Category Archives: hindi mitra

ज़ज्बातों को कार समझ लिया-हास्य कविताएँ


एक दिल था जो
उन्होंने खिलौने की तरह तोड़ दिया,
मोहब्बत को समझा खेल
अपना रिश्ता दिल्लगी से जोड़ लिया।
जिंदगी के सुकून का मतलब नहीं समझे
जज़्बातों को समझा लोहे लंगर की तरह
अपना ख्याल कार की तरह मोड़ लिया।
———
एक दोस्त ने दूसरे को समझाया
‘‘यह ‘आई लव यू’ लिखकर
प्रेम पत्र भेजने से काम नहीं चलेगा,
इस तरह तो तू जिंदगी पर आहें भरेगा।
अपने पत्र में
तमाम तरह के तोहफों की पेशकश कर,
जज़्बातों से ज्यादा वादों के शब्द भर,
भले ही बाद में कार में न घुमाना
पहाड़ों पर हनीमून मनाने की बात भुलाना
मित्र, अब केवल दिल से दिल नहीं जीते जाते,
होटलों के बिल से ही इश्क के गीत लिखे जाते,
जो बताई मैंने तुझ राह
मंजिल तुझे तभी मिलेगी
जब आजकल के इश्क की राह चलेगा।’

———
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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‘सविता भाभी’ से मस्त राम पीछे- व्यंग्य आलेख ‘savita bhabhi’ se pichhe ‘mastram’-hindi vyangya article


कुछ दिन पहले तक शायद बहुत कम लोग जानते होंगे कि ‘सविता भाभी’ नाम की कोई वेबसाइट होगी जिस पर ‘लोकप्रिय’ सामग्री भी हो सकती है। इस पर प्रतिबंध लगने के बाद उसकी खोज खबर बढ़ गयी है। सच कहें तो इस ‘सविता भाभी’ अपने पाठों को हिट कराने का जोरदार नुस्खा बनता नजर आ रहा है-यह लेख भी इसी उद्देश्य से हम लिख रहे हैं कि चलो कुछ और हिट बटोर लो क्योंकि हम कथित रूप से उस तरह का लोकप्रिय साहित्य लिखने में अपने को असमर्थ पाते हैं-हां, अगर कहीं से जोरदार पैसे की आफर आ जाये तो जोरदार कहानियां हैं पर मु्फ्त में तो यही लिखेंगे। नामा आ जाये तो नाम वैसे ही होता है भले बदनाम हो जाये।
किस्से पर किस्सा याद आ ही जाता है। हमने अपने ब्लाग में अपने नाम के साथ मस्तराम शब्द जोड़ा तो पाया कि वह हिट ले रहा है। उसी तरह हमने अंग्रेजी और हिंदी में मस्तराम के लेबल जोड़े। उससे कुछ पाठ हिट होने लगे। एक बार एक ब्लाग लेखक ने इस पर आपत्ति की तो हमने पता किया कि मस्तराम साहित्य में लोकप्रिय सामग्री लिखी जाता है अलबत्ता उसकी लोकप्रियता का दायदा उत्तरप्रदेश तक ही सीमित है। इधर मध्यप्रदेश में लोगों को अधिक जानकारी नहीं है। बहरहाल हमारी नानी हमसे मस्तराम कहती थी जो किसी भी आपत्ति को स्वीकार न कर हम उसका उपयोग करते हैं-उसमें सामग्री यही होती है।
इधर सविता भाभी ने मस्तराम को पीछे छोड़ दिया है। अब क्या करें? उसके उपयोग के लिये हमारे पास कोई तर्क नहीं है। हमारे पूरे खानदान में किसी महिला का नाम सविता नहीं है जिसे झूठमूठ ही आदर्श के रूप में प्रस्तुत कर ब्लाग का नाम लिखे या पाठों पर लेबल लगायें। ‘सविता भाभी’ प्रतिबंध से पहले कितनी लोकप्रिय थी यह तो पता नहीं पर इस समय सर्च इंजिनों यह शब्द सबसे अधिक खोजा गया है। कहते हैं कि किसी भी चीज या आदमी को दबाओ उतनी ही शिद्दत से ऊपर उठ कर आती है। यही हाल ‘सविता भाभी’ का है। एक काल्पनिक स्त्री पात्र और उसका नाम इस समय इंटरनेट प्रयोक्ताओं के लिये खोजबीन का विषय हो गया है।
इंटरनेट पर पोर्न वेबसाईटों का जाल कभी खत्म नहीं हो सकता। देश के अधिकतर प्रयोक्ता ऐसा वैसा देखने के लिये ही अधिक उत्सुक हैं और उनकी यही इच्छा संचार बाजार का यह एक बहुत बड़ा आधार बनी हुई हैं।
एक मजे की बात है कि हमेशा ही नारी स्वतंत्रता और और विकास के पक्षधर सार्वजनिक रूप से अश्लीलता रोकने का स्वतंत्रता के नाम पर तो विरोध करते हैं पर अंतर्जाल पर ‘सविता भाभी’ की रोक पर कोई सामने नहीं आया। लगभग यही स्थिति उनकी है जो परंपरावादी हैं और अश्लीलता रोकने का समर्थन करते हैं वह भी इसके समर्थन में आगे नहीं आये।
इधर अनेक अंतर्जाल लेखकों ने यह बता दिया है कि ‘सविता भाभी’ पर कैसे पहुंचा जा सकता है। हमने यह वेबसाईट देखने का प्रयास नहीं किया मगर इस पर लगा प्रतिबंध हमारे लिये कौतुक और जिज्ञासा का विषय है। इधर हमारे एक पाठ ने जमकर हिट पाये तो वह जिज्ञासा बढ़ गयी।
हम भी लगे गुणा भाग करने। पाया कि मस्तराम उसके मुकाबले एकदम फ्लाप है।
उस दिन इस लेखक ने सविता भाभी वेबसाईट पर लगे प्रतिबंध पर एक आलेख लिखा। उसका नाम भी पहली बार अखबार में देखा था। वह पाठ ब्लाग स्पाट के ब्लाग पर लिखा गया। हिंदी के सभी ब्लाग एक जगह दिखाने वाले एक फोरम ब्लाग वाणी पर इस लेखक के केवल ब्लाग स्पाट के ही ब्लाग दिखते हैं। वहां ब्लाग लेखक मित्रों की आवाजाही होती है और आम पाठक तो हमारे पाठों को सर्च इंजिनों में सीधे ही पढ़ते हैं। वहां सविता भाभी पर लिखा गया पाठ फ्लाप हो गया। उसे हमने शाम को डालाा था और अगली सुबह वही पाठ हमें सुस्त पड़ा दिखा। जैसे कह रहा हो कि तुमने शीर्षक में ही अगर ‘सविता भाभी’ लिखा होता तो मेरा यह हाल न होता।’
हमने उसे पुचकारा और शाम तक इंतजार करने के लिये कहा। शाम को आते ही उस पाठ को वर्डप्रेस के प्लेट फार्म ‘हिंदी पत्रिका’ पर ढकेल दिया। उस पर शीर्षक हिंदी और अंग्रेजी में लिखा-यह अलग बात है कि हिंदी में ‘सविता भाभी’ छूट गया पर अंग्रेजी में डालना नहीं भूले।
अपने दायित्व की इति श्री करने के बाद हमने उससे मूंह फेर लिया। डेढ़ दिन बाद जब वर्डप्रेस के डेशबोर्ड को खोला तो वह पाठों के शीर्ष पर मौजूद होकर वह हमें चिढ़ा रहा था-देखो हिंदी में लिखना था ‘सविता भाभी पर प्रतिबंध’ और लिख दिया केवल ‘पर प्रतिबंध’। हमने अंदर घुसकर देखा तो आंखें फटी रह गयी। कहां वह पाठ छह पाठकों की संख्या लेकर ब्लागवाणी में सुपर फ्लाप था और कहां वह डेढ़ सौ के पास पहुंच गया। हिंदी में शब्द डालने का अफसोस इसलिये नहीं रहा क्योंकि उसे अंग्रेजी के शब्द से ही खोजा गया था।
फिर हमने मस्तराम की खोजबीन की तो देखा कि उसके आंकड़े नगण्य थे। मस्तराम नाम की अंतर्जाल पर लोकप्रियता ठीक ठाक है। हम तो हैरान होते हैं जब मस्तरामी ब्लाग के आंकड़े देखते हैं। कुछ मत लिखो पर उस पाठकों का आगमन यथावत है। हमें याद है जब पत्रकार थे तब हमारे साथ एक बाजार संपादक हुआ करते थे। उनके शीर्ष ऐसे ही होते थे। ‘मिर्ची भड़की’, ‘सोना लुढ़का’, ‘चांदी उछली’ और ‘तेल पिछड़ा’। उनकी अनुपस्थिति में हम उनका काम देखते थे। तब ऐसे ही शीर्षक लगाते थे। उनकी देखा देखी हम अपने खेल समाचारों पर कभी कभी खेल संपादक के रूप में हम भी लिख देते थे कि‘अमुक टीम ने अमुक को पीटा’। इस बात को अनेक बरस हो गये हैं पर याद तो आती है। इस घटनाक्रम पर हमारे दिमाग में एक ही शीर्षक आ रहा था कि ‘सविता भाभी’ ने ‘मस्तराम’को पीटा।
आगे क्या होगा पता नहीं पर इस देश में अंतर्जाल पर व्यवसाय ढूंढ रहे लोग इसे नुस्खे के रूप में अपना सकते हैं। आप देखना कि ‘सविता भाभी’ नाम के अनेक उत्पाद और पाठ यहां दिख सकते हैं। प्रतिबंध लगा यह एक अलग विषय है पर जिस तरह अखबार में पढ़कर लोग इस पर आ रहे हैं उस पर विचार करना चाहिये कि कहीं इस तरह के प्रयास तो नहीं हो रहे कि इसके नाम के सहारे अंतर्जाल पर बाजार की नैया पर लगायी जाये क्योंकि अंतर्जाल का बाजर नियमित रूप से बना रहे इसके लिये टेलीफोन कंपनियों से विज्ञापन पाने वाले व्यवसायिक इस तरह के प्रयास करेंगे। मस्तराम से अधिक आशा नहीं की जा सकती।
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कंपनी कभी देवता तो कभी दानव -आलेख


कंपनियों का सच यही है कि वह आम निवेशक और उपभोक्ता और अपने कर्मचारी का शोषण करने के लिये बनायी जाती हैं। प्राचीन व्यापार में सेठ साहूकार यही काम करते थे पर जैसे लोगों के जागृति बढ़ने लगी उनके चेहरे स्याह दिखने लगे। तब कंपनी नाम का एक ऐसा दैत्य खड़ा किया जिसमें शोषक और अनाचारी व्यक्ति का चेहरा नहीं दिखता क्योंकि वह एक बोर्ड या तख्ती दिखाई देती है। पहले भी बोर्ड या तख्ती दिखती थी पर सेठ साहूकार की साख ही उसके साथ जुड़ी होती थी। तब यह भी निश्चित था कि आदमी के व्यापार के साथ उसका मालिक भी बदनाम होता था।
वैसे तो भारत में भी कंपनियों का प्रचलन बहुत समय से है पर पिछले बीस वर्षों से कंपनी शब्द भी आम जनता में प्रचलित हो गया है।

अमेरिका के नये राष्ट्रपति ओबामा ने अपने देश की कंपनियों के कामकाज के रवैये पर तीखी नाराजगी प्रकट की है। इसका कारण यह है कि वह एक तरफ मंदी की वजह से अपनी आय कम होने के संकट का प्रचार कर रही हैं दूसरी ओर अपने ही उच्चाधिकारियों को बोनस बांटने में लगी हैं-जी हां, यही कंपनियां सामान्य कर्मचारी को भी निकालने पर तुली हैंं। एक तरफ अपने संकट से उबरने के लिये सरकार से राहत की मांग और दूसरी तरफ अपने उच्चाधिकारियों को बोनस देना विरोधाभासी है। दरअसल कंपनी के उच्चाधिकारी भी अपने आपको सेवक के रूप में प्रस्तुत करते हैं, पर वह होते तो पुराने सेठ साहुकारों की तरह हैं। अंतर केवल यह है कि सुठ साहुकार अपनी जेब से भी पैसा लगाते थे पर यह आजकल के कंपनी प्रमुख सारे मजे सामान्य कर्मचारी के परिश्रम, आमभोक्ता के शोषण और निवेशक के धन से करना चाहते हैं। कंपनी बनाने वाले शायद ही कभी अपनी जेब से पैसा लगाते हों पर उनके ठाठ ऐसे होते हैं जैसे कि उनका खुद का धन हों। कंपनी नाम के देवता ने कई लोगों के जमीन से उठाकर आसमान में पहुंचा दिया पर इसी कंपनी नाम के दानव ने उनको आम आदमी के कर्मचारी,श्रमिक, और अपभोक्ता के शोषण का वरदान भी प्रदान किया।
समय बदल रहा है। वैश्वीकरण ने जहां बाजार को व्यापक आधार प्रदान किया है वहीं लोगों को प्रचार के शक्तिशाली माध्यम भी प्रदान किये हैं। अभी तक कंपनियां एक अंधेरे कुुएं की तरह थी पर मंदी के सूरज ने उन पर ऐसी रोशनी डाली है कि उनकी पोल पूरी दुनियों को दिखाई दे रही है।
पूरे विश्व के अनेक देशों में अनेक कंपनियों ने किसी न किसी तरह सरकारी खजाने पर अपना हाथ साफ किया है-हालांकि कई प्रसिद्ध कंपनियां इसका अपवाद भी हैं। इन्हीं कपंनी संगठनों ने इतनी शक्ति अर्जिकत कर ली कि वह सरकार बनाने और बिगाड़ने तक के काम अपनी इच्छानुसार सफलता पूर्वक कर लेती हैं। अब इस मंदी ने उनको पिचका दिया है। कहते हैं कि अमेरिका में पहली बार कोई अश्वेत व्यक्ति राष्ट्रपति बना और यह विश्व में बदलाव का संकेत है। अमेरिका में कंपनियों पर भी श्वेतों का वर्चस्व रहा और राष्ट्रपति पद पर भी। अब कंपनियों की पकड़ मंदी से संघर्ष के कारण कमजोर हो गयी है तो क्या यह बदलाव इसी कारण स्वाभाविक रूप से आ गया या कंपनियों ऐसा कुछ करने का समय नहीं निकाल सकंीं। इसका प्रमाण है कि अभी तक अमेरिका के राष्ट्रपति कभी अपने देश की कंपनियों के विरुद्ध नहीं बोलते थे पर नये अश्वेत राष्ट्रपति ने उनकी आलोचना कर यह साबित कर दिया कि कंपनी नाम के संगठन अब इतने मजबूत नहीं रहने वाले। कंपनियों में पैसा अनेक लोगों का होता है और उसके अनेक सामान्य कर्मचारी कार्यरत होते हैं पर उच्च अधिकारी-एक तरह से कहा जाये आजकल के सेठ-अपने हिसाब से मनमाने निर्णय लेते हैं। आपने सुना होगा कि अनेक कंपनियां प्रसिद्ध फिल्मी, खेल तथा समाज सेवा के क्षेत्र में कार्यरत हस्तियों को सम्मानित करने के साथ महंगे उपहार भी देती हैं। बाहर से सामान्य दिखने वाली इस बात पर अनेक लोग संशय अपने संशय भी भी व्यकत करते हैं। एक तो ऐसे सम्मानों और उपहारों का कंपनी के व्यापार से कोई संबंध नहीं होता दूसरा उसमें आम निवेशक की कोई भूमिका नहीं होती। हां, कथित उच्चाधिकारी इससे अपना नाम कमाने के साथ कंपनी से अलग अपनी भूमिका और छबि बनाने के लिये इसी तरह पैसा व्यय करते हैं। यही स्थिति कंपनियों के उत्पादों के विज्ञापनों के साथ भी है। कई कंपनियां बहुत प्रसिद्ध हैं और वह अपनी उत्पादों का विज्ञापन न भी करें तो भी उनकी बिक्री पर अंतर नहीं पड़े पर उसके उच्चाधिकारी प्रचार माध्यमों से अच्छे संबंध बनाने के लिये महंगी दरों पर विज्ञापन देकर अपने लिये एक सामाजिक सुरक्षा प्राप्त करते हैं जिससे उनके एक व दो नंबर दोनों प्रकार की गतिविधियां जान सामान्य के परिदृश्य में न आये। बहरहाल कंपनी संगठन आधुनिक व्यवस्था में आर्थिक और सामाजिक से बहुत शक्ति प्राप्त कर लेते हैं और उसके उच्चाधिकारी अपने विवेक के अनुसार उसका सदुपयोग और दुरुपयोग दोनों ही करने में समर्थ होते हैं। वैसे उदारीकरण के प्रांरम्भिक दौर में कई कंपनियां कुकुरमुतों की तरह उगे आयीं थीं और उसमें लोगों ने विनिवेश कर अपने पैसे गंवाये। अनेक कंपनियों के तो अब नाम भी नहीं आते। हां, कुछ पुरानी और प्रतिष्ठित कंपनियां आज भी लोगों के लिये बहुत बेहतर हैं और उसमें वह विनिवेश करते हैं। आजकल लोग कंपनियों के प्रबंधकों का नाम देखकर ही उस पर विश्वास या अविश्वास करते हैं। यह अलग बात है कि कभी कभी प्रसिद्ध और ईमानदार नाम जुड़े होने के बावजूद भी धोखे की गुंजायश तो रहती ही है।

