Category Archives: hindi jagran

जहाँ ले जाता मन-कविता साहित्य


दिल में हो कड़वाहट तो मीठा कैसे लिखें
उदासी हो दिल में, चेहरे से हँसते कैसे दिखें
कितना कठिन अपने को छिपाना मन की आँखों से
जैसे अपने को लगें वैसे ही दूसरों को भी दिखें
जमाने के साथ कब तक चल सकती है चालाकी
कब तक अपने दिल का हाल छिपा कर लिखें
कहीं कोई आस नहीं, फिर भी दिल निराश नहीं
जब तक चल रही सांस, कैसे जिन्दगी से हारते दिखें
कभी अपने कागज़ पर लिखे शब्द थके हुए लगते हैं
हम रुक जाते, पर फिर वह शेर की तरह दौड़ते दिखे
कहाँ ले जाएं इस जमाने से आहत अपना मन
रुकने की सोचें, अगले ही पल उसके कहे पर चलते दिखें

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कमेन्ट ही रजाई का काम कर जायेगी-हास्य कविता


आकर फंदेबाज बोला
”दीपक बापू
इस ठंड में क्या
कीबोर्ड पर उंगली नचा रहे हो
लो लाया हूँ बोतल
तुम तो अब हो गए हो काईयाँ
शराब का नशा छोड़
ब्लोग पर पोस्ट पर लगे कमेन्ट के
पैग पीकर
जेब के पैसे बचा रहे हो’

सुनकर उखड़े दीपक बापू पहले
फिर सिर पर रखी टोपी घुमाते बोले
‘कह गए बुजुर्ग
अधिक नशा करना ठीक नहीं
साथ ही यह भी कहा है कि
अधिक खर्च करना ठीक नहीं
ब्लोग पर पोस्ट लिखने का नशा भी
सिर पर चढा हो
तो फिर शराब क्या काम करेगी
डबल हो गया नशा तो हैरान करेगी
तुमने बताया है तो देखो ठंड के मारे
हमारे हाथ काँप रहे हैं
वरना हमें क्या पता कि
कल पारा जीरों पर जायेगा
तुम घर में ही घुसे रहना
यहाँ आकर हमें खबर न करना
वरना पोस्ट लिखने का नशा उतर जायेगा
यह बोतल भी ले जाओ
ठंड से यह क्या बचायेगी
एकाध कमेन्ट टपक पडी तो
उसकी गर्मी ही रजाई का काम कर जायेगी
अगर कमेन्ट नहीं आयी तो
चौपालों पर जाकर ढूंढेंगे
अंतर्जाल का कोई गरम पोस्ट वाला ब्लोग उसी पर
फड़कती कमेन्ट लगाकर
लिखेंगे कोई हास्य कविता
जो हमारी क्या सब साथियों को
सर्दी में भी गर्मी का अहसास कराएगी
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जल्दी टीवी बनवा लेना-हास्य कविता


घर में घुसते ही बाप ने बेटे से कहा
”बेटा तुम्हारी मां के कमरे में रखा टीवी
खराब हो गया है
अगर तुम बचना चाहते हो
गृहयुद्ध से तो आज
अपने कमरे में रखे टीवी के
प्लग में गडबडी कर देना
ताकि सास के मन को भी हो जाये तसल्ली
आज खामोश रहे
कल छुट्टी के दिन मां का टीवी
किसी भी तरह बनवा लेना
वैसे भी सास-बहु के सीरियल की
भयानक आवाजे सुनते
और बीभत्स दृश्य देखते
बोर हो गया हूँ
पर फिर भी टीवी जल्दी बनवा लेना
नहीं तो जो अभी तक
सीरियल में चल रहा है
उसे अपने घर के परदे पर
देखने का मन बना लेना
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प्रभावपूर्ण दस्तक देते हैं सागरचंद नाहर-समीक्षा


अंतर्जाल पर बहुत लोग लिख रहे हैं और हर किसी को ब्लोग के बारे इस्तेमाल की पूरी जानकारी हो यह कोई जरूरी नहीं है और जिनको पूरी हो गयी है तो लिख कर व्यक्त नहीं करते. हालत यह है जिन ब्लॉगस्पोट और वर्डप्रेस ब्लोगों का पूरा इस्तेमाल भी कुछ लोग-जिनमें मैं स्वयं भी शामिल-नहीं कर पा रहे हैं. ऐसे में एक शख्सियत हैं सागर चंद नाहर जो निर्बाध गति से अपना ज्ञान दूसरे लोगों को अपने ब्लॉग दस्तक पर बाँट रहे हैं. जब मैं अपने को अंतर्जाल पर लिखते देखता हूं तो यह कभी नहीं भूलता कि किस तरह कमेंट देकर उन्होने मुझे प्रेरित किया, तब मैं सादा हिन्दी फ़ॉन्ट में लिख रहा था और मेरा लिखा कोई पढ़ नहीं पा रहा था. उस समय वह मेरे ब्लॉग पर आए और अपना संदेश छोड़ गये. उसके बाद मैं महीने भर तक अकेले ही अपने ब्लोग यूनीकोड में लिखकर विचरता रहा था तो फिर आए और संदेश छोडा कि नारद पर आओ. हमें तो केवल लिखने का नशा है पर उनको इसके साथ दूसरों को भी प्रेरित करने का भाव हो नाहर जी में है वह बहुत कम लोगोंमें दिखता है.

जो भी नया ब्लॉग नारद पर आया उसे सबसे पहले कमेन्ट देकर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने का काम उन्होने किया है. मैं हमेशा उसे ही अच्छा ब्लोग लेखक मानता हूँ जो प्रभावपूर्ण लिखने के साथ दूसरों को भी प्रेरित करता है और मेरे हिसाब से इस समय नाहर जी के अलावा मैं यह गुण अन्य किसी में नहीं देखता .

आईए उनके लिखे पर चर्चा करें. तमाम तरह के तकनीकी ज्ञान को लेकर तमाम ब्लॉगर दावे करते रहे हैं पर अपने ब्लोग पर ही मौजूद सुविधाओं का इस्तेमाल किस तरह किया जाये यह जानकारी मुझे केवल सागरचंद नाहर के ब्लोग से ही मिलती है.देखा जाए तो हमारे ब्लॉग पर जो सुविधाएँ उपलब्ध हैं उनके लिए बाहर से किसी सॉफ्टवेअर की मुझे कभी ज़रूरत नहीं लगती. इन्हीं ब्लोग का अधिक से अधिक उपयोग कैसे किया जाए यह सीखना भर है-हमें यह जानकारी अक्सर दस्तक पर मिल जाती है . अभी सागर चंद नाहर जी ने अपने ब्लॉग पर ही मौजूद सुविधा ब्लोगरोल के व्यापक इस्तेमाल के बारे में लिखा था. इसका इस्तेमाल तो मैं बहुत समय से कर रहा हूँ पर कई लोगों को शायद इससे पता लगा होगा. आपने पिछले दिनों यह सुना होगा की ”अपने चिट्ठे पसंद कर लो और पढ़ो”. जिन ब्लॉगरों ने सागरचंद नाहर का वह लेख पढ़ा होगा वह हंसते होंगे. हमारे ब्लॉग पर ही यह सुविधा है कि आपको जो ब्लॉग पसंद है उस अपने ब्लॉग पर ही लिंक दे और स्वयं पढ़ें और अपने पाठकों को भी पढ़वाएं. चाहे कितने भी चिट्ठे अपने ब्लॉग पर लिंक कर सकते हैं. इसके लिए किसी का मोहताज होने की ज़रूरत नहीं है.

अभी कुछ दिनों पहले ही उन्होने वर्डप्रेस के widgest के इस्तेमाल की जानकारी दी. इसके अलावा वर्ड प्रेस में अपनी पोस्ट पर ही post slug में भी अपना शीर्षक डालने की जानकारी दी और वह मेरे काम आई. आज अब मेरे वर्डप्रेस के ब्लॉग को देखेंगे तो उनके वर्तमान स्वरूप का श्रेय सागरचंद नाहर को ही देता हूँ. इसके अलावा अपनी पोस्ट पर शब्दों का चयन कर उनको विशिष्ट रूप से कैसे दिखाएँ यह भी उन्होने बताया. इतना ही नहीं वह ब्लॉगस्पोट के ब्लॉग के बारे में भी लिखते हैं. मैं मानता हूँ कि अगर आप ब्लॉग को निरंतर लिख रहे हैं और उसमें सुधार करना चाहते हैं तो सागर चंद नहर की दस्तक पर ध्यान देते र्हें, ऐसी जानकारी देने वाला और कोई मुझे तो नहीं दिखा.

वह बहुत सरल स्वभाव के हैं. यह मैं जानता हूँ क्योंकि पिछले वर्ष की कुछ ऐसी पोस्टें जो ब्लॉग जगत में अभद्र व्यवहार पर प्रतिवाद प्रकट करतीं थी उस पर वह कमेंट देते थे और कहते थे आप ऐसा लिखते रहें. कुछ लोगों ने उनकी सादगी को कमज़ोरी समझकर ऐसा कोई व्यवहार उसने किया होगा जो अशोभनीय होगा या वह ऐसे माहौल से दुख होकर कहते होंगे -ऐसा मुझे लगता है. शांति से अपनी बात लिखकर दूसरों की प्रेरणा बनने वाले सागरचंद नाहर पर बहुत दिनों से लिखने का मन था. हिन्दी साहित्या में वही साहित्यकार पूर्ण माना जाता है जो समीक्षा लिख सकता है. मैने इससे पहले सत्येन्द्र श्रीवास्तव (भूख), परमजीत बाली (दिशाएं) और ममता श्री वास्तव (ममता टीवी) पर समीक्षाएं लिखीं थी. उसके बाद एक समीक्षा लिख रहा था तो वह पूरी होने से पहले ही इंडिक टूल पर पता नहीं कहाँ हाथ पड़ा और वह उड़ गया. यह पोस्ट भी मैं लिख चुका था एक माह पहले पर लाईट चली गयी तो इसे सेव कर रख लिया. आज जब वर्डप्रेस पर गया तो अचानक यह याद आई और मुझे अपने आप पर खुद आश्चर्य हुआ कि मैने इसे इतने दिन तक क्यों अपने पास रख छोडा . सागर चंद नाहर के बारे में बस इतना ही और कहना चाहूँगा कि वह ऐसा न समझें की उनका लिखा कोई महत्व नहीं रखता.यह समीक्षा लिखने का मतलब भी यही है की सब लोग समझें कि अन्य पाठक उनको पढ़ते हैं और उसका प्रभाव होता है.
हाँ मैं एक आग्रह उनसे करूंगा कि अगर वह एक ऐसी पोस्ट रखें जिसमें ब्लोग बनाने की पूरी विधि हो. वह यह मानकर लिखें कि ब्लोगर अनाडी हैं क्योंकि हमारा लिखा अन्य आम पाठक भी पढ़ते हैं जो हमें बता नहीं पाते और इस विधा की जानकारी उनको तभी हो सकती है जब कोई ब्लोगर उस पर लिखे. अगर मैं उनके बारे में कम या गलत लिख गया हूँ तो उनसे और उनके प्रशंसकों से और अधिक लिख गया हूँ तो उनके आलोचकों से क्षमा प्रार्थी हूँ. उनके उज्जवल भविष्य की कामना के साथ यह समीक्षात्मक आलेख उनको ही समर्पित.

इनके ब्लोग का पता है
http://nahar.wordpress.com
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एक सामान्य पहल से अधिक कुछ नहीं-आलेख


भारत में हिन्दी ब्लोग अभी शैशव काल में है और ब्लोगरों की संख्या देखें तो अपने देश के विशाल क्षेत्र को देखते हुए अभी भी नगण्य है, और जैसे जैसे इसका प्रचार होगा वैसे-वैसे ही इसमें बदलाव आयेंगे और उस समय जो स्वरूप होगा जिसकी कल्पना कोई इस समय तो नहीं कर सकता
किसी समय नारद हिन्दी ब्लोग का एकमात्र ऐसा फोरम था जिस पर सब ब्लोग एकत्रित होते थे, और दूसरे फोरम बनाने के बावजूद लोग उस पर नहीं जा रहे थे. एक बार नारद के तीन दिन तक खराब रहने के बाद भी लोग उस पर नहीं जा रहे थे तब मैंने एक पोस्ट डाली थी ”नारद का मोह न छोडें पर दूसरी चौपालों पर भी जाएं”. इसका असर हुआ और लोग दूसरी चौपालों पर जाना शुरू हुए. आज भी मेरे तरह कुछ लोग हैं जिनको नारद से मोह है पर उसकी ब्लोगवाणी से प्रतिस्पर्धा है जिसे मेरे लेख के बाद पाठक मिले तो ऐसे कि वह इस समय ब्लोगरों का पसंदीदा फोरम है.

अगर यह चौपाल वाले दूसरों की खबर रखते हैं तो दूसरों को भी इनकी खबर रखनी चाहिए. नारद और चिटठा जगत आपसे में जुड़ें फोरम हैं. आप कोई नया ब्लोग बनाएं और उसे चिटठा जगत पर पंजीकृत करें तो वह उसके अलावा नारद और हिन्दी ब्लोग्स पर अपने आप आ जायेगा पर ब्लोग वाणी पर आपको पंजीकृत कराना पडेगा. जो लोग चिट्ठाजगत के परिवर्तनों से चिंतित हैं उन्हें बता दूं कि इस तरह की कोई बात नहीं है. नारद अपने ऐसे बदलाव नहीं करेगा क्योंकि वह जानते हैं कि वह किसी काम का नहीं है. ब्लोगवाणी के संचालक कभी भी ऐसे परिवर्तन नहीं करेंगे क्योंकि इसका सीधा मतलब है नारद के पास अपने ब्लोगर भेजना.
नारद के कर्णधार इस समय अपने पास पाठक खींचने के लिए जूझ रहे हैं, वह चिट्ठाजगत के परिवर्तनों का प्रचार कर रहे हैं पर ब्लोगवाणी शायद ही इसमें आयें.

कल सर्वश्रेष्ठ चिट्ठाकार २००७ के लिए किया गया एलान इसी का हिस्सा है. नारद के फोरम से ही चलाया गया है-ऐसा मुझे लगता है. उसका एक कर्णधार ही इससे सीधा जुडा हुआ है. हालांकि इसके एक कर्णधार का मत रहा है कि वेब साईट को ब्लोग नहीं माना जा सकता है, पर इस राय से हटने के अलावा उनके पास कोई रास्ता नहीं है. उन्होने कुछ पुराने ब्लोगरों के साथ ऐसे नये ब्लोगर जोड़े हैं जो उनके साथ एक मित्र की तरह पहले से ही हैं .

बहरहाल ऐसे बहुत से पुरस्कार बनेंगे और बटेंगे, इनसे विचलित होने की बजाय नये ब्लोगर अपने कौशल का प्रदर्शन करते हुए आगे बढ़ें. हमें इन फोरमों के आपसी द्वंद में नहीं जाना है क्योंकि इसके लोग बडे शहरों में रहते हैं और आपस में मित्रों की तरह ही हैं. इनकी लाबियाँ है और इसमें तो निकट के लोग ही हो सकते हैं. अभी पिछले पुरस्कार के समय भी विवाद उठे थे और इसमें भी उठेंगे पर इतने प्रभावशाली ढंग से नहीं क्योंकि इसमें कई ऐसी चीजों का ध्यान रखा गया है जो विवाद उठाने वाले लोग हैं वह डरेंगे-दबे स्वर में तो कल ही कुछ पोस्ट और कमेन्ट देखी थी. अगर आप इनके नामों और उनके सक्रियता को देखें तो नारद अब भी वहीं हैं जहाँ पहले था. वरिष्ठ वेब साईट धारकों को आगे कर वह ऐसा समझ रहे हैं कि कोई इस चालाकी को नही पकडेगा और पकडेगा तो कहेगा नहीं. मैं भी लिख रहा हूँ क्योंकि मैं जानता हूँ कि कोई मुझसे सवाल नहीं करेगा क्योंकि मेरे पास और भी सवाल हैं. एक धुर विरोधी नाम के ब्लोगर थे और कहते हैं कि वह गुस्से में ब्लोग जगत से चले गए पर मेरे के मित्र ब्लोगर से जब भेंट हुई (वह अकेले ऐसे ब्लोगर हैं जिनसे मैं मिला हूँ) तो पता लगा कि वह एक छद्म नाम था और वह असली नाम से कोई वेब साईट चला रहे हैं-और मेरा मानना है कि कई लोग ऐसे होते है कि लगता है अब झांसे में आये पर आते नहीं है. इन फोरम वालों का द्वंद है चलता रहेगा. इसमें रूचि लें पर अपने लक्ष्य से नहीं भटकें. यह इस सम्मान का खूब प्रचार करेंगे और ऐसा दिखाएँगे कि जैसे कोई बहुत बड़ी उपाधि है पर उस पर ध्यान देना चाहे तो वोट डाल देना पर कोई टेंशन मत लेना. यह भी बता दूं इनकी यह योजना हाल ही में बनी हैं क्योंकि कुछ नये नाम लोगों की जुबान पर चढ़ते जा रहे हैं तो इन लोगों ने सोचा कि अपने पुराने लोगों को पुन: सक्रिय किया जाये ताकि वह उनके चौपाल पर आयें, और हम जैसे लोग तो वैसे ही जाते है और ऐसे पुरस्कारों में रूचि नहीं है जो अपने ही ब्लोगर वर्ग के लोगों से मिले क्योंकि बड़ा तो बाहर सिद्ध होना है यहाँ क्या? कुल मिलाकर एक दम सामान्य पहल है. आज मेरा इस पर हास्य कविता लिखने का मन था पर उसे अब मैंने स्थगित कर दिया क्योंकि इसमें दम नजर नहीं आया.

