तंबाकू, एकता और योगसाधना-आलेख


 

पिछले वर्ष जुलाई में वृंदावन से हम दोनों पति-पत्नी अपने शहर  के लिये चले। हमने मथुरा के मार्ग पर पड़ने वाले मंदिरों को देखने का फैसला किया। हम जब बिड़ला मंदिर पहुंचे तो उस समय उमस बहुत थी। हम दोनों अंदर गये और कुछ देर ध्यान लगाने के बाद बाहर निकले। मैंने वहां पानी पिया और फिर अपनी जेब से तंबाकू की डिब्बी निकाली और हाथ में घिसकर उसे मूंह में रख लिया। वहां भीषण उमस से भरी दोपहर में हमने अब अन्य मंदिर देखने की बजाय मथुरा रेल्वे स्टेशन का रुख किया।

पता चला कि गाड़ी आने में आधा घंटा देर है तब हमने वहां अपने साथ लाये खाने के सामान से कुछ नमकीन निकाला और खा लिया। फिर पानी लेकर पिया और हाथ पौंछने के लिए रुमाल निकाला तो तंबाकू की डिब्बी भी मेरे हाथ में आ गयी। मैं उसे रखना चाहता था कि एक तिलक धारी सज्जन आये और बोले-‘जरा तंबाकू की डिब्बी दीजिए। मैंने आपके पास बिड़ला मंदिर में देखी थी पर उस समय खाने का विचार नहीं था। मैं अपनी डिब्बी घर भूल कर आया और यहां कोई दुकान नहीं मिली।’

मैंने उसके हाथ में डिब्बी दी। उसने कहा-‘चूना तो सूखा हुआ हैं। मैं पानी डाल दूं।’

मेरी स्वीकृति के बाद वह पास ही नल पर गया और उसमंे पानी डालकर तंबाकू बनाने लगा। उसी समय वहां से एक कुली गुजर रहा था और बोला-‘साहब, थोड़ी मेरे लिये भी बना लीजिए।’
उन सज्जन ने हंसते हुए कुछ तंबाकू और चूना और निकाला और घिसना शूरू किया। तंबाकू बनते ही जैसे उसने उस कुली को देने के लिए हाथ बढ़ाया तो कोई अन्य एक सज्जन जो खाकी कपड़े पहने हुए थे आये और बिना कुछ कहे ही उनके हाथ से थोड़ी तंबाकू लेकर चलते बने।
सबने अपना अपना हिस्सा ले लिया और डिब्बी मेरी जेब में पहुंच गयी। तंबाकू खाने वालों के लिए ऐसी घटनाएं कोई मायने नहीं रखतीं। यह घटना भी ऐसी ही थी अगर मेरी पत्नी इस सब पर गौर नहीं कर रही होती। इतने में हमारी गाड़ी आ गयी। हमारे से पहले चूंकि तीन गाडि़यां जा चुकीं थीं इसलिये हमें सामान्य डिब्बे में  बैठने के लिये जगह मिल गयी।
आगरा तक हम आराम से आये और वहां भी गाड़ी से लोग उतरने लगे। खिड़की से एक युवती ने हमसे पूछा-‘यहां क्या कोई बैठा है। अगर नहीं! तो प्लीज हमारे लिए जगह घेर लीजिए।’
मेरी पत्नी ने कहा-‘‘घेरने की कोई जरूरत नहीं है आप इन सबको निकल जाने दीजिए और आराम से अंदर आयें। यह जगह खाली पड़ी रहेगी। अभी इस समय कोई इसमें अंदर आता नहीं दिख रहा।’

वह युवती अंदर आयी तो उसके साथ उसकी माता पिता और भाई भी थे। चारों को आराम से जगह मिल गयी। वह मुस्लिम परिवार था। हम दोनो खिड़की के आमने सामने बैठे थे। मेरी पत्नी मेरे पास में आकर बैठ गयी लड़की सामने की जगह ली।
उसके थोड़ा समय बाद ही हमने चाय लेकर पीना भी शुरू कर दी। उसके बाद मैंने अपने जेब से तंबाकू निकाली और उसे हाथ में घिसने लगा। उस लड़की की पिता ने कहा-‘‘थोड़ा तंबाकू आप देंगे। मेरे दांत में दर्द है।’

लड़की ने कहा-‘‘पापा, आपको तंबाकू खाना है तो  फिर दंात के दर्द का बहाना क्यों कर रहे हैं? कहीं तंबाकू देखी नहीं कि खाने का मन करने लगता है।’

