इंसान तो कठपुतली है-हास्य कविता

आदमी के पंख नहीं होते
जो वह आसमान में उड़ सके
पर उसका मन बिना पंख के ही
उड़ता चला जाता है
उसके पांव आदमी की काबू में होते नहीं
पंरिदे बनाते हैं लोगों के घर में भी घरोंदे
पर उनके बिस्तर पर सोते नहीं
खुशी में झूमकर नाचता इंसान
दुःख  में अपने ही आंखो से बहती
अश्रुधारा में करता स्नान
पर परिंदे कभी रोते नहीं
अपने मन के इशारे पर
कठपुतली की तरह नाचता
कितने भी दावे करे कि
खुद ही चल रहा है इस जीवन पथ पर
अपनी अक्ल पर है उसका काबू
कराती है इंसान की  जुबान दावे आजाद होने के
पर कभी वह सच्चे होते नहीं
अपनी जरूरतों से आगे नहीं उड़ते
इसलिये परिंदे कठपुतली नहीं होते
यह सच है
अपनी ख्वाहिशों के हमेशा गुलाम
रहने वाले  इंसानों के लिये
साबित करना बहुत मुश्किल है कि
वह कठपुतली होते नहीं
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कठपुतली ने चिडि़या से कहा
‘देखो, मैं नाच  और गा सकती हूं
पर तुम ऐसा नहीं कर सकती
मुझे तुम पर तरस आता है’

चिडि़या ने उसकी डोर पकड़ने वाल  नट की
गर्दन पर चांेच मारी तो वह चिल्लाया
छूट गयी उसके हाथ से  डोर
उसने कठपुतली को इस तरह नीचे गिराया
चिडि़या ने लौटकर चिड़े से कहा
‘आदमी कठपुतली को आगे कर बोलता
अपने मन के इशारे पर डोलता 
बोलने से पहले कभी शब्द नहीं तोलता 
दावे करता है आकाश में उड़ने का
कभी ऐसा नहीं करता तब  मचा रहा है शोर
उड़ता तो क्या हाल करता
सर्वशक्तिमान ने इसलिये इसको पंख नहीं लगाया
उड़ने के ख्वाब देखता रहे इसलिये
इंसान को मन की कठपुतली बनाया
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दीपक भारतदीप

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2 Comments

  1. Posted May 11, 2008 at 12:15 pm | Permalink

    डा. रमा द्विवेदी….

    बहुत सही कहा आपने…बधाई…

    दावे करता है आकाश में उड़ने का
    कभी ऐसा नहीं करता तब मचा रहा है शोर
    उड़ता तो क्या हाल करता
    सर्वशक्तिमान ने इसलिये इसको पंख नहीं लगाया
    उड़ने के ख्वाब देखता रहे इसलिये
    इंसान को मन की कठपुतली बनाया

  2. Posted May 11, 2008 at 6:19 pm | Permalink

    बहुत सही!!!


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