जहाँ ले जाता मन-कविता साहित्य

दिल में हो कड़वाहट तो मीठा कैसे लिखें
उदासी हो दिल में, चेहरे से हँसते कैसे दिखें
कितना कठिन अपने को छिपाना मन की आँखों से
जैसे अपने को लगें वैसे ही दूसरों को भी दिखें
जमाने के साथ कब तक चल सकती है चालाकी
कब तक अपने दिल का हाल छिपा कर लिखें
कहीं कोई आस नहीं, फिर भी दिल निराश नहीं
जब तक चल रही सांस, कैसे जिन्दगी से हारते दिखें
कभी अपने कागज़ पर लिखे शब्द थके हुए लगते हैं
हम रुक जाते, पर फिर वह शेर की तरह दौड़ते दिखे
कहाँ ले जाएं इस जमाने से आहत अपना मन
रुकने की सोचें, अगले ही पल उसके कहे पर चलते दिखें

4 Comments

  1. mehhekk
    Posted February 4, 2008 at 5:54 pm | Permalink

    fantastic,mann aisa hi hota hai bawara.khud ke faisle khud hi kar leta hai,aur hum uske piche daudte hai.

  2. Posted February 4, 2008 at 6:22 pm | Permalink

    जीना इसी का नाम है….

    कभी तेज़ धूप तो कभी घनी छांव है…..

    जीवन चलने का नाम…चलते रहो सुबह और शाम…

  3. Posted February 8, 2008 at 7:36 pm | Permalink

    jaha le jata man kavita sahitya

  4. Posted April 22, 2009 at 10:53 am | Permalink

    bhut shi kha apne


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