हाड़मांस के पुतलों से
हो गये है नाउम्मीद इसलिये
पत्थर के बुत ही पूजना अच्छा लगता
कम से कम उम्मीद के टूटने का भय तो नहीं रहता
पत्थर बोलते नहीं है
पर जो बुत बोल रहे
स्वर उनके जरूर हैं पर
शब्द पराये होकर डोल रहे ं
आखों में जिनके जीवन है
देख रहे हैं दृश्य
पर उसे किसी का दृष्टिकोण उधार लेकर तोल रहे
उनकी [...]
By दीपक भारतदीप
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अक्लमंदों की महफिल से इसलिये ही
जल्दी बाहर निकल आये
सभी के पास था अपनी शिकायतों का पुलिंदा
किसी के पास मसलों का हल न था
अपनी बात कहते हुए चिल्ला रहे थे
पर करने का किसी में बल न था
करते वह कोई नई तलाश
उनसे यह उम्मीद करना बेकार था
हर कोई अपना मसले का
बयां करने को ही हर कोई तैयार [...]
By दीपक भारतदीप
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उन्होंने अपनी गाड़ी थोड़ी दूर बनवाई। जब वह मैकनिक को पैसे दे रहे थे तब उनके साथ एक मित्र भी था। अपने आपको स्याना साबित करने के लिये उन्होंने मैकनिक पैसे किच किच कर दिये। जितने उसने मांगे थे उससे कम ही दिये।
जब वहां से निकले तो उन्होंने अपने मित्र से कहा-‘यह लेबर क्लास [...]
By दीपक भारतदीप
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कभी तृष्णा तो कभी वितृष्णा
मन चला जाता है वहीं इंसान जाता
जब सिमटता है दायरों में ख्याल
अपनों पर ही होता है मन निहाल
इतनी बड़ी दुनिया के होने बोध नहीं रह जाता
किसी नये की तरह नजर नहीं जाती
पुरानों के आसपास घूमते ही
छोटी कैद में ही रह जाता
अपने पास आते लोगों में
प्यार पाने के ख्वाब देखता
वक्त और काम [...]
By दीपक भारतदीप
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दिन के उजाले में
लगता है बाजार
कहीं शय तो कहीं आदमी
बिक जाता है
पैसा हो जेब में तो
आदमी ही खरीददार हो जाता है
चारों तरफ फैला शोर
कोई किसकी सुन पाता है
कोई खड़ा बाजार में खरीददार बनकर
कोई बिकने के इंतजार में बेसब्र हो जाता है
भीड़ में आदमी ढूंढता है सुख
सौदे में अपना देखता अस्त्तिव
भ्रम से भला कौन मुक्त [...]
By दीपक भारतदीप
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पापी पेट का है सवाल
इसलिये रोटी पर मचा रहता है
इस दुनियां में हमेशा बवाल
थाली में रोटी सजती हैं
तो फिर चाहिये मक्खनी दाल
नाक तक रोटी भर जाये
फिर उठता है अगले वक्त की रोटी का सवाल
पेट भरकर फिर खाली हो जाता है
रोटी का थाल फिर सजकर आता है
पर रोटी से इंसान का दिल कभी नहीं [...]
By दीपक भारतदीप
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बहुत दिन बाद प्रेमी आया
अपने शहर
और उसने अपनी प्रेमिका से की भेंट
मोटर साइकिल पर बैठाकर किक लगाई
चल पड़े दोनों सैर सपाटे पर
फिर बरसात के मौसम में सड़क
अपनी जगह से नदारत पाई
कभी ऊपर तो कभी नीचे
बल खाती हुई चल रही गाड़ी ने
दोनों से खूब ठुमके लगवाये
प्रेमिका की कमर में पीड़ा उभर आई
परेशान होते ही उसने
आगे चलने [...]
By दीपक भारतदीप
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हमारे देश के लोगों का सबसे बड़ा दोष है-परनिंदा करना। बहुत कम लोग हैं जो इसके कीटाणुओं से मुक्त रह पाते हैं। देखने में भक्त और साधु किस्म के लोग भी इस बीमारी से उतने ही ग्रस्त होते हैं जितने सामान्य लोग। अगर कहीं चार लोगों के बीच चर्चा करो तो वहां अनुपस्थित व्यक्ति की [...]
By दीपक भारतदीप
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दिन के उजाले में
लगता है बाजार
कहीं शय तो कहीं आदमी
बिक जाता है
पैसा हो जेब में तो
आदमी ही खरीददार हो जाता है
चारों तरफ फैला शोर
कोई किसकी सुन पाता है
कोई खड़ा बाजार में खरीददार बनकर
कोई बिकने के इंतजार में बेसब्र हो जाता है
भीड़ में आदमी ढूंढता है सुख
सौदे में अपना देखता अपना अस्त्तिव
भ्रम से भला कौन मुक्त [...]
By दीपक भारतदीप
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