चजइ-अंतर्जाल पर भी होंगे भेड़ की खाल में भेडिया


हिन्दी का परचम फहराने का
उनका तो बहाना है
बस उनको अपनी दुकान ज़माना है
बोलने में शब्द तो बह जाते
पर लिखते हुए हाथ काँप जाते
पर अपने लेखक होने का अहसास कराना
कहीं अखबारों से कटिंग ढूंढ कर लाते
कही उठा लाते किसी का छपा अफ़साना

जब कहीं हिन्दी के नाम पर
बनते पुरस्कार तो मुहँ में लार आ जाती
जब मिलते नहीं देखते तो
निर्णायक की कुर्सी पर बुरी नजर जाती
कहीं न कहीं तो ढूंढना है उनको ठिकाना
लोगों को किसी तरह होता है भरमाना

अखबार और पत्रिकाओं से
चलकर अंतर्जाल पा भी लाये वह जमाना
दुनिया भर के वाद और नारे
उनके भी खून में हैं
चाहते हैं किसी तरह उसे छिपाना
हिन्दी को अंतर्जाल पर बढ़ाने के नाम पर
सर्वश्रेष्ट ब्लोगर के लिए
चुन लेंगे अपने-अपने लोग
पुरस्कार वजनदार लगे इसलिए
हिट ब्लोगरों को भी होगा जरूरी फ्लॉप दिखाना

कहैं दीपक बापू
अंतर्जाल पर लिखने वाले ब्लोगरों में भी
भेड़ की खाल में भेडिया
न हो यह कैसे हो सकता है
छल-कपट के लिए
गढ़ लेते हैं तर्कों का बहाना
सो डरना या विचलित नहीं होना
बंटवाने दो अपनों-अपनों को पुरस्कार
अपना मन मैला मत करो
हमें तो हिन्दी का है परचम फहराना
जिन्होंने छेडा है हमारे ब्लॉग का डंडा
उनके ब्लॉग तो वैसे ही हैं अंडा
हमें तो चलते जाना है
माँ सरस्वती ने सौंपा है
शब्दों का खजाना
उसे अपने दोस्तों पर बरसाते जायेंगे
उनकी करनी पर ही
अब हास्य कविता लिखते जायेंगे
उन्हें पुरस्कार मिलते रहेंगे
हमें मिलेगा हास्य कविता लिखने का बहाना

नोट-यह काल्पनिक हास्य रचना है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका लेना-देना नहीं है अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाए तो वही इसके लिए जिम्मेदार होगा.

आसमान से अब फ़रिश्ते नहीं आते


आसमान से अब फ़रिश्ते नहीं आते
विचार खुले होना अच्छा है
पर आंख्ने भी खुली रखना
यकीन करना अच्छा है
पर कदम-कदम पर है
धोखे भीं हजार हैं
अपना हर कदम
सतर्कता से रखना

सुन्दर शब्दों का जाल
फैलाया जाता है चहूं ओर
अर्थहीन लाभ दिखाए जाते है
जिनका नहीं होता कहीं ठौर
शिकारी अब ऐसा जाल बिछाते हैं
पंक्षी बिना दाना डाले फंस जाते हैं
तुम शिकार होने से बचना

कहीं एक के साथ एक फ्री का नारा
कहीं भारी भरकम गिफ्ट का नज़ारा
कोई करता हैं भारी छूट का वादा
कोई बताता अपने ही लुटने का aaj
खरीदने निकलो बाजार में तो तुम भी
एक सौदागर बन जाना
अपनी नज़र पैनी रखना

कहैं दीपक बापू
अब आसमान से नहीं आते
ऐसे फ़रिश्ते
जो दूसरे को मालामाल कर दें
लोगों के झुंड के झुंड जुटे हैं
अमीर बनने के लिए
वह ऐसे नही है
किसी दूसरे के लिए कमाल कर दें
तुम अपना ईमान नहीं छोड़ना
अपने ख्वाबों को सच करने की
जंग खुद ही जीतने की बाट जोहना
किसी दूसरे के दिखाए सपने में
अपनी जिन्दगी फंसाने से बचना
यहां कोई ख़्याल से फ्री दिखता है
किसी का माल फ्री बिकता है
कोई फ्री में लिखता है
पर यहां कुछ फ्री नहीं है
सिवाय तुम्हारी जिन्दगी के
इसे फ्री में बेकार करने से बचना
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रहीम के दोहे:अभिवादन करने वाले सभी मित्र नहीं हो जाते


सब को सब कोऊ करै, कै सलाम कै राम
हित रहीम तब जानिए, जब कछु अटकै काम

कविवर रहीम कहते हैं की सब एक दुसरे को सलाम और राम-राम कहकर अभिवादन तो सभी करते हैं पर मित्र तो उसे ही मानिए जो समय पर काम पर आये.

संपादकीय अभिमत-इसमें रहीम जी ने कितना बड़ा गूढ़ रहस्य प्रकट किया है. दिन में कई लोगों से हमारा सलाम और राम-राम कहकर अभिवादन होता है और समझते हैं की वह हमारे अपने हो गए. कई लोग इसे भे होते हैं जिनसे हमारा प्रतिदिन अभिवादन का आदान-प्रदान और अन्य वार्तालाप होता है पर वह सब मित्र नहीं हो जाते जबक हम मन ही मन उन्हें अपना समझने लगते हैं. जब काम अटकता है तो हम उनसे उम्मीद करते हैं जब वह इनकार कर देते हैं तब कहीं जाकर हमारा भ्रम टूटता है.

स्कूल. ऑफिस और दुकानों पर हमारे साथ ऐसे अनेक जुड़ते हैं जो केवल वहाँ काम करने की वजह से होते हैं पर उन्हें मित्र नहीं माना जा सकता. हाँ, वहाँ मित्र बनते हैं पर वही लोग जो दु:ख और सुख में हमारे यहाँ शरीक होते हैं.

बेनजीर एक नजीर बन गयी


सुन्दर चेहरा
समुन्दर जैसे गहरी ऑंखें
खुशदिल और शिक्षित व्यक्तित्व
की मल्लिका बेनजीर को
किसकी  नजर लग गयी

५४ वर्ष में खिला एक
फूल पल भर में मसल डाला
दानव नहीं लगा सकते एक फूल भी
पर बाग़-बाग़ के उजाड़ डालते हैं
इंसानों के भेष में सब इंसान नहीं होते
भला क्या सब यह जानते हैं
भोली भाली एक औरत
मर्दों की राजनीति की बलि चढ़ गयी

हिंसा का खेल कौन रचता है
अपने लिए  रखता है आजादी
औरत को गुलाम बनाने के लिए
कई किताबें लिख बचता है
लिखी जायेगी कोई किताब उस पर
फिर कभी किसी आदमी द्वारा
बेनजीर किताब का एक पन्ना बन गई

उसने किया उन लोगों पर भरोसा
जिनके घर के चिराग 
भले लोगों के खून से रौशन होते हैं
अपने कफ़न  बेचने के लिए
बाजार में कत्लेआम बेचते हैं
धोखे तो हर पल होते हैं यहाँ
बेनजीर भी एक नजीर बन गयी   

संत कबीर वाणी:प्रभु का दर्शन करने वाला गाता नहीं


कबीर जब हम गावते, तब जाना गुरु नाहीं
अब गुरु दिल में देखिया, गावन को कछु नाहिं

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब तक हम गाते रहे, तब तक हम गुरु को जान ही नहीं पाए, परन्तु अब हृदय में दर्शन पा लिया, तो गाने को कुछ नहीं रहा.

भावार्थ- संत कबीरदास जी के दोहों में बहुत बड़ा महत्वपूर्ण दर्शन मिलता है. समाज में कई ऐसे लोग हैं जो किन्हीं गुरु के पास या किसी मंदिर या किसी अन्य धार्मिक स्थान पर जाते है और फिर लोगों से वहाँ के महत्त्व का दर्शन बखान करते हैं. यह उनका ढोंग होता है. इसके अलावा कई गुरु ऐसे भी हैं जो धर्म ग्रंथों का बखान कर अपने ज्ञान तो बघारते हैं पर उस पर चलना तो दूर उस सत्य के मार्ग की तरफ झांकते तक नहीं है. ऐसे लोग भक्त नहीं होते बल्कि एक गायक की तरह होते हैं. जिसने भगवान् की भक्ति हृदय में धारण कर ली है तो उसे तत्वज्ञान मिल जाता है और वह इस तरह नहीं गाता. वह तो अपनी मस्ती में मस्त रहता है किसी के सामने अपने भक्ति का बखान नहीं करता.

मनुस्मृति:अपराधियों को अनदेखा न करे राज्य



चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

१.अपनी क्षीण वृति, अर्थात आय की कमी से तंग होकर जो व्यक्ति रास्ते में पड़ने वाले खेत से कुछ कंद-मूल अथवा गन्ना ले लेता हैं उस पर दंड नहीं लगाना चाहिए.

२.जो व्यक्ति दुसरे के पशुओं को बांधता है, बंधे हुए पशुओं को खोल देता है तथा दासों, घोडों और रथों को हर लेता है, वह निश्चय ही दंडनीय है.

३.इस प्रकार जो राज्य प्रमुख चोरों को दण्डित कर चोरी का निग्रह करता है वह इस लोक में यश प्राप्त करता है तथा परलोक में दिव्य सुखों को भोगता है.

४.जो राज्य प्रमुख इस लोक में अक्षय यश व मृत्यु के बाद दिव्य लोक चाहता है उसे चोरों और डकैतों के अपराध को कभी अनदेखा नहीं करना चाहिए.

५. वह व्यक्ति जो अप्रिय वचन बोलता है, चोरी करता है और हिंसा में लिप्त होता है. उसे महापापी मानना चाहिए.

६.यदि राज्य दुस्साहस करने वाले व्यक्ति को क्षमा कर देता है या उसके कृत्य को अनदेखा कर देता है तो अतिशीघ्र उसका विनाश हो जाता है क्योंकि लोगों को उसके प्रति विद्वेष की भावना पैदा हो जाती है.

७.राज्य प्रमुख को चाहिए के वह स्नेह वश अथवा लालच वश भी प्रजाजन में डर उत्पन्न करने वाले अपराधियों को बन्धन मुक्त न करे.

८.यदि गुरु, बालक,वृद्ध व विद्वान भी किसी पर अत्याचार करता है तो उसे बिना विचार किये उपयुक्त दंड दिया जाना चाहिए.

९.अपने आत्म रक्षार्थ तथा किसी स्त्री और विद्वान पर संकट आने पर उसकी रक्षा के लिए जो व्यक्ति किसी दुष्ट व्यक्ति का संहार करता है उसे हत्या के पाप का भागीदार नहीं माना जाता.

जब ब्लोगर कार के मुहूर्त से बिना कमेन्ट के लौटा


ब्लोगर पहुंचा सर्वशक्तिमान के घर
ध्यान लगाने
कुछ पल का चैन पाने
निकला जब बाहर तो देखा
उसका मित्र अपनी नयी कार लेकर
खडा था
उस घर के सेवक से पुजवाने
ब्लोगर को देखकर मित्र खुश हो गया
और इशारा कर बुलाया और बोला
”यार, आज ही खरीदी है
लाया हूँ इसे इसकी नजर उतरवाने
तुम भी रुक जाओ
और प्रसाद पाओ
फिर कभी ले चलूँगा तुम्हें घुमाने’

ब्लोगर रुक गया
विश्वास बहुत था उसका सर्वशक्तिमान में
पर अंधविश्वास से परे था
पर मित्र के आगे वह झुक गया
मित्र ने फूल दिए और कहा
जब हो जाये सब
तक यह हैं कार पर बरसाने’
जब हो गयी कार की पूजा
तब ब्लोगर ने भी फूल बरसाए
और दूर हो गया पानी पीने के बहाने
उधर मिठाई बंटी
ख़त्म हो गया मिठाई का डिब्बा
ब्लोगर पहुंचा मित्र के सामने
हिस्से का हक़ जमाने
मित्र ने खाली डिब्बा दिखाया और
दिया आश्वासन कल उसका
हिस्सा घर पहुँचाने के लिए
ब्लोगर बोला
”यार, क्या मेरे लिए
एक टुकडा नहीं बचा सके
मैंने तुम्हारी कार पर
फूल पोस्ट किये थे
पर कमेन्ट की बात आयी
तो लगे टरकाने
हमें तो मजा तब आता है
जब पोस्ट रखते ही कमेन्ट आये
वह बहुत ताजा लगती है
कल-परसों वाली बासी लगती है
तुम कल भी कुछ मत लाना
अरे, हमें हर पोस्ट पर कमेन्ट नहीं मिलती
मैं यही समझ लूंगा
यह पोस्ट भी औंधे-मुहँ गिरी
चित हो गयी चारों खाने
—————————————-
नोट-यह काल्पनिक हास्य-व्यंग्य रचना है और इसका किसी घटना से कोई लेना देना नहीं है और किसी की कारिस्तानी इससे मेल खा जाये तो वही इसके लिए जिम्मेदार होगा.

रहीम के दोहे:सूखा तालाब किसी की प्यास नहीं बुझाता


तासौं ही कछु पाइए, कीजै जाकी आस
रीते सरवर पर गए, कैसें बुझे पियास

कवि रहीम कहते हैं कि उसी व्यक्ति के पास जाइये जिससे आशा हो। सूखे तालाब के पास जाने से कभी भी किसी जीव की प्यास नहीं बुझ सकती।
संपादकीय अभिमत- इस दुनिया में कई ऐसे लोग हैं जिनके पास बहुत सारी दौलत है पर वह किसी को कुछ देना नहीं चाहते। उसी व्यक्ति को कुछ देते हैं जिससे कुछ लाभ होने वाला है। ऐसे लोगों के पास जाने का कोई लाभ नहीं है जो किसी को फूटी कौडी भी मदद के रूप में नहीं दे सकते। देखा जाये तो आजकल दुनिया में ऐसे ही लोगों की बहुतायत है जो केवल स्वार्थ सिद्धि में लगे हैं। कहने को बड़ी-बड़ी बातें करेंगे और हम उनके बारे में जानते हैं कि यह किसी भी हालत में मदद नहीं करने वाला फिर भी उम्मीद करते हैं। जब वक्त आता है तो मुहँ फेर जाते हैं और हमारी वाणी व्यर्थ हो जाती है। इसलिए हमेशा ऐसे लोगों की संगत करनी चाहिये जो वक्त पर मदद करने वाले हों। जिनके बारे में यकीन है कि वक्त पर मदद नहीं करेगा उसका साथ पहले ही छोड़ देना चाहिए जैसे सूखे तालाब को जलचर छोड़ जाते हैं।

मथत मथत माखन रही, दही मही बिलगाव
रहिमन सोई मीत हैं, भीर परे ठहराय

कविवर रहीम कहते हैं कि जब दही को लगातार माथा जाता है तो उसमें से मक्खन अलग हो जाता है और दही मट्ठे में विलीन होकर मक्खन को अपने ऊपर आश्रय देती है, इसी प्रकार सच्चा मित्र वही होता है जो विपत्ति आने पर भी साथ नहीं छोड़ता।

भावार्थ सच्चा दोस्त वक्त पह ही परखा जाता है जिस प्रकार दही मट्ठे में परिवर्तित होकर मक्खन को अपने ऊपर आश्रय देती है वैसे ही सच्चा मित्र विपति में अपने मित्र को बचाने के लिए अपना अस्तित्व समाप्त कर देता है।
मनिसिज माली के उपज, कहि रहीम नहिं जाय
फल श्यामा के उर लगे, फूल श्याम उर आय

कविवर रहीम कहते हैं कि कामदेव रुपी माली की पैदावार का शब्दों में बखान नहीं किया जा सकता। राधा के हृदय पर जो फल लगे हुए हैं उसके फूल श्याम के हृदय पर ही उगे हैं।

कंप्यूटर के बाहर ब्लोगर नजरबंद


बिजली बंद तो पानी बंद
ब्लोग फिर भी चल रहा है
भले ही उसकी गति हो मंद
पर ब्लोगर खुद बैठा है
कंप्यूटर के बाहर नजरबंद
उसे इन्तजार है कब लाईट आये
तो वह अपने ब्लोग पर जाये
घड़ी चल रही है
पर ब्लोगर की सांस थम रही है
अक्ल काम कर रही है
पर सोच का सिलसिला है बंद
कलम हाथ में
कोरा कागज़ सामने है
पर लिखना फिर भी है बंद
ब्लोगर खुद ही किये बैठा अपनी नजर बंद
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समस्याएं वैसे भी कम नहीं है
पर बिजली फिर भी निभाती है
कुछ अल्फाज दिल से बाहर
निकल आते हैं
डैने बनकर ब्लोग को कबूतर
की तरह उडा ले जाते हैं
तसल्ली होती हैं कि
हमने भी एक कबूतर उडाया
सब शून्य में घिर जाता है
जब बिजली चली जाती है
————————————

ब्लोगरी की तो प्रेम के अध्याय बंद हो जायेंगे


प्रेयसी ने प्रियतमा को सुझाया
जब तक मेरा कोर्स पूरा न हो
तब तक ब्लोग बनाकर मजे कर लें
इसमें जब मशहूर हो जायेंगे
तब प्रियतम के माँ-बाप भी
मशहूर बहू को बिना दहेज़ के
लाने को तैयार हो जायेंगे

प्रियतम सोच में पड़ गया
और शहर के एक फ्लॉप ब्लोगर के
घर पहुंचा राय मांगने
सुनते ही उसने कहा
‘पगला गए हो जो ऐसा सोचते हो
क्या इश्क ने तुम्हें बिल्ली बना दिया है
जो ब्लोग का खंभा नोचते हो
तुम नहीं जानते ब्लोग चीज क्या है
कैसे हैं डाक्टर और मरीज क्या हैं
पहले तो चौपालों के लोग
पंजीकरण के लिए तुम्हें
पकड़ कर अपना मेहमान बनायेंगे
खूब लगाएंगे कमेन्ट
फिर भूल जायेंगे
वहाँ पर करते हैं कई बार
शब्दों की लड़ाई में दो-दो हाथ
फिर हो जाते हैं साथ-साथ
मेरी नहीं मानते तो
मेरे दोस्त नारद जी से पूछो
वह तुमेह ब्लोगवाणी सुनाएंगे
चिट्ठाजगत की धक्कमपेल और खींचतान के
किस्से सुनायेगे
हिन्दी ब्लोग भी है अजीब
दोनों को अगर नशा चढ़ गया तो
गजब हो जायेगा
ब्लोग के चक्कर में पड़ गए तो
जो झगडे मियाँ-बीबी में शादी के
बाद होते हैं वह पहले ही शुरू हो जायेंगे
दोस्त अपने माँ-बाप को
समझा लो
लड़कियों की संख्या कम होती जा रही है
कई कुंवारे बिना ब्याह रह जायेंगे
अपने प्रेयसी को भी मना लो
ब्लोगरी की तो तुम्हारे प्रेम प्रसंग के
सारे अध्याय बंद हो जायेंगे
———————————–
नोट-यह काल्पनिक हास्य रचना है किसी व्यक्ति या घटना से इसका कोई संबंध नहीं है और किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही इसके लिए जिम्मेदार होंगे.

