जैसी दी शिक्षा वैसा ही शिष्य पाया-हास्य कविता
गुरू चेले थे बरसों से साथ
पर उस दिन गुरू को गुस्सा आया
लग चेले पर बरसने
‘मैने कई बरस तक दी तुझे सीख
पर तू मेरे किसी काम न आया
देश की प्राचीन गुरू-परंपरा पर
तू ने बहुत बड़ा कलंक लगाया’
अभी तक कभी जवाब न देने वाले
शिष्य को भी उस दिन ताव आया
और पलटकर बोला
‘साथ-साथ रहे पर बड़े होने से
तुमकों ऐसे ही गुरू कहकर मैने भरमाया
इसलिये सब सहता आया
वैसे भी इस घोर कलियुग में
तुम्हें सतयुग का प्रसंग कैसे याद आया
उस युग में देते गुरू सात्विक शिक्षा
गुरुदक्षिणा देने के लिये शिष्य मांगते थे भिक्षा
तुमने हमेशा मुझे चाल फरेब करना ही सिखाया
जैसी दी थी शिक्षा वैसा ही शिष्य पाया’
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This entry was written by
दीपक भारतदीप, posted on
May 14, 2008 at 1:49 pm, filed under
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