Monthly Archives: July 2008

पहले एक कौवा दिखा दो-व्यंग्य कविता

एक श्रोता ने कवि से कहा
‘अपने को बहुत बड़ा कवि समझते हो तो
कौवे पर कोई व्यंग्य कविता लिख कर दिखा दो’
कवि ने उदास होते हुए कहा
‘कौवे पर कविता लिख सकता हूं
पर वीभत्स रस से सराबोर हो जायेगी
सुन लोगे तो तुम्हें रात भर
नींद नहीं आयेगी
कौवे की तस्वीर भी तुम्हें सतायेगी
जिसकी नस्ल ही लुप्त हो रही [...]

भिखारी से साक्षात्कार-लघुकथा

वह लेखक मंदिर के अंदर गया और वहां से बाहर लौटा तो गेहूंआ कुर्ता और सफेद धोती पहले और माथे पर लाल तिलक लगाये एक भिखारी ने अपना हाथ उसकी तरफ बढ़ा दिया और बोला-‘बाबूजी जरा चाय के लिये दो रुपये दे दो।’
लेखक ने अंदर जाते हुए देखा था कि कोई दानी व्यक्ति भिखारियों [...]

ख्यालों का बंधन-हिंदी शायरी

ख्यालों के बंधन में फंसकर
उनके इशारों पर नाचते रहे
जिंदगी मेंं इसलिये हर कदम पर हारते रहे
जो आजाद होकर सोचा
तो सामने हमारे यह बात आई
क्यों हमने उनको अपना सबकुछ माना
जब हमेशा की उन्होंने बेवफाई
दिल की गुलामी से
अच्छा है आजाद ख्याल से जीना
हम क्यों अपना जिस्म
इतने समये से अपने हाथों ही मारते रहे
……………………….

इसलिये अमन के फरिश्ते वहां नहीं बसते-हिंदी शायरी

बादशाह और अमीर दौलत खर्च कर
पत्थरों के बनवाते महल और घर
तिनके तिनके जोड़कर अपनी झौंपड़ी
बनाता है गरीब बसाता है शहर
बसा कर होता है दर-ब-दर
रहकर महलों और और बड़े मकानों में
नहीं चैन से रह पाते बड़े लोग
लग जाते हैं उनको राजरोग
अपने पसीने से नहाया
अपनी ही कमाई का खाया
गरीब जीवन गुजारता चैन से
नहीं सह पाते ऊंचे [...]

स्वयं पढ़ा कुछ नहीं, दूसरों को लिखना सिखाते हैं-हास्य कविता

आया फंदेबाज और एक
किताब हाथ में थमाते हुए बोला
‘दीपक बापू, लो पकड़ लो यह किताब
‘लिखने के नुस्खें सीखें’
एक दोस्त के घर से उठायी
इसे देखकर तुम्हारी याद आयी
हमारा तो न पढ़ने से वास्ता
न लिखने का जाने रास्ता
तुम ही अंतर्जाल पर लिखते
थक गये लगते हो
फ्लाप की जमात में बैठे
हिट होने की जगह तकते हो
तुम पर तरस आया
इसलिये [...]

अब रास्ते से निकलने के लिये तरसे-हास्य कविता

बरसों से कभी ऐसे मेघ नहीं बरसे
हमेशा रहा जल का अकाल
हम पानी की बूंद बूंद को तरसे
बहुत सारी शायरी प्यास पर लिखी
तो कई कवितायें गर्र्मी पर रच डाली
पसीने में नहाते हुए मेघों पर
अपने व्यंग्य शब्दों से हम अधिक बरसे
इस बार राशन पानी लेकर आसमान में मेघ आये
लगता है ढूंढ रहे थे हमको
अपनी बरसात से [...]

