Category Archives: chankya

चाणक्य नीति-कुसंस्कार बुढ़ापे तक पीछा नहीं छोड़ते


वयसः परिणामेऽपि यः खलः खलः एव सः।
सुपक्वमपि माधुर्य नोपयातीद्रवारुणाम्।।

हिंदी में भावार्थ-आयु में बड़ा हो जाने पर भी दुष्ट की दुष्टता का भाव नहीं जाता। जैसे किसी फल का स्वाद स्वाभाविक रूप कड़वा होता है और उसे अधिक देर तक इसलिये पकाया जाये कि उसमें मीठे का स्वाद आ जाये तो वह संभव नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य में संस्कार और आस्थायें स्थापित होने के लिये दस या बारह वर्ष तक की आयु मानी जाती है। कुछ संस्कार तो अगर पांच वर्ष तक पड़ जायें तो ठीक नहीं तो उनका फिर आना मुश्किल होता है। कहने का तात्पर्य है छोटी आयु में ही बच्चों में संस्कार डालने का प्रयास करना चाहिये। कुछ माता पिता यह सोचकर बच्चों की परवाह नहीं करते कि ‘अभी तो छोटा है बड़ा होकर सीख जायेगा‘। इतना ही नहीं वह अपने बच्चों के सामने ही लड़ाई झ्रगड़ा और अपने रिश्तेदारों की निंदा करते हैं-सोचते हैं कि यह छोटा है भला क्या समझेगा? और समझ भी ले तो क्या? माता पिता के व्यवहार, आचरण और कार्य से बच्चे बहुत कुछ सीखते हैं। कई चीजें उनको बताई नहीं जाती बस देखकर ही सीख जाते हैं।

संस्कार और आस्थायें स्थापित करने की आयु में अगर माता पिता ने उचित प्रयास नहीं किया या लापरवाही दिखाई तो बाद में उसका परिणाम उनको भोगना पड़ता है। आजकल समाज में लोगों का अपराध, व्यसन और समाज के प्रति उपेक्षा का जो भाव दिख रहा है वह उनके ही पूर्वजों की लापरवाही का परिणाम है। एक अन्य बात यह है कि माता पिता अपने बच्चे को बस यही सिखाते हैं कि अधिक से अधिक कमाओ, प्रतिष्ठत पद प्राप्त करो और जिंदगी मं केवल अपने स्वार्थ ही पूरे करो। बाद में जब बच्चे उनकी ही उपेक्षा करने लगते हैं तब अपने बुढ़ापे को कोसते हैं। जो माता पिता अपने बच्चों की उपेक्षा की शिकायत करते हैं अगर उनसे कहा जाये कि ‘आपने ही यह संस्कार दिये होंगे।’ तब वह जवाब नहीं दे पायेंगे। आप अपने बच्चे के सामने अपनी पत्नी को प्रसन्न करने के लिये अपने माता पिता, भाई बहिन तथा अन्य रिश्तेदारों की निंदा कर बड़े होने पर उससे किसी प्रकार की उदारता की आशा नहीं कर सकते।
————————–

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Advertisements

चाणक्य नीतिः ‘जस के साथ तस’ नीति में दोष नहीं


संसार विषवृक्षस्य द्वे फले अमृतोपमे।
सुभाषितं च सुस्वादु संगतिः सुजने जनै।।

हिन्दी में भावार्थ-नीति विशारद चाणक्य जी कहते हैं कि इस विषरूपी संसार में दो तरह के फल अमृत की तरह लगते हैं। एक तो सज्जन लोगों की संगत और दूसरा अच्छी वाणी सुनना।
कृते प्रतिकृतं कुर्याद् हिंसने प्रतिहिसंनम्।
तत्र दोषो न पतति दुष्टे दुष्टे सामचरेत्
हिंदी में भावार्थ-
अपने प्रति अपराध और हिंसा करने वाले के विरुद्ध प्रतिकार और प्रतिहिंसा का भाव रखने में कोई दोष नहीं है। उसी तरह दुष्ट व्यक्ति के साथ वैसे ही व्यवहार करना कोई अपराध नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में वैसे तो दुःख और विष के अलावा अन्य कुछ नहीं दिखता पर दो तरह के फल अवश्य हैं जिनका मनुष्य अगर सेवन करे तो उसका जीवन संतोष के साथ व्यतीत किया जा सकता है। इसमें एक तो है ऐसे स्थानो पर जाना जहां भगवत्चर्चा होती हो। दूसरा है सज्जन और गुणी लोगों से संगत करना। दरअसल इस स्वार्थी दुनियां में निष्काम भाव से कुछ समय व्यतीत करने पर ही शांति मिलती है और यह तभी संभव है जब हम स्वार्थ की वजह से बने रिश्तों से अलग ऐसे संतों और सत्पुरुषों की संगत करें जिनका हम में और हमारा उनमें स्वार्थ न हो। इसके अलावा आत्मा को प्रसन्न करने वाली कहीं कोई बात सुनने को मिले तो वह अवश्य सुनना चाहिये।
कहते हैं कि मन में बुरा भाव नहीं रखना चाहिये पर अगर कोई हमारे साथ बुरा बर्ताव करता है तो उससे चिढ़ हो ही जाती है। पंच तत्व से बनी इस देह में बुद्धि, मन और अहंकार ऐसी प्रकृतियां हैं जिन पर चाहे जितना प्रयास करो पर नियंत्रण हो नहीं पाता। सज्जन लोग किसी अन्य द्वारा बुरा बर्ताव करने पर उससे मन में चिढ़ जाते हैं पर बाद में वह इस बात से पछताते हैं कि उनके मन में बुरी बात आई क्यों? अगर किसी बुरे व्यक्ति के बर्ताव से गुस्सा आता है तो उससे विचलित होने की आवश्यकता नहीं है। वैसे जीवन में सतर्कता और सक्रियता आवश्यक है। कोई व्यक्ति हमारे अहित के लिये तत्पर है तो उसका वैसा ही प्रतिकार करने में कोई बुराई नहीं है। बस! इतना ध्यान रखना चाहिये कि उससे हम बाद में स्वयं मानसिक रूप से स्वयं प्रताड़ित न हों।
——————–

