हमने भी दीपावली पर जमकर
मिठाई खाई लोगों को बतायेंगे

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जो बुत बोल रहे, पराये शब्द और स्वर लेकर डोल रहे-व्यंग्य कविता


हाड़मांस के पुतलों से
हो गये है नाउम्मीद इसलिये
पत्थर के बुत ही पूजना अच्छा लगता
कम से कम उम्मीद के टूटने का भय तो नहीं रहता

पत्थर बोलते नहीं है
पर जो बुत बोल रहे
स्वर उनके जरूर हैं पर
शब्द पराये होकर डोल रहे ं
आखों में जिनके जीवन है
देख रहे हैं दृश्य
पर उसे किसी का दृष्टिकोण उधार लेकर तोल रहे
उनकी किसी बात को
प्रमाणिक मानने को मन नहीं कहता

ऋषियों और मुनियों जैसे
बन नहीं सके
ऐसे पुरुषों ने अपने को पुजवाने के लिये
तमाम दिये नारे
इतिहास में किया नाम दर्ज
समाज के इलाज के नाम पर दिया
उसे भ्रमों में भटकने का मर्ज
भटक रहे हैं कई किताबी कीड़े
उतारने के लिये उनका कर्ज
मिटाने की चाहत थी पुराने इतिहास की
नया जो रचा उन्होंने
नीरस और बोझिल शब्दों से जो वाद और नारा
वह कभी हकीकत नहीं लगता
पर बिखरे पड़े हैं उनके शागिर्द चारों ओर
को साहसी भी सच नहीं उनसे नहीं कहता

पत्थर के बुतों से
अगर नहीं है कामयाबी की आशा
तो नहीं होती कभी
उनसे झूठ और भ्रम की वजह से निराशा
हाड़मांस के पुतलों को क्या
नाम दें
इसलिये तो जमाना पत्थर के बुतों को ही
अपना इष्ट कहता
पत्थरों से जंग लड़ी जाती है तभी
जब हाड़मांस के बुतों बातों पर होती जंग
उनके नारे लगाने वालों की
हो जाती है सोच तंग
पर पत्थर का कोई बुत
खुद तो किसी को जंग के लिये नहीं कहता

…………………………………….

यह आलेख ‘दीपक” भारतदीप की सिंधु केसरी-पत्रिका पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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रोटी का इंसान से बहुत गहरा है रिश्ता-हिंदी शायरी


पापी पेट का है सवाल
इसलिये रोटी पर मचा रहता है
इस दुनियां में हमेशा बवाल
थाली में रोटी सजती हैं
तो फिर चाहिये मक्खनी दाल
नाक तक रोटी भर जाये
फिर उठता है अगले वक्त की रोटी का सवाल
पेट भरकर फिर खाली हो जाता है
रोटी का थाल फिर सजकर आता है
पर रोटी से इंसान का दिल कभी नहीं भरा
यही है एक कमाल
………………………
रोटी का इंसान से
बहुत गहरा है रिश्ता
जीवन भर रोटी की जुगाड़ में
घर से काम
और काम से घर की
दौड़ में हमेशा पिसता
हर सांस में बसी है उसके ख्वाहिशों
से जकड़ जाता है
जैसे चुंबक की तरफ
लोहा खिंचता

…………………………………..

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सड़क ने प्यार से जुदा करा दिया-हास्य व्यंग्य कविता


बहुत दिन बाद प्रेमी आया
अपने शहर
और उसने अपनी प्रेमिका से की भेंट
मोटर साइकिल पर बैठाकर किक लगाई
चल पड़े दोनों सैर सपाटे पर
फिर बरसात के मौसम में सड़क
अपनी जगह से नदारत पाई

कभी ऊपर तो कभी नीचे
बल खाती हुई चल रही गाड़ी ने
दोनों से खूब ठुमके लगवाये
प्रेमिका की कमर में पीड़ा उभर आई
परेशान होते ही उसने
आगे चलने में असमर्थता अपने प्रेमी को जताई

कई दिन तक ऐसा होता रहा
रोज वह उसे ले जाता
कमर दर्द के कारण वापस ले आता
प्रेमिका की मां ने कहा दोनों से
‘क्यों परेशान होते हो
बहुत हो गया बहुत रोमांस
अब करो शादी की तैयारी
पहले कर लो सगाई
फिर एक ही घर में बैठकर
खूब प्रेम करना
बेटी के रोज के कमर दर्द से
मैं तो बाज आई’

प्रेमिका ने कहा
‘रहने दो अभी शादी की बात
पहले शहर की सड़के बन जायें
फिर सोचेंगे
इस शहर की नहीं सारे शहरों में यही हाल है
टीवी पर देखती हूं सब जगह सड़कें बदहाल हैं
शादी के हनीमून भी कहां मनायेंगे
सभी जगह कमर दर्द को सहलायेंगे
फिर शादी के बाद सड़क के खराब होने के बहाने
यह कहीं मुझे बाहर नहीं ले जायेगा
घर में ही बैठाकर बना देगा बाई
इसलिये पहले सड़कें बन जाने तो
फिर सोचना
अभी तो प्यार से करती हूं गुडबाई’

………………………….

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अकेलापन-हिंदी शायरी


जब याद आती है अकेले में किसी की
खत्म हो जाता है एकांत
जिन्हें भूलने की कोशिश करो
उतना ही मन होता क्लांत
धीमे-धीमे चलती शीतल पवन
लहराते हुए पेड़ के पतों से खिलता चमन
पर अकेलेपन की चाहत में
बैठे होते उसका आनंद
जब किसी का चेहरा मन में घुमड़ता
हो जाता अशांत

अकेले में मौसम का मजा लेने के लिये
मन ही मन किलकारियां भरने के लिये
आंखे बंद कर लेता हूं
बहुत कोशिश करता हूं
मन की आंखें बंद करने की
पर खुली रहतीं हैं वह हमेशा
कोई साथ होता तो अकेले होने की चाहत पैदा
अकेले में भी यादें खत्म कर देतीं एकांत
……………………………
दीपक भारतदीप

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शब्दों के फूल कभी नहीं मुरझाये-हिंदी शायरी


कुछ पाने के लिये

दौड़ता है आदमी इधर से उधर

देने का ख्याल कभी उसके

अंदर नहीं आता

भरता है जमाने का सामान अपने घर में

पर दिल से खाली हो जाता

दूसरे के दिलों में ढूंढता प्यार

अपना तो खाली कर आता

कोई बताये कौन लायेगा

इस धरती पर हमदर्दी का दरिया

नहाने को सभी तैयार खड़े हैं

दिल से बहने वाली गंगा में

पर किसी को खुद भागीरथ
बनने का ख्याल नहीं आता
……………………………….
अपने नाम खुदवाते हुए

कितने इंसानों ने पत्थर लगवाये

पर फिर भी अमर नहीं बन पाये

जिन्होंने रचे शब्द

बहते रहे वह समय के दरिया में

गाते हैं लोग आज भी उनका नाम

कुछ पत्थरों पर धूल जमी

कुछ टूट कर कंकड़ हो गये

पर


……………………….

दीपक भारतदीप

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दूसरे के दर्द में अपनी तसल्ली ढूंढता आदमी-हिंदी शायरी


शहर-दर-शहर घूमता रहा

इंसानों में इंसान का रूप ढूंढता रहा
चेहरे और पहनावे एक जैसे

पर करते हैं फर्क एक दूसरे को देखते

आपस में ही एक दूसरे से

अपने बदन को रबड़ की तरह खींचते

हर पल अपनी मुट्ठियां भींचते

अपने फायदे के लिये सब जागते मिले

नहीं तो हर शख्स ऊंघता रहा

अपनी दौलत और शौहरत का

नशा है

इतराते भी उस बहुत

पर भी अपने चैन और अमन के लिये

दूसरे के दर्द से मिले सुगंध तो हो दिल को तसल्ली

हर इंसान इसलिये अपनी

नाक इधर उधर घुमाकर सूंघता रहा
……………………………
दीपक भारतदीप

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दिल के मचे तूफानों का कौन पता लगा सकता ह-हिन्दी शायरी



मोहब्बत में साथ चलते हुए
सफर हो जाते आसान
नहीं होता पांव में पड़े
छालों के दर्द का भान
पर समय भी होता है बलवान
दिल के मचे तूफानों का
कौन पता लगा सकता है
जो वहां रखी हमदर्द की तस्वीर भी
उड़ा ले जाते हैं
खाली पड़ी जगह पर जवाब नहीं होते
जो सवालों को दिये जायें
वहां रह जाते हैं बस जख्मों के निशान
……………………………
जब तक प्यार नहीं था
उनसे हम अनजान थे
जो किया तो जाना
वह कई दर्द साथ लेकर आये
जो अब हमारी बने पहचान थे
…………………………..
दीपक भारतदीप

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किताबों में लिखे शब्दों की पंक्तियां उनके पांव में बेड़ियाँ नजर आ रही हैं-हिंदी शायरी


किताब में लिखे शब्दों की पंक्तियां
सलाखों की तरह नजर आ रही हैं
कुछ चेहरे छिपे हैं उसके पीछे
जिनकी आंखें बुझी जा रही हैं

पाठ है आजादी का
जिसमें कई कहानियां हैं
लोग उन्हें सुनाये जा रहे हैं
पर उससे आगे नहीं जा पा रहे ं
क्योंकि किताब एक कैद की तरह हो गयी है
कोई दूसरी मिल जाये तो
शायद वह उससे निकल पायें
पर वह भी एक दूसरी कैद होगी
जिसमें वह फिर बंद हो जायें
संभव है उसी में लिखा पढ़कर सभी को सुनायें
अपनी सोच बंद है आलस्य के पिंजरे में कैद
दूसरों के ख्याल पर जली मोमबत्तियों पर
पढ़ने वाले कैदी रौशनी पा रहे हैं
आजादी के गीत गा रहे हैं
पुरानी कहानियों के दायरों से बाहर
कौन बाहर आयेगा
शब्दों का पहरेदार फिर
उनको अंदर भगायेगा
शहीदों के समाधि पर लगाकर
हर वर्ष मेले
नयी सूरतें अपना मूंह छिपा रहीं हैं
किताब में लिखी शब्दों की पंक्तियों
उनके पांव बेड़ी की तरह तरह नजर आ रही हैं
…………………………………………………….
……………………………………………………..

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चमन की बागडोर है जिसके हाथ वही दुश्मन हो जाता-हिंदी शायरी


लुट जाने का खतरा अब
गैरो से नहीं सताता
अपनों को ही यह काम
अच्छी तरह अब करना आता

पहरेदारी अपने घर की किसे सौेपे
यकीन किसी पर नहीं आता
जहां भी देखा है लुटते हुए लोगों को
अपनों का हाथ नजर आता
कई बाग उजड़ गये हैं
माली के हाथों जब
जोअब फूल नहीं लगाता
इंतजार रहता है उसे
कोई आकर लगा जाये पेड़ तो
वह उसे बेच आये बाजार में
इस तरह अपना घर सजाता
नाम के लिये करते हैं मोहब्बत
बेईमानी से उनकी है सोहबत
जमाने के भलाई का लगाते जो लोग नारा
लूट में उनको ही मजा आता
कहें महाकवि दीपक बापू
मन में है उथलपुथल तो
अमन कहां से आयेगा यहां
जिनके हाथ में बागडोर होती चमन की
किसी और से क्या खतरा होगा
वही उसका दुश्मन हो जाता

…………………………….

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नहीं मिलते उनकी करतूतों के निशान-हिंदी शायरी


कई किताबें पढ़कर बेचते है ज्ञान
अपने व्यापार को नाम देते अभियान
चार दिशाओं के चौराहे पर खड़े होकर
देते हैं हांका
समाज की भीड़ भागती है भेड़ों की तरह
नाम लेते हैं शांति का
पहले कराते हैं सिद्धांतों के नाम पर झगड़ा
बह जाता है खून सड़कों पर
उनका नहीं होता बाल बांका
कोई तनाव से कट जाता
कोई गोली से उड़ जाता
पर किसी ने उनके घर में नहीं झांका
कहीं नहीं मिलते उनकी करतूतों के निशान
…………………………………………….

हमें मंजिल का पता बताकर
खुद वह जंगल में अटके हैं
कहने वाले सच कह गये
जो सबको बताते हैं
नदिया के पार जाने का रास्ता
वह स्वयं कभी पार नहीं हुए हैं
कहैं महाकवि दीपक बापू
उन्मुक्त भाव से जीते हैं जो लोग
मुक्त कहां हो पाते हैं स्वयं
दुनियां भर के झंझट उनके मन के बाहर लटके हैं
………………………………………….

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तब तक अधूरा है अभिव्यक्ति का सृजन-हिंदी शायरी


जो सरल और सहज हैं
जिन के दिल में हैं नेकनीयति
करते हैं वही रचना का सृजन
जिन पर खुद की ख्वाहिशों और
अरमानों को पूरा करने का बोझ है
समाज में तनाव का करते हैं वही विसर्जन

दूसरे के दर्द को अपने दिल की
आंखों से देखकर जो करते हैं विचार
सृजक वही बन पाते हैं
जो सतह पर तैरते हुए केवल
दिखाने के लिए बनते हैं हमदर्द
वह तो शब्द के सौदागर हैं
बेच लें बाजार में ढेर सारी रचनाएं
पर फिर भी सृजक नहीं कहलाते हैं
प्रसिद्धि और प्रशंसा के ढेर सारे शब्द
अपने खजाने में जमा करते लेते
पर सृजन की उपाधि का नहीं कर पाते अर्जन

कहने से कोई सृजक नहीं हो जाता
चंद शब्द लिखने से कोई सृजन नहीं हो पाता
आखों से पढ़कर
कानों से सुनकर
हाथों से स्पर्श कर
जब तक अपनी अनुभूतियों को
दिल में डुबोया न जाए
तब तक रस और श्रृंगार के बिना
अधूरा है अभिव्यक्ति का सृजन
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भीड़ की भेड़ नहीं शेर बनो-हिदी शायरी


भीड़ में सबको भेड़ की तरह
हांकने कि कोशिश में हैं सब
चलते जाते हैं आगे ही आगे
सीना तानकर अपना चलते
पर कोई शेर आ जाये सामने
तो कायरता का भाव उनमें जागे

भेड़ों की तरह भीड़ में चलते
अब में थक गया हूँ
सोचता हूँ कि अब बची जिन्दगी
शेरों की तरह लड़ते हुए गुजारूं
कर देते हैं वह शिकार होने के लिए भेड़ों को आगे
सियारों का ही खेल चल रहा है सब जगह
जो कभी सामने नहीं आते
भेडो को शिकार के लिए सामने लाते
खुद चढ़ जाते अट्टालिकाओं पर भागे-भागे

मन नहीं चाहता किसी को
अपने पंजों से आहत करूं
पर फिर सोचता हूँ कि
मैं किसी की भेड़ भी क्यों बनूँ
चल पडा हूँ
जिन्दगी की उस दौर में
जहाँ शेर ही चल सकते हैं आगे
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वफा मुफ्त में नहीं मिलती-हिंदी शायरी


वफा अब मुफ्त में नहीं मिलती
अगर दाम देने की ताकत हो पास तो
बेचने वाले सौदागरो की भीड़ दिखती
ओ बाजार में खड़े इंसान
अपने मन में कोई खुशफहमी में आकर
किसी से बिना मतलब वफा की
उम्मीद कभी न करना
वफा के सौदागर तरक्की में लगे हैं
उन्हें भी यह कभी मुफ्त में नहीं मिलती
कौड़ी के भाव भले ही खरीद लें वह
पर आम इंसान को सोने के भाव मिलती
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पहले एक कौवा दिखा दो-व्यंग्य कविता


एक श्रोता ने कवि से कहा
‘अपने को बहुत बड़ा कवि समझते हो तो
कौवे पर कोई व्यंग्य कविता लिख कर दिखा दो’
कवि ने उदास होते हुए कहा
‘कौवे पर कविता लिख सकता हूं
पर वीभत्स रस से सराबोर हो जायेगी
सुन लोगे तो तुम्हें रात भर
नींद नहीं आयेगी
कौवे की तस्वीर भी तुम्हें सतायेगी
जिसकी नस्ल ही लुप्त हो रही हो
अब पहले की तरह कांव-कांव कर
कहां नजर आते
दिख जायें तो इंसानों की
बुरी नजर का शिकार हो जाते
उस पर व्यंग्य कविता कैसे लिखें
तुम कहीं चलकर पहले एक कौवा दिखा दो’
…………………………………………………………….

