जो बडे हैं वह कभी संयम नहीं गंवाते-हास्य कविता

आया फंदेबाज और बोला
”क्या दीपक बापू हम तो
समझते थे कोई भारी भरकम लेखक को
पर हम अब समझे हमें भरमाते हो
सभ्य शब्दों की बात करते हो
गालियाँ लिखने में शर्माते हो
देखो अंतर्जाल पर बडे-बडे लेखकों के नाम का
लेखक गालिया चाप (छाप) जाते
और लोग तारीफ भी कर आते”

सुन पहले चौंके
फिर कुर्सी से उठकर
टोपी को घुमाते कहानी दीपक बापू
”लोगों की हताशा और निराशा दूर करने का
ठेका वैसे हमने नहीं लिया
अभिव्यक्ति की आजादी है
किसी का मुहँ सिलने का
काम हमने कभी नहीं किया
करते हो गालियों की बात
हम नहीं लिखेंगे
चाहे तालियाँ बजे या पड़े लात
लोगों का क्या
जो लेखक होते सामने
उनका पूछते नहीं
पीठ पीछे उनके नाम की
कविताओं के गुणगान कर जाते
समझना तो दूर कभीं पढीं भी
नहीं होगी जिन कवियों की कवितायेँ
उनके पीछे गाते हैं उनकी गाथाएं
और अपना प्रभाव जमाने के लिए
उनकी गालियाँ चिपका जाते
दूसरों पर लाशों का व्यापार करने का
आरोप लगाने वाले
स्वर्गवासी लोगों के नाम से
गालियाँ छपने के लिए आते
अपने दिल के अरमान दबाये दिल में
बडे कवियों के नाम से वाह-वाही लूट जाते
हिन्दी भाषा का है बहुत बडा इलाका
दर्द भी बहुत है यहाँ
इसलिए कवि और लेखक भी बहुत हैं
सबको कौन पढ़ पाता
इसलिए लोग अपनी बात उनसे नाम से
चिपका जाते
हम तो बस इतना जानते कि
जो बडे हैं वह कभी अपना संयम नहीं गंवाते”
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One Comment

  1. Posted March 30, 2008 at 4:40 am | Permalink

    :)


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