विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता के लिये धर्म और संतों का सहारा-हिन्दी संपादकीय (vishwa cup cricket tournment,religion and hindu sant)


हो सकता है कि वयोवृद्ध दर्शक कहकर -दरअसल प्रचार माध्यम अब क्रिकेट खेल के लिये नयी पीढ़ी के दर्शक ढूंढ रहे हैं क्योकि उनको यकीन है कि 1983 में विश्व कप क्रिकेट जीतन पर इससे जुड़े भारतीय दर्शक अब बुढ़ा गये हैं- क्रिकेट खेल पर चर्चा से वंचित किया जाये पर सच यह है कि सच यह है कि इसकी लोकप्रियता केवल इसलिये थी क्योंकि सभी आयु वर्ग के महिला पुरुष इसे देखते थे। अब क्रिकेट का प्रचार अप्रभावी लग रहा है इसलिये धर्म और अंधविश्वास की आड़ लेकर विश्व क्रिकेट में दर्शक और नये प्रशंसक तलाशने का काम हो रहा है।
स्थिति यह हो गयी है कि धार्मिक स्थानों पर संतों के हाथ में बल्ला पकड़ाकर उनसे टीम इंडिया को शुभकामनाऐं दिलवायी जा रही हैं। यह सब संत बड़ी आयु वर्ग के हैं और हमें नहीं लगता कि उनके धार्मिक ऐजंेडे में क्रिकेट कहीं फिट बैठता है। इसके अलावा खिलाड़ियों को प्रतिष्ठित धार्मिक स्थानों का विजय के लिये आशाीर्वाद मांगते हुए वहां का दौरा करते हुए भी दिखाया जा रहा है। माता, शनि, शिवजी, विष्णु जी तथा अन्य कई देवताओं और भगवानों से मनौती मांगी जा रही है। भक्तों से टीवी इंडिया के विजय की कामना कराई जा रही है। ऐसा करते हुए कम इस मामले में भारत शब्द का उपयोग न कर हमें आत्मग्लानि के बोध से यह प्रचार माध्यम बचा रहे हैं इसके लिये तो धन्यावद तो दिया जाना चाहिए क्योंकि इंडिया शब्द से हमारा मस्तिष्क संवेदनहीन ही रहता है और भारत शब्द आते ही भावुक हो जाता है। टीम इंडिया से आशय केवल है कि बीसीसीआई नामक एक क्रिकेट क्लब की टीम से है न कि संपूर्ण भारत के प्रतिनिधित्व वाली टीम से-कम से कम हमारी खिसियाहट तो यही कहने को मज़बूर करती है।
जब टीवी समाचार चैनल और समाचार पत्र क्रिकेट से संबंधित सामग्री का प्रकाशन भारत में विश्व कप क्रिकेट की दृष्टि से कर रहे हैं तो वह उनकी पत्रकारिता के प्रति निष्ठा कम व्यवसायिक प्रतिबद्धता को ही दर्शाती है। अब इनके प्रबंधक और संपादक यह दावा भले ही कर लें कि वह तो यह केवल वही कर रहे हैं जो लोग देखना चाहते हैं और फिर विश्व कप भारत में हो रहा है तो पूरे विश्व को यह बताना आवश्यक है कि हम उसकी कितनी इज्जत करते हैं पर इस देश के आम जागरुक नागरिकों के लिये यह मानना संभव नहीं है।
क्रिकेट में हम जैसे दर्शकों की निष्ठा नहीं रही। इतना ही नहीं इसमें देशभक्ति जैसा भाव पैदा नहीं होता। कई लोगों को बुरा लगेगा कि पाकिस्तान की जीत पर भी अब क्षोभ पैदा नहीं होगा क्योंकि वैश्विक उदारीकरण में धर्म, देशभक्ति तथा भाषा प्रेम का ढोंग अब स्वाभाविक तो नहीं लगता खास तौर से जब बाज़ार के सौदागरों को वक्तव्य और उनके प्रचार माध्यमों के कार्यक्रमों में उसे जमकर प्रायोजित ढंग से उभारा जाता है। संभव है कि हमारे जैसे पुराने दर्शकों को बढ़ती आयु का प्रकोप बताकर चुप करा दिया जाये पर फिर उन पुराने दर्शकों की भी बात हम उठा सकते हैं जो फिर बाज़ार और प्रचार माध्यम के जाल में फंस गया है। क्रिकेट फिक्सिंग की बात सामने आने पर उससे मन विरक्त हो गया। अगर कोई उससे देशभक्ति जोड़ता है तो हम यह भी सवाल उठा सकते हैं कि जिन लोगों को मैच फिक्सिंग में दोषी पाकर सजा दी गयी आजकल वह लोग क्या कर रहे हैं? क्या उनकी राष्ट्रनिष्ठा पर सवाल नहीं उठाना चाहिये आखिर उन पर देश के लिये खेलकर मैच बेचने का आरोप हैं। इनमें से कई लोग तो अब दूसरे क्षेत्रों में फिर शिखर पर पहुंच गये हैं।
बहरहाल क्रिकेट की लोकप्रियता उतनी नहीं जितना दिखाया जा रहा है। जिस समय क्रिकेट लोकप्रियता तेजी से बढ़ी उस समय देश में मनोरंजन साधन सीमित थे। इसके बावजूद क्रिकेट की लोकप्रियता बनी रही पर एक बार जब फिक्सिंग का भूत आया तो फिर अनेक लोगों का मन विरक्त हो गया। उसके बाद टीट्वंटी विश्व भारत को जितवाकर इस खेल को नया जीवन देने का प्रयास किया गया पर लगता है नाकाफी रहा। सो अब नये नये टोटके किये जा रहे हैं। इससे पहले भी भारत में क्रिकेट का विश्व कप हो चुका है पर उस समय धर्म और देशभक्ति के भावनाओं की आड़़ लेकर उसका प्रचार नहीं हुआ था। क्रिकेट को इसकी जरूरत भी नहीं थी पर अब जो हालात हैं उसे देखते धर्म और अंधविश्वास की आड़ ली जा रही है।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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