प्रकृति से निरंतर जुड़े रहना जरूरी-चिंत्तन लेख (nature and man-hindi thought article)


                किसी भी इमारत का-चाहे वह महल हो या मकान या झौंपड़ी-फर्श हो वह सीमेंट, मुजाइक,, संगममरमर, टाइल्स, पत्थर या मार्बल का हो सकता है जिसे देखने का शहरी आदमी आदी हो गया है और जिसकी वजह से लोग प्राकृतिक घास पर चलना ही भूल गये हैं। अगर कोई आदमी प्रकृति से दूर है तो वह इमारतों की चमक से अचंभित हो सकता है, खुश भी हो सकता है पर वह आनंद नहीं उठा सकता। फर्श पर चलते हुए वह आंखें नीचे देखकर उस पर चलने का सुख भले ही अनुभव करना चाहता हो पर वह क्या ऐसा कर नहीं पाता। 
              प्रकृति से दूर होकर आदमी अगर सुख या आनंद की अनुभूति करना चाहे तो यह उसका भ्रम है। प्रश्न यह है कि सुख या आनंद है क्या? आंनद वह है जब आप किसी वस्तु की सुगंध को नाक से , रूप का आंख से और अस्त्तिव को स्पर्श से अनुभव करें। यही आनंद है। न कि यह लगे कि हमें सुख अनुभव हो रहा है पर जिसका आभास अंदर नहीं पहुंचे। हम जबरदस्ती करें कि आनंद हमें मिल रहा है तो वह क्षणिक है। इसका पता कैसे लगे?
               जब किसी चीज को देखें, स्पर्श करें या सूंघें तो उसके आनंद का आभास उससे दूर होने पर भी लगे। हम कोई आवाज सुने और जब वह बंद हो जाये तो भी अनुभूति होती रहें। हम कोई वस्तु मुख से ग्रहण करें तो पेट में जाकर उसका रस आनंद प्रदान करे न कि जुबान पर स्वाद के बाद उसका सुख जाता रहे। सच्चा आनंद वही है जो अपने उद्गम स्तोत्र से बाहर आने के बाद भी सुख देता रहे। यह सुख कृत्रिम वस्तुओं से नहीं मिल सकता। एक बात यह भी है कि इसके विपरीत यह आभास बुरा हो तो उससे दूर होते ही समाप्त हो जाये। जिनकी इंद्रियां सुख को गहराई तक ले जाने की आदी हैं वह दुःख को बाहर ही छोड़ देती हैं।
               कभी पार्क में घुमने जायें। वहां पेड़ पत्तों से उठ रही शीतल हवा गर्मी में भी सुख प्रदान करती है। उद्यान में घास पर नंगे पांव घूमे। कहते हैं कि इससे आंखों की रौशन बढ़ती है तो जीवन में आत्मविश्वास भी आता है। इसका कारण यह है कि हमारे पांव या तो जूते पर सवारी करते हैं या पक्के फर्श पर चलते हैं। यह कठोरता उनके स्वभाव का मूल हिस्सा हो जाती है। इससे हमारे मस्तिष्क में भी लोचता का अभाव दिखाई देता है। यही कारण है कि आजकल लोग अहंकार, जिद्दी और अपनी शेखी बघारने वाले होते हैं। लोग बोलते हैं पर किसी की सुनते नहीं। सुनते हैं तो समझते नहीं। उद्यान में लोचदार घास पर घूमते हुए पांव न केवल परिवर्तन का आभास करते हैं बल्कि उनमें यह आत्मविश्वास भी आता है कि यह संसार एक जैसा रसहीन नहीं है। बल्कि कहंी ठोस धरातल है तो की घास का भी आनंद है।

                 हमने देखा है कि जो लोग पार्क में नहंी घूमते न व्यायाम करते हैं उनका व्यवहार रूढ़ और रूखा होता है जबकि जो लोग प्रातः घूमते हैं या योगसाधना करते हैं उनके व्यवहार में कहीं न कहीं आकर्षण झलकता है। जब हम श्रीमद्भागवत गीता में वर्णित ‘गुण ही गुणों में बरतते हैं’ कि सिद्धांत का व्यवहारिक रूप देखते हैं तो लगता है कि मनुष्य स्वयं कुछ नहीं है बल्कि उसका खानपान, रहनसहन तथा चाल चलन ही उसके व्यवहार का निर्धारण करते हैं। ऐसे में  हमें यह प्रयास करना चाहिए कि हम ऐसे स्तोत्रों के संपर्क में रहें जिनसे सद्गुणों का निर्माण होता है।

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कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

http://rajlekh-patrika.blogspot.com

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टिप्पणियाँ

  • Zakir Ali Rajnish  On 05/06/2011 at 21:07

    सही कहा।

    ———

  • Indrasen Nigam  On 22/09/2012 at 10:38

    har manushy saundary upasak hota hai jo har vastu me, har chij me saundary, shrigar, ras. Adi tatvo ko dhudhata hai vah apni niyati ke anusar nature se kuchh na kuchh pane ki sochata rahata hai Arthat manushy nature se sadaiv juda rahata hai and juda rahana bbi chahiye “INDRASEN”

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