Monthly Archives: September 2008

जो बुत बोल रहे, पराये शब्द और स्वर लेकर डोल रहे-व्यंग्य कविता

हाड़मांस के पुतलों से
हो गये है नाउम्मीद इसलिये
पत्थर के बुत ही पूजना अच्छा लगता
कम से कम उम्मीद के टूटने का भय तो नहीं रहता
पत्थर बोलते नहीं है
पर जो बुत बोल रहे
स्वर उनके जरूर हैं पर
शब्द पराये होकर डोल रहे ं
आखों में जिनके जीवन है
देख रहे हैं दृश्य
पर उसे किसी का दृष्टिकोण उधार लेकर तोल रहे
उनकी [...]

अक्लमंदों के बीच होती है अल्फाजों की जंग-हास्य शायरी

अक्लमंदों की महफिल से इसलिये ही
जल्दी बाहर निकल आये
सभी के पास था अपनी शिकायतों का पुलिंदा
किसी के पास मसलों का हल न था
अपनी बात कहते हुए चिल्ला रहे थे
पर करने का किसी में बल न था
करते वह कोई नई तलाश
उनसे यह उम्मीद करना बेकार था
हर कोई अपना मसले का
बयां करने को ही हर कोई तैयार [...]

अक्ल का इस्तेमाल-लघुकथा

उन्होंने अपनी गाड़ी थोड़ी दूर बनवाई। जब वह मैकनिक को पैसे दे रहे थे तब उनके साथ एक मित्र भी था। अपने आपको स्याना साबित करने के लिये उन्होंने मैकनिक पैसे किच किच कर दिये। जितने उसने मांगे थे उससे कम ही दिये।
जब वहां से निकले तो उन्होंने अपने मित्र से कहा-‘यह लेबर क्लास [...]

कभी तृष्णा तो कभी वितृष्णा-व्यंग्य कविता

कभी तृष्णा तो कभी वितृष्णा
मन चला जाता है वहीं इंसान जाता
जब सिमटता है दायरों में ख्याल
अपनों पर ही होता है मन निहाल
इतनी बड़ी दुनिया के होने बोध नहीं रह जाता
किसी नये की तरह नजर नहीं जाती
पुरानों के आसपास घूमते ही
छोटी कैद में ही रह जाता
अपने पास आते लोगों में
प्यार पाने के ख्वाब देखता
वक्त और काम [...]

कहीं शय तो कहीं आदमी बिक जाता है-व्यंग्य कविता

दिन के उजाले में
लगता है बाजार
कहीं शय तो कहीं आदमी
बिक जाता है
पैसा हो जेब में तो
आदमी ही खरीददार हो जाता है
चारों तरफ फैला शोर
कोई किसकी सुन पाता है
कोई खड़ा बाजार में खरीददार बनकर
कोई बिकने के इंतजार में बेसब्र हो जाता है
भीड़ में आदमी ढूंढता है सुख
सौदे में अपना देखता अस्त्तिव
भ्रम से भला कौन मुक्त [...]

रोटी का इंसान से बहुत गहरा है रिश्ता-हिंदी शायरी

पापी पेट का है सवाल
इसलिये रोटी पर मचा रहता है
इस दुनियां में हमेशा बवाल
थाली में रोटी सजती हैं
तो फिर चाहिये मक्खनी दाल
नाक तक रोटी भर जाये
फिर उठता है अगले वक्त की रोटी का सवाल
पेट भरकर फिर खाली हो जाता है
रोटी का थाल फिर सजकर आता है
पर रोटी से इंसान का दिल कभी नहीं [...]

सड़क ने प्यार से जुदा करा दिया-हास्य व्यंग्य कविता

बहुत दिन बाद प्रेमी आया
अपने शहर
और उसने अपनी प्रेमिका से की भेंट
मोटर साइकिल पर बैठाकर किक लगाई
चल पड़े दोनों सैर सपाटे पर
फिर बरसात के मौसम में सड़क
अपनी जगह से नदारत पाई
कभी ऊपर तो कभी नीचे
बल खाती हुई चल रही गाड़ी ने
दोनों से खूब ठुमके लगवाये
प्रेमिका की कमर में पीड़ा उभर आई
परेशान होते ही उसने
आगे चलने [...]

लोगों के मन का सहारा है परनिंदा करना-व्यंग्य आलेख

हमारे देश के लोगों का सबसे बड़ा दोष है-परनिंदा करना। बहुत कम लोग हैं जो इसके कीटाणुओं से मुक्त रह पाते हैं। देखने में भक्त और साधु किस्म के लोग भी इस बीमारी से उतने ही ग्रस्त होते हैं जितने सामान्य लोग। अगर कहीं चार लोगों के बीच चर्चा करो तो वहां अनुपस्थित व्यक्ति की [...]

सौदा होता है सब जगह-व्यंग्य कविता

दिन के उजाले में
लगता है बाजार
कहीं शय तो कहीं आदमी
बिक जाता है
पैसा हो जेब में तो
आदमी ही खरीददार हो जाता है
चारों तरफ फैला शोर
कोई किसकी सुन पाता है
कोई खड़ा बाजार में खरीददार बनकर
कोई बिकने के इंतजार में बेसब्र हो जाता है
भीड़ में आदमी ढूंढता है सुख
सौदे में अपना देखता अपना अस्त्तिव
भ्रम से भला कौन मुक्त [...]