सच किसे समझाएं


सदियों से चले आ रही
लोगों के समूहों की परिभाषाएँ
बाहर से मजबूत किले की तरह लगते
अन्दर रिवाजों में एक दूसरे को ठगते
बाहर से आदर्श लगते
पर एक शब्द से हिलते नजर आएं
वक्त देखें तो पहचान छिपाएं
फायदा देखें सीना तानकर सामने आयें
सभ्य समाज हो रहा है दिशाहीन
अक्षरज्ञान जितना बढ़ता जा रहा है
अक्षरों से बने शब्दार्थ पर हो रही है जंग
लोगों के दिमाग हो रहे हैं तंग
अभिव्यक्ति का मतलब चिल्लाना हो गया है
ऐसे में सच किसे समझाएं
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टिप्पणियाँ

  • बिलकुल सही फरमाया आपने…
    कौन सुनता है किसी किसी?…
    सब अपने नफे-नुकसान के हिसाब से अपने मतलब बुनते हैँ…
    जहाँ ढलान देखी उसी तरफ लुढक लिए…

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