Monthly Archives: February 2009

बहु ने लिखी कविताएँ-व्यंग्य शायरी

नयी बहू कवियित्री है
जब सास को पता लगी
तो उसकी परीक्षा लेने की बात दिमाग में आयी
उसने उससे अपने ऊपर कविता लिखने को कहा
तो बहू ने बड़ी खुशी से सुनाई
‘मेरी सास दुनियां में सबसे अच्छी
जैसे मैंने अपनी मां पायी
बोलना है कोयल की तरह
चेहरा है लगता है किसी देवी जैसा
क्यों न सराहूं अपना भाग्य ऐसा
चरण धोकर पीयूं
ऐसी [...]

उपेक्षासन सीख लो तो तनाव नहीं रहेगा-व्यंग्य

हम कपड़े क्यों पहनते हैं? इसके चार जवाब हो सकते हैं
1.सभी कपड़े पहनकर घूमते हैं।
2.हम बिना कपड़े पहने बाहर निकलेंगे तो लोगों की नजरें हम केंद्रित हो जायेंगी और हमें शर्म आ जायेगी।
3.हम कपड़े पहनकर नहंी निकलेंगे तो लोगों को शर्म आयेगी।
4.हमारा शरीर इसका आदी हो गया है और अगर हम उसे नहीं पहनेंगे तो [...]

भ्रष्ट पात्र किसी कहानी में में केन्द्रीय पात्र क्यों नहीं होता -आलेख

स्वतंत्रता के बाद देश का बौद्धिक वर्ग दो भागों में बंट गया हैं। एक तो वह जो प्रगतिशील है दूसरा वह जो नहीं प्रगतिशील नहीं है। कुछ लोग सांस्कृतिक और धर्मवादियों को भी गैर प्रगतिशील कहते हैं। दोनों प्रकार के लेखक और बुद्धिजीवी आपस में अनेक विषयों पर वाद विवाद करते हैं और [...]

कंपनी कभी देवता तो कभी दानव -आलेख

कंपनियों का सच यही है कि वह आम निवेशक और उपभोक्ता और अपने कर्मचारी का शोषण करने के लिये बनायी जाती हैं। प्राचीन व्यापार में सेठ साहूकार यही काम करते थे पर जैसे लोगों के जागृति बढ़ने लगी उनके चेहरे स्याह दिखने लगे। तब कंपनी नाम का एक ऐसा दैत्य खड़ा किया [...]