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खबरों की खबर देने वाले-व्यंग्य कविता


खबरों की खबर वह रखते हैं
अपनी खबर हमेशा ढंकते हैं
दुनियां भर के दर्द को अपनी
खबर बनाने वाले
अपने वास्ते बेदर्द होते हैं

आंखों पर चश्मा चढ़ाये
कमीज की जेब पर पेन लटकाये
कभी कभी हाथों में माइक थमाये
चहूं ओर देखते हैं अपने लिये खबर
स्वयं से होते बेखबर
कभी खाने को तो कभी पानी को तरसे
कभी जलाती धूप तो कभी पानी बरसे
दूसरों की खबर पर फिर लपक जाते हैं
मुश्किल से अपना छिपाते दर्द होते हैं

लाख चाहे कहो
आदमी से जमाना होता है
खबरची भी होता है आदमी
जिसे पेट के लिये कमाना होता है
दूसरों के दर्द की खबर देने के लिये
खुद का पी जाना होता है
भले ही वह एक क्यों न हो
उसका पिया दर्द भी
जमाने के लिए गरल होता
खबरों से अपने महल सजाने वाले
बादशाह चाहे
अपनी खबरों से जमाने को
जगाने की बात भले ही करते हों
पर बेखबर अपने मातहतों के दर्द से होते हैं

कभी कभी अपना खून पसीना बहाने वाले खबरची
खोलते हैं धीमी आवाज में अपने बादशाहों की पोल
पर फिर भी नहीं देते खबर
अपने प्रति वह बेदर्द होते हैं
—————————-
दीपक भारतदीप

चिंतन शिविर-हास्य कविता


अपने संगठन का चिंतन शिविर
उन्होंने किसी मैदान की बजाय
अब एक होटल में लगाया
जहां सभी ने मिलकर
अपना समय अपने संगठन के लिये
धन जुटाने की योजनायें बनाने में बिताया
खत्म होने पर एक समाज को सुधारने का
एक आदर्श बयान आया
तब एक सदस्य ने कहा
-‘कितना आराम है यहां
खुले में बैठकर
खाली पीली सिद्धांतों की बात करनी पड़ती थी
कभी सर्दी तो गर्मी हमला करती थी
यहां केवल मतलब की बात पर विचार हुआ
सिर्फ अपने बारे में चिंतन कर समय बिताया’
……………………………

दीपक भारतदीप

मैं नहीं हूं कोई सिकंदर-हिंदी शायरी


किसे मित्र कहें किसे शत्रू
आदमी बंटा हुआ है अपने अंदर
सिमट जाता है अपने ख्यालों में
एक तालाब की तरह
जब मिलती है जिंदगी जीने के लिये जैसे एक समंदर

दोस्ती के लिये फैले हैं इतने लोग
पर दायरों मेंे ही वह निभाता
जिनको जानता है उनसे करता सलाम
अजनबियों से मूंह फेर जाता
दोस्तों में भी अपने और गैर का करता भेद
कीड़े की तरह बहुत से नाम वाले समूह में
अपने लिये ढूंढता छेद
नाचता ऐसे है जैसे बंदर

देखा है अकेले में लोगों को अपना कहते हुए
अपने मिलते ही दूर होते हुए
फिर अपनी हालातों पर अपनों की
बेवफाई पर रोते हुए
फिर भी निकल नहीं पाते दायरों से
लगते हैं कायरों से
फिर भी नहीं तोड़ता भरोसा उनका
वह तोड़ जायें अलग बात है
मजबूर और लाचार हैं
दायरों में कैद रहने की आदत है उनकी
भला मैं उनको कैसे निकाल पाऊंगा
जो जन्म से उनको बांधे हैं
मैं नहीं हूं कोई सिकंदर
……………………………………………
दीपक भारतदीप

इंसान कभी चिराग नहीं हो सकते-हिन्दी शायरी


यूं तो चमकता चाँद देखकर
अपना दिल बहला लेते
पर जब आकाश में नहीं दिखता वह
छोटा चिराग जला लेते हैं
जिन्दगी में अपने
रौशनी के लिए क्यों
किसी एक के आसरे रहें
इसलिए कई इंतजाम कर लेते हैं
इंसानों का भी क्या भरोसा
उजियाले में करते हैं
हमेशा साथ निभाने का
अँधेरा ही होते मुहँ फेर लेते हैं
—————————————
मांगी थी उनसे कुछ पल के लिए रौशनी उधार
उन्होंने अपना चिराग ही बुझा दिया
हमारा रौशनी में रहना
उनको कबूल नहीं था
अँधेरे को अपने पास इसलिए बुला लिया
इंसान कभी चिराग नहीं हो सकते यह बता दिया
————————
दीपक भारतदीप

अकेले होने के गम में इसलिये रोते रहे-कविता


भीड़ में हमेशा खोते रहे
अपने से न मिलने के गम में रोते रहे
नहीं ढूंढा अपने को अंदर
आदमी होकर भी रहा बंदर
लोगों के शोर को सुनकर ही बहलाया दिल
अपनी अक्ल की आंख बंद कर सोते रहे

जमाने भर का बेजान सामान
जुटाते हुए सभी पल गंवा दिये
दिल का चैन फिर नहीं मिला
जो आज आया था घर में
उसी से ही कल हो गया गिला
उठाये रहे अपने ऊपर भ्रम का बोझ
सच समझ कर उसे ढोते रहे
कब आराम मिले इस पर रोते रहे
झांका नहीं अपने अंदर
मिले नहीं अपने अंदर बैठे शख्स से
अकेले होने के गम में इसलिये रोते रहे
………………………….
दीपक भारतदीप

बरसात की पहली फुहार-हास्य कविता


वर्षा ऋतु का की पहली फुहार
प्रेमी को मिली मोबाइल पर प्रेमिका की पुकार
‘चले आओ,
घर पर अकेली हूं
चंद लम्हे सुनाओ अपनी बात
आज से शुरू हो गयी बरसात
मन में जल रही है तन्हाई की ज्वाला
आओ अपने मन भावन शब्दों से
इस मौसम में बैठकर करें कुछ अच्छी बात
अगर वक्त निकल गया तो
तुम्हें दिल से निकालते हुए दूंगी दुत्कार’

प्रेमी पहुंचा मोटर सायकिल पर
दनादनाता हुआ उसके घर के बाहर
चंद लोग खड़े थे वहां
बरसात से बचने के लिये
प्रेमिका के घर की छत का छाता बनाकर
जिसमें था उसका चाचा भी था शामिल
जिसने भतीजे को रुकते देखकर कहा
‘तुम हो लायक भतीजे जो
चाचा को देखकर रुक गये
लेकर चलना मुझे अपने साथ
जब थम जाये बरसात
आजकल इस कलियुग में ऐसे भतीजे
कहां मिलते हैं
मुझे आ रहा है तुम पर दुलार’

प्रेमी का दिल बैठ गया
अब नहीं हो सकता था प्यार
जिसने उकसाया था वही बाधक बनी
पहली बरसात की फुहार
उधर से मोबाइल पर आई प्रेमिका की फिर पुकार
प्रेमी बोला
‘भले ही मौसम सुहाना हो गया
पर इस तरह मिलने का फैशन भी पुराना हो गया है
करेंगे अब नया सिलसिला शुरू
तुम होटल में पहुंच जाओ यार
इस समय तो तुम तो घर में हो
मैं नीचे छत को ही छाता बनाकर
अपने चाचा के साथ खड़ा हूं
बीच धारा में अड़ा हूूं
जब होगी बरसात मुझे भी जाना होगा
फिर लौटकर आना होगा
करना होगा तुम्हें इंतजार’

प्रेमिका इशारे में समझ गयी और बोली
‘जब तक चाचा को छोड़कर आओगे
मुझे अपने से दूर पाओगे
कहीं मेरे परिवार वाले भी इसी तरह फंसे है
करती हूं मैं अपने वेटिंग में पड़े
नंबर एक को पुकार
तुम मत करना अब मेरे को दुलार’

थोड़ी देर में देखा प्रेमी ने
वेटिंग में नंबर वन पर खड़ा उसका विरोधी
कंफर्म होने की खुशी में कार पर आया
और सीना तानकर दरवाजे से प्रवेश पाया
उदास प्रेमी ने चाचा को देखकर कहा
‘आप भी कहां आकर खड़े हुए
नहीं ले सकते थे भीगने का मजा
इस छत के नीचे खड़े होने पर
ऐसा लग रहा है जैसे पा रहे हों सजा
झेलना चाहिए थी आपको
बरसात की पहली फुहार’

चाचा ने कहा
‘ठीक है दोनों ही चलते हैं
मोटर सायकिल पर जल्दी पहुंच जायेंगे
कुछ भीगने का मजा भी उठायेंगे
आखिर है बरसात की पहली फुहार’

प्रेमी भतीजे ने मोटर साइकिल
चालू करते हुए आसमान में देखा
और कहा-
‘ऊपर वाले बरसात बनानी तो
मकानों की छत बड़ी नहीं बनाना था
जो बनती हैं किसी का छाता
तो किसी की छाती पर आग बरसाती हैं
चाहे होती हो बरसात की पहली फुहार
……………………….

कभी कभी आंखों में आंसू आ जाते हैं-हिन्दी शायरी


अपने दर्द से भला कहां
हमारे आंखों में आसू आते हैं
दूसरों के दर्द से ही जलता है मन
उसी में सब सूख जाते हैं

अगर दर्द अपना हो तो
बदन का जर्रा जरौ
जंग में लड् जाता है
तब भला आंखों से आंसु बहाने का
ख्याल भी कब आता है
जो बहते भी हैं आंखों के कभी तो
वह दूसरों के दर्द का इलाज न कर पाने की
मजबूरी के कारण बह आते हैं

कोई नहीं आया इस पर
कभी रोना नहीं आता
कोई नापसंद शख्स भी आया
तो भी कोई बुरा ख्याल नहीं आता
कोइ वादा कर मुकर गया
इसकी कब की हमने परवाह
हम वादा पूरा नहीं कर पाये
कभी कभी इस पर आंखों से आंसू आ जाते हैं
…………………………….
दीपक भारतदीप

hasya kavita-प्यार कोई कारखाने में बनने वाली चीज नहीं है-कविता


मन में प्यास थी प्यार की
एक बूंद भी मिल जाती तो
अमृत पीने जैसा आनंद आता
पर लोग खुद ही तरसे हैं
तो हमें कौन पिलाता

स्वार्थों की वजह से सूख गयी है
लोगों के हृदय में बहने वाली
प्यार की नदी
जज्बातों से परे होती सोच में
मतलब की रेत बसे बीत गईं कई सदी
कहानियों और किस्सों में
प्यार की बहती है काल्पनिक नदी
कई गीत और शायरी कही जातीं
कई नाठकों का मंचन किया जाता
पर जमीन पर प्यार का अस्तित्व नजर नहीं आता

गागर भर कर कभी हमने नहीं चाहा प्यार
एक बूंद प्यार की ख्वाहिश लिये
चलते रहे जीवन पथ पर
पर कहीं मन भर नहीं पाता

जमीन से आकाश भी फतह
कर लिया इंसान
प्यार के लिये लिख दिये कही
कुछ पवित्र और कुछ अपवित्र किताबों
जिनका करते उनको पढ़ने वाले बखान
पर पढ़ने सुनने में सब है मग्न
पर सच्चे प्यार की मूर्ति सभी जगह भग्न
लेकर प्यार का नाम सब झूमते
सूखी आंखों से ढूंढते
पर उनकी प्यास का अंत नजर नहीं आता
प्यार कोई जमीन पर उगने वाली फसल नहीं
कारखाने में बन जाये वह चीज भी नहीं
मन में ख्यालों से बनते हैं प्यार के जज्बात
बना सके तो एक बूंद क्या सागर बन जाता
पर किसी को खुश कोई नहीं कर सकता
इसलिये हर कोई प्यार की एक बूंद के
हर कोई तरसता नजर नहीं आता
………………………………..

तीन क्षणिकाऐं



किसी को खुश देखकर ही
जब मजा आता हो तब
कही तारीफें झूठ में भी
लोग कर जाते हैं
सच से फरेब करने में नहीं सकुचाते हैं
…………………….

सांप से नेवले से पूछा
‘क्या तुम मुझसे दोस्ती करोगे?’
नेवले ने कहा
‘हां, क्यों नहीं
हम दोनों ही जंगली हैं
जंग का मैदान बन चुके
शहर में अपने लिए
कोई जगह बची नहीं
कुछ जगह मालिक अड़े
तो कहीं मजदूर खड़े
दोनों में दोस्ती कभी संभव नहीं
पर हम दोनों में कोई
शोषक या शोषित नहीं
इसलिये खूब जमेगी जब
मिलकर बैठेंगे दो यार
करेंगे एक दूसरे के लिए शिकार
फिर तुमसे क्यों घबड़ाऊंगा
तुम मुझसे क्यों डरोगे‘
………………….

संवेदनहीन हो चुके समाज में
अपनी जिंदगी किसी
दूसरे की दया पर मत छोड़ना
अवसर पाते ही सांप छोड़ दे
पर इंसान नहीं चाहते डसना छोड़ना
……………………..