फिर वह हमारी पत्नी की तरफ देखकर हंसते हुए बोली-‘सब आदतें छूट जायें पर तंबाकू की आदत नहीं जाती।’ 
हमारी पत्नी ने उससे कहा-‘‘हां, हमारे यह योगसाधना शुरू करने के बाद शराब तो छोड़ चुके हैं पर इससे इनका भी पीछा नहीं छूटता।’
लड़की ने एकदम पूछा-‘‘रोज करते हैं? वही बाबा रामदेव वाली न!
हमारी पत्नी ने कहा-‘‘हां पिछले पांच वर्ष से कर रहे हैं, और यह इन्होंने तब शुरू की जब बाबा रामदेव का नाम इतना प्रसिद्ध नहीं था।
मैने बीच में हस्तक्षेप किया-‘‘मैंने भारतीय योग ंसंस्थान के शिविर में योग साधना सीखी थी। हां, अब यह सच है कि भारतीय योग के प्रचार में उनका बहुत योगदान है।’
फिर तो वह कहने लगी-‘हां, हमारे यहां एक औरत को कैंसर हो गया था वह टीवी पर देखकर योग साधना करने लगी और वह ठीक हो गयी। एक आदमी  की तो दोनों किडनी खराब थी वह भी ठीक हो गयीं। कई लोगोंं को इससे लाभ हुआ है।’
उसका भाई बताने लगा-‘उससे कई लोगों का फायदा हुआ है।’
मैंने कहा-‘‘खुश रहने के लिए इसके अलावा कोई और उपाय है इस पर मैं यकीन नहीं करता।’

उसकी मां ने कहा-‘‘है तो बहुत काम की चीज, पर लोग करते नहीं है। आलस्य होता है।’
उसके पिताजी ने कहा-‘हां, हमारे यहां कई लोगों की फायदे की बात सुनी है।
लड़की कहने लगी-‘आप कौनसे आसन करते हैं?
मैने उसे थोड़ा इस बारे में बताया। हमारा गंतव्य स्थान आ गया तो फिर हमने उनसे विदा ली।
बाहर निकलकर मेरी पत्नी ने कहा-‘‘हमसे कहा कि एक बात जो मैने वहां नहीं कही कि तंबाकू खाने वाले व्यसनी कोई जातपात या धर्म नहीं देखते। उनके लिए तो तंबाकू  खाने वाले आत्मीय बंधु हो जाते हैं और कभी अधिकार से तो कभी आग्रह से तंबाकू मांग कर खाते है।’
मैने कहा-‘‘हां, पर यह कई बार मैं भी करता हूं। एक विषय और है आजकल जो लोगों में  बंधुत्व की भावना जाग्रत कर रहा है। वह है योग साधना और ध्यान। हां तंबाकू से तो केवल क्षणिक रूप से बंधुत्व का भाव होता है पर देखो मैंने जिनके साथ योग साधना प्रारंभ की उनसे आजतक मेरी मित्रता है। फिर अभी गाडी में  उनसे तंबाकू पर कितनी क्षणिक बातचीत  हुई पर योग साधना पर कितनी देर तक चर्चा हुई।’
 
हमारे देश में एकता और और प्रेम के नारे बहुत लगते है। इनसे कोई मतलब नहीं निकलता। सच तो यह है कि स्वार्थ की वजह से एकता स्वयं ही बन जाती है। अगर आप यह चाहते है कि कोई आपसे एकता करे तो उसके स्वार्थ अपने में फंसाये रहो। आप अगर किसी समूह के नेता है तो केवल एकता करने या उनको अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए प्रेरित कर उसे संगठित नहीं रख सकते। उनके आपस में इस तरह स्वार्थ जोडि़ये। मैं अपने साथ स्वार्थ की वजह से जुड़ने वाले व्यक्तियों पर भी कोई आक्षेप नहीं करता क्योंकि मुझे मालुम है कि समाज में एक दूसरे के स्वार्थ सिद्धि  के लिये कार्य नहीं करेंगे तो फिर उसका औचित्य क्या रह जायेगा? आप चाहते हैं कि आपके बच्चे आपस में जुड़े रहे तो उनके अपने स्वार्थ इस जुड़वा कर रखें ताकि उनका प्रेम बना रहे। हम सब अपने स्वार्थ पूर्ति करने वालों के साथ ही एकता स्थापित करते हैं तब दूसरों से निस्वार्थ एकता की बात करना व्यर्थ है। सभी धर्मों, जातियों, विचारों और वर्गों के लोग आपस में अपने स्वार्थों से मिलते और बिछुड़ते है। जिनको आपस में स्वार्थ नहीं है उसे किसी से मिलने की जरूरत क्या है? हम उस परिवार के साथ अच्छे विषयों पर चर्चा में इतना व्यस्त रहे कि दोनों ने एक दूसरे का परिचय तक नहीं पूछा जबकि  डेढ़ घंटे तक सहयात्री के रूप में एकता और सौहार्द बनाये  रहे।

जरूरत है उन विषयों को प्रोत्साहन देने की जिनसे लोगों में एकता कायम हो सकती है। यहां मैंने तंबाकू का विषय इसलिये उठाया कि लिखते लिखते अब मैं ज्ञानी होता जा रहा हूं-ऐसा आज मेरे एक मित्र ने कहा। मैं सोचता हूं हो सकता है कि लिखने से मेरी यह आदत छूट जाये। तंबाकू खाना स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है यह तो सभी जानते है। सोच रहा हूं हो सकता है लिखने से वह छूट जाये।    

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