पड़ौस पर हमला न करो यह तो डाइन भी सिखाती-व्यंग्य कविता


डाइन भी सात घर छोड़कर
कहर बरपाती
अपने पडौस से निभाओ यह तो वह भी सिखाती

उसकी राह पर चलने वाले असली भक्त
आज भी अपने देश और पडौस को
कहर से बचाने के लिए
दूसरी जगह कहर बरपाते
पर खुद न जाकर
वहीँ के बाशिंदों को लगाते
जो पडौस नहीं अपने ही घर को ही
अपने हाथ से आग लगाकर कर देते राख
खुद को बहादुर समझने वाले
नहीं जानते कि
उनकी करतूत डाइन को भी लजाती
वह भी उनकी करतूत पर शर्माती
——————————-

यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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टिप्पणियाँ

  • pankaj  On 19/12/2008 at 15:46

    डाइन भी सात घर छोड़कर
    कहर बरपाती
    अपने पडौस से निभाओ यह तो वह भी सिखाती

    उसकी राह पर चलने वाले असली भक्त
    आज भी अपने देश और पडौस को
    कहर से बचाने के लिए
    दूसरी जगह कहर बरपाते
    पर खुद न जाकर
    वहीँ के बाशिंदों को लगाते
    जो पडौस नहीं अपने ही घर को ही
    अपने हाथ से आग लगाकर कर देते राख
    खुद को बहादुर समझने वाले
    नहीं जानते कि
    उनकी करतूत डाइन को भी लजाती
    वह भी उनकी करतूत पर शर्माती

  • vinod  On 22/12/2009 at 18:43

    wah mere dost koi to hai jo desh ke khatir aisi kavita likhta hai

  • vinod  On 22/12/2009 at 18:44

    wah mere dost wah kya khoob likhta hai

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