सभी की सोच मतलब के घर में बंद है-हिंदी शायरी



कोई लिखकर कहे या
अपनी जुबां से बोले
कोई ऐसे शब्द कान में अमृत घोले
मन में छा जाये प्रसन्नता की सरिता
इसी चाहत में उम्र गुजार दी

पर प्यासे रहे हमेशा
कोई नहीं बोल पाया
नहीं लिख पाया कुछ मीठे शब्द
हमने बोले कुछ प्यार के
तो लिखे भी बहुत
पर जमाना ही है लाचार और बेबस
जूझता है अपने दर्द और गमों से
कोई नहीं समझता
प्यार के शब्दों की असलियत
सभी ढूंढते हैं खुशी उधार की
………………………..
मैं कहां तलाश करूं प्यार से
सराबोर शब्दों की
सभी दरवाजे बंद हैं

अपने दिल के दर्द से टूटे लोग
ढूंढ रहे हैं खुशियां
रौशनी के पीछे अंधेरे में
अपने शब्दों से जला सकें
किसी के दिल में उम्मीद का चिराग
कोई ख्याल में भी नहीं लाता
सभी की सोच
अपने मतलब के घर में बंद है
………………………..

जैसी अभिव्यक्ति वैसी ही अनुभूति-हिन्दी शायरी


राह पर चलते हुए जो
मैंने देखी जोर से चिल्लाते लोगों की भीड़
वहां एक खड़े एक आदमी से पूछा
‘यहां क्या हो रहा है’
उसने कहा-‘झगड़ा हो रहा है’

मैं कुछ दूर चला तो जोर जोर से
लोगों को स्तुतिगान गाते सुना
मैंने एक आदमी से पूछा
‘यह इतना शोर क्यों हो रहा है’
उसने गुस्से से कहा

मौसम पर कविता नहीं लिखेंगे-हास्य कविता


आया फंदेबाज और बोला
‘दीपक बापू, गर्मी में हो रही बरसात
जहां रुलाता पसीना, वहां करती बहार अपनी बात
लिखो कोई जोरदार कविता
बहने लगे श्रृंगार रस की सरिता
शायद तुम्हारे नाम से फ्लाप का लेबल हट जाये
हिट होकर तुम्हारा नाम आकाश पर चमक जाये
कोई कुछ भी कहे तुम करो
अपनी पत्रिका पर मौसम पर कविता की बरसात’

जाने को तैयार खड़े थे
बांध रहे थे धोती
सिर पर रख रहे टोपी
सुनकर पहले देखा फंदेबाज को घूरकर
फिर कहैं दीपक बापू
‘दो दिन पहले गर्मी पर
लिखने को कह रहे थे हास्य कविता
अब प्रवाहित करवाना चाहते हो
श्रृंगार रस की सरिता
बहुत लिख चुके तुम्हारे विषयों पर
नहीं बनी हमारी पत्रिका के हिट होने की बात
मौसम का कोई भरोसा नहीं
सर्दी के मौसम में सुबह लिख रहे थे
कंपाकंपाते हुए उस पर गर्म कविता
दोपहर तक निकलने लगा गर्मी में पसीना
गर्मी में लिखने बैठते हैं शाम को
रात तक पानी बरसता है बनकर नगीना
हवा बंद पर लिखने बैठते हैं तो
आंधी चली आती है
मौसम का कोई भरोसा नहीं
यह अंतर्जाल है मेरे मित्र
सारी दुनियां में एक जैसा मौसम नहीं रहता
कहीं कोई बहार में नहाता
तो कोई धूप में गर्मी में सहता
अब पहले जैसा माहौल नहीं है
जो लिखेंगे यहीं पढ़ा जायेगा
अब तो लिखो अपने शहर में
वह विदेश में भी दिखने में आयेगा
इसलिये समझ में नहीं आती
मौसम पर लिखकर हिट होने की बात
यहां हमेशा ही होने लगी है
बेमौसम गर्मी, सर्दी, और बरसात
हमें नहीं जमी तुम्हारी मौसम पर
हास्य कविता लिखने की बात
…………………………….

अपनी असली पहचान खोते जाते-कविता


प्रसिद्ध होने के लिए
चले जाते है उस राह पर
जहां बुरे नाम वाले हो जाते हैं
अगर नाम चमका आकाश में तो
जमीन पर गिरकर चकनाचूर
होने के खतरे भी बढ़ जाते हैं

पत्थरों पर नाम लिखवाने से
लोगों के हृदय में जगह नहीं मिल जाती
हंसी की करतूतों पर लोगों के ताली बजाने से
कुछ पल अच्छा लगता है
पर कोई इज्जत नहीं बढ़ जाती
कुछ पलों की प्रशंसा से
क्यों फूल कर कुप्पा हो जाते हैं
आकाश में उड़ने की ख्वाहिश रखने वालों
पहले जमीन पर चलना सीख लो
जहां खड़े रहने से ही
तुम्हारे पांव लड़खड़ने लग जाते हैं
दूसरे की आंखों में पहचान ढूंढने की
निरर्थक कोशिश में
अपनी असली पहचान खोते चले जाते हैं
………………………..

दिल बहलाने के लिए देख लो सुंदर तस्वीरें कहीं-कविता


हंसते चेहरे देखकर हंसता हूं
दिल बहलाने के लिये दूसरों की
हंसी भी सहारा बन जाती है
किसी के दर्द पर हंसने वाले बहुत हैं
दूसरों को हंसा दें ऐसी सूरतें
कभी कभी नजर आती हैं
नहीं मिलता तो देख लेता हूं
हंसते हुए लोगों तस्वीरें
दर्द से परे जो ले जातीं हैं
………………………………………………

आंखों से देखने का उम्र से
कभी कोई वास्ता नहीं
अगर बहलता हो मन तस्वीरों से
तो कोई हर्ज नहीं
अपनी उम्र देखकर शर्माने से
भला समय कट पाता है
राह चलते किसी का सौंदर्य देखने पर
अगर घबड़ाते हो तो
देख लो सुंदर तस्वीरें कहीं
…………………………………..

सदियों से धोखा देता आया चांद-कविता


 

आज महक जी  के ब्लाग पर एक फोटो और अच्छी गजल देखी। ऐसे में मेरा कवित्व मन जाग उठा। कुछ पंक्तियां मेरे हृदय में इस तरह आईं-

समंदर किनारे खड़े होकर
चंद्रमा को देखते हुए मत बहक जाना
अपने हृदय का समंदर भी कम गहरा नहीं
उसमें ही डूब कर आनंद उठाओ
वहां  से फिर भी निकल सकते हो
अपनी सोच के दायरे से निकलकर
आगे  चलते-चलते कहीं समंदर में डूब न जाना
अभी कई गीतों और गजलों के फूल
इस इस जहां* में  तुम्हें है महकाना

वहां मैंने “अंतर्जाल” लिखा था पर जहां लिख दिया

कभी कभी अंतर्जाल पर ऐसे पाठ आ जाते हैं जिन पर लिखने का मन करता है। तब वहां लिखने के विचार से जब अपना विंडो खोलता हूं और सहजता पूर्वक जो विचार आते हैं लिखता हूं। मैं हमेशा यही सोचता हूं कि अंतर्जाल पर अब मनोरंजक और ज्ञानवद्र्धक मिल जाता है तब उसके लिये कहीं और हाथ पांव क्यों मारे जायें?

इसी कविता पर एक फिर कुछ और विचार आये

समंदर के किनारे
चमकता चांद पुकारे
ऊपर निहारते हुए
एक कदम उठाए खड़े हो
जैसे तुम उसे पकड़ लोगे
पर अपना दूसरा कदम
तुम आगे मत बढ़ाना
सदियों से धोखा देता आया है चांद
किसी के हाथ नहीं आया
इसने कई प्रेमियों को ललचाया
शायरों को रिझाया
पर कोई उसे छू नहीं पाया
उसकी चमक एक भ्रम है
जो पाता है वह सूर्य से
यह हमारी बात पहले सुनते जाना

महक जी अपने ब्लाग पर कई बार ऐसा पाठ प्रकाशित करतीं है कि मन प्रसन्न हो जाता है। हां, मुझे याद आया एक बार उन्होंने अपने पाठ चोरी होने की शिकायत की थी और मुझे तब बहुत गुस्सा आया और उनके बताये पते जब गया था तो वहां उन्होंने अपनी प्यार भरी टिप्पणी रखी थी जिसमें कहीं गुस्सा नहीं बल्कि स्नेहपूर्ण उलाहना थी। तब लगा कि वह बहुत भावुक होकर लिखतीं हैं। यही कारण है कि उनके लिखे से जहां आनंद प्राप्त होता है वही लिखने की भी प्रेरणा मिलती है।
……………………………………….

 

 

विचारों की धारा-कविता


विचारों की धारा मस्तिष्क में
बहती चली जाती है
जब तक बहती है
अच्छा लगता है
जब एक विचार अटक जाता है
रुकी धारा से दुर्गंध आती है
प्रसन्न्ता का समय
बहता जाता हे
पर दुःख के पल में
घड़ी बंद नजर आती है

एकांत से हटकर भीड़ में जाकर
भला कहां मिलती है शांति
अकेले में भी अपनों के दर्द की
याद आकर सताती है

मन में जगह होती है बहुत
देते हैं किराये पर देते चिंताओं को
खौफ लगता है जमाने का
जो खुद लंगड़ाते चल रहा है
किताबों में लिखी लकीरों को
अपनी लाठी बनाकर
उसमें बदनाम होने का भय
अपने अंदर  लाकर
भला कैसे करते हैं उन चिंताओं से
चैन की आशा
जो अपने साथ बैचेनी ले आती है

शब्द अपनी दुनियां स्वयं बसाते है-आलेख और कविता


मैने कई ब्लाग पर हाइकु के रूप में कविताएं पढ़ीं, पर मेरे समझ में नही आता था कि वह होता क्या है। आज मीनाक्षी जी  के ब्लाग पर पढ़ा कि उसे त्रिपदम कहा जाता है। हिंदी में इस विधा के बारे में कहीं लिख गया है तो मुझे पता नहीं पर मुझे लगा कि यह एक मुक्त कविता की तरह ही है। शायद इस विधा को अंग्रेजी से लिया गया होगा और मैं इस आधार पर कोई विरोध करने वाला नहीं हूं। मुख्य बात है कि हम अपनी बात कहना चाहते है और उसके लिये हम गद्य या पद्य किसी में भी लिख सकते हैं।

त्रिपदम(हाइकु) पढ़कर मेरे मन में विचार आया कि आज अपने कुछ विचारों को इस विधा में  लिख कर देखें। कभी-कभी मुझे लगता है कि लोग अपने मन की हलचल को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाते या कभी वह कुछ कहना चाहते है पर कुछ और कह जाते है। हमारा मन बहुत गहरा होता है और हम उसमें डुबकी तो सभी लगा लेते हैं पर वहां से कितने मोती उठा पाते हैं यह एक विचार का विषय है। हम कई बार कहते हैं कि अमुक व्यक्ति बहुत गहराई से लिखता या विचार करता है। इसका यह आशय  यह कदापि नहीं हैं कि कि हम ऐसा नहीं कर सकते हैं। दरअसल जो लोग लिखने या विचार करने मेंे गहराई का संकेत देते हैं वह अपने अंदर से बाहर आ रहे विचार और शब्दों को रोकने का प्रयास नहीं करते। दृष्टा की तरह उनको बाहर लोगों के पास जाते देखते हैं। हां, यह मुझे लगता है। कई बार मेरे साथ ऐसा होता है। जब शब्द और और विचारों के बाह्य प्रवाह के बीच मैं स्वयं खड़ा होने का प्रयास करता हूं तो लगता है कि वह अवरुद्ध हो गया।

मुझे पता नहीं कि मैं अच्छा लिखता हूं कि बुरा? पर कुछ मित्र मेरी कुछ रचनाओं पर फिदा हो जाते हैं और कुछ पर कह देते हैं कि यह क्या लिखा है हमारे समझ में नहीं आया।’ तब मुझे इस बात की अनुभुति होती है कि मैंने खराब कही जा रही रचनाओं के समय अपने विचारों और शब्दों के प्रवाह में अपनी टांग अड़ाई थी। आज जब मेरे मन में हाइकू (त्रिपदम) लिखने का विचार आया तो मैं अपने अ्र्रंर्तमन पर दृष्टिपात कर रहा हूं कि क्या वहां कोई विचार या शब्द हैं जो बाहर आना चाहते है।

मन में उठती कुछ उमंगें
विचारों की बहती तरंगें
आशाओं की उड़ती पतंगें

मौसम के खुशनुमा होने का अहसास
किसी का हमदर्द बनने का विश्वास
प्यार में वफादारी की आस

अनुभूतियों से भरा तन
अभिव्यक्त होना चाहता मन
शब्द चहक रहे खिलाने को चमन

जब तलाशता हूं उनका रास्ता
संदर्भों से जोड़ता हूं उनका वास्ता
सोचता हूं परोसूं जैसे नाश्ता

तब असहज हो जाता हूं
अपने को भटका पाता हूं
नयी तलाश में पुराना भूल जाता हूं

जब हट जाता हूं उनके पास से
रचना होने की आस से
अपने अस्तित्व के आभास से

तब वह कोई कविता बन जाते हैं
या कोई कहानी सजाते हैं
शब्द अपनी दुनिया स्वयं बसाते है

यह मेरा त्रिपदम(हाइकु) लिखने का एक प्रयास है। मुझे इसे लिखना बहुत अच्छा लगा। यह अलग बात है कि पढ़ने वाले इस पर क्या सोचते है। मेरा प्रयास अपने को अभिव्यक्त करना होता है और प्रयास यही करता हूं कि अपने आपसे दिखावा नहीं करूं। हमेशा ऐसा नहीं कर पाता यह अलग बात है।

इंसान तो कठपुतली है-हास्य कविता


आदमी के पंख नहीं होते
जो वह आसमान में उड़ सके
पर उसका मन बिना पंख के ही
उड़ता चला जाता है
उसके पांव आदमी की काबू में होते नहीं
पंरिदे बनाते हैं लोगों के घर में भी घरोंदे
पर उनके बिस्तर पर सोते नहीं
खुशी में झूमकर नाचता इंसान
दुःख  में अपने ही आंखो से बहती
अश्रुधारा में करता स्नान
पर परिंदे कभी रोते नहीं
अपने मन के इशारे पर
कठपुतली की तरह नाचता
कितने भी दावे करे कि
खुद ही चल रहा है इस जीवन पथ पर
अपनी अक्ल पर है उसका काबू
कराती है इंसान की  जुबान दावे आजाद होने के
पर कभी वह सच्चे होते नहीं
अपनी जरूरतों से आगे नहीं उड़ते
इसलिये परिंदे कठपुतली नहीं होते
यह सच है
अपनी ख्वाहिशों के हमेशा गुलाम
रहने वाले  इंसानों के लिये
साबित करना बहुत मुश्किल है कि
वह कठपुतली होते नहीं
……………………………………………………..

कठपुतली ने चिडि़या से कहा
‘देखो, मैं नाच  और गा सकती हूं
पर तुम ऐसा नहीं कर सकती
मुझे तुम पर तरस आता है’

चिडि़या ने उसकी डोर पकड़ने वाल  नट की
गर्दन पर चांेच मारी तो वह चिल्लाया
छूट गयी उसके हाथ से  डोर
उसने कठपुतली को इस तरह नीचे गिराया
चिडि़या ने लौटकर चिड़े से कहा
‘आदमी कठपुतली को आगे कर बोलता
अपने मन के इशारे पर डोलता 
बोलने से पहले कभी शब्द नहीं तोलता 
दावे करता है आकाश में उड़ने का
कभी ऐसा नहीं करता तब  मचा रहा है शोर
उड़ता तो क्या हाल करता
सर्वशक्तिमान ने इसलिये इसको पंख नहीं लगाया
उड़ने के ख्वाब देखता रहे इसलिये
इंसान को मन की कठपुतली बनाया
……………………………………………………..