इसमें भी कोई संशय नहीं है कि यह कंपनी संगठन ही है जिन्होंने पूरे विश्व में तकनीकी,सूचना,इंटरनेट तथा अन्य प्रचार माध्यमों को व्यापक आधार प्रदान किया पर अब उनका काला पक्ष भी लोगों के सामने आने लगा है। ऐसे में वही कंपनियां अपनी साख बचा सकेंगे जिनके प्रमुख वाकई प्रबंध कौशल में दक्ष होने के साथ नैतिकता और ईमानदारी के आधारों पर भी काम करेंगे। हालांकि कंपनी एक ऐसा व्यवसायिक स्वरूप है जिसमें देवत्व और दानवता दोनों साथ ही विद्यमान रहते हैं।
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सड़क ने प्यार से जुदा करा दिया-हास्य व्यंग्य कविता


बहुत दिन बाद प्रेमी आया
अपने शहर
और उसने अपनी प्रेमिका से की भेंट
मोटर साइकिल पर बैठाकर किक लगाई
चल पड़े दोनों सैर सपाटे पर
फिर बरसात के मौसम में सड़क
अपनी जगह से नदारत पाई

कभी ऊपर तो कभी नीचे
बल खाती हुई चल रही गाड़ी ने
दोनों से खूब ठुमके लगवाये
प्रेमिका की कमर में पीड़ा उभर आई
परेशान होते ही उसने
आगे चलने में असमर्थता अपने प्रेमी को जताई

कई दिन तक ऐसा होता रहा
रोज वह उसे ले जाता
कमर दर्द के कारण वापस ले आता
प्रेमिका की मां ने कहा दोनों से
‘क्यों परेशान होते हो
बहुत हो गया बहुत रोमांस
अब करो शादी की तैयारी
पहले कर लो सगाई
फिर एक ही घर में बैठकर
खूब प्रेम करना
बेटी के रोज के कमर दर्द से
मैं तो बाज आई’

प्रेमिका ने कहा
‘रहने दो अभी शादी की बात
पहले शहर की सड़के बन जायें
फिर सोचेंगे
इस शहर की नहीं सारे शहरों में यही हाल है
टीवी पर देखती हूं सब जगह सड़कें बदहाल हैं
शादी के हनीमून भी कहां मनायेंगे
सभी जगह कमर दर्द को सहलायेंगे
फिर शादी के बाद सड़क के खराब होने के बहाने
यह कहीं मुझे बाहर नहीं ले जायेगा
घर में ही बैठाकर बना देगा बाई
इसलिये पहले सड़कें बन जाने तो
फिर सोचना
अभी तो प्यार से करती हूं गुडबाई’

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लोगों के मन का सहारा है परनिंदा करना-व्यंग्य आलेख


हमारे देश के लोगों का सबसे बड़ा दोष है-परनिंदा करना। बहुत कम लोग हैं जो इसके कीटाणुओं से मुक्त रह पाते हैं। देखने में भक्त और साधु किस्म के लोग भी इस बीमारी से उतने ही ग्रस्त होते हैं जितने सामान्य लोग। अगर कहीं चार लोगों के बीच चर्चा करो तो वहां अनुपस्थित व्यक्ति की निंदा हाल शुरू हो जाती है।

कई बार तो विचित्र स्थिति भी सामने आ जाती है। जब एक आदमी किसी दूसरे से अन्य के बारे में चर्चा करते हुए उसके दोष गिनाता है और श्रोता व्यक्ति यह सोचकर हंसता है कि यह दोष तो कहने वाले में भी है पर वह नहीं समझता। उसे लगता है कि दूसरा आदमी उसकी बात से सहमत है।
लोग परनिंदा में लिप्त तो होते हैं पर उससे घबड़ाते बहुत हैं। यही कारण है कि कई तरह के मानसिक बोझ व्यर्थ गधे की तरह ढोकर अपना जीवन नरक बनाते हैं यह अलग बात है कि वह मरणोपरांत स्वर्ग की कल्पना करना नहीं छोड़ते। ‘लोग क्या कहेंगे’, और ‘लोग क्या सोचेंगे’।

एक सज्जन दूसरे से अपने ही एक मित्र के बारे में कह रहे थे-‘वह तो दिखने का ही भला आदमी है। मैं तो उसे ऐसे ही अपना मित्र कहता हूं क्योंकि उससे काम निकालना होता है। वह तो अपने बाप का नहीं हुआ तो मेरा क्या होगा? उसक मां बाप अलग रहते हैं। दोनों बीमार हैं पर वह उनके पास जाता तक नहीं है। न ही पैसा देता है। बिचारे रोते रहते हैं। ऐसा आदमी इस दुनियां मेंे किस काम का जो मां बाप की सेवा नहीं करता।’

दूसरे ने कहा-‘भई, किसी के परिवार के विवादों को सार्वजनिक रूप से चर्चा नहीं करो तो अच्छा! आज तुम उनके बारे में कह रहे हो कल कोइ्र्र तुम्हारे बारे में भी कह सकता है। उसके मां बाप तो उसके घर से दूर रहते हैं हो सकता है वह अपने कार्य की व्यस्तता के कारण नहीं जा पाता हो। तुम्हारे मां बाप तो एकदम पास ही रहते हैं पर वह भी तुम्हारे बारे में ऐसी ही बातें करते हैं। यह तो घर घर की कहानी है।’

पहले वाले सज्जन एकदम तैश में आ गये और बोले-‘वह तो बुजुर्गों की आदत होती है। वैसे मैने तो अपने दम पर ही अपना मकान और सामाजिक प्रतिष्ठा अर्जित की है। अपने मां बाप से एक भी पैसा नहीं लिया। उन्होंने सब छोटे भाई को दे दिया है। उससे तो मेरी तुलना हो ही नहीं सकती।’

बहरहाल दोनों में बातचीत से तनाव बढ़ा और फिर दोनों में बातचीत ही बंद हो गयी। अपने दोष कोई सुन नहीं सकता पर दूसरे का प्रचार हर कोई ऐसे करता है जैसे कि वह सर्वगुण संपन्न हो।

किसी सात्विक विषय पर चर्चा करने की बजाय हर पल अपने लिये समाज के खलपात्र ढूंढने लगते हैं। नहीं मिलें तो फिल्मी सितारों और खलपात्रों की ही बात करेंगे। कहीं भी जाओ तो बस यही जुमले सुनाई देंगे‘अमुक आदमी ने अपने मां बाप को जीवन भर पूछा ही नहीं पर मर गया तो तेरहवीं पर पानी की तरह पैसा बहाया ताकि समाज के लोग खापीकर उसकी प्रशंसा करें’ या फिर ‘अमुक का लड़का नकारा है इसलिये ही उसकी बहुत भाग गयी आदि आदि।

तमाम तरह के संत और साधु अपने भक्तों के सामने प्रवचन में कहते हैं कि ‘परनिंदा मत करो‘ कार्यक्रम खत्म होते ही अपने निजी सेवकों और भक्तों के समक्ष दूसरे संतों की निंदा करने लग जाते हैं। उन पर आश्रित सेवक या भक्त उनके सामने कैसे कह सकता है कि कि ‘महाराज अभी तो आप परनिंदा की लिये मना कर रहे थे और आप जो कह रहे हैं क्या वह परंनिदा नहीं है।’
जैसे वक्ता वैसे ही श्रोता। श्रोता ऐसे बहरे कि उनको लगता है कि वक्ता जैसे गूंगा हो।

पंडाल में प्रवचन करते हुए वक्ता कह रहा है ‘परनिंदा मत करो’, पर वहां बैठे श्रोता तो व्यस्त रहते हैं अपने घर परिवार की चिंताओं में या अपने साथ आये लोगों के साथ वार्ताओं में। कोई अपने दामाद से खुश है तो कोई नाखुश। बहू से तो कोई सास कभी खुश हो ही नहीं सकती। उसी तरह बहुत कम बहूऐं ऐसी मिलेंगी जो सास की प्रशंसा करेंगी। लोग इधर उधर निंदा में ही अपना समय व्यतीत करते हैं और जिनको सुनने वाले लोग नहीं मिलते वह ऐसे सत्संग कार्यक्रमों की सूचना का इंतजार करते हैं कि वहां कोई पुराना साथी मिल जाये तो जाकर दिल की भड़ास निकालें।

ऐसा लगता है कि इसे देश में मौजूद लोगों परनिंदा करने की भूख को शांत करने के लिये ही ऐसे पारंपरिक मिलन समारोह बनाये गये हैं जहां आकर सब अपने को छोड़कर बाकी सभी की निंदा कर सकें। कई तो व्यवसाय ही इसलिये फल रहे हैं। फिल्म में एक नायक और एक खलनायक इसलिये ही रखा जाता है ताकि लोग नायक में अपनी छबि देखें और खलनायक में किसी दूसरे की। बातचीत मेंं लोग जिससे नाखुश होते हैं उसके लिये किसी फिल्मी खलनायक की छबि ढूंढते हैं।

आजकल के प्रचार माध्यम तो टिके ही परनिंदा के आसरे हैं। वह अपने लिये समाज के ऐसे खलपात्रों का ही प्रचार करते हैं जो अपराध तो करते हैं पर आसपास दिखाई नहीं देते। उन पर ढेर सारे शब्द और समय व्यय किया जाता है। लोग एकरसता से ऊबे नहीं इसलिये बीच बीच में भले लोगों के रचनात्मक काम का प्रदर्शन भी कर देते हैं। अखबार हों या टीवी चैनल ऐसी खबरों को ही महत्वपूर्ण स्थान देते हैं जिनमें दूसरों का दोष लोगों को अधिक दिखाई दे। कहीं बहू खराब तो कहीं सास, कहीं जमाई तो कही ससुर खूंखार और कही भाई तो कहीं साला अपराधी। लोग बड़े चाव से देखते हैं खराब व्यक्ति को। तब उनको आत्मतुष्टि मिलती हैं कि हम तो ऐसे नहीं हैं।

इसी कारण कहा भी जाता है कि ‘बदनाम हुए तो क्या नाम तो है’। रचनात्मक काम के परिश्रम अधिक लगता है कि नाम पाने के लिये मरणोपरांत ही संभावना रहती है जबकि विध्वंस में तत्काल चर्चा हो जाती है। अखबार और टीवी में नाम आ जाता हैं। भले लोग को अपना यह जुमला दोहराने का अवसर निरंतर मिलता है‘आजकल जमाना बहुत खराब है’। यह सुनते हुए बरसों हो गये हैं। यह पता हीं लगता कि जमाना सही था कब? एक भला आदमी दूसरे से संबंध रखने की बजाय दादा टाईप के आदमी से संबंध रखता है कि कब उससे काम पड़ जाये। हर किसी को दादा टाईप लोगों में ही दिलचस्पी रहती है।

कुल मिलाकर परनिंदा पर ही यह भौतिक संसार टिका हुआ है। अनेक लोगों की रोजी रोटी तो केवल इसलिये चलती है कि वह परनिंदा करते हैं तो कुछ कथित महान लोगों को इसलिये मक्खन खाने की अवसर मिलता है क्योंकि वह लोगों का संदेश देते हैं कि परनिंदा मत करो। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि सारा संसार ही परंनिंदा पर टिका है।

सारा संसार परनिंद पर टिका है-व्यंग्य आलेख

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नहीं मिलते उनकी करतूतों के निशान-हिंदी शायरी


कई किताबें पढ़कर बेचते है ज्ञान
अपने व्यापार को नाम देते अभियान
चार दिशाओं के चौराहे पर खड़े होकर
देते हैं हांका
समाज की भीड़ भागती है भेड़ों की तरह
नाम लेते हैं शांति का
पहले कराते हैं सिद्धांतों के नाम पर झगड़ा
बह जाता है खून सड़कों पर
उनका नहीं होता बाल बांका
कोई तनाव से कट जाता
कोई गोली से उड़ जाता
पर किसी ने उनके घर में नहीं झांका
कहीं नहीं मिलते उनकी करतूतों के निशान
…………………………………………….