अगर ब्लोग के लिए पुरस्कार घोषित हुए तो


एक ब्लोगर* ने दूसरे से कहा
”यार, तुम उम्मीद करते हो कि
कभी हमारे लिए भी पुरस्कार
घोषित किये जायेंगे’
दूसरे ने कहा
‘ख्याल तो अच्छा है पर
यह भी सोच लो
जब ऐसी संभावना बनी भी
तो अपुन तो बाहर हो जायेंगे
ढेर सारे छद्म ब्लोग आसमान से
जमीन पर उतर आयेंगे
औरों का तो छोडो
अपने ब्लोग के नाम भी हम भूल जायेंगे
और जो इनाम देने वाले होंगे
वह पहले अपने ब्लोगर मैदान में लायेंगे
पढ़ना-पढाना तो हो जायेगा दूर
अभी तो पुरस्कार की संभावना नहीं है
तब यह हाल है और अगर बनी भी तो
ब्लोगर एक दूसरे पर बरसते नजर आयेंगे
————————————————–
*इंटरनेट पर लिखने वाले
नोट-यह एक काल्पनिक हास्य-व्यंग्य रचना है और इसका किसी घटना से कोई लेना देना नहीं है और अगर किसी से मेल खा जाये तो वही उसके लिए जिम्मेदार होगा

जब तक चेतना नहीं होगी


पेट भरते ही भले लोग
चूल्हे की बुझा देते आग
पर जिनके मन में है
दौलत और शौहरत की आग
वह कभी नहीं बुझती
वह कभी शहर तो कभी ग्राम में
गली और मुहल्ले में भड़काते हैं आग

हर गरीब को खिलाते ख्याली पुलाव
ऐसे रास्ते का पता देते
जिसकी मंजिल कहीं नहीं
बस है इधर से उधर घुमाव
दिन में गाली देते अमीर को
रात को करते हैं जुडाव
चारों और से रंगे हैं
पर उजियाले में नहीं दिखता दाग

अनपढ़ को देते सपनों की किताब
कंगाल को समझाते अमीरी का हिसाब
अपनी ताकत के नशे में झूमते
किसी से नहीं मिलता मिजाज
बाद में बुझाने के लिए जूझते नजर आते
पहले लगाते आग
यह कभी यहाँ जलेगी
कभी वहाँ लगेगी
जब तक आम आदमी में नही जागेगी
चेतना और जागरूकता की आग
तब तक जलती रहेगी यह नफरत की आग

चाणक्य नीति:मन का लगाव न हो तो आत्मीयता नहीं बन पाती


1.जिसके प्रति लगाव(सच्चा प्यार) वह दूर होते हुए भी पास रहता है। इसके विपरीत जिसके प्रति लगाव नहीं है वह प्राणी समीप होते हुए भी दूर रहता है। मन का लगाव न होने पर आत्मीयता बन ही नहीं पाती और किसी प्रकार का संबंध बन ही नहीं पाता।
2.जिस किसी प्राणी से मनुष्य को किसी भी प्रकार के लाभ मिलने की आशा है उससे सदैव और प्रिय व्यवहार करना चाहिए। मृग का शिकार करने की इच्छा रखने वाला चालाक शिकारी उसे मोहित करने के लिए उसके पास रहकर मधुर स्वर में गीत गाता रहता है।
3.विद्वान व्यक्ति वही है जो अपने व्यक्तित्व के अनुकूल ऎसी बात करता हो जो प्रसंग के भी अनुकूल हो। अच्छी से अच्छी बात अप्रान्सगिक होकर प्रभावहीन हो जाती है। यदि वह बात अप्रिय हो और उसमें क्रोध की अभिव्यक्ति आवश्यक हो तो वह भी उतना ही प्रदर्शित करना चाहिए जितना निभा सकें।

ब्लोगर लेखक और लेखक ब्लोगर (3)


मैं पिछले कई दिनों से लगातार देख रहा हूँ कि कुछ लोग अपने साथ कोई लेबल लगा कर रहना चाहते हैं. यह मानव प्रवृति है कि वह कोई समूह बनाने के लिए अपने साथ कोई न कोई लेबल लगाना चाहता है ताकि वैसे ही लेबल लगाने वाले उससे जुड़ें. मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसकी यह स्वाभाविक प्रवृति है. इधर आजकल ब्लोगरों को एक समूह में पिरोने का विचार चल रहा है. ब्लोगर और साहित्यकार क्या अलग-अलग होंगे?यह प्रश्न मेरे सामने था और मैं उसका उत्तर लिखते ही ढूँढता हूँ-मेरी अक्ल लिखते ही काम करती है. अगर कोई मुझे कोई योजना बनानी होती है तो भले ही लिखने न हो पेन अपने हाथ में ले लेता हूँ और आगे बढ़ता हूँ.

मैं मूलत: एक लेखक हूँ और ब्लोग मेरे लिए कापी और पेन की तरह है. कापी और पेन कई लोगों के पास होती है पर सभी लेखक नहीं बन जाते. कापी या कागज़ लेकर क्लर्क, अधिकारी, और महाजन भी लिखते हैं पर लेखक नहीं कहलाते. ब्लोग से पहले कंप्यूटर शब्द का विश्लेषण कर लें C= केल्कूलेटर A= घड़ी m= मेज P= पेन U= अलमारी T= टाईप राईटर E= इलेक्ट्रोनिक R= रजिस्टर. मुझे यह बहुत पहले एक इंजीनियर ने अपनी किताब में दिखाया था और हो सकता है कि इसमें एक दो शब्द मुझे वैसे याद न हो. उसने कहा था कि कंप्यूटर और कुछ नहीं ऐसी चीजों का संग्रह है. मतलब ब्लोग कोई आसमान से टपकी चीज नहीं है, बस ऐसे ही जैसे पहले नौटंकी देखने घर से बाहर जाते थे अब टीवी पर ही देख लेते हैं. इसी तरह ब्लोग पर लेखक हैं पर साहित्यकार उनमें कौन अपने को मानता है यह उन्हीं पर छोड़ देना चाहिए, पर हाँ इसका उपयोग कुछ लोग डायरी की तरह भी कर सकते हैं तो कुछ मित्र बनाने के लिए भी कर सकते हैं तो कुछ अपने विज्ञापनों को क्लिक कराने के लिए ऐसी सामग्री रख सकते हैं जो पठनीय है, पर साहित्यकार वही होंगे जो अपनी मौलिक रचना प्रस्तुत करेंगे. जो मौलिक रचना देंगे वही होंगे साहित्यकार.
जब मैंने ब्लोग बनाना शुरू किया था तो मेरा विचार यह था कि देखें तो आखिर होता क्या है. मैं एक ईपत्रिका पर नारद को देखता था तब मुझे कभी नहीं लगा कि वहाँ साहित्य लिखने के लिए कोई जगह है वह तो जब मेरे हाथ ब्लोग लगे तो मैं उस पर अपनी ई-पत्रिका बनाने के लिए मैदान में उतरा था.

अब यहाँ तमाम तरह के सवाल आते हैं तो मुझे लगता है कि उनका मुझसे कोइ संबंध सिर्फ इतना है कि मैं एक लेखक हूँ और जब किसी बात का महत्व सार्वजनिक रूप से है तो मुझे उस पर लिखना चाहिए. कोई लिखने की इच्छा से यहाँ आ रहा है और उसे यहाँ आकर पता लगता है कि वह तो ब्लोगिंग कर रहा है पर आम पाठक के लिए एक लेखक है. मेरे दोस्त मुझे बाहर और कंप्यूटर पर एक लेखक के रूप में पढ़ते हैं. अगर ब्लोगरों का एक वर्ग यह चुनौती दे रहा है कि यहाँ ब्लोगर आगे रहेंगे और साहित्यकार नहीं तो वह उनका तर्क है. हकीकत यह है कि अंतरजाल पर पाठक तभी जुडेंगे जब उन्हें वैसा ही रुचिकर, ज्ञानवर्द्धक पढ़ने के मिलेगा और यह केवल साहित्य लिखने वालों के बूते की बात है. मैं इस बात से बहुत खुश हूँ कि यहाँ मैं कई ऐसे ब्लोग पर लिखने वाले देख रहा हूँ जो साहित्यकार बनने की संभावना वाले हैं. जिनमें लिखने की साहित्य वृत्ति है वह बहुत जल्दी परिणाम चाहने वाले नहीं है और वही ब्लोग की विधा को आगे ले जाने वाले हैं . अगर आगे रहने की बात है और उसका संबंध कमाने से है तो अभी ब्लोगर आगे रहेंगे. मैं एक साहित्य सृजन करना चाहता हूँ और मुझे पता है कि यहाँ मेरे लिए अर्थार्जन की कोई संभावना है क्योंकि उसमें लिखने के साथ दूसरी गतिविधियों की तरफ ध्यान देना होता है. जो कमाने के लिए उतरेंगे वह ब्लोगर संपादक बनाकर भी अपना ब्लोग चलाएंगे पर जो खुद लिखने वाले हैं उसके लिए यहाँ रास्ता आसान नहीं है, पर उनके बिना ब्लोगर एक कदम भी नहीं चल पायेंगे.

मेरा लक्ष्य साफ है कि अंतर्जाल पा हिन्दी भाषा की श्री वृद्धि करना और अपना साहित्य लिखना. मेरे जैसे लोगों की कमी नहीं है और जो साहित्य सृजन की दृष्टि से आये हैं उन्हें तमाम तरह के बंटवारों से दूर रहना चाहिऐ अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ना चाहिए क्योंकि साहित्य श्रेणी का कोई बंटवारा तो है ही नहीं भले ही वह अंतर्जाल तकनीकी के बारे में हो. एक बात जो साहित्य श्रेणी के लेखक ब्लोगरों को करना चाहिऐ कि वह बाहर भी सक्रिय रहें और अखबार आदि में भी प्रचार करें क्योंकि अभी जो इस बारे में जानकारी वहाँ छप रही है और कुछ ब्लोगरों के प्रचार तक सीमित है. इतना ही नहीं यहाँ छपने वाले लेखों में भी यह साबित की जा रही हैं कि बस वहीं है सब कुछ. अब अगर ब्लोगरों और साहित्यकारों में विभाजन हो ही रहा है तो फिर साहित्य श्रेणी के लेखक ब्लोगरों को एक दूसरे का हाथ पकड़कर चलना होगा. इसलिए अगर अखबार वगैरह में ऐसे लोगों का भी प्रचार करें जो साहित्यक श्रेणी के हों. वर्तमान में कुछ ब्लोगर बाहर लिख रहे हैं वह पूर्ण नहीं है और जो पत्रिका वगैरह में लेख भेजें वह साहित्य लेखन से लिखे जा रहे ब्लोग का उल्लेख प्रभावपूर्ण ढंग से करें. अभी तो शुरूआत है और अभी तय होना बाकी है कि कौन श्रेष्ट है कौन नहीं.

वैसे एक सत्य और भी है कि अभी साहित्यक श्रेणी के लोगों को बहुत बड़ी रचनाएं लिखने से बचना चाहिए और गागर में सागर की नीति अपनानी चाहिए और यह काम केवल साहित्यकार ही कर सकता है. वैसे एक बात और कि अगर सादा हिन्दी फॉण्ट का उपयोग अगर संभव हो जाये तो साहित्य श्रेणी के लेखक ब्लोगर अपनी बढत बहुत जल्दी कायम कर लेंगे. दिलचस्प बात यह है के एक मेरा ब्लोग है जिस पर केवल साहित्य ही है और वह कई लोगों की पसंद बना हुआ है. मैं उस पर कम ही लिखता हूँ कि उस पर लिखी पोस्टें तत्काल कोई अधिक नहीं देखी जातीं. उसी ब्लोग को देखकर मेरा यह मानना है कि अच्छा साहित्य लिखने वाले यहाँ सफल होंगे. इस ब्लोग जगत में मेरे बहुत मित्र हैं और कई लोगों से मैं असहमत होता हूँ पर गुस्सा आने की बजाय उस पर लिखता हूँ यह बताने के लिए मुझे मत भूलो क्योंकि आप ही लोग मुझे लाये हो. अगर मैं साहित्यकार नही होता और मुझमें साहित्य के प्रति झुकाव नहीं होता तो भला क्या मैं टिकता. सादा हिन्दी फॉण्ट में लिखने वाला कोई अगर यूनीकोड में लिखने के लिए तैयार हो सकता है तो वह साहित्यकार ही हो सकता है.

इसलिए मेरे साहित्य श्रेणी के नये और फ्लॉप ब्लोग लेखकों और लेखक ब्लोगरों तुम अपने लिखने की तरफ ध्यान देते रहो. कई और तरह के बदलाव आने वालें है और उनका सामना तभी कर पाओगे जब खुद लिखोगे. अभी कई तरह की चालाकिया होना शुरू हो गयीं हैं. गुटबंदी साफ दिखाई दे रही है. तुम उस तरह लिखो कि कोई तुम्हारी उपेक्षा नहीं कर सके. मुझे ऐसा कभी नही लगा था कि लोगों के उसूल किसी के लिए एक तो दूसरे के लिए दूसरे होते हैं. साहित्यकार का मन कोमल होता है और वह छोटी बातों को अनदेखा कर देते हैं पर जब एक सामूह का प्रश्न हो तो उसे उठाते हैं और उनका लिखा साहित्य ही होता है.

संत कबीर वाणी:एक राम को जानिए


आवत गारी एक है, उलटत होय अनेक
कहैं कबीर नहिं उलटिए, वही एक की एक

संत कबीर जी का कहना है की गाली आते हुए एक होती है, परन्तु उसके प्रत्युतर में जब दूसरा भी गाली देता है, तो वह एक की अनेक रूप होती जातीं हैं। अगर कोई गाली देता है तो उसे सह जाओ क्योंकि अगर पलट कर गाली दोगे तो झगडा बढ़ता जायेगा-और गाली पर गाली से उसकी संख्या बढ़ती जायेगी।

जैसा भोजन खाईये, तैसा ही मन होय
जैसा पानी पीजिए, तैसी बानी होय संत

कबीर कहते हैं जैसा भोजन करोगे, वैसा ही मन का निर्माण होगा और जैसा जल पियोगे वैसी ही वाणी होगी अर्थात शुद्ध-सात्विक आहार तथा पवित्र जल से मन और वाणी पवित्र होते हैं इसी प्रकार जो जैसी संगति करता है उसका जीवन वैसा ही बन जाता है।

एक राम को जानि करि, दूजा देह बहाय
तीरथ व्रत जप तप नहिं, सतगुरु चरण समाय

संत कबीर कहते हैं की जो सबके भीतर रमा हुआ एक राम है, उसे जानकर दूसरों को भुला दो, अन्य सब भ्रम है। तीर्थ-व्रत-जप-तप आदि सब झंझटों से मुक्त हो जाओ और सद्गुरु-स्वामी के श्रीचरणों में ध्यान लगाए रखो। उनकी सेवा और भक्ति करो

शीतल चांदनी का आनंद उठाए कौन


रात्रि में चन्दा बिखेरता
अब भी पहले की तरह
शीतल चांदनी
पर उसका आनन्द उठाएँ कौन
दूरदर्शन और कम्प्यूटर से
अपनी आखें लेकर जूझता आदमी
बाहर है प्राकृतिक सौन्दर्य
खङा है मौन

प्रथम किरणों के साथ
जीवन का संदेश देता सूर्य
रात को देर तक सोकर
सुबह देर बिस्तर छोड़ें आदमी
प्रात:काल नमन करे कौन
शीतल और शुद्ध पवन
आवारा फिरती है
वातानुकूलित कमरों में
उसका है प्रवेश वर्जित
सुखद अनुभूति पाए कौन
कई सदियों से शहर के बीच
बहती है नदी की धारा
नालियों से बहकर आती गंदिगी ने
उसकी शुद्ध आत्मा को मारा
अपने शहर में ही हो गया
आदमी अब परदेशी
उसका हमसफ़र बने कौन

प्राणवायु का सर्जन कर
उसे चारों और  बिखेर  रहा है
बरगद का पेड
जीवंत ह्रदय की प्रतीक्षा में
खड़ा है मौन
जीने की चाह है सभी को
सुख और आनन्द भी मांगें
पर इनका मतलब
समझा पाता कौन
——————-
हरियाली को बेघर कर
पत्थरों के जंगल खडे कर रहा है
जिसे देखो  वही
आत्मघाती हमले कर रहा है
हवाओं में खुद ही डालता
विषैली गैसें आदमी
हर कोई जीवन को मौत का
सन्देश दे रहा है

चाणक्य नीति:अपनी योजना गुप्त रखने पर ही सफलता संभव


१. यदि आप सफलता हासिल करना चाहते हैं तो गोपनीयता रखना सीख लें. जब किसी कार्य की सिद्धि के लिए कोई योजना बना रहे हैं तो उसके कार्यान्वयन और सफल होने तक उसे गुप्त रखने का मन्त्र आना चाहिए. अन्य लोगों की जानकारी में अगर आपकी योजना आ गयी तो वह उसमें सफलता संदिग्ध हो जायेगी.

२.प्रत्येक व्यक्ति को स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए. उसे प्रतिदिन धर्म शास्त्रों का कम से कम एक श्लोक अवश्य पढ़ना चाहिए. इससे व्यक्ति को ज्ञान प्राप्त होता है और उसका भला होता है.

३.विवेकवान मनुष्य को जन्मदाता, दीक्षा देकर ज्ञान देने वाले गुरु, रोजगार देने वाले स्वामी एवं विपत्ति में सहायता करने वाले संरक्षक को सदा आदर देना चाहिए.

४.मनुष्य को चाहिए की कोई कार्य छोटा हो या बड़ा उसे मन लगाकर करे. आधे दिल व उत्साह से किये गए कार्य में कभी सफलता नहीं मिलती. पूरी शक्ति लगाकर अपने प्राणों की बाजी लगाकर कार्य करने का भाव शेर से सीखना चाहिए.

५.अपनी सारी इन्द्रियों को नियंत्रण में कर स्थान, समय और अपनी शक्ति का अनुमान लगाकर कार्य सिद्धि के लिए जुटना बगुले से सीखना चाहिए.

जजबात वह शय है


जजबातों के साथ जीना अच्छी बात है
पर उन्हें कोई बांधकर
हमारी अक्ल को भी कोई साथ ले जाये
यह मंजूर नहीं करना
अब उस्ताद वैसे नहीं है जो
शागिर्द को सिखा सब दाव सिखा दें
फिक्सिंग का खेल सभी जगह हैं
क्या पता कौन चेला
उस्ताद को स्टिंग आपरेशन में फंसा दे
इसलिए जहाँ तक विज्ञापन में बिक सके
उतना ही नाच नचवाये
तुम दिमाग से देखना
दिल में कुछ मत बसाना
जजबात से शेर-ओ-शायरी करना
पर किसी ड्रामे के सीन पर
न हँसना और न रोना
आदमी के जजबात अब वह शय है
जो बाजार में बिकती है
और उसे पता भी न चल पाए
खुले में होता है व्यापार
पर दिखता नहीं है
क्योंकि जजबात ही हैं जो
आदमी को अक्ल पर ताला लगाए
—————————–

चाणक्य नीति:मन शुद्ध हो तो प्रतिमा में भी भगवान्


1.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आयुर्वेद तथा धनुर्वेद की विद्याओं की भी गणना भी नहीं की जा सकती है, इसके विपरीत मनुष्य का जीवन अल्प है और उस अल्पकाल के जीवन में रोग,शोक, कष्ट आदि अनेक प्रकार की बाधाएं उपस्थित होती रहती हैं। इस स्थिति में मनुष्य को शास्त्रों का सार ग्रहण करना चाहिए।
संपादकीय अभिमत-विश्व में अनेक प्रकार के ग्रंथ हैं और सबको पढ़ना और उनका ज्ञान धारण करना संभव नहीं है इसलिए सार अपनी दिमाग में रखना चाहिए. अनेक पुस्तकों में कहानियां और उदाहरण दिए जाते हैं पर उनके सन्देश का सार बहुत संक्षिप्त होता है और उसे ही ध्यान में रखान चाहिऐ

2.मन की शुद्ध भावना से यदि लकड़ी, पत्थर या किसी धातु से बनी मूर्ति की पूजा की जायेगी तो सब में व्याप्त परमात्मा वहां भी भक्त पर प्रसन्न होंगें। अगर भावना है तो जड़ वस्तु में भी भगवान का निवास होता है ।
3. सच्ची भावना से कोई भी कल्याणकारी काम किया जाये तो परमात्मा की कृपा से उसमें अवश्य सफलता मिलेगी। मनुष्य की भावना ही प्रतिमा को भगवान बनाती है। भावना का अभाव प्रतिमा को भी जड़ बना देता है।
संपादकीय अभिमत-यह सच है की प्रतिमा में भगवान् का अस्तित्व नही दिखता पर इस उसमें उसके होने की अनुभूति हमारे मन होती है. आदमी का मन ही उसका मूल है इसलिए उसे मनुष्य कहा जाता है. जब किसी प्रतिमा के सामने बहुत श्रद्धा से प्रणाम करते हैं तो कुछ देर इस दुनिया से विरक्त हो जाते हैं और हमारा ध्यान थोडी देर के लिए पवित्र भाव को प्राप्त होता है. यह बहुत महत्वपूर्ण होता है. हाँ, इसके लिए हमें मन में शुद्ध भावना को स्थापित करना पडेगा तभी हम प्रसन्नता प्राप्त कर सकते हैं.