दीपक भारतदीप

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मोबाइल मोहब्बत हो गई-हास्य कविता


प्रेमी ने प्रेमिका के मोबाइल की
घंटी बड़ी उम्मीद से बजाई
जा रही थी वह गाड़ी पर
चलते चलते ही उसने
अपने मार्ग में होने की बात उसे बताई
फिर भी वह बातें करता रहा
वह भी सुनती रही
सफर गाड़ी पर उसका चलता रहा
अचानक वह कार  से टकराई
प्रेमी को भी फोन पर आवाज आई
प्रेमी ने पूछा
‘क्या हुआ प्रिये
यह कैसी आवाज आई
कोई ऐसी बात हो तो मोटर साइकिल पर
चढ़कर वहीं आ जाऊं
मुझे बहुत चिंता घिर आई’
प्रेमिका ने कहा
‘घबड़ाओ नहीं कार से
मेरी गाड़ी यूं ही टकराई
अपनी मरहम पट्टी कराकर अभी आई
करा देगा यह कार वाला उसकी भरपाई+’

प्रेमी करता रहा इंतजार
फिर नहीं प्रेमिका की कोई खबर आई
एक दिन भेजा संदेश
‘जिससे मेरी गाड़ी टकराई
उसी कार वाले से हो गयी  मेरी सगाई
बहुत हैंडसम और स्मार्ट है
उसने मुझ पर बहुत दया दिखाई
इन दो पहियों की गाड़ी से
तो अब हो गयी ऊब
चार पहियों वाली गाड़ी में ही
अब घूमने की इच्छा आई’

प्रेमी सुनकर चीखा
‘यह कैसा मोबाइल है
जिसने मोहब्बत को भी बनाया
अपने जैसा
कितना बुरा किया मैंने जो
उस दिन मोबाइल की घंटी बजाइ
……………………………………….

नोट-यह हास्य कविता काल्पनिक है तथा इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई लेना-देना नहीं है। अगर किसी की कारिस्तानी से मेल हो जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा।

क्रिकेट में अब देशप्रेम का सुख नहीं उठाते-हास्य कविता


आया फंदेबाज और बोला
‘क्या दीपक बापू किक्रेट भूल गये देखना
पता नहीं तुम्हें अब यहां
क्रिकेट मैच चल रहे हैं
तुम्हारे नेत्र उनका आनंद उठाने की बजाय
कंप्यूटर में जल रहे हैं
क्यों नहीं कुछ मजा उठाते’

सुन कर पहले उदास हुए
फिर टोपी लहराते हुए कहें दीपक बापू
‘जजबातों में बहकर देख लिया
जिनकी जीत पर हंसे
और हारने पर रोए
उनके खिलवाड़ को सहकर देख लिया
कमबख्तों ने  पहले राष्ट्रप्रेम जगाने के लिये
आजादी के गाने सुनवाये
और हमारे जजबातों से खूब पैसे बनाये
अब क्रिकेट हो गया बाकी सब जगह कंगाल
विदेशी खिलाड़ी हो रहे बेहाल
किसी भी तरह इस देश में ही कमाना है
पर बाहर ही तो रखना अपना खजाना है
इसलिये देश में अंदर ही बंटने के लिये
देश की बजाय टीमों के नाम की भक्ति के लिये
नये-नये मनोरंजक तराने बनवाये
अब तो देशप्रेम उनको सांप की तरह
डसने लगता है
क्योंकि विदेशी नाराज न हो जायें
इससे शरीर उनका कंपता है
हमें तो लगने लगा है कि
इतिहास में ही आडम्बर भरा पड़ा है
गुलामी का दैत्य तो अब भी यहीं खड़ा है
कभी इस देश को एक करने के लिये
सब जगह नारे लगे
अब बांटने के लिये सितारे लगे
पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण में
मनोरंजन के नाम पर बांटा जा रहा है
देशप्रेम से शायद व्यापार नहीं होता
विश्व के सबसे उपभोक्ता यहीं हैं
उनको बांटने से ही कई लोगों का
बेड़ा पार यहीं होता
देशप्रेम हम नहीं छोड़ पाते
उसके नाम के बिना क्रिकेट में सुख नहीं पाते
लोग उसे भुलाने के लिये
बन  रहे हैं बैट बाल के खेल में
पेश कर रहे हैं नृत्य और गाने
उसे देखेंगे शोर के दीवाने
हास्य कविता लिखेंगे हम जैसे सयाने
अब हम क्रिकेट से मनोरंजन नहीं उठाते
……………………………………

तब तक बहुत देर हो जायेगी-हास्य कविता


हर शाख पर उल्लू बिठा दो
जब बिजली चली जायेगी
वह तरक्की-तरक्की के नारे लगायेगा
लोग समझेंगे सब ठीक-ठाक है
अंधेरे में भला किसे तरक्की नजर आयेगी
………………………………………………………………………..
तरक्की हो रही चारों तरफ
भ्रमित लोग चले जा रहे यह सोचकर कि 
कहीं हमें भी मिल जायेगी
जमीन में धंसता जा रहा  है पानी
आदमी में कहां रहेगा
घर में बढ़ते कबाड़ में खोया
जब गला तरसेगा  पानी को
तब उसे समझ आयेगी
पर तब तक बहुत देर हो जायेगी
…………………………………………………………..

उसने कहा
‘मैं तरक्की करूंगा
आकाश में तारे की तरह
लोगों के बीच चमकूंगा
मेरी ख्याति चारों और फैल जायेगी’
बरसों हो गये वह घूमता रहा
रोटी से अधिक कुछ हाथ नहीं आया
अब कहता है
‘‘इतनी कट गयी जिंदगी
जो बची है वह भी कट जायेगी’
पढना जारी रखे

बंधे सबके अपनी मजबूरी से हाथ-हिन्दी शायरी (hand of men-hindi shayri)


यूं दर्द बांटने चले थे जमाने के साथ
शायद बढे मदद के लिए अपनी तरफ हाथ
हम खड़े देखते रहे
लोग हंसते रहे
जो हमने पूछी वजह तो
बताया‘यहां सब सुनाने आते हैं दर्द
कोई नहीं बनता  किसी का हमदर्द
मूंहजुबानी बहुत वादे करने की
होड़ सभी लोग करते
पर देता कोई नहीं साथ
बंधे सबके  अपनी मजबूरी से हाथ

जो बडे हैं वह कभी संयम नहीं गंवाते-हास्य कविता


आया फंदेबाज और बोला
”क्या दीपक बापू हम तो
समझते थे कोई भारी भरकम लेखक को
पर हम अब समझे हमें भरमाते हो
सभ्य शब्दों की बात करते हो
गालियाँ लिखने में शर्माते हो
देखो अंतर्जाल पर बडे-बडे लेखकों के नाम का
लेखक गालिया चाप (छाप) जाते
और लोग तारीफ भी कर आते”

सुन पहले चौंके
फिर कुर्सी से उठकर
टोपी को घुमाते कहानी दीपक बापू
”लोगों की हताशा और निराशा दूर करने का
ठेका वैसे हमने नहीं लिया
अभिव्यक्ति की आजादी है
किसी का मुहँ सिलने का
काम हमने कभी नहीं किया
करते हो गालियों की बात
हम नहीं लिखेंगे
चाहे तालियाँ बजे या पड़े लात
लोगों का क्या
जो लेखक होते सामने
उनका पूछते नहीं
पीठ पीछे उनके नाम की
कविताओं के गुणगान कर जाते
समझना तो दूर कभीं पढीं भी
नहीं होगी जिन कवियों की कवितायेँ
उनके पीछे गाते हैं उनकी गाथाएं
और अपना प्रभाव जमाने के लिए
उनकी गालियाँ चिपका जाते
दूसरों पर लाशों का व्यापार करने का
आरोप लगाने वाले
स्वर्गवासी लोगों के नाम से
गालियाँ छपने के लिए आते
अपने दिल के अरमान दबाये दिल में
बडे कवियों के नाम से वाह-वाही लूट जाते
हिन्दी भाषा का है बहुत बडा इलाका
दर्द भी बहुत है यहाँ
इसलिए कवि और लेखक भी बहुत हैं
सबको कौन पढ़ पाता
इसलिए लोग अपनी बात उनसे नाम से
चिपका जाते
हम तो बस इतना जानते कि
जो बडे हैं वह कभी अपना संयम नहीं गंवाते”
———————————————-

होली के दिन सबका चरित्र बदल जाता है-हास्य कविता


घर से नेकर और कैप पहनकर
निकले घर से बाहर निकले लेने किराने का सामान
तो सामने से आता दिखा फंदेबाज
और बिना देख आगे बढ़ गया किया नही मान
तब चिल्ला कर आवाज दी उसे
”क्यों आँखें बंद कर जा रहे हो
अभी तो दोपहर है
बिना हमें देखे चले जा रहे हो
क्या अभी से ही लगा ली है
या लुट गया है सामान’

देखकर चौंका फंदेबाज
”आ तो तुम्हारे घर ही रहा हूँ
यह देखने कल कहीं भाग तो नहीं जाओगे
वैसे पता है तुम अपने ब्लोग पर
कल भी कहर बरपाओगे
पर यह क्या होली का हुलिया है
कहाँ है धोती और टोपी
पहन ली नेकर और यह अंग्रेजी टोपी
वैसे बात करते हो संस्कृति और संस्कार की
पर भूल गए एक ही दिन में सम्मान”

हंसकर बोले दीपक बापू
”होली के दिन सभी लोगों का
चरित्र बदल जाता है
समझदार आदमी भी बदतमीजी पर उतर आता है
बचपन में देखा है किस तरह
कांटे से लोगों की टोपी उडाई जाती थी
और धोती फंसाई जाती थी
तब से ही तय किया एक दिन
अंग्रेज बन जायेंगे
किसी तरह अपना बचाएंगे सम्मान
वैसे भी पहनने और ओढ़ने से
संस्कार और संस्कृति का कोई संबंध नहीं
मजाक और बदतमीजी में अंतर होता है
हम धोती पहने या नेकर
देशी पहने या विदेशी टोपी
लिखेंगे तो हास्य कविता
बढाएंगे हिन्दी का सम्मान
——————————–

तुम्हारी रक्षा करेगा ज्ञान-साहित्यक कविता


गुरु ने शिष्य को विदा
करने से पहले पूछा
”तुम अब जाओगे
जीवन के पथ पर
चल्रते जाओगे प्रगति पथ पर
सेवा करोगे या चाहोगे सम्मान
शिष्य ने कहा
”गुरु आपने कहा था
ज्ञान कभी पूरा किसी का हो नहीं सकता
मैं तो अभी भी चाहूंगा ज्ञान”

गुरु ने खुश होकर कहा
”तब तो तुम सेवा से स्वत: बडे हो जाओगे
हर सम्मान से परे पाओगे
नहीं होगा अभिमान
हमेशा तुम्हारी रक्षा करेगा ज्ञान’
——————————-

सच का भला कौन साथी होता-कविता


अगर अकेले चल सकते हो
जिन्दगी की राह पर
तो सत्य बोलो जो
हमेशा कड़वा होता
अगर अपने इर्द-गिर्द जुटाना चाहते हो
लोगों की भीड़ तो
झूठ बड़ी सफाई से बोलो
जो हमेशा मीठा होता

यहाँ सब सच से घबडाए
भ्रम की छाया तले
जिंदा रहने के आदी हैं लोग
सर्वशक्तिमान के नाम पर
बताये संदेशों की दवा बनाकर
किया जाता है उसका दूर रोग
पर सच यह कि
भ्रम का कोई इलाज नहीं होता
जिसने जीवन दिया
उसी सर्वशक्तिमान के क्रुद्ध होने का भय
दिखाते कई सयाने
तंत्र-मन्त्र से लगते दर्द भगाने
उनको ढोंगियों के चंगुल से
कभी कोई बचा नहीं सकता
जाली धंधे का जाल भी
इतना कमजोर नहीं होता

मन का अँधेरा आदमी को
खुशी की खातिर कहाँ-कहाँ ले जाता
मिलता रौशन चिराग का पता
वहाँ अपनी देह खींच ले जाता
जिन पर हैं जमाने के दिल को रौशन
करने का ठेका
वह भी नकली चिराग बेच रहे हैं
पुरानी किताबों के संदेशों पर
चुटकुलों के पैबंद लगाकर
लोगों से पैसे अपनी और खींच रहे हैं
सच कह पाना लोगों से कठिन है
क्योंकि उसमें आदमी अकेला होता
सच का भला कौन साथी होता

महिला जाग्रति के लिए-हास्य कविता


प्रदूषण पर आयोजित कार्यक्रम में वह विद्वान
बोल रहे थे
”घर से कितना भी सजकर
सड़क पर खुले में जाएं
तो गाड़ियों के धुएं में
सबके चेहरे काले हो जाएं
अगर जाएं बंद गाडी में
करें अपना सफर पूरा तो
लोगों को अपनी सुन्दरता पर
ध्यान कैसे दिलाएं
दुनिया में फैले प्रदूषण से
महिलाओं को खास परेशानी है
हम चाहते हैं कि इस समस्या को सब
मिलकर सुलझाएं”

कार्यक्रम की समाप्ति पर
वह आयोजकों से बोले
देखो मैं महिलाओं की समस्याओं को ही
उठाता हूँ और अब मेरा नाम
महिला जागृति के लिए
जहाँ भी पुरस्कार मिलता हो
वहाँ जरूर भिजवाएं’
————————–

कमेन्ट ही रजाई का काम कर जायेगी-हास्य कविता


आकर फंदेबाज बोला
”दीपक बापू
इस ठंड में क्या
कीबोर्ड पर उंगली नचा रहे हो
लो लाया हूँ बोतल
तुम तो अब हो गए हो काईयाँ
शराब का नशा छोड़
ब्लोग पर पोस्ट पर लगे कमेन्ट के
पैग पीकर
जेब के पैसे बचा रहे हो’

सुनकर उखड़े दीपक बापू पहले
फिर सिर पर रखी टोपी घुमाते बोले
‘कह गए बुजुर्ग
अधिक नशा करना ठीक नहीं
साथ ही यह भी कहा है कि
अधिक खर्च करना ठीक नहीं
ब्लोग पर पोस्ट लिखने का नशा भी
सिर पर चढा हो
तो फिर शराब क्या काम करेगी
डबल हो गया नशा तो हैरान करेगी
तुमने बताया है तो देखो ठंड के मारे
हमारे हाथ काँप रहे हैं
वरना हमें क्या पता कि
कल पारा जीरों पर जायेगा
तुम घर में ही घुसे रहना
यहाँ आकर हमें खबर न करना
वरना पोस्ट लिखने का नशा उतर जायेगा
यह बोतल भी ले जाओ
ठंड से यह क्या बचायेगी
एकाध कमेन्ट टपक पडी तो
उसकी गर्मी ही रजाई का काम कर जायेगी
अगर कमेन्ट नहीं आयी तो
चौपालों पर जाकर ढूंढेंगे
अंतर्जाल का कोई गरम पोस्ट वाला ब्लोग उसी पर
फड़कती कमेन्ट लगाकर
लिखेंगे कोई हास्य कविता
जो हमारी क्या सब साथियों को
सर्दी में भी गर्मी का अहसास कराएगी
—————————————————–