हमें मंजिल का पता बताकर
खुद वह जंगल में अटके हैं
कहने वाले सच कह गये
जो सबको बताते हैं
नदिया के पार जाने का रास्ता
वह स्वयं कभी पार नहीं हुए हैं
कहैं महाकवि दीपक बापू
उन्मुक्त भाव से जीते हैं जो लोग
मुक्त कहां हो पाते हैं स्वयं
दुनियां भर के झंझट उनके मन के बाहर लटके हैं
………………………………………….

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हर रोज जंग का माडल, हर समय होता-व्यंग्य कविता


हर इंसान के दिल की पसंद अमन है
पर दुनियां के सौदागरों के लिये
इंसान भी एक शय होता
जिसके जज्बातों पर कब्जा
होने पर ही सौदा कोई तय होता
बिकता है इंसान तभी बाजार में
जब उसके ख्याल दफन होते
अपने ही दिमाग की मजार में
जब खुश होता तो भला कौन किसको पूछता
सब होते ताकतवर तो कौन किसको लूटता
ढूंढता है आदमी तभी कोई सहारा
जब उसके दिल में कभी भय होता
उसके जज्बातों पर कब्जो करने का यही समय होता

चाहते हैं अपने लिये सभी अमन
पर जंग देखकर मन बहलाते हैं
इसलिये ही सौदागर रोज
किसी भी नाम पर जंग का नया माडल
बेचने बाजार आते हैं
खौफ में आदमी हो जाये उनके साथ
कर दे जिंदगी का सौदा उनके हाथ
सब जगह खुशहाली होती
तो सौदागरों की बदहाली होती
इसलिये जंग बेचने के लिये बाजार में
हमेशा खौफ का समय होता

बंद कर दो जंग पर बहलना
शुरू कर दो अमन की पगडंडी पर टहलना
मत देखो उनके जंग के माडलों की तरफ
वह भी बाकी चीजों की तरह
पुराने हो जायेंगे
नहीं तो तमाम तरह की सोचों के नाम पर
रोज चले आयेंगे
पर ऐसा सभी नहीं कर सकते
आदमी में हर आदमी से बड़े बनने की ख्वाहिश
जो कभी उसे जंग से दूर नहीं रहने देगी
क्योंकि उसे हमेशा अपने छोटे होने का भय होता
सदियां गुजर गयी, जंगों के इतिहास लिखे गये
अमन का वास्ता देने वाले हाशिये पर दिखे गये
इसलिये यहां हर रोज जंग का माडल हर समय होता
………………………………..

hasya kavita-प्यार कोई कारखाने में बनने वाली चीज नहीं है-कविता


मन में प्यास थी प्यार की
एक बूंद भी मिल जाती तो
अमृत पीने जैसा आनंद आता
पर लोग खुद ही तरसे हैं
तो हमें कौन पिलाता

स्वार्थों की वजह से सूख गयी है
लोगों के हृदय में बहने वाली
प्यार की नदी
जज्बातों से परे होती सोच में
मतलब की रेत बसे बीत गईं कई सदी
कहानियों और किस्सों में
प्यार की बहती है काल्पनिक नदी
कई गीत और शायरी कही जातीं
कई नाठकों का मंचन किया जाता
पर जमीन पर प्यार का अस्तित्व नजर नहीं आता

गागर भर कर कभी हमने नहीं चाहा प्यार
एक बूंद प्यार की ख्वाहिश लिये
चलते रहे जीवन पथ पर
पर कहीं मन भर नहीं पाता

जमीन से आकाश भी फतह
कर लिया इंसान
प्यार के लिये लिख दिये कही
कुछ पवित्र और कुछ अपवित्र किताबों
जिनका करते उनको पढ़ने वाले बखान
पर पढ़ने सुनने में सब है मग्न
पर सच्चे प्यार की मूर्ति सभी जगह भग्न
लेकर प्यार का नाम सब झूमते
सूखी आंखों से ढूंढते
पर उनकी प्यास का अंत नजर नहीं आता
प्यार कोई जमीन पर उगने वाली फसल नहीं
कारखाने में बन जाये वह चीज भी नहीं
मन में ख्यालों से बनते हैं प्यार के जज्बात
बना सके तो एक बूंद क्या सागर बन जाता
पर किसी को खुश कोई नहीं कर सकता
इसलिये हर कोई प्यार की एक बूंद के
हर कोई तरसता नजर नहीं आता
………………………………..

विचारों की धारा-कविता


विचारों की धारा मस्तिष्क में
बहती चली जाती है
जब तक बहती है
अच्छा लगता है
जब एक विचार अटक जाता है
रुकी धारा से दुर्गंध आती है
प्रसन्न्ता का समय
बहता जाता हे
पर दुःख के पल में
घड़ी बंद नजर आती है

एकांत से हटकर भीड़ में जाकर
भला कहां मिलती है शांति
अकेले में भी अपनों के दर्द की
याद आकर सताती है

मन में जगह होती है बहुत
देते हैं किराये पर देते चिंताओं को
खौफ लगता है जमाने का
जो खुद लंगड़ाते चल रहा है
किताबों में लिखी लकीरों को
अपनी लाठी बनाकर
उसमें बदनाम होने का भय
अपने अंदर  लाकर
भला कैसे करते हैं उन चिंताओं से
चैन की आशा
जो अपने साथ बैचेनी ले आती है

संत कबीर वाणी:जैसा भोजन और पानी वैसा मन और वाणी


आवत गारी एक है, उलटत होय अनेक
कहैं कबीर नहिं उलटिए, वही एक की एक

संत कबीर जी का कहना है की गाली आते हुए एक होती है, परन्तु उसके प्रत्युत्तर में जब दूसरा भी गाली देता है, तो वह एक की अनेक रूप होती जातीं हैं। अगर कोई गाली देता है तो उसे सह जाओ क्योंकि अगर पलट कर गाली दोगे तो झगडा बढ़ता जायेगा-और गाली पर गाली से उसकी संख्या बढ़ती जायेगी।

जैसा भोजन खाईये, तैसा ही मन होय
जैसा पानी पीजिए, तैसी बानी होय

संत कबीर कहते हैं जैसा भोजन करोगे, वैसा ही मन का निर्माण होगा और जैसा जल पियोगे वैसी ही वाणी होगी अर्थात शुद्ध-सात्विक आहार तथा पवित्र जल से मन और वाणी पवित्र होते हैं इसी प्रकार जो जैसी संगति करता है उसका जीवन वैसा ही बन जाता है।

एक राम को जानि करि, दूजा देह बहाय
तीरथ व्रत जप तप नहिं, सतगुरु चरण समाय

कबीर कहते हैं की जो सबके भीतर रमा हुआ एक राम है, उसे जानकर दूसरों को भुला दो, अन्य सब भ्रम है। तीर्थ-व्रत-जप-तप आदि सब झंझटों से मुक्त हो जाओ और सद्गुरु-स्वामी के श्रीचरणों में ध्यान लगाए रखो। उनकी सेवा और भक्ति करो

अपने मुहँ से अपनी तारीफ़-हास्य व्यंग्य


अब दो फिल्म अभिनेताओं में झगडा शुरू हो गया है कि वह नंबर वन हैं। आज जब मैंने यह खबर एक टीवी चैनल पर सुनी तो मुझे हैरानी नहीं हुई क्योंकि हमारे बुजुर्ग कहते रहे हैं कि चूहे को मिली हल्दी की गाँठ तो गाने लगा कि ”मैं भी पंसारी, मैं भी पंसारी”। ऐसा भाव आदमी में स्वाभाविक रूप से होता भी है थोडा बहुत नाच-गा लेता है या लिख लेता तो उसके दिमाग में नंबर वन का कीडा कुलबुलाने लगता है। थोडे ठुमके लगा लिए और कुछ इधर-उधर टीप कर लिख लिया। और फिर सोचने लगता है कि अब कोई कहेगा कि अब तुम नंबर वन हो। जब कोई नहीं कहता तो खुद ही कहने लगता है कि ‘मैं नंबर वन हूँ’। उसकी बात कोई न सुने तो वह और अधिक चीखने और चिल्लाने लगता है कि जैसे कि उसका मानसिक संतुलन गड़बड़ होता दिखता है।

कम से कम इस मामले में मैं बहुत भाग्यशाली हूँ कि खराब लेखनी की वजह से मेरे अन्दर एक कुंठा हमेशा के लिए भर गयी कि लिखने के मामले में मुझे कहीं भी नंबर नहीं मिलेगा। निबंध लिखता था तो टीचर कहते थे तुम्हारी राईटिंग खराब है इसलिए नंबर कम मिलेंगे पर पास होने लायक जरूर मिलेंगे क्योंकि लिखा अच्छा है। इस कुंठा को साथ लेकर साथ चले तो फिर नंबर वन की कभी चिंता नहीं की। अंतर्जाल पर लिखते समय यह तो मालुम था कि कोई नंबर वन का शिखर हमारे लिए नहीं है इसलिए अपने शिखर को साथ लेकर उतरे और वह था सतत संघर्ष की भावना और आत्मविश्वास जिसके बारे में हमारे गुरु ने कह दिया कि वह तुम में खूब है और कहीं अगर किसी क्षेत्र में कोई नंबर वन का शिखर खाली हुआ तो तुम जरूर पहुंचोगे। हम उनकी बात सुनकर खुश हुए पर आगे उन्होने कहा पर इसकी आशा मत करना क्योंकि इसके लिए तुम्हें विदेश जाना होगा भारत में तो इसके लिए सभी जगह सिर-फुटटोबल होती मिलेंगी। इस देश में लोग हर जगह नंबर वन के लड़ते मिलेंगे और तुम यह काम नहीं करो पाओगे।

हमने देखा तो बिलकुल सही लगा। घर-परिवार, मोहल्ला-कालोनी, नाटक–फिल्म और गीत-संगीत, साहित्य और व्यापार में सब जगह जोरदार द्वंद्व नजर आता है। हम भी कई जगह सक्रिय हैं और जब लोगों को नंबर वन के लिए लड़ते देखते हैं तो हँसते हैं। एक बात मजे की है कि कोई हमें नंबर वन के लिए आफर भी नहीं करता और हमें भी अफ़सोस भी नहीं होता। एक बार एक संस्था के अध्यक्ष पद पर भाई लोगों ने खडा कर दिया और मैंने अन्तिम समय में अपना नाम वापस ले लिया, क्योंकि मुझे लगा कि पूरे साल मैं अपनी आजादी खो बैठूंगा पर कार्यकारिणी के सदस्य पर लड़ा और जीता। सात सौ सदस्यों वाली उस समिति में सात कार्यकारिणी सदस्यों में नंबर वन पर आया। तब मुझे हैरानी हुई पर यह सम्मान मुझे अपने लेखक होने के प्रताप से मिला था और फिर आगे कई संस्थाओं से जुडे होने के बावजूद मैंने कहीं चुनाव नहीं लड़ा क्योंकि अगर मुझे अपने लिखे से ही लोगों का प्यार मिलना है तो मुझे कुछ और क्या करने की जरूरत है।

हिन्दी फिल्मों में अभिनेता करोडों रुपये कमा रहे हैं पर उनका मन भटकता हैं नंबर वन के लिए। उसका आधार क्या है? फिल्मी समीक्षक फिल्म के परिश्रम को मानते हैं। आजादी देते समय अंग्रेज जाते समय हमारे अक्ल भी ले गए और हम सारे आधार पैसे के अनुसार ही करते हैं। आजकल क्रिकेट के व्यापार में उतरे फिल्मी हीरो और चाकलेटी हीरो में नंबर वन का मुकाबला प्रचार माध्यम चला रहे हैं एक हीरों खुद ही दावा कर दिया कि वह नम्बर वन हैं। सच कहूं तो आजकल प्रचार माध्यम में कुंठित लोगों का जमावडा है और उनको खुद पता नहीं क्या कह रहे हैं? किसी समय मिथुन चक्रवर्ती को गरीबों का अमिताभ बच्चन कहा जाता था और इसलिए उनको नंबर वन फिर भी किसी ने नहीं कहा क्योंकि उनका पारिश्रमिक अमिताभ बच्चन जितना नहीं था।मैं अमिताभ बच्चन का कभी प्रशंसक नहीं रहा पर आज मैं मानता हूँ अपने दूसरी पारी में अमिताभ एक नंबर से नौ नंबर तक हैं और दसवें पर कोई है तो अक्षय कुमार। बाकी जो खुद को नंबर वन के लिए प्रोजेक्ट कर रहे हैं या मीडिया प्रचार कर रहा हैं वह किसी अन्य व्यवसायिक कारणों से कर रहे हैं।
जिनकी मुझे आलोचना करनी होती है मैं उनके नाम नहीं देता क्योंकि उसे इस बहाने व्यर्थ प्रचार देना है और जिनकी मुझे प्रशंसा करनी होती है उनका नाम लेने में मुझे कोई हिचक नहीं होती। अक्सर मेरी हर वर्ग और आयु के लोगों से चर्चा होती है और उनसे मुझे बात कर यही लगता है कि कुछ लोगों को मीडिया जबरन लोगों पर थोप रहा है। अगर अभिनय की बात करें तो ओमपुरी और नसीरुद्दीन शाह, सदाशिव अमरापुरकर और अमरीशपुरी जैसे अभिनेताओं को तो फिल्म समीक्षकों और प्रचार माध्यमों द्वारा कभी गिना ही नहीं जाता जबकि लोग आज भी इनके कायल हैं। वैसे भी अमिताभ बच्चन अभी सक्रिय है और नंबर वन का सिंहासन अभी उनके नाम है और उनके बाद अक्षय कुमार की छवि लोगों में अच्छी है।
अगर इस लेख को लिखते हुए हमें अपनी प्रशंसा कर डाली हो तो अनदेखा कर दें आखिर जब इस बीमारी सब ग्रस्त हैं तो हम कैसे बच सकते हैं. हमें कोई नहीं कह रहा कि तुन नबर वन ब्लोगर है इसलिए कभी ऐसा दावा करें तो मजाक समझना. माफी वगैरह तो हम मांगेंगे नहीं फिर व्यंग्य कैसे लिखेंगे.