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

चाणक्य नीतिःधन कमाने वाले धर्म की स्थापना नहीं कर सकते


अर्थाधीतांश्च  यैवे ये शुद्रान्नभोजिनः
मं द्विज किं करिध्यन्ति निर्विषा इन पन्नगाः

जिस प्रकार विषहीन सर्प किसी को हानि नहीं पहुंचा सकता, उसी प्रकार जिस विद्वान ने धन कमाने के लिए वेदों का अध्ययन किया है वह कोई उपयोगी कार्य नहीं कर सकता क्योंकि वेदों का माया से कोई संबंध नहीं है। जो विद्वान प्रकृति के लोग असंस्कार लोगों के साथ भोजन करते हैं उन्हें भी समाज में समान नहीं मिलता।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- आजकल अगर हम देखें तो अधिकतर वह लोग जो ज्ञान बांटते फिर रहे हैं उन्होंने भारतीय अध्यात्म के धर्मग्रंथों को अध्ययन किया इसलिये है कि वह अर्थोपार्जन कर सकें। यही वजह है कि वह एक तरफ माया और मोह को छोड़ने का संदेश देते हैं वही अपने लिये गुरूदक्षिणा के नाम भारी वसूली करते हैं। यही कारण है कि इतने सारे साधु और संत इस देश में होते भी अज्ञानता, निरक्षरता और अनैतिकता का बोलाबाला है क्योंकि  उनके काम में निष्काम भाव का अभाव है। अनेक संत और उनके करोड़ों शिष्य होते हुए भी इस देश में ज्ञान और आदर्श संस्कारों का अभाव इस बात को दर्शाता है कि धर्मग्रंथों का अर्थोपार्जन करने वाले धर्म की स्थापना नही कर सकते।

सच तो यह है कि व्यक्ति को गुरू से शिक्षा लेकर धर्मग्रंथों का अध्ययन स्वयं ही करना चाहिए तभी उसमें ज्ञान उत्पन्न होता है पर यहंा तो गुरू पूरा ग्रंथ सुनाते जाते और लोग श्रवण कर घर चले जाते। बाबआों की झोली उनके पैसो से भर जाती। प्रवचन समाप्त कर वह हिसाब लगाने बैठते कि क्या आया और फिर अपनी मायावी दुनियां के विस्तार में लग जाते हैं। जिन लोगों को सच में ज्ञान और भक्ति की प्यास है वह अब अपने स्कूली शिक्षकों को ही मन में गुरू धारण करें और फिर वेदों और अन्य धर्मग्रंथों का अध्ययन शुरू करें क्योंकि जिन अध्यात्म गुरूओं के पास वह जाते हैं वह बात सत्य की करते हैं पर उनके मन में माया का मोह होता है और वह न तो उनको ज्ञान दे सकते हैं न ही भक्ति की तरफ प्रेरित कर सकते हैं। वह करेंगे भी तो उसका प्रभाव नहीं होगा क्योंकि जिस भाव से वह दूर है वह हममें कैसे हो सकता है।

चाणक्य नीति:समय का ख्याल करना पशु-पक्षियों से सीखें


1.जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुचाने वाले मर्मभेदी वचन बोलते हैं, दूसरों की बुराई करने में खुश होते हैं। अपने वचनों द्वारा से कभी-कभी अपने ही वाचों द्वारा बिछाए जाल में स्वयं ही घिर जाते हैं और उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जिस तरह रेत की टीले के भीतर बांबी समझकर सांप घुस जाता है और फिर दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है।

2.समय के अनुसार विचार न करना अपने लिए विपत्तियों को बुलावा देना है, गुणों पर स्वयं को समर्पित करने वाली संपतियां विचारशील पुरुष का वरण करती हैं। इसे समझते हुए समझदार लोग एवं आर्य पुरुष सोच-विचारकर ही किसी कार्य को करते हैं।
3.मनुष्य को कर्मानुसार फल मिलता है और बद्धि भी कर्म फल से ही प्रेरित होती है। इस विचार के अनुसार विद्वान और सज्जन पुरुष विवेक पूर्णता से ही किसी कार्य को पूर्ण करते हैं।जब तक बारिश नहीं आती कोयल नहीं गाती, वह समयानुकूल स्वर निकालती है।

