गुरु कुम्हार शीश कुंभ है, गढ़िं-गढ़िं काढेँ खोट
अंतर हाथ सहार दे, बाहर बाहि चोट
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि गुरु कुम्हार के समान है और शिष्य मिट्टी के समान है। जैसे कुम्हार घडे या बर्तन को सुन्दर व सही आकार प्रदान कर अपने जीवन के प्रगति पथ पर चलने के लिए प्रस्तुत करता है।
जो गोचर जहिं लगि मन जाई
तहँ लगि माया जानेहु भाई
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इन्द्रियाँ और उसके विषय जहाँ तक मन की कल्पना की पहुंच है वहाँ तक केवल माया का विस्तार ही जानना चाहिऐ।
8 Comments
i want to read The DOHA OF KABIR
bahut achha hai ye varnan…
kabirji’s dohes are wonderful. i want to read more.
I just love to read and implement Sant KabirDasjis Dohes and also would like to read more dohes.
ITS A PLEASURE FOR ME TO READ THESE DOHAS AND IMPLEMENT THEM IN MY LIFE.
Kabir das ji ke dohe man ko moh lete hai……
xsr
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It is very interesting and easy to learn.
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