सुबह और शाम का दृश्य-लघुकथा


वह एक गृह स्वामी की तरह अपने पोर्च के नीचे खडा था . कालोनी का चौकीदार पैसे मांगने आया और बोला-”बाबूजी नमस्कार.
उसने अपने पहले दोनों हाथ जोड़े और अपना एक हाथ मांगने के लिए बढाया.
उसके जेब में दस, बीस, पचास और सौ के नोट थे, पर उसे तीस रूपये देने का मन नहीं हुआ और बोला-”यार, अभी हमें वेतन नहीं मिला. जब मिलेगा तो ले जाना.
वह चला गया. घर पर काम करने वाले बाई आई और काम कर जब जाने वाली थी तब बोली-”बाबूजी, आज हमें अपने दो सौ रूपये दे दीजिये.हमें अपने बेटे के लिए फीस भरनी है.”
यह उसके जेब में रखी रकम से कोई कम नहीं थी फिर भी उसने कहा-”अभी वेतन नहीं मिला. जब मिल जायेगा तो दे दूंगा.
वह चली गयी. कुछ देर बाद सड़क पर झाडू लगाने वाला आया और उसने नमस्कार की. उसे हर महीने बीस रूपये देने होते थे. उसे भी उसने वही जवाब दिया.
पत्नी ने कहा-”इतना पैसा तो अपने पास होता है, फिर आपने दिया क्यों नहीं? मुझसे ही लेकर देते.”
उसने कहा-”ठीक है. कल दे देंगे. क्या जाता है. कौनसा पहाड़ टूट पड़ रहा है. सुबह-सुबह सब भिखारियों की तरह मांगने चले जाते हैं. मुझे तो उनकी शक्ल देखकर ही नफरत होती है.

शाम को उसने अपना काम समाप्त किया और अपना वेतन मांगने के लिए प्रबंधक के पास गया. उसका जवाब था-”
कल ले लेना.”
”आज क्यों नहीं?आपके यहाँ तो पैसा हमेशा रहता है.”
प्रबंधक ने कहा-”हाँ, पर आज मुझे जल्दी जाना है, फिर आज मेरा असिस्टेंट भी नहीं है. अपनी तनख्वाह लेकर चला गया. उसे खरीददारी करनी थी.”

उसे बहुत गुस्सा आ गया और बोला-”क्या हम मेहनत नहीं करते? उस क्लर्क को जल्दी खरीददारी करनी थी पर हम क्या करेंगे?”
प्रबंधक ने कहा-”चिल्लाओ नहीं. वह मालिकों का रिश्तेदार है, अगर किसी ने सुन लिया तो इस नौकरी से भी जाओगे.
वह गुस्से में घर आया और अपनी पत्नी के सामने प्रबंधक और क्लर्क को गाली देना लगा गो वह बोली-”सुबह हमने क्या किया था? वही उन्होने हमारे साथ किया. अगर वह छोटे लोग कल तक इन्तजार कर सकते हैं तो फिर हम क्यों नहीं?”

वह हतप्रभ खडा था. देर रात तक सोते समय सुबह और शाम के दृश्य उसके सामने घूम रहे थे.

संत कबीर वाणी:प्रभु का दर्शन करने वाला गाता नहीं


कबीर जब हम गावते, तब जाना गुरु नाहीं
अब गुरु दिल में देखिया, गावन को कछु नाहिं

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब तक हम गाते रहे, तब तक हम गुरु को जान ही नहीं पाए, परन्तु अब हृदय में दर्शन पा लिया, तो गाने को कुछ नहीं रहा.

भावार्थ- संत कबीरदास जी के दोहों में बहुत बड़ा महत्वपूर्ण दर्शन मिलता है. समाज में कई ऐसे लोग हैं जो किन्हीं गुरु के पास या किसी मंदिर या किसी अन्य धार्मिक स्थान पर जाते है और फिर लोगों से वहाँ के महत्त्व का दर्शन बखान करते हैं. यह उनका ढोंग होता है. इसके अलावा कई गुरु ऐसे भी हैं जो धर्म ग्रंथों का बखान कर अपने ज्ञान तो बघारते हैं पर उस पर चलना तो दूर उस सत्य के मार्ग की तरफ झांकते तक नहीं है. ऐसे लोग भक्त नहीं होते बल्कि एक गायक की तरह होते हैं. जिसने भगवान् की भक्ति हृदय में धारण कर ली है तो उसे तत्वज्ञान मिल जाता है और वह इस तरह नहीं गाता. वह तो अपनी मस्ती में मस्त रहता है किसी के सामने अपने भक्ति का बखान नहीं करता.

अगर ब्लोग के लिए पुरस्कार घोषित हुए तो


एक ब्लोगर* ने दूसरे से कहा
”यार, तुम उम्मीद करते हो कि
कभी हमारे लिए भी पुरस्कार
घोषित किये जायेंगे’
दूसरे ने कहा
‘ख्याल तो अच्छा है पर
यह भी सोच लो
जब ऐसी संभावना बनी भी
तो अपुन तो बाहर हो जायेंगे
ढेर सारे छद्म ब्लोग आसमान से
जमीन पर उतर आयेंगे
औरों का तो छोडो
अपने ब्लोग के नाम भी हम भूल जायेंगे
और जो इनाम देने वाले होंगे
वह पहले अपने ब्लोगर मैदान में लायेंगे
पढ़ना-पढाना तो हो जायेगा दूर
अभी तो पुरस्कार की संभावना नहीं है
तब यह हाल है और अगर बनी भी तो
ब्लोगर एक दूसरे पर बरसते नजर आयेंगे
————————————————–
*इंटरनेट पर लिखने वाले
नोट-यह एक काल्पनिक हास्य-व्यंग्य रचना है और इसका किसी घटना से कोई लेना देना नहीं है और अगर किसी से मेल खा जाये तो वही उसके लिए जिम्मेदार होगा

चाणक्य नीति:अपनी योजना गुप्त रखने पर ही सफलता संभव


१. यदि आप सफलता हासिल करना चाहते हैं तो गोपनीयता रखना सीख लें. जब किसी कार्य की सिद्धि के लिए कोई योजना बना रहे हैं तो उसके कार्यान्वयन और सफल होने तक उसे गुप्त रखने का मन्त्र आना चाहिए. अन्य लोगों की जानकारी में अगर आपकी योजना आ गयी तो वह उसमें सफलता संदिग्ध हो जायेगी.

२.प्रत्येक व्यक्ति को स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए. उसे प्रतिदिन धर्म शास्त्रों का कम से कम एक श्लोक अवश्य पढ़ना चाहिए. इससे व्यक्ति को ज्ञान प्राप्त होता है और उसका भला होता है.

३.विवेकवान मनुष्य को जन्मदाता, दीक्षा देकर ज्ञान देने वाले गुरु, रोजगार देने वाले स्वामी एवं विपत्ति में सहायता करने वाले संरक्षक को सदा आदर देना चाहिए.

४.मनुष्य को चाहिए की कोई कार्य छोटा हो या बड़ा उसे मन लगाकर करे. आधे दिल व उत्साह से किये गए कार्य में कभी सफलता नहीं मिलती. पूरी शक्ति लगाकर अपने प्राणों की बाजी लगाकर कार्य करने का भाव शेर से सीखना चाहिए.

५.अपनी सारी इन्द्रियों को नियंत्रण में कर स्थान, समय और अपनी शक्ति का अनुमान लगाकर कार्य सिद्धि के लिए जुटना बगुले से सीखना चाहिए.

जजबात वह शय है


जजबातों के साथ जीना अच्छी बात है
पर उन्हें कोई बांधकर
हमारी अक्ल को भी कोई साथ ले जाये
यह मंजूर नहीं करना
अब उस्ताद वैसे नहीं है जो
शागिर्द को सिखा सब दाव सिखा दें
फिक्सिंग का खेल सभी जगह हैं
क्या पता कौन चेला
उस्ताद को स्टिंग आपरेशन में फंसा दे
इसलिए जहाँ तक विज्ञापन में बिक सके
उतना ही नाच नचवाये
तुम दिमाग से देखना
दिल में कुछ मत बसाना
जजबात से शेर-ओ-शायरी करना
पर किसी ड्रामे के सीन पर
न हँसना और न रोना
आदमी के जजबात अब वह शय है
जो बाजार में बिकती है
और उसे पता भी न चल पाए
खुले में होता है व्यापार
पर दिखता नहीं है
क्योंकि जजबात ही हैं जो
आदमी को अक्ल पर ताला लगाए
—————————–

चाणक्य नीति:मन शुद्ध हो तो प्रतिमा में भी भगवान्


1.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आयुर्वेद तथा धनुर्वेद की विद्याओं की भी गणना भी नहीं की जा सकती है, इसके विपरीत मनुष्य का जीवन अल्प है और उस अल्पकाल के जीवन में रोग,शोक, कष्ट आदि अनेक प्रकार की बाधाएं उपस्थित होती रहती हैं। इस स्थिति में मनुष्य को शास्त्रों का सार ग्रहण करना चाहिए।
संपादकीय अभिमत-विश्व में अनेक प्रकार के ग्रंथ हैं और सबको पढ़ना और उनका ज्ञान धारण करना संभव नहीं है इसलिए सार अपनी दिमाग में रखना चाहिए. अनेक पुस्तकों में कहानियां और उदाहरण दिए जाते हैं पर उनके सन्देश का सार बहुत संक्षिप्त होता है और उसे ही ध्यान में रखान चाहिऐ

2.मन की शुद्ध भावना से यदि लकड़ी, पत्थर या किसी धातु से बनी मूर्ति की पूजा की जायेगी तो सब में व्याप्त परमात्मा वहां भी भक्त पर प्रसन्न होंगें। अगर भावना है तो जड़ वस्तु में भी भगवान का निवास होता है ।
3. सच्ची भावना से कोई भी कल्याणकारी काम किया जाये तो परमात्मा की कृपा से उसमें अवश्य सफलता मिलेगी। मनुष्य की भावना ही प्रतिमा को भगवान बनाती है। भावना का अभाव प्रतिमा को भी जड़ बना देता है।
संपादकीय अभिमत-यह सच है की प्रतिमा में भगवान् का अस्तित्व नही दिखता पर इस उसमें उसके होने की अनुभूति हमारे मन होती है. आदमी का मन ही उसका मूल है इसलिए उसे मनुष्य कहा जाता है. जब किसी प्रतिमा के सामने बहुत श्रद्धा से प्रणाम करते हैं तो कुछ देर इस दुनिया से विरक्त हो जाते हैं और हमारा ध्यान थोडी देर के लिए पवित्र भाव को प्राप्त होता है. यह बहुत महत्वपूर्ण होता है. हाँ, इसके लिए हमें मन में शुद्ध भावना को स्थापित करना पडेगा तभी हम प्रसन्नता प्राप्त कर सकते हैं.

4.इस क्षण-भंगुर संसार में धन-वैभव का आना-जाना सदैव लगा रहेगा। लक्ष्मी चंचल स्वभाव की है। घर-परिवार भी नश्वर है। बाल्यकाल, युवावस्था और बुढ़ापा भी आते हैं और चले जाते हैं। कोई भी मनुष्य उन्हें सदा ही उन्हें अपने बन्धन में नहीं बाँध सकता। इस अस्थिर संसार में केवल धर्म ही अपना है। धर्म का नियम ही शाश्वत है और उसकी रक्षा करना ही सच्चा कर्तव्य है।
5.जिस प्रकार सोने की चार विधियों-घिसना, काटना, तपाना तथा पीटने-से जांच की जाती है, उसी प्रकार मनुष्य की श्रेष्ठता की जांच भी चार विधियों-त्यागवृति, शील, गुण तथा सतकर्मो -से की जाती है।

पानी पिलायें ऐसा नही अवसर


भाषण करते हुए वह बोले
”हम अब प्रगति के पथ पर
अग्रसर हैं
सारी दुनिया हमारी प्रशंसक है
हमारे शेयर बाजार का आंकडा
अब दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है
विकास डर आसमान छू रही है
हमारे लिए अब आगे बढ़ने का अवसर है

भाषण के बाद आए मिलने लोग
उनसे अपने-अपने इलाके की
बिजली, पानी और सड़कों की
खस्ता हालत के मुद्दे उठाने लगे
तो वह बोले
‘इस समय देश विकास कर रहा है
और तुम अभी भी वहीं अटके हो
अपने रास्ते से भटके हो
हम तरक्की करते हुए
अन्तरिक्ष की तरह बढे हैं
और तुम लोग अभी भी
सड़क, बिजली और पानी पर अटके हो
भला अब यह भी ऐसी बातों का अवसर है’

उनके डर के मारे सब खामोश रहे
फ़िर बोले
‘बहुत बोल लिया अब तो
मुझे पिलाने के लिए पानी लाओ
मुझे फ़िर आगे जाकर बोलना है
मेरी तो बस विकास पर नजर है’

वहाँ कोई पानी नहीं लाया
तो चीखने लगे तब एक आदमी ने कहा
‘यहाँ पानी बिजली कुछ नही है
आपका भाषण सुनने के लिए नहीं
हम अपनी व्यथा कहने आए थे
पानी की बोतलें अपने साथ लाये थे
सब पी गए आपकी बात सुनते हुए
जो बचा है वह इस ऊबड़ खाबड़
सड़क पर चलते हुए पीते जायेंगे
हम तो पहुचेंगे गिरते -पड़ते अपने घर
आप तो हेलिकॉप्टर में उड़ जायेंगे
आकाश में पानी पी लीजिये
आपकी है तो विकास पर नजर
पर हमारी तो है घर पर नजर
इन बोतलों में बंद पानी ही
अब हमारे रास्ते का सहारा है
आपके भाषण से हम बहुत खुश
पर पानी पिलायें ऐसा नहीं अवसर

रहीम के दोहे:सच्चा मित्र दही की तरह निभाता है


मथत मथत माखन रही, दही मही बिलगाव
रहिमन सोई मीत हैं, भीर परे ठहराय

कविवर रहीम कहते हैं कि जब दही को लगातार माथा जाता है तो उसमें से मक्खन अलग हो जाता है और दही मट्ठे में विलीन होकर मक्खन को अपने ऊपर आश्रय देती है, इसी प्रकार सच्चा मित्र वही होता है जो विपत्ति आने पर भी साथ नहीं छोड़ता।