जल्दी टीवी बनवा लेना-हास्य कविता


घर में घुसते ही बाप ने बेटे से कहा
”बेटा तुम्हारी मां के कमरे में रखा टीवी
खराब हो गया है
अगर तुम बचना चाहते हो
गृहयुद्ध से तो आज
अपने कमरे में रखे टीवी के
प्लग में गडबडी कर देना
ताकि सास के मन को भी हो जाये तसल्ली
आज खामोश रहे
कल छुट्टी के दिन मां का टीवी
किसी भी तरह बनवा लेना
वैसे भी सास-बहु के सीरियल की
भयानक आवाजे सुनते
और बीभत्स दृश्य देखते
बोर हो गया हूँ
पर फिर भी टीवी जल्दी बनवा लेना
नहीं तो जो अभी तक
सीरियल में चल रहा है
उसे अपने घर के परदे पर
देखने का मन बना लेना
———————————-

चजई-अक्ल का करो व्यायाम, लगाओ चालाकियों पर विराम-हास्य कविता


चतुरों के होते चार कान
सुने किसी की नहीं
हमेशा अपनी छेड़ें तान
ज्ञान, विज्ञान, पत्रकारिता, उद्योग और व्यापार में
जहाँ भी गए
मात खा जाते हैं हम
इधर से बचाएँ उधर से पकड़ लेते कान
हम ठहरे अल्हड़ और मस्त
सब जगह फ्लॉप हो जाते थे
वह दूसरों को टोपी पहनाकर
खुद भी हिट हो जाते थे
हम झेलते अपमान
कहते हैं कि काठ की हांडी
सिर्फ एक बार ही चढ़ती
पर उनकी चतुराई होती है ऐसी कि
कई बार बीरबल की खिचडी की तरह पकती
सहृदय लोगों को नहीं होता इसका भान

कहै दीपक बापू
सब करो अक्ल का व्यायाम
सुबह उठकरलगाओ हमेशा ध्यान
तो दुनिया में हर धोखे का आभास
तुम्हें पहले ही हो जायेगा
हम तो हैरान होते हैं जब लोग
हो जाते हैं ठगी का शिकार
अपनी अक्ल को नहीं करते
दूसरे का मान लेते हैं सही विचार
हम भी रहे हमेशा चालाकियों का शिकार
पर अब पल-पल रहते हैं सजग
अपने शब्दों से खेलते हैं
न गाली देना न धमकाना
बस व्यंजना विधा में
हास्य कविता ही बरसाना
तुम भी सीख लोगे ऐसी शब्दों की जादूगरी
जब लगाओगे ध्यान
तुम्हारा भी लोग करेंगे सम्मान
———————————–

नोट-यह काल्पनिक हास्य रचना है. इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है.

क्रिकेट में फिल्म जैसा एक्शन


फिल्म चल रही कि क्रिकेट
हो रहा है मतिभ्रम
बैट-बाल का खेल होते-होते
एक्शन सीन आ जाता है कि
फिल्म वालों को भी आये शर्म
जिसे फिल्म से परहेज जो
वह भी अपने खिलाड़ी को पिटते देख
हो जाता गर्म

कहैं दीपक बापू
विश्वास तो पहले भी नहीं था
अब भी नहीं होता
फिल्म वालों की संगत जब से
क्रिकेट वालों से हुई है
पटकथा लेखकों के सहारे
मैच में एक्शन चलता लग रहा है
एक्शन की वजह से
फिल्में देखना बंद कर दीं
पर क्रिकेट में भी उसका रंग
चढ़ता लग रहा है
कोई पटकथा लिख रहा है
पीछे बैठकर
जो जानता है मैच और कहानी का मर्म
वरना ऐसे कैसे हो जाता है
जब लगता है कि बस अब होगा
इस श्रंखला का दुखांत अंत
पर हो जाता है सुखांत
जो गरम होकर प्रहार करने की
मुद्रा दिखाता है
अचानक हो जाता है नरम
———————————-

पुराने रिकार्ड के सहारे अब नहीं चलेगा नाम-हास्य कविता


कितने दिनों के बाद
प्राचीनतम बल्लेबाज सह्बाग ने
बना शतक और अब
कगारुओं पर पर बरस रहे
तब तक मुहँ पर ताला जब
बल्ला खामोश
लोग अभी बडे मैच में उनके रनों को तरस रहे

कहै दीपक बापू
नाम ने उनका कंगारू
उनके लिए एक बकनर क्या
कई अंपायर उस जैसा बनने के लिए तरस रहे
पर अभी भी तुम्हारा इम्तहान बाकी है
छोटे मैच का शतक तुम्हें हीरो नहीं बनाता
बडे मैच में महीनों हो गए
रन बनाने में तुम्हारा नाम नहीं आता
जुबान से गर्जना होता आसान
बाल खेलने के लिए
हाथों और पांवों कर जोर काम आता
तुम्हारे ‘फुटवर्क’ में अभी ढेर दोष नजर आता
कहीं फिर न हो जाओ टाँय-टाँय फिस्स
अपना मुहँ चलाते रहो
पर अभी बाकी है
तुम्हारे लिए रन बनाने का काम
पुराने रिकार्ड के सहारे अब नहीं चलेगा नाम

आसमान से अब फ़रिश्ते नहीं आते


आसमान से अब फ़रिश्ते नहीं आते
विचार खुले होना अच्छा है
पर आंख्ने भी खुली रखना
यकीन करना अच्छा है
पर कदम-कदम पर है
धोखे भीं हजार हैं
अपना हर कदम
सतर्कता से रखना

सुन्दर शब्दों का जाल
फैलाया जाता है चहूं ओर
अर्थहीन लाभ दिखाए जाते है
जिनका नहीं होता कहीं ठौर
शिकारी अब ऐसा जाल बिछाते हैं
पंक्षी बिना दाना डाले फंस जाते हैं
तुम शिकार होने से बचना

कहीं एक के साथ एक फ्री का नारा
कहीं भारी भरकम गिफ्ट का नज़ारा
कोई करता हैं भारी छूट का वादा
कोई बताता अपने ही लुटने का aaj
खरीदने निकलो बाजार में तो तुम भी
एक सौदागर बन जाना
अपनी नज़र पैनी रखना

कहैं दीपक बापू
अब आसमान से नहीं आते
ऐसे फ़रिश्ते
जो दूसरे को मालामाल कर दें
लोगों के झुंड के झुंड जुटे हैं
अमीर बनने के लिए
वह ऐसे नही है
किसी दूसरे के लिए कमाल कर दें
तुम अपना ईमान नहीं छोड़ना
अपने ख्वाबों को सच करने की
जंग खुद ही जीतने की बाट जोहना
किसी दूसरे के दिखाए सपने में
अपनी जिन्दगी फंसाने से बचना
यहां कोई ख़्याल से फ्री दिखता है
किसी का माल फ्री बिकता है
कोई फ्री में लिखता है
पर यहां कुछ फ्री नहीं है
सिवाय तुम्हारी जिन्दगी के
इसे फ्री में बेकार करने से बचना
——————-

धर्म के रास्ते


दुनिया से ऊबकर लोग
धर्म के रास्ते जाते
ढूंढते ठिकाने वही
जहाँ तख्तियाँ लगी होती
सर्वशक्तिमान के नाम की
पीछे अधर्म के होते अहाते
अपने अन्दर बैठे शख्स को देख पाते
तो शायद जान पाते
जिन्दगी केवल पाते रहने का नाम नहीं
जिस पर अपने जीवन के सभी पल लुटाते
————————————-

शांति लाने का दावा
——————–

बारूद के ढेर चारों और लगाकर
हर समस्या के इलाज के लिए
नये-नयी चीजें बनाकर
आदमी में लालच का भूत जगाकर
वह करते हैं दुनिया में शांति लाने का दावा

बंद कमरों में मिलते अपने देश की
कुर्सियों पर सजे बुत
चर्चाओं के दौर चलते
प्रस्ताव पारित होते बहुत
पर जंग का कारवाँ भी
चल रहा है फिर भी हर जगह
होती कुछ और
बताते और कुछ वजह
जब सब चीज बिकाऊ है
तो कैसे मिल सकता है
कहीं से मुफ्त में शांति का वादा
बहाने तो बहुत मिल जाते हैं
पर कुछ लोग का व्यवसाय ही है
देना अशांति को बढावा

एक दुकान से खरीदेंगे शांति
दूसरा अपनी बेचने के लिए
जोर-जोर से चिल्लाएगा
फैलेगी फिर अशांति
जब फूल अब मुफ्त नहीं मिलते
तो बंदूक और गोली कैसे
उनके हाथ आते हैं
जहाँ से चूहा भी नहीं निकल सकता आजादी से
वहाँ कोहराम मचाकर
वह कैसे निकल जाते हैं
विकास के लिए बहता दौलत का दरिया
कुछ बूँदें वहाँ भी पहुंचा देता है
जहाँ कहीं शांति का ठेकेदार
कुछ समेट लेता है
जानते सब हैं पर
दुनिया को देते हैं भुलावा
न दें तो कैसे करेंगे शांति लाने का दावा

चिंता का रोग


टूटते-बिखरते समाज को
बचाने के लिए जूझते लोग
रिवाजों और रीतियों को निभाकर
अपने लिए सम्मान ढूंढते लोग
चिंताओं में पाल रहे हैं रोग
——————————-

चिंता देती है कई रोगों को जन्म
पर उनसे क्या कहेंगे
जिनको चिंता के साथ जीने की
आदत हो गयी
ज्ञान सब बघारते हैं सभी
‘करने वाला तो करतार है’
पर फिर आ जाता है ख्याल
तो कहते हैं कि
”चिंता तो करनी पड़ती है
वरना हमारे काम कैसे होंगे
हमारी जिन्दगी तो हराम हो गयी’

”मैं अपनी पोस्ट का शीर्षक बदलता हूँ”


एक ब्लोगर ने अपने ब्लोगर ने
अपनी पोस्ट पर लिखी कहानी
शीर्षक लिखा ”मैं प्यार करता चाहता हूँ’
पढ़ने वालों ने बस उसे ही
पढा और अपने लिए प्रस्ताव समझकर
कई ने लगा दिए
स्वीकृति भरे कमेन्ट
ब्लोगर हैरान हुआ
समझ गया केवल शीर्षक ने ही किया है
यह घोटाला
तब उसने दूसरी पोस्ट लिखी
”मैं अपनी पोस्ट का शीर्षक बदलता हूँ’
——————————–


पोस्ट भले फटीचर हो शीर्षक फड़कता हुआ लगाएं
————————————–

किसी भी रचना की मुख्य पहचान उसका शीर्षक होता है। अगर कभी कोई शीर्षक आकर्षक होता है तो लोग उसे बडे चाव से पढ़ते हैं और कही वह प्रभावपूर्ण नहीं है तो लोग उसे नजरंदाज कर जाते हैं। हालांकि इसमें पढ़ने वाले का दोष नहीं होता क्योंकि हो सकता है उसे वह विषय ही पसंद न हो दूसरा विषय पसंद हो पर शीर्षक से उस पर प्रभाव न डाला हो. वैसे भी हम जब अखबार या पत्रिका देखते हैं तो शीर्षक से ही तय करते हैं कि उसे पढ़ें या नहीं।

मैने एक ब्लोग पर एक नाराजगी भरी पोस्ट देखी थी जिसमें चार ब्लोगरों के नाम शीर्षक में लिखकर नीचे इस बात पर नाराजगी व्यक्त की गयी थी कि लोग शीर्षक देखकर कोई पोस्ट पढ़ते हैं। इसलिए प्रसिद्ध ब्लोगरों के नाम दिये गये हैं ताकि ब्लोगर लोग अपनी गलती महसूस करें। जैसा की अनुमान था और कई ब्लोगरों ने उसे खोला और वहां कुछ न देखकर अपना बहुत गुस्सा कमेंट के रूप में दिखाया। उत्सुक्तवश मैने भी वह पोस्ट खोली और उससे उपजी निराशा को पी गया। इस तरह पाठकों की परीक्षा लेना मुझे भी बहुत खला क्योंकि उस ब्लोगर ने यह नहीं सोचा ही ब्लोग पर कोई ऐसा पाठक भी हो सकता है और जो ब्लोगर नहीं है और उसे कुछ समझ नहीं आयेगा।

हालांकि मैं कई बार ऐसी रचनाएँ- जो की कवितायेँ होतीं है- अनाकर्षक शीर्षक से डाल जाता हूं जिनके बारे में मेरा विचार यह होता है कि इसे आकर्षक शीर्षक डालकर अधिक लोगों को पढ़ने के लिए प्रेरित करना ठीक नहीं होगा, यह अलग बात है कि मुझे जो नियमित रूप से पढ़ते हैं वह मुझे जानने लगे हैं और वह मेरी कोई पोस्ट नहीं छोड़ते। एक मित्र ने लिखा भी था कि आप कभी-कभी ऐसा हल्का शीर्षक क्यों लगाते हैं कि अधिक लोग न पढ़ें।

अभी दो भारत में ही रहने वाले ब्लोगरों से शीर्षक में ही पूछा गया था कि क्या अफगानिस्तान में रहते हैं। उस ब्लोगर ने लिखा था कि लोगों का ध्यान आकर्षित हो इसलिए ऐसा लिखा है ताकि दूसरे ब्लोगर भी अपनी गलती सुधार लें। मैं उस ब्लोगर की तारीफ करूंगा कि उसने सही शीर्षक लगाया था ताकि उसे अधिक ब्लोगर पढ़ें। उसकी पूरी जानकारी काम की थी। उसके बाद मैने अपने एक ब्लोग को देखा तो वह भी अफगानिस्तान में बसा दिख रहा था और उसे सही किया। पोस्ट छोटी थी पर काम की थी-और जैसा कि मैं हमेशा कह्ता हूं कि अच्छी या बुरी रचना का निर्णय पाठक पर ही छोड़ देना चाहिये। इसलिए अपनी पोस्ट भले ही फटीचर लगे पर शीर्षक तो फड़कता लगाना चाहिये पर पाठकों की परीक्षा लेने का प्रयास नहीं करना चाहिये। एक बार अगर किसी के मन में यह बात आ गयी कि उसे मूर्ख बनाया गया है तो वह फिर आपकी पोस्ट की तरफ देखेगा भी नहीं।

बेनजीर एक नजीर बन गयी


सुन्दर चेहरा
समुन्दर जैसे गहरी ऑंखें
खुशदिल और शिक्षित व्यक्तित्व
की मल्लिका बेनजीर को
किसकी  नजर लग गयी