4.पशु-पक्षी समय के अनुसार अपने क्रियाएँ करते हैं और जो मनुष्य समय का ध्यान नहीं रखते वह पशु-पक्षियों से भी गए गुजरे हैं।
5.उसी कवि की शोभा और उपयोगिता होती है जो समयानुकूल होता है। बेमौसम राग अलापना जग हँसाई कराना है।

चाणक्य नीति:देवता तो बस भावना में बसते हैं


1.जिस प्रकार फूल में गंध, तिल में तेल, लकडी में आग, दूध में घी और ईख में गुड होता है वैसे ही शरीर में आत्मा होती है यह विचार करना चाहिऐ।
2.देवता न कंठ में, न मिटटी की मूर्ति में होते हैं। वह तो केवल भावना में बसते हैं। इसलिए ही भावना ही सब कुछ है।
3.धातु, काष्ट और पाषाण की मूर्ति को भावनानुसार पूजन करने से ही भगवान की कृपा की सिद्धि होती है।
4. जो इंसान मुक्ति की इच्छा रखते हों तो उसे विषय रुपी विष को त्याग देना चाहिऐ। सरलता, पवित्रता और सत्य का अमृत की तरह पान करना चाहिए।
5.सोने में महक, ईख में फल, चन्दन में फूल, धनी-विज्ञान , दीर्घजीवी राजा क्या विधाता ने इनको नहीं बनाया। क्या ब्रह्मा की तरह कोई बुद्धि दाता न था। *
*इसका आशय यह है कि भला कहीं सोने में सुगंध होती है। ईख में फल और चन्दन में फूल नहीं होते। विज्ञान कभी धनी नहीं होता और राजा कभी दीर्घजीवी नहीं होता। विधाता ने ऐसा नहीं किया। क्या विधाता को ऐसी बुद्धि देने वाला कोई नहीं मिला था। सीधा आशय यह है की विधाता ने सब सोच समझकर बनाया है। उसकी महिमा इसलिए अपरंपार मानी जाती है।

चाणक्य नीति:अपनों का अपमान अधिक दुख:दायी


1.ऐसा व्यक्ति अविश्वसनीय होता है जो क्रुद्ध होने पर सारे भेद देता है। ऐसा व्यक्ति कदापि मित्रता के योग्य नहीं होता है। ऐसा व्यक्ति निकृष्ट श्रेणी का होता है और जो भी ऐसे व्यक्ति को मित्र बनाता है वह सदैव धोखा ही खाता है।
2.पार्थिव अग्नि की ज्वाला से भी अधिक दग्ध करने वाली मन की अग्नि होती है, और वह मन और शरीर दोनों को भस्म कर देती है।
पत्नी के वियोग का अग्नि मनुष्य को जलाने वाली होती है, विशेषकर वृद्धावस्था में मिलने वाला यह दर्द अधिक कष्टकारी होता है।

3.अपमान की अग्नि मनुष्य को दग्ध कर देती है। विशेषकर बंधु-बांधवों द्वारा किया गया अपमान तो दिल को जलाकर ही रख देता है। इसी प्रकार कर्जा न अदा न कर पाने की चिंता भी मनुष्य को जलाती है। इसी प्रकार कर्जा अदा न कर पाने की चिंता भी मनुष्य को जलाती है।

4.दुष्ट राजा की सेवा, दरिद्रों और मूर्खों की सभा से भी जो अपमान होता है वह शरीर को जलाता है।

var sc_project=3285392;
var sc_invisible=0;
var sc_partition=21;
var sc_security=”8ed208b9″;

website stats

चाणक्य नीति:अपनी हानि किसी को नहीं बतानी


१.बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने धन की हानि, अपने मानसिक संताप, अपने घर-परिवार के सदस्यों के दोष तथा किसी दुष्ट द्वारा अपने पर किये गए प्रहार और अपमान की भूलकर किसी से भी चर्चा किसी अन्य व्यक्ति से चर्चा न करे. इन सब बातों को यथासंभव गुप्त रखना चाहिए.
२.बुद्धिमान पुरुष को भय से तब तक डरना चाहिए जब तक वह सामने नहीं आ जाता. जब वह सामने आ जाता है तो उसका सामना करने के लिए मनस्थिति बना लेनी चाहिऐ.
३.बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिऐ कि वह अपने अपनी स्थिति पर विचार करता रहे कि उसके कितने मित्र है, उसका समय कैसा है, उसका निवास कैसा है और उसकी आय कितनी है और व्यय कितना है.
४.बुद्धिमान को चाहिऐ कि वह अपनी स्त्री से ही संतोष करे चाहे वह रूपवती हो अथवा साधारण, वह सुशिक्षित हो अथवा निरक्षर. इसी प्रकार को जो भोजन प्राप्त हो जाये, उसी से संतोष करना चाहिऐ. आजीविका से प्राप्त धन के संबंध में भी विचार करना चाहिए.
५.बुद्धिमान व्यक्ति को स्वाध्याय करते रहना चाहिए और शास्त्रों के अध्ययन, प्रभु के नाम का स्मरण और दान करने से कभी संतोष नहीं करना चाहिए.