भावार्थ-सच्चा दोस्त वक्त पर ही परखा जाता है जिस प्रकार दही मट्ठे में परिवर्तित होकर मक्खन को अपने ऊपर आश्रय देती है वैसे ही सच्चा मित्र विपति में अपने मित्र को बचाने के लिए अपना अस्तित्व समाप्त कर देता है।

मनिसिज माली के उपज, कहि रहीम नहिं जाय
फल श्यामा के उर लगे, फूल श्याम उर आय

कविवर रहीम कहते हैं कि कामदेव रुपी माली की पैदावार का शब्दों में बखान नहीं किया जा सकता। राधा के हृदय पर जो फल लगे हुए हैं उसके फूल श्याम के हृदय पर ही उगे हैं।

रहिमन गली है सांकरी, दूजो न ठहराहिं
आपु अहैं तो हरि नहीं, हरि आपुन नाहि

संत शिरोमणि रहीम कहते हैं की प्रेम की गली बहुत पतली होती है उसमें दूसरा व्यक्ति नहीं ठहर सकता, यदि मन में अहंकार है तो भगवान का निवास नहीं होगा और यदि दृदय में ईश्वर का वास है तो अहंकार का अस्तित्व नहीं होगा।

हवा और पानी को शुद्ध नहीं कर सकते


जिन रास्तों पर चलते हुए
कई बरस बीत गये
पता ही नही लगा कि
कैसे उनके रूप बदलते गए
जहाँ कभी छायादार पेड़ हुआ करते थे
वहाँ लहराता है सिगरेट का धुआं
जहाँ रखीं थीं गुम्टियाँ
वहाँ ऊंची इमारतों के
पाँव जमते गए
जहाँ हुआ करता था उद्यान
वहाँ कचरे के ढेर बढ़ते गये
कहते हैं दुनिया में तरक्की हो रही है
सच यह है कि पतन की तरफ
हम कदम-दर कदम बढ़ते गए
हवा में लटकी
खातों में अटकी
गरीब से दूर भटकी
दौलत अगर तरक्की का प्रतीक है तो
सोचना होगा कि हम पढे-लिखे हैं कि
किताब पढ़ने वाले अनपढ़ बन गए
आंकडों के मायाजाल में
कितनी भी तरक्की दिखा लो
हवाओं को तुम ताजा नहीं कर सकते
पानी को साफ नहीं कर सकते
इलाज के लिए कितनी भी दवाएं बना लो
मरे हुए को जिंदा नही कर सकते
आकाश में खडे होकर तरक्की की
सोचने वाले जमीन के दुश्मन बन गए

चाणक्य नीति:मन में पाप हो तो तीर्थ से भी शुद्धि नहीं


१.आंखों से देखभाल का पैर रखें, पानी कपडे से छान कर पीयें. शास्त्रानुसार वाक्य बोलें, मन में सोच कर कार्य करें.
२.दान, शक्ति, मीठा बोलना, धीरता और सम्यक ज्ञान यह चार प्रकार के गुण जन्म जात होते हैं, यह अभ्यास से नहीं आते.
३.जिसकी मन में पाप हैं, वह सौ बार तीर्थ स्नान करने के बाद भी पवित्र नहीं हो सकता, जिस प्रकार मदिरा का पात्र जलाने पर भी शुद्ध नहीं होता.
४.जो वर्ष भर मौन रहकर भोजन करता है, वह हजार कोटी वर्ष तक स्वर्ग लोक में पूजित होता है.
५.पीछे-पीछे बुराई कर काम बिगाड़ने वाले और सामने मधुर बोलने वाले मित्र को अवश्य छोड़ देना चाहिए.
६.कुमित्र पर कदापि विश्वास न करें क्योंकि वह आपकी कभी भी आपकी पोल खोल सकता है.
७.अपने शास्त्रों के किसी एक श्लोक अथवा उस में से भी आधे का प्रतिदिन करना चाहिए. इससे अपने मन और विचार की शुद्ध होती है.

नोट-थक रहे ब्लोगर योग साधना शुरू करें-यह लेखा यहाँ अवश्य पढें

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भ्रम का जाल


सामने कुछ कहैं
पीठ पीछे कुछ और
ऐसे लोगों की बातों पर क्या करें गौर
बात काम करें मचाएँ ज्यादा शोर
बोले और पीछे पछ्ताएं
जैसे नाचने के बाद रोए मोर
जिनके मन में नही सदभाव
उनकी वाणी में होता है कटुता का भाव
अपनी पीठ आप थपथपापाएं
अपने दिल का मैल छिपाएं
क्या पायेंगे ऐसे लोगों को बनाकर सिरमौर
उनकी भीड़ में शामिल होने से बेहतर है
अकेले में समय गुजारें
उनके झुंड में रहने से अच्छा है
भले लोगों का तलाश करें ठौर
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सुबह से शाम तक
पसीन बहाते हुए लोग
बड़ी मुश्किल से रोटी जुटा पाते
फिर भी समाज में तिरस्कार पाते
जिन्हें मिली है दौलत की गाडी
वह फिर भी गरीब से इतना खौफ खाते कि
जिन्हें खुद न माने
उसी जाति,भाषा, और धर्म के नाम पर
भ्रम का जाल बुनकर उसे फंसाते

चाणक्य नीति:जिस देश में मूर्खों का सम्मान नहीं होता वहाँ समृद्धि आती है


१.जिस देश में मूर्खों का सम्मान नहीं होता, अन्न संचित रहता है तथा पति-पत्नी में झगडा नहीं होता वहाँ लक्ष्मी बिना बुलाए निवास करती है.
अभिप्राय-इस कथन का आशय यह है की यदि किसी देश में सुख और समृद्धि आयेगी तो गुणवानों के समान से आयेगी.इसके अलावा जहाँ खाद्यान के भण्डार एवं परिवारों में शांति होती है वही खुशहाली होती है.

2.जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुचाने वाले मर्मभेदी वचन बोलते हैं, दूसरों की बुराई करने में खुश होते हैं। अपने वचनों द्वारा से कभी-कभी अपने ही वाचों द्वारा बिछाए जाल में स्वयं ही घिर जाते हैं और उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जिस तरह रेत की टीले के भीतर बांबी समझकर सांप घुस जाता है और फिर दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है।
३.समय के अनुसार विचार न करना अपने लिए विपत्तियों को बुलावा देना है, गुणों पर स्वयं को समर्पित करने वाली संपतियां विचारशील पुरुष का वरण करती हैं। इसे समझते हुए समझदार लोग एवं आर्य पुरुष सोच-विचारकर ही किसी कार्य को करते हैं। मनुष्य को कर्मानुसार फल मिलता है और बुद्धि भी कर्म फल से ही प्रेरित होती है। इस विचार के अनुसार विद्वान और सज्जन पुरुष विवेक पूर्णता से ही किसी कार्य को पूर्ण करते हैं।
4.जो बात बीत गयी उसका सोच नहीं करना चाहिए। समझदार लोग भविष्य की भी चिंता नहीं करते और केवल वर्तमान पर ही विचार करते हैं।हृदय में प्रीति रखने वाले लोगों को ही दुःख झेलने पड़ते हैं। प्रीति सुख का कारण है तो भय का भी। अतएव प्रीति में चालाकी रखने वाले लोग ही सुखी होते है.
५. व्यक्ति आने वाले संकट का सामना करने के लिए पहले से ही तैयारी कर रहे होते हैं वह उसके आने पर तत्काल उसका उपाय खोज लेते हैं। जो यह सोचता है कि भाग्य में लिखा है वही होगा वह जल्द खत्म हो जाता है। मन को विषय में लगाना बंधन है और विषयों से मन को हटाना मुक्ति है.

पहले अपनी नीयत बताओ


कहते हैं रामजी के होने के
भौतिक सबूत हमारे सामने लाओ
नहीं ला सकते तो उन्हें भूल जाओ
राम जी की माया अपरम्पार
जिस पर माया का भूत चढा दें
अपना नाम भी भुलवा दें
सोने के सिंहासन पर बैठते ही
भगवान् की तरह पूजने की चाह
उन्हें अंधा बना देती है
रामजी का नाम रहते यह संभव नहीं
अमीर तो क्या गरीब के मन भी
उनका नाम बसता है कहीं न कहीं
दिलों के नाम मिटाने के लिए
वह कहते है
उनके होने का सबूत लाओ

राम के नाम का उनको कितना खौफ है
गरीबी, शोषण और बीमारी के दवा के लिए
लोगों को इधर उधर भटकाते हैं
राम की प्रस्तर की प्रतिमा को
पूजने से मना करने वाले ही
मुर्दों के नाम पर पत्थर लगाकर
उस पर माला चढाते हैं
कहीं अपना काम न बने तो
पत्थर लगवाने के लिए
जिंदा इंसान को ही मुर्दा बनाते हैं
राम का नाम फिर भी लेते हैं
यह कहने के लिए उसे भूल जाओ

रामभक्त भी सबूत जुटा लेंगे
अपने भक्तों के लिए रामजी भी
अपनी कृपा उन पर लुटा देंगे
पर सवाल करने वाले भी
इसके पीछे जो उनके दिल की नीयत है
क्या वह अपनी हथेली पर रखकर दिखा देंगे
कर सकते हैं तभी कहें कि
‘राम जी के होने के सबूत लाओ’
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चाणक्य नीति:धर्म का नियम ही शाश्वत


१.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आयुर्वेद तथा धनुर्वेद की विद्याओं की भी गणना भी नहीं की जा सकती है, इसके विपरीत मनुष्य का जीवन अल्प है और उस अल्पकाल के जीवन में रोग,शोक, कष्ट आदि अनेक प्रकार की बाधाएं उपस्थित होती रहती हैं। इस स्थिति में मनुष्य को शास्त्रों का सार ग्रहण करना चाहिए।

२.मन की शुद्ध भावना से यदि लकड़ी, पत्थर या किसी धातु से बनी मूर्ति की पूजा की जायेगी तो सब में व्याप्त परमात्मा वहां भी भक्त पर प्रसन्न होंगें। अगर भावना है तो जड़ वस्तु में भी भगवान का निवास होता है । इस क्षण-भंगुर संसार में धन-वैभव का आना-जाना सदैव लगा रहेगा। लक्ष्मी चंचल स्वभाव की है। घर-परिवार भी नश्वर है। बाल्यकाल, युवावस्था और बुढ़ापा भी आते हैं और चले जाते हैं। कोई भी मनुष्य उन्हें सदा ही उन्हें अपने बन्धन में नहीं बाँध सकता। इस अस्थिर संसार में केवल धर्म ही अपना है। धर्म का नियम ही शाश्वत है और उसकी रक्षा करना ही सच्चा कर्तव्य है।सच्ची भावना से कोई भी कल्याणकारी काम किया जाये तो परमात्मा की कृपा से उसमें अवश्य सफलता मिलेगी। मनुष्य की भावना ही प्रतिमा को भगवान बनाती है। भावना का अभाव प्रतिमा को भी जड़ बना देता है।
३.जिस प्रकार सोने की चार विधियों-घिसना, काटना, तपाना तथा पीटने-से जांच की जाती है, उसी प्रकार मनुष्य की श्रेष्ठता की जांच भी चार विधियों-त्यागवृति, शील, गुण तथा सतकर्मो -से की जाती है।

४.अज्ञानी व्यक्ति को कोई भी बात समझायी जा सकती है क्योंकि उसे किसी बात का ज्ञान तो है नहीं। अत: उसे जो कुछ समझाया जाएगा वह समझ सकता है, ज्ञानी को तो कोई बात बिल्कुल सही तौर पर समझायी जा सकते है। परन्तु अल्पज्ञानी को कोई भी बात नही समझायी क्योंकि अल्पज्ञान के रुप में अधकचरे ज्ञान का समावेश होता है जो किसी भी बात को उसके मस्तिष्क तक पहुंचने ही नहीं देता।

*संकलनकर्ता का मत है कि अल्पज्ञानी को अपने ज्ञान का अहंकार हो जाता है इसलिये वह कुछ सीखना ही नहीं चाहता, वह केवल अपने प्रदर्शन में ही लगा रहता है।
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चाणक्य नीति:आलस्य मनुष्य का स्वाभाविक दुर्गुण


1.जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुचाने वाले मर्मभेदी वचन बोलते हैं, दूसरों की बुराई करने में खुश होते हैं। अपने वचनों द्वारा से कभी-कभी अपने ही वाचों द्वारा बिछाए जाल में स्वयं ही घिर जाते हैं और उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जिस तरह रेत की टीले के भीतर बांबी समझकर सांप घुस जाता है और फिर दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है।
2.समय के अनुसार विचार न करना अपने लिए विपत्तियों को बुलावा देना है, गुणों पर स्वयं को समर्पित करने वाली संपतियां विचारशील पुरुष का वरण करती हैं। इसे समझते हुए समझदार लोग एवं आर्य पुरुष सोच-विचारकर ही किसी कार्य को करते हैं। मनुष्य को कर्मानुसार फल मिलता है और बद्धि भी कर्म फल से ही प्रेरित होती है। इस विचार के अनुसार विद्वान और सज्जन पुरुष विवेक पूर्णता से ही किसी कार्य को पूर्ण करते हैं।
3.ऐसा धन जो अत्यंत पीडा, धर्म त्यागने और बैरियों के शरण में जाने से मिलता है, वह स्वीकार नहीं करना चाहिए। धर्म, धन, अन्न, गुरू का वचन, औषधि हमेशा संग्रहित रखना चाहिए, जो इनको भलीभांति सहेज कर रखता है वह हेमेशा सुखी रहता है।बिना पढी पुस्तक की विद्या और अपना कमाया धन दूसरों के हाथ में देने से समय पर न विद्या काम आती है न धनं.