५४ वर्ष में खिला एक
फूल पल भर में मसल डाला
दानव नहीं लगा सकते एक फूल भी
पर बाग़-बाग़ के उजाड़ डालते हैं
इंसानों के भेष में सब इंसान नहीं होते
भला क्या सब यह जानते हैं
भोली भाली एक औरत
मर्दों की राजनीति की बलि चढ़ गयी

हिंसा का खेल कौन रचता है
अपने लिए  रखता है आजादी
औरत को गुलाम बनाने के लिए
कई किताबें लिख बचता है
लिखी जायेगी कोई किताब उस पर
फिर कभी किसी आदमी द्वारा
बेनजीर किताब का एक पन्ना बन गई

उसने किया उन लोगों पर भरोसा
जिनके घर के चिराग 
भले लोगों के खून से रौशन होते हैं
अपने कफ़न  बेचने के लिए
बाजार में कत्लेआम बेचते हैं
धोखे तो हर पल होते हैं यहाँ
बेनजीर भी एक नजीर बन गयी   

छोटा आदमी-बड़ा आदमी


आदमी बड़ा या उसकी माया
दौलत बड़ी की आदमी की काया
हर पल बदलती इस दुनिया में
रूप बदलती है माया
पर ढहती जाती है काया
कभी साइकिल थी अमीर की सवारी
आज हो गई है कार
कभी पैडल मार कर चलते हुए बडे आदमी को
देख रास्ता छोड़ देते थे कि
कहीं टक्कर न मारे साथ में
जड़ दे गाल पर दो हाथ
आज घर से निकलते हैं
भय खाते हुए कि कार चढाकर
न निकल जाये और बना जाये लाश
उन पर तो है काली दौलत की छाया
पर हादसे किसका पीछा छोड़ते हैं
छोटा आदमी तो जमीन का
जमीन पर ही गिरता है
बडों को ऊपर भी नहीं छोड़ती
हादसों की छाया
आदमी करता माया के
चक्कर में छोटे-बडे का भेद
जिन्दगी और मौत ने कभी
यह भेद नहीं दिखाया
———————

जिन्होंने अमीरी के पलने में
आँख खोली है
उन्हें गरीबी में भी सौदर्य का
बोध होता है
और ईर्ष्या होती है
उन्हें बिना सुविधाओं के जिंदा देखकर
जिन्होंने गरीबी ने पाला है
उन्हें शायद इस बात का आभास नहीं होता
कि दौलतमंद के दिल में
उसके दुख के लिए कोई दर्द नहीं
वरन सह नहीं पाते अमीर
उसकी चलती साँसें भी देखकर
———————————————

अपने मन में है बस व्यापार


जो हाथ मांगने के लिए उठते हैं
उनके हाथ कुछ तो आ जाता है
पर सम्मान पाने की आशा
उनको नहीं करना चाहिए
जिनकी जुबान का हर शब्द
मांगने में खर्च हो जाता है
———————————–

अपने मन में है बस व्यापार
बाहर ढूंढते हैं प्यार
मन में ख्वाहिश
सोने, चांदी और धन
के हों भण्डार
पर दूसरा करे प्यार
मन की भाषा में हैं लाखों शब्द
पर बोलते हुए जुबान कांपती है
कोई सुनकर खुश हो जाये
अपनी नीयत पहले यह भांपती है
हम पर हो न्यौछावर
पर खुद किसी को न दें सहारा
बस यही होता है विचार
इसलिए वक्त ठहरा लगता है
छोटी मुसीबत बहुत बड़ा कहर लगता है
पहल करना सीख लें
प्यार का पहला शब्द
पहले कहना सीख लें
तो जिन्दगी में आ जाये बहार
—————–

जब ब्लोगर कार के मुहूर्त से बिना कमेन्ट के लौटा


ब्लोगर पहुंचा सर्वशक्तिमान के घर
ध्यान लगाने
कुछ पल का चैन पाने
निकला जब बाहर तो देखा
उसका मित्र अपनी नयी कार लेकर
खडा था
उस घर के सेवक से पुजवाने
ब्लोगर को देखकर मित्र खुश हो गया
और इशारा कर बुलाया और बोला
”यार, आज ही खरीदी है
लाया हूँ इसे इसकी नजर उतरवाने
तुम भी रुक जाओ
और प्रसाद पाओ
फिर कभी ले चलूँगा तुम्हें घुमाने’

ब्लोगर रुक गया
विश्वास बहुत था उसका सर्वशक्तिमान में
पर अंधविश्वास से परे था
पर मित्र के आगे वह झुक गया
मित्र ने फूल दिए और कहा
जब हो जाये सब
तक यह हैं कार पर बरसाने’
जब हो गयी कार की पूजा
तब ब्लोगर ने भी फूल बरसाए
और दूर हो गया पानी पीने के बहाने
उधर मिठाई बंटी
ख़त्म हो गया मिठाई का डिब्बा
ब्लोगर पहुंचा मित्र के सामने
हिस्से का हक़ जमाने
मित्र ने खाली डिब्बा दिखाया और
दिया आश्वासन कल उसका
हिस्सा घर पहुँचाने के लिए
ब्लोगर बोला
”यार, क्या मेरे लिए
एक टुकडा नहीं बचा सके
मैंने तुम्हारी कार पर
फूल पोस्ट किये थे
पर कमेन्ट की बात आयी
तो लगे टरकाने
हमें तो मजा तब आता है
जब पोस्ट रखते ही कमेन्ट आये
वह बहुत ताजा लगती है
कल-परसों वाली बासी लगती है
तुम कल भी कुछ मत लाना
अरे, हमें हर पोस्ट पर कमेन्ट नहीं मिलती
मैं यही समझ लूंगा
यह पोस्ट भी औंधे-मुहँ गिरी
चित हो गयी चारों खाने
—————————————-
नोट-यह काल्पनिक हास्य-व्यंग्य रचना है और इसका किसी घटना से कोई लेना देना नहीं है और किसी की कारिस्तानी इससे मेल खा जाये तो वही इसके लिए जिम्मेदार होगा.

कंप्यूटर के बाहर ब्लोगर नजरबंद


बिजली बंद तो पानी बंद
ब्लोग फिर भी चल रहा है
भले ही उसकी गति हो मंद
पर ब्लोगर खुद बैठा है
कंप्यूटर के बाहर नजरबंद
उसे इन्तजार है कब लाईट आये
तो वह अपने ब्लोग पर जाये
घड़ी चल रही है
पर ब्लोगर की सांस थम रही है
अक्ल काम कर रही है
पर सोच का सिलसिला है बंद
कलम हाथ में
कोरा कागज़ सामने है
पर लिखना फिर भी है बंद
ब्लोगर खुद ही किये बैठा अपनी नजर बंद
————————————-

समस्याएं वैसे भी कम नहीं है
पर बिजली फिर भी निभाती है
कुछ अल्फाज दिल से बाहर
निकल आते हैं
डैने बनकर ब्लोग को कबूतर
की तरह उडा ले जाते हैं
तसल्ली होती हैं कि
हमने भी एक कबूतर उडाया
सब शून्य में घिर जाता है
जब बिजली चली जाती है
————————————

ब्लोगरी की तो प्रेम के अध्याय बंद हो जायेंगे


प्रेयसी ने प्रियतमा को सुझाया
जब तक मेरा कोर्स पूरा न हो
तब तक ब्लोग बनाकर मजे कर लें
इसमें जब मशहूर हो जायेंगे
तब प्रियतम के माँ-बाप भी
मशहूर बहू को बिना दहेज़ के
लाने को तैयार हो जायेंगे

प्रियतम सोच में पड़ गया
और शहर के एक फ्लॉप ब्लोगर के
घर पहुंचा राय मांगने
सुनते ही उसने कहा
‘पगला गए हो जो ऐसा सोचते हो
क्या इश्क ने तुम्हें बिल्ली बना दिया है
जो ब्लोग का खंभा नोचते हो
तुम नहीं जानते ब्लोग चीज क्या है
कैसे हैं डाक्टर और मरीज क्या हैं
पहले तो चौपालों के लोग
पंजीकरण के लिए तुम्हें
पकड़ कर अपना मेहमान बनायेंगे
खूब लगाएंगे कमेन्ट
फिर भूल जायेंगे
वहाँ पर करते हैं कई बार
शब्दों की लड़ाई में दो-दो हाथ
फिर हो जाते हैं साथ-साथ
मेरी नहीं मानते तो
मेरे दोस्त नारद जी से पूछो
वह तुमेह ब्लोगवाणी सुनाएंगे
चिट्ठाजगत की धक्कमपेल और खींचतान के
किस्से सुनायेगे
हिन्दी ब्लोग भी है अजीब
दोनों को अगर नशा चढ़ गया तो
गजब हो जायेगा
ब्लोग के चक्कर में पड़ गए तो
जो झगडे मियाँ-बीबी में शादी के
बाद होते हैं वह पहले ही शुरू हो जायेंगे
दोस्त अपने माँ-बाप को
समझा लो
लड़कियों की संख्या कम होती जा रही है
कई कुंवारे बिना ब्याह रह जायेंगे
अपने प्रेयसी को भी मना लो
ब्लोगरी की तो तुम्हारे प्रेम प्रसंग के
सारे अध्याय बंद हो जायेंगे
———————————–
नोट-यह काल्पनिक हास्य रचना है किसी व्यक्ति या घटना से इसका कोई संबंध नहीं है और किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही इसके लिए जिम्मेदार होंगे.

अगर ब्लोग के लिए पुरस्कार घोषित हुए तो


एक ब्लोगर* ने दूसरे से कहा
”यार, तुम उम्मीद करते हो कि
कभी हमारे लिए भी पुरस्कार
घोषित किये जायेंगे’
दूसरे ने कहा
‘ख्याल तो अच्छा है पर
यह भी सोच लो
जब ऐसी संभावना बनी भी
तो अपुन तो बाहर हो जायेंगे
ढेर सारे छद्म ब्लोग आसमान से
जमीन पर उतर आयेंगे
औरों का तो छोडो
अपने ब्लोग के नाम भी हम भूल जायेंगे
और जो इनाम देने वाले होंगे
वह पहले अपने ब्लोगर मैदान में लायेंगे
पढ़ना-पढाना तो हो जायेगा दूर
अभी तो पुरस्कार की संभावना नहीं है
तब यह हाल है और अगर बनी भी तो
ब्लोगर एक दूसरे पर बरसते नजर आयेंगे
————————————————–
*इंटरनेट पर लिखने वाले
नोट-यह एक काल्पनिक हास्य-व्यंग्य रचना है और इसका किसी घटना से कोई लेना देना नहीं है और अगर किसी से मेल खा जाये तो वही उसके लिए जिम्मेदार होगा

संत कबीर वाणी:एक राम को जानिए


आवत गारी एक है, उलटत होय अनेक
कहैं कबीर नहिं उलटिए, वही एक की एक

संत कबीर जी का कहना है की गाली आते हुए एक होती है, परन्तु उसके प्रत्युतर में जब दूसरा भी गाली देता है, तो वह एक की अनेक रूप होती जातीं हैं। अगर कोई गाली देता है तो उसे सह जाओ क्योंकि अगर पलट कर गाली दोगे तो झगडा बढ़ता जायेगा-और गाली पर गाली से उसकी संख्या बढ़ती जायेगी।

जैसा भोजन खाईये, तैसा ही मन होय
जैसा पानी पीजिए, तैसी बानी होय संत

कबीर कहते हैं जैसा भोजन करोगे, वैसा ही मन का निर्माण होगा और जैसा जल पियोगे वैसी ही वाणी होगी अर्थात शुद्ध-सात्विक आहार तथा पवित्र जल से मन और वाणी पवित्र होते हैं इसी प्रकार जो जैसी संगति करता है उसका जीवन वैसा ही बन जाता है।

एक राम को जानि करि, दूजा देह बहाय
तीरथ व्रत जप तप नहिं, सतगुरु चरण समाय

संत कबीर कहते हैं की जो सबके भीतर रमा हुआ एक राम है, उसे जानकर दूसरों को भुला दो, अन्य सब भ्रम है। तीर्थ-व्रत-जप-तप आदि सब झंझटों से मुक्त हो जाओ और सद्गुरु-स्वामी के श्रीचरणों में ध्यान लगाए रखो। उनकी सेवा और भक्ति करो

शीतल चांदनी का आनंद उठाए कौन


रात्रि में चन्दा बिखेरता
अब भी पहले की तरह
शीतल चांदनी
पर उसका आनन्द उठाएँ कौन
दूरदर्शन और कम्प्यूटर से
अपनी आखें लेकर जूझता आदमी
बाहर है प्राकृतिक सौन्दर्य
खङा है मौन

प्रथम किरणों के साथ
जीवन का संदेश देता सूर्य
रात को देर तक सोकर
सुबह देर बिस्तर छोड़ें आदमी
प्रात:काल नमन करे कौन
शीतल और शुद्ध पवन
आवारा फिरती है
वातानुकूलित कमरों में
उसका है प्रवेश वर्जित
सुखद अनुभूति पाए कौन
कई सदियों से शहर के बीच
बहती है नदी की धारा
नालियों से बहकर आती गंदिगी ने
उसकी शुद्ध आत्मा को मारा
अपने शहर में ही हो गया
आदमी अब परदेशी
उसका हमसफ़र बने कौन

प्राणवायु का सर्जन कर
उसे चारों और  बिखेर  रहा है
बरगद का पेड
जीवंत ह्रदय की प्रतीक्षा में
खड़ा है मौन
जीने की चाह है सभी को
सुख और आनन्द भी मांगें
पर इनका मतलब
समझा पाता कौन
——————-
हरियाली को बेघर कर
पत्थरों के जंगल खडे कर रहा है
जिसे देखो  वही
आत्मघाती हमले कर रहा है
हवाओं में खुद ही डालता
विषैली गैसें आदमी
हर कोई जीवन को मौत का
सन्देश दे रहा है

पानी पिलायें ऐसा नही अवसर


भाषण करते हुए वह बोले
”हम अब प्रगति के पथ पर
अग्रसर हैं
सारी दुनिया हमारी प्रशंसक है
हमारे शेयर बाजार का आंकडा
अब दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है
विकास डर आसमान छू रही है
हमारे लिए अब आगे बढ़ने का अवसर है

भाषण के बाद आए मिलने लोग
उनसे अपने-अपने इलाके की
बिजली, पानी और सड़कों की
खस्ता हालत के मुद्दे उठाने लगे
तो वह बोले
‘इस समय देश विकास कर रहा है
और तुम अभी भी वहीं अटके हो
अपने रास्ते से भटके हो
हम तरक्की करते हुए
अन्तरिक्ष की तरह बढे हैं
और तुम लोग अभी भी
सड़क, बिजली और पानी पर अटके हो
भला अब यह भी ऐसी बातों का अवसर है’

उनके डर के मारे सब खामोश रहे
फ़िर बोले
‘बहुत बोल लिया अब तो
मुझे पिलाने के लिए पानी लाओ
मुझे फ़िर आगे जाकर बोलना है
मेरी तो बस विकास पर नजर है’