शीतल चांदनी का आनंद उठाए कौन


रात्रि में चन्दा बिखेरता
अब भी पहले की तरह
शीतल चांदनी
पर उसका आनन्द उठाएँ कौन
दूरदर्शन और कम्प्यूटर से
अपनी आखें लेकर जूझता आदमी
बाहर है प्राकृतिक सौन्दर्य
खङा है मौन

प्रथम किरणों के साथ
जीवन का संदेश देता सूर्य
रात को देर तक सोकर
सुबह देर बिस्तर छोड़ें आदमी
प्रात:काल नमन करे कौन
शीतल और शुद्ध पवन
आवारा फिरती है
वातानुकूलित कमरों में
उसका है प्रवेश वर्जित
सुखद अनुभूति पाए कौन
कई सदियों से शहर के बीच
बहती है नदी की धारा
नालियों से बहकर आती गंदिगी ने
उसकी शुद्ध आत्मा को मारा
अपने शहर में ही हो गया
आदमी अब परदेशी
उसका हमसफ़र बने कौन

प्राणवायु का सर्जन कर
उसे चारों और  बिखेर  रहा है
बरगद का पेड
जीवंत ह्रदय की प्रतीक्षा में
खड़ा है मौन
जीने की चाह है सभी को
सुख और आनन्द भी मांगें
पर इनका मतलब
समझा पाता कौन
——————-
हरियाली को बेघर कर
पत्थरों के जंगल खडे कर रहा है
जिसे देखो  वही
आत्मघाती हमले कर रहा है
हवाओं में खुद ही डालता
विषैली गैसें आदमी
हर कोई जीवन को मौत का
सन्देश दे रहा है

चाणक्य नीति:अपनी योजना गुप्त रखने पर ही सफलता संभव


१. यदि आप सफलता हासिल करना चाहते हैं तो गोपनीयता रखना सीख लें. जब किसी कार्य की सिद्धि के लिए कोई योजना बना रहे हैं तो उसके कार्यान्वयन और सफल होने तक उसे गुप्त रखने का मन्त्र आना चाहिए. अन्य लोगों की जानकारी में अगर आपकी योजना आ गयी तो वह उसमें सफलता संदिग्ध हो जायेगी.

२.प्रत्येक व्यक्ति को स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए. उसे प्रतिदिन धर्म शास्त्रों का कम से कम एक श्लोक अवश्य पढ़ना चाहिए. इससे व्यक्ति को ज्ञान प्राप्त होता है और उसका भला होता है.

३.विवेकवान मनुष्य को जन्मदाता, दीक्षा देकर ज्ञान देने वाले गुरु, रोजगार देने वाले स्वामी एवं विपत्ति में सहायता करने वाले संरक्षक को सदा आदर देना चाहिए.

४.मनुष्य को चाहिए की कोई कार्य छोटा हो या बड़ा उसे मन लगाकर करे. आधे दिल व उत्साह से किये गए कार्य में कभी सफलता नहीं मिलती. पूरी शक्ति लगाकर अपने प्राणों की बाजी लगाकर कार्य करने का भाव शेर से सीखना चाहिए.

५.अपनी सारी इन्द्रियों को नियंत्रण में कर स्थान, समय और अपनी शक्ति का अनुमान लगाकर कार्य सिद्धि के लिए जुटना बगुले से सीखना चाहिए.

चाणक्य नीति:बुद्धिमान अपने आहार की चिंता नहीं करते


१.बुद्धिमान पुरुष को आहार जुटाने के चिंता नहीं करना चाहिए, उसे तो केवल अपने धर्म और अनुष्ठान में लगना चाहिए क्योंकि उसका आहार तो उसके मनुष्य जन्म लेते ही उत्पन्न हो जाता है.

अभिप्राय-इसका अभिप्राय यह है कि परमपिता परमात्मा ने जिसे जन्म दिया है उसके लिए आहार का इंतजाम तो उसके भाग्य में लिख दिया है, कहा भी जाता है कि दाने-दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम. आदमी में यह अहंकार रहता है कि में खुद अर्जित कर रहा हूँ जबकि वह तो उसके भाग्य में लिखा है.

लोगों से जब कहा जाता है कि ‘भाई,. धर्म कर्म और भगवान् की भक्ति कर लो.’ तो वह कहते हैं कि समय ही कहाँ मिल पाता. परिवार के लिए रोटी कमाने से फुरसत ही कहाँ है?

ऐसा कहकर अपने को धोखा देते हैं. यहाँ कोई किसी को नहीं पाल सकता. सब अपने लिए नियत भाग्य का खा रहे हैं. आपने देखा होगा कि कोइ व्यक्ति जब मार जाता है तो उसके पीछे कोई और मरने नहीं जाता कि अब तो अमुक मर गया है और अब में कहाँ से रोटी खाऊंगा. अब जिंदा लोग यह खुशफहमी पालें के में किसी को भोजन और वस्त्र और अन्य वस्तुएं उपलब्ध करा रहा हूँ तो उसे भ्रमित नहीं तो क्या कहा जायेगा. यह भ्रम नहीं तो और क्या है कि लोग अपना पूरा जीवन अपने जिस परिवार को अर्पित करते हुए धर्म-कर्म और अनुष्टान से दूर रहकर गुजार देते हैं और वह उनके बाद भी यथावत चलता है.