4.जो बात बीत गयी उसका सोच नहीं करना चाहिए। समझदार लोग भविष्य की भी चिंता नहीं करते और केवल वर्तमान पर ही विचार करते हैं।हृदय में प्रीति रखने वाले लोगों को ही दुःख झेलने पड़ते हैं। प्रीति सुख का कारण है तो भय का भी। अतएव प्रीति में चालाकी रखने वाले लोग ही सुखी होते हैंजो व्यक्ति आने वाले संकट का सामना करने के लिए पहले से ही तैयारी कर रहे होते हैं वह उसके आने पर तत्काल उसका उपाय खोज लेते हैं। जो यह सोचता है कि भाग्य में लिखा है वही होगा वह जल्द खत्म हो जाता है। मन को विषय में लगाना बंधन है और विषयों से मन को हटाना मुक्ति है.
5.आलस्य मनुष्य के स्वभाव का बहुत बड़ा दुर्गुण है। आलस्य के कारण प्राप्त की गयी विद्या भी नष्ट हो जाती है दुसरे के हाथ में गया धन कभी वापस नहीं आता।बीज अच्छा न हो तो फसल भी अच्छी नहीं होती और थोडा बीज डालने से भी खेत उजड़ जाते हैंसेनापति कुशल न हो तो सेना भी नष्ट हो जाती है। शील के संरक्षण में कुल का नाम उज्जवल होता है।
6.बुरे राजा के राज में भला जनता कैसे सुखी रह सकती है। बुरे मित्र से भला क्या सुख मिल सकता है। वह और भी गले की फांसी सिद्ध हो सकता है। बुरी स्त्री से भला घर में सुख शांति और प्रेम का भाव कैसे हो सकता है। बुरे शिष्य को गुरू लाख पढाये पर ऐसे शिष्य पर किसी भी प्रकार का प्रभाव नहीं पड़ सकता है।

विकास यानि वाहनों की चौडाई बढना सड़क की कम होना


बहुत समय से देश के विकास होने के प्रचार का मैं टीवी चैनलों और अख़बारों में सुनता आ रहा हूँ. तमाम तरह के आंकडे भी दिए जाते हैं पर जब मैं रास्तों से उन रास्तों से गुजरता हूँ-जहाँ चलते हुए वर्षों हो गयी है-तो उनकी हालत देखकर यह ख्याल आता है कि आखिर वह विकास हुआ कहाँ है. अगर इसे विकास कहते हैं तो वह इंसान के लिए बहुत तकलीफ देह होने वाला है.

पेट्रोल, धुएं और रेत से पटे पड़े रास्ते राहगीरों की साँसों में जो विष घोल रहे हैं उससे अनेक बार तो सांस बंद करना पड़ती हैं कि यह थोडा आगे चलकर यह विष भरा धुआं और गंध कम हो तो फिर लें. टेलीफोन, जल और सीवर की लाईने डालने और उनको सुधारने के लिए खुदाई हो जाती है पर सड़क को पहले वाली शक्ल-जो पहले भी कम बुरी नहीं थी-फिर वैसी नहीं हो पाती. अपने टीवी चैनल और अखबार चीन के विकास की खबरें दिखाते हुए चमचमाती सड़कें और ऊंची-ऊंची गगनचुंबी इमारतें दिखा कर यह बताते हैं कि हम उससे बहुत पीछे हैं-पर यह मानते हैं कि अपने देश में विकास हो रहा है पर धीमी गति से. मैं जब वास्तविक धरातल पह देखता हूँ तो पानी और पैसे के लिए देश का बहुत बड़ा वर्ग अब भी जूझ रहा है. कमबख्त विकास कहीं तो नजर आये.

आज एक अखबार में पढ़ रहा था कि भारत में पुरुषों से मोबाइल अधिक महिलाओं के पास बहुत हैं. मोबाइल से औरतें अधिक लाभप्रद स्थिति में दिखतीं हैं क्योंकि अब किसी से बात करना है तो उसके घर जाने की जरूरत ही नहीं है मोबाइल पर ही बात कर ली, पर पुरुषों की समस्या यह है कि उनको अपने कार्यस्थल तक घर से सड़क मार्ग से ही जाना है और उनके लिए यह रास्ते कोई सरल नहीं रहे. साथ में मोबाइल लेकर उनके लिए चलना वैसे भी ठीक नहीं है. रास्ते में मोबाइल की घंटी मस्तिष्क में कितनी बाधा पहुचाती है यह मैं जानता हूँ. उस दिन बीच सड़क पर स्कूटर पर घंटी बजी और मेरे इर्द-गिर्द वाहनों की गति बहुत तेज थी कि एक तरफ रूकने के लिए मुझे समय लग गया. जब एक तरफ रुका तो जेब से मोबाइल निकाला तो देखा कि ‘विज्ञापन’ था. उस समय झल्लाहट हुई पर मैं क्या कर सकता था? फिर मैंने स्कूटर भी सड़क से ढलान से उतरकर ऐसी जगह रोका था जहाँ सड़क पर लाने के लिए शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन करना पडा.

आपने देखा होगा कि जो आंकडे विकास के रूप में दिए जाते हैं उनमें देशों में मोबाइल, कंप्यूटर और टीवी के उपभोक्ता की संख्या शामिल रहती है. अब विकास का अर्थ प्रति व्यक्ति की आय-व्यय की जगह धन की बर्बादी से है. यह नहीं देखते कि उनका उपयोग क्या है? मैं तो आज तक समझ नहीं पाया कि लोग मोबाइल पर इतनी लंबी बात करते क्या हैं. फालतू, एकदम फालतू? फिर तमाम ऍफ़ एम् रेडियो, और टीवी पर ऐसे सवाल करते है ( उस पर एस.एम्.एस करने के लिए कहा जाता है) जो एक दम साधारण होते हैं. लोग जानते हैं कि यह सब उनका धन खींचने के लिए किया जा रहा है पर अपने को रोक नहीं पाते क्योंकि उन्हें क्षेत्र, धर्म, और भाषा के नाम पर बौद्धिक रूप से गुलाम बना दिया गया है कि वह उससे मुक्त नहीं हो पाता.

अगर मुझसे पूछें तो विकास का मतलब है कि वाहनों की चौडाई बढना और सड़क की कम होना. जब भी कहीं जाम में फंसता हूँ तो मुझे नहीं लगता कि वह लोगों और उनके वाहनों की संख्या की वजह से है. दो सौ मीटर के दायरे में सौ लोग और पच्चीस वाहन भी नहीं होंगे पर जाम फिर भी लग जाता है. वहाँ कारें, ट्रेक्टर और मोटर साइकलों पर एक-एक व्यक्ति सवार हैं पर सड़क तंग है तो रास्ता जाम हो जाता है. सड़कें भी जो पहले चौड़ी थी वहाँ इस तरह निर्माण किये गए हैं कि पता नहीं कि कब यह हो गए. जहाँ पहले पेड़ थे वहाँ गुमटियाँ, ठेले और कहीं पक्के निर्माण हो गए हैं और सड़क छोटी हो गयी और वाहन जहाँ साइकिल और स्कूटर थे वहाँ आजकल कारों का झुंड हो गया है. यह विकास और उत्थान है तो फिर विनाश और पतन किसे कहते हैं यह मेरे लिए अभी भी एक पहेली है.

चाणक्य नीति:जहाँ धनी, ज्ञानी और निपुण राजा न हो वह स्थान छोड़ दें


1.किसी भी व्यक्ति का जहाँ सम्मान न हो उसे त्याग देना चाहिए. क्योंकि बिना सम्मान के मनुष्य जीवन जीने का कोई अर्थ नहीं है.
2.किसी भी व्यक्ति को वह स्थान भी त्याग देना चाहिए जहाँ आजीविका न हो क्योंकि आजीविका रहित मनुष्य समाज में किसी सम्मान के योग्य नहीं रह जाता.

3.इसी प्रकार वह देश और क्षेत्र भी त्याज्य है जहाः अपने मित्र व संबंधी न रहते हों क्योंकि इनके अभाव में व्यक्ति कभी भी असहाय हो सकता है.
4.वेद के ज्ञान की गहराई न समझकर वैद की निंदा करने वाले वेद की महानता कम नहीं कर सकते.शास्त्र निहित आचार-व्यवहार को व्यर्थ बताने वाले अल्प ज्ञानी उसकी विषय सामग्री की उपयोगिता को नष्ट नहीं कर सकते

5.जिस स्थान पर धनी-व्यापारी, ज्ञानीजन, शासन व्यवस्था में निपुण राजा, सिंचाई अथवा जल आपूर्ति की व्यवस्था न हो उस स्थान का भी त्याग कर देना चाहिऐ. क्योंकि धनि से श्री वृद्धि ज्ञानी से विवेक , निपुण राजा से मनुष्य की सुरक्षा और जल से जीवन के रक्षा होती है.

6.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आयुर्वेद तथा धनुर्वेद की विद्याओं की भी गणना भी नहीं की जा सकती है, इसके विपरीत मनुष्य का जीवन अल्प है और उस अल्पकाल के जीवन में रोग,शोक, कष्ट आदि अनेक प्रकार की बाधाएं उपस्थित होती रहती हैं। इस स्थिति में मनुष्य को शास्त्रों का सार ग्रहण करना चाहिए।

रूस और भारत की मैत्री में अब वह बात नहीं रही


भारत के नौसेनाध्यक्ष एडमिरल मेहता ने रक्षा सौदों मैं रूस की और से निरंतर बढ़ते विलंब और लागत से परेशान होकर कहा है कि रूस को अब भारत से संबंध पर पुनर्विचार करना चाहिए. अखबार मैं प्रकाशित समाचार के अनुसार नौसेना दिवस की पूर्व संध्या पर उन्होने कहा कि रूस वैसा नहीं रहा जैसा वह सोवियत संघ के विघटन से पहले था.

अगर हम पिछले कुछ वर्षों का घटनाक्रम देखें तो रूस के साथ जब हम अपने संबंधों पर विचार करते हैं तो हमारी स्मृति में सोवियत संघ के साथ भारत की तथाकथित मैत्री थी वही बनी रहती है. वास्तव में अब वह पहले वाले बात नहीं रही. वैसे जब उसके साथ भारत की घनिष्ठ मैत्री की बात होती थी तब भी भारत में विद्वानों का एक बहुत बड़ा वर्ग उसे अपना निस्वार्थी मित्र मानने से इन्कार कर देता था. रूस की मैत्री के रूप में सबसे बडा प्रमाण १९७१ में पाकिस्तान के साथ युद्ध में जब अमेरिका ने भारत के खिलाफ सातवाँ बेडा भेजने की धमकी दी तब रूस ने भी कार्यवाही की धमकी दी और अमेरिका इससे डर गया था.

इसके बारे में विद्वान लोग अपना अलग मत ही व्यक्त करते हैं. उनका कहना है कि उस समय अमेरिका इतना प्रबल नहीं था कि वह भारत से लंबी लड़ाई लड़ता. उस समय से पहले और अभी तक अमेरिका किसी दूसरे देश की तरफ से अकेले लड़ने नहीं गया और जब गया तो उसने मुहँ की खाई है. उसने किसी देश पर हमला किया है तो अपने हितों की खातिर उसे कमजोर जानते हुए और वह भी ब्रिटेन और फ्रांस जैसे अन्य ताक़तवर देशों को साथ लेकर किया है. उस समय अन्य पश्चिमी देशों का रवैया भारत के पक्ष में नहीं था तो केवल सोवियत संघ से मैत्री के कारण वह इस हद तक नहीं था कि वह अमेरिका की तरफ से लड़ने आते . कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि यह धमकी तब आयी थी जब युद्ध करीब-करीब समाप्ति की तरफ था. अगर उस दौर को छोड़ दिया जाये तो अमेरिका से भारत का कभी सीधा टकराव नहीं हुआ, और यही कारण है कि आज भी उसे मैत्री की वकालत करने वालों की संख्या अधिक है. भारत में वैज्ञानिक और तकनीकी क्षेत्रों में अमेरिकी योगदान को काम कर आंकना सरल नहीं है.

पिछले दिनों से अमेरिका से भारत की बढ़ती मैत्री से रूस नाखुश है पर इस देश में यह सवाल उठाने वाले कई लोग हैं कि भारत को क्रायोजनिक इंजन अमेरिकी दबाव में न बेचने वाला रूस क्या भारत से ऐसा व्यवहार कर सकता है? जब भारत ने परमाणु विस्फोट किये तो अमेरिका ने भारत पर जो प्रतिबन्ध लगाए क्या रूस ने उनमें से किसी का उल्लंघन कर भारत की मदद की. रूस अब भारत से ऐसी अपेक्षाएं कर रहा है जिन पर वह खुद खरा नहीं उतरा. वह मदद की बात करता है पर १९६५ में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री शास्त्री जी को बुलाकर जो पाकिस्तान से समझौता करवाया उससे भारत को क्या मिला था? कहते हैं कि उन्होने अपनी इच्छा के विपरीत रूस के दबाव में समझौता किया था और वही पीडा वह झेल नहीं पाए और दिल के दौरे से निधन हो गया. इन बातों में कितनी सच्चाई है यह कोई नहीं जानता कुल मिलाकर कई राजनीतिक विशेषज्ञ रूस के निस्वार्थ मित्रता को एक ढोंग मानते है.

आथिक विशेषज्ञों ने तो कभी भी सोवियत संघ को भारत के लिए कभी उपयोगी नहीं माना. कहा जाता है जब उसके और भारत के रिश्ते बहुत अच्छे थे तब भी उसने भारतीय मुद्रा रूपये का कभी अंतर्राष्ट्रीय मूल्य स्वीकार न करते हुए अपने द्वारा तय मूल्य दिया. उसकी मुद्रा कभी भी विश्व में सम्मान नहीं पा सकी पर भारत ने उसका मूल्य अधिक दिया. कुल मिलाकर उसने मित्रता का दोहन किया और उसके लिए अमेरिका भी काम जिम्मेदार नहीं है क्योंकि जिस समय संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद का थोडा बहुत सम्मान था तब उसके स्थायी सदस्यों में रूस ही था जिससे भारत किसी मसले पर अपने साथ खडे होने का विश्वास कर सकता था, और परमाणु विस्फोट करते समय भारत ने उसकी परवाह भी छोड़ दी और आखिर अपनी आर्थिक और राजनितिक ताकत से अमेरिका को प्रतिबन्ध हटाने के लिए मजबूर कर दिया. भारत के कई लोग अभी रूस को सम्मान करते हैं पर उसका रवैया इस तरह रहा तो उसका यहाँ रहा सहा सम्मान भी समाप्त हो जायेगा.

भारत की सेना ने अभी तक अपनी लड़ाई खुद जीतीं है और सोवियत संघ ने भारत से सलाह मशविरा किये बिना अफगानिस्तान में दखल दिया जो उसके साम्राज्य के अंत का कारण बना और उससे भारत को भी बहुत परेशानी हुई. अगर उसने भारत का साथ दिया तो भारत ने उसकी कीमत भी चुकाई है इसलिए वह अगर बराबरी के आधार पर ही संबंध रखकर वह आगे चल सकता है.