खबरों की खबर देने वाले-व्यंग्य कविता

खबरों की खबर वह रखते हैं
अपनी खबर हमेशा ढंकते हैं
दुनियां भर के दर्द को अपनी
खबर बनाने वाले
अपने वास्ते बेदर्द होते हैं
आंखों पर चश्मा चढ़ाये
कमीज की जेब पर पेन लटकाये
कभी कभी हाथों में माइक थमाये
चहूं ओर देखते हैं अपने लिये खबर
स्वयं से होते बेखबर
कभी खाने को तो कभी पानी को तरसे
कभी जलाती धूप तो कभी पानी [...]

पीढियां और जमाना-लघुकथा

वह बच्चा अपने दादा का हाथ पकड़कर सड़क के किनारे खड़ा था। उस समय उसी रास्ते से एक जुलूस निकल रहा था इसलिये दोनों के आगे बढ़ने पर व्यवधान आ गया। इसी कारण दादा अपने पोते को लेकर एक तरफ खड़े हो गये। अचानक उस जुलूस से एक आदमी निकलकर आया जो दादाजी की जानपहचान [...]

मौसम अच्छा हो तो घर पर ही मन जाती है पिकनिक -व्यंग्य

अपने जीवन में मैं अनेक बार पिकनिक गया हूं पर कहीं से भी प्रसन्न मन के साथ नहीं लौटा। वजह यह कि बरसात का मौसम चाहे कितना भी सुहाना क्यों न हो अगर दोपहर में पानी नहीं बरस रहा तो विकट गर्मी और उमस अच्छे खासे आदमी को बीमार बना देती है।
वैसे अधिकतर [...]

क्या फायदा विषय का पहाड़ खोदने से-हास्य कविता

समाज के शिखर पर बैठे लोग
हांकते हैं ऐसे आदमी को
जैसे भेड़-बकरी हों
जो न बोले
न कहे
न देखे
उनके काले कारनामें दिन के उजाले में भी
अपने डंडे के जोर पर चलता उनका फरमान
टूट जाये चाहे किसी का भी अरमान
उन पर कोई नहीं उठाता उंगली
फिर भी समाज की गलियों में
गोल-गोल घूमता है
चाहे वह कितनी भी संकरी हों
………………………………………………..
अब तो मुद्दे [...]

गीत संगीत की महफिल की बजाय महायुद्ध सजाते-हास्य कविता

गीत और संगीत से
दिल मिल जाते हैं पर
अब तो उसकी परख के लिये
प्रतियोगितायें को अब वह
महायुद्ध कहकर जमकर प्रचार कराते
वाद्ययंत्र हथियारों की तरह सजाये जाते
जिन सुरों से खिलना चाहिये मन
उससे हमले कराये जाते
मद्धिम संगीत और गीत से
तन्मय होने की चाहत है जिनके ख्याल में
उन पर शोर के बादल बरसाये जाते
कहें महाकवि दीपक बापू
‘अब गीत और [...]

चिंतन शिविर-हास्य कविता

अपने संगठन का चिंतन शिविर
उन्होंने किसी मैदान की बजाय
अब एक होटल में लगाया
जहां सभी ने मिलकर
अपना समय अपने संगठन के लिये
धन जुटाने की योजनायें बनाने में बिताया
खत्म होने पर एक समाज को सुधारने का
एक आदर्श बयान आया
तब एक सदस्य ने कहा
-‘कितना आराम है यहां
खुले में बैठकर
खाली पीली सिद्धांतों की बात करनी पड़ती थी
कभी सर्दी तो [...]

हर रोज जंग का माडल, हर समय होता-व्यंग्य कविता

हर इंसान के दिल की पसंद अमन है
पर दुनियां के सौदागरों के लिये
इंसान भी एक शय होता
जिसके जज्बातों पर कब्जा
होने पर ही सौदा कोई तय होता
बिकता है इंसान तभी बाजार में
जब उसके ख्याल दफन होते
अपने ही दिमाग की मजार में
जब खुश होता तो भला कौन किसको पूछता
सब होते ताकतवर तो कौन किसको लूटता
ढूंढता है आदमी [...]