चाणक्य नीति:मन में पाप हो तो तीर्थ से भी शुद्धि नहीं


१.आंखों से देखभाल का पैर रखें, पानी कपडे से छान कर पीयें. शास्त्रानुसार वाक्य बोलें, मन में सोच कर कार्य करें.
२.दान, शक्ति, मीठा बोलना, धीरता और सम्यक ज्ञान यह चार प्रकार के गुण जन्म जात होते हैं, यह अभ्यास से नहीं आते.
३.जिसकी मन में पाप हैं, वह सौ बार तीर्थ स्नान करने के बाद भी पवित्र नहीं हो सकता, जिस प्रकार मदिरा का पात्र जलाने पर भी शुद्ध नहीं होता.
४.जो वर्ष भर मौन रहकर भोजन करता है, वह हजार कोटी वर्ष तक स्वर्ग लोक में पूजित होता है.
५.पीछे-पीछे बुराई कर काम बिगाड़ने वाले और सामने मधुर बोलने वाले मित्र को अवश्य छोड़ देना चाहिए.
६.कुमित्र पर कदापि विश्वास न करें क्योंकि वह आपकी कभी भी आपकी पोल खोल सकता है.
७.अपने शास्त्रों के किसी एक श्लोक अथवा उस में से भी आधे का प्रतिदिन करना चाहिए. इससे अपने मन और विचार की शुद्ध होती है.

नोट-थक रहे ब्लोगर योग साधना शुरू करें-यह लेखा यहाँ अवश्य पढें

http//dpkraj.blogspot.com

चाणक्य नीति:संतान को शिक्षा न देने वाले माता-पिता शत्रु के समान


१.इस संसार में कुछ प्राणियों के किसी विशेष अंग में विष होता है-जैसे सर्प के दांतों में मक्खी के मस्तिष्क में और बिच्छू की पुँछ में-पर इन सबसे अलग दुर्जन और कपटी मनुष्य के हर अंग में विष होता है. उसके मन में विद्वेष,वाणी में कटुता और कर्म में नीचता का व्यवहार जहर बुझे तीर की तरह दूसरे को त्रास देते हैं.

२.जो माता-पिता अपने पुत्र को शिक्षित नहीं करते वह उसके शत्रु के समान हैं.
संपादकीय अभिव्यक्ति-चाणक्य के काल में पूरा समाज स्त्री को घरेलू शिक्षा तक ही सीमित था पर आज के आधुनिक समाज में यह कथन पुत्री की शिक्षा पर भी लागू होता है.

३.हर मनुष्य को सभी विधाओं में निपुण होना चाहिऐ. बडे लोगों से विनम्रता, विद्वानों से श्रेष्ठ और मधुर ढंग से वार्तालाप का तरीक सीखना चाहिए. जुआरियों से झूठ बोलना और कुशल स्त्रियों से चालाकी का गुण सीखना चाहिए.
४.मनुष्य को ऐसे कर्म करना जिससे उसकी कीर्ति सब और फैले. विद्या, दान, तपस्या, सत्य भाषण और धनोपार्जन के उचित तरीकों से कीर्ति दसों दिशाओं में फैलती है.

५.अपना जीवन शांतिपूर्वक बिताने के लिए हर मनुष्य को धर्म-कर्म का अनुष्ठान करते रहना चाहिऐ. वह घर मुर्दाघर के समान हैं जहाँ धर्म-कर्म या यज्ञ-हवन नहीं होता. जहाँ वेद शास्त्रों का उच्चारण नहीं होता, विद्वानों का सम्मान नहीं होता और यज्ञ-हवन से देवताओं का पूजन नहीं होता ऐसे घर, घर न रहकर शमशान के समान होता है.

चाणक्य नीति:परिवार का सुख उसके स्वरूप पर निर्भर


१.सुखद गृहस्थी और परिवार की सुख समृद्धि इस बात पर निर्भर करती है की परिवार का स्वरूप कैसा है. जहाँ परिवार के सदस्य एक दूसरे के मनोभावों को समझते और सम्मान करे हैं वहीं शांति रह पाती है और शांति से ही सुख समृद्धि आती है.
2. यह मनुष्य का स्वभाव है की यदि वह दूसरे के गुण और श्रेष्ठता को नहीं जानता तो वह हमेशा उसकी निंदा करता रहता है. इस बात से ज़रा भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

उदाहरण- यदि किसी भीलनी को गजमुक्ता (हाथी के कपाल में पाया जाने वाला काले रंग का मूल्यवान मोती) मिल जाये तो उसका मूल्य न जानने के कारण वह उसे साधारण मानकर माला में पिरो देती है और गले में पहनती है.

