विदेशी खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश का व्यापार-हिन्दी लेख (khudara vyapar mein videsh nivesh, forein investment fdi in bhartiya market-hindi article or lekh)


        खेरिज किराना व्यापार में विदेशी निवेश लाने के फैसले पर देश में बवाल बचा है और इस पर बहस हो रही है। एक आम लेखक और नागरिक के रूप में हमें इस फैसले के विरोध या समर्थन करने की शक्ति नहीं रखते हैं क्योंकि इस निर्णय तो शिखर पुरुषों को करना होता है। साथ ही चूंकि प्रचार माध्यमों में चर्चा करने में हम समर्थ नहीं है इसलिये अपने ब्लाग पर इसका आम नागरिकों की दृष्टि से विश्लेषण कर रहे हैं। हमने देखा कि आम जनमानस में इस निर्णय की कोई अधिक प्रतिक्रिया नहीं है। इसका कारण यह है कि आम जनमानस समझ नहीं पा रहा है कि आखिर मामला क्या है?
        अगर भारतीय बुद्धिजीवियों की बात की जाये तो उनका अध्ययन भले ही व्यापक होता है जिसके आधार वह तर्क गढ़ लेते हैं पर उनका चिंत्तन अत्यंत सीमित हैं इसलिये अधिक गहन जानकारी उनसे नहीं मिल पाती और उनके तक भी सतही होते हैं। यही अब भी हो रहा है। अगर खेरिज किराने के व्यापार में विदेशी निवेश की बात की जाये तो उस पर बहस अलग होनी चाहिए। अगर मसला संगठित किराना व्यापार ( मॉल या संयुक्त बाज़ार) का है तो वह भी बहस का विषय हो सकता है। जहां तक खेरिज किराना व्यापार में विदेशी निवेश का जो नया फैसला है उसे लेकर अधिक चिंतित होने वाली क्या बात है, यह अभी तक समझ में नहीं आया। दरअसल यह निर्णय हमारी उदारीकरण की उस नीति का इस पर सारे राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक संगठन चल रहे हैं। अगर हम यह मानते हैं कि केवल वाल मार्ट के आने से इस देश के छोटे किराने व्यापारी और किसान तबाह हो जायेंगे तो यह एक भारी भ्रम होगा क्योंकि हम जिन नीतियों पर समाज को चलता देख रहे हैं वह उससे अधिक खतरनाक हैं। यह खतरा लगातार हमारे साथ पहले से ही चल रहा है जिसमें छोटे मध्यम व्यवसाय अपनी महत्ता खोते जा रहे हैं।
           हमें याद है कि इससे पहले भी बड़ी कंपनियों के किराना के खेरिज व्यापार में उतरने का विरोध हुआ पर अंततः क्या हुआ? बड़े शहरों में बड़े मॉल खुल गये हैं। हमने अनेक मॉल स्वयं देखे हैं और यकीनन उन्होंने अनेक छोटे व्यवसायियों के ग्राहक-प्रगतिवादियों और जनवादियों के दृष्टि से कहें तो हक- छीने हैं। हम जब छोटे थे तो मेलों में बच्चों को खिलाने के लिये विभिन्न प्रकार के झूले लगते थे। कभी कभार मोहल्ले में भी लोग ले आते थे। आज मॉल में बच्चों के आधुनिक खेल हैं और तय बात है कि उन्होंने कहीं न कहीं गरीब लोगों की रोजी छीनी है। हम यहां यह भी उल्लेख करना चाहेंगे कि तब और बच्चों के रहन सहन और पहनावे में भी अंतर था। हम अगर उन्हीं झूलों के लायक थे पर आज के बच्चे अधिक धन की फसल में पैदा हुए हैं। तब समाज में माता पिता के बच्चों को स्वयं घुमाने फिराने का फैशन आज की तरह नहीं  था। यह काम हम स्वयं ही कर लेते थे। एक तरह से साफ बात कहें तो तब और अब का समाज बदला हुआ है। यह समाज उदारीकरण की वजह से बदला या उसके बदलते हुए रूप के आभास से नीतियां पहले ही बन गयी। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि उदारीकरण में पूंजीपतियों का पेट भरने के लिये समाज का बौद्धिक वर्ग पहले ही लगा हुआ था।
                 अब खुदरा किराना व्यापार की बात कर लें। धन्य है वह लोग जो आज भी खुदरा किराना व्यापार कर रहे हैं क्योंकि जिस तरह अब नौकरियों के प्रति समाज का रुझान बढ़ा है उसमें नयी पीढ़ी के बहुत कम लोग इसे करना चाहते हैं।
