अब रास्ते से निकलने के लिये तरसे-हास्य कविता


बरसों से कभी ऐसे मेघ नहीं बरसे
हमेशा रहा जल का अकाल
हम पानी की बूंद बूंद को तरसे
बहुत सारी शायरी प्यास पर लिखी
तो कई कवितायें गर्र्मी पर रच डाली
पसीने में नहाते हुए मेघों पर
अपने व्यंग्य शब्दों से हम अधिक बरसे

इस बार राशन पानी लेकर आसमान में मेघ आये
लगता है ढूंढ रहे थे हमको
अपनी बरसात से नहलाने को
घर लौटने से ऐसे बरस जाते हैं
कि तालाब बनी सड़कों से
घर पहुंचने का रास्ता निकालने के लिये
अब तो रोज तरसे

उस दिन साइकिल समेत
मझधार में फंसे थे
आगे कार तो पीछे टूसीटर अड़े थे
आसमान से बरसते मेघों को देखकर
हमें अपने पर ही रहम आया
एक मेघ अपना कोटा पूरा कर
हमारे सामने आया
और बोला
‘और गर्मी पर कविता लिख
हमारी मजाक उड़ाता दिख
जब भी देख गर्मी में नहाते हुए ही
अपनी कविता लिखता है
सारे जमाने को कार की बजाय
साइकिल पर चलता दिखता है
भला! इसमे हमारा क्या दोष
जो हम पर दिखाता है रोष
कार और पैट्रोल का खर्च बचाता है
इसलिये साइकिल में तेरा तेल निकल जाता है
पिछली बार गर्मी पर कविता लिखकर
अपने ब्लाग पर हिट हुआ था
हास्य कविता के रूप में फिट हुआ था
अब हम पर हास्य कविता लिख
पर हमारे संदेश के साथ खड़ा दिख
सुन हम क्यों नहीं बरसों से, जो अब ऐसे बरसे
सारे नाले और नालियां बंद कर
हमारे जल का मार्ग अवरुद्ध कर दिया
तुम इंसानों ने
धरती पुत्र पेड़ पौद्यों का कत्ल किया
तुम्हारे बीच बरसे शैतानों ने
एक तरफ बरसी दौलत तो
दूसरी और हरियाली को लोग तरसे
अपने विनाश का खुद ही किया इंतजाम
इसलिये कई बरसों ऐसे नहीं बरसे

इस बार जमकर बरस कर बता दिया
जमकर बरसते हुए पग-पग पर
सड़कों और पंगडंडियों को
जलमग्न बना दिया
प्रकृति से छेडछाड़ का नतीजा दिखा दिया
अगर चाहते हो कि हर बरस बरसें तो
हास्य कविता पर हम लिख
प्रकृति को प्यार करने का
इंसानों को संदेश देता दिख
लोगों को बता दे कि
अपने ही भूलों से जो किया विनाश इस धरती का
इसलिये ही पहले पानी को
अब रास्ते से निकलने के लिये तरसे
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