3.बसंत ऋतू में फलने वाले आम्रमंजरी के स्वाद से प्राणी को पुलकित करने वाले कोयल की वाणी जब तक मधु और कर्ण प्रिय नहीं हो जाती तबतक मौन रहकर ही अपना जीवन व्यतीत करती है.
इसका आशय यह है हर मनुष्य को किसी भी कार्य को करने के लिए उचित समय की प्रतीक्षा करना चाहिए अन्यथा असफलता का भय बना रहता है.
4.राजा , अग्नि, गुरु और स्त्री इन चारों से न अधिक दूर रहना चाहिऐ न अधिक पास अर्थात इनकी अत्यधिक समीपता विनाश का कारण बनती है और इनसे दूर रहने पर भी कोई लाभ नहीं होता. अत: विनाश से बचने के लिए बीच का रास्ता अपनाना चाहिऐ.
५.अधिक लाड प्यार बच्चे में में दोष उत्पन्न करता है और प्रताड़ना से ही उसमें सुधार आता है.

चाणक्य नीति: इस कड़वे संसार में दो मीठे फल भी लगते हैं


१.इस संसार की तुलना एक कड़वे वृक्ष से की जाती है जिस पर पर अमृत के समान दो फल भी लगेते हैं-मधुर वचन और सद्पुरुषों की संगति. ये दोनों अत्यंत गुणकारी होते हैं. इन्हें खाकर आदमी अपने जीवन को सुखद बना सकता है. अत हर मनुष्य को मधुर वचन और सत्संग का फल ग्रहण करना चाहिए

2.जिसके कार्य में स्थिरता नहीं है, वह समाज में सुख नहीं पाता न ही उसे जंगल में सुख मिलता है. समाज के बीच वह परेशान रहता है और किसी का साथ पाने के लिए तरस जाता है.
3.गंदे पड़ोस में रहना, नीच कुल की सेवा, खराब भोजन करना, और मूर्ख पुत्र बिना आग के ही जला देते हैं.
4.कांसे का बर्तन राख से, तांबे का बर्तन इमले से,स्त्री रजस्वला कृत्य से और नदी पानी की तेज धारा से पवित्र होती है.
5.मनुष्य में अंधापन कई प्रकार का होता है. एक तो जन्म के अंधे होते हैं और आंखों से बिलकुल नहीं देख पाते और कुछ आँख के रहते हुए भी हो जाते हैं जिनकी अक्ल को कुछ सूझता नहीं है.
6.काम वासना के अंधे के कुछ नहीं सूझता और मदौन्मत को भी कुछ नहीं सूझता. लोभी भी अपने दोष के कारण वस्तु में दोष नहीं देख पाता. कामांध और मदांध इसी श्रेणी में आते हैं.
7.कुछ लोगों की प्रवृतियों को ध्यान में रखते हुए उनको वश में किया जा सकता है, और उनको वश में किया जा सकता है, लोभी को धन से, अहंकारी को हाथ जोड़कर, मूर्ख को मनमानी करने देने से और सत्य बोलकर विद्वान को खुश किया जा सकता है.

चाणक्य नीति:धर्म का नियम ही शाश्वत


१.शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आयुर्वेद तथा धनुर्वेद की विद्याओं की भी गणना भी नहीं की जा सकती है, इसके विपरीत मनुष्य का जीवन अल्प है और उस अल्पकाल के जीवन में रोग,शोक, कष्ट आदि अनेक प्रकार की बाधाएं उपस्थित होती रहती हैं। इस स्थिति में मनुष्य को शास्त्रों का सार ग्रहण करना चाहिए।

२.मन की शुद्ध भावना से यदि लकड़ी, पत्थर या किसी धातु से बनी मूर्ति की पूजा की जायेगी तो सब में व्याप्त परमात्मा वहां भी भक्त पर प्रसन्न होंगें। अगर भावना है तो जड़ वस्तु में भी भगवान का निवास होता है । इस क्षण-भंगुर संसार में धन-वैभव का आना-जाना सदैव लगा रहेगा। लक्ष्मी चंचल स्वभाव की है। घर-परिवार भी नश्वर है। बाल्यकाल, युवावस्था और बुढ़ापा भी आते हैं और चले जाते हैं। कोई भी मनुष्य उन्हें सदा ही उन्हें अपने बन्धन में नहीं बाँध सकता। इस अस्थिर संसार में केवल धर्म ही अपना है। धर्म का नियम ही शाश्वत है और उसकी रक्षा करना ही सच्चा कर्तव्य है।सच्ची भावना से कोई भी कल्याणकारी काम किया जाये तो परमात्मा की कृपा से उसमें अवश्य सफलता मिलेगी। मनुष्य की भावना ही प्रतिमा को भगवान बनाती है। भावना का अभाव प्रतिमा को भी जड़ बना देता है।
३.जिस प्रकार सोने की चार विधियों-घिसना, काटना, तपाना तथा पीटने-से जांच की जाती है, उसी प्रकार मनुष्य की श्रेष्ठता की जांच भी चार विधियों-त्यागवृति, शील, गुण तथा सतकर्मो -से की जाती है।

४.अज्ञानी व्यक्ति को कोई भी बात समझायी जा सकती है क्योंकि उसे किसी बात का ज्ञान तो है नहीं। अत: उसे जो कुछ समझाया जाएगा वह समझ सकता है, ज्ञानी को तो कोई बात बिल्कुल सही तौर पर समझायी जा सकते है। परन्तु अल्पज्ञानी को कोई भी बात नही समझायी क्योंकि अल्पज्ञान के रुप में अधकचरे ज्ञान का समावेश होता है जो किसी भी बात को उसके मस्तिष्क तक पहुंचने ही नहीं देता।

*संकलनकर्ता का मत है कि अल्पज्ञानी को अपने ज्ञान का अहंकार हो जाता है इसलिये वह कुछ सीखना ही नहीं चाहता, वह केवल अपने प्रदर्शन में ही लगा रहता है।
नोट-रहीम, चाणक्य, कबीर और कौटिल्य की त्वरित पोस्टें नारद और ब्लोगवाणी पर अभी उपलब्ध हैं, अत: वहाँ देखने का प्रयास करें.