4.इस क्षण-भंगुर संसार में धन-वैभव का आना-जाना सदैव लगा रहेगा। लक्ष्मी चंचल स्वभाव की है। घर-परिवार भी नश्वर है। बाल्यकाल, युवावस्था और बुढ़ापा भी आते हैं और चले जाते हैं। कोई भी मनुष्य उन्हें सदा ही उन्हें अपने बन्धन में नहीं बाँध सकता। इस अस्थिर संसार में केवल धर्म ही अपना है। धर्म का नियम ही शाश्वत है और उसकी रक्षा करना ही सच्चा कर्तव्य है।
5.जिस प्रकार सोने की चार विधियों-घिसना, काटना, तपाना तथा पीटने-से जांच की जाती है, उसी प्रकार मनुष्य की श्रेष्ठता की जांच भी चार विधियों-त्यागवृति, शील, गुण तथा सतकर्मो -से की जाती है।

पानी पिलायें ऐसा नही अवसर


भाषण करते हुए वह बोले
”हम अब प्रगति के पथ पर
अग्रसर हैं
सारी दुनिया हमारी प्रशंसक है
हमारे शेयर बाजार का आंकडा
अब दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है
विकास डर आसमान छू रही है
हमारे लिए अब आगे बढ़ने का अवसर है

भाषण के बाद आए मिलने लोग
उनसे अपने-अपने इलाके की
बिजली, पानी और सड़कों की
खस्ता हालत के मुद्दे उठाने लगे
तो वह बोले
‘इस समय देश विकास कर रहा है
और तुम अभी भी वहीं अटके हो
अपने रास्ते से भटके हो
हम तरक्की करते हुए
अन्तरिक्ष की तरह बढे हैं
और तुम लोग अभी भी
सड़क, बिजली और पानी पर अटके हो
भला अब यह भी ऐसी बातों का अवसर है’

उनके डर के मारे सब खामोश रहे
फ़िर बोले
‘बहुत बोल लिया अब तो
मुझे पिलाने के लिए पानी लाओ
मुझे फ़िर आगे जाकर बोलना है
मेरी तो बस विकास पर नजर है’

वहाँ कोई पानी नहीं लाया
तो चीखने लगे तब एक आदमी ने कहा
‘यहाँ पानी बिजली कुछ नही है
आपका भाषण सुनने के लिए नहीं
हम अपनी व्यथा कहने आए थे
पानी की बोतलें अपने साथ लाये थे
सब पी गए आपकी बात सुनते हुए
जो बचा है वह इस ऊबड़ खाबड़
सड़क पर चलते हुए पीते जायेंगे
हम तो पहुचेंगे गिरते -पड़ते अपने घर
आप तो हेलिकॉप्टर में उड़ जायेंगे
आकाश में पानी पी लीजिये
आपकी है तो विकास पर नजर
पर हमारी तो है घर पर नजर
इन बोतलों में बंद पानी ही
अब हमारे रास्ते का सहारा है
आपके भाषण से हम बहुत खुश
पर पानी पिलायें ऐसा नहीं अवसर

चाणक्य नीति:बुद्धिमान अपने आहार की चिंता नहीं करते


१.बुद्धिमान पुरुष को आहार जुटाने के चिंता नहीं करना चाहिए, उसे तो केवल अपने धर्म और अनुष्ठान में लगना चाहिए क्योंकि उसका आहार तो उसके मनुष्य जन्म लेते ही उत्पन्न हो जाता है.

अभिप्राय-इसका अभिप्राय यह है कि परमपिता परमात्मा ने जिसे जन्म दिया है उसके लिए आहार का इंतजाम तो उसके भाग्य में लिख दिया है, कहा भी जाता है कि दाने-दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम. आदमी में यह अहंकार रहता है कि में खुद अर्जित कर रहा हूँ जबकि वह तो उसके भाग्य में लिखा है.

लोगों से जब कहा जाता है कि ‘भाई,. धर्म कर्म और भगवान् की भक्ति कर लो.’ तो वह कहते हैं कि समय ही कहाँ मिल पाता. परिवार के लिए रोटी कमाने से फुरसत ही कहाँ है?

ऐसा कहकर अपने को धोखा देते हैं. यहाँ कोई किसी को नहीं पाल सकता. सब अपने लिए नियत भाग्य का खा रहे हैं. आपने देखा होगा कि कोइ व्यक्ति जब मार जाता है तो उसके पीछे कोई और मरने नहीं जाता कि अब तो अमुक मर गया है और अब में कहाँ से रोटी खाऊंगा. अब जिंदा लोग यह खुशफहमी पालें के में किसी को भोजन और वस्त्र और अन्य वस्तुएं उपलब्ध करा रहा हूँ तो उसे भ्रमित नहीं तो क्या कहा जायेगा. यह भ्रम नहीं तो और क्या है कि लोग अपना पूरा जीवन अपने जिस परिवार को अर्पित करते हुए धर्म-कर्म और अनुष्टान से दूर रहकर गुजार देते हैं और वह उनके बाद भी यथावत चलता है.

डर की कोख में ही क्रूरता का शैतान जन्म लेता है


कभी बनते थे हथियारों के खिलौने
अब हथियार ही खिलौने बनने लगे हैं
अपनी देह को बचाने के लिए
लोग रखने लगे हैं हथियार
इस इलेक्ट्रोनिक युग में
कौन रिवाल्वर को खरीद कर
बच्चों को देता है
अपने लिए ही हथियार को खिलौना समझ लेता है
क्या गलती उस बच्चे की जो
हथियार को खिलौना समझ लेता है

किस-किस से शिकायत करें
सबने अपनी जिन्दगी को ही खेल
समझ लिया है
क्या सिखाएंगे वह अपने बच्चों को
जिन्होंने खुद कुछ नहीं सीखा
क्या जियेगा वह जिन्दगी जो
पत्थर की दीवारों के पीछे
हथियार रखकर
भय को अपना मित्र बनाकर
अपनी सुरक्षा का किला समझ लेता है

हथियार रखने से लोग
बहादुर नहीं हो जाते
जो बहादुर होते वह होते दयालू
इसलिए किसी सी नहीं डरते
जिनके मन में खौफ है
वही क्रूर हो जाते
ओ हथियारों पर भरोसा रखने वालों
तुम खुद भी डरपोक हो और
अपने बच्चों को भी वही विरासत सौंप रहे हो
समझ लो इस बात को कि
डर की कोख में ही ईर्ष्या और क्रूरता का
शैतान जन्म लेता है

रहीम के दोहे:सच्चा मित्र दही की तरह निभाता है


मथत मथत माखन रही, दही मही बिलगाव
रहिमन सोई मीत हैं, भीर परे ठहराय

कविवर रहीम कहते हैं कि जब दही को लगातार माथा जाता है तो उसमें से मक्खन अलग हो जाता है और दही मट्ठे में विलीन होकर मक्खन को अपने ऊपर आश्रय देती है, इसी प्रकार सच्चा मित्र वही होता है जो विपत्ति आने पर भी साथ नहीं छोड़ता।

भावार्थ-सच्चा दोस्त वक्त पर ही परखा जाता है जिस प्रकार दही मट्ठे में परिवर्तित होकर मक्खन को अपने ऊपर आश्रय देती है वैसे ही सच्चा मित्र विपति में अपने मित्र को बचाने के लिए अपना अस्तित्व समाप्त कर देता है।

मनिसिज माली के उपज, कहि रहीम नहिं जाय
फल श्यामा के उर लगे, फूल श्याम उर आय

कविवर रहीम कहते हैं कि कामदेव रुपी माली की पैदावार का शब्दों में बखान नहीं किया जा सकता। राधा के हृदय पर जो फल लगे हुए हैं उसके फूल श्याम के हृदय पर ही उगे हैं।

रहिमन गली है सांकरी, दूजो न ठहराहिं
आपु अहैं तो हरि नहीं, हरि आपुन नाहि

संत शिरोमणि रहीम कहते हैं की प्रेम की गली बहुत पतली होती है उसमें दूसरा व्यक्ति नहीं ठहर सकता, यदि मन में अहंकार है तो भगवान का निवास नहीं होगा और यदि दृदय में ईश्वर का वास है तो अहंकार का अस्तित्व नहीं होगा।

हवा और पानी को शुद्ध नहीं कर सकते


जिन रास्तों पर चलते हुए
कई बरस बीत गये
पता ही नही लगा कि
कैसे उनके रूप बदलते गए
जहाँ कभी छायादार पेड़ हुआ करते थे
वहाँ लहराता है सिगरेट का धुआं
जहाँ रखीं थीं गुम्टियाँ
वहाँ ऊंची इमारतों के
पाँव जमते गए
जहाँ हुआ करता था उद्यान
वहाँ कचरे के ढेर बढ़ते गये
कहते हैं दुनिया में तरक्की हो रही है
सच यह है कि पतन की तरफ
हम कदम-दर कदम बढ़ते गए
हवा में लटकी
खातों में अटकी
गरीब से दूर भटकी
दौलत अगर तरक्की का प्रतीक है तो
सोचना होगा कि हम पढे-लिखे हैं कि
किताब पढ़ने वाले अनपढ़ बन गए
आंकडों के मायाजाल में
कितनी भी तरक्की दिखा लो
हवाओं को तुम ताजा नहीं कर सकते
पानी को साफ नहीं कर सकते
इलाज के लिए कितनी भी दवाएं बना लो
मरे हुए को जिंदा नही कर सकते
आकाश में खडे होकर तरक्की की
सोचने वाले जमीन के दुश्मन बन गए

चाणक्य नीति:मन में पाप हो तो तीर्थ से भी शुद्धि नहीं


१.आंखों से देखभाल का पैर रखें, पानी कपडे से छान कर पीयें. शास्त्रानुसार वाक्य बोलें, मन में सोच कर कार्य करें.
२.दान, शक्ति, मीठा बोलना, धीरता और सम्यक ज्ञान यह चार प्रकार के गुण जन्म जात होते हैं, यह अभ्यास से नहीं आते.
३.जिसकी मन में पाप हैं, वह सौ बार तीर्थ स्नान करने के बाद भी पवित्र नहीं हो सकता, जिस प्रकार मदिरा का पात्र जलाने पर भी शुद्ध नहीं होता.
४.जो वर्ष भर मौन रहकर भोजन करता है, वह हजार कोटी वर्ष तक स्वर्ग लोक में पूजित होता है.
५.पीछे-पीछे बुराई कर काम बिगाड़ने वाले और सामने मधुर बोलने वाले मित्र को अवश्य छोड़ देना चाहिए.
६.कुमित्र पर कदापि विश्वास न करें क्योंकि वह आपकी कभी भी आपकी पोल खोल सकता है.
७.अपने शास्त्रों के किसी एक श्लोक अथवा उस में से भी आधे का प्रतिदिन करना चाहिए. इससे अपने मन और विचार की शुद्ध होती है.

नोट-थक रहे ब्लोगर योग साधना शुरू करें-यह लेखा यहाँ अवश्य पढें

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चाणक्य नीति:जिस देश में मूर्खों का सम्मान नहीं होता वहाँ समृद्धि आती है


१.जिस देश में मूर्खों का सम्मान नहीं होता, अन्न संचित रहता है तथा पति-पत्नी में झगडा नहीं होता वहाँ लक्ष्मी बिना बुलाए निवास करती है.
अभिप्राय-इस कथन का आशय यह है की यदि किसी देश में सुख और समृद्धि आयेगी तो गुणवानों के समान से आयेगी.इसके अलावा जहाँ खाद्यान के भण्डार एवं परिवारों में शांति होती है वही खुशहाली होती है.

2.जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुचाने वाले मर्मभेदी वचन बोलते हैं, दूसरों की बुराई करने में खुश होते हैं। अपने वचनों द्वारा से कभी-कभी अपने ही वाचों द्वारा बिछाए जाल में स्वयं ही घिर जाते हैं और उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जिस तरह रेत की टीले के भीतर बांबी समझकर सांप घुस जाता है और फिर दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है।
३.समय के अनुसार विचार न करना अपने लिए विपत्तियों को बुलावा देना है, गुणों पर स्वयं को समर्पित करने वाली संपतियां विचारशील पुरुष का वरण करती हैं। इसे समझते हुए समझदार लोग एवं आर्य पुरुष सोच-विचारकर ही किसी कार्य को करते हैं। मनुष्य को कर्मानुसार फल मिलता है और बुद्धि भी कर्म फल से ही प्रेरित होती है। इस विचार के अनुसार विद्वान और सज्जन पुरुष विवेक पूर्णता से ही किसी कार्य को पूर्ण करते हैं।
4.जो बात बीत गयी उसका सोच नहीं करना चाहिए। समझदार लोग भविष्य की भी चिंता नहीं करते और केवल वर्तमान पर ही विचार करते हैं।हृदय में प्रीति रखने वाले लोगों को ही दुःख झेलने पड़ते हैं। प्रीति सुख का कारण है तो भय का भी। अतएव प्रीति में चालाकी रखने वाले लोग ही सुखी होते है.
५. व्यक्ति आने वाले संकट का सामना करने के लिए पहले से ही तैयारी कर रहे होते हैं वह उसके आने पर तत्काल उसका उपाय खोज लेते हैं। जो यह सोचता है कि भाग्य में लिखा है वही होगा वह जल्द खत्म हो जाता है। मन को विषय में लगाना बंधन है और विषयों से मन को हटाना मुक्ति है.

पहले अपनी नीयत बताओ


कहते हैं रामजी के होने के
भौतिक सबूत हमारे सामने लाओ
नहीं ला सकते तो उन्हें भूल जाओ
राम जी की माया अपरम्पार
जिस पर माया का भूत चढा दें
अपना नाम भी भुलवा दें
सोने के सिंहासन पर बैठते ही
भगवान् की तरह पूजने की चाह
उन्हें अंधा बना देती है
रामजी का नाम रहते यह संभव नहीं
अमीर तो क्या गरीब के मन भी
उनका नाम बसता है कहीं न कहीं
दिलों के नाम मिटाने के लिए
वह कहते है
उनके होने का सबूत लाओ

राम के नाम का उनको कितना खौफ है
गरीबी, शोषण और बीमारी के दवा के लिए
लोगों को इधर उधर भटकाते हैं
राम की प्रस्तर की प्रतिमा को
पूजने से मना करने वाले ही
मुर्दों के नाम पर पत्थर लगाकर
उस पर माला चढाते हैं
कहीं अपना काम न बने तो
पत्थर लगवाने के लिए
जिंदा इंसान को ही मुर्दा बनाते हैं
राम का नाम फिर भी लेते हैं
यह कहने के लिए उसे भूल जाओ

रामभक्त भी सबूत जुटा लेंगे
अपने भक्तों के लिए रामजी भी
अपनी कृपा उन पर लुटा देंगे
पर सवाल करने वाले भी
इसके पीछे जो उनके दिल की नीयत है
क्या वह अपनी हथेली पर रखकर दिखा देंगे
कर सकते हैं तभी कहें कि
‘राम जी के होने के सबूत लाओ’
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चाणक्य नीति:परिवार का सुख उसके स्वरूप पर निर्भर


१.सुखद गृहस्थी और परिवार की सुख समृद्धि इस बात पर निर्भर करती है की परिवार का स्वरूप कैसा है. जहाँ परिवार के सदस्य एक दूसरे के मनोभावों को समझते और सम्मान करे हैं वहीं शांति रह पाती है और शांति से ही सुख समृद्धि आती है.
2. यह मनुष्य का स्वभाव है की यदि वह दूसरे के गुण और श्रेष्ठता को नहीं जानता तो वह हमेशा उसकी निंदा करता रहता है. इस बात से ज़रा भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

उदाहरण- यदि किसी भीलनी को गजमुक्ता (हाथी के कपाल में पाया जाने वाला काले रंग का मूल्यवान मोती) मिल जाये तो उसका मूल्य न जानने के कारण वह उसे साधारण मानकर माला में पिरो देती है और गले में पहनती है.

3.बसंत ऋतू में फलने वाले आम्रमंजरी के स्वाद से प्राणी को पुलकित करने वाले कोयल की वाणी जब तक मधु और कर्ण प्रिय नहीं हो जाती तबतक मौन रहकर ही अपना जीवन व्यतीत करती है.
इसका आशय यह है हर मनुष्य को किसी भी कार्य को करने के लिए उचित समय की प्रतीक्षा करना चाहिए अन्यथा असफलता का भय बना रहता है.
4.राजा , अग्नि, गुरु और स्त्री इन चारों से न अधिक दूर रहना चाहिऐ न अधिक पास अर्थात इनकी अत्यधिक समीपता विनाश का कारण बनती है और इनसे दूर रहने पर भी कोई लाभ नहीं होता. अत: विनाश से बचने के लिए बीच का रास्ता अपनाना चाहिऐ.
५.अधिक लाड प्यार बच्चे में में दोष उत्पन्न करता है और प्रताड़ना से ही उसमें सुधार आता है.