चाणक्य नीति:जहाँ यज्ञ-हवन न हो वह घर मुर्दाघर समान


१.इस संसार में कुछ प्राणियों के किसी विशेष अंग में विष होता है-जैसे सर्प के दांतों में मक्खी के मस्तिष्क में और बिच्छू की पुँछ में-पर इन सबसे अलग दुर्जन और कपटी मनुष्य के हर अंग में विष होता है. उसके मन में विद्वेष,वाणी में कटुता और कर्म में नीचता का व्यवहार जहर बुझे तीर की तरह दूसरे को त्रास देते हैं.

२.किसी भी व्यक्ति को वह स्थान भी त्याग देना चाहिए जहाँ आजीविका न हो क्योंकि आजीविका रहित मनुष्य समाज में किसी सम्मान के योग्य नहीं रह जाता.

३.हर मनुष्य को सभी विधाओं में निपुण होना चाहिऐ. बडे लोगों से विनम्रता, विद्वानों से श्रेष्ठ और मधुर ढंग से वार्तालाप का तरीक सीखना चाहिए. जुआरियों से झूठ बोलना और कुशल स्त्रियों से चालाकी का गुण सीखना चाहिए.
४.मनुष्य को ऐसे कर्म करना जिससे उसकी कीर्ति सब और फैले. विद्या, दान, तपस्या, सत्य भाषण और धनोपार्जन के उचित तरीकों से कीर्ति दसों दिशाओं में फैलती है.

५.अपना जीवन शांतिपूर्वक बिताने के लिए हर मनुष्य को धर्म-कर्म का अनुष्ठान करते रहना चाहिऐ. वह घर मुर्दाघर के समान हैं जहाँ धर्म-कर्म या यज्ञ-हवन नहीं होता. जहाँ वेद शास्त्रों का उच्चारण नहीं होता, विद्वानों का सम्मान नहीं होता और यज्ञ-हवन से देवताओं का पूजन नहीं होता ऐसे घर, घर न रहकर शमशान के समान होता है.

मनुस्मृति:सभी के निद्रा मी चले जाने पर दंड ही जाग्रत रहता है


1.देश, काल, विद्या एवं अन्यास में लिप्त अपराधियों की शक्ति को देखते हुए राज्य को उन्हें उचित दण्ड देना चाहिए। सच तो यह है कि राज्य का दण्ड ही राष्ट्र में अनुशासन बनाए रखने में सहायक तथा सभी वर्गों के धर्म-पालन कि सुविधाओं की व्यवस्था करने वाला मध्यस्थ होता है।
2.सारी प्रजा के रक्षा और उस पर शासन दण्ड ही करता है, सबके निद्रा में चले जाने पर दण्ड ही जाग्रत रहता है। भली-भांति विचार कर दिए गए दण्ड के उपयोग से प्रजा प्रसन्न होती है। इसके विपरीत बिना विचार कर दिए गए अनुचित दण्ड से राज्य की प्रतिष्ठा तथा यश का नाश हो जाता है।
3.यदि अपराधियों को सजा देने में राज्य सदैव सावधानी से काम नहीं लेता, तो शक्तिशाली व्यक्ति कमजोर लोंगों को उसी प्रकार नष्ट कर देते हैं, जैसे बड़ी मछ्ली छोटी मछ्ली को खा जाती है। संसार के सभी स्थावर-जंगम जीव राजा के दण्ड के भय से अपने-अपने कर्तव्य का पालने करते और अपने-अपने भोग को भोगने में समर्थ होते हैं ।

*अक्सर एक बात कही जाती है की हमारे देश को अंग्रेजों ने सभ्यता से रहना सिखाया और इस समय जो हम अपने देश को सुद्दढ और विशाल राष्ट्र के रूप में देख रहे हैं तो यह उनकी देन है. पर हम अपने प्राचीन मनीषियों की सोच को देखे तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि वह राज्य, राजनीति और प्रशासनिक कार्यप्रणाली से अच्छी तरह वाकिफ थे, मनु स्मृति में राजकाज से संबंधित विषय सामग्री होना इस बात का प्रमाण है. एक व्यसनी राजा और उसके सहायक राष्ट्र को तबाह कर देते हैं. अगर राजदंड प्रभावी नहीं या उसमें पक्षपात होता है तो जनता का विश्वास उसमें से उठ जाता है. यह बात मनु स्मृति में कही गयी है.

समझो प्रेयसी को ठगता है


सावन और बसंत के मौसम पर
शीतल हवाओं के चलने की बात
लिखना अब मजाक लगता है
अगर कोई प्रियतम अपने प्रेयसी को
लिखे खूबसूरत मौसम की बात
समझो उसे ठगता है
घुली है प्राणवायु में विषैली गैस
सांस में भला अब सुगंध कहाँ से आये
सब जगह तो आसमान से
जलता अंगारा बरसता है
बरसात का पानी भी
कई बार विषैला लगता है
सर्दी हो या गर्मी
कवि हृदय में कितनी भी लहलहाएं
श्रंगार रस से ओत-प्रोत कवितायेँ
भला मौसम को कहाँ पता लगता है

चीखकर करना पङता है इजहार


चारों और मचती चीख पुकार
कोई खुशी में चिल्ला रहा है
कोई तकलीफ में कर रहा है चीत्कार
सुखों की खोज में बढ़ता आदमी
दुख जुटा रहा है
अपना चैन गँवा रहा है
दिल का दर्द इतना बढ जाता है
चिल्ला कर ही हो पाता है इजहार
कानों से किसी का दर्द
सुनने की आदत भी कहाँ रही
किसी को सुनाना है तो
इतनी शक्ति लगानी जरूरी हैं
की कान के के खुलें द्वार
इसलिए ही मची है
चारों और मची है चीख पुकार

संत कबीर वाणी:जादू-टोना व्यर्थ है


जो कोय निन्दै साधू को, संकट आवै सोय
नरक जाय जन्मै मरै, मुक्ति कबहु नहिं होय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो भी साधू और संतजनों की निंदा करता है, उसके अनुसार अवश्य ही संकट आता है। वह निम्न कोटि का व्यक्ति नरक-योनि के अनेक दु:खों को भोगता हुआ जन्मता और मरता रहता है। उसके मुक्ति कभी भी नहीं हो सकती और वह हमेशा आवागमन के चक्कर में फंसा रहेगा।

बोलै बोल विचारि के, बैठे ठौर संभारि
कहैं कबीर ता दास को, कबहु न आवै हारि

इसका आशय यह है कि जो आदमी वाणी के महत्त्व को जानता है,, समय देखकर उसके अनुसार सोच और विचार कर बोलता है और अपने लिए उचित स्थान देखकर बैठता है वह कभी भी कहीं भी पराजित नहीं हो सकता।

जंत्र मन्त्र सब झूठ है, मति भरमो जग कोय
सार शब्द जाने बिना, कागा हंस न होय

संत शिरोमणि कबीरदास जीं का यह आशय है कि यन्त्र-मन्त्र एवं टोना-टोटका आदि सब मिथ्या हैं। इनके भ्रम में मत कभी मत आओ। परम सत्य के ठोस शब्द-ज्ञान के बिना, कौवा कभी भी हंस नहीं हो सकता अर्थात दुर्गुनी-अज्ञानी लोग कभी सदगुनी और ज्ञानवान नही हो सकते

सच किसे समझाएं


सदियों से चले आ रही
लोगों के समूहों की परिभाषाएँ
बाहर से मजबूत किले की तरह लगते
अन्दर रिवाजों में एक दूसरे को ठगते
बाहर से आदर्श लगते
पर एक शब्द से हिलते नजर आएं
वक्त देखें तो पहचान छिपाएं
फायदा देखें सीना तानकर सामने आयें
सभ्य समाज हो रहा है दिशाहीन
अक्षरज्ञान जितना बढ़ता जा रहा है
अक्षरों से बने शब्दार्थ पर हो रही है जंग
लोगों के दिमाग हो रहे हैं तंग
अभिव्यक्ति का मतलब चिल्लाना हो गया है
ऐसे में सच किसे समझाएं
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जमीन की जिन्दगी की हकीकत


ख्वाहिशें तो जिंदगी में बहुत होतीं हैं
पर सभी नहीं होतीं पूरी
जो होतीं भी हैं तो अधूरी
पर कोई इसलिए जिन्दगी में ठहर नहीं जाता
कहीं रौशनी होती है पर
जहाँ होता हैं अँधेरा
वीरान कभी शहर नहीं हो जाता
कोई रोता है कोई हंसता है
करते सभी जिन्दगी पूरी

सपने तो जागते हुए भी
लोग बहुत देखते हैं
उनके पूरे न होने पर
अपने ही मन को सताते हैं
जो पूरे न हो सकें ऐसे सपने देखकर
पूरा न होने पर बेबसी जताते हैं
अपनी नाकामी की हवा से
अपने ही दिल के चिराग बुझाते हैं
खौफ का माहौल चारों और बनाकर
आदमी ढूंढते हैं चैन
पर वह कैसे मिल सकता है
जब उसकी चाहत भी होती आधी-अधूरी
फिर भी वह जिंदा दिल होते हैं लोग
जो जिन्दगी की जंग में
चलते जाते है
क्या खोया-पाया इससे नहीं रखते वास्ता
अपने दिल के चिराग खुद ही जलाते हैं
तय करते हैं मस्ती से मंजिल की दूरी

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ख्वाहिशें वही पूरी हो पातीं हैं
जो हकीकत की जमीन पर टिक पातीं हैं
कोई ऐसे पंख नहीं बने जो
आदमी के अरमानों को आसमान में
उडा कर सैर कराएँ
जमीन की जिन्दगी की हकीकतें
जमीन से ही जुड़कर जिंदा रह पाती हैं

दिल के चिराग जलाते नहीं-hindi shayri


जिनका हम करते हैं इन्तजार
वह हमसे मिलने आते नहीं
जो हमारे लिए बिछाये बैठे हैं पलकें
उनके यहां हम जाते नहीं
अपने दिल के आगे क्यों हो जाते हैं मजबूर
क्यों होता है हमको अपने पर गरूर
जो आसानी से मिल सकता है
उससे आँखें फेर जाते हैं
जिसे ढूँढने के लिए बरसों
बरबाद हो जाते हैं
उसे कभी पाते नहीं
तकलीफों पर रोते हैं
पर अपनी मुश्किलें
खुद ही बोते हैं
अमन और चैन से लगती हैं बोरियत
और जज्बातों से परे अंधेरी गली में
दिल के चिराग के लिए
रौशनी ढूँढने निकल जाते हैं
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दुर्घटनाएं अब अँधेरे में नहीं
तेज रौशनी में ही होतीं है
रास्ते पर चलते वाहनों से
रौशनी की जगह बरसती है आग
आंखों को कर देती हैं अंधा
जागते हुए भी सोती हैं
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हमें तेज रौशनी चाहिए
इतनी तेज चले जा रहे हैं
उन्हें पता ही नहीं आगे
और अँधेरे आ रहे हैं
दिल के चिराग जलाते नहीं
बाहर रौशनी ढूँढने जा रहे हैं

कौटिल्य का अर्थशास्त्र:अग्नि के समान असहनशील भी होना चाहिये


१.कछुए के समान अंग संकोचकर शत्रु का प्रहार भी सहन करे और बुद्धिमान फिर समय देखकर क्रूर सर्प के समान डटकर लडे.
२.समय पर पर्वत के समान सहनशील हो और अग्नि के समान असहनशील हो और समय पर प्रिय वचन कहता हुआ कंधे पर भी शत्रु को उठावे.
३.मत्त और प्रमत्त के समान बाहरी दिखावे से स्थित बुद्धिमान आक्रमण करे, जैसे कि सिंह ऐसा कूदकर प्रहार करता है वह खाले वार नहीं जाता.
४.प्रसन्नता की वृत्ति से लोक की हितकारी वृत्ति से शत्रु के हृदय में निरन्तर प्रवेश का समय पर नीति के हाथों से प्रहार कर उसकी लक्ष्मी के केश ग्रहण करें.

५.विद्वान् को उचित है कि प्राप्त हुए उपायों से विग्रह को शांत करे. विजय की प्राप्ति अचल नहीं है. एकाएक किसी प्रकार पर प्रहार न करे.
६.बुद्धिमान को कोई भी वस्तु असाध्य नहीं है, लोहा अभेद्य होता है पर लोहार बुद्धिमानी से उसे गला डालता है.

तकिये का सहारा


हमें पूछा था अपने दिल को
बहलाने के लिए किसे जगह का पता
उन्होने बाजार का रास्ता बता दिया
जहां बिकती है दिल की खुशी
दौलत के सिक्कों से
जहाँ पहुंचे तो सौदागरों ने
मोलभाव में उलझा दिया
अगर बाजार में मिलती दिल की खुशी
और दिमाग का चैन
तो इस दुनिया में रहता
हर आदमी क्यों इतना बैचैन
हम घर पहुंचे और सांस ली
आँखें बंद की और सिर तकिये पर रखा
आखिर उसने ही जिसे हम
ढूढ़ते हुए थक गये थे
उसका पता दिया
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सांप के पास जहर है
पर डसने किसी को खुद नहीं जाता
कुता काट सकता है
पर अकारण नहीं काटने आता
निरीह गाय नुकीले सींग होते
हुए भी खामोश सहती हैं अनाचार
किसी को अनजाने में लग जाये अलग बात
पर उसके मन में किसी को मरने का
विचार में नहीं आता
भूखा न हो तो शेर भी
कभी शिकार पर नहीं जाता
हर इंसान एक दूसरे को
सिखाता हैं इंसानियत का पाठ
भूल जाता हां जब खुद का वक्त आता
एक पल की रोटी अभी पेट मह होती है
दूसरी की जुगाड़ में लग जाता
पीछे से वार करते हुए इंसान
जहरीले शिकारी के भेष में होता है जब
किसी और जीव का नाम
उसके साथ शोभा नहीं पाता
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भीड़ से नहीं निकलेंगे शेर जब तक


जब किसी के लिखने से
शांति भंग होती है
तो उससे कहें बंद कर दे लिखना
जो बिना पढे ही
चंद शब्दों को समझे बिना ही
जमाने पर फैंकते हैं पत्थर
गैरों के इशारे पर
अपनों पर ही चुभोते हैं नश्तर
कह देते हैं लिखने वाले से
अब कभी लिखते नहीं दिखना

बोलने की आजादी पर
जोर-जोर से सुबह शाम चिल्लाने वाले
अपनी ताकत पर खौफ का
माहोल बनाने वालों का
रास्ता हमेशा आसान होते दिखता
लिखने की आजादी उनको मंजूर नहीं
क्योंकि कोई शब्द उनके
ख्यालों से नहीं मिलता
उनकी दिमाग में किसी के साथ चलने का
इरादा नहीं टिकता
उनके खौफ से ही ताकत बनती
जमाने के मिट जाने का डर जतातीं तकरीरें
बेबस भीड़ भी होती है उनके साथ
बढ़ते रहेंगे उनके पंजे तब तक
भीड़ से नहीं निकलेंगे शेर जब तक
दिल में हिम्मत जुटाकर लड़ना तो जरूरी है
काफी नहीं अब लड़ते दिखना

रहीम के दोहे:अपशब्द बोले जीभ, मार खाए सिर


रहिमन जिह्म बावरी, कही गइ सरग पाताल
आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल

कविवर रहीम कहते हैं कि इस मनुष्य के बुद्धि बहुत वाचाल है. वह स्वर्ग से पाताल तक का अनाप-शनाप बककर अन्दर चली जाती है पर अगर उससे लोग गुस्सा होते हैं तो बिचारे सिर को जूते खाने पड़ते हैं.