चाणक्य नीति:आलस्य मनुष्य का स्वाभाविक दुर्गुण


1.जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुचाने वाले मर्मभेदी वचन बोलते हैं, दूसरों की बुराई करने में खुश होते हैं। अपने वचनों द्वारा से कभी-कभी अपने ही वाचों द्वारा बिछाए जाल में स्वयं ही घिर जाते हैं और उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जिस तरह रेत की टीले के भीतर बांबी समझकर सांप घुस जाता है और फिर दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है।
2.समय के अनुसार विचार न करना अपने लिए विपत्तियों को बुलावा देना है, गुणों पर स्वयं को समर्पित करने वाली संपतियां विचारशील पुरुष का वरण करती हैं। इसे समझते हुए समझदार लोग एवं आर्य पुरुष सोच-विचारकर ही किसी कार्य को करते हैं। मनुष्य को कर्मानुसार फल मिलता है और बद्धि भी कर्म फल से ही प्रेरित होती है। इस विचार के अनुसार विद्वान और सज्जन पुरुष विवेक पूर्णता से ही किसी कार्य को पूर्ण करते हैं।
3.ऐसा धन जो अत्यंत पीडा, धर्म त्यागने और बैरियों के शरण में जाने से मिलता है, वह स्वीकार नहीं करना चाहिए। धर्म, धन, अन्न, गुरू का वचन, औषधि हमेशा संग्रहित रखना चाहिए, जो इनको भलीभांति सहेज कर रखता है वह हेमेशा सुखी रहता है।बिना पढी पुस्तक की विद्या और अपना कमाया धन दूसरों के हाथ में देने से समय पर न विद्या काम आती है न धनं.

4.जो बात बीत गयी उसका सोच नहीं करना चाहिए। समझदार लोग भविष्य की भी चिंता नहीं करते और केवल वर्तमान पर ही विचार करते हैं।हृदय में प्रीति रखने वाले लोगों को ही दुःख झेलने पड़ते हैं। प्रीति सुख का कारण है तो भय का भी। अतएव प्रीति में चालाकी रखने वाले लोग ही सुखी होते हैंजो व्यक्ति आने वाले संकट का सामना करने के लिए पहले से ही तैयारी कर रहे होते हैं वह उसके आने पर तत्काल उसका उपाय खोज लेते हैं। जो यह सोचता है कि भाग्य में लिखा है वही होगा वह जल्द खत्म हो जाता है। मन को विषय में लगाना बंधन है और विषयों से मन को हटाना मुक्ति है.
5.आलस्य मनुष्य के स्वभाव का बहुत बड़ा दुर्गुण है। आलस्य के कारण प्राप्त की गयी विद्या भी नष्ट हो जाती है दुसरे के हाथ में गया धन कभी वापस नहीं आता।बीज अच्छा न हो तो फसल भी अच्छी नहीं होती और थोडा बीज डालने से भी खेत उजड़ जाते हैंसेनापति कुशल न हो तो सेना भी नष्ट हो जाती है। शील के संरक्षण में कुल का नाम उज्जवल होता है।
6.बुरे राजा के राज में भला जनता कैसे सुखी रह सकती है। बुरे मित्र से भला क्या सुख मिल सकता है। वह और भी गले की फांसी सिद्ध हो सकता है। बुरी स्त्री से भला घर में सुख शांति और प्रेम का भाव कैसे हो सकता है। बुरे शिष्य को गुरू लाख पढाये पर ऐसे शिष्य पर किसी भी प्रकार का प्रभाव नहीं पड़ सकता है।

चाणक्य नीति:जहाँ यज्ञ-हवन न हो वह घर मुर्दाघर समान


१.इस संसार में कुछ प्राणियों के किसी विशेष अंग में विष होता है-जैसे सर्प के दांतों में मक्खी के मस्तिष्क में और बिच्छू की पुँछ में-पर इन सबसे अलग दुर्जन और कपटी मनुष्य के हर अंग में विष होता है. उसके मन में विद्वेष,वाणी में कटुता और कर्म में नीचता का व्यवहार जहर बुझे तीर की तरह दूसरे को त्रास देते हैं.

२.किसी भी व्यक्ति को वह स्थान भी त्याग देना चाहिए जहाँ आजीविका न हो क्योंकि आजीविका रहित मनुष्य समाज में किसी सम्मान के योग्य नहीं रह जाता.