चाणक्य नीति: इस कड़वे संसार में दो मीठे फल भी लगते हैं


१.इस संसार की तुलना एक कड़वे वृक्ष से की जाती है जिस पर पर अमृत के समान दो फल भी लगेते हैं-मधुर वचन और सद्पुरुषों की संगति. ये दोनों अत्यंत गुणकारी होते हैं. इन्हें खाकर आदमी अपने जीवन को सुखद बना सकता है. अत हर मनुष्य को मधुर वचन और सत्संग का फल ग्रहण करना चाहिए

2.जिसके कार्य में स्थिरता नहीं है, वह समाज में सुख नहीं पाता न ही उसे जंगल में सुख मिलता है. समाज के बीच वह परेशान रहता है और किसी का साथ पाने के लिए तरस जाता है.
3.गंदे पड़ोस में रहना, नीच कुल की सेवा, खराब भोजन करना, और मूर्ख पुत्र बिना आग के ही जला देते हैं.
4.कांसे का बर्तन राख से, तांबे का बर्तन इमले से,स्त्री रजस्वला कृत्य से और नदी पानी की तेज धारा से पवित्र होती है.
5.मनुष्य में अंधापन कई प्रकार का होता है. एक तो जन्म के अंधे होते हैं और आंखों से बिलकुल नहीं देख पाते और कुछ आँख के रहते हुए भी हो जाते हैं जिनकी अक्ल को कुछ सूझता नहीं है.
6.काम वासना के अंधे के कुछ नहीं सूझता और मदौन्मत को भी कुछ नहीं सूझता. लोभी भी अपने दोष के कारण वस्तु में दोष नहीं देख पाता. कामांध और मदांध इसी श्रेणी में आते हैं.
7.कुछ लोगों की प्रवृतियों को ध्यान में रखते हुए उनको वश में किया जा सकता है, और उनको वश में किया जा सकता है, लोभी को धन से, अहंकारी को हाथ जोड़कर, मूर्ख को मनमानी करने देने से और सत्य बोलकर विद्वान को खुश किया जा सकता है.

चाणक्य नीति:धर्म का नियम ही शाश्वत


१.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आयुर्वेद तथा धनुर्वेद की विद्याओं की भी गणना भी नहीं की जा सकती है, इसके विपरीत मनुष्य का जीवन अल्प है और उस अल्पकाल के जीवन में रोग,शोक, कष्ट आदि अनेक प्रकार की बाधाएं उपस्थित होती रहती हैं। इस स्थिति में मनुष्य को शास्त्रों का सार ग्रहण करना चाहिए।

२.मन की शुद्ध भावना से यदि लकड़ी, पत्थर या किसी धातु से बनी मूर्ति की पूजा की जायेगी तो सब में व्याप्त परमात्मा वहां भी भक्त पर प्रसन्न होंगें। अगर भावना है तो जड़ वस्तु में भी भगवान का निवास होता है । इस क्षण-भंगुर संसार में धन-वैभव का आना-जाना सदैव लगा रहेगा। लक्ष्मी चंचल स्वभाव की है। घर-परिवार भी नश्वर है। बाल्यकाल, युवावस्था और बुढ़ापा भी आते हैं और चले जाते हैं। कोई भी मनुष्य उन्हें सदा ही उन्हें अपने बन्धन में नहीं बाँध सकता। इस अस्थिर संसार में केवल धर्म ही अपना है। धर्म का नियम ही शाश्वत है और उसकी रक्षा करना ही सच्चा कर्तव्य है।सच्ची भावना से कोई भी कल्याणकारी काम किया जाये तो परमात्मा की कृपा से उसमें अवश्य सफलता मिलेगी। मनुष्य की भावना ही प्रतिमा को भगवान बनाती है। भावना का अभाव प्रतिमा को भी जड़ बना देता है।
३.जिस प्रकार सोने की चार विधियों-घिसना, काटना, तपाना तथा पीटने-से जांच की जाती है, उसी प्रकार मनुष्य की श्रेष्ठता की जांच भी चार विधियों-त्यागवृति, शील, गुण तथा सतकर्मो -से की जाती है।

४.अज्ञानी व्यक्ति को कोई भी बात समझायी जा सकती है क्योंकि उसे किसी बात का ज्ञान तो है नहीं। अत: उसे जो कुछ समझाया जाएगा वह समझ सकता है, ज्ञानी को तो कोई बात बिल्कुल सही तौर पर समझायी जा सकते है। परन्तु अल्पज्ञानी को कोई भी बात नही समझायी क्योंकि अल्पज्ञान के रुप में अधकचरे ज्ञान का समावेश होता है जो किसी भी बात को उसके मस्तिष्क तक पहुंचने ही नहीं देता।

*संकलनकर्ता का मत है कि अल्पज्ञानी को अपने ज्ञान का अहंकार हो जाता है इसलिये वह कुछ सीखना ही नहीं चाहता, वह केवल अपने प्रदर्शन में ही लगा रहता है।
नोट-रहीम, चाणक्य, कबीर और कौटिल्य की त्वरित पोस्टें नारद और ब्लोगवाणी पर अभी उपलब्ध हैं, अत: वहाँ देखने का प्रयास करें.

विकास यानि वाहनों की चौडाई बढना सड़क की कम होना


बहुत समय से देश के विकास होने के प्रचार का मैं टीवी चैनलों और अख़बारों में सुनता आ रहा हूँ. तमाम तरह के आंकडे भी दिए जाते हैं पर जब मैं रास्तों से उन रास्तों से गुजरता हूँ-जहाँ चलते हुए वर्षों हो गयी है-तो उनकी हालत देखकर यह ख्याल आता है कि आखिर वह विकास हुआ कहाँ है. अगर इसे विकास कहते हैं तो वह इंसान के लिए बहुत तकलीफ देह होने वाला है.

पेट्रोल, धुएं और रेत से पटे पड़े रास्ते राहगीरों की साँसों में जो विष घोल रहे हैं उससे अनेक बार तो सांस बंद करना पड़ती हैं कि यह थोडा आगे चलकर यह विष भरा धुआं और गंध कम हो तो फिर लें. टेलीफोन, जल और सीवर की लाईने डालने और उनको सुधारने के लिए खुदाई हो जाती है पर सड़क को पहले वाली शक्ल-जो पहले भी कम बुरी नहीं थी-फिर वैसी नहीं हो पाती. अपने टीवी चैनल और अखबार चीन के विकास की खबरें दिखाते हुए चमचमाती सड़कें और ऊंची-ऊंची गगनचुंबी इमारतें दिखा कर यह बताते हैं कि हम उससे बहुत पीछे हैं-पर यह मानते हैं कि अपने देश में विकास हो रहा है पर धीमी गति से. मैं जब वास्तविक धरातल पह देखता हूँ तो पानी और पैसे के लिए देश का बहुत बड़ा वर्ग अब भी जूझ रहा है. कमबख्त विकास कहीं तो नजर आये.

आज एक अखबार में पढ़ रहा था कि भारत में पुरुषों से मोबाइल अधिक महिलाओं के पास बहुत हैं. मोबाइल से औरतें अधिक लाभप्रद स्थिति में दिखतीं हैं क्योंकि अब किसी से बात करना है तो उसके घर जाने की जरूरत ही नहीं है मोबाइल पर ही बात कर ली, पर पुरुषों की समस्या यह है कि उनको अपने कार्यस्थल तक घर से सड़क मार्ग से ही जाना है और उनके लिए यह रास्ते कोई सरल नहीं रहे. साथ में मोबाइल लेकर उनके लिए चलना वैसे भी ठीक नहीं है. रास्ते में मोबाइल की घंटी मस्तिष्क में कितनी बाधा पहुचाती है यह मैं जानता हूँ. उस दिन बीच सड़क पर स्कूटर पर घंटी बजी और मेरे इर्द-गिर्द वाहनों की गति बहुत तेज थी कि एक तरफ रूकने के लिए मुझे समय लग गया. जब एक तरफ रुका तो जेब से मोबाइल निकाला तो देखा कि ‘विज्ञापन’ था. उस समय झल्लाहट हुई पर मैं क्या कर सकता था? फिर मैंने स्कूटर भी सड़क से ढलान से उतरकर ऐसी जगह रोका था जहाँ सड़क पर लाने के लिए शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन करना पडा.

आपने देखा होगा कि जो आंकडे विकास के रूप में दिए जाते हैं उनमें देशों में मोबाइल, कंप्यूटर और टीवी के उपभोक्ता की संख्या शामिल रहती है. अब विकास का अर्थ प्रति व्यक्ति की आय-व्यय की जगह धन की बर्बादी से है. यह नहीं देखते कि उनका उपयोग क्या है? मैं तो आज तक समझ नहीं पाया कि लोग मोबाइल पर इतनी लंबी बात करते क्या हैं. फालतू, एकदम फालतू? फिर तमाम ऍफ़ एम् रेडियो, और टीवी पर ऐसे सवाल करते है ( उस पर एस.एम्.एस करने के लिए कहा जाता है) जो एक दम साधारण होते हैं. लोग जानते हैं कि यह सब उनका धन खींचने के लिए किया जा रहा है पर अपने को रोक नहीं पाते क्योंकि उन्हें क्षेत्र, धर्म, और भाषा के नाम पर बौद्धिक रूप से गुलाम बना दिया गया है कि वह उससे मुक्त नहीं हो पाता.

अगर मुझसे पूछें तो विकास का मतलब है कि वाहनों की चौडाई बढना और सड़क की कम होना. जब भी कहीं जाम में फंसता हूँ तो मुझे नहीं लगता कि वह लोगों और उनके वाहनों की संख्या की वजह से है. दो सौ मीटर के दायरे में सौ लोग और पच्चीस वाहन भी नहीं होंगे पर जाम फिर भी लग जाता है. वहाँ कारें, ट्रेक्टर और मोटर साइकलों पर एक-एक व्यक्ति सवार हैं पर सड़क तंग है तो रास्ता जाम हो जाता है. सड़कें भी जो पहले चौड़ी थी वहाँ इस तरह निर्माण किये गए हैं कि पता नहीं कि कब यह हो गए. जहाँ पहले पेड़ थे वहाँ गुमटियाँ, ठेले और कहीं पक्के निर्माण हो गए हैं और सड़क छोटी हो गयी और वाहन जहाँ साइकिल और स्कूटर थे वहाँ आजकल कारों का झुंड हो गया है. यह विकास और उत्थान है तो फिर विनाश और पतन किसे कहते हैं यह मेरे लिए अभी भी एक पहेली है.

चाणक्य नीति:जहाँ धनी, ज्ञानी और निपुण राजा न हो वह स्थान छोड़ दें


1.किसी भी व्यक्ति का जहाँ सम्मान न हो उसे त्याग देना चाहिए. क्योंकि बिना सम्मान के मनुष्य जीवन जीने का कोई अर्थ नहीं है.
2.किसी भी व्यक्ति को वह स्थान भी त्याग देना चाहिए जहाँ आजीविका न हो क्योंकि आजीविका रहित मनुष्य समाज में किसी सम्मान के योग्य नहीं रह जाता.

3.इसी प्रकार वह देश और क्षेत्र भी त्याज्य है जहाः अपने मित्र व संबंधी न रहते हों क्योंकि इनके अभाव में व्यक्ति कभी भी असहाय हो सकता है.
4.वेद के ज्ञान की गहराई न समझकर वैद की निंदा करने वाले वेद की महानता कम नहीं कर सकते.शास्त्र निहित आचार-व्यवहार को व्यर्थ बताने वाले अल्प ज्ञानी उसकी विषय सामग्री की उपयोगिता को नष्ट नहीं कर सकते

5.जिस स्थान पर धनी-व्यापारी, ज्ञानीजन, शासन व्यवस्था में निपुण राजा, सिंचाई अथवा जल आपूर्ति की व्यवस्था न हो उस स्थान का भी त्याग कर देना चाहिऐ. क्योंकि धनि से श्री वृद्धि ज्ञानी से विवेक , निपुण राजा से मनुष्य की सुरक्षा और जल से जीवन के रक्षा होती है.

6.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आयुर्वेद तथा धनुर्वेद की विद्याओं की भी गणना भी नहीं की जा सकती है, इसके विपरीत मनुष्य का जीवन अल्प है और उस अल्पकाल के जीवन में रोग,शोक, कष्ट आदि अनेक प्रकार की बाधाएं उपस्थित होती रहती हैं। इस स्थिति में मनुष्य को शास्त्रों का सार ग्रहण करना चाहिए।

रूस और भारत की मैत्री में अब वह बात नहीं रही


भारत के नौसेनाध्यक्ष एडमिरल मेहता ने रक्षा सौदों मैं रूस की और से निरंतर बढ़ते विलंब और लागत से परेशान होकर कहा है कि रूस को अब भारत से संबंध पर पुनर्विचार करना चाहिए. अखबार मैं प्रकाशित समाचार के अनुसार नौसेना दिवस की पूर्व संध्या पर उन्होने कहा कि रूस वैसा नहीं रहा जैसा वह सोवियत संघ के विघटन से पहले था.

अगर हम पिछले कुछ वर्षों का घटनाक्रम देखें तो रूस के साथ जब हम अपने संबंधों पर विचार करते हैं तो हमारी स्मृति में सोवियत संघ के साथ भारत की तथाकथित मैत्री थी वही बनी रहती है. वास्तव में अब वह पहले वाले बात नहीं रही. वैसे जब उसके साथ भारत की घनिष्ठ मैत्री की बात होती थी तब भी भारत में विद्वानों का एक बहुत बड़ा वर्ग उसे अपना निस्वार्थी मित्र मानने से इन्कार कर देता था. रूस की मैत्री के रूप में सबसे बडा प्रमाण १९७१ में पाकिस्तान के साथ युद्ध में जब अमेरिका ने भारत के खिलाफ सातवाँ बेडा भेजने की धमकी दी तब रूस ने भी कार्यवाही की धमकी दी और अमेरिका इससे डर गया था.

इसके बारे में विद्वान लोग अपना अलग मत ही व्यक्त करते हैं. उनका कहना है कि उस समय अमेरिका इतना प्रबल नहीं था कि वह भारत से लंबी लड़ाई लड़ता. उस समय से पहले और अभी तक अमेरिका किसी दूसरे देश की तरफ से अकेले लड़ने नहीं गया और जब गया तो उसने मुहँ की खाई है. उसने किसी देश पर हमला किया है तो अपने हितों की खातिर उसे कमजोर जानते हुए और वह भी ब्रिटेन और फ्रांस जैसे अन्य ताक़तवर देशों को साथ लेकर किया है. उस समय अन्य पश्चिमी देशों का रवैया भारत के पक्ष में नहीं था तो केवल सोवियत संघ से मैत्री के कारण वह इस हद तक नहीं था कि वह अमेरिका की तरफ से लड़ने आते . कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि यह धमकी तब आयी थी जब युद्ध करीब-करीब समाप्ति की तरफ था. अगर उस दौर को छोड़ दिया जाये तो अमेरिका से भारत का कभी सीधा टकराव नहीं हुआ, और यही कारण है कि आज भी उसे मैत्री की वकालत करने वालों की संख्या अधिक है. भारत में वैज्ञानिक और तकनीकी क्षेत्रों में अमेरिकी योगदान को काम कर आंकना सरल नहीं है.

पिछले दिनों से अमेरिका से भारत की बढ़ती मैत्री से रूस नाखुश है पर इस देश में यह सवाल उठाने वाले कई लोग हैं कि भारत को क्रायोजनिक इंजन अमेरिकी दबाव में न बेचने वाला रूस क्या भारत से ऐसा व्यवहार कर सकता है? जब भारत ने परमाणु विस्फोट किये तो अमेरिका ने भारत पर जो प्रतिबन्ध लगाए क्या रूस ने उनमें से किसी का उल्लंघन कर भारत की मदद की. रूस अब भारत से ऐसी अपेक्षाएं कर रहा है जिन पर वह खुद खरा नहीं उतरा. वह मदद की बात करता है पर १९६५ में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री शास्त्री जी को बुलाकर जो पाकिस्तान से समझौता करवाया उससे भारत को क्या मिला था? कहते हैं कि उन्होने अपनी इच्छा के विपरीत रूस के दबाव में समझौता किया था और वही पीडा वह झेल नहीं पाए और दिल के दौरे से निधन हो गया. इन बातों में कितनी सच्चाई है यह कोई नहीं जानता कुल मिलाकर कई राजनीतिक विशेषज्ञ रूस के निस्वार्थ मित्रता को एक ढोंग मानते है.

आथिक विशेषज्ञों ने तो कभी भी सोवियत संघ को भारत के लिए कभी उपयोगी नहीं माना. कहा जाता है जब उसके और भारत के रिश्ते बहुत अच्छे थे तब भी उसने भारतीय मुद्रा रूपये का कभी अंतर्राष्ट्रीय मूल्य स्वीकार न करते हुए अपने द्वारा तय मूल्य दिया. उसकी मुद्रा कभी भी विश्व में सम्मान नहीं पा सकी पर भारत ने उसका मूल्य अधिक दिया. कुल मिलाकर उसने मित्रता का दोहन किया और उसके लिए अमेरिका भी काम जिम्मेदार नहीं है क्योंकि जिस समय संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद का थोडा बहुत सम्मान था तब उसके स्थायी सदस्यों में रूस ही था जिससे भारत किसी मसले पर अपने साथ खडे होने का विश्वास कर सकता था, और परमाणु विस्फोट करते समय भारत ने उसकी परवाह भी छोड़ दी और आखिर अपनी आर्थिक और राजनितिक ताकत से अमेरिका को प्रतिबन्ध हटाने के लिए मजबूर कर दिया. भारत के कई लोग अभी रूस को सम्मान करते हैं पर उसका रवैया इस तरह रहा तो उसका यहाँ रहा सहा सम्मान भी समाप्त हो जायेगा.

भारत की सेना ने अभी तक अपनी लड़ाई खुद जीतीं है और सोवियत संघ ने भारत से सलाह मशविरा किये बिना अफगानिस्तान में दखल दिया जो उसके साम्राज्य के अंत का कारण बना और उससे भारत को भी बहुत परेशानी हुई. अगर उसने भारत का साथ दिया तो भारत ने उसकी कीमत भी चुकाई है इसलिए वह अगर बराबरी के आधार पर ही संबंध रखकर वह आगे चल सकता है.

चाणक्य नीति:जहाँ यज्ञ-हवन न हो वह घर मुर्दाघर समान


१.इस संसार में कुछ प्राणियों के किसी विशेष अंग में विष होता है-जैसे सर्प के दांतों में मक्खी के मस्तिष्क में और बिच्छू की पुँछ में-पर इन सबसे अलग दुर्जन और कपटी मनुष्य के हर अंग में विष होता है. उसके मन में विद्वेष,वाणी में कटुता और कर्म में नीचता का व्यवहार जहर बुझे तीर की तरह दूसरे को त्रास देते हैं.

२.किसी भी व्यक्ति को वह स्थान भी त्याग देना चाहिए जहाँ आजीविका न हो क्योंकि आजीविका रहित मनुष्य समाज में किसी सम्मान के योग्य नहीं रह जाता.