भावार्थ-यहाँ संत रहीम चेता रहे हैं कि जब भी बोलो सोच समझ कर बोलो. कटु वचन बोलना या दूसरे का अपमान करने पर मार खाने की भी नौबत आती है. इसलिए किसी को बुरा-भला कहकर लांछित नहीं करना चाहिए.

रहिमन ठहरी धूरि की, रही पवन ते पूरि
गाँठ युक्ति की खुलि गयी, अंत धूरि को धूरि

संत रहीम कहते हैं ठहरी हुई धूल हवा चलने से स्थिर नहीं रहती, जैसे व्यक्ति की नीति का रहस्य यदि खुल जाये तो अंतत: सिर पर धूल ही पड़ती है.

भावार्थ-श्रेष्ठ पुरुष अपने अपने हृदय के विचारों को आसानी से किसी के सामने प्रकट नहीं करते. यदि उनके नीति सबंधी विचार पहले से खुल जाएं तो उनका प्रभाव कम हो जाता है और उन्हें अपमानित होना पड़ता है.

क्रिकेट और फिल्म में ऐसा भी हो सकता है


आखिर झगडा किस बात का है? क्रिकेट वालों ने एक्टर से कहा होगा कि-”यार, क्रिकेट को लोग देखने तो खूब आ रहे हैं पर अभी पहले जैसी तवज्जो नहीं मिल रही है। हमारी टीम ने ट्वेन्टी-ट्वेन्टी मैं विश्व कप जीता है और हमें चाहिए फिफ्टी-फिफ्टी के ग्राहक जिसमें विज्ञापन लंबे समय तक दिखाए जा सकते हैं। सो तुम भी मैदान मैं देखने आ जाओ तो थोडा इसका क्रेज बढे। ट्वेन्टी-ट्वेन्टी के समय से क्रिकेट पेट नहीं भरना है.”

इधर एक्टर भी फ्लॉप चल रहें हो तो क्या करें? एक दिन फिल्म आयी मीडिया मैं शोर मचा फिर थम गया। अरबों रूपये का खेल है और तमाम तरह के विज्ञापन अभियान(अद्द cअम्पैं) लोगों की भावनाओं पर जिंदा हैं। विज्ञापन देने वाली कंपनिया तो सीमित हैं। फिल्मों के एक्टर हों या क्रिकेट के खिलाड़ी उनके प्रोडक्ट के प्रचार के माडल होते हैं। एक क्षेत्र में फ्लॉप हो रहे हों तो दूसरे के इलाके से लोग ले आओ। समस्या फिल्म और क्रिकेट की नहीं है कंपनियों के प्रोडक्ट के प्रचार की हैं। जब किसी प्रोडक्ट के माडल हीरो और खिलाड़ी एक हों तो उनका एक जगह पर होना प्रचार का दोहरा साधन हो जाता है।

अब आगे और बदलाव आने वाले हैं। जो युवक और युवतियां फिल्म के लिए इंटरव्यू देने जायेंगे उनसे अपने अभिनय के बारे में कम क्रिकेट के बारे में अधिक सवाल होंगे। खेल से संबन्धित विषय पर नहीं बल्कि उसे देखने के तरीक के बारे में सवाल होंगे। जैसे
१. जब मैच देखने जाओगे तो कैसे सीट पर बैठोगे?
२. चेहरे पर कैसी भाव भंगिमा बनाओगे जिससे लगे कि तुम क्रिकेट के बारे में जानते हो?
३. जब कोई देश का खिलाड़ी छका लगाएगा तो कैसे ताली बजाओगे?
इस तरह के ढेर सारे सवाल और होंगे और अनुबंध में ही यह शर्त शामिल होगी कि जब तक फिल्म पुरानी न पड़े तब तक निर्माता के आदेश पर फिल्म प्रचार के लिए एक्टर मैच देखने मैदान पर जायेगा।

क्रिकेट में क्या होगा? लड़के दो तरह के कोच के यहाँ जायेंगे-सुबह क्रिकेट के कोच के यहाँ शाम को डांस वाले के यहाँ। भी रैंप पर भी जाना तो होगा क्रिकेट के प्रचार के लिए। आगे जब स्थानीय, प्रादेशिक और राष्ट्रीय स्तर पर जो चयन करता टीम का चयन करेंगे वह पहले खिलाडियों की नृत्य कला की परख करेंगे। क्रिकेट खेलने वाले तो कई मिल जायेंगे पर रेम्प पर नृत्य कर सकें यह संभव नहीं है-और ऐसी ही प्रचार अभियान चलते रहे तो नृत्य में प्रवीण खिलाडियों की पूछ परख बाद जायेगी। हाँ, इसमें पुराने संस्कार धारक दब्बू क्रिकेट खिलाडियों को बहुत परेशानी होगी। यह बाजार और प्रचार का खेल और इसमें आगे जाने-जाने क्या देखने को मिलेगा क्योंकि यह चलता है लोगों के जज्बातों से और जहाँ वह जायेंगे वहीं उनकी जेब में रखा पैसा भी जायेगा और उसे खींचने वाले भी वहीं अपना डेरा जमायेंगे।

सिगरेट का धुआं छोड़ते हुए (sigret ka dhuan-hindi vyangya kavita)


मुख से सिगरेट का धुँआ
चहुँ और फैलाते हुए करते हैं
शहर में फैले
पर्यावरण प्रदूषण की शिकायत
शराब के कई जाम पीने के बाद
करते हैं मर्यादा की वकालत
व्यसनों को पालना सहज है
उससे पीछा छुड़ाने में
होती है बहुत मुश्किल
पर नैतिकता की बात कहने में
शब्द खर्च करने हुए क्यों करो किफायत
कहैं दीपक बापू देते हैं
दूसरों को बड़ी आसानी से देते हैं
नैतिकता का उपदेश लोग
जबकि अपने ही आचरण में
होते हैं ढ़ेर सारे खोट
दूसरे को दें निष्काम भाव का संदेश
और दान- धर्म की सलाह
अपने लिए जोड़ रहे हैं नॉट
समाज और जमाने के बिगड़ जाने की
बात तो सभी करते हैं
आदमी को सुधारने की
कोई नहीं करता कवायद
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सुबह से शाम तक
छोड़ते हैं सिगरेट का धुआं
अपने दिल में खोदते  मौत का कुआँ
और लोगों को सुनाते हैं
जमाने के खराब होने के किस्से
अपना सीना तानकर कहते हैं
बिगडा जो है प्रकृति का हिसाब
उस पर पढ़ते हैं किताब
पर कभी जानना नहीं चाहते
हवाओं को तबाह करने में
कितने हैं उनके हिस्से

इससे अच्छा तो बुतों पर यकीन कर लें


अपने लिए बनाते हैं ऐसे
सपनों के महल
जो रेत के घर से भी
कमजोर बन जाते हैं
तेज रोशनी को जब देखते देखते
आंखों को थका देते हैं
फिर अँधेरे में ही रोशनी
तलाशने निकल जाते हैं
इधर-उधर भटकते हुए
अनजान जगहों के नाम
मंजिल के रूप में लिखते हैं
दर्द के सौदागरों के हाथ
पकड़ कर चलने लग जाते हैं
जब दौलत के अंबार लगे हों तो
गरीबी में सुख आता है नजर
जब हों गरीब होते हैं
तो बीतता समय रोटी की जंग में
अमीरों का झेलते हैं कहर
नहीं होता दिल पर काबू
बस इधर से उधर जाते हैं
जिंदा लोगों को बुत समझने की
गलती करते हैं कदम-कदम पर
इसलिए हमेशा धोखा खाते हैं
इससे अच्छा तो यही होगा कि
बुतों को ही रंग-बिरंगा कर
उनमें अपना यकीन जमा लें
हम कुछ भी कह लें
कम से कम वह बोलने तो नहीं आते हैं
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तुम्हारे प्रेम के विरह में हास्य लिखता हूँ


ब्लोगर उस दिन एक पार्क में घूम रहा था तो उसकी पुरानी प्रेमिका सामने आकर खडी हो गयी। पहले तो वह उसे पहचाना ही नहीं क्योंकि वह अब खाते-पीते घर के लग रही थी और जब वह उसके साथ तथाकथित प्यार (जिसे अलग होते समय प्रेमिका ने दोस्ती कहा था) करता था तब वह दुबली पतली थी। ब्लोगर ने जब उसे पहचाना तो सोच में पड़ गया इससे पहले वह कुछ बोलता उसने कहा-”क्या बात पहचान नहीं रहे हो? किसी चिंता में पड़े हुए हो। क्या घर पर झगडा कर आये हो?”
”नहीं!कुछ लिखने की सोच रहा हूँ।”ब्लोगर ने कहा;”मुझे पता है कि तुम ब्लोग पर लिखते हो। उस दिन तुम्हारी पत्नी से भेंट एक महिला सम्मेलन में हुई थी तब उसने बताया था। मैंने उसे नहीं बताया कि हम दोनों एक दूसरे को जानते है।वह चहकते हुए बोली-”क्या लिखते हो? मेरी विरह में कवितायेँ न! यकीनन बहुत हिट होतीं होंगीं।’
ब्लोगर ने सहमते हुए कहा-”नहीं हिट तो नहीं होतीं फ्लॉप हो जातीं हैं। पर विरह कवितायेँ मैं तुम्हारी याद में नहीं लिखता। वह अपनी दूसरी प्रेमिका की याद में लिखता हूँ।”
”धोखेबाज! मेरे बाद दूसरी से भी प्यार किया था। अच्छा कौन थी वह? वह मुझसे अधिक सुन्दर थी।”उसने घूरकर पूछा।
”नहीं। वह तुमसे अधिक खूबसूरत थी, और इस समय अधिक ही होगी। वह अब मेरी पत्नी है। ब्लोगर ने धीरे से उत्तर दिया।
प्रेमिका हंसी-”पर तुम्हारा तो उससे मिलन हो गया न! फिर उसकी विरह में क्यों लिखते हो?’
”पहले प्रेमिका थी, और अब पत्नी बन गयी तो प्रेम में विरह तो हुआ न!”ब्लोगर ने कहा।
पुरानी प्रेमिका ने पूछा -”अच्छा! मेरे विरह में क्या लिखते हो?”
”हास्य कवितायेँ और व्यंग्य लिखता हूँ।” ब्लोगर ने डरते हुए कहा।
”क्या”-वह गुस्से में बोली-”मुझे पर हास्य लिखते हो। तुम्हें शर्म नहीं आती। अच्छा हुआ तुमसे शादी नहीं की। वरना तुम तो मेरे को बदनाम कर देते। आज तो मेरा मूड खराब हो गया। इतने सालों बाद तुमसे मिली तो खुशी हुई पर तुमने मुझ पर हास्य कवितायेँ लिखीं। ऐसा क्या है मुझमें जो तुम यह सब लिखते हो?’
ब्लोगर सहमते हुए बोला-“मैंने देखा एक दिन तुम्हारे पति का उस कार के शोरूम पर झगडा हो रहा था जहाँ से उसने वह खरीदी थी। कार का दरवाजा टूटा हुआ था और तुम्हारा पति उससे झगडा कर रहा था. मालिक उसे कह रहा था कि”साहब. कार बेचते समय ही मैंने आपको बताया था कि दरवाजे की साईज क्या है और आपने इसमें इससे अधिक कमर वाले किसी हाथी रुपी इंसान को बिठाया है जिससे उसके निकलने पर यह टूट गया है और हम इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं. तुम्हारा पति कह रहा था कि’उसमें तो केवल हम पति-पत्नी ने ही सवारी की है’, तुम्हारे पति की कमर देखकर मैं समझ गया कि……………वहाँ मुझे हंसी आ गई और हास्य कविता निकल पडी. तब से लेकर अब जब तुम्हारी याद आती है तब……अब मैं और क्या कहूं?”
वह बिफर गयी और बोली-”तुमने मेरा मूड खराब किया। मेरा ब्लड प्रेशर वैसे ही बढा रहता है। डाक्टर ने सलाह दी कि तुम पार्क वगैरह में घूमा करो। अब तो मुझे यहाँ आना भी बंद करना पडेगा। अब मैं तो चली।”
ब्लोगर पीछे से बोला-”तुम यहाँ आती रहना। मैं तो आज ही आया हूँ। मेरा घर दूर है रोज यहाँ नहीं आता। आज कोई व्यंग्य का आइडिया ढूंढ रहा था, और तुम्हारी यह खुराक साल भर के लिए काफी है। जब जरूरत होगी तब ही आऊँगा।”
वह उसे गुस्से में देखती चली गयी। ब्लोगर सोचने लगा-”अच्छा ही हुआ कि मैंने इसे यह नहीं बताया कि इस पर मैं हास्य आलेख भी लिखता हूँ। नहीं तो और ज्यादा गुस्सा करती।”
नोट-यह एक स्वरचित और मौलिक काल्पनिक व्यंग्य रचना है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई लेना देना नहीं है और किसी का इससे मेल हो जाये तो वही इसके लिए जिम्मेदार होगा.

मेरे इन ब्लोगस की रचनाओं को देखें


समस्त पाठकों से निवेदं है कि यदि आप मेरी रचनाएं इस ब्लोग पर पढना चाह्ते हैं तो कृप्या कमेंट अवश्य लिखे। इस ब्लोग पर मेरा इरादा एक उप ंयास लिखने का है। तब तक आप मेरे इन ब्लोगस की रचनाओं को देखें
दीपक भारतदीप्

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