कूड़े में भी सोना हो सकता है-हास्य कविता


अभी तक दे रहे थे पहरा
तकनीकी ज्ञान का डंडा लेकर
इस घर के पहरेदार बनकर
करते रहे अपने मन की
उस समय कहते यहाँ सोना है
कभी कोई विचार नहीं आया
जो हटा दिया गया
उनको अपने काम से तो
बरस रहे हैं सब पर
कहते हैं ”मैंने सब छोड़ दिया
वहाँ तो सब कूडा है
बदबू आती है वहाँ
खडा नहीं रह सकता कभी तनकर”

कहै दीपक बापू
होता रहता है यार
जब हमें कही से भागना होता है
हम भी यही कहते हैं
पर कोई शालीन शब्द गढ़ते हैं
कह गए चाणक्य महाराज
”कूड़े में भी सोना हो तो उठा लेना चाहिए
कभी नहीं रहना चाहिए मदांध बनकर’
हम तो महापुरुषों की बात
मानते और सब जगह जाते
कूड़े में भी सोना हो सकता है
कोई छोटा कभी हो सकता है
सबके सामने खडा बड़ा आदमी बनकर
नोट-यह एक काल्पनिक रचना है और इसका किसी व्यक्ति या घटना से कोई लेना देना नहीं है और किसी से इसका कोई लेना-देना नहीं है

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टिप्पणियाँ

  • राजीव तनेजा  On 21/01/2008 at 02:30

    सही कहा बन्धुवर……
    या फिर यूँ भी कह सकते हैँ कि अँगूर खट्टे है…….
    या फिर नाचना ना आए तो इसमें हमारा कोई दोष नहीं होता है बल्कि आँगन ही टेढा होता है …..

    सही कहा आपने कूडॆ के ढेर में सोना मिल जाए तो उठा लेना चाहिए …
    ज्ञान की बात कोई ज़रूरी नहीं है कि बडे लोगों से मिले….

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