गर्मी के प्रकोप के साथ बसंत पंचमी का आगमन -हिन्दी लेख (basant panchami ka aagman aur garmi ka prakop-hinid lekh)


यह बसंत आया कि गर्मी आई! विश्व में मौसम अपने अपने नये अंदाज दिखा रहा है। सूर्यनारायण उत्तरायण क्या हुए सर्दी ने अपना बिस्तरा बांध लिया। इसके बाद कश्मीर में बर्फबारी हुई पर फिर भी सर्दी उस तरह वापस नहीं लौटी जैसे मकर सक्रांति के पहले थी। 2011 की बसंत पंचमी इतनी गर्म रहेगी इसका अनुमान उस समय नहीं लग रहा था जब इस वर्ष के प्रारंभ में ही सर्दी उग्र रूप में थी।
ग्वालियर में तापमान 6 फरवरी को 34 के पास पहुंच गया। यह उग्र गर्मी के मौसम की शुरुआत का संकेत होता है। इस बार भारत में विकट गर्मी रही तो बरसात भी जोरदार हुई। इसके बाद सर्दी भी जमकर पड़ी मगर मौसम विशेषज्ञों की चिंताऐं यथावत हैं। धरती का तापमान बढ़ रहा है। इसके लिये पूरे विश्व में गैसों का उत्सर्जन बताया जाता है। कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि इन गैसों का दुष्प्रभाव ओजोन परत पर पड़ता है जिसमें बहुत बड़ा छेद हो गया है जिसके कारण उस भाग से सूर्य की किरणें सीधे धरती पर आती हैं जिससे गर्मी बढ़ रही है। जहां तक हमारी जानकारी है उसके ओजोन परत एक तरह का कांच या वह सतह है जहां से सूर्य की किरणें बाधित होती हैं जिससे उनकी उष्मा कम हो जाती हैं और धरती का मौसम सामान्य बना रहता है। दूसरी भाषा में कहें तो आजोन परत एक छलनी की तरह है जो सूर्य की उष्मा की उग्रता को अपने में समेट लेती है ताकि धरती को परिष्कृत उष्मा मिल सके।
जहां विश्व के पर्यावरण को शुद्ध रखकर गैसों के उत्सर्जन पर नियंत्रण करने की बात आती है वहां विभिन्न देशों के राजनयिक नाटक करने लगते हैं और एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप कर अपने देश को स्वयं के पर्यावरण हितैषी होने का प्रमाण पेश करते हैं। चीन और भारत पर अमेरिका अधिक गैस उत्सर्जन होने का आरोप लगाता है तो यह दोनों उस पर ही तोहमत जमाते हैं। मुख्य बात यह है कि सारी दुनियां का राजतंत्र धनपतियों-पहले इसमें उद्योगपति और व्यापारी शामिल होते थे और आजकल अपराधी भी इस शब्द के हकदार हो गये हैं-के हाथ में है जो एक नहीं अनेक प्रकार से इस धरती का ही बल्कि अंतरिक्ष का भी वातावरण बिगाड़ रहे हैं। हम इनके निरंकुश होने पर यह कहकर नहीं रो सकते कि राज्यतंत्र इनके इशारों पर चल रहा है बल्कि अब तो यह सवाल भी उठने लगा है कि आम आदमी क्या कर रहा है? वह स्वयं भी तो इनके बनाऐ ऐजेंडे पर चल रहा है। बाज़ार और उसके प्रचार माध्यमों में विज्ञापित वस्तुओं के साथ ही सुविधाओं के भुगतान के लिये आम आदमी प्राणप्रण से जुटा है।
टीवी, फ्रिज, एसी, कूलर, तथा पर्यावरण प्रदूषित करने वाले वाहनों का प्रयोक्ता होने की आम आदमी में ऐसी आदत हो गयी है कि वह सड़क, उद्यान तथा ऐतिहासिक धरोहरों को भी अपनी उपभोग की वस्तु समझने लगा है। सड़कों को खोदना, उद्यानों को गंदा करना तथा एतिहासिक धरोहरों के प्रति बेपरवाही दिखाना आम आदमी ने अपना अधिकार समझ लिया है। हम यहां पर अमेरिका और चीन पर आक्षेप करने की बजाय अपने देश के गिरेबान में झांके। जिस तरह विशेषज्ञ बताते हैं उससे यह बात तो साफ लगती है कि गैसें आसानी से नष्ट नहीं होती। ऐसे में भारत में आबादी के साथ घरेलू गैस का उपभोग बढ़ा है। तय बात है यह चीन में भी बढ़ा होगा पर अमेरिका में जनंसख्या इतनी नहीं है। इसी गैस को लेकर यह सवाल उठता है कि जलने के बाद वह जाती कहां है? यकीनन वह इसी पर्यावरण में ही बहती है। वातावरण में जिस तरह अप्रत्याशित रूप से गर्मी बढ़ रही है उससे तो यही लगता है कि कहीं न कहंी मानव ही इसके लिये जिम्मेदार है। विशेषज्ञ क्या कहते हैं कि हम नहीं जानते पर रसोई की आग में गैस के बढ़ते उपभोग के साथ ही यह गर्मी हमने बढ़ती देखी है। अमेरिका के अनेक कारखाने भी इससे अनेक गुना गैस उत्सर्जन के लिये जिम्मेदार माने जाते हैं। हम उस पर आक्षेप करने का अनावश्यक उत्साह नहीं दिखाना चाहते। हमारे यहां रसोई गैस के बढ़ते उपयोग के साथ ही विकास के नाम पर चौड़ी सड़के करने के लिये अनेक पेड़ पौद्यों की बलि दी जा रही है। आम आदमी को जहां भूखंड में खुली जगह रखने का कहा जाता है वहां वह पक्के निर्माण करा लेता है। जिनका मन करता है वह सरकारी जमीन पर पेड़ लगाकर पर्यावरण हितैषी होने का दावा करते हैं। मतलब पर्यावरण संतुलन रखने के लिये आम आदमी अपने जिम्मे से बचना चाहता है।
यह बकवास लिखने का विचार आखिर क्यों आया? यह लेखक प्रतिदिन अक्सर पार्कों में जाता है। कुछ पार्क कभी साफ लगते हैं। ऐसा लगता है कि उनको कोई राजकीय कर्मी साफ कर गया होगा पर फिर वही हालत! वहां प्लास्टिक की पन्नियां, बिस्कुट के खाली पैकेटों के झुंड, शराब की बोतले और तंबाकु के पाउच देखने गंदगी के रूप में विराजते हुए देखे जा सकते हैं। यकीनन यह राजकीय कर्मियों ने नहीं वरन् उन लोगों ने किया होता है जो कथित रूप से प्रयोक्ता बनकर आते हैं। केवल दोहन करने की प्रवृत्ति पर सृजन और सतर्कता से मुंह फेरने की आम आदमी की इस आदत ने शिखर पुरुषों को बेलगाम बना दिया है। अकर्मण्य तथा अचिंतक समाज में थोड़ी सक्रियता से ही बेईमानों को सत्ता मिल जाती है। जब बसंत पंचमी पर ग्रीष्म पंचमी का अहसास हो तो पर्यावरण प्रदूषण के लिये अपनी भड़ास निकालने के लिये दूसरा और क्या लिखा जा सकता है?
बहरहाल 8 फरवरी पर बसंत पंचमी पर अपने ब्लाग लेखकों तथा पाठकों को बधाई।
लेखक दीपक भारतदीप 
कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
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