३.हर मनुष्य को सभी विधाओं में निपुण होना चाहिऐ. बडे लोगों से विनम्रता, विद्वानों से श्रेष्ठ और मधुर ढंग से वार्तालाप का तरीक सीखना चाहिए. जुआरियों से झूठ बोलना और कुशल स्त्रियों से चालाकी का गुण सीखना चाहिए.
४.मनुष्य को ऐसे कर्म करना जिससे उसकी कीर्ति सब और फैले. विद्या, दान, तपस्या, सत्य भाषण और धनोपार्जन के उचित तरीकों से कीर्ति दसों दिशाओं में फैलती है.

५.अपना जीवन शांतिपूर्वक बिताने के लिए हर मनुष्य को धर्म-कर्म का अनुष्ठान करते रहना चाहिऐ. वह घर मुर्दाघर के समान हैं जहाँ धर्म-कर्म या यज्ञ-हवन नहीं होता. जहाँ वेद शास्त्रों का उच्चारण नहीं होता, विद्वानों का सम्मान नहीं होता और यज्ञ-हवन से देवताओं का पूजन नहीं होता ऐसे घर, घर न रहकर शमशान के समान होता है.

मनुस्मृति:सभी के निद्रा मी चले जाने पर दंड ही जाग्रत रहता है


1.देश, काल, विद्या एवं अन्यास में लिप्त अपराधियों की शक्ति को देखते हुए राज्य को उन्हें उचित दण्ड देना चाहिए। सच तो यह है कि राज्य का दण्ड ही राष्ट्र में अनुशासन बनाए रखने में सहायक तथा सभी वर्गों के धर्म-पालन कि सुविधाओं की व्यवस्था करने वाला मध्यस्थ होता है।
2.सारी प्रजा के रक्षा और उस पर शासन दण्ड ही करता है, सबके निद्रा में चले जाने पर दण्ड ही जाग्रत रहता है। भली-भांति विचार कर दिए गए दण्ड के उपयोग से प्रजा प्रसन्न होती है। इसके विपरीत बिना विचार कर दिए गए अनुचित दण्ड से राज्य की प्रतिष्ठा तथा यश का नाश हो जाता है।
3.यदि अपराधियों को सजा देने में राज्य सदैव सावधानी से काम नहीं लेता, तो शक्तिशाली व्यक्ति कमजोर लोंगों को उसी प्रकार नष्ट कर देते हैं, जैसे बड़ी मछ्ली छोटी मछ्ली को खा जाती है। संसार के सभी स्थावर-जंगम जीव राजा के दण्ड के भय से अपने-अपने कर्तव्य का पालने करते और अपने-अपने भोग को भोगने में समर्थ होते हैं ।

*अक्सर एक बात कही जाती है की हमारे देश को अंग्रेजों ने सभ्यता से रहना सिखाया और इस समय जो हम अपने देश को सुद्दढ और विशाल राष्ट्र के रूप में देख रहे हैं तो यह उनकी देन है. पर हम अपने प्राचीन मनीषियों की सोच को देखे तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि वह राज्य, राजनीति और प्रशासनिक कार्यप्रणाली से अच्छी तरह वाकिफ थे, मनु स्मृति में राजकाज से संबंधित विषय सामग्री होना इस बात का प्रमाण है. एक व्यसनी राजा और उसके सहायक राष्ट्र को तबाह कर देते हैं. अगर राजदंड प्रभावी नहीं या उसमें पक्षपात होता है तो जनता का विश्वास उसमें से उठ जाता है. यह बात मनु स्मृति में कही गयी है.

समझो प्रेयसी को ठगता है


सावन और बसंत के मौसम पर
शीतल हवाओं के चलने की बात
लिखना अब मजाक लगता है
अगर कोई प्रियतम अपने प्रेयसी को
लिखे खूबसूरत मौसम की बात
समझो उसे ठगता है
घुली है प्राणवायु में विषैली गैस
सांस में भला अब सुगंध कहाँ से आये
सब जगह तो आसमान से
जलता अंगारा बरसता है
बरसात का पानी भी
कई बार विषैला लगता है
सर्दी हो या गर्मी
कवि हृदय में कितनी भी लहलहाएं
श्रंगार रस से ओत-प्रोत कवितायेँ
भला मौसम को कहाँ पता लगता है

संत कबीर वाणी:जादू-टोना व्यर्थ है


जो कोय निन्दै साधू को, संकट आवै सोय
नरक जाय जन्मै मरै, मुक्ति कबहु नहिं होय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो भी साधू और संतजनों की निंदा करता है, उसके अनुसार अवश्य ही संकट आता है। वह निम्न कोटि का व्यक्ति नरक-योनि के अनेक दु:खों को भोगता हुआ जन्मता और मरता रहता है। उसके मुक्ति कभी भी नहीं हो सकती और वह हमेशा आवागमन के चक्कर में फंसा रहेगा।

बोलै बोल विचारि के, बैठे ठौर संभारि
कहैं कबीर ता दास को, कबहु न आवै हारि

इसका आशय यह है कि जो आदमी वाणी के महत्त्व को जानता है,, समय देखकर उसके अनुसार सोच और विचार कर बोलता है और अपने लिए उचित स्थान देखकर बैठता है वह कभी भी कहीं भी पराजित नहीं हो सकता।

जंत्र मन्त्र सब झूठ है, मति भरमो जग कोय
सार शब्द जाने बिना, कागा हंस न होय

संत शिरोमणि कबीरदास जीं का यह आशय है कि यन्त्र-मन्त्र एवं टोना-टोटका आदि सब मिथ्या हैं। इनके भ्रम में मत कभी मत आओ। परम सत्य के ठोस शब्द-ज्ञान के बिना, कौवा कभी भी हंस नहीं हो सकता अर्थात दुर्गुनी-अज्ञानी लोग कभी सदगुनी और ज्ञानवान नही हो सकते

सच किसे समझाएं


सदियों से चले आ रही
लोगों के समूहों की परिभाषाएँ
बाहर से मजबूत किले की तरह लगते
अन्दर रिवाजों में एक दूसरे को ठगते
बाहर से आदर्श लगते
पर एक शब्द से हिलते नजर आएं
वक्त देखें तो पहचान छिपाएं
फायदा देखें सीना तानकर सामने आयें
सभ्य समाज हो रहा है दिशाहीन
अक्षरज्ञान जितना बढ़ता जा रहा है
अक्षरों से बने शब्दार्थ पर हो रही है जंग
लोगों के दिमाग हो रहे हैं तंग
अभिव्यक्ति का मतलब चिल्लाना हो गया है
ऐसे में सच किसे समझाएं
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रहीम के दोहे:अति कदापि न कीजिए


रहिमन अति न कीजिए, गहि रहिये निज कानि
सैजन अति फूले तऊ, दार पात की हानि

अर्थ-कवि रहीम कहते हैं कि किसी चीज की भी अति कदापि न कीजिए, हमेशा अपनी मर्यादा को पकडे रही. जैसे सहिजन वृक्ष के अत्यधिक विकसित होने से उसकी शाखाओं और पत्तों को हानि होती है और वह झड़ जाते हैं.

रन, बन, व्याधि, विपत्ति में रहिमन मरै न रोय
जो रच्छक जननी जठर, सौ हरि गए कि सोय

अर्थ-कवि रहीम कहते हैं कि रणक्षेत्र में, वन में, बीमारी में और आपति आने पर जो मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होता है उसके रोना नहीं चाहिए, जो माता के गर्भ का रक्षक है वह परमात्मा कभी सोता नहीं है.

अभिप्राय- जो ईश्वर जन्म देता है वही मृत्यु भी. ईश्वर की मर्जी होती हैं तो जन्म होता है और उसकी मर्जी होती है तभी वह किसी जीव को अपने पास बुला लेता है. जिसके उसके द्वारा प्रदत्त आयु पूर्ण नहीं हुई है उसे मृत्यं भी नहीं मार सकती.

जमीन की जिन्दगी की हकीकत


ख्वाहिशें तो जिंदगी में बहुत होतीं हैं
पर सभी नहीं होतीं पूरी
जो होतीं भी हैं तो अधूरी
पर कोई इसलिए जिन्दगी में ठहर नहीं जाता
कहीं रौशनी होती है पर
जहाँ होता हैं अँधेरा
वीरान कभी शहर नहीं हो जाता
कोई रोता है कोई हंसता है
करते सभी जिन्दगी पूरी

सपने तो जागते हुए भी
लोग बहुत देखते हैं
उनके पूरे न होने पर
अपने ही मन को सताते हैं
जो पूरे न हो सकें ऐसे सपने देखकर
पूरा न होने पर बेबसी जताते हैं
अपनी नाकामी की हवा से
अपने ही दिल के चिराग बुझाते हैं
खौफ का माहौल चारों और बनाकर
आदमी ढूंढते हैं चैन
पर वह कैसे मिल सकता है
जब उसकी चाहत भी होती आधी-अधूरी
फिर भी वह जिंदा दिल होते हैं लोग
जो जिन्दगी की जंग में
चलते जाते है
क्या खोया-पाया इससे नहीं रखते वास्ता
अपने दिल के चिराग खुद ही जलाते हैं
तय करते हैं मस्ती से मंजिल की दूरी

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ख्वाहिशें वही पूरी हो पातीं हैं
जो हकीकत की जमीन पर टिक पातीं हैं
कोई ऐसे पंख नहीं बने जो
आदमी के अरमानों को आसमान में
उडा कर सैर कराएँ
जमीन की जिन्दगी की हकीकतें
जमीन से ही जुड़कर जिंदा रह पाती हैं

कौटिल्य का अर्थशास्त्र: कायर की संगति भी बुरी


  • 1. दूर्भिक्ष और आपत्तिग्रस्त स्वयं ही नष्ट होता है और सेना का व्यसन को प्राप्त हुआ राज प्रमुख युद्ध की शक्ति नहीं रखता।
    2. विदेश में स्थित राज प्रमुख छोटे शत्रु से भी परास्त हो जाता है। थोड़े जल में स्थित ग्राह हाथी को खींचकर चला जाता है।
    3. बहुत शत्रुओं से भयभीत हुआ राजा गिद्धों के मध्य में कबूतर के समान जिस मार्ग में गमन करता है, उसी में वह शीघ्र नष्ट हो जाता है।
    4.सत्य धर्म से रहित व्यक्ति के साथ कभी संधि न करें। दुष्ट व्यक्ति संधि करने पर भी अपनी प्रवृति के कारण हमला करता ही है।
    5.डरपोक युद्ध के त्याग से स्वयं ही नष्ट होता है। वीर पुरुष भी कायर पुरुषों के साथ हौं तो संग्राम में वह भी उनके समान हो जाता है।अत: वीर पुरुषों को कायरों की संगत नहीं करना चाहिऐ।
    6.धर्मात्मा राजप्रमुख पर आपत्ति आने पर सभी उसके लिए युद्ध करते हैं। जिसे प्रजा प्यार करती है वह राजप्रमुख बहुत मुश्किल से परास्त होता है।
    7.संधि कर भी बुद्धिमान किसी का विश्वास न करे। ‘मैं वैर नहीं करूंगा’ यह कहकर भी इंद्र ने वृत्रासुर को मार डाला।
    8.समय आने पर पराक्रम प्रकट करने वाले तथा नम्र होने वाले बलवान पुरुष की संपत्ति कभी नहीं जाती। जैसे ढलान के ओर बहने वाली नदियां कभी नीचे जाना नहीं छोडती।
  • दिल के चिराग जलाते नहीं-hindi shayri


    जिनका हम करते हैं इन्तजार
    वह हमसे मिलने आते नहीं
    जो हमारे लिए बिछाये बैठे हैं पलकें
    उनके यहां हम जाते नहीं
    अपने दिल के आगे क्यों हो जाते हैं मजबूर
    क्यों होता है हमको अपने पर गरूर
    जो आसानी से मिल सकता है
    उससे आँखें फेर जाते हैं
    जिसे ढूँढने के लिए बरसों
    बरबाद हो जाते हैं
    उसे कभी पाते नहीं
    तकलीफों पर रोते हैं
    पर अपनी मुश्किलें
    खुद ही बोते हैं
    अमन और चैन से लगती हैं बोरियत
    और जज्बातों से परे अंधेरी गली में
    दिल के चिराग के लिए
    रौशनी ढूँढने निकल जाते हैं
    ——————–

    दुर्घटनाएं अब अँधेरे में नहीं
    तेज रौशनी में ही होतीं है
    रास्ते पर चलते वाहनों से
    रौशनी की जगह बरसती है आग
    आंखों को कर देती हैं अंधा
    जागते हुए भी सोती हैं
    —————————-
    हमें तेज रौशनी चाहिए
    इतनी तेज चले जा रहे हैं
    उन्हें पता ही नहीं आगे
    और अँधेरे आ रहे हैं
    दिल के चिराग जलाते नहीं
    बाहर रौशनी ढूँढने जा रहे हैं

    कौटिल्य का अर्थशास्त्र:अग्नि के समान असहनशील भी होना चाहिये


    १.कछुए के समान अंग संकोचकर शत्रु का प्रहार भी सहन करे और बुद्धिमान फिर समय देखकर क्रूर सर्प के समान डटकर लडे.
    २.समय पर पर्वत के समान सहनशील हो और अग्नि के समान असहनशील हो और समय पर प्रिय वचन कहता हुआ कंधे पर भी शत्रु को उठावे.
    ३.मत्त और प्रमत्त के समान बाहरी दिखावे से स्थित बुद्धिमान आक्रमण करे, जैसे कि सिंह ऐसा कूदकर प्रहार करता है वह खाले वार नहीं जाता.
    ४.प्रसन्नता की वृत्ति से लोक की हितकारी वृत्ति से शत्रु के हृदय में निरन्तर प्रवेश का समय पर नीति के हाथों से प्रहार कर उसकी लक्ष्मी के केश ग्रहण करें.

    ५.विद्वान् को उचित है कि प्राप्त हुए उपायों से विग्रह को शांत करे. विजय की प्राप्ति अचल नहीं है. एकाएक किसी प्रकार पर प्रहार न करे.
    ६.बुद्धिमान को कोई भी वस्तु असाध्य नहीं है, लोहा अभेद्य होता है पर लोहार बुद्धिमानी से उसे गला डालता है.

    झूठ की सता ही लोगों में इज्जत पाती है


    अपनी महफिलों में शराब की
    बोतलें टेबलों पर सजाते हैं
    बात करते हैं इंसानियत की
    पर नशे में मदहोश होने की
    तैयारी में जुट जाते हैं
    हर जाम पर ज़माने के
    बिगड़ जाने का रोना
    चर्चा का विषय होता है
    सोने का महंगा होना
    नजर कहीं और दिमाग कहीं
    ख्याल कहीं और जुबान कहीं
    शराब का हर घूँट
    गले के नीचे उतारे जाते हैं
    ————————————

    आदमी की संवेदना हैं कि
    रुई की गठरी
    किसी लेखक के लिखे
    चंद शब्दों से ही पिचक जाती हैं
    लगता हैं कभी-कभी
    सच बोलना और लिखना
    अब अपराध हो गया है
    क्योंकि झूठ और दिखावे की सत्ता ही
    अब लोगों में इज्जत पाती है

    ———————————

    संत कबीर वाणी:फ़टे दिल को कौन सिल सकता है


    बाहर क्या दिखराइये, अन्तर जानिए राम
    कहा काज संसार से, तुझे घनी से काम

    संत शिरोमणि कबीरदास कहते हैं कि बाहर दिखाकर भगवान् का स्मरण करने से क्या लाभ, राम का स्मरण तो अपने ह्रदय में करना चाहिए। जब भगवान् के भक्ती करनी है फिर इस संसार से क्या काम ।

    *लेखक का मत है कि अगर हमें भगवान् की पूजा या भक्ती करनी है तो उसका दिखावा करने कई जरूरत नहीं है। कई लोग अपने इष्ट और उसकी भक्ती के दावा लोगों के सामने करते हैं, ऐसे लोग ढोंगी होते हैं। प्रेमभाव एक चाहिए, भेष अनेक बजाय चाहे घर में बात कर, चाहे बन को जाय इसका आशय यह है कि अगर भगवान की भक्ती करनी है तो घर-गृहस्थी में रहते हुए भी की जा सकती है उसके लिए वेशभूषा बदलने की कोई जरूरत नहीं है और न वन जाने की। बस मन में प्रेमभाव होना चाहिए।

    दिल का मरहम कोई न मिला, जो मिला मर्जी
    कहे कबीर बादल फटा, क्यों कर सीवे दर्जी

    कबीर दास जीं कहते हैं कि इस संसार में ऐसा कोई नहीं मिला जो मेरे हृदय को शांति प्रदान कर सके। जो भी मिले सब अपने मतलब से मिले । स्वार्थियों को देखकर मन जब बादल की तरह फट गया तो उसे दरजी क्यों सीयेगा।

    तकिये का सहारा


    हमें पूछा था अपने दिल को
    बहलाने के लिए किसे जगह का पता
    उन्होने बाजार का रास्ता बता दिया
    जहां बिकती है दिल की खुशी
    दौलत के सिक्कों से
    जहाँ पहुंचे तो सौदागरों ने
    मोलभाव में उलझा दिया
    अगर बाजार में मिलती दिल की खुशी
    और दिमाग का चैन
    तो इस दुनिया में रहता
    हर आदमी क्यों इतना बैचैन
    हम घर पहुंचे और सांस ली
    आँखें बंद की और सिर तकिये पर रखा
    आखिर उसने ही जिसे हम
    ढूढ़ते हुए थक गये थे
    उसका पता दिया
    ——————-

    सांप के पास जहर है
    पर डसने किसी को खुद नहीं जाता
    कुता काट सकता है
    पर अकारण नहीं काटने आता
    निरीह गाय नुकीले सींग होते
    हुए भी खामोश सहती हैं अनाचार
    किसी को अनजाने में लग जाये अलग बात
    पर उसके मन में किसी को मरने का
    विचार में नहीं आता
    भूखा न हो तो शेर भी
    कभी शिकार पर नहीं जाता
    हर इंसान एक दूसरे को
    सिखाता हैं इंसानियत का पाठ
    भूल जाता हां जब खुद का वक्त आता
    एक पल की रोटी अभी पेट मह होती है
    दूसरी की जुगाड़ में लग जाता
    पीछे से वार करते हुए इंसान
    जहरीले शिकारी के भेष में होता है जब
    किसी और जीव का नाम
    उसके साथ शोभा नहीं पाता
    ————–

    रहीम के दोहे:संसार के बड़प्पन को कोई नहीं देख सकता


    रहिमन जगत बडाई की, कूकुर की पहिचानि
    प्रीती करे मुख छाती, बैर करे तन हानि

    कविवर रहीम कहते हैं की अपनी बडाई सुनकर फूलना और आलोचना से गुस्सा हो जाना कोई अच्छी बात नहीं है क्योंकि यह कुत्ते का गुण है. उसे थोडा प्यार करो तो मालिक को चाटने लगता है और फटकारने पर उसे काट भी लेता है.
    भावार्थ-संसार में कई प्रकार के लोग हैं और कुछ लोग ऐसे होते हैं कि जो चापलूसी कर काम निकालते हैं ऐसे लोगों से बचने का प्रयास करना चाहिए. उनकी प्रशंसा पर फूल जाना मूर्खता है क्योंकि उन्हें तो काम निकलना होता है और बाद में हमें मूर्ख भी समझते हैं कि देखो कैसे काम निकलवाया.

