यह आजादी-हिन्दी हाइकु (yah azadi-hindi hiq)


भ्रष्टाचार
जिंदगी का हिस्सा
बन गया है,

उठता दर्द
जब मौका न होता
अपने पास,

दुख यह है
कोई धनी होकर
तन गया है।
——–
गैरों ने लूटा
परवाह नहीं थी
गुलाम जो थे,

यह आजादी
अपनों ने पाई है
लूट वास्ते

नये कातिल
रचते इतिहास
हाथ खुले हैं,

कब्र में दर्ज
लगते है पुराने
यूं नाम जो थे।

————

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप” 
poet,writter and editor-Deepak “BharatDeep”
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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टिप्पणियाँ

  • seema sinha  On 25/05/2011 at 16:18

    Bahut sundar likha hai aapne.Aage se thoda bada likha karen.

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