पीढियां और जमाना-लघुकथा


वह बच्चा अपने दादा का हाथ पकड़कर सड़क के किनारे खड़ा था। उस समय उसी रास्ते से एक जुलूस निकल रहा था इसलिये दोनों के आगे बढ़ने पर व्यवधान आ गया। इसी कारण दादा अपने पोते को लेकर एक तरफ खड़े हो गये। अचानक उस जुलूस से एक आदमी निकलकर आया जो दादाजी की जानपहचान का था। उसे देखकर दादा जी ने पूछा-‘क्रांतिवीर, कहां जा रहे हो इस जुलूस में शामिल होकर। पैदल चलते हुए थक नहीं जाओगे। इससे क्या तुम्हारी मांगें पूरी हो जायेंगी?’

क्रांतिवीर ने कहा-‘कैसे नहीं होंगी। हम पूरी ताकत से आंदोलन करेंगे। अरे, पैदल चलते हुए नहीं थकेंगे। हमारे अंदर बहुत ताकत है। हम तो भूख हड़ताल पर बैठने वाले है।’

दादा के पोते ने भी सुना पर उसे समझ में कुछ नहीं आया। वह बच्चे से नवयुवक हो गया। एक दिन वह अपने पिताजी के साथ उसी सड़क पर खड़ा था। उसी समय एक जुलूस निकला जिसमें सभी साइकिल सवार थे। उसमें क्रांतिवीर का बेटा भी था। वह साइकिल से उतर कर आया और उसके पिताजी से मिला। उन्होंने उससे पूछा-‘यह साइकिल पर जुलूस में चलते हुए थक नहीं जाओगे। इससे क्या तुम्हारी मांगें पूरी हो जायेंगी।’
क्रांतिवीर के बेटे ने कहा-‘ पूरी हों जायें तो अच्छा नहीं है तो जैसे हैं वैसे ही रहेंगे। यहां जुलूस में चलकर अपने साथ के लोगों से तो निभाना ही है। फिर साइकिल पर चल रहे हैं, कोई पैदल थोड़े ही हैं। इससे तो घूमना और सैर हो जायेगी। वैसे ही इस रास्ते पर आना था।’

उस नवयुवक ने सुना।
वह अब और बड़ा हो गया था। उस दिन वह अपने बेटे को लेकर उसी सड़क से गुजर रहा था और वहां से एक मोटर साइकिलों सवारों का जुलूस निकला रहा था। उसमें से एक सवार निकल कर उसके पास आया और नमस्कार की। उसने पहचान लिया। वह क्रांतिवीर का नवयुवक पोता था।
उसने कहा-‘तुम मोटर साइकिल पर प्रदर्शन कर रहे हो। बेकार में यह पैट्रोल फूक रहे हो। वैसे तुम्हारी मांगें क्या हैं जो इस जुलूस में जा रहे हो? और क्या वह पूरी जो जायेंगी। तुम अपने को वैसे ही क्यों थका रहे हो?’

क्रांतिवीर का पोता बोला-‘यह तो एक बहुत बड़ा मुद्दा है। मांगें पूरी हों या न हों इससे हमारा क्या मतलब? जहां तक पैट्रोल का सवाल है तो किसी ने भरवा दिया हैं। हम तो मजे से घूम रहे हैं। इसमें थकने वाली बात कहां आती है?’
वह चला गया तो उसके बेटे ने पूछा-‘पापा, क्या बात हो रही थी? यह जुलूस क्यों निकला है?’

उसके अधरों पर मुस्कराहट उभर आयी और अपने बेटे से कहा-‘बेटा, इसी सड़क पर चलते रहना। कभी उसकी आगे वाली पीढ़ी मिल जाये तो उससे सवाल करना तब शायद तुम्हें जवाब मिल जायेगा कि किस तरह पीढि़यां और जमाना बदलता है।’

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टिप्पणियाँ

  • Gyan Dutt Pandey  On 06/07/2008 at 14:44

    बहुत तेजी से जीवन मूल्य बदल गये। पर मुझे लगता है कि आजादी के बाद की पीढ़ी मूल्यों के प्रति घोर बेइमान थी और उसने कहा कुछ, किया कुछ और।

  • dinesh  On 25/07/2008 at 13:59

    इस पोस्ट से हमें शिक्षा मिलती है कि भारत में
    १. नेता की पीढियां नेता (या अरबपति)
    २. आईएस की पीढियां IAS (या NRI )
    ३. छुटभैयों की पीढियां छुटभैया
    तथा
    ४. गरीब की पीढियां ग़रीब ही रहती हैं.

    सड़क के किनारे खड़े होकर जुलूस देखने वाले की पीढियां हमेशा से वहीँ खड़ी थी, हैं और रहेंगी, उनका जीवन मूल्य शून्य है.
    किसी में जोड़ो या घटाओ कोई फरक नहीं. ये केवल गुणा भाग में ही काम आ सकते हैं.

    (इसलिए १ और २ जोड़ घटाने के लिए इनको पूछते नहीं, उनको भाग देकर ये अन्नंत कर देते हैं.
    ये लोग केवल नम्बर ४ को गुणा करते हैं. इनकी पीढियां आजकल ब्लॉग लिख रहीं हैं और टिप्पणी भेज रहीं हैं.)

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