    रहिमन जंग जीवन बडे, काहू न देखे नैन
    जाय दशानन अछत ही,कापी लागे काठ लेन

    कवि रहीम कहते हैं कि संसार के बड़प्पन को कोई व्यक्ति अपनी आँखों से नहीं देख सकता. रावण को अक्षत जाना जाता था, परन्तु वानरों ने उसके गढ़ को नष्ट कर दिया.

    भावार्थ-अक्सर यह भ्रम होता है यहाँ सब कुछ कई बरसों तक स्थिर रहने वाला है पर यहाँ सब एक दिन बिखर जाता है. इसलिए अपने अन्दर किसी प्रकार का अहंकार नहीं पालना चाहिए. न ही यह भ्रम पालना चाहिए कि कोई हमसे छोटा है और यह कुंठा भी मन में नहीं लाना चाहिऐ कि कोई हमसे बड़ा है.

    अपनी सोच से रास्ते बनते हैं


    एक पत्थर को रंग पोतकर अदभुत
    बताकर दिखाने की कोशिश
    लोहे को रंग लगाकर
    चमत्कारी बताने की कोशिश
    आदमी के भटकते मन को
    स्वर्ग दिखाने की कोशिश
    तब तक चलती रहेगी
    जब तक अपने को सब खुद नहीं संभालेंगे

    ख्वाब ही हकीकत बनते हैं
    सपने भी सच निकलते हैं
    अपनी सोच से भी रास्ते बनते हैं
    कोई और हमें संभाले
    अपनी जंग जीत सकते हैं
    जब इसके लिए इन्तजार करने के बजाय
    खुद को खुद ही संभालेंगे
    ———————————

    भीड़ से नहीं निकलेंगे शेर जब तक


    जब किसी के लिखने से
    शांति भंग होती है
    तो उससे कहें बंद कर दे लिखना
    जो बिना पढे ही
    चंद शब्दों को समझे बिना ही
    जमाने पर फैंकते हैं पत्थर
    गैरों के इशारे पर
    अपनों पर ही चुभोते हैं नश्तर
    कह देते हैं लिखने वाले से
    अब कभी लिखते नहीं दिखना

    बोलने की आजादी पर
    जोर-जोर से सुबह शाम चिल्लाने वाले
    अपनी ताकत पर खौफ का
    माहोल बनाने वालों का
    रास्ता हमेशा आसान होते दिखता
    लिखने की आजादी उनको मंजूर नहीं
    क्योंकि कोई शब्द उनके
    ख्यालों से नहीं मिलता
    उनकी दिमाग में किसी के साथ चलने का
    इरादा नहीं टिकता
    उनके खौफ से ही ताकत बनती
    जमाने के मिट जाने का डर जतातीं तकरीरें
    बेबस भीड़ भी होती है उनके साथ
    बढ़ते रहेंगे उनके पंजे तब तक
    भीड़ से नहीं निकलेंगे शेर जब तक
    दिल में हिम्मत जुटाकर लड़ना तो जरूरी है
    काफी नहीं अब लड़ते दिखना

    चाणक्य नीति:हिंसक पशु,नदी और राजपरिवार सदैव विश्वसनीय नहीं


    १.केवल मनुष्य योनि में जन्म लेने से सब मनुष्य एक समान नहीं हो जाते. एक ही माँ के गर्भ से उत्पन्न एक ही राशि-नक्षत्र में जन्म लेने वाले दो जुड़वां भाई भी बिलकुल अलग कर्म करने वाले और भिन्न गुण और स्वभाव वाले होते है. शायद पुराने कर्म फल के कारण सभी में ऐसी विभिन्नता आती है.
    २.जिस प्रकार मछली देख-देखकर संतान का पालन करती है,कछुई केवल ध्यान द्वारा ही संतान की देखभाल करती है और मादा पक्षी अपने अण्डों को सेकर या छूकर अपनी संतान का पालन करती हैं उसी परकार सज्जन की संगती अपने संपर्क में आने वालों को भगवान् के दर्शन, ध्यान और चरण-स्पर्श आदि का आभास कराकर कल्याण करती है.
    ३.संसार में सुख की अपेक्षा दु:खों का अस्तित्व अधिक माना जता है, तीन प्रकार के संताप ऐसे हैं जिनसे मनुष्य घिरा रहता है. मन, स्थिति और दुर्भाग्य के कष्टों का निवारण भी तीन प्रकार के उपायों से होता है- गुणवान पुत्र मधुर भाषिणी पत्नी और श्रेष्ठ पुत्र की संगति.

    ४.लंबे नाखून धारण करने वाले हिंसक पशु, नदिया एवं राजपरिवार हमेशा विश्वसनीय नहीं होते क्योंकि इनके स्वभाव में परिवर्तन आते रहते हैं.

    डूबते को तिनके का सहारा :एक नारा


    डूबते को तिनके का सहारा
    देने में वह नाम कमाते हैं
    पहले आदमी को डूबने की लिए छोड़
    फिर तिनके एकत्रित करने के लिए
    अभियान चलते हैं
    जब भर जाते हैं चारों और तिनके
    तब अपना आशियाना बनाते हैं
    और डूबते को भूल जाते हैं
    फिर भी उनका नाम है बुलंदियों पर
    भला डूबे लोग कब उनकी पोल खाते हैं

    ———————————————
    जब तक जवान थे
    अपने नारे और वाद के सहारे
    बहुत से आन्दोलन और अभियान चलाते रहे
    अब बुढापे में मिल गया
    आधुनिक साधनों का मिल गया सहारा
    वीडियो और टीवी पर ही
    चला रहे हैं पुरानी दुकान
    अब भी चल रहा है उनका जन कल्याण
    पेंतरे हैं नये पर शब्द वही जो बरसों से कहे

    रहीम के दोहे:प्रेम की गली संकरी होती है


    रहिमन गली है सांकरी, दूजो न ठहराहिं
    आपु अहैं तो हरि नहीं, हरि आपुन नाहि

    संत शिरोमणि रहीम कहते हैं की प्रेम की गली बहुत पतली होती है उसमें दूसरा व्यक्ति नहीं ठहर सकता, यदि मन में अहंकार है तो भगवान् का निवास नहीं होगा और यदि दृदय में ईश्वर का वास है तो अहंकार का अस्तित्व नहीं होगा.
    रहिमन घरिया रहंट को त्यों ओछे की डीठ
    रीतिही सन्मुख होत है, भरी दिखावे पीठ

    कविवर रहीम कहते हैं की कुएँ में लगी रहंट की छोटी-छोटी घडेईयाँ तुच्छ व्यक्ति की दृष्टि के समान होती हैं. सामने तो खाली होती किन्तु पीछे भरे हुई होतीं हैं.

    डर का माहौल बनाना ठीक नहीं


    यह अनदेखी करने वाली बात नहीं है और जिस तरह इसे सामान्य कहकर टाला जा रहा है वह मुझे स्वीकार्य नहीं है। मैं आज सागर चंद नाहर के साथ हुई बदतमीजी की बात कर रहा हूँ। मैंने सागर चंद नाहर की पोस्ट देखी और उसमें तमाम साथियों की कमेन्ट भी देखी। इसे व्यक्तिगत मामला नहीं माना जा सकता है भले ही यह दो व्यक्तियों के बीच हुआ है। हम जो ब्लोग बनाए हैं वह घर के शोपीस नहीं है और वह बराबर लोगों के बीच में पढे जाते हैं और इन पर लिखा पढ़ने से लोगों के मन में प्रतिक्रिया होती है। जब ब्लोग की संख्या कम थी तब इसका आभास नहीं था। हो सकता है कि कुछ लोगों के पुराने पूर्वाग्रह रहे हों पर उनकों इस तरह व्यक्त करने का समय अब नहीं रहा।

    अगर सागरचंद जी नाहर किसी भी चौपाल पर नहीं होते तो शायद मैं भी इस मामले में इतनी दिलचस्पी नहीं लेता, पर जब इन चौपालों से दूसरे लोगों को जोड़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं तब यह भी देखना चाहिए कि यहाँ के घटनाक्रम का क्या प्रभाव होता है। अगर हम इस घटनाक्रम को देखें तो यह नये लेखकों में भय पैदा करता है। शुरू में मुझे यह लगा था कि यहाँ कुछ गड़बड़ है इसलिए अपने एक नहीं दो छद्म ब्लोग बनाए ताकि कभी ऐसी हालत आये तो उसे दो तरफा ढंग से निपटा जा सके। उसके बाद जब लगा कि अब इसकी मुझे जरूरत नहीं है तो मैंने उनको वास्तविक नाम में परिवर्तित कर दिया क्योंकि जिस बात से मुझे डर था वह उस छद्म ब्लोग पर ही हुई और तब मैंने उसे बंद किया। यह मैं इसलिए बता रहा हूँ कि यह भय लोगों को रहता है और अपनी बात कहने में कतरायेंगे, और इस तरह तो किसी को चौपालों से जोड़ने के काम में कठिनाई भी होगी। भला आदमी किसी की बदतमीजी से डरता है.

    बात यहाँ तक ही सीमित नहीं है। किसी के ब्लोग पर जाकर सद्भावना से प्रशंसा और आलोचना करना अलग बात है अभद्र शब्द लिखना अनैतिक तो है ही और भारतीय संविधान भी इसकी इजाजत नहीं देता। सबसे बड़ी बात यह है कुछ लोगों के मन में यह भय व्याप्त हो सकता है कि किसी की प्रशंसा या आलोचना पर ऐसी प्रतिक्रिया भी हो सकती है। ऐसे भय का माहौल बनाने का किसी को कोई अधिकार नहीं है। मैं मानकर चलता हूँ कि कुछ भद्र लोग भी गलतियां कर जाते हैं और उनको उसे सुधारने का अधिकार दिया जाना चाहिए पर उनको दूसरे की सहृदयता को भी उनकी कमजोरी नहीं समझना चाहिए। हमारी कुछ गलतियां कानून के दायरे में आती है यह भी नये ब्लोगरों को ध्यान में रखना चाहिए। हो सकता है मैं कड़ी बात कह रहा हूँ और कुछ लोगों को बुरा लगे पर एक बात तो यह कि सच कड़वा होता है दूसरा यह कि मैं बहुत समय से ब्लोग को देख रहा हूँ और किसी ने भी यह बात लिखी हो कि ‘किसी के साथ बदतमीजी करने की इजाजत भारतीय संविधान नहीं देता’। अगर आप लोगों ने देखा होगा कि किस तरह ईमेल और मोबाइल पर बदतमीजी करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही होती है और हम तो सब एक दूसरे के अते-पते जानते हैं। मेरे गुरु ने जो पत्रकारिता में थे वह कहते थे’तुम कभी किसी को गाली मत देना और कोई दे तो उसे मारपीट भी मत करना दोनों में तुम फंसे होगे और दे तो तुम कानून की याद दिलाना। उनकी बात मेरे मन में ऐसी लगी कि फिर मैं बातचीत में किसी अभद्र शब्द का उपयोग गुस्से में भी नहीं करता। यह मैं सदाशय भाव से लिख रहा हूँ और कोई उपदेशक बनने का मेरा कोई विचार नहीं है। मैं उम्मीद करता हूँ कि मेरे मित्र मेरी इस बात को समझेंगे कि यहाँ डर का माहौल बनाना ठीक नहीं होगा, वैसे ही ऐसा माहौल बनाने वालों की कमी नहीं हैं.

    क्रिकेट और फिल्म में ऐसा भी हो सकता है


    आखिर झगडा किस बात का है? क्रिकेट वालों ने एक्टर से कहा होगा कि-”यार, क्रिकेट को लोग देखने तो खूब आ रहे हैं पर अभी पहले जैसी तवज्जो नहीं मिल रही है। हमारी टीम ने ट्वेन्टी-ट्वेन्टी मैं विश्व कप जीता है और हमें चाहिए फिफ्टी-फिफ्टी के ग्राहक जिसमें विज्ञापन लंबे समय तक दिखाए जा सकते हैं। सो तुम भी मैदान मैं देखने आ जाओ तो थोडा इसका क्रेज बढे। ट्वेन्टी-ट्वेन्टी के समय से क्रिकेट पेट नहीं भरना है.”

    इधर एक्टर भी फ्लॉप चल रहें हो तो क्या करें? एक दिन फिल्म आयी मीडिया मैं शोर मचा फिर थम गया। अरबों रूपये का खेल है और तमाम तरह के विज्ञापन अभियान(अद्द cअम्पैं) लोगों की भावनाओं पर जिंदा हैं। विज्ञापन देने वाली कंपनिया तो सीमित हैं। फिल्मों के एक्टर हों या क्रिकेट के खिलाड़ी उनके प्रोडक्ट के प्रचार के माडल होते हैं। एक क्षेत्र में फ्लॉप हो रहे हों तो दूसरे के इलाके से लोग ले आओ। समस्या फिल्म और क्रिकेट की नहीं है कंपनियों के प्रोडक्ट के प्रचार की हैं। जब किसी प्रोडक्ट के माडल हीरो और खिलाड़ी एक हों तो उनका एक जगह पर होना प्रचार का दोहरा साधन हो जाता है।

    अब आगे और बदलाव आने वाले हैं। जो युवक और युवतियां फिल्म के लिए इंटरव्यू देने जायेंगे उनसे अपने अभिनय के बारे में कम क्रिकेट के बारे में अधिक सवाल होंगे। खेल से संबन्धित विषय पर नहीं बल्कि उसे देखने के तरीक के बारे में सवाल होंगे। जैसे
    १. जब मैच देखने जाओगे तो कैसे सीट पर बैठोगे?
    २. चेहरे पर कैसी भाव भंगिमा बनाओगे जिससे लगे कि तुम क्रिकेट के बारे में जानते हो?
    ३. जब कोई देश का खिलाड़ी छका लगाएगा तो कैसे ताली बजाओगे?
    इस तरह के ढेर सारे सवाल और होंगे और अनुबंध में ही यह शर्त शामिल होगी कि जब तक फिल्म पुरानी न पड़े तब तक निर्माता के आदेश पर फिल्म प्रचार के लिए एक्टर मैच देखने मैदान पर जायेगा।

    क्रिकेट में क्या होगा? लड़के दो तरह के कोच के यहाँ जायेंगे-सुबह क्रिकेट के कोच के यहाँ शाम को डांस वाले के यहाँ। भी रैंप पर भी जाना तो होगा क्रिकेट के प्रचार के लिए। आगे जब स्थानीय, प्रादेशिक और राष्ट्रीय स्तर पर जो चयन करता टीम का चयन करेंगे वह पहले खिलाडियों की नृत्य कला की परख करेंगे। क्रिकेट खेलने वाले तो कई मिल जायेंगे पर रेम्प पर नृत्य कर सकें यह संभव नहीं है-और ऐसी ही प्रचार अभियान चलते रहे तो नृत्य में प्रवीण खिलाडियों की पूछ परख बाद जायेगी। हाँ, इसमें पुराने संस्कार धारक दब्बू क्रिकेट खिलाडियों को बहुत परेशानी होगी। यह बाजार और प्रचार का खेल और इसमें आगे जाने-जाने क्या देखने को मिलेगा क्योंकि यह चलता है लोगों के जज्बातों से और जहाँ वह जायेंगे वहीं उनकी जेब में रखा पैसा भी जायेगा और उसे खींचने वाले भी वहीं अपना डेरा जमायेंगे।

    चाणक्य नीति:धन मिले तो भी बैरी के पास न जाएं


    1.जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुचाने वाले मर्मभेदी वचन बोलते हैं, दूसरों की बुराई करने में खुश होते हैं। अपने वचनों द्वारा से कभी-कभी अपने ही वाचों द्वारा बिछाए जाल में स्वयं ही घिर जाते हैं और उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जिस तरह रेत की टीले के भीतर बांबी समझकर सांप घुस जाता है और फिर दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है।

    2.समय के अनुसार विचार न करना अपने लिए विपत्तियों को बुलावा देना है, गुणों पर स्वयं को समर्पित करने वाली संपतियां विचारशील पुरुष का वरण करती हैं। इसे समझते हुए समझदार लोग एवं आर्य पुरुष सोच-विचारकर ही किसी कार्य को करते हैं।
    3.मनुष्य को कर्मानुसार फल मिलता है और बद्धि भी कर्म फल से ही प्रेरित होती है। इस विचार के अनुसार विद्वान और सज्जन पुरुष विवेक पूर्णता से ही किसी कार्य को पूर्ण करते हैं।

    4.ऐसा धन जो अत्यंत पीडा, धर्म त्यागने और बैरियों के शरण में जाने से मिलता है, वह स्वीकार नहीं करना चाहिए। धर्म, धन, अन्न, गुरू का वचन, औषधि हमेशा संग्रहित रखना चाहिए, जो इनको भलीभांति सहेज कर रखता है वह हेमेशा सुखी रहता है।बिना पढी पुस्तक की विद्या और अपना कमाया धन दूसरों के हाथ में देने से समय पर न विद्या काम आती है न धनं.

    5.जो बात बीत गयी उसका सोच नहीं करना चाहिए। समझदार लोग भविष्य की भी चिंता नहीं करते और केवल वर्तमान पर ही विचार करते हैं।हृदय में प्रीति रखने वाले लोगों को ही दुःख झेलने पड़ते हैं।
    6.प्रीति सुख का कारण है तो भय का भी। अतएव प्रीति में चालाकी रखने वाले लोग ही सुखी होते हैं.
    7.जो व्यक्ति आने वाले संकट का सामना करने के लिए पहले से ही तैयारी कर रहे होते हैं वह उसके आने पर तत्काल उसका उपाय खोज लेते हैं। जो यह सोचता है कि भाग्य में लिखा है वही होगा वह जल्द खत्म हो जाता है। मन को विषय में लगाना बंधन है और विषयों से मन को हटाना मुक्ति है.

