जब अपने मन का सच बोलता है


जब खामोशी हो चारों तरह तब भी
कोई बोलता हैं
हम सुनते नही उसकी आवाज
हम उसे नहीं देखते
पर वह हमें बैठा तोलता है
भीड़ में घूमने की आदत
हो जाती है जिनको
उन्हें अकेलापन डराता है
क्योंकि जिसकी सुनने से कतराते हैं
वही अपने मन में बैठा सच
दबने की वजह से बोलता है

दूसरे से अपना सच छिपा लें
पर अपने से कैसे छिपाये
अकेले होते तो बच पाते
भीड़ में रहते हुए
लोगों के बीच में टहलते हुए
महफिलों में अपने घमंड के
नशे में बहकते हुए
सहज होने की कोशिश भी
हो जाती है जब वह
अपने मन का सच बोलता है

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टिप्पणियाँ

  • परमजीत बाली  On 17/11/2007 at 12:47

    दीपक जी,बढिया रचना है।बधाई।

    जब खामोशी हो चारों तरह तब भी
    कोई बोलता हैं
    हम सुनते नही उसकी आवाज
    हम उसे नहीं देखते
    पर वह हमें बैठा तोलता है

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