वहाँ कोई पानी नहीं लाया
तो चीखने लगे तब एक आदमी ने कहा
‘यहाँ पानी बिजली कुछ नही है
आपका भाषण सुनने के लिए नहीं
हम अपनी व्यथा कहने आए थे
पानी की बोतलें अपने साथ लाये थे
सब पी गए आपकी बात सुनते हुए
जो बचा है वह इस ऊबड़ खाबड़
सड़क पर चलते हुए पीते जायेंगे
हम तो पहुचेंगे गिरते -पड़ते अपने घर
आप तो हेलिकॉप्टर में उड़ जायेंगे
आकाश में पानी पी लीजिये
आपकी है तो विकास पर नजर
पर हमारी तो है घर पर नजर
इन बोतलों में बंद पानी ही
अब हमारे रास्ते का सहारा है
आपके भाषण से हम बहुत खुश
पर पानी पिलायें ऐसा नहीं अवसर

डर की कोख में ही क्रूरता का शैतान जन्म लेता है


कभी बनते थे हथियारों के खिलौने
अब हथियार ही खिलौने बनने लगे हैं
अपनी देह को बचाने के लिए
लोग रखने लगे हैं हथियार
इस इलेक्ट्रोनिक युग में
कौन रिवाल्वर को खरीद कर
बच्चों को देता है
अपने लिए ही हथियार को खिलौना समझ लेता है
क्या गलती उस बच्चे की जो
हथियार को खिलौना समझ लेता है

किस-किस से शिकायत करें
सबने अपनी जिन्दगी को ही खेल
समझ लिया है
क्या सिखाएंगे वह अपने बच्चों को
जिन्होंने खुद कुछ नहीं सीखा
क्या जियेगा वह जिन्दगी जो
पत्थर की दीवारों के पीछे
हथियार रखकर
भय को अपना मित्र बनाकर
अपनी सुरक्षा का किला समझ लेता है

हथियार रखने से लोग
बहादुर नहीं हो जाते
जो बहादुर होते वह होते दयालू
इसलिए किसी सी नहीं डरते
जिनके मन में खौफ है
वही क्रूर हो जाते
ओ हथियारों पर भरोसा रखने वालों
तुम खुद भी डरपोक हो और
अपने बच्चों को भी वही विरासत सौंप रहे हो
समझ लो इस बात को कि
डर की कोख में ही ईर्ष्या और क्रूरता का
शैतान जन्म लेता है

हवा और पानी को शुद्ध नहीं कर सकते


जिन रास्तों पर चलते हुए
कई बरस बीत गये
पता ही नही लगा कि
कैसे उनके रूप बदलते गए
जहाँ कभी छायादार पेड़ हुआ करते थे
वहाँ लहराता है सिगरेट का धुआं
जहाँ रखीं थीं गुम्टियाँ
वहाँ ऊंची इमारतों के
पाँव जमते गए
जहाँ हुआ करता था उद्यान
वहाँ कचरे के ढेर बढ़ते गये
कहते हैं दुनिया में तरक्की हो रही है
सच यह है कि पतन की तरफ
हम कदम-दर कदम बढ़ते गए
हवा में लटकी
खातों में अटकी
गरीब से दूर भटकी
दौलत अगर तरक्की का प्रतीक है तो
सोचना होगा कि हम पढे-लिखे हैं कि
किताब पढ़ने वाले अनपढ़ बन गए
आंकडों के मायाजाल में
कितनी भी तरक्की दिखा लो
हवाओं को तुम ताजा नहीं कर सकते
पानी को साफ नहीं कर सकते
इलाज के लिए कितनी भी दवाएं बना लो
मरे हुए को जिंदा नही कर सकते
आकाश में खडे होकर तरक्की की
सोचने वाले जमीन के दुश्मन बन गए

चाणक्य नीति:मन में पाप हो तो तीर्थ से भी शुद्धि नहीं


१.आंखों से देखभाल का पैर रखें, पानी कपडे से छान कर पीयें. शास्त्रानुसार वाक्य बोलें, मन में सोच कर कार्य करें.
२.दान, शक्ति, मीठा बोलना, धीरता और सम्यक ज्ञान यह चार प्रकार के गुण जन्म जात होते हैं, यह अभ्यास से नहीं आते.
३.जिसकी मन में पाप हैं, वह सौ बार तीर्थ स्नान करने के बाद भी पवित्र नहीं हो सकता, जिस प्रकार मदिरा का पात्र जलाने पर भी शुद्ध नहीं होता.
४.जो वर्ष भर मौन रहकर भोजन करता है, वह हजार कोटी वर्ष तक स्वर्ग लोक में पूजित होता है.
५.पीछे-पीछे बुराई कर काम बिगाड़ने वाले और सामने मधुर बोलने वाले मित्र को अवश्य छोड़ देना चाहिए.
६.कुमित्र पर कदापि विश्वास न करें क्योंकि वह आपकी कभी भी आपकी पोल खोल सकता है.
७.अपने शास्त्रों के किसी एक श्लोक अथवा उस में से भी आधे का प्रतिदिन करना चाहिए. इससे अपने मन और विचार की शुद्ध होती है.

नोट-थक रहे ब्लोगर योग साधना शुरू करें-यह लेखा यहाँ अवश्य पढें

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भ्रम का जाल


सामने कुछ कहैं
पीठ पीछे कुछ और
ऐसे लोगों की बातों पर क्या करें गौर
बात काम करें मचाएँ ज्यादा शोर
बोले और पीछे पछ्ताएं
जैसे नाचने के बाद रोए मोर
जिनके मन में नही सदभाव
उनकी वाणी में होता है कटुता का भाव
अपनी पीठ आप थपथपापाएं
अपने दिल का मैल छिपाएं
क्या पायेंगे ऐसे लोगों को बनाकर सिरमौर
उनकी भीड़ में शामिल होने से बेहतर है
अकेले में समय गुजारें
उनके झुंड में रहने से अच्छा है
भले लोगों का तलाश करें ठौर
—————————————

सुबह से शाम तक
पसीन बहाते हुए लोग
बड़ी मुश्किल से रोटी जुटा पाते
फिर भी समाज में तिरस्कार पाते
जिन्हें मिली है दौलत की गाडी
वह फिर भी गरीब से इतना खौफ खाते कि
जिन्हें खुद न माने
उसी जाति,भाषा, और धर्म के नाम पर
भ्रम का जाल बुनकर उसे फंसाते

पहले अपनी नीयत बताओ


कहते हैं रामजी के होने के
भौतिक सबूत हमारे सामने लाओ
नहीं ला सकते तो उन्हें भूल जाओ
राम जी की माया अपरम्पार
जिस पर माया का भूत चढा दें
अपना नाम भी भुलवा दें
सोने के सिंहासन पर बैठते ही
भगवान् की तरह पूजने की चाह
उन्हें अंधा बना देती है
रामजी का नाम रहते यह संभव नहीं
अमीर तो क्या गरीब के मन भी
उनका नाम बसता है कहीं न कहीं
दिलों के नाम मिटाने के लिए
वह कहते है
उनके होने का सबूत लाओ

राम के नाम का उनको कितना खौफ है
गरीबी, शोषण और बीमारी के दवा के लिए
लोगों को इधर उधर भटकाते हैं
राम की प्रस्तर की प्रतिमा को
पूजने से मना करने वाले ही
मुर्दों के नाम पर पत्थर लगाकर
उस पर माला चढाते हैं
कहीं अपना काम न बने तो
पत्थर लगवाने के लिए
जिंदा इंसान को ही मुर्दा बनाते हैं
राम का नाम फिर भी लेते हैं
यह कहने के लिए उसे भूल जाओ

रामभक्त भी सबूत जुटा लेंगे
अपने भक्तों के लिए रामजी भी
अपनी कृपा उन पर लुटा देंगे
पर सवाल करने वाले भी
इसके पीछे जो उनके दिल की नीयत है
क्या वह अपनी हथेली पर रखकर दिखा देंगे
कर सकते हैं तभी कहें कि
‘राम जी के होने के सबूत लाओ’
———————————–

चाणक्य नीति:जहाँ धनी, ज्ञानी और निपुण राजा न हो वह स्थान छोड़ दें


1.किसी भी व्यक्ति का जहाँ सम्मान न हो उसे त्याग देना चाहिए. क्योंकि बिना सम्मान के मनुष्य जीवन जीने का कोई अर्थ नहीं है.
2.किसी भी व्यक्ति को वह स्थान भी त्याग देना चाहिए जहाँ आजीविका न हो क्योंकि आजीविका रहित मनुष्य समाज में किसी सम्मान के योग्य नहीं रह जाता.

3.इसी प्रकार वह देश और क्षेत्र भी त्याज्य है जहाः अपने मित्र व संबंधी न रहते हों क्योंकि इनके अभाव में व्यक्ति कभी भी असहाय हो सकता है.
4.वेद के ज्ञान की गहराई न समझकर वैद की निंदा करने वाले वेद की महानता कम नहीं कर सकते.शास्त्र निहित आचार-व्यवहार को व्यर्थ बताने वाले अल्प ज्ञानी उसकी विषय सामग्री की उपयोगिता को नष्ट नहीं कर सकते

5.जिस स्थान पर धनी-व्यापारी, ज्ञानीजन, शासन व्यवस्था में निपुण राजा, सिंचाई अथवा जल आपूर्ति की व्यवस्था न हो उस स्थान का भी त्याग कर देना चाहिऐ. क्योंकि धनि से श्री वृद्धि ज्ञानी से विवेक , निपुण राजा से मनुष्य की सुरक्षा और जल से जीवन के रक्षा होती है.

6.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आयुर्वेद तथा धनुर्वेद की विद्याओं की भी गणना भी नहीं की जा सकती है, इसके विपरीत मनुष्य का जीवन अल्प है और उस अल्पकाल के जीवन में रोग,शोक, कष्ट आदि अनेक प्रकार की बाधाएं उपस्थित होती रहती हैं। इस स्थिति में मनुष्य को शास्त्रों का सार ग्रहण करना चाहिए।

समझो प्रेयसी को ठगता है


सावन और बसंत के मौसम पर
शीतल हवाओं के चलने की बात
लिखना अब मजाक लगता है
अगर कोई प्रियतम अपने प्रेयसी को
लिखे खूबसूरत मौसम की बात
समझो उसे ठगता है
घुली है प्राणवायु में विषैली गैस
सांस में भला अब सुगंध कहाँ से आये
सब जगह तो आसमान से
जलता अंगारा बरसता है
बरसात का पानी भी
कई बार विषैला लगता है
सर्दी हो या गर्मी
कवि हृदय में कितनी भी लहलहाएं
श्रंगार रस से ओत-प्रोत कवितायेँ
भला मौसम को कहाँ पता लगता है

सच किसे समझाएं


सदियों से चले आ रही
लोगों के समूहों की परिभाषाएँ
बाहर से मजबूत किले की तरह लगते
अन्दर रिवाजों में एक दूसरे को ठगते
बाहर से आदर्श लगते
पर एक शब्द से हिलते नजर आएं
वक्त देखें तो पहचान छिपाएं
फायदा देखें सीना तानकर सामने आयें
सभ्य समाज हो रहा है दिशाहीन
अक्षरज्ञान जितना बढ़ता जा रहा है
अक्षरों से बने शब्दार्थ पर हो रही है जंग
लोगों के दिमाग हो रहे हैं तंग
अभिव्यक्ति का मतलब चिल्लाना हो गया है
ऐसे में सच किसे समझाएं
——————————————

जमीन की जिन्दगी की हकीकत


ख्वाहिशें तो जिंदगी में बहुत होतीं हैं
पर सभी नहीं होतीं पूरी
जो होतीं भी हैं तो अधूरी
पर कोई इसलिए जिन्दगी में ठहर नहीं जाता
कहीं रौशनी होती है पर
जहाँ होता हैं अँधेरा
वीरान कभी शहर नहीं हो जाता
कोई रोता है कोई हंसता है
करते सभी जिन्दगी पूरी

सपने तो जागते हुए भी
लोग बहुत देखते हैं
उनके पूरे न होने पर
अपने ही मन को सताते हैं
जो पूरे न हो सकें ऐसे सपने देखकर
पूरा न होने पर बेबसी जताते हैं
अपनी नाकामी की हवा से
अपने ही दिल के चिराग बुझाते हैं
खौफ का माहौल चारों और बनाकर
आदमी ढूंढते हैं चैन
पर वह कैसे मिल सकता है
जब उसकी चाहत भी होती आधी-अधूरी
फिर भी वह जिंदा दिल होते हैं लोग
जो जिन्दगी की जंग में
चलते जाते है
क्या खोया-पाया इससे नहीं रखते वास्ता
अपने दिल के चिराग खुद ही जलाते हैं
तय करते हैं मस्ती से मंजिल की दूरी

—————————————-
ख्वाहिशें वही पूरी हो पातीं हैं
जो हकीकत की जमीन पर टिक पातीं हैं
कोई ऐसे पंख नहीं बने जो
आदमी के अरमानों को आसमान में
उडा कर सैर कराएँ
जमीन की जिन्दगी की हकीकतें
जमीन से ही जुड़कर जिंदा रह पाती हैं

दिल के चिराग जलाते नहीं-hindi shayri


जिनका हम करते हैं इन्तजार
वह हमसे मिलने आते नहीं
जो हमारे लिए बिछाये बैठे हैं पलकें
उनके यहां हम जाते नहीं
अपने दिल के आगे क्यों हो जाते हैं मजबूर
क्यों होता है हमको अपने पर गरूर
जो आसानी से मिल सकता है
उससे आँखें फेर जाते हैं
जिसे ढूँढने के लिए बरसों
बरबाद हो जाते हैं
उसे कभी पाते नहीं
तकलीफों पर रोते हैं
पर अपनी मुश्किलें
खुद ही बोते हैं
अमन और चैन से लगती हैं बोरियत
और जज्बातों से परे अंधेरी गली में
दिल के चिराग के लिए
रौशनी ढूँढने निकल जाते हैं
——————–

दुर्घटनाएं अब अँधेरे में नहीं
तेज रौशनी में ही होतीं है
रास्ते पर चलते वाहनों से
रौशनी की जगह बरसती है आग
आंखों को कर देती हैं अंधा
जागते हुए भी सोती हैं
—————————-
हमें तेज रौशनी चाहिए
इतनी तेज चले जा रहे हैं
उन्हें पता ही नहीं आगे
और अँधेरे आ रहे हैं
दिल के चिराग जलाते नहीं
बाहर रौशनी ढूँढने जा रहे हैं

तकिये का सहारा


हमें पूछा था अपने दिल को
बहलाने के लिए किसे जगह का पता
उन्होने बाजार का रास्ता बता दिया
जहां बिकती है दिल की खुशी
दौलत के सिक्कों से
जहाँ पहुंचे तो सौदागरों ने
मोलभाव में उलझा दिया
अगर बाजार में मिलती दिल की खुशी
और दिमाग का चैन
तो इस दुनिया में रहता
हर आदमी क्यों इतना बैचैन
हम घर पहुंचे और सांस ली
आँखें बंद की और सिर तकिये पर रखा
आखिर उसने ही जिसे हम
ढूढ़ते हुए थक गये थे
उसका पता दिया
——————-