    भूल-भुलैया में फंस जाते हैं


    अपने दिल के नगीने से
    सजाकर कितने भी तौह्फे दे दो
    इस ज़माने को
    कद्रदान कभी होगा नहीं
    खुश रहते हैं वही लोग
    जो बेचते हैं परछाईयाँ
    झूठ बेचते हैं दिखाकर सच्चाईयां
    बन जाते हैं उनके महल
    ज़माना भी खो जाता है
    भूलभुलैया में कहीं
    दावे सभी करते हैं
    पर भला कोई हुआ है अभी तक
    सच्चे आदमी का साथी कहीं
    —————————————-

    भगवान की पहचान के लिए
    शैतान का डर दिखाते हैं
    सच को सही बताने के लिए
    झूठ का भूत दिखाते हैं
    पर जो देते हैं पता
    वही नाचते हैं शैतान जैसा
    झूठ को बेचते हैं सच की तरह
    लोग मानते हैं उनको अपना आदर्श
    इसलिए भगवान् से दूर
    सच के रस्ते से हटे हुए
    भूल-भुलैया में फंस जाते हैं

    सिगरेट का धुआं छोड़ते हुए (sigret ka dhuan-hindi vyangya kavita)


    मुख से सिगरेट का धुँआ
    चहुँ और फैलाते हुए करते हैं
    शहर में फैले
    पर्यावरण प्रदूषण की शिकायत
    शराब के कई जाम पीने के बाद
    करते हैं मर्यादा की वकालत
    व्यसनों को पालना सहज है
    उससे पीछा छुड़ाने में
    होती है बहुत मुश्किल
    पर नैतिकता की बात कहने में
    शब्द खर्च करने हुए क्यों करो किफायत
    कहैं दीपक बापू देते हैं
    दूसरों को बड़ी आसानी से देते हैं
    नैतिकता का उपदेश लोग
    जबकि अपने ही आचरण में
    होते हैं ढ़ेर सारे खोट
    दूसरे को दें निष्काम भाव का संदेश
    और दान- धर्म की सलाह
    अपने लिए जोड़ रहे हैं नॉट
    समाज और जमाने के बिगड़ जाने की
    बात तो सभी करते हैं
    आदमी को सुधारने की
    कोई नहीं करता कवायद
    ————————

    सुबह से शाम तक
    छोड़ते हैं सिगरेट का धुआं
    अपने दिल में खोदते  मौत का कुआँ
    और लोगों को सुनाते हैं
    जमाने के खराब होने के किस्से
    अपना सीना तानकर कहते हैं
    बिगडा जो है प्रकृति का हिसाब
    उस पर पढ़ते हैं किताब
    पर कभी जानना नहीं चाहते
    हवाओं को तबाह करने में
    कितने हैं उनके हिस्से

    सबसे अलग हटकर लिख (sabse alag hatkar likh-hindi kavita)


    तू लिख
    समाज में झगडा
    बढाने के लिए लिख
    शांति की बात लिखेगा
    तो तेरी रचना कौन पढेगा
    जहां द्वंद्व न होता वहां होता लिख
    जहाँ कत्ल होता हो आदर्श का
    उससे मुहँ फेर
    बेईमानों के स्वर्ग की
    गाथा लिख
    ईमान की बात लिखेगा
    तो तेरी ख़बर कौन पढेगा

    अमीरी पर कस खाली फब्तियां
    जहाँ मौका मिले
    अमीरों की स्तुति कर
    गरीबों का हमदर्द दिख
    भले ही कुछ न लिख
    गरीबी को सहारा देने की
    बात अगर करेगा
    तो तेरी संपादकीय कौन पढेगा

    रोटी को तरसते लोगों की बात पर
    लोगों का दिल भर आता है
    तू उनके जज्बातों पर ख़ूब लिख
    फोटो से भर दे अपने पृष्ठ
    भूख बिकने की चीज है ख़ूब लिख
    किसी भूखे को रोटी मिलने पर लिखेगा
    तो तेरी बात कौन सुनेगा

    पर यह सब लिख कर
    एक दिन ही पढे जाओगे
    अगले दिन अपना लिखा ही
    तुम भूल जाओगे
    फिर कौन तुम्हे पढेगा

    झगडे से बडी उम्र शांति की होती है
    गरीब की भूख से लडाई तो अनंत है
    पर जीवन का स्वरूप भी बेअंत है
    तुम सबसे अलग हटकर लिखो
    सब झगडे पर लिखें
    तुम शांति पर लिखो
    लोग भूख पर लिखें
    तुम भक्ति पर लिखो
    सब आतंक पर लिखें
    तुम अपनी आस्था पर लिखो
    सब बेईमानी पर लिखें
    तुम अपने विश्वास पर लिखो
    जब लड़ते-लड़ते थक जाएगा ज़माना
    मुट्ठी भींचे रहना कठिन है
    हाथ कभी तो खोलेंगे ही लोग
    तब हर कोई तुम्हारा लिखा पढेगा
    —————-

    तुम्हारे प्रेम के विरह में हास्य लिखता हूँ


    ब्लोगर उस दिन एक पार्क में घूम रहा था तो उसकी पुरानी प्रेमिका सामने आकर खडी हो गयी। पहले तो वह उसे पहचाना ही नहीं क्योंकि वह अब खाते-पीते घर के लग रही थी और जब वह उसके साथ तथाकथित प्यार (जिसे अलग होते समय प्रेमिका ने दोस्ती कहा था) करता था तब वह दुबली पतली थी। ब्लोगर ने जब उसे पहचाना तो सोच में पड़ गया इससे पहले वह कुछ बोलता उसने कहा-”क्या बात पहचान नहीं रहे हो? किसी चिंता में पड़े हुए हो। क्या घर पर झगडा कर आये हो?”
    ”नहीं!कुछ लिखने की सोच रहा हूँ।”ब्लोगर ने कहा;”मुझे पता है कि तुम ब्लोग पर लिखते हो। उस दिन तुम्हारी पत्नी से भेंट एक महिला सम्मेलन में हुई थी तब उसने बताया था। मैंने उसे नहीं बताया कि हम दोनों एक दूसरे को जानते है।वह चहकते हुए बोली-”क्या लिखते हो? मेरी विरह में कवितायेँ न! यकीनन बहुत हिट होतीं होंगीं।’
    ब्लोगर ने सहमते हुए कहा-”नहीं हिट तो नहीं होतीं फ्लॉप हो जातीं हैं। पर विरह कवितायेँ मैं तुम्हारी याद में नहीं लिखता। वह अपनी दूसरी प्रेमिका की याद में लिखता हूँ।”
    ”धोखेबाज! मेरे बाद दूसरी से भी प्यार किया था। अच्छा कौन थी वह? वह मुझसे अधिक सुन्दर थी।”उसने घूरकर पूछा।
    ”नहीं। वह तुमसे अधिक खूबसूरत थी, और इस समय अधिक ही होगी। वह अब मेरी पत्नी है। ब्लोगर ने धीरे से उत्तर दिया।
    प्रेमिका हंसी-”पर तुम्हारा तो उससे मिलन हो गया न! फिर उसकी विरह में क्यों लिखते हो?’
    ”पहले प्रेमिका थी, और अब पत्नी बन गयी तो प्रेम में विरह तो हुआ न!”ब्लोगर ने कहा।
    पुरानी प्रेमिका ने पूछा -”अच्छा! मेरे विरह में क्या लिखते हो?”
    ”हास्य कवितायेँ और व्यंग्य लिखता हूँ।” ब्लोगर ने डरते हुए कहा।
    ”क्या”-वह गुस्से में बोली-”मुझे पर हास्य लिखते हो। तुम्हें शर्म नहीं आती। अच्छा हुआ तुमसे शादी नहीं की। वरना तुम तो मेरे को बदनाम कर देते। आज तो मेरा मूड खराब हो गया। इतने सालों बाद तुमसे मिली तो खुशी हुई पर तुमने मुझ पर हास्य कवितायेँ लिखीं। ऐसा क्या है मुझमें जो तुम यह सब लिखते हो?’
    ब्लोगर सहमते हुए बोला-“मैंने देखा एक दिन तुम्हारे पति का उस कार के शोरूम पर झगडा हो रहा था जहाँ से उसने वह खरीदी थी। कार का दरवाजा टूटा हुआ था और तुम्हारा पति उससे झगडा कर रहा था. मालिक उसे कह रहा था कि”साहब. कार बेचते समय ही मैंने आपको बताया था कि दरवाजे की साईज क्या है और आपने इसमें इससे अधिक कमर वाले किसी हाथी रुपी इंसान को बिठाया है जिससे उसके निकलने पर यह टूट गया है और हम इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं. तुम्हारा पति कह रहा था कि’उसमें तो केवल हम पति-पत्नी ने ही सवारी की है’, तुम्हारे पति की कमर देखकर मैं समझ गया कि……………वहाँ मुझे हंसी आ गई और हास्य कविता निकल पडी. तब से लेकर अब जब तुम्हारी याद आती है तब……अब मैं और क्या कहूं?”
    वह बिफर गयी और बोली-”तुमने मेरा मूड खराब किया। मेरा ब्लड प्रेशर वैसे ही बढा रहता है। डाक्टर ने सलाह दी कि तुम पार्क वगैरह में घूमा करो। अब तो मुझे यहाँ आना भी बंद करना पडेगा। अब मैं तो चली।”
    ब्लोगर पीछे से बोला-”तुम यहाँ आती रहना। मैं तो आज ही आया हूँ। मेरा घर दूर है रोज यहाँ नहीं आता। आज कोई व्यंग्य का आइडिया ढूंढ रहा था, और तुम्हारी यह खुराक साल भर के लिए काफी है। जब जरूरत होगी तब ही आऊँगा।”
    वह उसे गुस्से में देखती चली गयी। ब्लोगर सोचने लगा-”अच्छा ही हुआ कि मैंने इसे यह नहीं बताया कि इस पर मैं हास्य आलेख भी लिखता हूँ। नहीं तो और ज्यादा गुस्सा करती।”
    नोट-यह एक स्वरचित और मौलिक काल्पनिक व्यंग्य रचना है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई लेना देना नहीं है और किसी का इससे मेल हो जाये तो वही इसके लिए जिम्मेदार होगा.

    मेरे इन ब्लोगस की रचनाओं को देखें


    समस्त पाठकों से निवेदं है कि यदि आप मेरी रचनाएं इस ब्लोग पर पढना चाह्ते हैं तो कृप्या कमेंट अवश्य लिखे। इस ब्लोग पर मेरा इरादा एक उप ंयास लिखने का है। तब तक आप मेरे इन ब्लोगस की रचनाओं को देखें
    दीपक भारतदीप्

    1. http://deepakbapukahin.wordpress.com

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    गीत-संगीत और मोबाइल


    मोबाइल का भला संगीत और गाने और बजाने से क्या संबंध हो सकता है? कभी यह प्रश्न हमने अपने आपसे ही नहीं पूछा तो किसी और से क्या पूछते? अपने आप में यह प्रश्न है भी बेतुका। पर जब बातें सामने ही बेतुकी आयेंगी तो ऐसे प्रश्न भी आएंगे।

    हुआ यूँ कि उस दिन हम अपने एक मित्र के साथ एक होटल में चाय पीने के लिए गये, वहाँ पर कई लोग अपने मोबाइल फोन हाथ में पकड़े और कान में इयरफोन डालकर समाधिस्थ अवस्था में बैठे और खडे थे। हमने चाय वाले को चाय लाने का आदेश दिया तो वह बोला-” महाराज, आप लोग भी अपने साथ मोबाइल लाए हो कि नहीं?’

    हमने चौंककर पूछा कि-”तुम क्या आज से केवल मोबाइल वालों को ही चाय देने का निर्णय किये बैठे हो। अगर ऐसा है तो हम चले जाते हैं हालांकि हम दोनों की जेब में मोबाइल है पर तुम्हारे यहाँ चाय नहीं पियेंगे। आत्म सम्मान भी कोई चीज होती है।”

    वह बोला-”नहीं महाराज! आज से शहर में एफ.ऍम.बेंड रेडिओ शुरू हो गया है न! उसे सब लोग मोबाइल पर सुन रहे हैं। अब तो ख़ूब मिलेगा गाना-बजाना सुनने को। आप देखो सब लोग वही सुन रहे हैं। आप ठहरे हमारे रोज के ग्राहक और गानों के शौक़ीन तो सोचा बता दें कि शहर में भी ऍफ़।एम्.बेंड ” चैनल शुरू हो गये हैं।”

    ” अरे वाह!”हमने खुश होकर कहा-” मजा आ गया!”

    “क्या ख़ाक मजा आ गया?” हमारे मित्र ने हमारी तरफ देखकर कहा और फिर उससे बोले-”गाने बजाने का मोबाइल से क्या संबंध है? वह तो हम दोनों बरसों से सुन रहे हैं । यह तो अब इन नन्हें-मुन्नों के लिए ठीक है यह बताने के लिए कि गाना दिखता ही नहीं बल्कि बजता भी है। इन लोगों नी टीवी पर गानों को देखा है सुना कहॉ है, अब सुनेंगे तो समझ पायेंगे कि गीत-संगीत सुनने के लिए होते हैं न कि देखने के लिए। “

    हमारे मित्र ने ऐसा कहते हुए अपने पास खडे जान-पहचाने के ऐक लड़के की तरफ इशारा किया था। उसकी बात सुनाकर वह लड़का तो मुस्करा दिया पर वहां कुछ ऐसे लोगों को यह बात नागवार गुजरी जो उन मोबाइल वालों के साथ खडे कौतुक भाव से देख और सुन रहे थे। उनमें एक सज्जन जिनके कुछ बाल सफ़ेद और कुछ काले थे और उनके केवल एक ही कान में इयरफोन लगा था उन्होने अपने दूसरे कान से भी इयर फोन खींच लिया और बोले -”ऐसा नहीं है गाने को कहीं भी और कभी भी कान में सुनने का अलग ही मजा है। आप शायद नहीं जानते।”

    हमारे मित्र इस प्रतिक्रिया के लिए तैयार नहीं था पर फिर थोडा आक्रामक होकर बोला-” महाशय! यह आपका विचार है, हमारे लिए तो गीत-संगीत कान में सुनने के लिए नहीं बल्कि कान से सुनने के लिए है। हम तो सुबह शाम रेडियों पर गाने सुनने वाले लोग हैं। अगर अब ही सुनना होगा तो छोटा ट्रांजिस्टर लेकर जेब में रख लेंगे। ऎसी बेवकूफी नहीं करेंगे कि जिससे बात करनी है उस मोबाइल को हाथ में पकड़कर उसका इयरफोन कान में डाले बैठे रहें । हम तो गाना सुनते हुए तो अपना काम भी बहुत अच्छी तरह कर लेते हैं।”

    वह सज्जन भी कम नहीं थे और बोले-”रेडियो और ट्रांजिस्टर का जमाना गया और अब तो मोबाइल का जमाना है। आदमी को जमाने के साथ ही चलना चाहिए।”

    हमारा मित्र भी कम नहीं था और कंधे उचकाता हुआ बोला-”हमारे घर में तो अभी भी रेडियो और ट्रांजिस्टर दोनों का ज़माना बना हुआ है।अभी तो हम उसके साथ ही चलेंगे।
    बात बढ न जाये इसलिये उसे हमने होटल के अन्दर खींचते हुए कहा-”ठीक है! अब बहुत हो गया। चल अन्दर और अपनी चाय पीते हैं।”

    हमने अन्दर भी बाहर जैसा ही दृश्य देखा और मेरा मित्र अब और कोई बात इस विषय पर न करे विषय बदलकर हमने बातचीत शुरू कर दीं। मेरा मित्र इस बात को समझ गया और इस विषय पर उसने वहाँ कोई बात भी नहीं की । बाद में बाहर निकला कर बोला-” एक बात मेरी समझ में नहीं आ रही कि यह लोग गीत-संगीत के शौक़ीन है या मोबाइल से सुनने के। देखना यह कुछ दिनों का हे शौक़ है फिर कोई नहीं सुनेगा हम जैसे शौकीनों के अलावा।”

    हमने कहा-” यह न तो गीत-संगीत के शौक़ीन है और न ही मोबाइल के! यह तो दिखावे के लिए ही सब कर रहे हैं। देख-सुन समझ सब रहे हैं पर आनंद कितना ले रहे हैं यह पता नहीं।”

    हमारे शहर में एक या दो नहीं बल्कि चार एफ।ऍम.बेंड रेडियो शुरू हो रहे है और इस समय उनका ट्रायल चल रहा है। जिसे देखो इसी विषय पर ही बात कर रहा है। मैं खुद बचपन से गाने सुनने का आदी हूँ और दूरदर्शन और अन्य टीवी चैनलों के दौर में भी मेरे पास एक नहीं बल्कि तीन रेडियो-ट्रांजिस्टर चलती-फिरती हालत में है और शायद हम जैसे ही लोग उनका सही आनद ले पायेंगे और अन्य लोग बहुत जल्दी इससे बोर हो जायेंगे। हम और मित्र इस बात पर सहमत थे कि संगीत का आनंद केवल सुनकर एकाग्रता के साथ ही लिया जा सकता है और सामने अगर दृश्य हौं तो आप अपना दिमाग वहां भी लगाएंगे और पूरा लुत्फ़ नहीं उठा पायेंगे।

    गीत-संगीत के बारे में तो मेरा मानना है कि जो लोग इससे नहीं सुनते या सुनकर उससे सुख की अनुभूति नहीं करते वह अपने जीवन में कभी सुख की अनुभूति ही नहीं कर सकते। गीतों को लेकर में कभी फूहड़ता और शालीनता के चक्कर में भी नही पड़ता बस वह श्रवण योग्य और हृदयंगम होना चाहिए। गीत-संगीत से आदमी की कार्यक्षमता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार अधिक टीवी देखने के बुरे प्रभाव होते हैं जबकि रेडियो से ऐसा नहीं होता। मैं और मेरा मित्र समय मिलने पर रेडियो से गाने जरूर सुनते है इसलिये हमें तो इस खबर से ही ख़ुशी हुई । जहाँ तक कानों में इयर फोन लगाकर सुनने का प्रश्न है तो मेरे मित्र ने मजाक में कहा था पर मैंने उसे गंभीरता से लिया था कि ‘ गीत-संगीत कानों में नहीं बल्कि कानों से सुना जाता है।’

    बहरहाल जिन लोगों के पास मोबाइल है उनका नया-नया संगीत प्रेम मेरे लिए कौतुक का विषय था। घर पहुंचते ही हमने भी अपने ट्रांजिस्टर को खोला और देखा तो चारों चैनल सुनाई दे रहे थे। गाने सुनते हुए हम भी सोच रहे थे-’गीत संगीत का मोबाइल से क्या संबंध ?

    दृष्टा बनकर जो रहेगा


    अगर मन में व्यग्रता का भाव हो तो
    सुहाना मौसम भी क्या भायेगा
    अंतर्दृष्टि में हो दोष तो
    प्राकृतिक सौन्दर्य का बोध
    कौन कर पायेगा
    मन की अग्नि में पकते
    विद्वेष, लालच, लोभ, अहंकार और
    चिन्ता जैसे अभक्ष्य भोजन
    गल जाता है देह का रक्त जिनसे
    तब सूर्य की तीक्ष्ण अग्नि को
    कौन सह पायेगा
    अपने ही ओढ़े गये दर्द और पीडा का
    इलाज कौन कर पायेगा
    कहाँ तक जुटाएगा संपत्ति का अंबार
    कहाँ तक करेगा अपनी प्रसिद्धि का विस्तार
    आदमी कभी न कभी तो थक जाएगा
    जो दृष्टा बनाकर जीवन गुजारेगा
    खेल में खेलते भी मन से दूर रहेगा
    वही अमन से जीवन में रह पायेगा
    ——————