-
लोकप्रियता
-
अभी तक आये पाठको की संख्या
- 55,254 hits
-
पाठकों की पसंद
- ‘सविता भाभी’ से मस्त राम पीछे- व्यंग्य आलेख 'savita bhabhi' se pichhe 'mastram'-hindi vyangya article
- कबीर के दोहे:मन की कल्पना माया के विस्तार तक
- शराबी ईमेल-हास्य व्यंग्य (hasya vyangya)
- कल्पित भाभी, कामयाबी की चाभी,-व्यंग्य कविता kalpit bhabhi, kamyabi ki chabhi-vyangya kavita
- दिल बहलाने के लिए देख लो सुंदर तस्वीरें कहीं-कविता
- दूसरे की दौलत को धूल समझें-चाणक्य नीति (dusre ki daulat ko dhool samjhen-chankya niti
- संत कबीर के दोहे: भक्ति और ध्यान एकांत में करें
- एक टुकड़ा बरफी-हास्य कविता
- मिलावट और नकल का आतंक-हास्य व्यंग्य(nakal aur milavat par hindi vyangya)
- गर्मी पर लिखी कविता बरसात धो गयी-व्यंग्य कविता
- चाणक्य नीति:समय का ख्याल करना पशु-पक्षियों से सीखें
- बरसात के लिये प्रार्थना-हिंदी व्यंग्य (hindi vyangya)
-
नवीन रचनाएं
- दूसरे की दौलत को धूल समझें-चाणक्य नीति (dusre ki daulat ko dhool samjhen-chankya niti
- कल्पित भाभी, कामयाबी की चाभी,-व्यंग्य कविता kalpit bhabhi, kamyabi ki chabhi-vyangya kavita
- मिलावट और नकल का आतंक-हास्य व्यंग्य(nakal aur milavat par hindi vyangya)
- शराबी ईमेल-हास्य व्यंग्य (hasya vyangya)
- ‘सविता भाभी’ से मस्त राम पीछे- व्यंग्य आलेख ’savita bhabhi’ se pichhe ‘mastram’-hindi vyangya article
- श्रीगीता संदेश-गैर धर्म गुणवान होने पर भी दु:खदायी (shri gita sandesh)
- बरसात के साथ धार्मिक चालाकी-हिंदी व्यंग्य (hindi vyangya)
- गर्मी पर लिखी कविता बरसात धो गयी-व्यंग्य कविता
- विदुर नीति-कम ताकत के होते गुस्सा करना तकलीफदेह
- ख़ुद भटके,द्रूसरे को देते रास्ते का पता-व्यंग्य कविता
- बरसात के लिये प्रार्थना-हिंदी व्यंग्य (hindi vyangya)
- मनुस्मृतिः युवती को पति स्वयं चुनने का अधिकार
- पतंग और क्रिकेट-हास्य कविता hindi vyangya kavita
- विदुर नीति-शक्ति से बड़ी इच्छा करना मूर्खता
- क्रिकेट में हार-मनोविज्ञान और अर्थशास्त्र
-
आपका कहना है
dharam on संत कबीर वाणी:जैसा भोजन और पान… harikishunrajbhar on संत कबीर वाणी:ज्ञान रुपी हाथी … Gourav on पहले अपनी नीयत बताओ brajesh mohan bhardw on यह जिंदगी शब्दों का खेल है-हिं… e.gowtham on कबीर के दोहे:मन की कल्पना माया… Pages
Archives
विचारों की धारा-कविता
विचारों की धारा मस्तिष्क में
एकांत से हटकर भीड़ में जाकर
मन में जगह होती है बहुत
This entry was written by दीपक भारतदीप, posted on 19/05/2008 at 17:11, filed under Blogroll, E-patrika, FAMILY, blogging, deepak bharatdeep, friends, hindi epatrika, hindi hasya, hindi internet, hindi jagran, hindi journlism, hindi kavita, hindi litreture, hindi megzine, hindi mitra, hindi nai duinia, hindi poem, inglish, internet, mastram, vyangya, web bhaskar, web dunia, web duniya, web panjab kesri, अनुभूति, अभिव्यक्ति, कला, कविता, जजबात, मस्तराम, व्यंग्य, शायरी, शेर, समाज, साहित्य, हास्य कविता, हास्य-व्यंग्य, हिन्दी शायरी, हिन्दी शेर. Bookmark the permalink. Follow any comments here with the RSS feed for this post.
Post a comment or leave a trackback: Trackback URL.
5 Comments
बढ़िया है.
बहुत सुन्दर व सही कविता है। ‘विचारों की धारा’ ,क्या सही परिभाषा दी है आपने !
घुघूती बासूती
पर दुःख के पल में
घड़ी बंद नजर आती है
गहरी बात । अच्छी बात ।
bhut sunder hai
एकांत से हटकर भीड़ में जाकर
भला कहां मिलती है शांति
अकेले में भी अपनों के दर्द की
याद आकर सताती है
ye baat 100percent humpar bhi lagu hai,bahut hi sundar,sahi jab tak vichar behte hai,nadiya se chanchal rehte hai,jab ruk ke unka dabka ban jata hai,durgand aati hai,ek sashakt abhivyakti ke liye bahut badhai.