          हम यहां शहरी किराना व्यापार की बात कर रहे हैं क्योंकि मॉल और संयुक्त व्यापार केंद्र शहरों में ही हैं। पहली बात तो यह है कि जो पुराने स्थापित किराने व्यापारी हैं उनकी नयी पीढ़ी यह काम करे तो उस पर हमें कुछ नहीं कहना पर आजकल जिसे देखो वही किराना व्यापार कर रहा है। देखा जाये तो किराना व्यापारी अधिक हैं और ग्राहक कम! हमारे एक मित्र ने आज से पंद्रह साल पहले महंगाई का करण इन खुदरा व्यापारियों की अधिक संख्या को बताया था। उसने कहा था कि यह सारे व्यापारी खाने पीने की चीजें खरीद लेते हैं। फिर वह सड़ जाती हैं तो अनेक दुकानें बंद हो जाती हैं या वह फैंक देते हैं। इनकी वजह से अनेक चीजों की मांग बढ़ी नज़र आती है पर होती नहीं है मगर उनके दाम बढ़ जाते हैं। उसका मानना था कि इस तरह अनेक कंपनियां कमा रही हैं पर छोटे दुकानदार अपनी पूंजी बरबाद कर बंद हो जाते हैं। इसका अन्वेषण हमने नहीं किया पर जब हम अनेक दुकानदारों के यहां वस्तुओं की मात्रा देखते हैं तो यह बात साफ लगता है कि कंपनियों का सामान अधिक होगा ग्राहक कम!
          हमारे देश में बेरोजगारी अधिक है। एक समय तो यह कहा जाने लगा था कि कि जो भी अपने घर से रूठता है वही किराने की दुकान खोल लेता है। इधर मॉल खुल गये हैं। ईमानदारी की बात करें तो हमें मॉल से खरीदना अब भी महंगा लगता है। एक बात यह भी मान लीजिये कि मॉल से खरीदने वाले लोगो की संख्या अब भी कम है। हमारे मार्ग में ही एक कंपनी का खेरिज भंडार पड़ता है जहां सब्जियां मिलती हैं पर वहां से कभी खरीदी नहीं क्योंकि ठेले वाले के मुकाबले वहां ताजी और सस्ती सब्जी मिलेगी इसमें संशय होता है। हमारे शहर में कम से कम दो कंपनियों के खेरिज भंडार खुले और बंद भी हो गये यह हमने देखा।
          भारतीय अर्थव्यवस्था के अंतद्वंद्वों और उनके संचालन की नीतियों की कमियों पर हम लिखने बैठें तो बहुत सारी सामग्री है पर उसे यहां लिखना प्रासंगिक है। हम इन नीतियों को जब देश के लाभ या हानि से जोड़कर देखते हैं तो लगता है कि यह चर्चा का विषय नहीं है। इस देश में दो देश सामने ही दिख रहे हैं-एक इंडिया दूसरा भारत! कभी कभी तो ऐसा लगता है कि हम एक भारतीय होकर इंडियन मामले में दखल दे रहे हैं। कुछ लोगों को यह मजाक लगे पर वह मॉल और मार्केट में खड़े होकर चिंत्तन करें तो यह बात साफ दिखाई देगी। वॉल मार्ट एक विदेशी कंपनी है उससे क्या डरें, देशी कंपनियों ने भला कौन छोड़ा है? सीधी बात कहें तो नवीन नीति से देश के किसानों या खुदरा व्यापारियों के बर्बाद होने की आशंका अपनी समझ से परे है। हम मान लें कि वह कंपनी लूटने आ रही है तो उसका मुकाबला यहां मौजूद देशी कंपनियों से ही होगा। मॉल के ग्राहक ही वॉल मार्ट में जायेंगे जो कि देशी कंपनियों के लिये चुनौती है। बड़े शहरों का हमें पता नहीं पर छोटे शहरों में हमने देखा है कि कम से पचास ग्राम चाय खरीदने कोई मॉल नहीं जाता। देश में रोज कमाकर खाने वाल गरीब बहुत हैं और उनका सहारा खुदारा व्यापारी हैं। गरीब रहेगा तो खुदरा व्यापारी भी रहेगा। वॉल मार्ट या गरीबी मिटाने नहीं आ रही भले ही ऐसा दावा किया जा रहा है।
            अपने पास अधिक लिखने की गुंजायश नहीं है क्योंकि पढ़ने वाले सीमित हैं। इतना जरूर कह सकते हैं कि यह बड़े लोगों का आपसी द्वंद्व है जो अंततः आमजन के हित का नारा लगाते हुए लड़ते हैं। आज के आधुनिक युग में शक्तिशाली प्रचारतंत्र के कारण आमजन भी इतना तो जान गया है कि उसके हित का नारा लगाना इन शक्तिशाली आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा धार्मिक समूहों के शिखर पुरुषों की मजबूरी है। इसलिये उनके आपसी द्वंद्वों को रुचि से देखता है।
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कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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टिप्पणियाँ

  • abhinay  On 09/02/2014 at 09:11

    Kya asp ye may rahe hai ki iska desh ki aam manta par koi prbhav nahi padega
    Air gareebe khatm Marne me aapke taste kya hai

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