रामनवमी पर अध्ययन और चिंत्तन जरूरी-हिंदी लेख


      आज रामनवमी का पर्व पूरे देश में बड़े उल्लास के साथ मनाया जा रहा है।  इस अवसर पर अनेक धर्मभीरु लोग मंदिरों में जाकर आरती, भजन तथा वहां मूर्तियों के अभिषेक आदि कार्यक्रमों में भाग लेकर आनंद उठाते हैं।  अनेक मंदिरों में लंगर आदि का कार्यक्रम भी होता है।  हम जैसे योग तथा ज्ञानसाधकों को ऐसे अवसर नये नये अनुभवों को अपने साथ जोड़ने का होता है। सच बात तो यह है कि योगविद्या के साथ ही श्रीमद्भागवत गीता के साथ जुड़ने पर इस संसार को देखने का हमारा ही दृष्टिकोण ही बदल गया है।  नित नयी अनुभूतियां होती हैं।  अनेक सुखद प्रसंग सामने इस तरह आते हैं कि कहना पड़ता है कि परमात्मा के खेल निराले हैं।

      पिछले दस बारह वर्षों से भारत में योग विद्या का प्रचार बढ़ा है। अनेक लोग मिलजुलकर योग साधना करते हैं।  इस दौरान आसन, प्राणायाम, ध्यान और मंत्रजाप करते करते वह एक दूसरे के सत्संगी बन जाते हैं।  भारतीय योग संस्थान और पतंजलि योग संस्थान के बैनरों के साथ होने वाले इन योग शिविरों ने सत्संगियों का एक नया समूह बनाया है।  हमने देखा है कि हमारे देश में पूजा पद्धतियों को लेकर अनेक पंथ बन चुके हैं। उनके पंथ प्रमुख अपने भक्तों के लिये पूज्यनीय माने जाते हैं।  उनके परमधाम गमन के पद उनका विश्राम आसन या कहें कुर्सी पर बैठने वाला दूसरा मनुष्य भी वहां प्रतिष्ठत होकर उनका  संचालन करता है।  इस तरह  पेशेवर ढंग से हमारे धार्मिक पंथ भी अपनी अध्यात्मिक विरासात संभाले रहते हैं।  आमतौर से अनेक धार्मिक विशेषज्ञ इन पंथों में बंटे समाज के विरोधी है पर योग शिविरों के आधार पर इन समूहों को वैसा नहीं माना जा सकता।

          पिछले कुछ वर्षों से रामनवमी, मकर सक्रांति, होली, जन्माष्टमी तथा अन्य धार्मिक पर्वों के अवसर पर हमारा संपर्क ऐसे ही योग शिविर से जुड़े लोगों से बढ़ता जा रहा है।  ऐसे अवसरों पर उनके साथ मिलकर बैठने में आनंद आता है।  यह आनंद रक्तशिराओं में जिस तरह के अमृत का संचालन करता है वह केवल योग से जुड़ी देह के लिये ही संभव है।

    आज रामनवमी के अवसर पर ऐसे ही एक योग सत्संगी के साथ हम अपने ही शहर के उन मंदिरों में गये जहां पहले भी जाते रहे हैं। इन मंदिरों का समय के साथ साथ आकर्षण बढ़ता ही गया है।  वह सत्संगी इन मंदिरों में हमारे साथ पहली बार चले।  वह बहुत प्रसन्न हुए।  कहने लगे ‘आपके साथ इतना घूमने में आज आनंद आ गया।’

 हमने हंसकर कहा कि‘‘जब भी ऐसे धार्मिक पर्व आते हैं हम अपने ही शहर के मंदिरों में जाकर आंनद उठाते हैं। सच बात तो यह है कि लोगों को बाहर दूसरे शहर में जाकर आंनद उठाने की बात मन में इसलिये आती है क्योंकि वह अपने शहर में घूमते नहीं।  उनका आदत ही नहीं। अगर अपने शहर में ही आनंद उठाने का अभ्यास हो तो फिर मन तृप्त हो जाता है तब कहीं बाहर जाकर भटकने का विचार नहीं आता है।’’

    वह हमारी बात से  सहमत हुए। सांई बाबा, वैष्णो देवी, राम मंदिर, और गोवर्धन के मंदिर हमारे शहर में भी हैं।  इन स्थानों में जाकर ध्यान लगाने के बाद मन तृप्त हो जाता है।  ऐसे में कोई व्यक्ति दूसरे शहर में प्रसिद्ध मंदिरों जाकर वहां दर्शन के लिये प्रेरित करता है तब उसे ना करना पड़ता है।  नाराज लोग कहते हैं कि‘‘यार, कहीं बाहर जाकर घूमा करो। क्या हमेशा यहीं पड़े रहते हो?’’

    उनके ताने पर मुस्कराकर चुप रहना ही पड़ता है। श्रीमद्भागवत गीता के  संदेशों की बात उनसे करना व्यर्थ है।  हमने देखा है कि ऐसे महान दर्शन के बाद घर लौटे लोग अपने साथ थकावट लाते हैं। यह थकावट उनके दर्शन के आनंद को सुखा देती है।  रेल की यात्रा करने के बाद भीड़ में जूझते हुए जिन मंदिरों के वह दर्शन करते हैं इसके लिये उनकी प्रशंसा ही करना चाहिये। मगर घर लौटकर सभी के सामने उसका प्रचार करने की बात कुछ जमती नहीं है।  फिर जब हमारा दर्शन कहता है कि परमात्मा सभी जगह मौजूद है तब ऐसे प्रयास करना अजीब लगता है।  एक बात तय रही कि ऐसे लोग अपने ही शहरों में घूमते नहीं है।  उनके लिये दूर के ढोल ही सुहावने हैं। हमारी यह अनुभूति है कि  पास के ढोल का आनंद उठाने के लिये योग वि़द्या के साथ जुड़ना ही एकमात्र विकल्प है।  सच बात तो यह है कि योग तो सभी करते हैं। अंतर इतना है कि योग विद्या से जुड़ा साधक सहज योग करता है और न करने वाला असहज योगी हो जाता है। देह में स्थित मन इधर उधर दौड़ाकर असहज करता है। जबकि योग साधक अपने मन को जोड़ने के लिये विकल्प स्वयं चुनता है।  कुछ धार्मिक प्रवचनकर्ता कहते हैं कि काम, क्रोध, मोह, लोभ तथा अहंकार छोड़ दो।  यह संभव नहीं है। योग विद्या से उन पर नियंत्रित किया जा सकता है।

               आज रामनवमी का पर्व हमारे लिये अध्यात्मिक सक्रियता का दिन रहता है।  मंदिरों में जाकर ध्यान लगाते हैं।  वहां अन्य भक्तों के श्रद्धामय प्रयास सुखद अनुभूति देते हैं।  इस आंनद को व्यक्त करने के लिये शब्द नहीं होते। किसी पर हंसते नहीं है वरन् उनकी सक्रियता देखकर उनके चेहरे पर आये सहज भाव को पढ़ते हैं।  सच बात तो यह है कि जब कोई आदमी पूजा, आरती या भजन कार्यक्रम में शामिल होता है तब उसके हृदय का भाव सात्विक हो जाता है।  यही चेहरे पर प्रकट होता है।

      इस रामनवमी पर सभी ब्लॉग लेखक मित्रों तथा पाठकों के इस आशा के साथ बधाई। साथ ही इस बात की शुभकामनायें कि उनके हृदय का अध्यात्मिक विकास हो।

 

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
jpoet, Writer and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
 

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