बेनजीर की हत्या: पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान की भूमिका भी संदेह के घेरे में


बेनजीर की हत्या से पूरा विश्व विचलित हुआ है क्योंकि एक औरत को इतनी बेरहमी से भी मारा जा सकता है इस पर लोग यकीन नहीं कर पा रहे. वर्तमान सभ्य समाज में यह एक ऐसी घटना है जिससे हर कोई सिहर उठा है. मैंने आज अंतरजाल पर अंग्रेजी और हिन्दी लेखों को देखा और लोगों की असहनीय पीडा को देखकर सोचता हूँ की क्या पाकिस्तान का सत्ता प्रतिष्ठान वाकई इतना निर्दोष है कि उस पर कोई उंगली नहीं उठा रहा है.

ब्रिटिश मीडिया इसके लिए पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी और वहाँ के कट्टरपंथी वर्ग को इसके लिए जिम्मेदार बता रहा है. यहाँ यह बात भी उल्लेखनीय है कि कुछ वर्ष पहले तक पाकिस्तान के यह दोनों वर्ग ही पश्चिमी देशों को प्रिय थे. जब अफगानिस्तान में सोवियत संघ की सेना घुसी थी तब उससे लड़ने के लिए दुनियाभर के कट्टरपंथी लाकर पाकिस्तान को तोहफे में दिए गए ताकि वह उससे लड़ सके-कालांतर में वह पाकिस्तान को अपनी जागीर समझने लगे. आज यह दोनों वर्ग ही इन देशो के खिलाफ खुली लड़ाई लड़ रहे हैं. असल में बेनजीर तो ब्रिटेन में शरण लिए हुए थी और अमेरिका की पाकिस्तान में घुसपैठ को देखते हुए उसके यहाँ जाने में उनकी दिलचस्पी नहीं दिखती थी. शायद वह जानती थी कि अमेरिका को किसी में दिलचस्पी नहीं सिवाय अपने हितों के-अगर ब्रिटेन के टोनी ब्लेयर बीच में नहीं पड़ते तो वह अकेले अमेरिका के कहने पर वह स्वदेश नहीं लौटने वाली थी. भारत के जितने भी विदेशी मामलों के विशेषज्ञ हैं वह कभी अमेरिकी समर्थन पर भरोसा नहीं करते-यहाँ तक अमेरिका के समर्थक माने जाने वाले भी कहते हैं कि अमेरिका के लिए कोई बड़ा नहीं है सिवाय अपने हितों के. जिस तरह से भारत के लोगों से बेनजीर के संपर्क थे ऐसा नहीं हो सकता कि उन्हें कभी उनको इस राय से अवगत नहीं कराया गया हो. यही कारण है कि उनकी वापस में अकेले अमेरिका ही नहीं ब्रिटेन भी सहभागी माना जाता है.

मैंने कई बार बेनजीर की बयान देखें है और कभी भी यह नहीं पाया कि वह अमेरिका की वैसी समर्थक हैं जैसा कि उनके दुश्मन कहते जो उनकी हत्या का दावा करते हैं. चूंकि ब्रिटेन अब अमेरिका की तरह प्रत्यक्ष रूप से किसी भी विदेशी राजनीतिक गतिविधि में भाग नहीं लेता तो उसका नाम अधिक प्रचार नहीं पाता-जबकि उसकी भूमिका होती जरूर है. इसलिए कई बार बेनजीर अमेरिका से समर्थन की अपेक्षा करतीं थी पर यह जानते हुए कि ब्रिटेन कि उसमें भूमिका होती है. जिस समय उनके पिता स्व. जुल्फिकार भुट्टो को फांसी दी गयी थी तब अमेरिका ने दिखाने के लिए अपील जरूर की थी पर जिया उल हक़ ने नहीं मानी थी उसके बाद कौन यकीन कर सकता है कि वह अमेरिका की अंधसमर्थक हैं. बेनजीर को अमेरिका समर्थक बताकर उसकी हत्या करने और कराने वाले अपने लिए अपने देश की अमेरिका विरोधी कॉम का समर्थन जुटाने के लिए ही ऐसा प्रचार कर रहे हैं.
यह आश्चर्य की बात है कि पाकिस्तान में घुसे विदेशी लोग पाकिस्तान की बेटी की हत्या का जिम्मा ले रहे हैं और वहाँ के सत्ता प्रतिष्ठान का खून नहीं खोल रहा है इससे लगता है कि कोई न कोई उनमें से भी जुडा हुआ है. इतिहास फिर अपने आपको दोहरा है. पहले भी वहाँ के लोग विदेशियों के सहारे अपने लोगों के खिलाफ षडयंत्र रचकर अपने लिए शक्ति अर्जित करते रहे और बाद में उन्हीं के शिकार बने. हो सकता है कि बेनजीर के सत्ता वापसी के बाद अपने काले कारनामों की पोल खुलने के चक्कर में सत्ता प्रतिष्ठान भी इसमें शामिल हो. आखिर अरबों रूपये की विदेशी सहायता आती है और आधुनिक हथियार खरीदे जाते हैं उसमें पाकिस्तान के सैन्य अधिकारियों कोई घोटाला न करते हों यह संभव नहीं है-खासतौर से जब जनता की तरफ से कोई ऐसा व्यक्ति मौजूद न हो जिसके प्रति उनकी जवाबदेही न हो. इसलिए ऐसी कई रहस्य हैं जिन पर से पर्दा तत्काल तो नहीं पर कभी पर्दा जरूर उठेगा.

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