सदियों से धोखा देता आया चांद-कविता

 

आज महक जी  के ब्लाग पर एक फोटो और अच्छी गजल देखी। ऐसे में मेरा कवित्व मन जाग उठा। कुछ पंक्तियां मेरे हृदय में इस तरह आईं-

समंदर किनारे खड़े होकर
चंद्रमा को देखते हुए मत बहक जाना
अपने हृदय का समंदर भी कम गहरा नहीं
उसमें ही डूब कर आनंद उठाओ
वहां  से फिर भी निकल सकते हो
अपनी सोच के दायरे से निकलकर
आगे  चलते-चलते कहीं समंदर में डूब न जाना
अभी कई गीतों और गजलों के फूल
इस इस जहां* में  तुम्हें है महकाना

वहां मैंने “अंतर्जाल” लिखा था पर जहां लिख दिया

कभी कभी अंतर्जाल पर ऐसे पाठ आ जाते हैं जिन पर लिखने का मन करता है। तब वहां लिखने के विचार से जब अपना विंडो खोलता हूं और सहजता पूर्वक जो विचार आते हैं लिखता हूं। मैं हमेशा यही सोचता हूं कि अंतर्जाल पर अब मनोरंजक और ज्ञानवद्र्धक मिल जाता है तब उसके लिये कहीं और हाथ पांव क्यों मारे जायें?

इसी कविता पर एक फिर कुछ और विचार आये

समंदर के किनारे
चमकता चांद पुकारे
ऊपर निहारते हुए
एक कदम उठाए खड़े हो
जैसे तुम उसे पकड़ लोगे
पर अपना दूसरा कदम
तुम आगे मत बढ़ाना
सदियों से धोखा देता आया है चांद
किसी के हाथ नहीं आया
इसने कई प्रेमियों को ललचाया
शायरों को रिझाया
पर कोई उसे छू नहीं पाया
उसकी चमक एक भ्रम है
जो पाता है वह सूर्य से
यह हमारी बात पहले सुनते जाना

महक जी अपने ब्लाग पर कई बार ऐसा पाठ प्रकाशित करतीं है कि मन प्रसन्न हो जाता है। हां, मुझे याद आया एक बार उन्होंने अपने पाठ चोरी होने की शिकायत की थी और मुझे तब बहुत गुस्सा आया और उनके बताये पते जब गया था तो वहां उन्होंने अपनी प्यार भरी टिप्पणी रखी थी जिसमें कहीं गुस्सा नहीं बल्कि स्नेहपूर्ण उलाहना थी। तब लगा कि वह बहुत भावुक होकर लिखतीं हैं। यही कारण है कि उनके लिखे से जहां आनंद प्राप्त होता है वही लिखने की भी प्रेरणा मिलती है।
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3 Comments

  1. mehhekk
    Posted 20/05/2008 at 17:22 | Permalink

    इसने कई प्रेमियों को ललचाया
    शायरों को रिझाया
    पर कोई उसे छू नहीं पाया
    उसकी चमक एक भ्रम है
    जो पाता है वह सूर्य से
    यह हमारी बात पहले सुनते जाना
    ye tho bahut sahi baat kahi aapne,chand har premi ko lalchata hai.magar kabhi haath nahi aaya,nahi saath diya hai usne,bhram ka maya jaal hi to hai wo,phir bhi bebaak mann usse pyar karta hai,bahut hi sundar.

    aapne hame apne blog par thodisi jagah dekar jo sanmaan diya hai,uske liye tahe dil se shukrana.

  2. Posted 20/05/2008 at 19:42 | Permalink

    महक जी अच्छा लिखती हैं और देखिये, आपको भी बेहतरीन कविता रचने की प्रेरणा मिल गई.

    दोनों को बधाई.

  3. Posted 20/05/2008 at 21:28 | Permalink

    बहुत खूब….. महक जी की लेखनी के हम भा कायल हैं और आपने तो कविता के माध्यम से ही उन्हें महकता आशीर्वाद दे दिया.
    हमें भी अपनी कविता की दो पंक्तियाँ याद आ गईं जो हमारे जीवन में महत्त्वपूर्ण हैं….
    “सूरज जीवन में जलना तपना सिखाता है
    चन्द्र्मा जलते-तपते जीवन में हँसना सिखा देता है……!”


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