सांप के पास जहर है
पर डसने किसी को खुद नहीं जाता
कुता काट सकता है
पर अकारण नहीं काटने आता
निरीह गाय नुकीले सींग होते
हुए भी खामोश सहती हैं अनाचार
किसी को अनजाने में लग जाये अलग बात
पर उसके मन में किसी को मरने का
विचार में नहीं आता
भूखा न हो तो शेर भी
कभी शिकार पर नहीं जाता
हर इंसान एक दूसरे को
सिखाता हैं इंसानियत का पाठ
भूल जाता हां जब खुद का वक्त आता
एक पल की रोटी अभी पेट मह होती है
दूसरी की जुगाड़ में लग जाता
पीछे से वार करते हुए इंसान
जहरीले शिकारी के भेष में होता है जब
किसी और जीव का नाम
उसके साथ शोभा नहीं पाता
————–

अपनी सोच से रास्ते बनते हैं


एक पत्थर को रंग पोतकर अदभुत
बताकर दिखाने की कोशिश
लोहे को रंग लगाकर
चमत्कारी बताने की कोशिश
आदमी के भटकते मन को
स्वर्ग दिखाने की कोशिश
तब तक चलती रहेगी
जब तक अपने को सब खुद नहीं संभालेंगे

ख्वाब ही हकीकत बनते हैं
सपने भी सच निकलते हैं
अपनी सोच से भी रास्ते बनते हैं
कोई और हमें संभाले
अपनी जंग जीत सकते हैं
जब इसके लिए इन्तजार करने के बजाय
खुद को खुद ही संभालेंगे
———————————

भूल-भुलैया में फंस जाते हैं


अपने दिल के नगीने से
सजाकर कितने भी तौह्फे दे दो
इस ज़माने को
कद्रदान कभी होगा नहीं
खुश रहते हैं वही लोग
जो बेचते हैं परछाईयाँ
झूठ बेचते हैं दिखाकर सच्चाईयां
बन जाते हैं उनके महल
ज़माना भी खो जाता है
भूलभुलैया में कहीं
दावे सभी करते हैं
पर भला कोई हुआ है अभी तक
सच्चे आदमी का साथी कहीं
—————————————-

भगवान की पहचान के लिए
शैतान का डर दिखाते हैं
सच को सही बताने के लिए
झूठ का भूत दिखाते हैं
पर जो देते हैं पता
वही नाचते हैं शैतान जैसा
झूठ को बेचते हैं सच की तरह
लोग मानते हैं उनको अपना आदर्श
इसलिए भगवान् से दूर
सच के रस्ते से हटे हुए
भूल-भुलैया में फंस जाते हैं

सिगरेट का धुआं छोड़ते हुए (sigret ka dhuan-hindi vyangya kavita)


मुख से सिगरेट का धुँआ
चहुँ और फैलाते हुए करते हैं
शहर में फैले
पर्यावरण प्रदूषण की शिकायत
शराब के कई जाम पीने के बाद
करते हैं मर्यादा की वकालत
व्यसनों को पालना सहज है
उससे पीछा छुड़ाने में
होती है बहुत मुश्किल
पर नैतिकता की बात कहने में
शब्द खर्च करने हुए क्यों करो किफायत
कहैं दीपक बापू देते हैं
दूसरों को बड़ी आसानी से देते हैं
नैतिकता का उपदेश लोग
जबकि अपने ही आचरण में
होते हैं ढ़ेर सारे खोट
दूसरे को दें निष्काम भाव का संदेश
और दान- धर्म की सलाह
अपने लिए जोड़ रहे हैं नॉट
समाज और जमाने के बिगड़ जाने की
बात तो सभी करते हैं
आदमी को सुधारने की
कोई नहीं करता कवायद
————————

सुबह से शाम तक
छोड़ते हैं सिगरेट का धुआं
अपने दिल में खोदते  मौत का कुआँ
और लोगों को सुनाते हैं
जमाने के खराब होने के किस्से
अपना सीना तानकर कहते हैं
बिगडा जो है प्रकृति का हिसाब
उस पर पढ़ते हैं किताब
पर कभी जानना नहीं चाहते
हवाओं को तबाह करने में
कितने हैं उनके हिस्से

इससे अच्छा तो बुतों पर यकीन कर लें


अपने लिए बनाते हैं ऐसे
सपनों के महल
जो रेत के घर से भी
कमजोर बन जाते हैं
तेज रोशनी को जब देखते देखते
आंखों को थका देते हैं
फिर अँधेरे में ही रोशनी
तलाशने निकल जाते हैं
इधर-उधर भटकते हुए
अनजान जगहों के नाम
मंजिल के रूप में लिखते हैं
दर्द के सौदागरों के हाथ
पकड़ कर चलने लग जाते हैं
जब दौलत के अंबार लगे हों तो
गरीबी में सुख आता है नजर
जब हों गरीब होते हैं
तो बीतता समय रोटी की जंग में
अमीरों का झेलते हैं कहर
नहीं होता दिल पर काबू
बस इधर से उधर जाते हैं
जिंदा लोगों को बुत समझने की
गलती करते हैं कदम-कदम पर
इसलिए हमेशा धोखा खाते हैं
इससे अच्छा तो यही होगा कि
बुतों को ही रंग-बिरंगा कर
उनमें अपना यकीन जमा लें
हम कुछ भी कह लें
कम से कम वह बोलने तो नहीं आते हैं
——————————–

मेरे इन ब्लोगस की रचनाओं को देखें


समस्त पाठकों से निवेदं है कि यदि आप मेरी रचनाएं इस ब्लोग पर पढना चाह्ते हैं तो कृप्या कमेंट अवश्य लिखे। इस ब्लोग पर मेरा इरादा एक उप ंयास लिखने का है। तब तक आप मेरे इन ब्लोगस की रचनाओं को देखें
दीपक भारतदीप्

1. http://deepakbapukahin.wordpress.com

2. http://deepakraj.wordpress.com

3. http://rajlekh.wordpress.com

4. http://dpkraj.blogspot.com

गीत-संगीत और मोबाइल


मोबाइल का भला संगीत और गाने और बजाने से क्या संबंध हो सकता है? कभी यह प्रश्न हमने अपने आपसे ही नहीं पूछा तो किसी और से क्या पूछते? अपने आप में यह प्रश्न है भी बेतुका। पर जब बातें सामने ही बेतुकी आयेंगी तो ऐसे प्रश्न भी आएंगे।

हुआ यूँ कि उस दिन हम अपने एक मित्र के साथ एक होटल में चाय पीने के लिए गये, वहाँ पर कई लोग अपने मोबाइल फोन हाथ में पकड़े और कान में इयरफोन डालकर समाधिस्थ अवस्था में बैठे और खडे थे। हमने चाय वाले को चाय लाने का आदेश दिया तो वह बोला-” महाराज, आप लोग भी अपने साथ मोबाइल लाए हो कि नहीं?’

हमने चौंककर पूछा कि-”तुम क्या आज से केवल मोबाइल वालों को ही चाय देने का निर्णय किये बैठे हो। अगर ऐसा है तो हम चले जाते हैं हालांकि हम दोनों की जेब में मोबाइल है पर तुम्हारे यहाँ चाय नहीं पियेंगे। आत्म सम्मान भी कोई चीज होती है।”

वह बोला-”नहीं महाराज! आज से शहर में एफ.ऍम.बेंड रेडिओ शुरू हो गया है न! उसे सब लोग मोबाइल पर सुन रहे हैं। अब तो ख़ूब मिलेगा गाना-बजाना सुनने को। आप देखो सब लोग वही सुन रहे हैं। आप ठहरे हमारे रोज के ग्राहक और गानों के शौक़ीन तो सोचा बता दें कि शहर में भी ऍफ़।एम्.बेंड ” चैनल शुरू हो गये हैं।”

” अरे वाह!”हमने खुश होकर कहा-” मजा आ गया!”

“क्या ख़ाक मजा आ गया?” हमारे मित्र ने हमारी तरफ देखकर कहा और फिर उससे बोले-”गाने बजाने का मोबाइल से क्या संबंध है? वह तो हम दोनों बरसों से सुन रहे हैं । यह तो अब इन नन्हें-मुन्नों के लिए ठीक है यह बताने के लिए कि गाना दिखता ही नहीं बल्कि बजता भी है। इन लोगों नी टीवी पर गानों को देखा है सुना कहॉ है, अब सुनेंगे तो समझ पायेंगे कि गीत-संगीत सुनने के लिए होते हैं न कि देखने के लिए। “

हमारे मित्र ने ऐसा कहते हुए अपने पास खडे जान-पहचाने के ऐक लड़के की तरफ इशारा किया था। उसकी बात सुनाकर वह लड़का तो मुस्करा दिया पर वहां कुछ ऐसे लोगों को यह बात नागवार गुजरी जो उन मोबाइल वालों के साथ खडे कौतुक भाव से देख और सुन रहे थे। उनमें एक सज्जन जिनके कुछ बाल सफ़ेद और कुछ काले थे और उनके केवल एक ही कान में इयरफोन लगा था उन्होने अपने दूसरे कान से भी इयर फोन खींच लिया और बोले -”ऐसा नहीं है गाने को कहीं भी और कभी भी कान में सुनने का अलग ही मजा है। आप शायद नहीं जानते।”

हमारे मित्र इस प्रतिक्रिया के लिए तैयार नहीं था पर फिर थोडा आक्रामक होकर बोला-” महाशय! यह आपका विचार है, हमारे लिए तो गीत-संगीत कान में सुनने के लिए नहीं बल्कि कान से सुनने के लिए है। हम तो सुबह शाम रेडियों पर गाने सुनने वाले लोग हैं। अगर अब ही सुनना होगा तो छोटा ट्रांजिस्टर लेकर जेब में रख लेंगे। ऎसी बेवकूफी नहीं करेंगे कि जिससे बात करनी है उस मोबाइल को हाथ में पकड़कर उसका इयरफोन कान में डाले बैठे रहें । हम तो गाना सुनते हुए तो अपना काम भी बहुत अच्छी तरह कर लेते हैं।”

वह सज्जन भी कम नहीं थे और बोले-”रेडियो और ट्रांजिस्टर का जमाना गया और अब तो मोबाइल का जमाना है। आदमी को जमाने के साथ ही चलना चाहिए।”

हमारा मित्र भी कम नहीं था और कंधे उचकाता हुआ बोला-”हमारे घर में तो अभी भी रेडियो और ट्रांजिस्टर दोनों का ज़माना बना हुआ है।अभी तो हम उसके साथ ही चलेंगे।
बात बढ न जाये इसलिये उसे हमने होटल के अन्दर खींचते हुए कहा-”ठीक है! अब बहुत हो गया। चल अन्दर और अपनी चाय पीते हैं।”

हमने अन्दर भी बाहर जैसा ही दृश्य देखा और मेरा मित्र अब और कोई बात इस विषय पर न करे विषय बदलकर हमने बातचीत शुरू कर दीं। मेरा मित्र इस बात को समझ गया और इस विषय पर उसने वहाँ कोई बात भी नहीं की । बाद में बाहर निकला कर बोला-” एक बात मेरी समझ में नहीं आ रही कि यह लोग गीत-संगीत के शौक़ीन है या मोबाइल से सुनने के। देखना यह कुछ दिनों का हे शौक़ है फिर कोई नहीं सुनेगा हम जैसे शौकीनों के अलावा।”

हमने कहा-” यह न तो गीत-संगीत के शौक़ीन है और न ही मोबाइल के! यह तो दिखावे के लिए ही सब कर रहे हैं। देख-सुन समझ सब रहे हैं पर आनंद कितना ले रहे हैं यह पता नहीं।”

हमारे शहर में एक या दो नहीं बल्कि चार एफ।ऍम.बेंड रेडियो शुरू हो रहे है और इस समय उनका ट्रायल चल रहा है। जिसे देखो इसी विषय पर ही बात कर रहा है। मैं खुद बचपन से गाने सुनने का आदी हूँ और दूरदर्शन और अन्य टीवी चैनलों के दौर में भी मेरे पास एक नहीं बल्कि तीन रेडियो-ट्रांजिस्टर चलती-फिरती हालत में है और शायद हम जैसे ही लोग उनका सही आनद ले पायेंगे और अन्य लोग बहुत जल्दी इससे बोर हो जायेंगे। हम और मित्र इस बात पर सहमत थे कि संगीत का आनंद केवल सुनकर एकाग्रता के साथ ही लिया जा सकता है और सामने अगर दृश्य हौं तो आप अपना दिमाग वहां भी लगाएंगे और पूरा लुत्फ़ नहीं उठा पायेंगे।

गीत-संगीत के बारे में तो मेरा मानना है कि जो लोग इससे नहीं सुनते या सुनकर उससे सुख की अनुभूति नहीं करते वह अपने जीवन में कभी सुख की अनुभूति ही नहीं कर सकते। गीतों को लेकर में कभी फूहड़ता और शालीनता के चक्कर में भी नही पड़ता बस वह श्रवण योग्य और हृदयंगम होना चाहिए। गीत-संगीत से आदमी की कार्यक्षमता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार अधिक टीवी देखने के बुरे प्रभाव होते हैं जबकि रेडियो से ऐसा नहीं होता। मैं और मेरा मित्र समय मिलने पर रेडियो से गाने जरूर सुनते है इसलिये हमें तो इस खबर से ही ख़ुशी हुई । जहाँ तक कानों में इयर फोन लगाकर सुनने का प्रश्न है तो मेरे मित्र ने मजाक में कहा था पर मैंने उसे गंभीरता से लिया था कि ‘ गीत-संगीत कानों में नहीं बल्कि कानों से सुना जाता है।’

बहरहाल जिन लोगों के पास मोबाइल है उनका नया-नया संगीत प्रेम मेरे लिए कौतुक का विषय था। घर पहुंचते ही हमने भी अपने ट्रांजिस्टर को खोला और देखा तो चारों चैनल सुनाई दे रहे थे। गाने सुनते हुए हम भी सोच रहे थे-’गीत संगीत का मोबाइल से क्या संबंध ?

दृष्टा बनकर जो रहेगा


अगर मन में व्यग्रता का भाव हो तो
सुहाना मौसम भी क्या भायेगा
अंतर्दृष्टि में हो दोष तो
प्राकृतिक सौन्दर्य का बोध
कौन कर पायेगा
मन की अग्नि में पकते
विद्वेष, लालच, लोभ, अहंकार और
चिन्ता जैसे अभक्ष्य भोजन
गल जाता है देह का रक्त जिनसे
तब सूर्य की तीक्ष्ण अग्नि को
कौन सह पायेगा
अपने ही ओढ़े गये दर्द और पीडा का
इलाज कौन कर पायेगा
कहाँ तक जुटाएगा संपत्ति का अंबार
कहाँ तक करेगा अपनी प्रसिद्धि का विस्तार
आदमी कभी न कभी तो थक जाएगा
जो दृष्टा बनाकर जीवन गुजारेगा
खेल में खेलते भी मन से दूर रहेगा
वही अमन से जीवन में रह पायेगा
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