३.हर मनुष्य को सभी विधाओं में निपुण होना चाहिऐ. बडे लोगों से विनम्रता, विद्वानों से श्रेष्ठ और मधुर ढंग से वार्तालाप का तरीक सीखना चाहिए. जुआरियों से झूठ बोलना और कुशल स्त्रियों से चालाकी का गुण सीखना चाहिए.
४.मनुष्य को ऐसे कर्म करना जिससे उसकी कीर्ति सब और फैले. विद्या, दान, तपस्या, सत्य भाषण और धनोपार्जन के उचित तरीकों से कीर्ति दसों दिशाओं में फैलती है.

५.अपना जीवन शांतिपूर्वक बिताने के लिए हर मनुष्य को धर्म-कर्म का अनुष्ठान करते रहना चाहिऐ. वह घर मुर्दाघर के समान हैं जहाँ धर्म-कर्म या यज्ञ-हवन नहीं होता. जहाँ वेद शास्त्रों का उच्चारण नहीं होता, विद्वानों का सम्मान नहीं होता और यज्ञ-हवन से देवताओं का पूजन नहीं होता ऐसे घर, घर न रहकर शमशान के समान होता है.

चाणक्य नीति:हिंसक पशु,नदी और राजपरिवार सदैव विश्वसनीय नहीं


१.केवल मनुष्य योनि में जन्म लेने से सब मनुष्य एक समान नहीं हो जाते. एक ही माँ के गर्भ से उत्पन्न एक ही राशि-नक्षत्र में जन्म लेने वाले दो जुड़वां भाई भी बिलकुल अलग कर्म करने वाले और भिन्न गुण और स्वभाव वाले होते है. शायद पुराने कर्म फल के कारण सभी में ऐसी विभिन्नता आती है.
२.जिस प्रकार मछली देख-देखकर संतान का पालन करती है,कछुई केवल ध्यान द्वारा ही संतान की देखभाल करती है और मादा पक्षी अपने अण्डों को सेकर या छूकर अपनी संतान का पालन करती हैं उसी परकार सज्जन की संगती अपने संपर्क में आने वालों को भगवान् के दर्शन, ध्यान और चरण-स्पर्श आदि का आभास कराकर कल्याण करती है.
३.संसार में सुख की अपेक्षा दु:खों का अस्तित्व अधिक माना जता है, तीन प्रकार के संताप ऐसे हैं जिनसे मनुष्य घिरा रहता है. मन, स्थिति और दुर्भाग्य के कष्टों का निवारण भी तीन प्रकार के उपायों से होता है- गुणवान पुत्र मधुर भाषिणी पत्नी और श्रेष्ठ पुत्र की संगति.

४.लंबे नाखून धारण करने वाले हिंसक पशु, नदिया एवं राजपरिवार हमेशा विश्वसनीय नहीं होते क्योंकि इनके स्वभाव में परिवर्तन आते रहते हैं.

चाणक्य नीति:धन मिले तो भी बैरी के पास न जाएं


1.जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुचाने वाले मर्मभेदी वचन बोलते हैं, दूसरों की बुराई करने में खुश होते हैं। अपने वचनों द्वारा से कभी-कभी अपने ही वाचों द्वारा बिछाए जाल में स्वयं ही घिर जाते हैं और उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जिस तरह रेत की टीले के भीतर बांबी समझकर सांप घुस जाता है और फिर दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है।

2.समय के अनुसार विचार न करना अपने लिए विपत्तियों को बुलावा देना है, गुणों पर स्वयं को समर्पित करने वाली संपतियां विचारशील पुरुष का वरण करती हैं। इसे समझते हुए समझदार लोग एवं आर्य पुरुष सोच-विचारकर ही किसी कार्य को करते हैं।
3.मनुष्य को कर्मानुसार फल मिलता है और बद्धि भी कर्म फल से ही प्रेरित होती है। इस विचार के अनुसार विद्वान और सज्जन पुरुष विवेक पूर्णता से ही किसी कार्य को पूर्ण करते हैं।

4.ऐसा धन जो अत्यंत पीडा, धर्म त्यागने और बैरियों के शरण में जाने से मिलता है, वह स्वीकार नहीं करना चाहिए। धर्म, धन, अन्न, गुरू का वचन, औषधि हमेशा संग्रहित रखना चाहिए, जो इनको भलीभांति सहेज कर रखता है वह हेमेशा सुखी रहता है।बिना पढी पुस्तक की विद्या और अपना कमाया धन दूसरों के हाथ में देने से समय पर न विद्या काम आती है न धनं.

5.जो बात बीत गयी उसका सोच नहीं करना चाहिए। समझदार लोग भविष्य की भी चिंता नहीं करते और केवल वर्तमान पर ही विचार करते हैं।हृदय में प्रीति रखने वाले लोगों को ही दुःख झेलने पड़ते हैं।
6.प्रीति सुख का कारण है तो भय का भी। अतएव प्रीति में चालाकी रखने वाले लोग ही सुखी होते हैं.
7.जो व्यक्ति आने वाले संकट का सामना करने के लिए पहले से ही तैयारी कर रहे होते हैं वह उसके आने पर तत्काल उसका उपाय खोज लेते हैं। जो यह सोचता है कि भाग्य में लिखा है वही होगा वह जल्द खत्म हो जाता है। मन को विषय में लगाना बंधन है और विषयों से मन को हटाना मुक्ति है.